21 December 2010

उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार के मायने

उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार के  मायने






एक अंतहीन सूची है..शब्दों की. शब्दों से आकार लेती कहानियों की. हर बार नयी कहानी. हर पाठ में कहानी नया अर्थ ले ले. कभी वह मेरे गाँव के मेरे परिचित के शक्ल में मेरे सामने हाजिर हो जाये..कभी मेरा चेहरा ही उस चेहरे में मिल जाए.  कभी कोने पर सब्जी बेचने वाले कि शक्ल की रेखाएं उसके चेहरे के भाव को प्रकट करने लगे तो कभी इतिहास का कोई टुकडा कहानी के टुकड़े में विन्यस्त हो जाए..कल्पना की उड़ान या अपने समय की पहचान ..कुछ भी कहें..लेकिन जो बार बार आपको अपने पास बुलाये...वो आपको ऊंचे आकाश पर भी ले जाए और अपने भीतर झाँकने की निर्मम चुनौती भी छोड़ जाए. 
उसकी कहानिया समय की हर नामालूम सी लकीर पर भटकती हुई कहानी है..उस लकीर को मिटने से बचाने की विकलता से उपजी कहानी  है.  अंतिम आदमी की कहानी. हाशिये को क्रेंद्र में लाने की बेचैनी से भरी कहानी. हर शब्द के अनेक रूप बनाये हैं हमने....समय के बीहड़ में रौशनी सी उसकी कहानी मुझे गुडगाँव  और मुंबई के चमकते माल में अँधेरे की ओर देख सकने लायक मानवीय बनाती हैं...
उदय जी को मैं सर्वश्रेष्ट कहानीकार नहीं कहता. प्रिय रचनाकार जरूर कहता हूँ. जिसकी कहानिया विशिष्ट हैं. मेरे अन्दर चेतना की कुछ रेखाएं खीचने में जिसने भूमिका निभायी है. जिसने मुझे थोडा बदला है...मेटामोर्फोसिस की प्रक्रिया के लिए जरूरी कुछ आंच थोडा दबाव उनकी  कहानियों से भी मिला  है. 


उदय  जी  को पुरस्कार उनके लेखन को देर आये दुरुस्त आये कि तर्ज पर दिया गया है..जहाँ अकादमी ने खुद को दुरुस्त किया है...पिछले कुछ वर्षों में अकादमी यही कर रही है...मनोहर श्याम जोशी और कमलेश्वर  के  बाद  उदय प्रकाश को पुरस्कार दिया जाना इसी अकादमी वाली परंपरा का हिस्सा है. वैसे यह सब लिखते हुए मैं गहरे आशंका से घिर गया हूँ...वह आशंका जिसका जिक्र उदय प्रकाश बार बार करते हैं...साहित्यिक गठजोड़-गिरोहबंदी पर यू तो उदय जी ने बहुत कुछ बहुत बार लिखा है...और फिलहाल ट्रेन में होने के कारण मैं उनके लिखे को प्रमाणिक रूप से उधृत नहीं कर सकता इसलिए कुछ दिन पहले उनके ब्लॉग पर पढ़े ये शब्द यहाँ दर्ज कर रहा हूँ- रामविलास शर्मा को याद करते हुए उन्होंने लिखा था..
 'पिछले कुछ अरसे से, जब से पुरस्कारों की लूट-खसोट और उन पर अखबारबाजी साहित्य के हलके से आने वाली अकेली सूचनाएं बन चुकी हैं, ऐसे में रामबिलास जी फिर से याद आते हैं। सैमसुंग टैगोर, साहित्य अकादेमी या हिंदी अकादेमी पुरस्कार को लेने वाले और न लेने वाले ‘नायक-नायिकाओं’ की परस्पर बयानबाजियों से भरी इन तारीखों में वह लगातार चुप रहने वाला धीरोदात्त, स्थावर लेखक बार-बार याद आता है, '
मैं उदय जी को पुरस्कार दिए जाने पर कतई खुश नहीं होना चाहता हूँ.  क्यूकि उदय जी ने पुरस्कारों पर ऐसा कई बार खुद कहा है...ऐसा नहीं है कि कमलेश्वर  म, नोहर श्याम जोशी, या अलका सरावगी को या श्रीलालशुक्ल ( इस  सूची में  और  भी  कई नाम  शामिल  हैं  )को मिले पुरस्कार को मैं गिरोहबंदी का परिणाम मानता  हूँ..लेकिन पुरस्कारों को लेकर उदय जी  कि स्थिति थोड़ी विशिष्ट है.  वो कल तक पुरस्कारों को गिरोहबाजों का खेल मानते थे.. 
क्या? क्या ?
क्या मैं उदय जी को बधाई दूं? क्या  उदय  प्रकाश  ने  पुरस्कार  देने  वालों  को  क्लीन  चिट  दे  दी  है ?  उदय जी  से यह सवाल बहुत लोग पूछेंगे . कही न कही वह इस सवाल का जवाब भी  देंगे ..आखिर  राडियागेट  के इस ज़माने में अविश्वास करना ही निरीह  जनता के पास एकमात्र अस्त्र है..और ये अस्त्र उदय प्रकाश ने ही कई पाठकों को दिया है...


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3 comments:

  1. udaya prakash ko yah purasmkar mila, mujhe behad khushi huyee, kdyonk vah aaj ke daur ke mere pasndeeda kahaneekaro aur rachnakaron men ek hai. peele chhtari wali ladaki ko mai kabhi bhi nahin bhool sakta...

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  2. आप अपने तरीके से शक कर सकते हैं लेकिन मुझे खुशी इस बात को लेकर हो रही है कि उदय प्रकाश के भीतर सिस्टम को लेकर जो टूटा है,वो शायद रिपेयर हो जाए। सब कुछ टूटकर बिखर जाने की स्थिति में कुछ का अटककर रह जाना बेहतर होता है। ये पुरस्कार उदय प्रकाश को इसी तरह अटकने के लिए जरुरी है। मैं व्यक्तिगत तौर पर उनके लिए ऐसा होना अनिवार्य मानता हूं। क्यों मानता हूं,इसकी ठोस वजह सिर्फ इतनी है कि वो पुरस्कार लेकर भी वही बने रहेंगे बल्कि उनके बने रहने में एक दम तोड़ती हुई उम्मीद साथ रहेगी।.उनके खुश होने पर ही मैं खुश हूं, नहीं तो किसी को भी मिल जाए, अपने को क्या करना है?

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  3. विनीत मुझे एक साथ भोलेपन और बुद्धिमान वाली मुद्रा सही नहीं लगती
    या तो आप भोले हो सकते हैं या बुद्धिमान
    कोई प्रिय है तो उसको लेकर भोलापन दिखाना मेरे हिसाब से सही दर्शन नहीं है...
    उदय जी का मैं जबरदस्त प्रशंसक हूँ. उनकी एक एक बची कहानी पढने के लिए मैंने किताब खरीदी है (मैन्गोसिल ऐसी ही किताब थी.) खैर मुझे कोई खुशी नहीं ऐसा नहीं कहूँगा. खुश हूँ बस सवालों से घिरा हूँ. मेरा सवाल यही है कि क्या सिस्टम बदला है या उदय प्रकाश?

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