17 May 2013

साहित्य का युवा नजरिया- 2

हालांकि साहित्य को पीढ़ियों में बांटना महज एक सुविधाजनक विभाजन ही माना जा सकता है, फिर भी हमने साहित्य के युवा मन की पड.ताल करने के लिए, उसमें बसनेवाली साहित्य और समाज की तसवीर को समझने के लिए मौजूदा दौर के कुछ महत्वपूर्ण रचनाकारों का चयन किया और उनसे चंद सवाल पूछे. यहां पीढ़ियों का वर्गीकरण कठोर नहीं है और कम से कम दो पीढ़ियों  तथा अलग-अलग क्षेत्रों की आवाजों को शामिल किया गया है. रचनाकारों का चयन भी किसी भी तरह प्राप्रतिनिधिक नहीं है. इस परिचर्चा में जैसी उम्मीद थी, विचारों के अलग-अलग क्षितिज हमारे सामने उभर कर आये, जो साहित्य के विविधतापूर्ण लोकतंत्र में झांकने का मौका देते हैं.

पांच लेखक : मनीषा कुलश्रेष्ठ, अनुज लुगुन, पंकज मित्र, पंकज सुबीर और उमाशंकर चौधरी 

पांच सवाल
1. मैं क्यों लिखता हूं ? 2. आपकी नजर में साहित्य की जिंदगी में क्या भूमिका है ? 3. किन पुराने लेखकों को आज के समय के करीब पाते हैं ? 4. क्या कालजयी होने की इच्छा आपको भी छू गयी है ? 5. आज के दौर के किस युवा लेखक की रचनाएं आपको प्रभावित करती हैं और क्यों ?




2.  अनुज लुगुन   

आदिवासियों के अस्मिता संघर्ष को कविता में आवाज देने वाले युवा कवि. कविता लेखन जारी. भारतभूषण पुरस्कार देकर प्रतिभा को सम्मानित किया गया है. 




इसलिए लिखता हूं कि हमारे अपने जीवन, दर्शन, मूल्य,आदर्श, इतिहास ,उसके पात्र और प्रतीक चिह्न्, जो कि मृत नहीं हैं, लेकिन जिन्हें मृत घोषित कर दिया गया, उन्हें जीवित कर न केवल उनसे संवाद कर सकूं, बल्कि वे भी हमारे समय से संवाद कर सकें और यह लड.ाई है. 

कई बार साहित्य की जिंदगी में अहमियत को भौतिक वस्तुओं की तरह खोजा जाता है. लेकिन इसकी अहमियत किसी वस्तु की तरह मूर्त रूप में दिखायी नहीं देती है. यह न केवल हमारी संवेदना को जीवित रखता है, बल्कि हमें जीवन के प्रति नया नजरिया भी देता है. यह हमारी सोच को परिष्कृत करता है. यह हमें बताता है कि चेहरे पर धूल की काई जमी हो, तो चेहरा ही साफ किया जाये न कि आईना. दूसरे, यह हम जैसे शोषित, वंचित, दलित तबकों के लिए सांस्कृतिक संघर्ष का औजार भी है.

कबीर ,नागार्जुन ,मुक्तिबोध,पाश और गोरख पाण्डेय आज के समय के करीब लगते हैं

कालजयी होने की इच्छा, ओह! यह तो बहुत ही डरावना सवाल है. मैं एक बात बताना चाहता हूं कि हमारे मुंडा आदिवासी समाज में स्वर्ग-नरक जैसी कोई अवधारणा नहीं है और न ही हम भवसागर पार करते हैं. मुझे भी लेखन की दुनिया में न तो भवसागर पार करना है और न ही साहित्यिक स्वर्ग की प्राप्ति करनी है. जैसे आदिवासी समाज अतिरिक्त महत्वकांक्षाओं से रहित है, वैसे ही मैं भी हूं.

जहां तक मेरी साहित्यिक समझ है, मुझे लगता है आज जितने भी युवा लेखन कर रहे हैं विभित्र क्षेत्रों में अच्छा लिख रहे हैं. किसी को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है. साहित्य में किसी एक की रचना से पूर्णता नहीं आती है. वैसे निर्मला पुतुल और कैलाश वनवासी की रचनाओं का यथार्थ ज्यादा प्रभावित करता है. निर्मला जी जब ‘चुड.का सोरेन’ को संबोधित कर लिखती हैं, तो मुझे लगता वह मुझे ही संबोधित कर रही हैं.

यहां एक बात मैं यह जोड.ना चाहूंगा कि आज जितने बडे. पैमाने पर जन आंदोलन हो रहे हैं, उसकी वैसी अभिव्यक्ति आज के युवाओं के यहां मुझे दिखायी नहीं दे रही है. ऐसा नहीं है कि बिल्कुल नहीं लिखा जा रहा है, लेकिन ‘कुछ’ के लिखने भर से समय की विस्तृत परिधि को नहीं पकड.ा जा सकता है, कबीर, नागार्जुन,गोरख पाण्डेय या पाश जैसे लिखनेवाले नहीं हैं.


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