28 October 2013

कविता लिखना, भाषा सीखना है : असद जैदी

 वरिष्ठ कवि असद जैदी को पढ.ना अपने समय, समाज और राजनीति को पहले से बेहतर तरीके से देखना और समझना है. अपनी कविताओं से समय के साथ संवाद करनेवाले असद जैदी से प्रीति सिंह परिहार की बातचीत के मुख्य अंश...अखरावट



‘कविता’ आपके लिए क्या है ?

कविता समाज में एक आदमी के बात करने का तरीका है. पहले अपने आप से, फिर दोस्तों से, तब उनसे जिनके चेहरे आप नहीं जानते, जो अब या कुछ बरस बाद हो सकता है आपकी रचना पढ.ते हों. कविता समाज को मुखातिब बाहरी आवाज नहीं, समाज ही में पैदा होनेवाली एक आवाज है, चाहे वह अंतरंग बातचीत हो, उत्सव का शोर हो या प्रतिरोध की चीख. यह एक गंभीर नागरिक कर्म भी है. कविता आदमी पर अपनी छाप छोड.ती है. जैसी कविता कोई लिखता है वैसा ही कवि वह बनता जाता है और किसी हद तक वैसा ही इंसान.

लेखन की शुरुआत कैसे हुई? क्या इसके पीछे कोई प्रेरणा थी?

खुद अपने जीवन को उलट-पुलट कर देखते, जो पढ.ने, सुनने और देखने को मिला है उसे संभालने से ही मेरा लिखने की तरफ झुकाव हुआ. घर में तालीम की कद्र तो थी पर नाविल पढ.ने, सिनेमा देखने, बीड.ी-सिगरेट पीने, शेरो-शायरी करने, गाना गाने या सुनने को बुरा समझा जाता था. यह लड.के के बिगड.ने या बुरी संगत में पड.ने की अलामतें थीं. लिहाजा अपना लिखा अपने तक ही रहने देता था. मगर मिजाज में बगावत है, यह सब पर जाहिर था.

कविता विधा ही क्यों?

शायद सुस्ती और कम लागत की वजह से. मुझे लगता रहता था असल लिखना तो कविता लिखना ही है. यह इस मानी में कि कविता लिखना भाषा सीखना है. कविता भाषा की क्षमता से रू-ब-रू कराती है और उसे किफायत से बरतना भी सिखाती है. कविता एक तरह का ज्ञान देती है, जो कथा-साहित्य या ललित गद्य से बाहर की चीज है. वह सहज ही दूसरी कलाओं को समझना और उनसे मिलना सिखा देती है. हर कवि के अंदर कई तरह के लोग- संगीतकार, गणितज्ञ, चित्रकार,फिल्मकार, कथाकार,मिनिएचरिस्ट,अभिलेखक, दार्शनिक, नुक्ताचीन र्शोता और एक खामोश आदमी- हरदम मौजूद होते हैं.

अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताएं.

मैं अकसर एक मामूली से सवाल का जवाब देना चाहता हूं. जैसे : कहो क्या हाल है? या, देखते हो? या, उधर की क्या खबर है? या, तुमने सुना वो क्या कहते हैं? या, तुम्हें फलां बात याद है? या, यह कैसा शोर है? जहां तक मैं समझ पाया हूं, मेरे प्रस्थान बिंदु ऐसे ही होते हैं. कई दफे अवचेतन में बनती कोई तसवीर या दृश्यावली अचानक दिखने लगती है, जैसे कोई फिल्म निगेटिव अचानक धुल कर छापे जाना मांगता हो. मिर्जा ने बड.ी अच्छी बात कही है- ‘हैं .ख्वाब में हनोज जो जागे हैं .ख्वाब में.’ दरअसल, रचना प्रक्रिया पर ज्यादा ध्यान देने से वह रचना प्रक्रिया नहीं रह जाती, कोई और चीज हो जाती है. यह तो बाद में जानने या फिक्र में लाने की चीज है. यह काम भी रचनाकार नहीं, कोई दूसरा आदमी करता है- चाहे वह उसी के भीतर ही बैठा हो- जो रचना में कोई मदद नहीं करता.

अपनी रचनाशीलता का अपने परिवेश, समाज, परिवार से किस तरह का संबंध पाते हैं?

संबंध इस तरह का है कि ‘दस्ते तहे संग आमद: पैमाने वफा है’ (गालिब). मैं इन्ही चीजों के नीचे दबा हुआ हूं, इनसे स्वतंत्र नहीं हूं. लेकिन मेरे लेखन से ये स्वतंत्र हैं, यह बड.ी राहत की बात है.

क्या साहित्य लेखन के लिए किसी विचारधारा का होना जरूरी है?

पानी में गीलापन होना उचित माना जाये या नहीं, वह उसमें होता है. समाज-रचना में कला वैचारिक उपकरण ही है- आदिम गुफाचित्रों के समय से ही. विचारधारा ही जबान और बयान को तय करती है, चाहे आप इसको लेकर जागरूक हों या नहीं. बाजार से लाकर रचना पर कोई चीज थोपना तो ठीक नहीं है, पर नैसर्गिक या रचनात्मक आत्मसंघर्ष से अर्जित वैचारिक मूल्यों को छिपाना या तथाकथित कलावादियों की तरह उलीच कर या बीन कर निकालना बुरी बात है. यह उसकी मनुष्यता का हरण है. और एक झूठी गवाही देने की तरह है.

क्या आपको लगता है कि मौजूदा समय-समाज में कवि की आवाज सुनी जा रही है?

मौजूदा व.क्त खराब है, और शायद इससे भी खराब व.क्त आने वाला है. यह कविता के लिए अच्छी बात है. कविकर्म की चुनौती और जिम्मेदारी, और कविता का अंत:करण इसी से बनता है. अच्छे वक्तों में अच्छी कविता शायद ही लिखी गयी हो. जो लिखी भी गयी है वह बुरे व.क्त की स्मृति या आशंका से कभी दूर न रही. जहां तक कवि की आवाज के सुने जाने या प्रभावी होने की बात है, मुझे पहली चिंता यह लगी रहती है कि दुनिया के हंगामे और कारोबार के बीच क्या हमारा कवि खुद अपनी आवाज सुन पा रहा है? या उसी में एब्जॉर्ब हो गया है, सोख लिया गया है? अगर वह अपने स्वर, अपनी सच्ची अस्मिता, अपनी नागरिक जागरूकता को बचाए रख सके, तो बाकी लोगों के लिए भी प्रासंगिक होगा.

आपके एक समकालीन कवि ने लिखा है (अपनी उनकी बात: उदय प्रकाश) ‘आपके साथ हिंदी की आलोचना ने न्याय नहीं किया.’ क्या आपको भी ऐसा लगता है?

मैं अपना ही आकलन कैसे करूं! या क्या कहूं? ऐसी कोई खास उपेक्षा भी मुझे महसूस नहीं हुई. मेरी पिछली किताब मेरे खयाल में गौर से पढ.ी गयी और चर्चा में भी रही. कुछ इधर का लेखन भी. इस बहाने कुछ अपना और कुछ जगत का हाल भी पता चला.

इन दिनों क्या नया लिख रहे हैं और लेखन से इतर क्या, क्या करना पसंद है?

कुछ खास नहीं. वही जो हमेशा से करता रहा हूं. मेरी ज्यादातर प्रेरणाएं और मशगले साहित्यिक जीवन से बाहर के हैं, लेकिन मेरा दिल साहित्य में भी लगा रहता है. समाज-विज्ञानों से सम्बद्ध विषयों पर ‘थ्री एसेज’ प्रकाशनगृह से किताबें छापने का काम करता हूं. और अपना लिखना पढ.ना भी करता ही रहता हूं. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, खास कर खयाल गायकी, सुनते हुए और विश्‍व सिनेमा देखते हुए एक उम्र गुजार दी है.

ऐसी साहित्यिक कृतियां जो पढ.ने के बाद जेहन में दर्ज हो गयी हों? क्या खास था उनमें?

चलते-चलते ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते. मैं पुराना पाठक हूं. जवाब देने बैठूं, तो बकौल शाइर,‘वो बदखू और मेरी दास्ताने-इश्क तूलानी/ इबारत मु.ख्तसर, कासिद भी घबरा जाये है मुझसे.’ कुछ आयतें जो बचपन में रटी थीं और अंतोन चेखव की कहानी ‘वान्का’ जो किशोर उम्र में ही पढ. ली थीं जेहन में न.क्श हो गयी हैं. इसके बाद की फेहरिस्त बहुत लंबी है.

26 October 2013

संयुक्त राष्ट्र में दिया गया मलाला यूसुफजई का भाषण

संयुक्त राष्ट्र  में दिया गया मलाला यूसुफजई का भाषण किसने लिखा, यह शोध का विषय होना चाहिए.   वैसे , जिसने भी यह भाषण लिखा है उसने  कई मकसदों को इसमें एकसाथ मिलाया है. कोई चाहे तो इसे ग्लोबल प्रोपगेंडा भी  कह सकता है. फिलहाल अगर आपकी इच्छा है, रूचि है, तो "मलाला दिवस" के मौके पर  दिए गए मलाला यूसुफ़जई के इस भाषण को पढ़ सकते हैं.



आदरणीय बान की मून, महासचिव संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष वुक जेरेमिक, वैश्विक शिक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र के राजदूत श्री गाॅर्डन ब्राउन, मुझसे बड़े आदरणीय जन, मेरे प्यारे भाइयों और बहनों.

अस्सलाम अलैकुम...

एक लंबे वक्फे के बाद फिर से बोलना, मेरे लिए एक फख्र की बात है. यहां इतने सम्मानीय लोगों के बीच होना मेरे जीवन की एक महान घड़ी है. मेरे लिए यह बेहद गौरव की बात है कि मैंने महरूम बेनजीर भुट्टो का शॉल ओढ़ रखा है. मुझे यह नहीं पता कि मैं कहां से अपनी बात शुरू करूं. मुझे यह नहीं मालूम कि लोग मुझसे क्या बोलने की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन सबसे पहले उस खुदा का शुक्रिया जिनकी निगाह में हम सब बराबर हैं. आप सभी लोगों का शुक्रिया जिन्होंने मेरी सलामती और नयी जिंदगी के लिए दुआ मांगी. लोगों ने मुझे जितना प्यार दिया है, उस पर यकीन करना मुश्किल है. मुझे दुनिया के कोने-कोने से मेरी खुशामती की दुआओं से भरे हजारों कार्ड और तोहफे मिले हैं. आप सभी को इनके लिए शुक्रिया. उन बच्चों का शुक्रिया जिनके मासूम अल्फाज मेरी हौसला अफजाई करते हैं. अपने से बड़ों का शुक्रिया, जिनकी दुआओं ने मुझे मजबूती दी है. मैं पाकिस्तान और ब्रिटेन हाॅस्पीटल के अपने डाॅक्टरों, नर्सों व कर्मचारियों को, साथ ही यूनाइटेड अरब अमीरात सरकार को शुक्रिया कहना चाहती हूं, जिन्होंने स्वस्थ होने में मेरी मदद की.

मैं संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मूल को उनके ग्लोबल एजुकेशन फर्स्ट  (सबसे पहले शिक्षा की वैश्विक  मुहिम) की पहल का,  साथ ही वैश्विक शिक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र के राजदूत  गाॅर्डन ब्राउन का और संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष वुक जेरेमिक का पुरी तरह समर्थन करती हूं. वे दुनिया को लगातार जो लीडरशिप दे रहे हैं, उसके लिए मैं उनकी शुक्रगुजार हूं. आप,  हम सभी को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं.

मेरे प्यारे भाइयों ओर बहनों, एक बात को हमेशा गांठ बांध कर याद रखिए, मलाला दिवस, मेरा दिवस नहीं है. यह वैसी हर महिला, हर बच्चे और हर लड़की का दिन है, जिसने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठायी है.

सैकड़ों मानवाधिकार कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता न सिर्फ अपने अधिकारो के लिए आवाज उठा रहे हैं, बल्कि वे शान्ति, शिक्षा और समानता के अपने लक्ष्यों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. आतंकवादियों के हाथों हजारों लोग मारे गये हैं, लाखों लोग घायल हुए हैं. मैं उनमें से ही एक हूं. इसलिए मैं यहां खड़ी हूं, क्योंकि मैं कई लड़कियों में से एक हूं. मैं सिर्फ अपनी तरफ से नहीं बोल रही हूं, बल्कि उन सभी की तरफ से बोल रही हूं, जिनकी आवाज नहीं सुनी जाती. उनकी तरफ से जिन्होंने अपने अधिकारों की खातिर लड़ाई लड़ी है. शान्ति के साथ रहना उनका हक है. गरिमा और सम्मान के साथ रहना उनका हक है. समानता और अवसर की मौजूदगी उनका हक है. शिक्षित होना उनका हक है.

मेरे प्यारे साथियों, नौ अक्तूबर, 2012 को तालिबान ने मेरे माथे के बायें हिस्से में गोली मारी थी. उन्होंने मेरी साथियों पर भी गोलियां बरसायीं. उन्होंने सोचा कि गोलियां हमें खामोश कर देंगी. लेकिन वे हार गये. और उस खामोशी से हजारों आवाजें बाहर निकल पड़ीं. आतंकवादियों ने सोचा कि वे मेरे मकसद को बदल देंगे और मेरी महत्वाकांक्षाओं के पर कतर देंगे. लेकिन इसने मेरे जीवन में कुछ भी नहीं बदला, सिवाय इस बात के कि मेरी कमजोरियां, डर और निराशा खत्म हो गयी. मेरे अंदर,एक शक्ति,  क्षमता और साहस का जन्म हुआ. मैं आज भी वही मलाला हूं, मेरी आशाएं वैसी ही हैं. मेरे सपने भी पहले की ही तरह जिंदा हैं. प्यारे भाइयों और बहनों मैं किसी के खिलाफ नहीं हूं. मैं यहां इसलिए नही खड़ी हूं ताकि तालिबान या किसी दूसरे आतंकी संगठन से बदला लेने की भाषा मे बात करूं. मैं यहां खड़ी हूं ताकि हर बच्चे के लिए शिक्षा का आधिकार की मांग उठा सकूं. मैं तालिबान और दूसरे कट्टरपंथी आतंकवादियों के बच्चे-बच्चियों के लिए शिक्षा की वकालत करती हूं. मेरे मन में उस तालिब के लिए भी नफरत नहीं, जिसने मुझे गोली मारी. अगर मेरे हाथों में बंदूक होती और वह मेरे सामने खड़ा होता, तो भी मैं उस पर गोली नहीं चलाती. यह वह करुणा है, जो मैंने दया के पैगंबर मोहम्मद, ईसा मसीह और भगवान बुद्ध से सीखी है. यह परिवर्तन की वह परंपरा है, जो मुझे मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला और मोहम्मद अली जिन्ना से विरासत में मिली है.

यह अहिंसा का वह फलसफा है जिसका पाठ मैंने मैंने गांधी, बाचा खान और मदर टेरेसा से सीखा है. लोगों को को माफ करने की यह क्षमता मैंने अपने माता-पिता से सीखी है. मेरी आत्मा मुझसे यही कह रही है कि अमन के साथ रहो और हर किसी से प्यार करो.

मेरे प्यारे भाइयों और बहनों हम अंधेरे का महत्व तब समझते हैं, जब हमारा सामना अंधेरे से होता है. हमें अपनी आवाज का महत्व तब पता चलता है, जब हमें खामोश कराया जाता है. इसी तरह उत्तरी पाकिस्तान के स्वात में जब हमने बंदूकें देखीं, तब हमें किताब और कलम का महत्व पता चला. पुरानी कहावत कि कलम तलवार से ज्यादा ताकतवर होती है, सही है. कट्टरवादियों को किताबों और कलमों से डर लगता है. शिक्षा की शक्ति उनमें खौफ पैदा करती है. महिलाएं उन्हें भयभीत करती हैं. महिलाओं की आवाज की ताकत उन्हें डराती है.  यही वजह है कि उन्होंने हाल ही में क्वेटा में किये गये हमले में 14 मासूम बच्चों की जान ले ली. यही कारण है कि वे महिला शिक्षिकाओं की हत्या करते हैं. यही कारण है किवे रोज स्कूलों को बम से उड़ा रहे हैं, क्योंिक वे पहले भी और आज भी उस बदलाव और समानता से डरे हुए हैं जो हम समाज में ला सकते हैं.  मुझे याद है कि हमारे स्कूल के एक लड़के से एक पत्रकार ने सवाल किया था, ‘तालिबान शिक्षा के खिलाफ क्यों हैं?’ उसने बेहत सहजता से इसका जवाब दिया था, ‘ क्योंकि एक तालिब को नहीं मालूम कि उस किताब के भीतर क्या लिखा है. ’ उनको लगता है कि भगवान एक पिलपिला, रूढ़ीवादी जीव है, जो लोगों के सिर पर सिर्फ इसलिए बंदूक तान देगा, क्योंकि वे स्कूल जा रहे हैं.

आतंकवादी अपने निजी फायदों के लिए इसलाम के नाम का दुरुपयोग कर रहे हैं. पाकिस्तान एक शान्तिप्रेमी लोकतांत्रिक देश है. पख्तून अपने बच्चों और बच्चियों के लिए शिक्षा चाहते हैं. इसलाम शान्ति, मानवता और भाइचारे का मजहब है. इसके अनुसार हर किसी का कर्तव्य है कि हर बच्चा-बच्ची शिक्षा हासिल करे. शिक्षा के लिए शांति जरूरी है. दुनिया के कई हिस्सों में खासकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवाद, युद्ध और संघर्ष बच्चों को स्कूल जाने से रोक रहे हैं. हम लोग सचमुच में इन युद्धों से थक गये हैं. दुनिया के कई हिस्सों में इसकी वजह से बच्चों और महिलाओं को कई तरह के कष्टों का सामना करना पड़ रहा है.

भारत में मासूम गरीब बच्चे बाल श्रम के शिकार हैं. नाईजीरिया में कई स्कूल तबाह कर दिये गये हैं. अफगानिस्तान में चरमपंथ ने लोगों के जीवन को प्रभावित किया है. कम उम्र की लड़कियों को घरेलू बाल मजदूर के तौर पर काम करना पड़ता है. उन्हें कम उम्र में शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है.गरीबी, उपेक्षा, नस्लवाद और मौलिक अधिकारों से महरूम किया जाना; ये वे समस्याएं हैं, जिनका सामना आज स्त्री और पुरुष दोनों को करना पड़ रहा है.

आज मैं महिलाओं के अधिकारों और लड़कियों की शिक्षा पर सबसे ज्यादा बात इसलिए कर रही हूं क्योंकि सबसे ज्यादा कष्ट वे ही उठा रही हैं. एक समय था जब महिला कार्यकर्ता  अपने अधिकारों के लिए पुरुषों से आगे आने की अपील करती थीं, लेकिन अब हम यह काम खुद करेंगे. मैं पुरुषों से यह नहीं कह रही कि वे स्त्रियों के अधिकारों के लिए बोलना छोड़ दें, लेकिन मैं मानती हूं कि माहिलाओं को खुद आजाद होना होगा और अपने अधिकारों के लिए खुद आवाज उठानी होगी. इसलिए मेरे प्यारे भाइयों और बहनों यह आवाज उठाने का वक्त है.इसलिए आज हम विष्व के नेताओं से यह अपील करते हैं कि वे अपनी नीतियों को षांति और समृद्धि के पक्ष में बदलें. मैं उनसे अपनी करती हूं कि उनकी नीतियां बच्चों और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए होनी चाहिए. केई ऐसा समझौता जो महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ जाता है, हमें मंजूर नहीं है.

हम दुनिया की सभी सरकारों से हर बच्चे के लिए मुफ्त और अनिवार्य षिक्षा की व्यवस्था करने की अपील करते है. हम उनसे आतंकवाद और खून-खराबे के खिलाफ संघर्ष करने की, बच्चों को अत्याचारों से बचाने की दरख्वास्त करते हैं. हम विकसित देशों से अपील करते हैं कि वे विकासशील देशों में लड़कियों के लिए शिक्षा के अवसरों में वृद्धि लाने में मदद करें.  हम दुनिया के सभी समुदायों से अपील करते हैं कि वे सहिष्णु बनें और जाति, नस्ल, धर्म, पंथ या एजेंडे पर आधारित पूर्वाग्रहों से मुक्त  हो कर स्त्रियों की आजादी और समानता को सुनिष्चित करने की दिशा में कदम बढ़ाएं, जिससे वे अपना विकास कर पायें.हम सभी तब तक सफल नहीं हो सकते, जब कि आधी आबादी को पिछड़ेपन में जीने के लिए मजबूर किया जायेगा. हम दुनिया भर की अपनी बहनों से अपील करना चाहते हैं कि वे साहसी बनें, अपने भीतर ताकत पैदा करें और अपने भीतर दबी संभावनाओं को हासिल करें.

मेरे प्यारे भाइयों और बहनों हम हर बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए स्कूल और शिक्षा चाहते हैं. हम शान्ति  और शिक्षा की मंजिल तक अपनी यात्रा को ले जाने के लिए कृत संकल्प हैं. हमें कोई नहीं रोक सकता. हम अपने अधिकारों के लिए आवाज उठायेंगे और बदलाव लेकर आयेंगे. हम अपने शब्दों की ताकत को पहचानते हैं. हमारे शब्द पूरी दुनिया को बदल सकते हैं, क्योंकि हम सब साथ हैं, शिक्षा के उद्देश्य के लिए एकजुट हैं. और अगर हमें अपने लक्ष्यों को हासिल करना है, तो हमें अपने आप को शिक्षा के शस्त्र से ताकतवर बनाना होगा और खुद एकता और बहनापे के मजबूत कवच से अपनी रक्षा करनी होगी.

भाइयों और बहनों हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया की एक बड़ी आबादी गरीबी, अन्याय और उपेक्षा का दंश झेल रही है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि करोड़ों बच्चे स्कूल से बाहर हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे भाई-बहन एक चमकते शान्तिपूर्ण भविष्य का इंतजार कर रहे हैं.

इसलिए आएं, अशिक्षा, गरीबी और आतंकवाद के खिलाफ एक महान संघर्ष की शुरुआत करें. आएं हम सब अपनी कलम और किताबों को हाथों में थाम लें. उनसे ज्यादा ताकतवर अस्त्र और कोई नहीं है. एक बच्चा, एक शिक्षक, एक किताब और एक कलम दुनिया को बदल सकते हैं. शिक्षा ही एकमात्र समाधान है. सबसे पहले शिक्षा. एजुकेशन फर्स्ट।

शुक्रिया.



23 October 2013

भुवनेश्वर की नजर में प्रेमचंद

इस महीने 8 तारीख (अक्तूबर) को प्रेमचंद की पुण्यतिथि थी. उस वक्त प्रेमचंद पर कुछ नया खोज रहा था, तब भुवनेश्वर की प्रेमचंद की मृत्यु  के बाद लिखी  इस ओबिचुरि से सामना हुआ. एक जीनियस पर दूसरे जीनियस की कलम से लिखा गया यह छोटा सा पीस आप भी पढ़ें। अखरावट


8 अक्तूबर ’36 को प्रेमचंद की मौत हो गयी. .

8 अक्तूबर ’36 को प्रेमचंद बहस-मुबाहसे, स्नेह और कटु आलोचना से परे हो गये. यह हिंदी के सबसे महान साहित्यिक का मामला है कि तुच्छ और खुदगर्ज मुबाहसे से परे होने के लिए 60 साल की उम्र में उसे मरना पड़ा, जिस उम्र में साहित्यिक कलमनवीसी से उपर उठता है, महात्मा और प्रेरक समझा जाता है और गोर्की के नाम पर शहर और वायुयान बनते हैं. प्रेमचंद को हिंदी का साधारण समादर भी नहीं मिल सका. वह अपनी प्रशंसक जनता के इतना निकट रहे कि उनका व्यक्तित्व सदैव नीरस बना रहा. पत्रिकाओं में कहानियां छपवाते, सिनेमा से धन पैदा करते, पुस्तकों की बिक्री के लिए साधारण प्रयत्न करते, 8 अक्तूबर, ’36 को प्रेमचंद की मौत हो गयी.

यदि प्रेमचंद का एक तुच्छ प्रशंसक आज यह लिखता है कि 8 अक्तूबर, ’36 को हिंदी-साहित्य की एक शताब्दी पर काल की मुहर लग गयी, तो वह एक ‘अति-प्रेमी’ के लांछन से कैसे बचेगा. प्रेमचंद हिंदी की एक शताब्दी थे. भविष्य का साहित्य इस युग से प्रेमचंद लेकर बाकी इत्मीनान से छोड़ देगा.
इसके अनेक कारण हैं.

यह नहीं कि उन्होंने 50 ऐसी कहानियां पैदा कीं, जो विश्व साहित्य में अपना स्थान बना सकती हैं
उन्होंने हिंदी साहित्य में एक नये जीवन का आह्वान किया. नहीं, उन्होंने साहित्य का असल रूप हिंदी को दिया, उन्होंने मौलिकता सृजित की, उन्होंने मौलिकता को एक द्रुत सजग वेश दिया, उन्होंने जैनेंद्र को पैदा किया.

प्रेमचंद की प्रतिभा और जीनियस खुद पैदा-करदां थी. वह शेली नहीं था. टैगोर नहीं था. शुरुआत में वह लिखने का शौ कीन था, बीच में वह एक कठिन संग्राम करता हुआ कलाकार और बाद में एक करेक्टर.
वह करेक्टर कैसा था?

ऐसा नहीं, जैसा गांधी या टॉलस्टॉय, जो संसार की सहस्र-फन विषमता को एक बिंदु पर आकर मिटा देता है, जो वस्तुतः कवि हो जाता है. उसका करेक्टर उनकी अनेकता थी.
ऐसी अनेकता, ऐसी वेराइटी की मिसाल विश्व साहित्य में भी नहीं मिलती. वह मोपांसा की मोर्बिडिटी से भी ऊंचा उठ गया.

उसके जीवन में एक स्वर सुनाई देता था कि वह समय के पीछे छूट गया, उसके साथी तो विक्टोरियन कलाकार थे और मरने के बाद वह विक्टोरियन हो ही गया. पर ऐसा विक्टोरियन, जो पूर्ण सहानुभूति में विश्वास रखता था, जो हनन करना भी जानता था, जो प्रकार और आकार में भेद कर सकता था, जो अपनी कला के लिए कच्चा माल लेने बार-बार सीधा, जीवन तक जाता था, जो समझता था, जो केवल विश्लेषक नहीं था.

हाँ,  वह फ्रायड के बाद का साहित्यिक था और सदा फ्रायद से दूर रहा. सेक्स एक बड़ी शक्ति है, पर साहित्य से उसका संबंध स्थापित करना कलाकार की इच्छा पर है. अगर उसने अपनी स्वतंत्रता से हम डीएच लारेंस और मोरिस डि कॉरन पढ़नेवालों को निराश किया तो वह कसूरवार नहीं है और न हम.

माधुरी, १९३६ में प्रकाशित

22 October 2013

उस देश का यारो क्या कहना !


मनोहर श्याम जोशी का व्यंग्य पढ़िए और देखिये कि हमारा क्षयग्रस्त कल कैसे हमारे आज में जीवित है, बल्कि वह अधिक जर्जर, अधिक रुग्न ही हुआ है.  भारत में चूंकि समय नहीं बदलता, इसलिए अपने समय पर सटीक टिप्पणी  कालजयी हो जाती है. यह कुछ ऐसी ही मनोहर कालजयी टिप्पणी है, एक खिलंदड़ेपन  का अंदाज लिए हुए.   अखरावट 

 

उस देश का यारो क्‍या कहना? और क्‍यों कहना? कहने से बात बेकार बढ़ती है। इसीलिए उस देश का बड़ा वजीर तो कुछ कहता ही नहीं था। कहना पड़ जाता था तो पिष्‍टोक्तियों में ही बोलता था। पिष्‍टोक्तियों से कोई नहीं पिटता। पिष्‍टोक्तियाँ हजम भी आसानी से होती हैं। सच, कहने में कोई अर्थ नहीं है, कहना पर व्‍यर्थ नहीं, कहने पर मिलती है एक तल्‍लीनता और एक पारिश्रमिक का चेक (कई बार फोन करने और चिट्ठी भेजने पर)। तो मैं उस देश के बारे में कुछ कहने बैठा हूँ जो दुनिया का सबसे अधिक सफाई-पसंद देश है। यह सही है कि वहाँ कीचड़ से भी होली खेली जाती है, लेकिन यह भी सही है कि वहाँ के वातावरण में ही सफेदी लानेवाले कुछे ऐसे विशिष्‍ट रसायन पाए जाते हैं कि सारी होली के बाद बेचारे ढूँढ़नेवाले कीचड़ के दाग ढूँढ़ते ही रह जाते हैं। वहाँ के आमोद-प्रिय निवासी एक-दूसरे पर कीचड़ जमकर फेंकते हैं लेकिन कीचड़ किसी पर लगता या जमता नहीं है। हर कोई, हर क्षण बेदाग सफाई का, हँसता हुआ नूरानी विज्ञापन बना रह पाता है।

गैर-सफाई-पसंद देशों में मानो सारा महत्व ही कीचड़ का है। जिस पर जरा-सी कीचड़ उछलती है, उसे घबराकर पद से, और कभी-कभी तो जीवन से ही त्‍यागपत्र दे बैठने की सूझती है। मगर उस सफाई-पसंद देश में कीचड़ कमल का कुछ बिगाड़ नहीं पाता है। बल्कि पंक जितना ही ज्‍यादा उछले-गिरे, पंकज उतना ही देदीप्‍य होता जाता है। उस देश के समझदार लोग इसीलिए कीचड़ महज शौकिया उछालते हैं, एक शगल के नाते उछालते हैं। इस मामले में वे कभी सीरियस नहीं होते। सीरियसली तो वह कमल की प्रार्थना ही करते हैं।
उस सफाई-पसंद देश के निवासी अपना दिमाग बार-बार साफ करते रहते हैं। इससे उन्‍हें सिर्फ काम की ही बातें याद रहती हैं। शहर के अंदेशे उनके दिमाग पर बोझ नहीं बनते हैं। इतिहास की स्‍मृति सहज उत्‍साह की राह में बाधा नहीं डाल पाती है। उस देश के निवासी अपना दिल भी साफ करते रहने के बारे में बहुत सजग हैं। इसीलिए वे अपनी सारी भावनाएँ अपने पर और अपनों पर केंद्रित रख पाते हैं। रो लेने की विधि, चीखने-चिल्‍लाने की विधि से बेहतर समझते हैं। वे जानते हैं कि चीखने-चिल्‍लाने से तो रक्‍तचाप ही बढ़ना है। रो लेने से और कुछ नहीं तो मन की शांति तो मिलेगी। और वह मिलेगी तो फिर शांत मन से अपनी और अपनों की समस्‍याओं का विचार कर सकेंगे। चित्त शांत होने से रक्‍तचाप भी नीचे आएगा। नित्‍य नियम से रोकर दिल की सफाई करते रहनेवाले उस देश के निवासी हार्ट अटैक और स्‍ट्रोक जैसी उन बीमारियों से बचे रह पाते हैं जो चीखने-चिल्‍लानेवाले देशों में बहुत व्‍यापक रूप से फैल गई हैं।

जहाँ तक पेट साफ रखने का सवाल है, इस मामले में तो उस देश के निवासी जगदगुरु सिद्ध हुए हैं। उनके यहाँ की एक कब्‍जहर भूसी का तो आज उन्‍नत देश के निवासी तक सुबह-सुबह जय-घोष करते पाए जाते हैं।
उस सफाई-पसंद देश में छोटे-से-छोटा अनुष्‍ठान भी बाहरी और भीतरी शुचिता के बारे में पूरी तरह आश्‍वस्‍त हो जाने पर ही करने की स्‍वस्‍थ परंपरा रही है। उस देश में उस बाहरी और भीतरी शुचिता के बारे में केवल एक मंत्र पढ़कर और तीन बार आचमन करके आश्‍वस्‍त हो सकने की सुविधाप्रद परंपरा भी रही है। उस सफाई-पसंद देश के नागरिक हिसाब साफ रखने में यकीन करते हैं और जब हिसाब साफ कर दिया जाता है तब वे स्‍वयं हमेशा लेनदार साबित होते हैं, प्रतिपक्ष देनदार। उस देश के निवासी साफ बात कहने और करने का आग्रह करते हैं और बहुत सफाई से बात कहना और करना बखूबी जानते हैं। वे अपने शत्रुओं तक को मारते नहीं, बस साफ कर देते हैं। उनके सफाई-पसंद होने का इससे बड़ा क्‍या प्रमाण होगा कि वे झूठ तक साफ-साफ बोलते हैं।

इन सफाई-पसंद नागरिकों को बराबर प्रेरणा देते रहने के लिए संसार की सबसे पवित्र नदी उसी देश में बहती है जो मैल को ही नहीं, पाप को भी काट देती है। सबसे पवित्र पर्वत-माला उसी देश के केशों में लिपटी है। और उस देश की मिट्टी तो इतनी पवित्र है कि उससे तिलक करने की सलाह दी जाती है। आज भी वहाँ की जनता अपने नेताओं के चरणों से लिपटी हुई इस पवित्र धूल को माथे से लगाकर धन्‍य होती है। उस देश की माटी स्‍वयं तो पवित्र है ही, अपने स्‍पर्श मात्र से शुचिता प्रदान करने की अद्भुत क्षमता रखती है।

तो क्‍या आश्‍चर्य जो उस देश की बहुसंख्‍यक आबादी सदा धूलि-धूसरित रहती आई है और अपने बच्‍चों को धूल में लोट लगाता देखकर पुलकित होती रही है। यही नहीं, हाथ धोने के लिए वह इस माटी को महँगे और महकते विदेशी साबुनों से बेहतर समझती आई है। इधर जब से उस देश में टेलीविजन ने उपभोक्‍ता संस्‍कृति के नाम पर विदेशी साबुनों का विज्ञापन शुरू किया है, कुछ कमजोर कलेजेवाले लोग घबरा उठे हैं और अपने देश की पवित्रता पर आँच आने का खतरा देख रहे हैं। सौभाग्‍य से उस देश में नेतृत्‍व हमेशा ऐसे ही लोगों के हाथ में रहता आया है, जो उस देश को ठीक-ठाक जानते हैं। न ज्‍यादा, न कम। बस इतना कि कम जाननेवालों से कह सकें कि आप नहीं जानते हैं, इसलिए आपके हितों के संरक्षण और संवर्द्धन का काम हम अपने हाथों में लिए ले रहे हैं। और जो ज्‍यादा जानते हों, उन्‍हें बता सकें कि जिस देश में यह पवित्र नदी विशेष बहती है, उसमें ज्‍यादा जाननेवाले अपने देश को ठीक से न पहचानने के लिए अभिशप्‍त रहे हैं।

तो विदेशी साबुनों का आक्रमण होने पर इन नेताओं ने कहा कि जिस देश में पवित्र नदी विशेष बहती है, उस देश के निवासी आज भी देश की माटी से जुड़े हुए हैं। उसी को जोत-बोकर अपना पेट पाल रहे हैं। उसी से बने हुए घरों में वे रहते हैं। रात को उसी पर सुख की नींद सोते हैं। और सुबह उसी पर निवृत्त होकर, उसी से शौच करते हैं, किसी सिने-तारिका के सौंदर्य साबुन से नहीं। तमाम पश्चिमी प्रभाव के बावजूद, टी.वी. से फैलती सांस्‍कृतिक टी.बी. के बावजूद, हमारे देश की असली आबादी को न ग्‍लैमररूम माने जा सकनेवाले बाथरूम में कोई आस्‍था हुई है, और न टायलेट पेपर से सफाई करने में कोई श्रद्धा। सच तो यह है कि वह आज भी इन पश्चिमी चोंचलों से अपरिचित है।

यह ठीक है कि गाँव के लोग शहरों की तरफ भागने लगे हैं। दूसरों की क्‍यों कहें स्‍वयं हम भी गाँवों से शहर में आ बसे हैं। लेकिन इसका यह अर्थ ह‍रगिज नहीं लगाया जाना चाहिए कि देश पश्चिम के प्रभाव में आ रहा है या कि उसका शहरीकरण हो रहा है। इससे तो केवल यह संकेत मिलता है कि देश में लोकतंत्र स्‍वस्‍थ है, सबल है। शहरों पर, सत्ता पर, उच्‍चवर्गीय शहरियों की बपौती नहीं रह गई है। झोंपड़ेवाले भी सरकारी बँगला-कोठी के दावेदार बन गए हैं।

नेताओं ने यह भी कहा कि गाँववालों के शहर में आने के बावजूद गाँवों की आबादी घट बिलकुल नहीं रही है। जनसंख्‍या के आँकड़े बताते हैं कि हमारे देश की अधिकतर आबादी अब भी गाँवों में ही रहती है। परमात्‍मा हमारे देश की पवित्र छवि को बनाए रखने के लिए इतना चिंतित है कि उसने देश-माता को एक अद्भुत वरदान दे डाला है। चाहे विकास के कितने भी पंचवर्षीय आयोजन पूरे हो जाएँ, चाहे तेरे कितने भी बेटों के लिए कितना भी आरक्षण कर दिया जाए, चाहे तेरे कितने भी बेटे शहरों को चले जाएँ, तू जहाँ है वहीं रहेगी, पवित्र धूल से धूसरित गाँव में। और जब देश की माता ग्रामवासिनी रहेगी, तब देश भी ग्रामवासी ही रहेगा।

जरा ये भी देखिएगा कि गाँव से शहरों में आई हुई यह आबादी अपने नित्‍य कर्म में अपनी जमीन से, अपनी माटी से अपना यह पवित्र संबंध बराबर जोड़े हुए है। गाँव से आई जनता को तो शहर में रेल पटरी के आसपास या फिर सरकारी बँगले में बँधी हुई अपनी-अपनी भैंस की पीठ पर हाथ फेरते हुए इन नेताओं ने शंकालुओं को यह भी समझाया कि जो लोग हमारी तरह गाँव से शहर आ गए हैं, वे भी अपने नित्‍य कर्म में अपनी जमीन और माटी से अपना वह पवित्र संबंध बराबर जोड़े हुए हैं। गाँव से आई जनता को तो शहर में रेल पटरी के आसपास या फिर पार्कों में अपनी जमीन से संपर्क साधे देखते ही होंगे आप, कभी हमारे सरकारी बँगलों और निजी शहरी फार्म हाउसों में सुबह-सुबह कोई आएँगे तो पाएँगे कि विदेशी कमोड हमारे लिए कब्‍जकारी है और हमारे ग्‍लैमररूम जैसे बाथरूम में लिक्विड सोप से अधिक सम्‍मान देश की माटी को प्राप्‍त है।

जब कुछ संवाददाताओं ने देश की बहुसंख्‍यक आबादी के माटी से जुड़े इस संबंध को ही देश के गंदे होने का प्रमाण बताया और एक हाथ की तर्जनी और अँगूठे से दोनों नथुने बंद करके दूसरे हाथ की तर्जनी सफाई-पसंद देश की तथाकथित गंदगी की ओर उठाते हुए हैरान होकर पूछा कि यहाँ लोग साँस भी कैसे ले पाते हैं? तब नेता बोले, काश कि कभी आप अपने नथुने खोलते और स्‍वयं अनुभव करके देखते कि और तमाम चीजों के साथ-साथ हमारे देश का पवन भी पावन है और उनके जैसे पतितों का भी उद्धार कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी नाक के साथ-साथ आप फिरंगी और फिरंगीवत आलोचकों ने अपनी आँखें भी बंद कर रखी हैं अन्‍यथा आप निश्‍चय ही ये देख पाते कि हमारे देश की बहुसंख्‍यक आबादी, इसी हवा से निर्मित हमारे चुनावी वादों पर जीती आई है।

नेताओं ने इस ओर भी ध्‍यान दिलाया कि सफाई-पसंद देश को आकंठ गंदगी में डूबा हुआ बताने के दुस्‍साहस को कभी व्‍यंग्‍य-विडंबना में तो कभी मानवीय चिंता में छिपा जाने की कोशिश करते हैं। सफाई-पसंद देश में गंदगी देखने-दिखानेवाले इन लोगों को उन्‍होंने 'नाबदान के नायब इंस्‍पेक्‍टर' और 'गंदे चहबच्‍चे के बच्‍चे' ठहराकर अपनी ग्रामवासिनी माता की तथाकथित गंदगी की सफाई में ऐसे-ऐसे तर्क दिए कि आलोचकों के मुँह खुले रह गए और बोलती बंद हो गई। उदाहरण के लिए उस देश के नेताओं ने कहा कि अलग-अलग देशकाल में गंदगी की परिभाषा अलग-अलग तरह की होती आई है क्‍योंकि सौंदर्य-बोध देशकाल सापेक्ष है। अस्‍तु जैसे आपको हमारी अपनी नाक अपनी जमीन पर सिनक देना गंदा लगता है, उसी तरह हमें आपका नाक रूमाल में सिनककर रूमाल को अपनी जेब में रख लेना गंदा लगता है। अगर आप तटस्‍थ होके देखें तो इस मामले में ही नहीं और तमाम बातों में भी आपकी गंदगी, हमारी गंदगी से कुछ ज्‍यादा ही गंदी ठहरेगी।
नाबदान के नायब इंस्‍पेक्‍टरों से उस देश की नेता बिरादरी यह कहती थी कि गंदगी दरअसल आपके दिमाग में है। इसीलिए आप हमारी तथाकथित गंदगी में ही अटके रह जाते हैं। हमारी सफाई आपको नजर ही नहीं आती है। अरे आपको हमारा गलियों में कूड़ा फेंकना तो नजर आता है लेकिन इससे पहले जब हम घर की सफाई करके वह कूड़ा जमा कर रहे होते हैं तब आप आँखें मींच लेते हैं। अजी सच तो ये है कि जब आप हमारी गंदगी का मजाक उड़ा रहे होते हैं तब आप वस्‍तुतः हमारी गरीबी का मजाक उड़ा रहे होते हैं और यह भूल जाते हैं कि इस गरीबी के लिए आप ही पूरी तरह जिम्‍मेदार हैं। हम इस देश के नेता जरूर हैं मगर इस देश का बेड़ा गर्क कर सकनेवाले तो आप विदेशी ही थे, हैं और रहेंगे। अगर सच्‍चे मन से हिसाब लगाएँगे तो पाएँगे कि हमारी विराट आबादी को देखते हुए हमारी गंदगी कुछ भी नहीं है। आप लोगों की प्रति व्‍यक्ति आय ही नहीं, प्रति व्‍यक्ति गंदगी भी हमसे सौ-गुनी है।

उस देश को ठीक-ठाक जाननेवाले लोग उस देश की गंदगी की ही नहीं, हर कमजोरी की तसल्‍लीबख्‍श सफाई देते रहे। इसीलिए सारी दु‍निया अंततः यह मानने को मजबूर हुई कि तमाम गरीबी और गंदगी के बावजूद वही दुनिया का सबसे ज्‍यादा सफाई-पसंद देश है। वहाँ हर कोई सफाई मॉंगता है और हर कोई सफाई दे सकता है।
"इस बारे में मैं कोई टिप्‍पणी नहीं करना चाहता" जैसी कायर उक्तियाँ उस देश के कायर-से-कायर नेता तक के लबों पर कभी नहीं आतीं।

उस सफाई-पसंद देश में सफाई माँगने के नाम पर गंदगी फैलाना, खोदखाद कूड़ा सबके सामने बिखरा देना अच्‍छा नहीं समझा जाता है, इसलिए एक अलिखित-सा समझौता है कि सफाई माँगी जरूर जाए, मगर जो सफाई दी जाए, उसे जहाँ तक हो सके, स्‍वीकार कर लिया जाए। सफाई हमेशा बहुत साफ और सरल दी जाती है ताकि कोई ऐसा न कह सके कि गोलमाल बात करके कुछ छिपाने की कोशिश की जा रही है। सबसे साफ और सरल सफाई वह मानी जाती है जिसमें आरोप को बिलकुल बेबुनियाद बताया गया हो। उदाहरण के लिए एक बार वहाँ छोटे वजीर पर यह आरोप लगा कि उसने अपने भाई की मदद से विदेशों में घूस खाई है। उसने पहले सफाई दी कि मैंने कोई घूस नहीं खाई है। मेरे पास जो भी पैसा आया है, जायज तरीकों से ही आया है। इस पर आरोप लगानेवाले ने सिद्ध करना चाहा कि भाई ने पैसा नाजायज तरीके से कमाया और नाजायज तरीके की कमाई में छोटे वजीर ने हिस्‍सा लिया है। छोटे वजीर ने बयान दिया कि इस बारे में मैंने अपने भाई से सफाई माँगी है और उसका कहना है कि आरोप बेबुनियाद है। मैं मानवीय भाईचारे में विश्‍वास करता हूँ। आप न करते हों तो आगे बात मेरे भाई से कीजिए।

किसी की सफाई को देर-सवेरे न मान लेना उस सफाई-पसंद देश में शिष्‍टाचार के विरुद्ध समझा जाता है। फिर भी विदेशी प्रभाव में आए कुछ लोग किसी भी सफाई से संतुष्‍ट न होकर आरोप लगाते चले जाते हैं। ऐसी दशा में उस देश में पुलिस का एक पूरा विभाग ही सत्‍यासत्‍य की जाँच के लिए खोल दिया गया है। सफाई-पसंद देश के निवासी अनिवार्य रूप से उसकी जाँच के नतीजों के बारे में भी सफाई माँगते हैं। इसीलिए उस देश में जाँच कमीशन और प्रवर समिति बैठाकर गंभीर कांडों की गहराई तक जाने का प्रावधान है।

किनारे पर बैठकर पानी में पाँव डाले हुए वह कमीशन, गहराई के विषय में पूर्वानुमान करते हुए काफी समय लेता है। इस बीच वह मामला सफाई-पसंद देश की स्‍मृति से साफ हो चुका होता है। कमीशन उस नतीजे पर पहुँचता है कि गहराई तो ऐसी है कि सारी व्‍यवस्‍था को ले डूबे लेकिन अब उसमें जाने से कोई फायदा नहीं है। आवश्‍यकता इस बात की है कि आइंदा सावधानी बरती जाए ताकि गंदे-गंदे आरोप लगने से इस सफाई-पसंद देश में गंदगी न फैले। गंदे आरोप लगानेवाले स्‍वयं इस विषय में बहुत सजग रहते थे कि कहीं हमारी वजह से हमारे देश का वातावरण गंदा न हो। इसीलिए वे सत्तारूढ़ व्‍यक्ति के पीछे हमेशा हाथ धोकर ही पड़ते थे। मगर जैसे ही सत्तावान मेहरबान होकर उन्‍हें कुछ दे देता है, वे उसके समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं।

गंदे आरोपों के बीच भी देश को स्‍वच्‍छ रखने के विषय में उस देश की नेता बिरादरी कितनी सजग है इसका एक अत्‍यंत सुंदर उदाहरण 'नीले होंठ कांड' में मिलता है। हुआ यह कि एक बार उस देश के किसी बड़े वजीर की घर से दूर अकस्‍मात मृत्‍यु हो गई। उसके पुत्र ने अपने पिता के शव के नीले होंठों की ओर जनता का ध्‍यान दिलाते हुए यह आशंका व्‍यक्‍त की कि मेरे पिता की हत्‍या की गई है। उसके चमचों ने नए बड़े वजीर पर परोक्ष ढंग से आरोप लगाया कि उसने सत्ता हथियाने के लिए पिछले बड़े वजीर की हत्‍या करा दी। लेकिन अंततः सफाई-पसंदी के हित में पिछले बड़े वजीर के पुत्र ने नए बड़े वजीर की यह सफाई मान ली कि पिछले बड़े वजीर दिल का दौरा पड़ने से पहले जामुन खा रहे थे और इसीलिए उनके होंठ नीले हो गए थे। पिछले बड़े वजीर के पुत्र ने न केवल यह सफाई मान ली बल्कि अपने चमचों के लगाए आरोपों से फैली गंदगी को दूर करने की खातिर नए बड़े वजीर का यह अनुरोध भी स्‍वीकार कर लिया कि वह अपने पिता का अधूरा काम पूरा करने के लिए फिलहाल छोटा वजीर बन जाए।

तो उस सफाई-पसंद देश में आरोप जितना ही गंभीर होता है, सफाई उतनी ही सरल होती है। आरोप को संगीन बनाने के लिए नित नए सबूत जुटानेवाले, उस देश में यह देखकर बहुत हैरान होते हैं कि संगीनी के साथ-साथ बढ़ती सफाई की सरलता आखिरकार बहुत सादगी से उनका ही सफाया कर देती है। सफाई-पसंद नागरिक सफाई देनेवाले की मासूमियत के कायल होते हैं और वही-वही आरोप दोहराए चले जानेवाले को सनसनी के नाम पर बोरियत फैलानेवाला ठहराते हैं।

उदाहरण के लिए एक बार वहाँ किसी विदेशी तोप की खरीद में कमीशन के पैसे खुद खा जाने का गंभीर आरोप बड़े वजीर पर लगाया गया। वह अपने को निर्दोष बताते रहे। उन्‍होंने कहा कि सर्वविदित है कि हम डायटिंग कर रहे हैं। इसलिए यह कल्‍पनातीत है कि हमने पैसे जैसी गरिष्‍ठ चीज खाई होगी। किसी और ने खा ली हो तो उसकी भी हमें कोई जानकारी नहीं है। जानकारी मिलेगी तो बताएँगे और आप निश्चित रहें, पैसा खाने के दोषी देश के कानून के अनुसार अवश्‍य दंड पाएँगे। आरोप लगानेवाले कहते रहे कि आप पूछेंगे, तभी तो जानकारी पाएँगे। जवाब में उन्‍हें यही सफाई सुनने को मिलती रही कि हम तमाम नियम-कायदों का पालन करते हुए पूछताछ कर रहे हैं। वही आरोप और वही सफाई का क्रम इतना लंबा चला कि उस सफाई-पसंद देश की पब्लिक झुँझला उठी और बोली कि जिन लोगों को उस तोप के सिवा कुछ नहीं सूझता है, उन्‍हें उसी तोप से उड़ा दिया जाए।

उस सफाई-पसंद देश में सफाइयाँ भी दो तरह की होती हैं, एक सार्वजनिक और एक निजी। सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई सफाई नहीं दी जाती है जिससे देश के वातावरण की स्‍वच्‍छता को आँच पहुँच सकती हो। निजी सफाई भी दो तरह की होती है। एक वह जो विश्‍वस्‍त मित्र के कान में कही जा सके और दूसरी वह जिसके बारे में कहा जा सके कि या तो मैं जानता हूँ या मेरा परमात्‍मा जानता है, और हाँ आरोप लगानेवाला भी। और चूँकि आरोप लगानेवाला उस बात को कहकर पहले ही वातावरण काफी गंदा कर चुका होता है इसलिए जिस पर आरोप लगा हो उसका यह कर्तव्‍य हो जाता है कि सफाई देकर उस गंदगी को साफ करे, यह नहीं कि स्‍वयं उसमें लोट लगाने लगे। यही कारण है कि सफाई के मामले में उस देश के सत्तावान लोग सार्वजनिक और निजी को हर हालत में अलग ही रखते थे।

एक बार को आप उन्‍हें सरकारी गाड़ी का घर की सब्‍जी लाने के लिए इस्‍तेमाल न करने के लिए मजबूर कर सकते थे। एक बार को आप उन्‍हें वजीर पद क्‍या, संसार भी छोड़ देने के वर्षों-वर्षों बाद तक सरकारी कोठी अपने ही नाम रखे रहने के लिए राजी कर सकते थे, लेकिन मजाल है जो आप उनसे किसी सार्वजनिक मंच से वह सफाई बुलवा देते, जो वे एक-दूसरे के कान में बोल दिया करते थे।

कोई साहब आपत्ति कर रहे हैं कि उस सफाई-पसंद देश का नाम क्‍यों नहीं ले रहा हूँ, इस बारे में तुरंत सफाई दूँ। लगता है ये भी उसी सफाई-पसंद देश के नागरिक हैं। तो साहब, मेरी सार्वजनिक सफाई ये है कि सठिया जाने के कारण मैं उस देश का नाम भी भूल गया हूँ। अब आपसे क्‍या छिपाऊँ, मैं तो अपने तीन बेटों के एक ही अक्षर से शुरू होनेवाले नामों तक में बुरी तरह गड़बड़ाने लगा हूँ। मेरे सामने इसके अलावा अब कोई रास्‍ता ही नहीं रह गया है कि उनमें से कोई भी सामने आए, मैं क्रम से तीनों के नाम लेता चला जाऊँ। कहना न होगा कि इससे जहाँ पहले बेटे को बहुत सुविधा हुई है, वहीं तीसरे को इतनी असुविधा कि अब उसने अपने कोट या कमीज पर अपनी नाम-पट्टी लगानी शुरू कर दी है। दिक्‍कत यह है कि मेरी निगाह भी सठिया गई है और मैं उस नाम-पट्टी को तभी पढ़ सकता हूँ जब वह मेरी निगाह से चौथाई मीटर की दूरी पर हो। जहाँ तक मेरे दूसरे बेटे का सवाल है उसने अपनी इस स्थिति को स्‍वीकार कर लिया है कि मेरा नाम, मेरे पिता द्वारा दूसरी कोशिश में ही सही पुकारा जाएगा।

अब आप अपने कान मेरे होंठों के करीब ले आए हैं तो निजी सफाई भी दे डालूँ। उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेरा साहस घटता चला गया है। अब कौन इस उम्र में नाम लेकर झमेले में पड़े।

हिंदी समय की साईट से साभार

रफी की आवाज के राहगीर

 आपको शब्बीर कुमार याद हैं? जी हां वही ‘एक शाम रफी के नाम’ वाले शब्बीर कुमार, जिनकी आवाज से सजे ‘जब हम जवां होंगे, ‘जिहाल-ए-मिस्किन’,‘जिंदगी हर कदम एक नयी जंग है’ जैसे गीत हम आज भी गाते हैं, गुनगुनाते हैं, एफएम पर ये गीत जब बजते हैं तो  थोड़ा ठहर जाते हैं. इन्ही शब्बीर कुमार के फ़िल्मी सफ़र पर छोटा सा लेख  प्रीति सिंह परिहार का.  अखरावट


हिंदी फिल्म के महानतम पार्श्व गायकों में शुमार मोहम्मद रफी की गायिकी के अंदाज और आवाज को उनके बाद बहुत से गायकों ने अपनाने की कोशिश की और बतौर गायक एक पहचान भी हासिल की.

अस्सी के दशक में एक ऐसे ही गायक उभरे शब्बीर कुमार. जी हां वही ‘एक शाम रफी के नाम’ वाले शब्बीर कुमार. रफी साहब के इंतकाल के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए इस नाम से शुरु हुआ उनका आर्केस्ट्रा कभी पूरे देश में मशहूर हुआ था.

गुजरात के वड़ोदरा में पले-बढ़े  शब्बीर शेख, जिन्हें दुनिया शब्बीर कुमार के नाम से जानती है, रफी साहब की गायिकी के दीवाने थे. उन्होंने रेडियों में मोहम्मद रफ़ी को सुनते हुए गाना सीखा. वह भी दूसरों के घर जाकर, क्योंकि उनके पिता घर में रेडियो रखने के खिलाफ थे. फिल्मों में गाने का ख्याल दूर तक उनके जेहन में नहीं था. एक इंटरव्यू में शब्बीर ने कहा था, "जिंदगी में संगीत से पहले पेंटिंग आ गई थी. गायक न बनता तो आर्टिस्ट होता.  किसी जमाने में दो से आठ रूपये में वडोदरा में चित्र बना कर कमा लेता था और उससे अपनी पॉकेट मनी निकाल लेता था. " हाँ, शब्बीर कुमार को संगीत का बेहद शौक था.  वे इतना अच्छा गा लेते थे कि दोस्तों ने उनसे कहा कि आर्केस्ट्रा में क्यों नहीं गाते? शब्बीर आर्केस्ट्रा के लिए गाने लगे और धीरे-धीरे रफी के गीत गाने के लिए लोकप्रिय हो गये. रफी से मिलती आवाज शब्बीर कुमार को आर्केस्ट्रा की दुनिया से पार्श्व गायन में ले आयी. हुआ यूं कि अमिताभ अभिनीत ‘कुली’ के गाने रफी साहब गानेवाले थे, पर कुदरत को यह मंजूर न था. फिल्मकार मनमोहन देसाई किसी और गायक की आवाज के बारे में सोच ही नहीं पा रहे थे. तब संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने ऊषा खन्ना की मदद से शब्बीर कुमार की "खोज" की.

उस समय यह चरचा आम थी कि ‘एक लड़का आया है जिसकी आवाज मोहम्मद रफी से मिलती-जुलती है.’ कुली के गानों की लोकप्रियता से उन्हें ‘बेताब’ में गाने का मौका मिला और पार्श्व  गायन के लिए फिल्म फेयर अवॉर्ड भी. ‘बेताब’ में लता मंगेशकर के साथ उनके गाये ‘जब हम जवां होंगे’ और ‘बादल यूं गरजता है’ तो आपको याद ही होंगे. ऐसे ही कुछ और यादगार गीत,‘जिहाल-ए-मिस्किन’,‘जिंदगी हर कदम एक नयी जंग है’,‘याद तेरी आयेगी’, ‘तुम्हे अपना साथी बनाने से पहले’, "गोरी हैं कलाइयां" शब्बीर की आवाज से सजे हैं. उन्होंने लता और आशा, दोनों के साथ गाया। 1980 के दशक में शब्बीर ने लगभग हर संगीतकार के साथ काम किया.  लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर डी बर्मन, राजेश रोशन, बप्पी लाहिरी, अनु मालिक, रवींद्र जैन जैसे शीर्ष संगीत निर्देशकों ने जो संगीत रचा, उसे शब्बीर ने स्वर दिया. पर, कई सुपर हिट गानों के बाववजूद फिल्मों में शब्बीर का फ़िल्मी सफर एक दशक से ज्यादा का नहीं रहा और गायिकी का यह सितारा माया नगरी की निगाहों से ओझल सा हो गया. वैसे शब्बीर आर्केस्ट्रा की दुनिया में आज भी लोकप्रिय और सक्रिय हैं, लेकिन कभी-कभार ही किसी फिल्म गीत में उनकी आवाज सुनी जा सकती है. पेंटिंग वे आज भी करते हैं. उन्होंने सलमान खान को उनकी फिल्म दबंग का पोट्रेट बना कर दिया था. उनके बेटे दिलशाद भी उभरते  हुए गायक हैं. दिलशाद ब्लू और रा-वन के लिए गाना गा चुके हैं. 

शब्बीर अब भले फिल्मों के लिए न के बराबर गाते हों, भले हमारा बचपन पीछे छूट गया हो और हम जवान हो गए हों और जाने कहाँ आ गये हों, लेकिन हम जहाँ भी हों आज भी शब्बीर कुमार के गाये गीतों और उनकी आवाज को तो अक्सर याद करते ही रहते हैं. उनके गानों के साथ पुराने दिनों में लौटते रहते है. 

20 October 2013

मेरे पास लेखक बनने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था : एलिस मुनरो

2013 के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार पानेवाली कनाडा की एलिस मुनरो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों में गिनी जाती हैं. लम्बी कहानी का फॉर्म चुननेवाली मुनरो राजनीतिक कहानियाँ नहीं लिखतीं, मन के भीतर झांकती हैं. उनकी कहानियों में मनोविज्ञान, खासकर स्त्री मनोविज्ञान की गहरी पकड़ देखी जा सकती है. कनाडा के सुदूर हिस्से में अपना ज्यादातर वक्त बितानेवाली मुनरो का एक किसान की बेटी से नोबेल पुरस्कार पाने का सफ़र, विपरीत परिस्थितियों में एक साधारण स्त्री की महान उपलब्धि हासिल करने का सफ़र है. मुनरो पर गंभीरता पूर्वक और ठहरकर लिखा चाहिए। फिलहाल पेरिस रिव्यू और वर्जीनिया क्वार्टरली रिव्यू में छपे उनके साक्षात्कारों के कुछ अंशों को मिलाकर उनका एक आत्मवक्तव्य।।। अखरावट 



 मैं जब 21 साल की थी, तब से लगातार लिख रही हूं. आज मैं 81 साल की हूं. (इस साल 2013 में 82 वर्ष की उम्र में एलिस मुनरो ने लेखन से संन्यास लेने की घोषणा की).  जब मेरी पहली किताब प्रकाशित हुई, उस वक्त मैं करीब 36 साल की थी. मैं ये कहानियां वर्षों से लिख रही थी. आखिरकार रायर्सन प्रेस के एक कनाडाई प्रकाशक (बाद में इसे मैकग्रॉ-हिल ने खरीद लिया) ने मुझे खत लिखा और पूछा कि क्या मेरे पास इतनी कहानियां हैं, जिनसे एक किताब प्रकाशित की जा सके? उनकी योजना तीन लेखकों की एक सम्मिलित किताब निकालने की थी. यह योजना शक्ल नहीं ले पायी, लेकिन उनके पास मेरी कहानियां थीं. फिर उन्होंने वह प्रकाशन छोड़ दिया, लेकिन उन्होंने मेरी कहानियां एक दूसरे संपादक के सुपुर्द कर दीं. नये संपादक  ने मुझसे कहा कि अगर आप तीन और कहानियां लिख सकती हैं, तो आपकी एक किताब आ जायेगी. इस तरह मैंने तीन और कहानियां लिखीं, ‘इमेजेज’, ‘वाकर ब्रदर्स कॉवबॉय’ और पोस्टकार्ड. इनमें से ज्यादातर कहानियां टैमारैक रिव्यू में प्रकाशित हुई. यह एक छोटी सी अच्छी और साहसी पत्रिका थी.

मैंने जब लिखने की शुरुआत की, उस वक्त मेरी महत्वाकांक्षा उपन्यास लिखने की थी. मैंने कहानियां लिखनी शुरू कीं, क्योकिं मेरे पास जितना वक्त था, उसमें यही लिखा जा सकता था. मैं घर और बच्चों को संभालने के बीच से बहुत ज्यादा वक्त नहीं निकाल पाती थी. इन कामों से मुझे लिखने के लिए जितना वक्त मिलता था, उसमें उपन्यास नहीं लिखा जा सकता था. लिखते-लिखते मैंने कहानी का एक ऐसा फॉर्म (रूप) हसिल किया, जो कहानियों के लिए प्राय: इस्तेमाल नहीं किया जाता. मैंने परंपरा से अलग लंबी कहानियों का रूप विकसित किया. मुझे लगा कि मैं जो कहना चाहती हूं, वह लंबी कहानियों में ही मुमकिन है. यह शुरू में काफी कठिन था, क्योंकि कहानी एक ऐसी विधा है, जिससे लोग उम्मीद करते हैं कि यह बहुत बड़ी न हो. वह निश्चित लंबाई की हो. लोग छोटी कहानियां चाहते हैं और मेरी कहानियां इस मायने में थोड़ी अलग थीं कि वे बड़ी होती जाती थीं. जो कुछ अलग तरह की बातें कहती थीं. मैं खुद नहीं जानती, कम से कम ज्यादातर मौकों पर मैं यह  नहीं जानती कि कहानी कितनी बड़ी होनेवाली है. लेकिन मैं इसके अपने आकार हासिल करने पर आश्चर्यचकित नहीं होती हूं. उसे जितनी जगह चाहिए, मैं उसे देती हूं. वैसे भी, मुझे इस बात की कोई परवाह नहीं कि मैं जो लिख रही हूं उसे क्या नाम दिया जा रहा है, किस विधा के अंतर्गत रखा जा रहा है. इसे कहानी कहा जा रहा है, या कुछ और. या कुछ भी. यह अपने आप में एक कथा है और मेरे लिए इतना ही महत्वपूर्ण है.

मेरे लिए लिखना हमेशा काफी कठिन रहा है. जी हां, हर दौर मैं यह काफी कठिन रहा है. मैं बहुत धीरे-धीरे लिखती हूं. मैं अपने लिखे को कई बार लिखती हूं. लिखती हूं, फिर लिखती हूं. फिर लिखती हूं. इसके बाद मैं इसे छपने के लिए भेजती हूं. अकसर ऐसा होता है कि कुछ समय बीतने के बाद मैं इसे फिर से लिखना चाहती हूं. कभी-कभी ऐसा लगता है कि कुछ शब्द इतने महत्वपूर्ण और जरूरी हैं, कि उन्हें कहानी में जरूर से शामिल किया जाना चाहिए. मैंने कई बार अपनी कहानियों में उनके लिखे जाने के काफी बाद में सुधार किया है, जो अकसर गलत फैसला साबित हुआ. क्योंकि जब मैं सुधार कर रही थी, उस समय मैं उस कहानी की लय में बिल्कुल भी नहीं थी. कई बार ऐसा होता है कि जब मैं कहानियों को बाद में पढ़ती हूं, तो उसका कोई हिस्सा, कुछ शब्द मुझे खटकते हैं. मुझे लगता है कि इन शब्दों को जो काम करना चाहिए, वे नहीं कर पा रहे. फिर मैं उन्हें फिर से लिखती हूं. लेकिन जब मैं कहानी को फिर से पढ़ती हूं, तो वे कहानी के प्रवाह को भंग करते दिखते हैं. इसलिए, मैं ऐसा करने को लेकर ज्यादा आश्वस्त नहीं हूं. ऐसे व्यवहार से बचना चाहिए. एक बिंदु ऐसा होना चाहिए, जहां हम खुद से कहें कि अब यह कहानी मेरी नहीं है. जैसा हम बच्चे के लिए कहते हैं.

मेरे पास लेखक बनने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था, क्योंकि मेरे पास इतने पैसे नहीं थे. मुझे मालूम था कि मैं यूनिवर्सिटी में सिर्फ दो साल रहनेवाली हूं, क्योंकि मुझे मिल रहा वजीफा दो सालों के लिए ही था. यह मेरे जीवन में एक अवकाश की तरह था. वह एक सुनहरा दौर था. जब मैं बच्ची थी, तब पूरे घर की जिम्मेवारी मेरे ऊपर थी. इसलिए यूनिवर्सिटी का वक्त, मेरे जीवन का एकमात्र  ऐसा दौर था, जब मुझे घर का काम नहीं करना होता था. यूनिवर्सिटी का दूसरा साल खत्म होने के साथ ही मैंने शादी कर ली. उस वक्त मैं 20 साल की थी. हम लोग वैंकूवर चले गये. यह एक बड़ा क्षण था. इसके साथ रोमांच जुड़ा था. बाहर जाने का बसने का रोमांच. जल्दी ही हम एक ठीक-ठाक मध्यवर्गीय जीवन जीने लगे. हम एक घर लेने और एक बच्चे के बारे में सोच रहे थे और समय गंवाये बगैर हमने ऐसा कर भी लिया. मैं सिर्फ 21 साल की थी, जब मेरा पहला बच्चा हुआ. हां इस दौरान मैं  लगातार लिख रही थी. जब मैं गर्भ से थी, उस दौर में मैं काफी व्यग्रता के साथ लगातार लिखती रहती थी, क्योंकि मुझे यह डर था कि इसके बाद मैं कभी नहीं लिख पाऊंगी. हर बार गर्भ के दौरान मुझे इस ख्याल ने गहरे तक मथा कि मुझे बच्चे के जन्म से पहले कुछ बड़ा करना चाहिए. हालांकि, मैं इस दौरान मुझसे कुछ भी बड़ा नहीं हुआ. जब मेरे बच्चे छोटे थे, उस समय मेरे लिखने का वक्त तब आता था, जब वे स्कूल चले जाते थे. उन दिनों में मैं काफी मेहनत किया करती थी. मेरे पति और मेरी एक किताब की दुकान थी. जब मैं वहां काम करती थी, उन दिनों में भी मैं घर में दोपहर तक रहती थी. मुझे इस वक्त घर का काम करना होता था, लेकिन मैं इसी समय में लिखा भी करती थी. बाद में, जब मैं हर दिन बुक स्टोर नहीं जाती थी, मैं तब तक लिखा करती थी, जब तक सभी लोग दोपहर के खाने के लिए घर लौटकर नहीं आ जाते थे. जब वे करीब ढाई बजे के करीब चले जाते थे, मैं अपने लिए जल्दी में  एक कप कॉफी बनाती थी, फिर घर का काम करती थी. मेरी कोशिश होती थी कि मैं शाम होने से पहले सबकुछ निबटा लूं.

लोग कहते हैं कि मेरी भाषा कवितामय है. मैं कविताएं आज भी यदा-कदा लिखती हूं. मुझे कविता का विचार पसंद है. लेकिन जब आप गद्य लिख रहे होते हैं, तब आपको इस बात को लेकर हमेशा सचेत रहना पड़ता है कि आप गद्य को जानबूझ कर कवितामय न बना दें. गद्य की भाषा में पैनापन होना चाहिए. और अब मुझे इसी तरह लिखना पसंद है.

हां मुझे  लोक-कथाएं आकर्षित करती हैं. लेकिन, एक लेखक होने के नाते यह किसी को नहीं पता होता कि वह किस ओर आकर्षित होगा. आप पहले से कुछ तय नहीं करते. अचानक आपको एहसास होता है कि हां, मुझे यह लिखना है. ऐसे लिखना है. हां, यह जरूर है कि लोग जो कहानियां सुनाते हैं, मैं उन्हें ध्यान से सुनती हूं. उनकी लय को पकड़ने की कोशिश करती हूं और फिर लिखने की कोशिश करती हूं. मैं सोचती हूं कि लोगों को आखिर इस तरह की कहानियां इतनी पसंद क्यों आती हैं? वे उनके लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों हैं? हम लोगों से ऐसी कई कहानियां सुनते हैं, जो जीवन की विचित्रता को बयान करती हैं. मैं ऐसी कहानियां उठाती हूं, और देखने की कोशिश करती हूं कि वे मुझसे क्या कहना चाहती हैं या फिर मैं उनसे कैसा व्यवहार करना चाहती हूं.

लोग कहते हैं कि लोक-कथाएं औरतों की विधा है. मुझे यह काफी हद तक सच मालूम पड़ता है. वैसी औरतें, जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता था, यहां तक कि जब औरतों ने लिखना सीख लिया और वे लिख सकती थीं, तब भी वे कहानियां सुना रही थीं. औरतें आपस में काफी वक्त गुजारती हैं. मुझे याद है पहले औरतों को खूब खाना बनाना पड़ता था. मेरे बचपन में पुरुष खेतों में काम करते थे, जब वे काम से वापस लौटते थे, तब उन्हें खूब विस्तार से खाना परोसा जाता था. खाना जितना भव्य होता था, वह जितना स्वादिष्ट होता था, औरतें उतनी गौरवान्वित होती थीं. खाने के बाद बर्तनों का अंबार होता था और औरतें साथ मिलकर उसे साफ करती थीं. इस पूरी प्रक्रिया में वे आपस में बात कर रही होती थीं. जरूर यह काफी पुरानी बात हो चुकी है. यह गांव के जीवन की बात है. मुझे नहीं पता अब औरतें अभी भी इस तरह से बात करती हैं या नहीं?  लेकिन औरतें जब भी मिलती हैं, मुझे लगता है उनके भीतर कहानियां सुनाने की इच्छा कुलबुलाती है. वे एक-दूसरे से यह सवाल पूछना चाहती हैं, ‘तुम्हें क्या लगता है,  ऐसा क्यों हुआ?’, ‘ऐसा कहना अजीब नहीं था?’, ‘इसका क्या मतलब है?’ औरतों में शायद एक आदत होती है. वे जीवन को मौखिक रूप से व्याख्यायित करना, उसे समझना चाहती हैं. जितने पुरुषों को मैं  जातनी हूं, या जानती थी, उनमें  ऐसी कुलबुलाहट मैंने नहीं देखी. वे चीजों के बारे में ज्यादा नहीं सोचते.

यह एक वजह हो सकती है कि मैंने कहानी की विधा को चुना या कह सकते हैं कि कहानी की विधा ने मुझे चुन लिया. मुझे लोगों के साथ, उनकी बातचीत, उनके जीवन में आनेवाले आश्चर्यों पर काम करना पसंद है. मेरे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है, कि आप जिस चीज की उम्मीद नहीं कर रहे थे, वह आपके साथ हो जाये. मेरी  एक कहानी ‘रनअवे’ में एक औरत  जिसका दांपत्य जीवन काफी कठिनाइयों भरा रहा है अपने पति को छोड़ने का फैसला करती है. एक उम्रदराज और तार्किक औरत की बातों से उसे ऐसा करने का हौसला मिलता है. और जब वह बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ाती है, वह महसूस करती है कि वह ऐसा नहीं कर सकती. यह समझदारीभरा फैसला है. उसके पास उस जीवन से बाहर आने के कई कारण हैं, लेकिन वह  ऐसा नहीं कर सकती. आखिर  ऐसा क्यों होता है? मैं ऐसे विषयों पर लिखती हूं, क्योंकि मुझे यह नहीं पता कि आखिर ऐसा क्यों होता है? लेकिन मेरे लिए जरूरी है कि मैं ऐसी घटनाओं की ओर ध्यान दूं. इनमें  ऐसा कुछ है, जो ध्यान दिये जाने की मांग करती हैं.

मेरा जीवन में कई कठिनाइयां आयीं, लेकिन मेरे हिस्से में किस्मत भी थी. अगर मैं अपने से पहले की पीढ़ी के किसान की बेटी होती, तो मेरे लिए कोई संभावना नहीं होती. लेकिन जिस पीढ़ी में मैं थी, वहां छात्रवृत्तियां थीं. हालांकि, लड़कियों को उसके लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था, लेकिन लड़कियां उसे हासिल कर सकती थीं. मैं काफी उम्र में अपने लिए सोच सकती थी कि मैं एक लेखक बनूंगी.  और मैं आपको बता दूं कि कोई और ऐसा या इस तरह का नहीं सोचता था. लेकिन यह कोई सपनीली राह नहीं थी. जब मैं किशोर थी तब मैं खूब शारीरिक काम किया करती थी, क्योंकि मेरी मां ज्यादा काम नहीं कर सकती थी. लेकिन यह मुझे रोकने के लिए काफी नहीं था. मुझे लगता है, एक तरह से यह मेरी खुशकिस्मती थी. अगर मैं न्यूयॉर्क में किसी काफी धनी परिवार में जन्मी होती, ऐसे लोगों के बीच जो लेखन के बारे में सबकुछ जानते होते, तो मैं पूरी तरह से  नष्ट हो जाती. मुझे लगता कि मैं ऐसा नहीं कर सकती. लेकिन क्योंकि मेरे आसपास ऐसा कोई नहीं था, जो लिखने के बारे में सोचा करता था, इसलिए मेरे अंदर यह विश्वास आया कि ‘हां, मैं यह कर सकती हूं.’





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