4 May 2013

मेरी निगाह में सिनेमा : बलराज साहनी, सत्यजीत रे, अडूर गोपालकृष्णन


बलराज साहनी



मैं दो बीघा जमीन में अपनी भूमिका को हमेशा गर्व के भाव के साथ देखूंगा. बेशक मैं इस भूमिका की स्मृतियों को अपनी आखिरी सांस तक सहेज कर रखूंगा. - यह कबूल करने के बाद मुझे इस बात का हक दिया जाना चाहिए कि मैं इस फिल्म से जुड़े कुछ तकनीकी पक्षों पर बात करूं. यह फिल्म रवींद्रनाथ टैगोर की इसी नाम से लिखी एक कविता पर आधारित थी. लेकिन इसके बावजूद विमल राय ने गुरुदेव के प्रति इसके लिए कोई कृतज्ञता व्यक्त नहीं की है. मेरा मानना है कि न्याय और भलमनसाहत का तकाजा है कि इसे स्वीकार किया जाये.
इस फिल्म के मुख्य किरदार में दो खामियां हैं, जो इसकी ताकत को काफी हद तक कम कर देती है. पहला, वह कभी भी उस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं करता, जिसका उसे सामना करना होता है. दूसरा, वह अपने दोस्तों और सहकर्मियों को खुद से दूर कर देता है. एक औसत दर्शक खुद को हीरो के जूते में रख कर देखना चाहता है. कौन सा ऐसा दर्शक होगा, जो खुद को इस तरह के आत्मपीड़क और अंतर्मुखी हीरो के साथ जोड़ कर देखना चाहेगा. वह दया का पात्र ज्यादा नजर आता है. यही वजह रही कि दो बीघा जमीन को जनता के बीच उस तरह की सफलता और लोकप्रियता नहीं मिली, जितनी कि उसे बुद्धिजीवियों के बीच मिली.
कुछ हद तक हमारी सारी प्रगतिशील कला और हमारा साहित्य इस आदत का शिकार है. यह विदेशी मूल्य और वाद है, जिस पर हम खरा उतरना चाहते हैं, न कि उन मूल्यों पर, जो हमारी अपनी धरती की उपज हैं. दो बीघा जमीन की तकनीक भी विश्व प्रसिद्ध इतालवी निर्देशक की फिल्म बाइसिकिल थीफ और उसमें प्रदर्शित किये गये यथार्थवाद से प्रभावित थी. यही वह कारण था कि रूसियों ने भले ही दो बीघा जमीन के बारे में अच्छी बातें कहीं, लेकिन उन्होंने अपनी सारी प्रशंसा और सम्मान राजकपूर की फिल्म आवारा के लिए सुरक्षित रख लिया, बल्कि वे आवारा के प्रति दीवाने से हो गये. आवारा के प्रदर्शन के बाद रूस में लाखों कामगार मजदूर फैक्टरियों और खेतों में ‘आवारा हूं’ की धुन गुनगुनाते पाये जाते थे. बल्कि जहां तक जनता के प्यार और लोकप्रियता का सवाल है, राजकपूर ने रूस के अभिनेताओं को भी पीछे छोड़ दिया. हालांकि हमने उम्मीद की थी समाजवाद के इस मक्का में लोग कहीं ज्यादा सुसंस्कृत और उन्नत कला  को सम्मान देंगे, लेकिन रूसियों को आवारा के प्रति उनकी दीवानगी के लिए कसूरवार नहीं माना जा सकता. खास तौर से यह देखते हुए कि आवारा में कितने बेजोड़ तरीके से भारतीय जीवन की धड़कन को पकड़ा गया है. इस संदर्भ में हम यह गांठ बांध सकते हैं कि एक अंगरेज हमेशा एक ऐसे भारतीय से संवाद करना कहीं ज्यादा पसंद करेगा, जिसे बस काम चलाऊ अंगरेजी ही आती हो.
(बलराज साहनी की आत्मकथा ‘बलराज साहनी एन आॅटोबायोग्राफी’ का अनुदित एवं संपादित अंश)



सत्यजीत रे






मुझे लगता है कि मुझमें काफी पहले परिपक्वता आ गयी. मुझमें शुरू से ही ऊपर से साधारण दिखनेवाले ढांचे में गहन संदेश को सिनेमाई परदे उतारने का जुनून रहा. मैं अपनी फिल्में बनाते वक्त कभी पश्चिम के दर्शकों के बारे में नहीं सोचता. जब मैं फिल्म बना रहा होता हूं, तो सिर्फ बंगाल के दर्शक ही मेरे जेहन में होते हैं. अपनी फिल्मों के सहारे मंै उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश करता हूं. और ऐसा करते हुए मैं कामयाब भी रहा हूं. शुरुआत में बंगाल के दर्शक काफी पिछड़े हुए थे. वे बचकानी बांग्ला फिल्मों के कचरे के आदी थे. मुझे धीरे-धीरे ही सही, उन्हें साथ लेकर चलना था. इस राह में कई बार कामयाबी मिली, कई बार मैं चूक गया. दर्शकों से जुड़ा ऐसा खतरा बर्गमैन और फेलिनी के साथ नहीं था. बर्गमैन का फिल्म संसार बेहद सहज था. हालांकि कई बार उनमें तीखापन और गहरा संघर्ष भी होता है. इसमें उनकी कई बार उम्दा फोटोग्राफी भी मदद करती है. जहां तक फेलिनी की बात है, मुझे लगता है कि वह एक ही फिल्म लगातार बनाये जा रहे हैं. उनकी फिल्में काफी साहसी होती हैं. इस तथ्य के बावजूद कि फेलिनी कहानियों में ज्यादा रुचि नहीं लेते, दर्शक उनके साहस को देखने जाते हैं. मैं वह सब कर सकता हूं, जो बर्गमैन और फेलिनी ने किया है. लेकिन मेरे पास वे दर्शक नहीं हैं और मैं  उनके परिवेश में काम नहीं कर रहा हूं. मुझे उन दर्शकों से संतुष्ट रहना है, जो कूड़े का अभ्यस्त रहा है.
मैंने भारतीय दर्शकों के साथ तीस सालों तक काम किया है और इन  वर्षों में सिनेमा का बाहरी चेहरा वैसा का वैसा रहा है. कम से कम बंगाल में तो नहीं ही बदला. वहां आपको ऐसे निर्देशक मिल जायेंगे, जो इतने पिछड़े हैं, इतने मूर्ख किस्म के हैं, इतना कूड़ा उत्पादन कर रहे हैं कि आपके लिए यह यकीन करना नामुमकिन होगा कि उनकी फिल्मों का अस्तित्व भी मेरी फिल्मों के साथ है. मेरी परिस्थितियां ऐसी हैं कि मुझे अपनी कहानियों को हमेशा साधारण बनाये रखना होता है. हां, मैं यह जरूर कर सकता हूं कि मैं अपनी फिल्मों को अर्थवान बनाऊं, उनमें मनोवैज्ञानिक घात-प्रतिघात पैदा करूं, उनमें नये शेड्स डालूं. और इस तरह से एक ‘पूर्ण’ का निर्माण करूं, जो कई लोगों को कई सारी चीजें संप्रेषित करेंगी.
कुछ आलोचकों को लगता है कि मैं गरीबी को रोमांटिसाइज करता हूं, या कि मेरी फिल्मों में गरीबी और वंचितता अपने क्रूरतम रूप में प्रकट नहीं होती. मेरा मानना है कि पाथेर पंचाली गरीबी के रूपांकन में काफी कठोर है. पात्रों का व्यवहार, जिस तरह से मां एक वृद्ध औरत के साथ व्यवहार करती है, वह  क्रूरतापूर्ण ही तो है. मुझे याद नहीं कि किसी ने एक परिवार में किसी वृद्ध के साथ इस तरह की क्रूरता दिखायी है.
मैंने किसी की भी तुलना में अपनी फिल्मों कहीं ज्यादा राजनीतिक टिप्पणी की है. मिडिल मैन में एक लंबा संवाद है, जिसमें एक कांग्रेसी आगे के लक्ष्यों के बारे में बात करता है. वह झूठ बोलता है. मूर्खतापूर्ण बातें करता है, लेकिन उसकी उपस्थिति महत्वपूर्ण है. किसी भी दूसरे निर्देशक की फिल्म में इस दृश्य को शामिल नहीं किया जाता. लेकिन यह जरूर है कि फिल्म निर्देशकों के ऊपर कई तरह के प्रतिबंध होते हैं. उसे मालूम होता है कि कुछ चित्रण और डायलॉग कभी  भी सेंसर बोर्ड से पास नहीं होंगे. फिल्म निर्देशकों की भूमिका उदासीन द्रष्टा की नहीं है. आप हीरक राजार देशे देखिए. उसमें एक दृश्य है, जिसमें सारे गरीब लोगों को बाहर हांक दिया गया है. यहां इमरजेंसी के दौरान जो दिल्ली और दूसरे शहरों में हुआ उसका सीधा असर देखा जा सकता है. जब आप ऐसी फैंटेसी फिल्में बना रहे हों, तो आप अपनी बात सामने रख सकते हैं, लेकिन जब आप समकालीन चरित्रों के साथ खेल रहे होते हैं, तब आप एक सीमा तक ही अपनी बात रख सकते हैं.

(1982 में प्रकाशित सिनेएस्ट साक्षात्कार श्रृंखला का संपादित अंश)


अडूर गोपालकृष्ण


जब मैं अपनी फिल्मों पर काम कर रहा होता हूं, तो मैं अपने आप से यह नहीं कहता कि देखो ये तुम्हारे दर्शक हैं, और तुम्हारी फिल्म को इनके लिए प्रासंगिक होना चाहिए. नहीं, अगर मुद्दे महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं, अगर विचार वैध और तार्किक हैं, तो फिल्में खुद-ब-खुद प्रासंगिक हो जायेंगी. एक फिल्म ‘एक समय में’ बनायी जाती है, लेकिन यह ‘एक समय के लिए’ ही नहीं बनायी जाती. मेरा मानना है कि एक अच्छी फिल्म अपने बनानेवाले की उम्र से कहीं ज्यादा जियेगी. मेरा विश्वास है कि कला या साहित्य के अच्छे शाहकार की ही तरह एक अच्छी फिल्म का असर कई पीढ़ियों पर पड़ता है. हालांकि इसका असर महसूस हो, और यह क्रियाओं को जन्म दे, इसमें कहीं ज्यादा वक्त लग सकता है. वैसे भी मैं हर दिन-ब-दिन की सामान्य समस्याओं पर सिनेमा नहीं बनाता. मेरे पास इन फिल्मों में समय खपाने करने की ऊर्जा नहीं है. मैं व्यापक मुद््दों पर ध्यान केंद्रित करने को तरजीह देता हूं. फिल्म बनाने को लेकर मेरा साफ मानना है कि इसे विचारों को प्रभावित करना चाहिए. किसी मुद्दे पर जागरूकता पैदा करना चाहिए. शुरुआत यहीं से होती है. इस तरह की फिल्मों को आपको परेशान करना चाहिए. इसे आपको खुद से और समाज से सवाल पूछने के लिए प्रेरित करना चाहिए. इस तरह सवाल पूछना ही बदलाव की ओर पहला छोटा सा कदम है.
               जहां तक व्यावसायिक सिनेमा का प्रश्न है, यह आज एक जुआ बन गया है, न कि रचनाशीलता की एक प्रक्रिया. आज निर्माता-निर्देशकों को लगता है कि जो भव्य है, वह अच्छा है. स्टार कास्ट बड़ा होना चाहिए. बजट बड़ा होना चाहिए. लेकिन आखिरी सत्य यह है कि आप जो पैसा खर्च करते हैं, या कितना भव्य रचते हैं, वह महत्वपूर्ण नहीं है. दर्शक की असल चिंता यह है कि सिनेमा कितना अच्छा है.

(3 मई, 2006 को रेडिफ डॉट कॉम पर प्रकाशित साक्षात्कार का संपादित अंश)

4 comments:

  1. शानदार छांटा और निर्वाह भी किया. शुक्रिया.

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  2. शुक्रिया Digamber Ashu जी...

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  3. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज ३० मई, २०१३, बृहस्पतिवार के ब्लॉग बुलेटिन - जीवन के कुछ सत्य अनुभव पर लिंक किया है | बहुत बहुत बधाई |

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  4. वाह ,बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
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