11 April 2013

फरमाइश की है झुमरी तिलैया से.....

"झुमरी तिलैया" नाम सुनकर हम बचपन में खिलखिला कर हंस दिया करते थे. हम में से कई लोगों के लिए झुमरी तिलैया बस एक काल्पनिक जगह थी, जहाँ के लोग फ़िल्मी गानों के बेहद शौक़ीन थे.  वे दिन भर चिट्ठियाँ लिखा करते थे...अपनी फरमाइशों की फेहरिस्त बनाया करते थे...उन्हें जूनून की हद तक शायद रेडिओ पर अपना नाम और उससे भी बढ़कर अपने शहर का नाम सुनने का चस्का लगा था... जब धीरे धीरे देश से वह पुराना रेडियो गायब हुआ, तब उसके साथ ही झुमरी तिलैया भी कही खो गया. उसके साथ ही खो गयी चेहरों पर खिलने वाली वह तन्दुरित मुस्कान....इस झुमरी तिलैया पर जो हकीकत की जमीन से ज्यादा हमारी कल्पनाओं में बसा करता था...एक रिपोर्ट लिखी है  अनुपमा ने... आप भी पढ़े...: अखरावट 
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देश  के लाखों रेडियो श्रोताओं की याद में बसा झारखंड का झुमरी तिलैया धीरे-धीरे अपनी पहचान बदल रहा है, लेकिन उसकी नई पहचान में भी सिनेमा और स्वाद का रस घुला हुआ है...... 

अगर आपने जीवन के किसी भी दौर में रेडियो पर फरमाइशी फिल्मी गीतों का कार्यक्रम सुना हो तो यह संभव नहीं है कि आप झुमरीतिलैया के नाम से अपरिचित हों. बात जब झुमरीतिलैया की हो तो वाकई यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि किस किस्से को तवज्जो दी जाए, बातचीत का कौन-सा सिरा थामा जाए. है तो यह एक छोटा-सा कस्बा लेकिन यहां गली-गली में ऐसी दास्तानें बिखरी हैं जो आपकी यादों से वाबस्ता होंगी.
झारखंड के कोडरमा जिले में स्थित यह शहर फरमाइशी गीतों के कद्रदानों का शहर तो है ही लेकिन आप यहां आएंगे तो एक और फरमाइश आपसे की जाएगी- यहां बनने वाले कलाकंद को चखने की. यहां बनने वाला कलाकंद हर रोज देश के कोने-कोने में जाता है और दुनिया के उन मुल्कों में भी जहां इस इलाके के लोग रहते हैं.

इस बीच सड़क किनारे दीवारों से झांकते पोस्टर एक दूसरी कहानी भी बता रहे होते हैं. यह झुमरीतिलैया की नई पहचान है. कुछ युवाओं द्वारा जिद और जुनून में बनाई गई ‘झुमरीतिलैया’ नाम की फिल्म ने भी शहर को नई पहचान देने की कोशिश की है. इन्हीं बातों के बीच तिलैया डैम के पास हमें ब्रजकिशोर बाबू मिलते हैं, जो कहते हैं, 'देखिए, यह सब पहचान बाद की है, इसकी असली पहचान तो अभ्रक को लेकर रही है. 1890 के आस-पास जब रेल लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ तो पता चला कि यहां तो अभ्रक की भरमार है. फिर क्या था अंग्रेजों की नजर पड़ी, वे खुदाई करने में लग गए. बाद में छोटूराम भदानी और होरिलराम भदानी आए. उन्होंने मिलकर सीएच कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनाई और माइका किंग नाम से मशहूर हो गए.’ ब्रजकिशोर बाबू कहते हैं कि शहर में 1960 में ही मर्सिडीज और पोर्सके कार देखी जा सकती थीं.

इस छोटे-से कस्बे में ऐसी अनेक दास्तानें बिखरी हुई हैं. वहां से हम सीधे गंगा प्रसाद मगधिया के घर पहुंचते हैं जो अपने जमाने में रेडियो पर फरमाइशी गीतों के चर्चित श्रोता थे. रेडियो सिलोन से लेकर विविध भारती तक फरमाइशी फिल्मों का कार्यक्रम हो और मगधिया का नाम न आए, ऐसा कम ही होता था. शहर के बीचो-बीच स्थित दुकान के पीछे बने मकान में उनकी पत्नी मालती देवी, भाई किशोर मगधिया और बेटे अंजनि मगधिया से मुलाकात होती है. घर में दाखिल होने पर पता चल जाता है कि हम ऐसी जगह पर हैं जहां कभी सिर्फ और सिर्फ गीत-संगीत और रेडियो की खुमारी रही होगी. कुछ पुराने रेडियो छज्जे पर रखे रहते हैं कपड़े के गट्ठर में पुराने कागजों के कुछ बंडल पड़े होते हैं. अंजनि मगधिया उन्हें खोलते हुए कहते हैं, ‘इसे ही देख लीजिए, कुछ नहीं बताना पड़ेगा हम लोगो को.

पिताजी के मन में रेडियो फरमाइश, गीत-संगीत की दीवानगी की कहानी इसी बंडल में है.’ बंडल खुलता है, सबसे पहले एक पैड नजर आता है- बारूद रेडियो श्रोता संघ, झुमरीतिलैया. पोस्टकार्ड हैं जो बाकायदा प्रिंट कराए गए हैं. कोई गंगा प्रसाद मगधिया के नाम से है तो किसी में उनके साथ पत्नी मालती देवी का नाम भी है. कुछ पोस्टकार्ड बारूद रेडियो श्रोता संघ के नाम वाले हैं. स्व. गंगा प्रसाद मगधिया की पत्नी मालती देवी कहती हैं, ‘मुझे तो इतना गुस्सा आता था उन पर कि क्या बताऊं. दिन भर बैठकर यही करते रहते थे. कहने पर कहते थे- सुनना, तुम्हारा भी नाम आएगा. मैं झल्लाकर कहती कि रेडियो से नाम आने पर क्या होगा तो वे हंस कर कहते- माना कि फरमाइश बचपना बर्बाद करती है, मगर ये क्या कम है कि दुनिया याद करती है. 

उनके भाई किशोर कहते हैं कि उस जमाने में विदेश में एक बार फरमाइश भेजने में 14 रुपये तक का खर्च आता था लेकिन यह रोजाना होता था. हमारे मन में सवाल उठता है कि आखिर उस जमाने में यानी 60 से 80 के दशक के बीच इतना खर्च कर रेडियो पर फरमाइशी गीत सुनने का यह जुनून क्यों. जवाब मिलता है- एक तो इस छोटे-से कस्बेनुमा शहर को ख्याति दिलाने की होड़, दूसरा इस छोटे-से शहर के लोगों का नाम रेडियो सिलोन, रेडियो इंडोनेशिया, रेडियो अफगानिस्तान, विविध भारती वगैरह में रोजाना सुनाई पड़ता था. एक तो इसे लेकर उत्साह और रोमांच रहता था और दूसरा अधिक से अधिक बार नाम प्रसारित करवाने की एक होड़ भी थी, जिसमें कई गुट एक-दूसरे से मुकाबला करने में लगे रहते थे.

हम रेडियो और फरमाइशी गीतों के दूसरे दीवानों के बारे में जानना चाहते हैं. बताया जाता है कि रामेश्वर वर्णवाल भी फरमाइशी गीतों के बेमिसाल श्रोता और फरमाइश भेजने वालों के बेताज बादशाह थे. कवि और फिल्म समीक्षक विष्णु खरे ने कभी लिखा था कि अमीन सयानी को मशहूर कराने में झुमरीतिलैया वाले रामेश्वर वर्णवाल का बड़ा योगदान रहा है. मगधिया और वर्णवाल के अलावा झुमरीतिलैया से फरमाइश करने वालों में कुलदीप सिंह आकाश, राजेंद्र प्रसाद, जगन्नाथ साहू, धर्मेंद्र कुमार जैन, लखन साहू, हरेकृष्ण सिंह, राजेश सिंह और अर्जुन सिंह के नाम भी हैं. हरेकृष्ण सिंह तो अपने नाम के साथ अपनी प्रेमिका प्रिया जैन का नाम भी लिखकर भेजा करते थे.

फरमाइशी गीतों की मासूम चाहत में भी षड्यंत्रों और घात-प्रतिघात की गुंजाइश मौजूद थी. कई लोग जहां टेलीग्राम भेजकर भी गीतों की फरमाइश करते थे वहीं ऐसे लोग भी थे जो डाकखाने से सेटिंग करके एक-दूसरे की फरमाइशी चिट्ठियों को गायब भी करवा देते थे ताकि दूसरे का नाम कम आए. बहरहाल, अतीत के इन दिलचस्प किस्सों के साथ हम वर्तमान को जानने की कोशिश करते हैं. फरमाइशी गीतों के कारण पहचान बनाने वाले इस शहर में अब इसके कितने दीवाने बचे हैं? गंगा प्रसाद मगधिया के भाई किशोर मगधिया कहते हैं, ‘हम इसे जिंदा तो रखना चाहते हैं लेकिन केवल एक परंपरा की तरह क्योंकि रोजी-रोटी की चिंता जुनून पर हावी है.’ 

इस बीच शहर की दीवारों पर जगह-जगह ‘झुमरीतिलैया’ फिल्म के पोस्टर नजर आ रहे हैं. हम कोशिश करते हैं शहर की नई फिल्मी पहचान से रूबरू होने की. हम फिल्म के कलाकारों से मिलने उनके घर पहुंचते हैं. एक कमरे में सारे कलाकार जुटते हैं. निर्देशक-अभिनेता अभिषेक द्विवेदी, उनके भाई राहुल, उनके पिता उदय द्विवेदी, मां कांति द्विवेदी, विवेक राणा, उनके मामा गौरव राणा, अभिनेत्री नेहा, नेहा के पापा आदि. इन सबने मिलकर फिल्म प्रोडक्शन कंपनी बनाई एफ ऐंड बी यानी फेंड्स ऐंड ब्रदर्स प्रोडक्शन. फिल्म में अगर तकनीशियन वगैरह का शुल्क जोड़ लिया जाए तो इसमें कम से कम 13 लाख रुपये लगते लेकिन आपसी जुगाड़ के चलते यह महज पांच लाख रुपये में बन गई.

यह फिल्म शहर के सिनेमाहॉल में दस दिन तक चलीं, रांची में एक सप्ताह तक, बुंडू में छह दिन तक. अब होली के बाद दूसरे शहरों में फिर से रिलीज करने की तैयारी है. फिल्म में एक्शन की भरमार है. अभिषेक कहते हैं, ‘हम बचपन से ही मार्शल आर्ट के दीवाने रहे हैं. बहुत दिनों से फिल्म बनाने की सोचते थे. हमने तय किया खुद ही पैसा जुटाएंगे और खुद ही अभिनेता-अभिनेत्री बनेंगे.’ इसके बाद सोनी एफएक्स कैमरे का जुगाड़ हुआ. ग्यारहवीं में पढ़ने वाली नेहा नायिका के रूप में मिल गई.

हीरो के लिए विवेक, राहुल आदि हो गए. पापा की भूमिका के लिए निर्देशक अभिषेक के पापा मिल गए और मां के रोल में उनकी मां. किसी का नाम नहीं बदला गया. किसी को फिल्म का अनुभव पहले से नहीं था, सो बार-बार ब्रूस ली की फिल्म ‘इंटर द ड्रैगन’, ‘टॉम युम वुम’ आदि दिखाई गईं ताकि एक्शन का रियाज हो. इसके बाद घर में और आस-पास के लोकेशन में ‘झुमरीतिलैया’ की शूटिंग भी शुरू हो गई. फिल्म बनाने के दौरान लगा कि एक गाना तो होना ही चाहिए. अब गायक कहां से आए तो अभिषेक ने अपने चाचा को कहा, जो मुकेश के गाने ही गाते हैं. ऐसे ही जुगाड़ तकनीक से झुमरीतिलैया बनकर तैयार हुई और रिलीज हुई तो एक बार फिर गीत-संगीत के शहर का फिल्मी सफर शुरू हुआ.


फिल्म की अभिनेत्री नेहा कहती हैं, ‘मैं पहले सोचती थी कि अभिनय कैसे करूंगी लेकिन दोस्तों के साथ काम का पता ही नहीं चला.’ फिल्म में मां बनी निर्देशक अभिषेक की मां कांति द्विवेदी कहती हैं, ‘बेटों ने मुझसे भी अभिनय करा लिया, अब तो सड़क पर जाती हूं तो कई बार बच्चे कहते हुए मिले- देखो-देखो, झुमरीतिलैया की मां जा रही है.’ एक्शन फिल्मों का नाम झुमरीतिलैया क्यों? इस सवाल के जवाब में निर्देशक अभिषेक कहते हैं कि अपना शहर है झुमरीतिलैया, इसके नाम पर तो इतना भरोसा है कि कुछ भी चल जाएगा.

गीतों के शहर में फिल्मों के जरिए सफर का यह नया अनुभव सुनना दिलचस्प लगता है. यहां से निकलते-निकलते युवा फिल्मकार भी कलाकंद चखने की सिफारिश कर ही देते हैं. वहां से हम कलाकंद के लिए मशहूर आनंद विहार मिष्ठान्न भंडार पहुंचते हैं. दुकान मालिक के बेटे अमित खेतान कहते हैं, ‘झुमरीतिलैया जैसा कलाकंद कहीं और खाने को नहीं मिल सकता.’

खेतान बताते हैं कि कलाकंद की शुरुआत भाटिया मिष्ठान्न भंडार ने की थी लेकिन उसके बंद हो जाने के बाद कलाकंद की सबसे ज्यादा बिक्री उनकी दुकान में ही होती है. इसकी फरमाइश देश के हर हिस्से और कई बार विदेश तक से आती है. पिछले चार दशक से कलाकंद बनाने में ही लगे कारीगर सुखती पात्रो कहते हैं, ‘मैंने बहुत जगह देखा है, कलाकंद आज भले सभी जगह हो लेकिन यह देन तो इसी झुमरीतिलैया की है.’

पता नहीं कलाकंद कहां की देन है लेकिन वाकई झुमरीतिलैया के कलाकंद का स्वाद शायद ही कहीं और मिले. शहर की पहचान अब बदल रही है. कोई कहता है कि यह पावर हब बन रहा है तो कोई और बेशकीमती पत्थरों को इसकी नई पहचान बताता है, लेकिन हमारे हाथों में मगधिया के पोस्टकार्डों का बंडल होता है- पसंदकर्ता गंगा प्रसाद मगधिया, बारूद रेडियो क्लब, झुमरीतिलैया, गीत- दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गया रे, फिल्म गंगा-जमुना....!

मूल रूप से तहलका हिंदी में प्रकाशित 

मूल कॉपी यहाँ पढ़ी जा सकती है

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