11 August 2010

वसंत के हत्यारे

(मूलतः इंडिया टुडे में प्रकाशित )
 वरिष्ठ कथाकार ,नाटककार हृषिकेश सुलभ का नया कहानी संग्रह ‘वसंत के हत्यारे’ एक विस्मृत प्रदेश और समय में हमारी आवाजाही को संभव बनाता है। ये कहानियां उस जीवन का आईना हैं जो है तो हमारा हिस्सा ही, हमारा खुद का भोगा हुआ , लेकिन इस कदर हमसे अलग हो चुका है कि उसकी बेचैन आहटें अब हमारे कानो  तक नहीं पहुंचतीं। यथार्थ के अनेकों चेहरे और उसके छल-छद्मों  को समेटे हुए ये कहानियां हमें  चकित भी करती हैं और स्तब्ध भी। हमें मथती भी हैं और अक्सर निःशब्द भी बना डालती हैं।
  संग्रह की शीर्षक कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है।विद्रूप समय और समाज में रंगकर्म और प्रेम के दोहरे जोखिम को उठानेवाला कथावाचक घुटन भरी व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक है। उसकी हत्या एक व्यक्ति के भीतर जन्म ले रहे वसंत की हत्या नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के वसंत की, उसके सपनों की हत्या है। अपनी ही मौत की जुलूस में शामिल कथा नैरेटर यह महसूस करता है कि यह (व्यवस्था के दुश्चक्र का)भंवर मुझे लील रहा है।....इस जुलूस में शामिल तमाम लोग इस भंवर में गड़ाप होते जा रहे हैं।’ यह कहानी किसी भी शहर की हो सकती है लेकिन पटना शहर के सांस्कृतिक और मानवीय वातावरण के क्षय को दर्ज करने के कारण इसका महत्व काफी ज्यादा है।  
      वसंत इस पूरे कहानी संग्रह की थीम है।ये इंसानी जीवन के कोमलतम को बचाए रखने की लेखकीय कोशिश  को दर्ज करती हुई कहानियां हैं। ‘काबर झील का पाखी’ में पुनीत शर्मा की आवारगी दहशतनाक समय में एक अकेले आदमी के-‘फर्क’ पैदा करने की कोशिश  , को बयान करती है। ‘स्वप्न जैसे पांव’ में भी इस कोशिश  को देखा जा सकता है और इसकी परिणति को भी। ‘डाइन’ कहानी दरकते हुए इंसानियत की , उसके पतन की कहानी है। यह आदमी की आत्मा के व्यवस्था के स्याह रंग से रंग जाने की त्रासदी को प्रकट करती है।
      ‘फजर की नमाज’ प्रेमचंद की परंपरा की कहानी है। यह कहानी ग्रामीण मुसलिम समाज की उन ओझल सच्चाइयों को बेहद आत्मीय तरीके से बयान करती है जिन्हें किसी रिपोर्ट से नहीं समझा जा सकता है। ये कहानी अरब देशों  को होने वाले मुसलमान आबादी के प्रवास के कारणों की और उसके कारण बनते बिगड़ते सामाजिक संबंधों की पड़ताल करती है। यह संभवतः इस विषय पर पर लिखी गई पहली कहानी है। यहां गन्ना मिलों की तालाबंदी से किसानी तंत्र  के चरमराने की सच्चाई को भी उजागर किया गया है।
       ‘खुला’ मुसलिम समाज की तस्वीर है। ‘आबरू’ की पुरुषवादी मानसिकता के कैदखाने में जकड़ी स्त्री की मुक्ति का मार्ग लेखक ने शिक्षा में देखा है। शिक्षा, लुबना को अपने लिए निर्णय लेने का साहस देती है और वह अनचाहे विवाह से ‘खुला’ यानी तलाक मांगती है।  ‘कुसुम कथा’ भी स्त्री की आजादी के वरण की कहानी है। यह अपने भीतर समाज के विकृत चेहरे को ही नहीं आत्मीयता के धागों को भी समेटे हुए है। इस कहानी के जरिए हम एक बिछडे़ जीवन में वापसी कर सकते हैं। ‘हां मेरी बिट्टू’ इंसानी रिष्तों की एक बेहद मार्मिक कहानी है।इस कहानी में एक सहज भावुकता है जिसका आज के कथा सहित्य में लोप होता जा रहा है ।
        इस संग्रह की तकरीबन सभी कहानियां ऐसी हैं जो ठहरकर सोचने के लिए विवष करती हैं। ये यथार्थ में गहरे तक डूबी हुई और उससे उपजी हुई कहानियां हैं। यहां घुटन भरी व्यवस्था के भीतर प्रेम में लरजते दिल भी हैं तो बेरोजगारी का दंष झेलता हुआ युवा भी । स्नेहिल रिश्तों  की नर्म आंच भी है तो प्रतिरोध की सुलगती चिंगारी भी। यहां सिर्फ विद्रूप समय का चेहरा ही नहीं, वह जीवन राग भी है जो इंसान को लड़ने और आगे बढ़ने की शक्ति देता है।
        इस संग्रह की कहानियां अपने ‘कहन’ के टेकनीक, यानी शिल्प  के कारण याद रखी जाएंगी। संग्रह की पहली कहानी ‘भुजाए’ं में जिस तरह ‘डबल क्लाइमेक्स’ का सृजन किया गया है वह आकर्षक है। ‘वसंत के हत्यारे’ में कथा नैरेटर अपनी ही हत्या की कहानी सुनाता है। अंत में जब यह बात पता चलती है तो पाठक को झटका लगता है। इसी तरह से ‘स्वप्न जैसे पांव’ में स्वप्न और यथार्थ का फ्यूजन मुक्तिबोध की कविताओं में प्रयुक्त फैंटेसी की याद दिलाता है।‘डाइन’ कहानी का वातावरण एक आदिम गंध लिए है;बहुत कुछ रेणु की कोसी अंचल की कहानियों की तरह। यथार्थपरक होने के बावजूद ये कहानियां कहीं बोझिल नहीं हुई हैं और रोचकता और नाटकीयता के तत्व से भरपूर हैं। एक कथाकार जो नाटककार भी है उसकी कहानियों में ऐसा होना विस्मयकारी नहीं है। यह महज संयोग नहीं है कि इस संग्रह की तमाम कहानियां हल्के एडप्टेशन  के साथ रंगमंच पर खेली जा सकती हैं। इन कहानियों से निश्चित ही हिंदी कथा-जगत समृ़द्ध हुआ है।

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