31 March 2013

ख्वाबों की या भय की भाषा!


पिछले दिनों जब संघ लोकसेवा आयोग ने सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में अंगरेजी के परचे के अंक को कुल अंकों में जोड़ने का फैसला सुनाया, तो इसने हिंदीभाषी राज्यों के छात्रों के भीतर एक गहरे आक्रोश को जन्म दिया. हालांकि चौतरफा विरोध के बाद सरकार ने इस फैसले को टाल दिया, लेकिन इसने एक बार फिर हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के ऊपर अंगरेजी को तरजीह देने की लंबी चली आ रही मानसिकता को उजागर किया है. हर बार की तरह एक बार फिर अंगरेजी के पैरोकारों ने यह तर्क दिया कि अंगरेजी अंतरराष्टÑीय भाषा है. पूरे देश की संपर्क भाषा है. यह कैरियर और तरक्की की भाषा है. अंगरेजी के पक्ष में दिये जाने वाले तर्कों की हकीकत और उसकी राजनीति पर केंद्रित यह लेख मैंने कुछ दिन पहले लिखा था. इस बीच संघ लोक सेवा  आयोग ने अंग्रेजी के अंकों को मुख्य परीक्षा में जोड़ने के निर्णय को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया है और एक भारतीय भाषा और एक अंग्रेजी के पन्ने में क्वालीफाईंग नंबर लाने की पुरानी व्यवस्था को पुनः लागू कर दिया है.





स्कूल का नाम नहीं बताऊंगा. लेकिन यह न समझा जाये कि स्कूल का नाम न लेने के कारण यह घटना अवास्तविक या काल्पनिक है. वाकया जानने के बाद आपको एहसास होगा कि यह तो आपके आसपास की दुनिया का ही किस्सा है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप पटना में रहते हैं या रांची में. दिल्ली में या मुंबई में.

दिल्ली में मैं जिस घर में रहता हूं, उसके ठीक पीछे नगर निगम का एक प्राइमरी स्कूल है.  बच्चे अपनी कक्षाओं में पूरे कंठ से शोर मचाते रहते हैं और उनकी आवाज मेरी चेतना तक को भेदती रहती है, लेकिन शिक्षक नदारद रहते हैं, तो नदारद ही रहते हैं. हाल यह है कि जब कभी किसी शिक्षक की 'ए फॉर एप्पल"  जैसी कोई आवाज मेरे कानों में गूंजती है, मैं अचानक घबरा सा जाता हूं. सरकारी स्कूल की दशा को लेकर यह कोई खोज नहीं है. उन्हें, जिनके बच्चों को इस स्कूल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वे इस हकीकत को कहीं भली-भांति जानते हैं. फिलहाल मैं दिल्ली की एक घटना की जिक्र करना चाहूंगा. मेरे घर एक बिजली मिस्त्री काम करने के लिए आया करता है. उसका नाम लक्ष्मण है. पिछले साल वह मेरे घर पंखा लगाने आया था. पीछे स्कूल से आ रहे शोर को सुन कर वह गुस्से और लाचारी से भर उठा. गुस्सा स्कूल की दशा को देखकर. लाचारी इस बात की कि पिछले साल आर्थिक दिक्कतों के कारण उसे अपने बच्चों का इस साल सरकारी स्कूल में दाखिला कराना पड़ा. लेकिन उसने तय कर रखा था कि वह अगले साल अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में डाल देगा. प्राइवेट स्कूल... जहां उसके बच्चे अंगरेजी पढ़ सकेंगे. जिंदगी बना सकेंगे.

‘अंगरेजी! पढ़ेगा, तो साहब बनेगा. अंगरेजी नहीं पढ़ेगा, तो हमारी तरह बिजली मिस्त्री या ऐसा ही कोई छोटा-मोटा काम करेगा.’ जाहिर है वह अपने बच्चे का दाखिला मॉडर्न स्कूल या डीपीएस में कराने का ख्वाब नहीं देख रहा था. न उन दर्जनों स्कूलों में जिनकी फीस हर महीने हजारों में है. उसके बच्चे अगले साल कहां गये होंगे! गलियों के कोने में मॉडर्न सेंट जोसेफ, न्यू सेंट मैरी, सेक्रेड सेंट अगस्तस, न्यू देलही सेंट जेवियर्स जैसे किसी स्कूल में. जहां न स्कूल के नाम पर कायदे की इमारत है. न खेलने की जगह. न मिड डे मील. न ट्रेंड शिक्षक. फिर वह बिजली मिस्त्री अपने बच्चों को अंगरेजी स्कूल में क्यों भेजना चाहता था! क्योंकि वह अपने अनुभवों से जान चुका है कि अगर उसे अपने बच्चों का भविष्य बनाना है, तो उसे उन्हें अंगरेजी की शिक्षा देनी ही होगी.

यहीं एक दूसरी तसवीर है. दिल्ली के ही मुखर्जी नगर इलाके की. दिल्ली का यह वह इलाका है, जहां देशभर के परीक्षार्थी सिविल सेवा की तैयारी करते हैं.  पिछले दिनों जब संघ लोकसेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा के सिलेबस में बदलाव की घोषणा करते हुए अंगरेजी के पर्चे के अंक को कुल अंकों में जोड़ने की बात की, तो कई सपने जैसे एक साथ जमीन पर आ गिरे. हिंदी माध्यम से परीक्षा की तैयारी करनेवाले छात्रों में इस फैसले को लेकर गहरा आक्रोश था. हिंदीभाषी राज्यों के छात्र महसूस कर रहे थे कि यह फैसला अंगरेजी माध्यम के छात्रों को फायदा पहुंचाने के लिए लिया गया है. इन छात्रों का साफ कहना था कि यह हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी करनेवालों के प्रति सोचे-समझे अन्याय की तैयारी है. मूलत: बिहार के सुपौल जिले के रहनेवाले और पिछले तीन वर्षों से दिल्ली में रह कर सिविल सेवा की तैयारी करनेवाले रजनीश रत्नाकर के कहे में उनके गुस्से और बेबसी के भाव को आसानी से पढ़ा जा सकता था-‘ पिछली बार मैं पांच नंबर से मेरिट लिस्ट में आने से रह गया था. अब मेरे लिए मेरिट लिस्ट में जगह बना पाना नामुमकिन हो गया है. मेरे लिए ही क्यों उन सभी परीक्षार्थियों के लिए जो हिंदी माध्यम में परीक्षा की तैयारी करते हैं. जिनकी शिक्षा अंगरेजी माध्यम स्कूलों में नहीं हुई है.

ये दोनों बहुत दूर की तसवीरें हैं. बिल्कुल दो अलग दुनिया की. दोनों तसवीरों का साझा सूत्र क्या है? गौर से देखें तो लक्ष्मण और रजनीश दोनों में आपको एक भय नजर आयेगा. भय- अंगरेजी के हाथों पीछे छूट जाने का. इसमें शक नहीं कि अंगरेजी हमारे समय की कैरियर की भाषा बन गयी है. लेकिन, सही मायने में यह विशेषाधिकार की भाषा है, जो नौकरियों में एक अभिजात वर्ग का एकाधिकार सुनिश्चित करती है.
यह भविष्य के रास्तों पर एक भाषा के वर्चस्व का भय ही है, जो लक्ष्मण जैसे करोड़ों भारतीयों में यह भाव पैदा करता है कि उसके बच्चे की तालीम अंगरेजी में ही होनी चाहिए. उसे अंगरेजी में अच्छे भविष्य का सुनहरा सपना साकार होता दिखाई देता है. वह ऐसा मानता है, क्योंकि उसे बार-बार विभिन्न तरीकों से ऐसा बताया जाता है. इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकनी ने अपनी किताब ‘इमैजिनिंग इंडिया’ में लिखा है, ‘भारतीय जनसंख्या के लिए अंगरेजी उभरते सपनों की भाषा है- आकर्षक नौकरी और तेजी से उभरते मध्यवर्ग में प्रवेश पाने का पासपोर्ट है.’ निलेकनी गलत नहीं हैं, क्योंकि उदारीकरण के बाद जिस तरक्की पर भारत गर्व करना चाहता है, उसका श्रेय बीपीओ, सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री, प्रबंधन के क्षेत्र में काम करनेवाले अंगरेजी भाषी नये युवा मध्यवर्ग को दिया जाता है. हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा लेनेवाला युवा इस तरक्की से बाहर हैं. अंगरेजी में हाथ तंग होने के कारण इस दुनिया में उसके लिए ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा है.

संघ लोकसेवा आयोग 
जब संघ लोकसेवा आयोग जैसी संस्था भी अपने फैसले से सिविल सेवा में अंगरेजी में शिक्षित वर्ग का एकाधिकार सुनिश्चित करने की कोशिश करती दिखे, तो इस भय का बढ़ना लाजिमी है. संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में अंगरेजी के एक पेपर को अनिवार्य करने की हालिया कोशिशों को क्षेत्रीय भाषा के छात्रों के साथ अन्याय करने की लंबी चली आ रही नीति के विस्तार के तौर पर देखा जा सकता है. हालांकि यह कोशिश फिलहाल विफल हो गयी है, लेकिन इसने एक पुराने संदेश को दोहराने का काम तो किया ही है कि अगर आप शीर्ष पर पहुंचने का कोई ख्वाब देखना चाहते हैं, तो वह ख्वाब अंगरेजी में देखना ही बेहतर है. हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में देखे गये ख्वाब की इबारत काफी धुंधली होती है. लोकसेवा आयोग के इस फैसले के अर्थों को स्पष्ट करते हुए प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘इस फैसले का मंतव्य साफ है कि या तो खुद को अंगरेजी में सिद्ध करो या ऊंची नौकरियों यानी उन ओहदों से दूर रहो, जहां से देश का भविष्य संवारा जाता है. आयोग का यह फैसला भूमंडलीकृत दुनिया में अंगरेजी से जान-पहचान को बढ़ावा देनेवाला नहीं है, बल्कि बहु-भाषिकता से परिभाषित होनेवाली एक सभ्यता के भीतर एकभाषी अभिजन गढ़ने की कोशिश है. यह प्रतिभा को पुरस्कार देनेवाला नहीं, बल्कि भावी सिविल सर्वेंट के चयन के सामाजिक दायरे को जान-बूझ कर छोटा करने की कोशिश है. फैसले से निकलनेवाला संदेश यह है कि देश की 99 फीसदी आबादी जिन जबानों को बोलती है, उसकी काम चलाऊ जानकारी भी जरूरी नहीं है.’ पिछले साल हिंदी दिवस के सिलसिले में सीएसडीएस के भारतीय भाषा कार्यक्रम के संपादक अभय कुमार दुबे ने नौकरशाही के भाषायी चरित्र पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी,‘पहले संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में दी ही नहीं जा सकती थी. लेकिन 70 के दशक में दौलत सिंह कोठारी की सिफारिशों के बाद इसे क्षेत्रीय भाषाओं में भी आयोजित किया जाने लगा. इसके बाद संघ लोकसेवा आयोग में बैठने वाले छात्रों की संख्या में दिन दोगुनी रात चौगुनी बढ़ोतरी हुई है. रिक्शे वाले का बेटा, दफ्तर में चपरासी की नौकरी करने वाले का बेटा भी इस परीक्षा में कामयाब हो रहा है. आज इस अभिजन ब्यूरोक्रेसी की दीवारें चटक रही हैं.’ उन्होंने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी, ‘भाषा के जितने भी मोरचे थे, उनमें से ज्यादातर में अंगरेजी का वर्चस्व समाप्त हो गया है या हो रहा है. अगर केंद्रीय ब्यूरोक्रेसी से अंगरेजी के प्रभुत्व को समाप्त कर दिया जाये, तो हिंदी आधी लड़ाई खुद जीत लेगी. जरूर यह लड़ाई आसान नहीं है.’ यूपीएससी के फैसले में इसी लड़ाई की आहट सुनी जा सकती है.

जाहिर है, लक्ष्मण जैसा आम भारतीय यह लड़ाई लड़ने में खुद को अक्षम पाता है. यही कारण है कि वह इस फैसले पर पहुंचता है कि उसे किसी भी हाल में अपने बच्चे को अंगरेजी में शिक्षा देनी है. यही वह सोच है, जिसने देश में अंगरेजी मीडियम और प्राइवेट स्कूल के व्यवसाय को आश्चर्यजनक विस्तार दिया है. शहर से गांव तक. गांव से शहर तक. यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी झोपड़पट्टियों में अंगरेजी माध्यम के प्राइवेट स्कूलों की संख्या में खासी बढ़ोतरी देखी गयी है. ‘असर’ की हालिया रिपोर्ट से यह बात सामने आयी है कि पूरे देश में ग्रामीण भागों में भी प्राइवेट स्कूलों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या का अनुपात बढ़ा है. 2006 में ग्रामीण क्षेत्रों में जहां  6-14 वर्ष के आयु वर्ग के 18.7 फीसदी बच्चे प्राइवेट स्कूल में भर्ती थे, वहीं 2012 में यह बढ़ कर 28.3 फीसदी हो गया. यह अलग बात है कि जब ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे पांचवीं के छात्रों से अंगरेजी वाक्य पढ़ने को कहा गया तो पचास फीसदी से ज्यादा बच्चे ऐसा नहीं कर पाये.

लक्ष्मण से कुछ दिन पहले फिर मुलाकात हुई. मैंने उससे पूछा कि उसके बच्चे कहां पढ़ रहे हैं. उसने उत्साह के साथ जवाब दिया कि चार महीने बाद ही उसने अपने दोनों बच्चों का दाखिला प्राइवेट स्कूल में करा दिया था. उसके चेहरे पर इस बार एक संतोष था. इस उम्मीद का संतोष कि अब उसके बच्चे अंगरेजी के ज्ञान के अभाव में अपनी उम्र के दूसरे बच्चों से पिछड़ जाने पर मजबूर नहीं होंगे और जीवन में कुछ बेहतर कर पायेंगे. मैंने उससे स्कूल का नाम नहीं पूछा. न यह पूछा कि स्कूल में पढ़ाई कैसी होती है? लक्ष्मण को मालूम है कि वहां ‘अंगरेजी की पढ़ाई होती है’ और उसके लिए इतना ही काफी है.

फिल्म मेकिंग की किताब है ‘प्यासा’ : राकेश ओम प्रकाश मेहरा


कुछ फिल्में एक याद की तरह जिंदगी में रह जाती हैं. यह याद गुजरते वक्त के साथ भी धुंधली नहीं पड.ती. उसके संवाद, दृश्य और किरदार एक हल्की-सी आहट पाकर सामने आ खडे. होते हैं. ऐसी ही एक फिल्म की याद  को उर्मिला कोरी के साथ साझा किया है. फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने. 


सिनेमा से मेरी शुरुआती पहचान रविवार के दिन दूरदर्शन पर आनेवाली ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों और ऑल इंडिया रेडियो पर फिल्मों के संवादों के माध्यम से हुई थी. बीतते सालों के साथ यह पहचान दोस्ती और दोस्ती जल्द ही प्यार में बदल गयी. जिस तरह से प्यार में दिमाग से नहीं दिल की सुनते हैं, ऐसे ही मुझे लगता है कि सिनेमा दिल से देखने की चीज है, दिमाग से नहीं. बस शर्त यह होनी चाहिए कि वह दिल को छू सकने का माद्दा भी रखता हो. एक ऐसा सिनेमा जो मनोरंजन के साथ-साथ एक सोच भी दे, मेरे लिए वही फिल्म है. यह सब मैंने गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ में पाया है. 

आम तौर पर लोग ‘प्यासा’ को मुख्य रूप से एक रोमांटिक फिल्म मानते हैं, लेकिन गौर करें तो यह फिल्म समाज पर भी पैनी चोट करती है. आजादी के बाद नेहरू और गांधी के दिखाये सपने जब टूट रहे थे और देश बेरोजगारी और भुखमरी का शिकार हो रहा था, तो इस फिल्म का गीत ‘जिन्हें हिंद पर नाज है..’ के शब्द पूरी तरह से व्यवस्था पर प्रहार करते हैं. साथ ही इसमें दुनिया का अजीब रंग भी दिखाया गया है. जिस प्रतिभाशाली शायर विजय को जमाने ने ठुकरा दिया था, उसी को मुर्दा समझ कर वही जमाना सिर आंखों पर बैठाने को तत्पर हो गया. आखिर हम मरने के बाद ही लोगों की कद्र क्यों करते हैं!

इस फिल्म के जरिये गुरुदत्त ने यह बात फिर साबित कर दी थी कि वह अद्भुत फिल्मकार थे. उन्होंने जिस तरह से फिल्म के क्लाइमेक्स को रचा था, अंधेरे सभागार के दरवाजे से आ रहे प्रकाश के बीच, सलीब पर टंगे ईसा मसीह की मुद्रा में दरवाजे पर खडे. विजय की छवि, वह सीन हिंदी सिनेमा के यादगार फ्रेमों में से एक था. फोटोग्राफी का बेजोड. संगम था. इस फिल्म के लिए छायाकार वीके मूर्ति की भी जितनी तारीफ की जाये कम है. अभिनय के लिहाज से भी यह फिल्म क्लासिक है. वहीदा जी, गुरुदत्त, रहमान और माला सिन्हा सभी बेहतरीन थे. कुल मिला कर ‘प्यासा’ फिल्ममेकिंग की किताब है, जिसका हर फ्रेम, संवाद, गीत-संगीत आपके दिल को छू जाता है. 

                                                                                 उर्मिला कोरी युवा फिल्म  रिपोर्टर हैं 
     

30 March 2013

कथा लेखन मेरी नियति थी : उषा किरण खान


साहित्य सीमाओं का अतिक्रमण करता है, लेकिन यह अतिक्रमण थोडा ख़ास होता है. यहाँ वैश्विक होने की कोशिश नहीं की जाती. यहाँ लोकल ही ग्लोबल हो जाता है. साहित्य समतल(चपटी) दुनिया की रचना नहीं है..यह बहुसांस्कृतिक, बहुभाषिक दुनिया में एकता लाने की रचनात्मक कोशिश है. साहित्य की दुनिया में सैकरों हजारों दुनिया एक साथ सांस लेते हैं. सैकड़ों भूगोल, सैकड़ों इतिहास एक साथ बसर करते हैं . यही साहित्य का गणतंत्र है. साहित्य के ऐसे ही गणतंत्र में मिथिलांचल की कहानियों को शामिल करनेवाली कथाकार हैं उषा किरण खान.  वे हिंदी और मैथिली दोनों भाषाओं में लिखती हैं. मैथिली  उपन्यास भामती के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ कथाकार उषा किरण खान से  उनके सृजन संसार के बारे में यह बातचीत प्रीति सिंह परिहार ने कुछ महीने पहले की थी. यहाँ  साक्षात्कार के संक्षिप्त अंश को आत्मवक्तव्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है 


स्कूल के दिनों में ही मैं कविताएं और नाटक लिखने लगी थी. कॉलेज में पढ़ाई के दौरान बाबा नागार्जुन के साथ कविता पाठ में भी जाती थी. लेकिन लिखना बीच में कुछ दिनों के लिए स्थगित हो गया. बच्चे जब थोड़े बड़े हुए और स्कूल जाने लगे तब बाबा नागार्जुन ने कहा कि अब लिखना-पढ़ना शुरू करो. मैंने उनसे, कविता की बजाय कहानी लिखने की इच्छा जाहिर की. उन्होंने कहा कहानी के साथ उपन्यास भी लिखो. इस तरह नियमित लेखन की शुरुआत 1977 में हुई और यही वह वक्त था जब मैं कविता छोड़ कथा लेखन की ओर मुड़ गयी. 
‘कहानी’ पत्रिका में पहली कहानी ‘आंखें स्निग्ध तरल और बहुरंगी मन’ प्रकाशित हुई. इसके बाद धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान में भी कहानियां और लेख प्रकाशित होने लगे. कथा लेखन का सिलसिला जो शुरू हुआ, अब तक जारी है. ऐसा लगता है कि शायद कथा लेखन ही मेरी नियति थी. ऐसा नहीं हुआ कि कहानी मेरे दिमाग में अचानक आयी और मैंने तत्काल लिखना शुरु कर दिया. किसी रचना का विचार बहुत दिनों तक मेरे भीतर चलता रहता है. कोई कहानी जब तक पूरी तरह आकार न ले, तब तक मैं लिखने नहीं बैठती. आकार लेने के बाद कहानी, मैं अधिकतर एक सिटिंग में लिख लेती हूं. लेकिन उपन्यास लिखने के लिए दिमाग में जैसे-जैसे चीजें आती हैं, उनका नोट्स लेती हूं. पहला उपन्यास पचास-साठ कहानियां लिखने के बाद लिखा.
रूढ़ियों से टकराहट और स्वतंत्रचेता स्त्री मेरे लेखन के मूल में शामिल रहे हैं. मैं गांधीवादी परिवार से हूं. मेरे पिता ने गांव के पास एक आश्रम बनाया था. मैंने वहां के जीवन को करीब से देखा है. आज भी साल में कम से कम दो बार वहां जाकर एक दो महीने रहती हूं. एकाध अपर कास्ट और संपन्न परिवार को छोड़, वहां अधिकतर उपेक्षित वर्ग के लोग रहते हैं. मेरी रचनाओं के अधिकतर पात्र भी मुझे वहीं से मिले. दरअसल, हर लेखक अपने पारिवारिक और सामाजिक परिवेश को अपने साथ लेकर चलता है.

कल्पना की भूमिका के बिना साहित्य नहीं रचा जा सकता. रचना का आधार यथार्थ होता है, लेकिन उसकी बुनावट कल्पना से होती है. वाचस्पति मिश्र के जीवन पर आधारित ‘भामती’ उपन्यास लिखने से पहले मैंने उनके बारे में बहुत सी किताबें और दंत कथाएं पढ़ी-सुनी थीं. लेकिन ‘भामती’ लिखना कल्पना के बिना संभव नहीं था. मेरे लेखन का सबसे मुश्किल पक्ष रहा है, समय का अभाव. एक स्त्री के लिए कभी परिस्थितियां ऐसी नहीं हो पाती हैं कि वह चाह कर भी लेखन को प्राथमिकता में रख सके. घर-परिवार और समाज उसे पहले देखना पड़ता है. मुझे लगता है मेरे लिए ही नहीं, हर महिला लेखक के लिए सबसे बड़ी चुनौती है लिख पाना.
मैथिली मेरी मातृभाषा है, लेकिन पढ़ाई मैंने हिंदी में की है, लिखने का अभ्यास हिंदी में है, इसलिए हिंदी लिखना सरल लगता है. लेकिन दोनों भाषाएं मुझे प्रिय हैं. मन में कोई चीज जिस भाषा में सहज ढंग से आ जाती है, उसी में लिख लेती हूं. दोनों भाषाएं मेरी अपनी हैं.
मैं कई विधाओं में लिखती हूं, लेकिन कहानी मेरे दिल के करीब है. कहानी में जब बात नहीं बनती,तब उपन्यास लिखती हूं. मेरी रचनाओं के ज्यादातर किरदार मेरे गांव के हैं. यथार्थ में कुछ किरदार आज भी मौजूद हैं. पंचायती राज व्यवस्था के बाद उनमें जो परिवर्तन आया, उस पर मैंने ‘पानी पर लकीर’ उपन्यास लिखा. ‘फागुन के बाद’ उपन्यास लिखने का विचार मुझे बाबा नागजरुन से मिला. उन्होंने मुझसे कहा था, तुम एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार से हो. तीस वर्षो में तुमने क्या देखा-समझा, उसे लिखो. ये बात मेरे दिमाग में घुमड़ रही थी और मैंने इस पर मैथिली में लघु उपन्यास ‘अनुत्तरित प्रश्न’ लिखा. लेकिन, उससे मेरा मन संतुष्ट नहीं हुआ तब मैंने दूसरे आम चुनाव के ठीक पहले यानी 1956 के कालखंड पर ‘फागुन के बाद ’ लिखा. आजादी के बाद लोग किस उत्साह से भरे हुए हैं, गांव में क्या परिवर्तन हो रहे हैं, इस सबको अभिव्यक्त करने साथ मैंने यह संदेश दिया कि ‘फागुन के बाद’ का मौसम आने वाला.

मैं किसी भी वक्त लिख सकती हूं. लेकिन मुझे शुरू से सुबह चार बजे से 7 बजे तक लिखने का अभ्यास रहा है, क्योंकि पहले घर की जिम्मेदारियां अधिक थीं. मैं कॉलेज में पढ़ाती भी थी.अब सेवानिवृत्त हो गयी हूं. मेरे कमरे में पहले की तरह भीड़-भाड़ नहीं होती है. इसलिए मैं कभी भी लिख सकती हूं. बरसात का मौसम मुझे अपने लेखन के लिए बहुत ही मौजूं लगता है.
अपनी हर रचना रचनाकार को उसी तरह प्रिय होती है, जैसे अपने बच्चे. लेकिन मुझे ‘फागुन के बाद’ पूरा होने के बाद सबसे अधिक खुशी हुई थी, जबकि ‘भामती’ में मैंने ज्यादा मेहनत की थी. इसके बाद मैथिली में मैंने ‘हसीना मंजिल’ उपन्यास लिखा, तो मन को बहुत सुकून मिला. यह इंडियन क्लासिक में शामिल है. लेकिन सबसे ज्यादा मेहनत मैंने ‘सृजनहार’ उपन्यास में की. एक तरह से यह कवि विद्यापति की जीवनी है. मुझे हैरानी होती है कि मैंने पांच सौ पेज का उपन्यास कैसे लिख दिया. यह भारतीय ज्ञानपीठ से आया है. इसके दो संस्करण बिक चुके हैं, जबकि आज तक इसकी एक भी समीक्षा नहीं छपी है. लेकिन इस पर बहुत ज्यादा पत्र और फोन आते हैं. संतोष होता है इससे. इसे पढ़कर ओड़िशा और असम के कई लोगों ने बताया कि उनके यहां भी विद्यापति के संदर्भ में कई दंत कथाएं हैं. तब मुझे लगा, अरे ये सब तो छूट गया. बंगाल, पूर्वाचल और मिथिला में विद्यापति की प्रसिद्धि के किस्से तो मुझे मालूम थे, लेकिन असम और ओड़िशा में प्रचलित कथाओं के बारे में नहीं पता था.
मैं जब लिख नहीं रही होती हूं, तो पढ़ना पसंद करती हूं. विश्व साहित्य में मैंने अंगरेजी के कुछ उपन्यासों के अलावा ज्यादा कुछ नहीं पढ़ा, क्योंकि भारतीय भाषाओं में ही इतना उत्कृष्ट और विपुल साहित्य है पढ़ने के लिए. बाबा नागाजरुन का लेखन शुरू से मुझे प्रभावित करता रहा है. मैथिली में प्रभात कुमार चौधरी की रचनाएं बहुत पसंद हैं. हिंदी में गोविंद मिश्र, जो अभी ज्यादा चर्चित नहीं हैं, उनके और शिव प्रसाद सिंह के उपन्यास मुझे अच्छे लगते हैं. महिला लेखिकाओं में मैत्रेयी पुष्पा, नासिरा शर्मा और राजी सेठ का लेखन प्रभावित करता है. निर्मल कुमार का उपन्यास ‘रितुराज’ पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. यह आदि शंकराचार्य की जीवनी है एक तरह से. मेरा मन करता है कि उस उपन्यास को भूल जाऊं और शंकराचार्य पर एक उपन्यास लिखूं. 

वर्तमान समय-समाज का सबसे बड़ा संकट है जीवन को बचाये रखना. आप घर से निकल कर चौराहे तक जाते हैं और आपको पता नहीं होता है कि लौट कर आयेंगे भी या नहीं. मुझे लगता है कि हर प्रकार के जीवन उपयोगी साधनों से हम वंचित होते चले जा रहे हैं. यह भौतिक संकट है. वैचारिक संकट है, वैश्वीकरण.देश में वैश्वीकरण जिस तरह आया है, वह हमें हमारी ही दुनिया से बेदखल कर रहा है. ऐसे में लेखक की भूमिका तभी प्रभावी हो सकती है जब उसका लिखा हुआ लोग पढ़ें. लेखक सड़क पर लाठी लेकर नहीं उतर सकता, कलम से ही अपना प्रतिरोध जताता है. वह लगातार अपना प्रतिरोध दर्ज कर रहा है. जरूरी ये है कि उसे कितने लोग पढ़ते हैं.

इन दिनों मैं शेरशाह सूरी पर उपन्यास लिखने की तैयारी में जुटी हूं. तकरीबन साल भर बाद मेरा यह उपन्यास पाठकों के सामने होगा. लिख नहीं रही होती हूं, तो पढ़ती हूं दूसरों को. इसके अलावा गिरिजा देवी, सरिता देवी के गायन के साथ लोक संगीत सुनना पसंद करती हूं.

27 March 2013

सौ साल के सिनेमा में गायब होती होली...

कभी समय था जब फ़िल्मी परदे पर होली को एक अनिवार्य आकर्षण के रूप में समाहित किया जाता था. लेकिन सिनेमा के सौवें साल तक आते आते हिंदी सिनेमा से होली लगभग गायब हो चुकी है। सौ साल का सिनेमा और होली के साथ इसके रिश्ते को बारीकी से देखा है फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने. आप भी पढ़िए और होली के रंग में डूबिये उतरिये.  





मल्टीप्लेक्सों की चमक में धब्बे के डर से पानी की बोतलों पर भी जब प्रतिबंध लगा, तो बाजार के आगे समर्पित हिंदी सिनेमा ने बगैर प्रतीक्षा किये परदे पर भी होली को दिखाना प्रतिबंधित कर लिया. शायद कथित आधुनिक सौंदर्यबोध ने आज के फिल्मकारों को यह सीख दी होगी कि होली का भदेसपन, मल्टीप्लेक्स के अति अभिजात्य वातावरण में टाट की पैबंद सरीखा दिखेगा. आश्‍चर्य नहीं कि कभी हिंदी सिनेमा के लिए अनिवार्य रही होली अब सिर्फ सिनेमा की खबरों में दिखायी देती है, सिनेमा के परदे पर नहीं. वास्तव में सिनेमा ने दर्शक बदले, तो उसके त्योहार भी बदले, आज ‘वेलेन्टाइन डे’ और ‘फ्रेंडशिप डे’ हिंदी सिनेमा सेलिब्रेट कर रही है, कभी समय था जब परदे पर होली को एक अनिवार्य आकर्षण के रूप में समाहित किया जाता था. यह वह समय था जब हिंदी फिल्में, हिंदी दर्शकों को ध्यान में रख कर बना करती थीं. उस समय -‘होली आई रे’, ‘होली’, ‘फागुन’ जैसी कई फिल्में बनी, जिसमें सारा कथानक होली के इर्द-गिर्द ही घूमता था. 

यह वह समय था, जब हिंदी सिनेमा के लिए होली वर्जनामुक्त होने का एकमात्र बहाना था. यह सिर्फ रंग और उत्साह का अवसर नहीं था, मानव मुक्ति का अवसर था, जिसमें मन की कुंठाओं, आग्रहों और पूर्वाग्रहों से मुक्ति पायी जाती थी. आज के समाज को शायद ही समझ में आये कि होली का वर्जनामुक्ति से क्या संबंध है? उनके लिए तो हरेक दिन और दिन के हर घंटे वर्जनामुक्त हैं. ‘जिस्म’ और ‘र्मडर’ के दौर में जब महेश भट्ट जैसे फिल्मकार विवाहेत्तर संबंध को स्वाभाविक मानकर चल रहे हों, जहां सहमति से सेक्स की उम्र सोलह करने के लिए दवाब बन रहा हो, वहां कैसे किसी से यह समझने की उम्मीद की जा सकती है कि ‘फूल और पत्थर’ में होली के अवसर पर पुलकित होकर मीना कुमारी क्यों गाती हैं, ‘लायी है हजारों रंग होली...’, आज की पीढ.ी के लिए यह एहसास दुर्लभ है.

जाहिर है विपुल शाह की कुछ वर्ष पहले आयी ‘वक्त- रेस अगेंस्ट टाइम’ में होली दिखायी भी जाती है, तो अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड.ा की ‘लेट्स प्ले होली’ की सरगोशियों के साथ, यहां तय करना मुश्किल हो जाता है कि यह कोई रेनडांस का सीक्वेंश है या उस होली का दृश्य जिसे हम जानते रहे हैं. यह होली के स्वभाव का ही कमाल है कि रंगों के लिए जाने जाना वाला यह त्योहार हिंदी सिनेमा में तब भी दिखाया जाता था, जब उसके पास रंगों की ताकत नहीं थी. यूं तो कई श्‍वेत-श्याम फिल्मों में होली दृश्य पूरी जीवंतता से फिल्माये गये, लेकिन 1950 में बनी ‘जोगन’ के ‘डारो रे रंग डारो रसिया’ को आज भी भुलाना संभव नहीं हो पाता. इस गीत में दिखती नरगिस की जीवंतता फिर एक बार देखने को मिली महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ में. गांव की अलमस्ती, छेड.छाड. और ,संबंधों की गरमाहट प्रदर्शित करती ‘होली आई रे कन्हाई रंग छलके, सुना दे जरा बांसुरी..’ आज भी होली के उत्साह से सराबोर कर जाती है.

‘मंगल पांडे’ में ‘भीगी चोली, चुनरी भी गीली हुई, सजना देखो मैं नीली हुई. थोड.ी-थोड.ी तू जो नसीली हुई, पतली कमर लचकीली हुई. .तुम रह-रह के फेंको न यह नजरों का जाल.अब हमें कोई रोके नहीं, कोई टोके नहीं.. ’ के बोल पर एक ओर मंगल पांडे और नर्तकी के प्रेम को परवान चढ.ते दिखाया जाता है, वहीं दूसरी ओर कम उम्र में विधवा बनी अमीशा के मन में उमडे. स्वभाविक उत्साह को भी प्रदर्शित किया जाता है. केतन मेहता के लिए मंगल पांडे के कालखंड में वर्जना को टूटते दिखाये जाने का होली के अलावा दूसरा अवसर नहीं हो सकता था.

अधिकांश हिंदी फिल्मों में होली के अवसर का उपयोग कथानक को एक नया मोड. देने के लिए ही किया गया है. राजेश खत्रा अभिनीत ‘कटी पतंग’ की, ‘आज न छोडे.ंगे हमजोली...’ के गीत होली के मूड को दोगूना ही नहीं करते, इस गीत में अभिव्यक्त एक युवा विधवा के दर्द का कंट्रास्ट इसे और भी प्रासंगिक बना देता है. कई फिल्मों में होली का अवसर प्रेम की मुखर अभिव्यक्ति के रूप में भी प्रदर्शित हुआ है. राकेश रोशन की ‘कामचोर’ में नायिका, ‘जहां मल दे गुलाल मोहे ..’ की मांग करती है, वहीं ‘डर’ में नायिका अज्ञात प्रेमी के भय से मुक्त होने का उत्साह अपने पति के साथ इन शब्दों के साथ मनाती है, ‘अंग से अंग मिलाना सजन ऐसे रंग लगाना..’.

आज जब तय रूप से हिंदी फिल्में मल्टीप्लेक्स और एनआरआइ दर्शकों को ध्यान में रख कर बनायी जा रही हैं, उसमें होली जैसे त्योहार की गुंजाइश ही नहीं बचती. हिंदी समाज में होली अभिजात्य लोगों द्वारा भी भले ही मना ली जाती रही हो, लेकिन खेलने की परंपरा सर्वहारा की ही रही है. कह सकते हैं होली का आनंद बगैर सर्वहारा हुए हम नहीं उठा सकते. निश्‍चय ही आज के कथित कॉरपोरेट दौर में जब सब कुछ एकदम करीने से चाहिए होता है, होली की भदेस सामूहिकता कैसे सूट कर सकती है. उन्हें नीली रोशनी में दिखाये जा रहे नितांत अंतरंग दृश्यों पर आपत्ति नहीं होती, लेकिन ढोल-मजीरे की थाप पर होरी का समूह गायन उन्हें अश्लील ही नहीं, विद्रुप भी लगता है. आश्‍चर्य नहीं कि लंबे अंतराल के बाद आये ‘बागवान’ के गीत ‘होली खेले रघुवीरा..’ के अतिरिक्त होली गीतों के नाम पर हिंदी सिनेमा में सत्राटा ही दिखायी पड.ता है. ‘बागवान’ की होली भी इसलिए दर्शकों को स्वीकार्य हो गयी. क्योंकि यह एक परिवार की कहानी थी, इसमें एक समाज को स्थापित करने की कोशिश की गयी थी. सबसे बढ.कर इसमें महानायक अमिताभ बच्चन थे, जहां आकर सारे फिल्मी गणित और व्याकरण ध्वस्त हो जाते हैं.



यह मात्र संयोग नहीं कि हिंदी सिनेमा के पांच कालजयी होली गीतों को याद करने की कोशिश करें तो तीन अमिताभ पर ही फिल्माये गये हैं. ‘बागवान’ से पहले ‘सिलसिला’ का रंग बरसे.., और उससे पहले ‘शोले’ का विहंगम, होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं..’. वर्षों से लोकगीत के रूप में गाये जाने वाले, रंग बरसे..का विकल्प नहीं ढूंढ.ा जा सकता. होली और होली गीत ही किसी व्यक्ति को अपने प्रेम की सार्वजनिक अभिव्यक्ति की ताकत दे सकते हैं. खासकर तब जब वह सामाजिक दायरे से बाहर भी हो. ऐसा ही स्मिता पाटिल अभिनीत ‘आखिर क्यों’ में भी दिखा था, जब नायक अपनी पत्नी के सामने ही उसकी छोटी बहन से प्रणय निवेदन कर बैठता है, ‘सात रंग में खेल रही दिलवालों की होली रे..’. ये होली गीत फिल्म के कथानक में भी महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं. और केवल नायिका के तन दिखाने का बहाना मात्र नही होते. जैसा सावन कुमार की ‘सौतन’ मे दिखा था, जब वे मॉरिशस में नायिका को ‘मेरी तो पहले ही तंग थी चोली, आ गयी बैरन होली.’ के साथ होली के रंगों में सराबोर दिखाते हैं.

सच यही है कि अधिकांश फिल्मों में होली सौंदर्य, सामाजिकता और संगीत का समन्वय ही प्रदर्शित करती आयी है. वास्तव में जिसे भुलाना संभव नहीं. ‘कोहीनूर’ को आज हम भले ही याद न कर पायें, लेकिन अपने मन से उसके ‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो’ को उतार पाना कतई संभव नहीं. वी शांताराम ने भी अपनी पहली रंगीन फिल्म ‘नवरंग’ में एक अद्भुत होली गीत रखा था, जिसे नृत्यांगना संध्या की चपलता ने अविस्मरणीय बना दिया. छेड.छाड. के साथ कुछ यूं शुरू होते हैं, गीत के बोल, कटक अटक झटपट पनघट पर चटक मटक झनकार नवेली.. और फिर प्रत्युत्तर शुरू होता है, जारे हट नटखट.. गौरतलब है कि इस गीत में नायक नायिका दोनों की ही भूमिका अकेले संध्या ने ही निभायी थी. यहां ‘नदिया के पार’ को कैसे भूला जा सकता है, जोगिड.ा सारारारा..भोजपुरी पृष्ठभूमि वाले इस गाने में नायक नायिका ही नहीं पूरा गांव रंगों में सराबोर दिखता है. बूढे. से लेकर बच्चे तक. होली के अवसर पर पारंपरिक नटुआ नाच की झलक भी शायद यहां पहली बार हिंदी फिल्म में दिखी थी.

होली की विशेषता ही है जितने रंग हैं, उतने ही मूड हैं. हिंदी सिनेमा ने कमोबेश होली के हरेक मूड को फिल्माने की कोशिश की भी की है. अब होली भी खो रही है और उसकी विशेषता भी, जाहिर है परदे से भी गुम हो रही है होली.

विनोद अनुपम राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 

25 March 2013

साहित्य यह दिखाने का काम करता है कि पीड़ा हमेशा रहेगी : मो यान



साहित्य के लिये वर्ष 2012 के नोबेल पुरस्कार विजेता चीनी लेखक मो यान से प्रतिष्ठित पत्रिका ह्यूमैनिटीज के लिए नेशनल इंडावमेंट फार ह्यूमैनिटीज के चेयरमैन जिम लेक ने वर्ष 2010 के अक्तूबर में यह साक्षात्कार लिया था. इस साक्षात्कार का महत्व इस बात को लेकर ज्यादा है कि इस समय तक मो यान, नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद छिड़ने वाली वैश्विक चर्चा के केंद्र में नहीं आये थे. न ही उनके लेखन को लेकर दुनियाभर बहस शुरू हुई थी. यह साक्षात्कार वैश्विक प्रसिद्धि के किसी किस्म के आभास से दूर एक ऐसे सजह लेखक को जानने का जरिया है, जिसके लेखन में चीन का समाज झांकता है. ह्यूमैनिटीज के जनवरी-फरवरी 2011 अंक में प्रकाशित इस महत्वपूर्ण साक्षात्कार का हिंदी अनुवाद....




जिम लेक: मो यान आपका पेन नेम- तखल्लुस है. क्या आप चीनी भाषा में इस नाम का अर्थ और आपके लिए इस नाम के मायने के बारे में बता सकते हैं? क्या अपने जीवन और अपने देश की कथा सुनाने में इस पेन नेम के इस्तेमाल से आपको कोई सहूलियत हुई? 

मो यान : चीनी भाषा में मो यान का अर्थ है: बोलो मत. मेरा जन्म 1955 में हुआ. उस समय चीन में लोगों का जीवन सामान्य नहीं था. इसलिए मेरे माता-पिता ने मुझे बाहर न बोलने की हिदायत दी. अगर तुम बाहर कुछ कुछ बोलते हो, खासकर वह जो तुम सोचते हो, तो तुम्हारा मुसीबतों में पड़ना तय है. इसलिए मैं लोगों को सुना करता था, लेकिन कुछ बोलता नहीं था. जब मैंने लिखना शुरू किया तब मैंने सोचा कि सभी महान लेखकों का एक उपनामः तखल्लुस होना चाहिए. मुझे याद आया कि मेरे मां-बाप मुझे न बोलने के लिए कहा करते थे. इसलिए मैंने अपना तखल्लुस मो यान रखा. यह एक विसंगति ही है कि मेरा आज यह नाम इसलिए है कि मैं हर जगह बोलता हूं.

लेक: आपके लेखकीय सफर की शुरुआत चीन की सांस्कृतिक क्रांति के ठीक बाद हुई. इस नये समय का चीन की साहित्यिक हस्तियों और आपके लिए क्या मतलब था? 
मो यान: अगर चीन में यह दौर नहीं आया होता, तो मैं लिख नहीं रहा होता. 1980 के दशक में हुए सुधार और नये दरवाजों के खुलने(उदारीकरण) से मुझे किताबें लिखने का मौका मिला. 1980 से पहले चीन के लेखकों पर सोवियत लेखकों का जबरदस्त प्रभाव था. 1980 के दशक में हम पर यूरोपीय और अमेरिकी साहित्य का प्रभाव पड़ा. अगर अपने नजरिये से कहूं तो चीन में हुए सुधार और उदारीकरण चीन की बड़ी घटनाएं थीं. 

लेक: आपका नाम कई बार जादुई यथार्थवादी के तौर पर लिया जाता है और आपका संबंध फ्रांत्ज काफ्का से जोड़ा जाता है. ठीक उसी समय आपको एक सामाजिक यथार्थवादी के तौर पर भी देखा जाता है. इस लीक पर चलते हुए आप पर विलियम फाकनर और स्टीनबैक का प्रभाव माना जा सकता है. या क्या यह बेहतर न हो कि चर्चा इस बात पर हो कि आपका रिश्ता किस तरह से चीन की क्लासिकल रचनाओं से है? 

मो यान: मुझे लगता है कि मेरे लेखन का जो स्टाइल है, वह काफी हद तक अमेरिकी लेखक विलियम फाकनर के करीब पड़ता है. मैंने उनकी किताबों से बहुत कुछ सीखा है. (अगले दिन कल्चरल फोरम में अपने भाषण में मो यान ने इस प्रभाव को विस्तार से बताया,‘ 1984 की सर्दियों की एक बर्फभरी रात में मैं विलियम फाकनर की एक किताब "द साउंड एंड द फ्युरी" मांग कर लाया. यह इस किताब का चीनी संस्करण था, जिसका चीनी में अनुवाद एक प्रसिद्ध अनुवादक ने किया था. उन्होंने जो कहानियां लिखीं वे उनके गृहनगर उनके गांव-देहात की थी. उन्होंने एक ऐसा देश बनाया जिसे आप दुनिया के नक़्शे पर कहीं भी नहीं पा सकते हैं. हालांकि वह देश बहुत छोटा है, लेकिन वह अपने आप में प्रतिनिधि है. इसने मुझे यह सोचने और महसूस करने पर विवश किया कि अगर एक लेखक को खुद को स्थापित करना है, तो उसे अपना गणंतंत्र खुद स्थापित करना होगा.  फाॅकनर ने अपना एक देश बनाया, मैंने चीन के उत्तर-पूर्व क्षेत्र में अपने एक गांव का निर्माण किया. इसे मैंने अपने अपने गृह नगर की ही तर्ज पर गढ़ा. इसके साथ ही मैंने अपने लिए एक जमीन बनायी. फाकनर को पढ़ने के बाद मेरे मन में यह ख्याल आया कि मेरे अपने अनुभव, छोटे से गांव में मेरी अपनी जिंदगी, ये सब कहानी और साहित्य बन सकते हैं. मेरा परिवार, लोग, जिनसे मैं परिचित हूं, गांव वाले वे सब मेरी कहानियों के पात्र बन सकते हैं.’) लेकिन मेरे स्टाइल में और भी कई तरह के प्रभाव मिले हुए हैं. मेरी परवरिश गांव-देहात में हुई. मेरी जवानी वहीं बीती. लोक साहित्य और किस्सागोओं ने मुझ पर काफी प्रभाव डाला. मेरी दादी, मेरे दादा, बड़े-बुजुर्गों और मेरे माता-पिता ने मुझे जो कहानियां सुनाई वे मेरे लिए कथा लेखन के संसाधनः कच्चा माल बन गये.  ‘जर्नी टू द वेस्ट’ और ड्रीम आॅफ द रेड चैंबर वे क्लासिक चीनी किताबें हैं, जिनका मेरे ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा है.





लेक: मेरा गृह नगर आयोवा सिटी है, वहां आपने भी कुछ समय बिताया है, क्या आपको आयोवा सिटी और उत्तर पूर्व चीन के अपने इलाके में किसी तरह की तुलना का कोई सूत्र दिखाई दिया? आयोवा सिटी में बिताये गये एक बेहद संक्षिप्त समय में आपके कई साहित्यिक दोस्त बन गये. वे आपको संभवतः चीन का सबसे बड़ा जीवित लेखक, बल्कि मुमकिन है कि दुनिया का ही  सबसे बड़ा लेखक मानते हैं. चूंकि इस क्षेत्र विशेष में आपके कई दोस्त हैं, इसलिए मैं आपसे यह जानना चाहता हूं. 
मो यान: आयोवा में मैं दो हफ्ते रहा. मैं वहां की सारी गलियां-रास्ते जान गया था. मैं वहां के सारे रेस्टोरैंट्स गया था. मेरी मुलाकात वहां पाॅल एंगले और उसकी पत्नी हाउलिंग नीह एंगले से हुई, जो कि मेरे अच्छे मित्र हैं. आयोवा में खूब मक्के के खेत हैं. जब मैं वहां था, तो मुझे लगता है कि मैंने अमेरिकी स्टैंडर्ड के हिसाब से काफी खराब व्यवहार किया. मै एक मक्के के खेत में गया और वहां से कुछ  मक्के की बालियां (भुट्टे) अपने साथ होटल ले आया. उन्हें उबाल कर उन्हें खाया. आयोवा मुझे काफी गरमाहट और आत्मीयता से भरी जगह लगा, क्योंकि यह काफी हद तक मेरे गांव जैसा है. इसलिए मुझे लगता है कि  यहां मेरे लेखन के काफी मित्र होंगे क्योंकि वे मिलती-जुलती पृष्ठभूमि और वातावरण से तादात्म्य मिला पाएंगे. 

लेक: आपके उपन्यासों की पृष्ठभूमि में इतिहास रहा है. इतिहास के साथ आप अपना किस तरह का रिश्ता मानते हैं? 
मो यान: मेरा शुरुआती लेखन 1930 के दषक के चीन के जीवन को बयान करता है. हालांकि मैं कहानियां इतिहास से ले रहा था, लेकिन मैंने इन कहानियों को एक आधुनिक लेखक की नजरों, एक आधुनिक व्यक्ति की सोच, और इतिहास को लेकर उसके विचारों के आईने में देखा. मेरे उपन्यासों में आया इतिहास मेरे बनाये पात्रों से भरा हुआ है. इतिहास के तथ्यों को लेकर मेरा हमेषा से मतभेद रहा है और आज भी है.  मेरा मानना है कि मेरे पाठकों को मेरी किताबों से  साहित्य मिलना चाहिए, न कि इतिहास-खासकर शुष्क इतिहास. 

लेक: आज ऐसा लगता है कि इंसान की कहानी साहित्य और नाटक के सहारे ज्यादा लिखी जा रही है, बनिस्बत कि इतिहास के कथन के द्वारा. आपको क्या लगता है आज से सदियों बाद आप इतिहासकारों के लिए मूल संदर्भ होंगे, या आपको लगता है कि आने वाले समय के इतिहासकार आज के समाजषास्त्रियों और इतिहासकारों को ज्यादा तवज्जो देंगे. 
मो यान: मुझे ऐसा लगता है कि भविष्य में जिन लोगों को इतिहास पढ़ना है, उन्हें वास्तविक इतिहास की पुस्तकों की ओर जाना चाहिए. लेकिन अगर आपको दूर-बहुत दूर स्थिति समय के बारे में जानना है, और यह कि आखिर उस समय में लोग किस तरह सोचा करते थे, उनकी रोजमर्रा की जिंदगी कैसी थी, तब आपको इस तरह के सवालों के जवाब के लिए साहित्य की ओर आना होगा. अगर कुछ सौ वर्षों के बाद लोग सचमुच में मेरी लिखी किताबें पढ़ते हैं, तो उन्हें इनमें आम लोगों की रोज की जिंदगी के बारे में तमाम तरह की जानकारियां मिलेंगी. इतिहास की किताबें घटनाओं और समय को केंद्र में रखती हैं, जबकि साहित्य आदमियों की जिंदगी और उनकी भावनाओं से ज्यादा वास्ता रखता है. 

लेक: मुझे किसी ने बताया कि आपने यह बेहतरीन किताब जिसका टाइटल लाइफ एंड डेथ आर वियरिंग मी आउट है, कंप्यूटर पर लिखने की जगह एक ब्रश के सहारे महज 42 दिन में लिखी. क्या अगर आप लिखने के  लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल करते तो क्या यह किसी तरह से अलग होता? 
मो यान: कंप्यूटर मेरी गति को कम कर देता है. क्योंकि जब मैं कंप्यूटर का इस्तेमाल करता हूं, मैं अपने आपको नियंत्रित नहीं कर सकता. मैं ज्यादा सूचनाएं खोजने के लिए हमेशा इंटरनेट से जुड़ जाता हूं. जब मैं कंप्यूटर का इस्तेमाल करता हूं तब इनपुट के तौर पर पिनयिन का इस्तेमाल करता हूं. ( पिनयिन चीनी  शब्द का रोमनीकरण करने वाला एक साॅफ्टवेयर है. वर्ड प्रोसेसिंग प्रोग्राम में एक लेखक किसी शब्द की पिनयिन स्पेलिंग डालता है, इसके बाद साफ्टवेयर इच्छित अक्षरों का एक सेट प्रस्तावित करता है, जिसमें स लेखक चयन करता है ) यह अक्षरों का प्रयोग करने से काफी अलग है, इससे आपका शब्द भंडार सीमित हो जाता है, जो मेरे दिल को तोड़ देता है. इसलिए मैंने सोचा कि अगरकर मैं सिर्फ अपनी कलम का इस्तेमाल करूं और अपने पात्र तैयार करूं, तब मेरी अच्छी सोच बाहर निकल कर आयेगी. दूसरी वजह जिसके कारण मैंने इस तरह लिखा, यह है कि मैंने सोचा कि लोगों की लिखावट, खासकर प्रसिद्ध लोगों की, आनेवाले वर्षों में काफी कीमती होगी. इसलिए मैं इसे अपनी बेटी के लिए छोड़ कर जाउंगा, हो सकता है कि इससे उसे कुछ पैसे मिल जायें. 

लेक: तो  क्या इसका मतलब है कि आपकी यह महत्वपूर्ण रचना हस्तलेख(कैलिग्राफी ) का भी काम है जिसे संग्रहालय की दीवार पर सजाया जा सकता है, साथ ही जिल्द में भी बांधा जा सकता है, इस आषा के साथ कि किसी मोड़ पर इसके बगल में एक नोबेल प्राइज भी टंका होगा?
मो यान: अगर ऐसा होता है तो मैं आपको चीन बुलाउंगा और हम साथ मिलकर इसे देखेंगे.

लेक: अब मैं ग्रैंड ओपनिंग की ओर आना चाहूंगा. बात  अगर ह्यूमर के बारे में की जाये, तो पन्ने पर इसे उतारने से ज्यादा मुश्किल कुछ भी नहीं है. यह खासतौर पर तब और भी जब आप किसी ऐसी घटना के बारे में बोल या लिख रहे हों, जो काफी कठोर और निर्मम हों. लेकिन फिर भी सच्चाई है कि ह्यूमर किसी आत्मा तक किसी बयान या तथ्य से ज्यादा सहजता और मारक तरीके से संप्रेषित हो जाता है. क्या आप ह्यूमर को अपनी सबसे बड़ी शक्ति मानते हैं?  
मो यान: अगर आप किस जज्बात को अभिव्यक्त करना चाहें, मसलन दर्द या तकलीफों को, तो या तो आप दर्द भरे शब्दो का इस्तेमाल करेंगे या फिर ह्यूमर से भरे शब्दों का. मेरा यह मानना है कि ज्यादातर पाठक किसी तकलीफ भरी जिंदगी के बारे में ह्यूमरस तरीके से लिखे को पढ़ने को तरजीह देंगे. इस बात की बहुत ज्यादा परवाह किये  बगैर कि हमारी जिंदगी कितनी कठिन और मुश्किल भरी है, मेरे गांव के लोग जीवन की कठोरताओं का सामना करने के लिए सेंस आॅफ ह्यूमर का इस्तेमाल किया करते थे. ह्यूमर का यह इस्तेमाल मैंने उनसे ही सीखा.

लेक: आपने कहा है कि किसी स्थापित लेखक का मोक्ष तकलीफों की खोज में है. क्या आपका यह मानना ह्यूमर के साथ तकलीफों को सहने के आपके विचार की संगति में है, और क्या इसमें बदलाव आया है? क्या आज के चीन में जो तकलीफ हैं, वह पहले के समय से भिन्न हैं या तकलीफों का एक सातत्य है? 
मो यान: मेरा मानना है जब तक इंसान जीवित रहता है, तब तक उसका संबंध दर्द से रहता है. जब मैं युवा था तब मेरे जीवन में काफी तकलीफें थीं, क्योंकि तब मेरे पास पर्याप्त खाना नहीं था. मेरे पास पर्याप्त कपड़े भी नहीं थे. वह सचमुच में काफी मुष्किल समय था. मैं अपनी बेटी से कहता हूं, ‘‘ देखो मेरे बचपन में क्या था; अब तुम्हारे पास सबकुछ  है, फिर भी तुम दर्द में क्यों हो? क्या कारण है कि तुम इसके बावजूद तकलीफ में हो? इस पर उसने कहा, क्या आपको लगता है कि जिसके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन और पहनने के लिए कपड़े हैं, उनको किसी किस्म का कोई दुख नहीं होना चाहिए? हमारे पास इतना होमवर्क होता है, हमें कई कठिन इम्तिहानों को पास करना होता है, हम एक अच्छा दोस्त नहीं खोज पाते. मुझे लगता है कि इन चीजों का तकलीफ खाना न होन की तकलीफ से भी कहीं ज्यादा खराब है.’ इसलिए मुझे लगता है कि जब तक इंसान है, तब तक उसके हृदय और मन में हमेशा दुख और तकलीफ है. साहित्य यह दिखाने का काम करता है कि पीड़ा हमेशा रहेगी.

लेक: इस संदर्भ में क्या आपको लगता है कि यह आपकी जिम्मेदारी है कि आपकी रचनाओं में यह हकीकत झांके? आपकी यह जिम्मेदारी संस्कृति के प्रति, देष के प्रति इस विष्व के प्रति है? या आपकी यह जिम्मेदारी मूल रूप से आपकी अपने प्रति है, आपके अपने मूल्यों के प्रति आपकी अपनी इंटेग्रिटी के प्रति? या यह इन सबका मिलाजुला रूप है, जैसा कि लेखकों के साथ होता है?
मो यान : जब एक लेखक लिखने की शुरुआत करता है, तब शुरू में तब यह हमेशा उसके अपने दिल से होता है, उसके निजी विचारों से. सामान्य रूप से यह उसके अपने या परिवार की पीड़ा से आता है. यह जरूर है कि जीवन में खुशियाँ भी होती है, लेकिन वह दुखों को लेकर ज्यादा चिंतित और केंद्रित रहता है. लेकिन लेखक को लगता है कि  वह जिस चीज के लिए  चिंतित है, वह जो सोचता है, वह दूसरों का भी अनुभव होगा. उसे लगता है कि जो वह लिख रहा है, जिसे वह अभिव्यक्त करेगा,  उसे ज्यादातर लोग महसूस करते हैं. मुझे लगता है कि समाज में जो कुछ भी हो रहा है, वह मेरे लेखन को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभावित करता है. यहां तक कि ऐसी चीजें भी जो अमेरिका या जापान में हो रही हैं. महान साहित्य राष्ट्रों की सरहदों से नहीं बंटा होता. 

लेक: चीन में साहित्य की वर्तमान स्थिति क्या है? आपको क्या लगता है यह किस दिशा में जा रहा है? 
मो यान: लोगों का मानना है कि 1980 का दशक चीन के साहित्य के लिए सुनहरा युग था. काफी छोटे उपन्यास पर भी पूरे देष का ध्यान जाता था. 1990 के दशक में सारी बहस वित्त और व्यापार पर आकर सिमट गयी. चीन में इंटरनेट के आने के बाद युवा पीढ़ी अपना ज्यादातर समय आॅनलाइन बिताने लगी. साहित्य पढ़ने वालों की संख्या में गिरावट आने लगी. अब पहले के किसी भी समय से ज्यादा राइटिंग स्टाइल(लेखन शैलियाँ) हैं. यह कहना ज्यादा सुरक्षित होगा कि अब काफी लोग लिख रहे हैं और लिखने के कई तरह के स्टाइल हैं. अब स्थितियां काफी हद तक अमेरिका और यूरोप जैसी हैं. एक चीज जो ध्यान देने लायक है कि अब काफी संख्या में युवा लोग अपने उपन्यासों का प्रकाशन आॅनलाइन कर रहे हैं. चीन में 30 करोड़ लोग अपना ब्लाॅग लिख रहे हैं. उनके लेख काफी अच्छे होते हैं. 

लेक: अंत इस सवाल से करना चाहूंगा कि अमेरिका में ज्यादातर लोग चीनी साहित्य को उसके अनूदित रूप में पढ़ रहे हैं. आपने साहित्यिक अनुवादक हावर्ड गोल्ड ब्लैट के साथ काम किया है, जो काफी सजगता और सुंदर तरीके से अनुवाद करते हैं. लेकिन क्या कुछ ऐसा है कि जब हम दो बिल्कुल अलग जबानों- चीनी से अंगरेजी में होने वाले अनुवादों को पढ़ते हैं, तो कुछ छूट जाता है?  
मो यान: मेरा पक्का मानना है कि साहित्य में जब एक भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद होता है, तो कुछ न कुछ अनुवाद में जरूर छूट जायेगा या खो जायेगा. मैं बहुत खुषनसीब हूं कि मेरी किताबों का अनुवाद गोल्ड ब्लैट ने किया है, जो  चीनी साहित्य के काफी प्रसिद्ध और प्रभावशाली विशेषज्ञ हैं. वे कई वर्षों से मेरे मित्र हैं. इसलिए वे मेरे स्टाइल को काफी भली-भांति जानते हैं.  

लेक: जब हम देशों के बीच संबंध के बारे में सोचते हैं, तब हम अक्सर राजनीतिज्ञों को राजनीतिज्ञों के बरक्स रखते हैं, जनरल को जनरल के बरक्स और कूटनीतिज्ञ को कूटनीतिज्ञ के बरक्स. लेकिन क्या आपको ऐसा लगता है हमारे जैसे दो बिल्कुल दो अलग-अलग देशों के साथ चलने की संभावना तब ज्यादा होगी जब हम दोनों के बीच ज्यादा साहित्यिक आदान-प्रदान हो और लोग एक दूसरे को उपन्यासों के सहारे जानें, बनिस्बत कि राजनीतिक संधियों के द्वारा? 
मो यान: अगर लेखक आपस में संवाद करते हैं, बात करते हैं, तो यह  उनके भविष्य के लेखन के लिए काफी अच्छा है. विचारों का आदान-प्रदान सकारात्मक स्थिति है. पिछले साल चीन लेखक संघ ने एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें कई अमेरिकी और चीनी लेखकों को साथ लाया गया. उन लोगों ने आपस संवाद किया और विचार बांटे. 

लेक: शुक्रिया मो यान. आप चीन के प्रमुख राजदूत और लेखक दोनों हैं. 

वाक् के हालिया अंक में मो यान पर विशेष सामग्री के तहत यह अनुवाद छपा है. साथ में मो यान पर एक लम्बा लेख भी है.  

24 March 2013

वह जादुई स्पर्श : सई परांजपे

बतौर फिल्मकार सई परांजपे का सफर लंबा नहीं रहा, लेकिन अपने छोटे से सफर में ही उन्होंने एक लंबी लकीर खींच दी और हिंदी सिनेमा की पहली महिला फिल्म निर्देशक के तौर पर प्रसिद्धि पायी. ‘स्पर्श’ और ‘चश्मेबद्दूर’ उनकी यादगार फिल्में हैं. सई परांजपे के फ़िल्मी सफ़र को याद करता यह छोटा सा लेख..




बॉलीवुड में इन दिनों रीमेक फिल्मों का मौसम चल रहा है. रीमेक की इस बहार में एक नाम ‘चश्मे- बद्दूर’ का भी जुड. गया है. स्कूल के दिनों में दूरदर्शन ने इस फिल्म से रूबरू कराया और यह फिल्म याद के किसी कोने में एक निश्छल मुस्कान की तरह बैठ गयी. इसके रीमके के बारे में सुना तो एक बार फिर पहले वाली ‘चश्मे-बद्दूर’ आंखों में तैर गयी. ऐसे में सई परांजपे का खयाल आना भी लाजिमी था. इस खयाल में उनकी अर्थपूर्ण फिल्मों के नाम भी जुड.ते चले गये. बेशक सई परांजपे निर्देशित फिल्मों की फेहरिस्त बहुत छोटी है, लेकिन जिंदगी को गहरे मायनों के साथ सहजता से परदे पर उतारने के उनके हुनर को कभी नहीं बिसराया जा सकता. सई के व्यक्तित्व में मौजूद फिल्मकार के पास ‘जादू का शंख’ था, जिसने मन को ‘स्पर्श’किया और ‘चश्मे बद्दूर’ अंदाज में ‘कथा’ कह गया, जिससे एक ‘दिशा’ निकली और ‘साज’ बन गयी. 

सई परांजपे का बचपन कला एवं शिक्षा में पारंगत लोगों के बीच बीता. पिता रशियन वाटरकलर आर्टिस्ट थे. मां शकुंतला परांजपे मराठी फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री. बाद में वे अभिनय छोड.कर लेखन और राजनीति के क्षेत्र में आ गयीं. सई के जन्म के बाद ही उनके माता-पिता में अलगाव हो गया और उनकी परवरिश मां और नाना ने की. सई के नाना आरपी परांजपे जाने-माने शिक्षाविद और गणितज्ञ थे. आठ साल की उम्र में सई ने मराठी में किताब लिखी ‘मूलांचा मेवा’. कॉलेज आकर रंगमंच पर उनके अभिनय, निर्देशन तथा लेखन का सिलसिला चल पड.ा. पारिवारिक मित्र अच्युत रानाडे जिन्हें सई मामा कहती थीं, के साथ रोज सुबह की सैर में होने वाली बातचीत ने उनके भीतर पटकथा लेखन और फिल्म निर्देशन का बीज रोपा. इसी बीच सई को बतौर उद्घोषिका आकाशवाणी पुणे में काम मिल गया. यहीं उन्होंने बच्चों के लिए कई नाटक लिखे और निर्देशित किये. ‘जादू का शंख’ भी इन्हीं दिनों लिखे गये नाटकों में एक है. यहीं उनकी दोस्ती अरुण जोगलेकर से हुई, जो बाद में शादी में बदल गयी. हालांकि यह रिश्ता दो साल बाद टूट गया, पर दोस्ती अरुण के इस दुनिया से अलविदा कहने तक बनी रही. 

सई को दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक करने के लिए छात्रवृत्ति मिली. यहीं अंतिम वर्ष में उन्हें इब्राहिम अल्काजी से रंगमंच से जुड.ी बारीक सीखें मिलीं. इसके बाद वे दूरदर्शन से जुड.ीं. यह देश में टेलीविजन के शुरुआती दिन थे. इन्हीं दिनों सई के भीतर का फिल्मकार सामने आया. यहां उन्होंने अनगिनत वृत्तचित्र और टेलीफिल्में बनायीं. दूरदर्शन के लिए बनायी गयी उनकी टेली फिल्में ‘रैना बीती जाए’ और ‘धुआं-धुआं’ ही बाद में ‘स्पर्श’ और ‘चश्मेबद्दूर’ फीचर फिल्मों के रूप में आयीं. सई में कहानी बुनने की कला तो बचपन से थी, अब वो स्क्रिप्ट राइटर और निर्देशक के तौर पर अपनी कहानियों को परदे पर उतारने लगी थीं. बतौर फिल्मकार सई का सफर लंबा नहीं रहा, लेकिन अपने छोटे से सफर में ही उन्होंने एक लंबी लकीर खींच दी और भारत की पहली महिला फिल्म निर्देशक के रूप में प्रसिद्धि पायी.
नेत्रहीनों की जिंदगी पर ‘स्पर्श’ जैसी फिल्म उनसे पहले शायद ही किसी ने बनायी हो. इस फिल्म को बेस्ट स्क्रीनप्ले का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला और फिल्मफेयर ने बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट डायलॉग अवार्ड से नवाजा. 1993 में सई निर्देशित ‘चूड.ियां’ को सामाजिक मुद्दे पर बनी बेस्ट लघु फिल्म का नेशनल अवॉर्ड मिला. सत्रह वर्ष में बनकर तैयार हुई उनकी फिल्म ‘दिशा’ को कान के क्रिटिक फेस्टिवल में बेस्ट ज्यूरी अवार्ड और पीपुल्स च्वाइस अवार्ड मिला. 2009 में एचआइवी पर सई निर्देशित 29 मिनिट की लघु फिल्म ‘सुई’ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही. इसमें सई के सार्थक सिनेमाई सफर का ही एक बिंब है. पद्म विभूषण से सम्मानित सई उन चुनिंदा लोगों में से हैं, जो जिंदगी में शोहरत की बजाय सार्थकता को चुनते हैं और उसे पाने के लिए लाभ-हानि के फेर में उलझे बिना अपनी र्मजी का काम भी करते हैं. सई परांजपे में सार्थकता के इस चयन को बखूबी देखा जा सकता है, उनकी ही फिल्म ‘स्पर्श’ के एक गीत की तरह, जो ‘खाली प्याला, धुंधला दर्पण’ से ‘प्याला छलका, उजला दपर्ण’ में तबदील हो जाता है. सई की कहानी सार्थकता को पाने की एक कहानी है.
                                               
                                                               -प्रीति सिंह परिहार

मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित 

23 March 2013

नहीं रहा अफ्रीकी साहित्य का पिता



अफ्रीकी साहित्य के पिता कहे जानेवाले चिनुआ अचेबे के निधन की खबर तीसरी दुनिया के साहित्य में दिलचस्पी रखने वाले हर व्यक्ति को व्यथित कर गयी है। ल्योसा और मार्खेज जैसे लैटिन अमेरिकी साहित्यकारों के साथ अफ्रीका के अचेबे उन साहित्यकारों में शामिल रहे जिन्होंने विश्व साहित्य के नक़्शे पर तीसरी दुनिया की दमदार उपस्थिति दर्ज करायी। तीसरी दुनिया की कहानियों को वैश्विक गल्प का हिस्सा बनाया। वर्ष 1958 में उनके द्वारा लिखा पहला उपन्यास 'थिंग्स फॉल अपार्ट' बेहद लोकप्रिय हुआ था। दुनियाभर में इस उपन्यास की एक करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। पचास से ज्यादा भाषाओं में इस उपन्यास का अनुवाद हुआ है। यह उपन्यास साम्राज्यवाद के चरित्र को सटीक तरीके से सामने लाता है. अचेबे को श्रद्धांजलि  देता हुआ गार्जियन में छपे एलिसन फ्लड के लेख का हिंदी अनुवाद. 




चिनुआ अचेबे  नहीं रहे. वे बयासी साल के थे. नाइजीरिया के उपन्यासकार अचेबे को कई लोग अफ्रीकी साहित्य के पिता की पदवी देते हैं. 

पेंगुइन के प्रकाशन निदेशक सिमोन विंडर ने उनकी मौत के बाद उन्हें बेहद उल्लेखनीय शख्सीयत की संज्ञा देते हुए कहा कि वे महानतम अफ्रीकी साहित्यकार थे. अचेबे के परिवार ने निजता और एकांत का अनुरोध करते हुए ‘सर्वकालिक महान साहित्यिक आवाजों में से एक’ को  श्रद्धांजलि दी. ‘ जो एक प्यारे पति, पिता,  चाचा और दादा भी थे. जिनकी बुद्धिमत्ता और साहस उन सभी के लिए प्रेरणा है, जो उन्हें जानते थे. ’ उपन्यासकार, कवि और निबंधकार-  एचेबे संभवतः सबसे ज्यादा अपने पहले उपन्यास थिंग्स फाॅल अपार्ट के लिए जाने जाते हैं. इग्बो योद्धा ओकोन्कवो और उपनिवेशवादी शासन के दौर की कहानी कहनेवाले इस उपन्यास की दुनियाभर में एक करोड़ से ज्यादा काॅपियां बिक चुकी हैं और इसका प्रकाशन 50 से ज्यादा भाषाओं में हो चुका है. इस उपन्यास में अचेबे पाठक को उस इग्बो गांव में लेकर जाते हैं, जिसमें 19वीं सदी के आखिरी में गोरे लोगों का आगमन हो रहा है. उपन्यास का शीर्षक डब्लु बी यीट्स की कविता की पंक्तियों थिंग्स फाल अपार्ट/ द सेंटर कांट होल्ड...( चीजें चरमरा कर बिखर जाती है...केंद्र ही स्थिर नहीं रह पाता) से लिया गया है ....उपन्यास में ओकोन्कवो का दोस्त ओबिरीका कहता है, ‘‘गोरा आदमी बहुत चालाक है...वह बहुत चुपचाप और शांत तरीके से अपने धर्म के साथ आया था...हम उसकी मूर्खता को देख कर आश्चर्यचकित हुए थे और उसे यहां रहने की इजाजत दे दी. अब उसने हमारे भाइयों को जीत लिया है. हमारा कबीला अब कभी एकता के साथ, भाई-भाई की तरह नहीं रह सकता. ’’ कवयित्री जैकी हे ने अचेबे को अफ्रीकी गल्प का पितामह कहा था. जिसने दूसरों को भी राह दिखाई. साथ में यह भी जोड़ा था कि उन्होंने थिंग्स फाॅल अपार्ट अनगिनत बार पढ़ी है. 

अचेबे को उनके काव्य संग्रह क्रिस्मस इन बियाफ्रा के लिए काॅमनवेल्थ पोएट्री प्राइज से नवाजा गया था. वे अपने उपन्यास एंटहिल्स ऑफ़ सवाना’ के लिए 1987 के बुकर प्राइज फाइनलिस्ट थे. 2007 में उन्हें मैन बुकर इंटरनेशनल प्राइज दिया गया. उस समय ज्यूरी की अध्यक्षता कर रहे एलेन शोवाल्टर ने अचेबे के लिए कहा था, ‘‘ उन्होंने आधुनिक अफ्रीकी उपन्यास की नींव रखी.’’ उनके साथी जज दक्षिण अफ्रीकी नोबेल विजेता नैडीन गाॅर्डीमर ने कहा था, उनके फिक्शन मनोवैज्ञानिक उपन्यास, जॉयसियन चेतना और अनुक्रमों के उत्तर आधुनिक विखंडन का मौलिक संश्लेषण हैं.’’ उनको पढ़ना एक आह््लादकारी अनुभव है..प्रकाशित होना है.’’ 


नेल्सन मंडेला ने अचेबे को अफ्रीका को बाकी दुनिया तक ले कर जाने वाला और ऐसा लेखक कहा है, जिसके साथ रहते हुए जेल की दीवारें टूट गयी थीं.’’

अचेबे को उनके प्रभावषाली लेख, ‘‘ एन इमेज आॅफ अफ्रीका: रेसिज्म इन कोनाड्र्स हार्ट आॅफ डार्कनेस’’(1975) के लिए भी जाना जाता है. यह कोनार्ड की तीखी आलोचना है.( जोसेफ कोनार्ड ने हार्ट ऑफ़  डार्कनेस नामक उपन्यास अफ्रीका में बर्बर बनाम सभ्यता के विमर्ष पर केंद्रित करके लिखा था)  इस लेख में अचेबे कहते हैं कि कोनार्ड ने अफ्रीकी महादेश को पहचान में आ सकने लायक मानवता के किसी भी चिह्न से खाली एक पराभौतिक युद्धभूमि मे बदल दिया. जिसमें घुमक्कड़ यूरोपियन उसकी उसकी मुष्किलों में दिलचस्पी लेता है.’’ क्या कोई उपहासपूर्ण, बेतुके और घिनौने घमंड को महसूस नहीं कर सकता, जिसमें एक क्षुद्र यूरोपीय दिमाग की संतुष्टि के लिए अफ्रीकियों की भूमिका परजीवी तक सीमित कर दी गयी है! इस लेख को कोनार्ड के की किताब पर सबसे सशक्त और मौलिक हस्तक्षेप माना जाता है, जिसने साहित्यिक पाठ के सामाजिक अध्ययन की शुरुआत की. खासकर इस बात की कि 20वीं सदी की साहित्यिक कल्पना पर सत्ता संबंध का क्या प्रभाव पड़ा?


1930 में नाइजीरिया के ओगिडी में जन्मे अचेबे को यूनिवर्सिटी ऑफ़ इबादान से छात्रवृत्ति मिली. बाद में उन्होंने नाइजीरिया ब्राडकास्टिंग सर्विस के लिए बतौर स्क्रिप्ट राइटर भी काम किया. उन्होंने ‘‘थिंग्स फाल  अपार्ट’’ उपन्यास अंगरेजी में लिखा, जिसके लिए न्गूगी वा थियोंगो समेत कइयों ने उनकी आलोचना की है. लेकिन अचेबे ने कहा है कि ‘‘मुझे लगा कि अंगरेजी भाषा मेरे अफ्रीकी अनुभवों का भार उठाने में कामयाब हो पायेगी. हां मुझे  इस बात का एहसास था कि इसे नयी अंगरेजी होना होगा, जो अफ्रीकी परिवेष में जंचने लायक हो.’’ 

थीम के रूप में नाइजीरिया 

1966 में प्रकाशित हुआ अचेबे का चैथा उपन्यास ‘‘ए मैन ऑफ़ द पीपुल’’ ने उपन्यास के प्रकाशन से ठीक पहले हुए तख्तापलट का का पूर्वानुमान लगाया था.’’ उन्होंने गार्जियन से कहा था, मैंने उपन्यास का अंत एक तख्तापलट से किया था. यह अपने आप में उपहास लायक था. क्योंकि नाइजीरिया इतना बड़ा देश है कि यहां ऐसे तख्तापलट की कोई संभावना नहीं बनती थी. यह उपन्यास के लिए सही था. उसी रात वहां तख्तापलट हो गया.  और हमारे भीतर बची कोई ऐसी आशा कि चीजें ठीक हो जायेंगी, बिखर गयी. वह
ऐसी रात थी, जिससे हम आज तक बाहर नहीं आ पाये हैं. उनकी सबसे हालिया किताब ‘‘ देयर वाज एन कंट्री’’ थी. यह 1967-70 के नाइजीरियाई गृह युद्ध का वृत्तांत है. अचेबे बियाफ्रा राज्य के नाइजीरिया से अलग होने के समर्थक थे. (बियाफ्रा दक्षिण-पूर्वी नाइजीरिया स्वतंत्रता की मांग करनेवाला राज्य था. जिसका अस्तित्व 1967 से 1970 तक बना रहा.) लेकिन 1970 में गृह युद्ध के समाप्त होने के बाद अचेबे ने राजनीति से संन्यास ले लिया. क्योंकि उन्हें लगा कि राजनीति में शामिल ज्यादातर लोग इसमें सिर्फ निजी लाभ के लिए हैं.’’ और खुद को अकादमिक कार्यों के प्रति समर्पित कर दिया. 

1990 में नाइजीरिया में हुई एक कार दुर्घटना के बाद उनके शरीर के कमर से नीचे का हिस्सा  लकवाग्रस्त हो गया. जिसने उन्हें अमेरिका जाने पर विवश कर दिया. लेकिन वह नाइजीरिया को बेतरह याद करते रहे. 
अचेबे ने दो बार नाइजीरिया सरकार की उन्हें कमांडर ऑफ़ फेडरल रिपब्लिक की पदवी देने की पेशकश को ठुकरा दिया था. एक बार 2004 में और दूसरी बार 2011 में. 2004 में उन्होंने लिखा था, ‘ कुछ समय से मैं नाइजीरिया के घटनाक्रमों को काफी भय और हताशा के साथ देख रहा हूं. मैंने खासकर अपने गृह राज्य अनांबरा में व्याप्त अराजकता को देखा है, जहां कुछ आवारों का गिरोह उंचे रसूख के दम पर मेरी मातृभूमि को पूरी तरह दीवालिया और कानून-प्रशासन रहित राज्य बनाने के लिए कृत-संकल्प लिये नजर आता है. मैं इन छुटभैयों के गिरोहों के मनमानेपन और राष्ट्रपति की खामोशी, अगर इसमें उनकी मिलीभगत नहीं है, से  पूरी तरह व्यथित हूं. आपके संरक्षण में आज के नाइजीरिया की स्थिति इतनी खतरनाक है कि खामोश रहना मुमकिन नहीं है...मुझे निश्चित तौर पर अपनी निराशा को दर्ज करना चाहिए और मुझे दिये गये सम्मान को ठुकरा कर अपना विरोध दर्ज करना चाहिए...   

21 March 2013

पहली फिल्म प्रोजेक्टर पर देखी थी : इरफ़ान


पान सिंह तोमर के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का  राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले इरफ़ान खान की अदाकारी का कौन मुरीद नहीं? लेकिन सच कहूं इरफ़ान मुझे अपनी अदाकारी से ज्यादा अपनी अदाकारी में विश्वास और कमिटमेंट के कारण आकर्षित करते हैं। करन जोहर मार्का फिल्मों और खानों के दबदबे वाले भारतीय फिल्म उद्योग, जो मुझे अक्सर सोनपुर मेले का उन्नत संस्करण नजर आता है,  में इरफ़ान उस अल्पसंख्यक बिरादरी के सदस्य हैं जो फिल्मों को आज भी "कला" के तौर पर लेते हैं ... खुद को सिर्फ इंटरटेनर और उछल कूद करने वाला न मानकर एक कलाकार मानते है ...अपनी कला में यकीन करते हैं।।।पता नहीं क्यों लेकिन इरफ़ान की फ़िल्में देखते हुए मुझे हमेशा "जाने भी दो यारों" का वह गीत याद आता है… हम होंगे कामयाब एक दिन… और यह भी आश्चर्य नहीं कि उनकी इस कामयाबी में मुझे कहीं "मुझे चाँद चाहिए" के हर्ष को बचा लेने का सुकून मिल रहा है. इरफ़ान की खासियत शायद यही है कि उन्होंने धारा के साथ बहने की जगह धारा के खिलाफ बहने का फैसला किया और अपने फैसले पर टिके भी रहे. पान सिंह तोमर लम्बे समय तक हाशिये पर खड़े तीन लोगों की सफलता कथा है… इरफ़ान, तिग्मांशु धूलिया और संजय चौहान। इस फिल्म की सफलता के साथ  अचानक सोनिवुड( सोनपुर मेले का उन्नत संस्करण) में काफी कुछ बदल रहा है. 

बहरहाल पुरस्कारों की घोषणा के बाद पान सिंह यानि इरफ़ान की जब बात चल रही है तो यह जानना रोचक होगा कि फिल्म का असल बाण आखिर उन्हें कब चुभा था? कुछ अरसा पहले फिल्म रिपोर्टर उर्मिला कोरी ने इरफ़ान खान से उनके सिनेमा के साथ जुडाव पर बात की थी। फिल्मों से बने इरफ़ान के रिश्ते पर यह छोटी सी बातचीत ...  
   
मैं जिस परिवार और माहौल से आया हूं, वहां सिनेमा को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था. उसे नाचने-गाने वालों का काम करार दिया जाता था. मैट्रिकुलेशन तक मैंने मुश्किल से चार-पांच फिल्में देखी थीं. फिल्में देखने की आजादी नहीं थी. थोड.ा बड.ा हुआ तो एक बार हमारे मोहल्ले में प्रोजेक्टर पर फिल्म दिखायी गयी थी. फिल्म क्या थी याद नहीं, लेकिन प्रोजेक्टर मेरे जेहन में बस गया था. छह महीने तक अपने वालिद साहब का दिमाग खाता रहा कि क्या है वह और कैसे कहानी कहता है. मैं अपने आस-पास की हर चीज में उस प्रोजेक्टर के खांचे को ढूंढ.ने लगा था, जो कहानी कहता है.

कहानियों से लगाव वहीं से शुरू हुआ फिर ऑल इंडिया रेडियो में जो नाटक आते थे, उन्हें भी बहुत ध्यान से सुनता था. इसके बाद चोरी छुपे टेलीविजन और वीडियो पर फिल्में देखने लगा. कईयों की तरह दिलीप कुमार की फिल्मों ने मेरा भी जुड़ाव सिनेमा और अभिनय से करा दिया. उनकी फिल्में ‘आजाद’ हो या ‘मुगल-ए-आजम’ सब मेरी पसंदीदा फ़िल्में थीं. बचपन में मैं क्रिकेटर बनना चाहता था लेकिन दीलिप कुमार ने मुझे फिल्मों से इस कदर जोड़ दिया कि मैंने महसूस किया कि क्रिकेटर तो सिर्फ 11 लोग ही बन सकते हैं लेकिन एक्टिंग तो 11 से ज्यादा लोग कर सकते हैं. 

उसके बाद मैंने टेलीविजन पर देव आनंद साहब की फिल्म ‘गाइड’ देखी. उस वक्त मैं शायद 12वीं  में था. उस फिल्म का मुझ पर गहरा असर हुआ, खासकर वहीदा जी के किरदार ‘रोजी’ ने मुझमें विपरीत परिस्थितियों में भी सपनों को पूरा करने की एक आशा जगा दी थी. अब तक परदे पर ऐसी अभिनेत्री मैंने नहीं देखी थी. उसी फिल्म से मैं अपने भीतर के एक्टर को हासिल कर पाया था. मैंने तय कर लिया कि मैं भी एक्टर बनूंगा. इसके बाद मैंने ग्रेजुएशन की पढ.ाई करने के साथ एक्टिंग की तरफ भी ध्यान देना शुरू किया. पहले मैं कुछ नये कलाकारों के साथ एक्टिंग सीखने की कोशिश करने लगा. फिर मेरी मुलाकात नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) के एक शख्स से हुई. वे कॉलेजों में जाकर नाटक किया करते थे. मैं भी उनके साथ उनकी टीम में शामिल हो गया और स्टूडेंट्स के साथ कॉरिडोर, क्लासरूम और कैंटीन में ड्रामा करते हुए ही एनएसडी में दाखिले को लेकर गंभीर हुआ. फिर एनएसडी में दाखिला लिया. ‘गाइड’ अब भी मुझे एक एक्टर, एक इनसान के तौर पर बहुत प्रभावित करती है. आखिर में मैं सिर्फ ‘गाइड’ के बारे में यह कह सकता हूं कि अब दुबारा वह फिल्म कभी नहीं बन सकती, ऐसी फिल्म सिर्फ एक बार ही बनती है. 

                                    उर्मिला कोरी युवा फिल्म रिपोर्टर हैं 

20 March 2013

भारत पर चे ग्वेरा


क्यूबाई क्रान्ति के ठीक बाद चे ग्वेरा , फिदेल कास्त्रो के दूत के तौर पर भारत आये थे. इस यात्रा के दौरान उन्होंने जवाहर लाल नेहरु से मुलाकात की थी और भारत की दशा, क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष, संघर्ष के गांधीवादी तरीके,  नेहरूवादी विकास, भारत में व्याप्त असमानता आदि विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकट किये थे.  भारत पर उनका लिखा एक संस्मरण कुछ साल पहले अंग्रेजी पत्रिका फ्रंटलाइन छपा था..उसी संस्मरण का एक अंश...




काहिरा से हमने सीधे भारत के लिए उड़ान भरी. 39 करोड़ लोगों का देश, जिसका क्षेत्रफल 30 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है.

भूमि के नाट्य का एहसास यहाँ मिस्र से ज्यादा होता. यहां मिट्टी की उर्वरता रेगिस्तानी मिस्र से कहीं ज्यादा है. लेकिन सामाजिक अन्याय ने भूमि के असमान और मनमाने वितरण को जन्म दिया है. जिसका परिणाम है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों के पास काफी जमीन है, जबकि बहुतों के पास कुछ भी नहीं
.
भारत को ब्रिटेन ने 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत के दौरान अपना उपनिवेश बनाया था. निश्चित तौर पर इस जीत के साथ आजादी बनाये रखने के संघर्ष की कहानी भी जुड़ी हुई है, लेकिन अंगरेजों की सैन्य क्षमता इस मामले में निर्णायक साबित हुई. भारत के फलते-फूलते हस्तकरघा उद्योग को साम्राज्यवादी संरचना के हाथों काफी नुकसान उठाना पड़ा जो भारतीयों की आर्थिक आत्मनिर्भरता को समाप्त करने पर आमादा थे, ताकि उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए साम्राज्य का कर्जदार बनाया जा सके. यह स्थिति पूरी 19वीं शताब्दी के दौरान बनी रही. 20वीं शताब्दी जिसमें हम रह रहे हैं,  यह देश कई विद्रोहों का साक्षी भी बना , जिसमें कई बेगुनाहों की जान गयी.

दुसरे विश्वयुद्ध से बाहर निकलते हुए अंगरेजी साम्राज्य के विखंडन के संकेत काफी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे थे. भारत में रहस्यवादी-आध्यात्मिक व्यक्तित्व वाले(मिस्टिक फिगर)  महात्मा गांधी के नेतृत्व में  चलाये जा रहे निष्क्रिय प्रतिरोध ने आखिर कार वर्षों से कामना की जा रही आजादी के लक्ष्य को हासिल किया. गांधी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने भारत की बागडोर संभाली. नेहरू को एक ऐसे देश का नेतृत्व मिला, जिसकी चेतना अनंत वर्षों के बाहरी वर्चस्व के कारण रुग्ण हो गयी थी, और जिसकी अर्थव्यवस्था को लंदन के मेट्रोपाॅलिटन बाजारों के लिए सस्ते दामों में सामान मुहैया कराने के लिए मजबूर किया गया था. भूमि का पुनर्वितरण किया जाना था और देश को भविष्य की आर्थिक तरक्की के लिए औद्योगिकीकृत किया जाना था. कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने खुद को इस लक्ष्य के प्रति बेहद उत्साह के साथ समर्पित किया.

इस विशालकाय और अतिसाधारण देश में ऐसी कई संस्थाएं और रवायतें हैं जो वर्तमान समय की सामाजिक समस्याओं को लेकर बनायी गयी हमारी अवधारणा से मेल नहीं खाती हैं. प्रासंगिक नजर नहीं आतीं.
हमारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था समान है. अपमान और उपनिवेशीकरण का इतिहास भी एक जैसा है. हमने प्रगति की समान दिशा चुनी है. बावजूद इसके कि हमारे समाधान काफी मिलते-जुलते हैं और एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं, वास्तव में वे काफी अलग हैं. कुछ वैसे, जैसे दिन, रात से होता है. हमारे देश में कृषि सुधार की एक बड़ी आंधी ने कैमागुवे (क्यूबा का एक प्रांत) में बड़ी जोतों को  समाप्त कर दिया. अब यह लहर पूरे देश में अबाध रूप से फैल रही है और इसे रोक पाना अब मुमकिन नहीं है. बड़ी जोतों को समाप्त किया जा रहा है और गरीब किसानों को मुफ्त में जमीन का वितरण किया जा रहा है.

लेकिन महान भारत देश इस मामले में काफी प्राच्यवादी सतर्कता और कंजूसी दिखा रहा है. वह काफी फूंक-फूक कर कदम रखते हुए बड़े भूपतियों को भूमिहीन किसानों को भूमि देने का न्याय करने के लिए राजी कर रहा है और किसानों को इस  जमीन के लिए पैसे चुकाने के लिए मना रहा है. इस तरह दुनिया में सबसे पवित्र, समझदार और गरीब बना दिये गये लोगों को घोर वंचितता से बाहर लाने की प्रक्रिया इतनी से चल रही है कि नजर ही नहीं आती.

19 March 2013

"आपबीती को जगबीती बनाने की कोशिश की है"- मंजूर एहतेशाम


मशहूर कथाकार मंजूर एहतेशाम का लेखन अपनी एक अलग ही काट लिए हुए है. उनके उपन्यास उस भारत का चेहरा हैं , जिस पर अब फ़िल्में भी नहीं बना करतीं. सामूहिक सामाजिक बहसें  तो नहीं ही  होतीं.  भारत का वह समाज जो स्मृतियों से भी लापता हो चुका है. एहतेशाम जी के लेखन में ख़ास किस्म का नोस्टाल्जिया है. स्मृति आख्यान. लापता हो चुके या हो रहे को सहेज लेने की एक बेचैनी. मंजूर एहतेशाम से बात की प्रीति सिंह परिहार ने. यह आलेख बातचीत को आत्म-वक्तव्य में ढाल कर लिखा गया है. 




लिखने वाला मंजूर एहतेशाम कुछ इस तरह होगा, ऐसा कभी सोचा नहीं था. आज भी यही समझता हूं कि यह मैं नहीं हूं. प्रिंट में दिखने वाले नाम मेरे लिए बहुत बड़ी चीज थे, आज भी हैं. जेहन में कहीं यह कल्पना कभी नहीं थी कि लेखक के रूप में मेरा नाम किसी किताब में आ सकता है. यह भी नहीं जानता था कि ऐसा समय आयेगा जब मेरे लेखन को पसंद करने वाले पाठक होंगे, मुझे राष्ट्रपति भवन जाने का मौका मिलेगा या इस वजह से कुछ लोग मुझसे नाराज भी हो जायेंगे. इन सारी चीजों से खुशी मिली, तो एक बड़ी जिम्मेदारी का एहसास भी हुआ. बचपन से डायरी लिखता था. स्कूल में लिखे गये निबंध पर हिंदी की शिक्षक की सराहना अकसर लिखने के लिए प्रेरित करती. एक वक्त ऐसा आया जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड.कर कहानी लिखने लगा. सत्येन साहब जैसे दोस्त मिले, जिनसे कहानी पर बात होती.

पहली कहानी ‘रमजान में मौत’ 1973 में सारिका के लंबी कहानी कॉलम प्रकाशित हुई. इस बात को चालीस साल हो गये. तब से अब तक जितना भी लिखा, वो मेरी अपनी जिंदगी से हट कर कुछ भी नहीं. दरअसल, कथा लेखन में यथार्थ कहीं परछाईं की तरह भीतर होता है और कल्पनाशीलता उसे शब्दाकार देती है. फिक्शन में लेखक का सामाजिक परिवेश, वर्ग, समाज, शहर- नाम लिए बिना भी आते जाते हैं. मेरे लेखन में भी आजादी के बाद की जिंदगी, मध्यवर्गीय मुसलिम परिवार, भोपाल शहर बार-बार आते हैं. लिखते हुए मैंने कोशिश की है कि अपनी आपबीती को जगबीती बना सकूं.

कहानी लिखना मेरे लिए ज्यादा मुश्किल होता है, उपन्यास की बनिस्बत. कहानी की अलग चुनौतियां होती हैं लेकिन वह ज्यादा सुख भी देती है. हालांकि मैंने चालीस साल के लेखन में कुल जमा 40 कहानियां ही लिखी हैं. कहानी सीधे वार करने की कला की मांग करती है. एक उम्दा कहानी लिखना मुश्किल काम है. वैसे उपन्यास लेखन की भी अपनी मुश्किलें हैं लेकिन उसका फलक बड.ा होता है. वह आपको वक्त देता है, ठहर कर सोचने और कहने का. सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक परिवेश को अभिव्यक्त करने का. मैंने अपने हर उपन्यास को लिखने के लिए पांच-छह साल का लंबा वक्त लिया है. बहुत सी ऐसी बातें जिनके बारे में मुझे लगता है कि लोगों को जानना चाहिए और वह मैं ही लिख सकता हूं, उन्हें कहने के लिए जब कहानियां छोटी पड. जाती हैं, तो उपन्यास लिखता हूं.कोई चीज है, जो सवाल की तरह घेरती है और वही मजबूर करती है लिखने के लिए. कभी-कभी मैं अपना लिखा हुआ जब खुद पढ.ता हूं, तब पता चलता है कि मेरे लेखन की मूल चिंता क्या थी. पहले से यह बहुत साफ नहीं होता. मैं किसी एक समस्या के बारे में बहुत कांशियस होकर नहीं लिखता.

मैंने कभी भी रात को या सुबह उठकर नहीं लिखा. हमेशा ऑफिस टाइम में हमारे शो रूम में बैठकर लिखता हूं. अपना पहला उपन्यास मैंने एक दवा की दुकान में बैठकर लिखा था. लिखते समय मुझे सिर्फ कुर्सी और मेज की दरकार होती है. फिर आप चाहे चौराहे पर भी बैठा दें, मैं अगर लिख रहा हूं, तो लिखता ही जाऊंगा. हालांकि कई बार ऐसा भी हुआ है कि लिखते-लिखते एक जगह पर आकर अटक गया और बहुत वक्त लगा है आगे बढ.ने में. शायद ऐसा सबके साथ होता होगा. पाठक भले आपको इत्मीनान दिलायें कि हां सबकुछ ठीक है. लेकिन कभी-कभी कुछ छूट जाने का एहसास रह जाता है. हर रचना अपना आवरण, तकनीक और भाषा खुद-ब-खुद लेकर आती है. एक बार आप उसके रिदिम में बंध गये, तो रुकते नहीं. लेकिन अगर उस रिदिम को आप नहीं पकड. पाये, तब मुश्किल होती है.

मैं इस सच से वाकिफ हूं कि अकेले मेरे लिख भर देने से कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा.लेकिन यह भरोसा बना रहता है कि अगर पांच लोग भी मेरे लिखे को पढेंगे, तो उनके माध्यम से मेरी बात दूर तलक जायेगी. दरअसल, लेखक के पास बहुत बडे. बदलाव की गुंजाइश नहीं होती. फ्रेंच रिव्योलूशन में जरूर लेखकों की भूमिका रही. लेकिन काल मार्क्‍स भी अकेले कुछ नहीं कर पाये, उन्हें दोस्तवस्की की जरूरत पड.ी. महात्मा गांधी के बाद उनकी बात करने वाले बहुत सारे हुए, लेकिन पहले उन्हें खुद लिखना पड.ा. ये सभी बहुत बडे. लोग थे.

हमारे समय-समाज  की कुछ चीजें मुझे अकसर परेशान करती हैं. एक समय के बाद समझ नहीं
आता कि आपने समाज को बनाया है या समाज ने आपको. मुझे समझ नहीं आता कि चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान लोग सांप्रदायिक क्यों हो जाते हैं! हमारा सेंस ऑफ ह्यूमर और कामनसेंस हमें इसकी इजाजत क्यों नहीं देता कि जो चीजें ऐतिहासिक हो चुकी हैं, अब हमें उनसे आगे बढ.ना चाहिए. लेकिन कहीं एक अजीब तरह की शतरंज चल रही है. किसको कौन मात देगा, कहना मुश्किल है पर इसकी फिराक हर तरफ दिखती है. फायदा उठाने का यह एटीट्यूट मेरे ख्याल से एक राष्ट्र के लिए बहुत ही घातक है. कुछ मामलों में तय करना होगा कि हम क्या हैं. मौजूदा समय में हमारे जीवन मूल्यों में लगातार दोगलापन हावी हो रहा है. आज बेईमानी को इस तरह से अपना लिया गया है, जैसे वो सेकेंड नेचर हो. यह इतनी गंभीर समस्या है कि इससे लड.ने के लिए गांधी जैसे किसी व्यक्ति की जरूरत होगी. इसका इलाज अगर मिल भी जाये, तो उस पर काम करने के लिए लंबा वक्त लगेगा. साहित्य इस तरह की चीजों को थोड.ा बहुत ही बदल सकता है. ऐसे चंद लोग जो सही सोच पर टिके हैं, उन्हें थोड.ी बहुत हिम्मत दिला सकता है. लेकिन अगर बुनियादी स्वभाव ही ऐसा हो जाये, तो कुछ नहीं रहेगा न मूल्य, न जीवन.

लिखने के बहुत पहले से मैं देश ही नहीं, दुनिया भर का साहित्य पढ.ता रहा हूं. लेकिन जो रचनाएं और रचनाकार अच्छे लगे, उन सबके नाम याद कर पाना मुश्किल है. जो याद आ रहा है उसमें दोस्तोवस्की के उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ और ‘द ब्रदर्स कारमाजोव’ के साथ टॉल्स्टाय का लिखा बहुत कुछ है. मार्खेज और विलियम फाकनर पसंद आये. साउथ अफ्रीका के भी कुछ लेखक हैं. अमिताभ घोष के शुरुआती उपन्यास अच्छे लगे. हिंदी में प्रेमचंद और फणीश्‍वरनाथ रेणु का लेखन लाजवाब है. मुक्तिबोध मुझे बेपनाह पसंद हैं. उनकी डायरी, कविता, कहानी सब बहुत ही उम्दा हैं. निर्मल वर्मा, जो मेरे बहुत करीबी रहे हैं और जिन्हें मैं बहुत ज्यादा प्यार भी करता था, उनके उपन्यास ‘वे दिन’,‘लालटीन की छत’ और ‘एक चिथड.ा सुख’ सहित उनकी कुछ कहानियां बेहद पसंद हैं. वे उस तरह के लेखक हैं, जो मैं नहीं हूं. लेकिन मुझे उनका लिखा हुआ बहुत अच्छा लगता है. श्रीलाल शुक्ल और विनोद कुमार शुक्ल के लेखन का मुरीद हूं. उर्दू में सआदत हसन मंटो तो थे ही. अब्दुल्लाह हुसैन का उपन्यास ‘उदास नस्लें’ पसंद आया. स्वदेश दीपक भी पसंद हैं. उदय प्रकाश के साथ नये में मनोज रूपड.ा प्रभावित करते हैं. गीतांजलि श्री की ‘माई’,‘खाली जगह’ सहित कुछ कहानियां अच्छी लगीं.

इन दिनों मैं एक उपन्यास पर ही काम कर रहा हूं. बहुत ठंड के दिनों में मैं लिख नहीं पाता, तो कुछ ऐतिहासिक मालूमात जो उपन्यास के लिए जरूरी हैं, उन्हें पढ. कर उनके नोट्स लेता रहा हूं. कुछ कहानियां भी हैं, धूप निकलते ही जिन पर काम करूंगा. लगता है कि अभी बहुत लिखना है और कभी लगता है कि अब क्या करूंगा लिख कर. कविता मुझे बहुत अच्छी लगती है, लेकिन मेरे अंदर वह योग्यता ही नहीं है कि कविता की एक पंक्ति भी लिख सकूं. लेखन से इतर मुझे पढ.ना पसंद है. दोस्त जिनकी तादाद अब दिन ब दिन कम होती जा रही है, उनके साथ मिल बैठना अच्छा लगता है.
                                                         
                                                                                 प्रीति सिंह परिहार युवा पत्रकार हैं. 

मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित 

17 March 2013

नगमे उसके अब भी जुबां पर हैं...बस उसका नाम नहीं


मुंबई में गुमनाम सी जिन्दगी जी रहे नक्श लायलपुरी के गीत आज भी जवां होती रातों, अलसाई सी सुबहों में हमारे सीने को चाक कर जाते है. नक्श भले दुनिया द्वारा भुला से दिए गए हों, लेकिन उनके गीत बेसाख्ता जुबान को शीरीं बना जाते हैं. नक्श लायलपुरी से मुंबई में मुलाक़ात की फिल्म रिपोर्टर उर्मिला कोरी ने. यह लेख नक्श जी के जीवन और उनके फन को याद कर रहा है..



न जाने क्या हुआ जो तूने छू लिया/ खिला गुलाब सा मेरा बदन/ निखर-निखर गयी संवर -संवर गयी / बना के आईना तुझे ऐ जानेमन... 

इश्क  में लरजता हुआ शायद ही कोई दिल होगा जिसने इस गीत की उंगली थामे कुछ दूरी न तय की होगी.. कहते हैं नाम भले भूल जाए..लफ्ज बचे रहते हैं...और अगर लफ्ज इतने पाकीजा हों तो तो वे सिर्फ बचे ही नहीं रहते...हर दिल का राग बन जाते हैं. फनकार भुला दिया जाता है..लेकिन उसका फन जिन्दा रहता है. ऐसे ही एक फनकार का नाम है नक्श लायलपुरी. 

24 फरवरी 1928को लाहौर के लायलपुर, जो अब फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है, में जन्मे मशहूर  गीतकार नक्श लायलपुरी  भले ही इंडस्ट्री द्वारा भुलाए जा चुके हैं लेकिन उनके गीत न जाने क्या हुआ जो तुने छू लिया,  उल्फत में जमाने की हर रस्म, ये मुलाकात एक बहाना है/ प्यार का सिलसिला पुराना है,  चांदनी रात में एक बार तुझे देखा, तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीं है...  जैसे अनगिनत गीत अब भी हर दिल में एक कसक पैदा कर जाते हैं. लाहौर पावर हाऊस में बतौर इंजीनियर काम करनेवाले जगन्नाथ पुरी के घर जन्मे जसवंत राय को शेरो-सुखन की दुनिया में नक्श लायलपुरी के नाम से जानती है. नक्श एक साल के भी नहीं हुए थे कि उनकी माता जी विद्या पुरी का अकस्मात देहांत हो गया. माता के देहांत के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली. 1947में हुए बंटवारे के समय पूरा परिवार लाहौर से लखनऊ आकर बस गया. पढाई-लिखाई तथा विशेषकर ऊर्दू शायरी में रूचि रखनेवाले नक्श बचपन से ही स्वाभिमानी किस्म के थे. पढाई समाप्त होने के बाद नौकरी न मिलने के कारण जब सौतेली माता ने हर रोज घर में कलह शुरू कर दिया तो उनके स्वाभिमानी मन ने विद्रोह कर दिया. 

सन 1950 में एक रोज किसी को बिना बताए नक्श साहब लखनऊ से बंबई आ गए. एक जोडी कपडे तथा जेब में चवन्नी के साथ मुंबई आनेवाले नक्श जी बताते हैं,  ‘उन दिनों रेलगाडियां कोयले से चला करती थी सो लखनऊ से कल्याण तक आते आते मेरे पूरे कपडे काले हो चुके थे. दोपहर का वक्त था सो भूख भी बहुत तेज लगी हुई थी.जेब में चवन्नी के रूप में यह मेरी आखिरी दौलत मेरे पास थी. एक पल विचार आया क्यों ना इसे बचा कर रख लिया जाए मगर दूसरे ही पल पेट की आग ने इस विचार को पुख्ता कर दिया कि बेगाने देश में भूखे पेट आमद दर्ज करने से कहींऐसे न हो कि कई दिन फांके करने पडे.सो मैंने जेब में पडी चवन्नी की चार पुरियां और भाजी खरीदी. दुर्भाग्य से पहला निवाला उठाते ही चील ने झपट्टा मारकर वह निवाला जमीन पर गिरा दिया.दुखी मन के साथ मैने वह पुरी भाजी वहीं छोड दी और वापस ट्रेन में आकर बैठ गया. जब ट्रेन दादर पहुंची तब ख्याल आया कि यहां मेरे कलम मित्र(पेन फ्रेंड) प्रदीप नैयर रहते है. हम कभी मिले नहीं थे सो उनसे मिलने के लिए मै उनके घर की तरफ चल पडा. उनके घर पहुंचने के बाद पाया वहां बडा सा ताला लटका हुआ है. ताला देखकर मेरा दिल फट पडा. वाचमैन ने बताया वह किसी काम से 15दिनों के लिए पूना गए हैं. यह सुनकर दिल और बैठ गया. बेहद थकान, धूप की तपिश और भूख ने मुझे बेहाल कर दिया था. साथ ही सवाल यह भी था कि अब क्या ? सडक पर चलते हुए यही सवाल  बार-बार दिल से टकरा रहा था कि सामने से मुझे एक 80-90 साल के एक बुजुर्ग सरदार हाथ में छडी लिए आते दिखाई दिए.मैने उन्हें रोककर जब अपनी परेशानी बताई, तो उन्होंने मुझे दादर स्थित गुरुद्वारे का पता बताया और कहा, वहां आठ दिन रहने और खाने की व्यवस्था हो सकती है. आठ दिन सुनकर मै जरा आश्वस्त हुआ और उम्मीद की एक किरण के साथ उनका शुक्रिया अदा कर गुरु द्वारे का पता पूछते पूछते वहां जा पहुंचा. जब मै वहां पहुंचा तब खाने का समय समाप्त हो चुका था और सभी एक बडे से हॉल में आराम कर रहे थे. वहां मेरी मुलाकात एक युवा नौजवान से हुई जिसने बंटवारे में अपना एक पैर खो दिया था. पेशे से वह बिजनेस मैन था और बिजनेस के सिलिसले में लाहौर से बंबई आया हुआ था. जब उसे पता चला कि मै एक शायर हूं तो उसका झुकाव मेरी तरफ अधिक हो गया। मेरी हालत देखकर उसने मुझे अपना तौलिया, साबुन और तेल दिया. इस तरह छ: दिन बीत गए और उसके जाने का दिन आ गया.मेरे लिए समस्या यह थी कि दो दिन बाद मेरी भी आठ दिन की अवधि खत्म होनेवाली थी.मेरी परेशानी देखकर उसने गुरुद्वारे वालों से कहकर मेरे रहने का एक हफ्ता इंतजाम और कर दिया, साथ ही जाते वक्त कुछ पैसे देकर वह चला गया.’

बंबई आने के बाद नक्श जी को पहला काम एक डाकखाने में बतौर क्लर्क की मिली. नौकरी में अरुचि तथा अधिकारियों से अनबन होने के कारण उन्होंने वह नौकरी छोड दी. कला की तरफ रुझान रखनेवाले नक्श जी ने बंबई में भी अपने काफी प्रशंसक बना लिए थे, जिनमें अधिकतर कला में रूचि रखनेवाले बडे घरों के लडके थे. उनकी मदद से नक्श जी ने एक नाटक तैयार किया.  आर्थिक मदद उन लडकों ने दी.  नायक के रूप में उन्होंने  अभिनेता राम मोहन को चुना,  उस समय निर्देशक जगदीश सेठी के साथ बतौर सहयोगी निर्देशक के रूप में कार्यरत थे. नक्श जी बताते है‘ मेरे लिखे नाटक और गीतों से प्रभावित होकर उन्होंने मुझे फिल्मों के लिए गीत लिखने का सुझाव दिया. मगर उन दिनों फिल्मों के बारे में मेरी राय अच्छी नहीं थी. मुझे लगता था फिल्मी दुनिया में नए लोगों के साथ बहुत बद्सलूकी की जाती है. जब मैने उन्हें अपने दिल की बात बताई तो वह हंसने लगे और कहा कि यदि आपको इज्जत से काम मिले तब तो आपको कोई परेशानी नहीं होगी. उनकी बात सुनकर मैने कहा बिल्कुल नहीं. जहां इज्जत और पैसा दोनों मिले वहां काम करने में कैसी हिचक. मेरी बात सुनकर उन्होंने मेरी मुलाकात जगदीश सेठी से करवाई. तब वह अपनी फिल्म जग्गू की तैयारियों में व्यस्त थे. गीत लिखने के लिए उन्होंने सात गीतकार नियुक्त कर रखे थे.शर्त यह थी कि जिसका गीत अच्छा होगा उसे चुना जाएगा. इस तरह आठवें गीतकार के रूप में उनके यहां मुझे भी मौका मिल गया. उनकी खासियत यह थी कि वहां लिखने के लिए सभी गीतकारों को समान रूप से पैसे मिलते थे. बीस दिन बाद आखिरकार वह भी दिन आ गया जब दो गीतों को चुना गया. उसमें से एक गीत मेरा था और दूसरा गीत उस जमाने के मशहूर गीतकार मुजफ्फर शाहजहांपुरी का. उन दोनों गीतों में से एक गीत का चुनाव होना था. गीत दोनों ही अच्छे थे सो मतदान के जरिए चुनाव तय हुआ। चुनाव की बात सुनकर मेरा दिल बैठ गया मुझे लगा अब तो कुछ नहीं हो सकता क्योंकि मुझे कौन जानता है जो मेरे लिए मतदान करेगा.मगर इत्तेफाक से मुझे उनसे एक मत अधिक मिले और मेरा गीत चुन लिया गया. इस तरह 1952में फिल्म ‘जग्गू से मैने फिल्मी दुनिया में प्रवेश किया.' 

नक्श जी इस बात को भी मानते है कि इस इंडस्ट्री में अपने पैर जमाने के लिए दूसरों की तरह उन्हें ज्यादा संघर्ष नहीं करना पडा. नक्श जी के अनुसार उन्हें यकीन था कि जिस तरह उन्हें प्रवेश मिला है, उसी तरह एक दिन वह बुलंदियों को भी छू लेंगे.नक्श जी बताते ह कि आज की तरह वह दौर भी मार्केटिंग का दौर था, जहां खुद को बेचना एक कला समझी जाती थी. मगर नक्श जी कभी इस दौड में नहीं शामिल हुए. 1952से लेकर आज तक काम मांगने के लिए वह किसी संगीतकार के पास नहीं गए. हालांकि नक्श जी यह भी मानते है कि यही वजह है जो उन्हें कोई बडी फिल्म नहीं मिल पाई. 

  गीतकार की जिन्दगी, आजाद जिन्दगी नहीं होती. हर गीत अच्छी धुनों, अच्छे गायक, सफल फिल्म और एक अच्छे चेहरे की मोहताज होती है, जिस पर यह गीत फिल्माया जाए. इन सबको मिलाकर ही एक कामयाब गीत बनता है 

वैसे नक्श जी भले ही यह कहें कि उन्हें कोई बडी फिल्म नहीं मिल पाई मगर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि वह संगीत प्रेमियों के पसंदीदा गीतकारों में से एक है.लेकिन इसका श्रेय भी नक्श जी खुद को ना देते हुए आकाशवाणी के उद्घोषकों को देते हैं जिन्होंने उनके गाने खूब बजाए. उस वक्त पैसे लेकर गाने बजाने का चलन था मगर पैसे देकर अपनी वाहवाही नक्श जी को मंजूर ना थी.बतौर गीतकार नक्श जी की लोकप्रियता किसी से छुपी नहीं है मगर यह सवाल भी स्वाभाविक है कि आखिर किस गायक और संगीतकार ने उनके गीतों के साथ न्याय किया ? इस सवाल के जवाब में नक्श जी मुस्कुराते हुए कहते है कि गीतकार की जिन्दगी, आजाद जिन्दगी नहीं होती. हर गीत अच्छी धुनों, अच्छे गायक, सफल फिल्म और एक अच्छे चेहरे की मोहताज होती है, जिस पर यह गीत फिल्माया जाए. इन सबको मिलाकर ही एक कामयाब गीत बनता है।’ वैसे नक्श जी के अनुसार गीत सिर्फ दो तरह के होते हैं, एक अच्छा गीत और दूसरा बुरा गीत. इस सिलिसले में नक्श जी एक गीत उदाहरण देते है जिसे पूरा करने के लिए उन्हें 4काफिये की बजाय 52काफिये लिखने पड़े   गीत के बोल थे - 

मजबूर है हम, तकदीर का गम, हर हाल में सहना पडता है।
शकवे भी जुबां पर आते है खामोश भी रहना पडता है।

नक्श जी बताते है ‘जब 52 काफिया लिखने के बावजूद यह गीत नहीं चुना गया, तो मैने इस गीत के संगीतकार गुलशन सूफी से इसका कारण पूछा.उन्होंने मुझे बताया कि आपके सभी शेर अच्छे है मगर मेरे धुनों में वह जम नहीं पा रहे है. मुझे गीत में जो कट चाहिए, वह कट आपकी शायरी में नहीं आ रही है. उनकी बातों को गौर करके मैने घर जाकर रात को एक शेर और लिखा, जो उन्हें खूब भाया. वह इस प्रकार है - 
ऐ शोख सितारे झूम नहीं, अफसोस तुझे मालूम नहीं,
ऐसी भी घडी आ जाती है, जब चांद को गहना पडता है.
(इस गीत में गहना का अर्थ ग्रहण से है) 

नक्श जी के अनुसार इस गीत को लिखने वक्त जितनी मुश्किलात आई, उतना ही सुकून इसके लोकिप्रय होने पर मिला।’  इसके अलावा  बप्पी लाहिरी का एक गीत  लिखने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पडी। नक्श जी बताते है, संगीतकार बप्पी लाहिरी एक ऐसा गीत चाहते थे जो भजन की शक्ल में हो और उसमें भाई का डूबकर मरना, बहन का बलात्कार और बरसात, तीनों चीजें समाहित हों. इस भजन को लिखने की जिम्मेदारी पहले उन्होंने किसी और को दी थी मगर एक महीने तक जब वह गीत नहीं लिख पाया तो वह गीत मेरे पास आ गया खैर,फिल्म तो साइन कर ली मगर अगले पल लगा कि यह फिल्म साइन करके मैने मुसीबत मोल ले ली- आखिरकार इन सभी चीजों को आपस में मिलाते हुए मैने एक भजन रूपी गीत की रचना की, जो इस प्रकार है - पाप का सावन घिर आया, पाप के बादल छाए/ राम ही जानें आज की बरखा कहां अगन बरसाए. 
इस गीत को मैने तरकीब से बनाई थी मगर आज भी मै इस गीत से खुश नहीं हूं।’

नक्श जी बताते है कि आज की तरह यह जरूरी नहीं था कि पहले धुन बनें उसके बाद गीत लिखे जाएं उस दौर के संगीतकार गीतों के अनुसार गीत और धुन बनाते थे,  जिस नृत्य पर आधारित गीत में संगीत मुख्य भूमिका निभाता है.सो उसका संगीत पहले तैयार किया जाता था क्योंकि उसमें हल्के फुल्के बोल भी चल जाते थे.

1952 से लेकर अब तक अनगिनत गीत लिख चुके नक्श जी अपने प्रोफेशन को प्रोफेशन नहीं मानते.उनके लिए यह कला है,  उन्हें सुकून देती है. साथ ही उन्हें इस बात की खुशी और तसल्ली है कि बुरा गीत ना लिखने का उनका फैसला आज तक कायम है. वैसे इस लिहाज से नक्श जी ने कई दौर देखे. पुराने लोगों के साथ साथ नए लोगों के लिए शब्द रचना कर चुके नक्श जी अपना अधिक जुडाव पुराने लोगों से मानते है.  उनके अनुसार आज के संगीतकारों के पास अधूरी शिक्षा है. पहले के संगीतकार पूरी तरह से राग विद्या में प्रशिक्षित होकर आते थे. उन्हें शास्त्रीय संगीत की सारी किस्में पता थी.इसके अलावा शायरी के लिए भी उनके पास कान थे जो आज के संगीतकारों में नदारद है. यही नहीं इन दिनों टेलीविजन में अपना खास मुकाम बनाए रिएलिटी शो में भी उनकी कोई आस्था नहीं है, विशेष रूप से उसमें नजर आनेवाले जजों पर.

यूं तो नक्श जी ने जयदेव, खैय्याम, मदन मोहन और रोशन, इन सभी के साथ खूब काम किया,  मगर विशेष रूप से वह मदन मोहन से काफी प्रभावित हैं. उनका कहना है कि मदन मोहन जी का जजमेंट काफी अच्छा था. सुरों के साथ गीत की भी उन्हें अच्छी परख थी। एक बार मैने उन्हें एक गीत लिखकर दिया, 

आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें,
होश में दोनों नहीं हैं, किसको दीवाना कहें.

इस गीत को सुनकर वह खुशी से उछल पडे और मुझे गले लगाते हुए कहा कि यह तो लाजवाब मुखडा है. इसे हम चाहें तो कव्वाली बना लें, गीत बना लें या फिर गजल बना लें. गायकी की हर विधा में यह बेजोड है.’ यदि आज के गीतों की बात करें तो आज के गीतों से नक्श जी को कोई परहेज नहीं है मगर उनका मानना है कि आज के गीतों में गहराई नहीं है और उसकी वजह है गीतकारों और संगीतकारों की निष्ठा में कमी. नक्श जी बताते है कि पहले कुछ फिल्म कंपनियां थी जैसे पूना में शालिमार फिल्म कंपनी और मुंबई में फजली ब्रदर्स, इनके निर्माता - निर्देशक काफी पढे लिखे और साहित्यिक किस्म के इंसान थे. अपनी फिल्मों के लिए उन्होंने बडे बडे और नामी शायर जैसे जोश मलिदाबादी और मजरूह सुल्तानपुरी को रखा था. उनके पास अच्छी जुबान के साथ अच्छी सोच भी थी, मगर आज के बारे में क्या कहें,उनकेबारे में कुछ ना कहना ही बेहतर है. इसके अलावा प्रेरणा के नाम पर गीत - संगीत की हो रही चोरी से उन्हें बेहद नफरत है. 

कुछ सालों तक छोटे परदे के सीरियलों के लिए गीत लिखने वाले नक्श जी फिलहाल मुंबई के ओशिवारा स्थित अपने आवास में गुमनाम सी जिंदगी जी रहे हैं लेकिन उन्हें किसी से शिकायत नही हैं.  वह बॉलीवुड की इस अदा से भी अच्छी तरह वाकिफ है कि यहां नमस्कार सिर्फ उगते सूरज को किया जाता है, डूबते सूरज को नहीं. नक्श जी कहते हैं कि यहां क्या हर जगह का यही आलम है. उदाहरण के तौर पर रेसकोर्स में जैकपॉट एक आदमी का लगता है और हारकर हजारों निकलते है मगर हारनेवालों के बारे में कोई नहीं सोचता, सभी की नजर सिर्फ जैकपॉट वाले पर होती है.इतनी आसानी से जिंदगी का फलसफा बयां करनेवाले नक्श जी ने सफलता और असफलता के कई पायदानों  को छुआ है मगर आज भी पुरस्कार उनके लिए कोई खास मायने नहीं रखते. उनका मानना है कि पुरस्कार कलाकारों की हौसला अफजाई के लिए होते है.सो यदि पुरस्कार योग्यता के आधार पर तय हो तो अच्छी बात है मगर दुखद बात यह है कि हमेशा से पुरस्कार बिकते आए हैं.
                                                                                        
नक्श जी आज फ़िल्मी दुनिया की चमक दमक से दूर हैं.  रेडियो पर जब उनका लिखा कोई पुराना नगमा बज उठता है तब वे शायद अपना ही एक शेर दुहराते हैं..

मैं दुनिया की हक़ीकत जानता हूँ
किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ

मेरी पहचान है शेरो सुख़न से
मैं अपनी कद्रो-क़ीमत जानता हूँ ..

                                                                             उर्मिला कोरी युवा फिल्म रिपोर्टर हैं. 




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