16 April 2013

हीरो को टक्कर देनेवाला खलनायक : प्राण

प्राण को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की घोषणा शायद इस वजह से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी यह पुरस्कार परदे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले एक अभिनेता को मिला है. प्राण सिनेमा के परदे पर खलनायकी के पर्याय हैं. नायकों की पूजा करने वाले हमारे समाज में प्राण को सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान मिलना भारतीय सिनेमा के वयस्क होने का एक प्रमाण कहा जा सकता है. हालांकि सच यह भी है की यह वयस्कता इसके सौवें साल में आयी है, और अभी भी इसे एक ट्रेंड मानने का कोई ठोस कारण नहीं है. प्राण को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने पर सोमवार को यह लेख प्रभात खबर के लिए विनोद अनुपम ने लिखा. आप भी पढ़िए. : अखरावट 

93 वर्ष की उम्र में प्राण के लिए हिन्दी सिनेमा के सबसे बडे सम्मान दादा साहब फाल्के सम्मान की घोषणा हुई। वाकई प्राण जैसे अभिनेता को यह सम्मान काफी पहले मिल जाना चाहिए था। लेकिन सवाल है पहले किन्हें नहीं मिलना चाहिए था, देवानंद को, यश चोपडा को, मन्ना डे, मजरुह सुल्तानपुरी को...प्राण से भी पूछा जाता तो इनमें से किसी नाम की जगह पर अपने नाम पर शायद ही वे सहमत होते। प्राण के लिए अभिनय एक कला थी,जिसके प्रति समर्पण का प्रतिसाद उन्हें उनके दर्शकों से मिलता था, पुरस्कार की न तो उन्हे इच्छा थी, न ही अपेक्षा।आश्चर्य नहीं कि आजादी के ठीक पहले भारत आ जाने वाले प्राण को अपना पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिलने में 20 वर्ष बीत गए। लेकिन दर्शकों की तालियों ने कभी प्राण के चेहरे पर शिकन नहीं आने दी। अपने 70 साल से भी लम्बे सिनेमाई जीवन में उन्हें शायद ही कभी असंतोष व्यक्त करते देखा गया। भारतीय सिनेमा के 100 वें वर्ष में वास्तव में यह सम्मान भाईचारे, समर्पण और अभिनय की उस परंपरा को याद दिलाने की कोशिश है जिसके प्रतीक पुरुष के रुप में प्राण माने जाते हैं। आज जबहिन्दी सिनेमा के नायक वास्तविक जीवन में खलनायक बनने को उतावले दिख रहे हों, ऐसे में यह जानना वाकई सुखद लगता है कि प्राण ऐसे विरले कलाकारों में थे जो सेट पर महिला कलाकारों को खड़े होकर रिसिव किया करते थे, चाहे वह कोई नवोदित अदाकारा ही क्यों न हो। परदे पर क्रूरता के पर्याय बने प्राण की पहचान उनकी सौम्यता थी, जो अब 93बर्ष के बुजुर्ग के चेहरे पर और भी मुखर हो गई लगती है। लेकिन यह प्राण के अभिनय का प्रभाव ही है कि तस्वीरों में दिखते उस सौम्य बुजुर्ग को देखते हुए भी याद ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के दो घोड़े पर एक साथ सवार डाकू राका की ही आती है। याद उस खलनायक की आती है, जिसने न जाने कितने बलात्कार, कितने षडयंत्रों, कितनी हत्याओं को पूरी तन्मयता से परदे पर साकार किया।
                यह शायद संयोग नहीं कि प्राण ने अपने अभिनय की शुरूआत महिला कलाकार के रूप में ही की थी। शिमला की रामलीलाओं में मदन पुरी राम की भूमिका निभाया करते थे,जबकि सीता की भूमिका लंबे समय तक प्राण निभाते रहे। प्राण की विलक्ष्ण अभिनय क्षमता ही थी कि एक सौम्य छवि को क्रूर खलनायक के रूप में उन्होंने दर्शकों को स्वीकार करवा दिया। प्राण की अभिनय यात्रा का आरंभ छोटी छोटी नकारात्मक भूमिकाओं से हुआ।1940 में पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ में प्राण को एक अहम् नकारात्मक किरदार मिला,  फिल्म सफल हुई और उसके साथ प्राण की गणना भी सफल अभिनेताओं में होने लगी। जल्दी ही वे लौहार फिल्म उद्योग में एक खलनायक की छवि बनाने में कामयाब हो गए, इनकी लोकप्रियता ने उसी समय निर्माताओं को हिम्मत दी, और 1942 में लाहौर की पंचोली आर्ट प्रोडक्शन के ‘खानदान’ में इन्हें उस समय की महत्वपूर्ण अदाकारा नूरजहां के साथ नायक बनने का अवसर दिया गया।लेकिन खलनायक के अभिनय की विविधता के सामने,नायक के चरित्र की एकरसता प्राण को रास नहीं आयी। बटवारे से पहले प्राण तकरीबन २२ फिल्मो में खलनायक की भूमिका निभा कर लाहौर में स्थापित हो गये थे। आजादी के बाद प्राण ने लाहोर छोड़ दिया और मुंबई आ गए, हालांकि पाकिस्तान में नायक के रूप में उनकी ‘शाही लुटेरा’ जैसी फिल्में आजादी के बाद तक दिखायी जाती रही, और भारत आने के बावजूद पाकिस्तान के लोकप्रिय अभिनेताओं में वे शुमार किये जाते रहे।

                प्राण स्टाइल ऐक्टर थे, लेकिन फर्क यह था कि जहां अधिकांश अभिनेता अपने स्टाइल को अपना ब्रांड बनाकर जिंदगी भर दुहराते रहे, प्राण हरेक फिल्म में अपने एक नये स्टाइल के साथ आए। कभी कभी स्टाइल के लिए उन्होंने सिगरेट, रूमाल, छड़ी जैसी प्रापर्टी का भी सहारा लिया, लेकिन अधिकांश फिल्मों में स्टाइल उनकी आंखों, होठों और चेहरे के भाव से बदलते रहे। हां, प्राण शायद ऐसे पहले अभिनेता थे जिन्होंने आवाज और मोडूलेशन बदलकर पात्र को एक नई पहचान दी, बाद में जिसका इस्तेमाल अमिताभ बच्चन ने‘अग्निपथ’ में, शाहरूख खान ने ‘वीरजारा’ में और बोमन ईरानी ने ‘वेलडन अब्बा’ में किया। प्राण अपने अभिनय के बारे में कहते भी थे, मैं पात्र में नहीं उतरता पात्र को अपने अंदर उतार लेता हूं।आज के मेथड एक्टिंग में उनका यकीन नहीं था। यह प्राण की ही खासियत थी कि अपने मैनेरिज्म के साथ भी वे दर्शकों को एक ओर ‘उपकार’ के मंगल चाचा दूसरी ओर ‘विक्टोरिया नं.203’ के राणा के रुप में भी स्वाकार्य हो सकते थे। आश्चर्य नहीं कि हिंदी सिनेमा  में पचास और साठ का दशक त्रिदेव ( दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद ) के लिये भले ही याद किया जाता हो, लेकिन जो उन्हें एक कडी से जोडती थी वे प्राण थे, फिल्म चाहे दिलीप कुमार की हो, या राज कपूर की, या फिर देवानंद की, अधिकांश फिल्मों में खलनायक के रुप में प्राण की उपस्थिती तय मानी जाती थी। दिलीप कुमार के साथ‘आजाद’, ‘मधुमती’, ‘देवदास’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘राम और श्याम’ और ‘आदमी’ में महत्वपूर्ण किरदार रहे तो  देव आनंद के साथ ‘जिद्दी’, ‘मुनीमजी’, ’अमरदीप’  जैसी फिल्मे पसंद की गई। राज कपूर के साथ ‘आह’, ‘चोरी  चोरी’ , ‘छलिया’ , ‘जिस  देश  में  गंगा बहती  है’ , ‘दिल  ही  तो है’ जैसी फिल्मों में जो जोडी बनी वह ‘बाबी’ तक कायम रही।

                      प्राण ने 60 साल से भी ज़्यादा समय तक चले अपने करियर के दौरान 400 से भी अधिक फिल्मों में काम किया। प्राण के लिए फर्क नहीं पडता फिल्म कैसी बन रही है, कौन बना रहा है, साथी कलाकारों की क्या भूमिका है, वे अपना श्रेष्ठ देते रहे। चाहे फिल्म कैसी भी बनी हो, यह याद करना मुश्किल होता है कि दर्शकों की कसौटी पर प्राण खरे न उतरे हों। मनमोहन देसाई की बडी फिल्मों की बडी भूमिका में भी वे उतने ही सशक्त दिखते थे,जितना ‘जंगल में मंगल’ जैसी छोटी फिल्म में किरण कुमार के साथ काम करते हुए।प्राण ने कभी अपने को किसी खास समूह का हिस्सा नहीं बनने नहीं दिया। उनके लिए सिनेमा महत्वपूर्ण रहा, और सिनेमा में अपनी भूमिका। 1967 में मनोज कुमार ने ‘उपकार’के साथ उन्हें एक नई पहचान दी। सहृदय मलंग चाचा के किरदार को प्राण ने वह ताकत दी कि हिन्दी सिनेमा में चरित्र भूमिकाओं को नायकों के समानान्तर स्थान दिया जाने लगा। यहां तक कि चरित्र भूमिकाओं को केन्द्र में रख कर फिल्में लिखी जाने लगीं। कह सकते हैं अमिताभ बच्चन प्रौढ भूमिकाओं में आज अपना श्रेष्ठ देते दिख रहे हैं तो उसकी जमीन तैयार करने का श्रेय प्राण को ही जाता है।

              2001 में प्राण को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। वास्तव में यह उस कलाकार का सम्मान था जो अपने अभिनय की स्वयं मिसाल था। अभिनय की यह तरलता शायद उन्हें उस विरासत से मिली थी जिसे प्राण ने आज भी संजोये रखा है। कहते हैं शराब के साथ जब लोग होश खो बैठते हैं, प्राण साहब पूरी गालिब सुना दे सकते हैं। फैज भी मानते थे कि उनके अलावा किसी और को फैज याद है, तो वे प्राण हैं। मीर तकी मीर, नजीर अकबराबादी, अली सरदार जाफरी, कैफी आजमी... प्राण की जिंदगी के सुर शायद यहीं से तय होते थे।

                शायद इसीलिए ‘उपकार’ के मलंग बाबा हों या ‘विक्टोरिया नं. 203’ का मस्त मौला चोर, ‘कालिया’ का जेलर हो या ‘जंजीर’ का खान, जिंदगी के जो भी रंग दिखाने के अवसर प्राण को मिले पूरी तन्मयता से उसे परदे पर साकार किया उसने। राजकपूर, दिलीप कुमार,देव आनंद से लेकर राजेन्द्र कुमार, मनोज कुमार, धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना, नवीन निश्चल अभिनेताओं की पीढि़या-दर-पीढि़या गुजरती रहीं, लेकिन जब तक शारीरिक रूप से सक्षम रहे,प्राण के लिए हिन्दी सिनेमा में भूमिका निकाली जाती रही। वे ऐसे पहले चरित्र अभिनेता थे,जिनपर गाना फिल्माया जाना फिल्म के लिए भाग्यशाली माना जाता था। भाग्यशाली हो या न हो, यह तो जरूर है कि प्राण की जीवंतता उस गाने को अमर कर देने का सामर्थय रखती थी। कौन भूल सकता है, ‘कस्में वादे प्यार वफा सब बाते हैं बातों का क्या....’ या फिर ‘यारी है इमान मेरा, यार मेरी जिंदगी...। ‘प्राण’ का होना हिन्दी सिनेमा में प्राण का होना है, हड़बड़ी में हिट तलाशते और सफलता के लिए अभिनय से दीगर चीजों को तरजीह देने की कोशिश में लगे अभिनेताओं को एक बार अवश्य मुड़कर प्राण की ओर देख लेना चाहिए, यदि वे अच्छे अभिनेता के साथ अच्छे व्यक्ति भी बनना चाहते हैं।

विनोद अनुपम : लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं.

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