29 November 2009

बाग़ मनहर लग रहा है..एक सपना सज रहा है..



दिल्ली को वर्ल्ड क्लास शहर बनाने का सपना सपना रह जाये इसकी संभावना आज बहुत ज्यादा है..अफ़सोस दिल्ली अभी पेरिस बन पाने के सपने के साथ ना जाने कितने महीने या कितने साल और अपनी बेचैन सांसें गिनता रहेगा?वैसे दिल्ली अगर वर्ल्ड क्लास शहर बन जाए तो तो दिल्ली का चेहरा कैसा होगा? शहर का चेहरा किससे  बनता है? फ्लाईओवरों  से ,जगमगाती नेओन लाइटों से ,शौपिंग मॉलों से ,ए सी बसों से. जी हाँ क्यों नहीं ?शहर अगर एक शरीर है तो इनको शरीर का हिस्सा मानना  ही चाहिए.और अगर हर हिस्सा अच्छा हो तो शहर खुद ब खुद अच्छा हो ही जायेगा. हाँ लेकिन इस शक के साथ ही कि क्या कभी दिल्ली की हर सड़क पेरिस की सड़क जैसी हो जाएगी,क्या उत्तर और दक्षिणी दिल्ली का भेद मिट जाएगा , क्या शहर के वीआईपियों का इलाका और शहर  के मजदूरों के इलाके में समान सुविधा पहुच पायेगी, एक सवाल दिल में जरूर उठता है कि  दिल्ली का चेहरा क्या  दिल्ली वालों के बिना बनाया जा सकता है? अगर दिल्ली वालों से दिल्ली का चेहरा बनाया जाए तो क्या सरकार को नए सिरे से इस बात पर सोचना नहीं चाहिए कि दिल्ली का चेहरा पेरिस जैसा बनने में दरअसल में कितने साल लगेंगे? क्यूकि इस बात की संभावना तो बहुत कम है कि दिल्ली की वह रोज घुटने  पिसने वाली आबादी, रोज हाथों में मामूली से औजार लेकर सड़कों पर दिहाड़ी की तलाश में निकलने वाली आबादी का चेहरा  अचानक  इतना खूबसूरत और चमकदार हो जाए कि शहर में पेरिस की चमक आ जाए. ऐसा नहीं होगा ये कहने और मानने  के लिए किसी आंकड़े की जरूरत हम में से किसी को नहीं.
   तो अगर सरकार को दिल्ली को सचमुच पेरिस बनाना हो तो सरकार के पास क्या विकल्प है? सरकार पचास लाख की बस सड़क पर उतारे, बस स्टॉपों को खूब खर्च कर कर के चमकाए, नालों को पाटने में करोड़ों  लगाये ,या आम आदमी की जिंदगी में इस तरह की सहूलियतें पैदा करें की उसके चेहरे पर चमक खिल  जाए..या शहर के भीतर रोजगार की ऐसी स्थितियां पैदा करें कि लोगों की जेबों में ज्यादा पैसे हों और वे हँसते खिलखिलाते हुए दिखलाई दें?  फिलहाल सरकार पहले विकल्प पर काम कर रही है..और अफ़सोस यह कि वह इसमें भी सफल होती दीख नहीं रही..यानी शरीर का इलाज किये बगैर शरीर को चमकाने कि कोशिश जारी है  जो शर्तिया तौर पर नाकामयाब होने वाली है..चलिए हम सब सरकार के इस प्रयास को थोडा गौर से देखें ..कॉमन वेल्थ गेम के नाम पर शहर को बदलने की जो कवायद शुरू हुई है..वह हम सब के सामने सरकार के चरित्र का पर्दाफाश करने वाली है..हम सब आने वाले महीनों में सौन्दर्यीकरण के इस प्रयास में सरकार के पक्षपात भरे चेहरे से वाकिफ होने  वाले हैं..हम सब इस सच से वाकिफ होने वाले हैं कि विदेशी आगंतुकों के सामने अपनी छवि ऊंची करने के लिए हमारे आपके पैसे का दुरूपयोग करने वाली सरकार का चेहरा दरअसल में कितना और किस हद तक जनविरोधी है..
  हम सब निराला कि कविता तब तक गुनगुना सकते हैं ..बाग़ मनहर लग रहा था/ एक सपना पल रहा था..ये सपना  किसका है..किसके फायदे का है ये हमें आने वाले महीनों में पता लगने वाला है..आइये हम सब एक नए ब्रेकिंग न्यूज का साक्षी बनने की तयारी कर लें..यह ब्रेकिंग न्यूज टीवी स्क्रीन पर आकर गायब होने वाला नहीं होगा बल्कि सरकार के चेहरे पर पड़े सदाशयता के मुखौटे को हमेशा के लिए ब्रेक करने वाला होगा..तो आइये देखिये सरकार का खेल..खेल के नाम पर खेला जाने वाला, आत्मा को कालिख से पोतने वाला खेल..

2 comments:

  1. भैया !
    अच्छा बताया ...
    निराला की ही एक कविता और है ---
    '' खुला भेद पंथी कहाए हुए जो
    लहू दूसरे का पिए जा रहे हैं | ''
    आभार ... ...

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  2. देख रहे पूरा खेल!

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