29 December 2013

आत्मा से बादलों पर चलूँ...

राजस्थानी लोक-कथाओं को नया जीवन देनेवाले कथाकार विजयदान देथा (बिज्जी) ने 10 नवंबर को भले इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके शब्दों की उपस्थिति हमारे जीवन में हमेशा बनी रहेगी. नजदीकी मित्र अनिल बोर्दिया को लिखे पत्र में बिज्जी ने अपने सृजन और काफी कुछ अपने जीवन के बारे में भी लिखा था. यह खत बिज्जी के लेखकीय सरोकारों को समझने की कुंजी कहा जा सकता है. प्रस्तुत है उस पत्र का संपादित अंश.


सन 1958 के किसी शुभ दिन मैंने पुख्ता सोच-समझकर निर्णय लिया कि हिंदी की बजाय राजस्थानी में लिखे बिना मेरी कहानियां आकांक्षित ऊंचाइयों तक नहीं उड़ सकतीं, तब से 28 वर्ष तक विभिन्न फलों की ‘फुलवाड़ी’ सींचता रहा. संवारता रहा. पर तुम कई बार मुङो मीठे ढंग से समझाते रहे कि हिंदी की बजाय राजस्थानी में लिखने का निर्णय अव्यावहारिक, असंगत और आत्मघाती है.

हिंदी का दायरा राष्ट्रव्यापी है और राजस्थानी का एकदम सीमित. प्रांतीय मान्यता और शिक्षा के अभाव में प्रशिक्षित वर्ग बड़ी मुश्किल से तैयार हो पायेगा. तब तुम्हारा सोचना था कि मेरा संकल्प अनुचित है. समय-सापेक्ष नहीं है. और जब ‘रूंख’ की सघनता के बाद हिंदी में फिर से लिखना प्रारंभ किया, तो तुम्हारा पुरजोर आग्रह है कि मुङो केवल राजस्थानी में ही लिखना चाहिए. अनुवाद का काम तो कोई भी कर लेगा, पर मैं फकत अनुवाद ही तो नहीं करता, अनिल. हिंदी में फुलवाड़ी की कथाओं को पुन:सृजित करता हूं. राजस्थानी ‘बात’ का वजन, उसकी ध्वनि, उसके छिपे अर्थ जो व्यक्त के द्वारा अव्यक्त की ओर संकेत करते हैं, प्रच्छन्न मौन को मुखरित करते हैं - यह सब प्रखर हो जाता है. बहुत-कुछ बदल जाता है. कथानक वे ही हैं. पर कहानी के आयाम बदल जाते हैं. इसलिए कि मैं निरंतर बदलता रहता हूं. कहूं कि परिष्कृत और संशोधित होता रहता हूं. जीवित गाछ-बिरछों के उनमान प्रस्फुटित करता रहता हूं. सघन होता रहता हूं.

खुलासा करने के लिए और अधिक पीछे जाना पड़ेगा अनिल, जब मैं सन 1948 से 1950 तक ‘ज्वाला’ साप्ताहिक में काम करता था. ‘ब्लिट्ज’ की साइज के सोलह पृष्ठ निकलते थे. नियमित रूप से तीन स्तंभ लिखता था - ‘हम सभी मानव हैं’, ‘दोजख की सैर’ और ‘घनश्याम, परदा गिराओ.’ तीनों स्तंभों में कथा की बुनावट रहती थी. मानववाले स्तंभ में आज के मुहावरे में सांप्रदायिकता के खिलाफ ‘एक मानव’ के नाम से मेरी कलम अबाध चलती रहती थी. ‘दोजख की सैर’ में विभागीय भ्रष्टाचार पर कटाक्ष का स्वरूप रहता था. वह भी कथा के माध्यम से. ‘घनश्याम, पर्दा गिराओ’ में राजनेताओं का पाखंड उजागर होता था. ये तीनों स्तंभ तो लिखता ही था, पर पूरे के पूरे सोलह पृष्ठ अपने हाथ से फेयर करके प्रेस में देता था. कलम मंजती रही. धार लगती रही.      
तब एक शिफ्त मुझमें और भी थी अनिल, कि लिखने के पूर्व-चाहे किसी विधा में लिखूं कविता, कहानी, गद्यगीत, निबंध या आलोचना-न कुछ सोचता था, लिखना शुरू करने के बाद न रुकता था. न काट-छांट करता था और न लिखे हुए को फिर से पढ़ता था. प्रारंभ से ही पत्र-पत्रिकाएं गले पड़ती गयीं, सो ये सब नखरे वहां चलते नहीं थे. हर रोज समय पर काम निपटाना पड़ता था.

पर मैंने बेगार कभी नहीं टाली. आधे-अधूरे मन से कभी काम नहीं किया. मैं काम को बेगार समझता ही नहीं, चाहे अपना हो, चाहे दूसरों का. संपूर्ण निष्ठा से करता हूं. काया के सांचे में मन और आत्मा उड़ेल कर. तुमने भी कई बार ठोक-बजाकर मेरे इस स्वभाव को जांचा-परखा है. इसे तुम मेरी बेवकूफी समझो या मेरी नादानी कि.. परिश्रम के साथ पारिश्रमिक को मैंने कभी जोड़ कर देखने की चेष्ठा ही नहीं की. हाथ लग जाये तो कोई ऐतराज नहीं, न लगे तो कोई आग्रह नहीं. बस, चाकू की धार तेज व टिकाऊ होनी चाहिए. फिर उससे प्याज काटो, चाहे आलू, लौकी या बैंगन. आसानी से कट जाते हैं. शुरुआत में हिंदी के रियाज से जो धार लगी, वह राजस्थानी में उसी कौशल से काम आयी. दृष्टि हमेशा ऊपर की ओर रखी कि शरीर से न भी हो, पर मन और आत्मा से बादलों पर चलूं. लहराती बिजलियों को बाहुपाश में भरूं और बादलों के बीच ही नहाऊं. धोऊं. चांदनी से प्यास बुझाऊं!        
मेरी रचनाओं में गहरी रुचि रखनेवाले परमहितैषी मुङो टोकते रहते हैं कि नये सृजन की कीमत पर राजस्थानी या हिंदी में पुनर्लेखन न करूं. पर मुङो इसमें प्रजापति-सा आनंद आता है. अपने ही हाथों रची सृष्टि को नया रूप प्रदान करना! यह तो अदम्य हौसले का काम है. मानों अपनी संतान को काट-कूटकर फिर से जीवित करने जैसा. जिस तरह मेरे भीतर स्रष्टा का स्वरूप नित्य-प्रति बदलता रहता है, तदनुरूप अपनी रचनाओं का रूप बदलते रहने की खातिर मेरी उत्कट अभिलाषा बनी रहती है.

यह तो पैदा किये बच्चों को वापस कोख में डालकर उसे पुनर्जन्म देना है. मेरी कशमकश को तनिक सहानुभूति से जांचो-परखो, अनिल! (अकस्मात बिजली गुल हो गयी. तीन बजे लिखने बैठा था. अब शायद पांच बजे हैं. विद्युत-मंडल की कटौती चल रही है. आजीवन चलती रहेगी.) लगता है अब तो बैटरी से चालित दो छोटी ट्यूबलाइटोंवाला चिराग खरीदना ही होगा. वरना यह कटौती तो मेरे पढ़ने-लिखने को काटती ही रहेगी. लेकिन कर्ज भी तो उतारना है. बोहरे का नहीं, मित्रों का ही. वे कभी तकादा नहीं करते.

करेंगे भी नहीं. इसलिए तो चिंता है. तपने से सोने में निखार आता है.अतएव जीवनभर परेशानियों की भरमार रही है. चलो, आर्थिक संकट का यह परोक्ष वरदान ही सही. दिन के चौबीस घंटों की अल्पावधि को सुनोयोजित करके इसी तरह बढ़ाया जा सकता है. तभी तो चालीस-बयालीस वर्षो से साढ़े तीन या पौने चार घंटे ही सोता हूं. इससे कम सोने पर झपकियां आने लगती हैं. खैर, यह शिकवा-शिकायत तो हर जिंदगी के साथ जुड़ी रहती है. सार्वजनकि रूप से रोने-धोन की बात शोभनीय नहीं लगती. मुस्कराने की चर्चा हो तो ठीक है. लिखते-पढ़ते समय सारे कष्ट संताप बिसर जाता हूं. दांत और अधरों के अलावा भीतर के हाड़-मांस, मज्जा, लहू और अंतड़ियों से मुस्कराता रहता हूं.    
(फिर प्रकाश ओझल) भयंकर खीज व झुंझलाहट हुई. छोटी-सी मोमबत्ती जला कर लिखने बैठा. सचमुच काम चल गया. अनिल तब तो दो मोटी मोमबत्तियों से बिजली की गरज पूरी हो सकती है. विश्वास रखो ‘फुलवाड़ी’ के अगले भागों में राजस्थान के प्रेमाख्यानों की सौरभ बिखेरूंगा. प्रेम के नये-नये फूल खिलाऊंगा. इसमें मेरी कलम काफी निष्णात है. वह तितली की नाई थिरकने लगती है.

इसलिए कि प्रेम के सिलसिले में असफल जो रहा हूं. उफ्फ तिरेपन वर्षो का सुदीर्घ इकतरफा यातायात! तुम तो जानते ही हो. छोड़ूं इस रामायण को.. अन्यथा राह भटक जाऊंगा. मोमबत्ती थोड़ी ही शेष रही है! सूर्योदय में मामूली वक्त बाकी है. काश! अजरुन के सखा कृष्ण मेरे लिए दो घड़ी पहले सूरज उदय कर दें, तो जयद्रथ के वध की बजाय, शब्दों में प्राण फूंकने के निमित्त ही गाण्डीव के बदले अपनी कलम चलाता रहूंगा. तब तक मोमबत्ती से सूरज की कमी पूरी हो रही है. मेरी कहानियों की तह में छिपे हुए ये अकिंचन आख्यान ही मेरे शब्दों की संजीवनी बूटी हैं.

24 December 2013

नौ वर्षों तक मिलजुल मन का शिल्प खोजती रही...

साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजी गयीं  मृदुला गर्ग ने  रचनात्मक साधना की राह पर लम्बी और सार्थक यात्रा की है. पिछले साल  प्रीति सिंह परिहार ने मृदुला गर्ग से उनके रचनात्मक सफ़र पर  लम्बी बातचीत की थी . यहाँ इस बातचीत को आत्मवक्तव्य में ढाला गया है. अखरावट 



साहित्य मुझे बचपन से ही बहुत आकर्षित करता रहा है. नौ साल की थी तबसे ही मैंने साहित्यिक किताबें पढ़ना शुरू कर दिया था. घर में सभी को साहित्य पढ़ने का शौक था, इसलिए मुझे भी आसानी से हर तरह की महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियां उपलब्ध थीं. मैंने बहुत छोटी उम्र में ही शरतचंद्र और बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय जैसे लेखकों की कृतियां पढ़ ली थीं.
लेकिन लेखन के बारे में तब कुछ सोचा नहीं था. हां, अपने आसपास के जीवन और स्थितियों को देखकर उन्हें व्यक्त करने की उथल-पुथल मन में जरूर चलती रहती थी. मैं साहित्य पढ़ती थी, लेकिन मैंने पढ़ाई अर्थशास्त्र से की और बाद में यही विषय पढ़ाने भी लगी. इसी बीच मेरी शादी हो गयी और मैं दिल्ली जैसे महानगर के माहौल से सीधे बिहार के एक छोटे से इंडस्ट्रियल कस्बे- डालमिया नगर आ गयी. यहां की जिंदगी बिलकुल अलग थी. आस-पास छोटे-छोटे गांव थे. गांव मैंने पहले भी देखे थे, लेकिन अक्सर गांव को लेकर हमारे दिमाग में एक तरह का नॉस्टेल्जिया होता है.
पर अब मैं गांव की विषम परिस्थितियों और व्याप्त शोषण को महसूस कर रही थी. यहां गरीबी, अकाल देखकर लगा कि इसे लिखना चाहिए. लेकिन कैसे? इन सब चीजों का उस अर्थशास्त्र से खास सामंजस्य बैठता नहीं था जो हमें तब साठ के दशक में पढ़ाया गया था. शुरू में मैंने अर्थशास्त्रीय विषयों पर लेख लिखे तब भी कहा गया कि ये लेख साहित्यिक ज्यादा लगते हैं. फिर लगा मैं जो कहना चाहती हूं वह साहित्यिक तरीके से ही व्यक्त हो सकता है, कहानी या उपन्यास के जरिए.
अब इसके लिए मुझे पात्र चाहिए थे, जिससे मैं समाज का बाह्य स्वरूप लिखकर ना रह जाऊं. लोगों के आंतरिक और व्यैक्तिक जीवन को पूरे भावनात्मक आलोड़न के साथ व्यक्त करूं. इसके साथ ही घर-परिवार भी आगे बढ़ रहा था. बच्चों के जन्म के बाद मेरी रचनात्मक ऊर्जा बहुत तेजी से विकसित हुई. बीत चुके जीवन से मेरा जुड़ाव शुरू हुआ. हमारे समय के मूल्य और व्यवस्थाओं से आमना-सामना हुआ. उनसे प्रेरणा मिली और पात्र भी.
मैंने छोटे बच्चों के रहते लेखन शुरू किया गुंजान माहौल में. इसी दौरान मैं बिहार से कर्नाटक की एक छोटी सी जगह बागलकोट आ गयी. यह तब इतना पिछड़ा इलाका था कि यहां स्कूल तक नहीं था. मैंने बागलकोट में अंगरेजी, हिंदी और कन्नड़ भाषा का एक स्कूल शुरू किया. स्कूल के लिए बहुत जद्दोजहद कर शिक्षक और प्रिंसिपल इकठ्ठा किये. यह मेरी जिंदगी का बहुत अहम पड़ाव था. मैं बच्चों को सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ने लगी. इसी क्रम में स्कूल में मैंने मिड समर नाइट ड्रीम नाटक का मंचन कराया. नाटक में एक छोटे से बच्चे का अभिनय अभिभूत करने वाला था. उसे देखकर मुझे लगा कि हर इंसान के भीतर रचनात्मक ऊर्जा होती है.
इस एहसास के साथ मेरे भीतर भी रचनात्मक ऊर्जा विकसित होती रही. स्कूल और घर की व्यस्तता के बाद जो वक्त मिलता, मैं लिखने बैठ जाती थी. मुझे लगता है कि लिखने के लिए एक खास क्षण में जेहन में उभर रहे जुनून की बड़ी भूमिका होती है. कई बार आपके पास बहुत वक्त होता है, लेकिन आप लिख नहीं पाते. लेकिन, कई बार बहुत व्यस्तता के बाद भी समय चुराकर, रात भर जागकर भी आप लिखते हैं. मेरे साथ भी ऐसा ही होता है. मैं अपनी ज्यादातर कहानियां एक बैठक में ही पूरी करती हूं. मेरी ऐसी ही एक बहुत लंबी कहानी है कितनी कैदें. इसे मैंने एक रात के सफर में ट्रेन में लिखा था.
कई बार ऐसा होता है कि अरसे से दिमाग में खदबदा रही कहानी किसी उत्प्रेरक क्षण में सामने आकर खड़ी हो जाती है और मैं लिखने से खुद को रोक नहीं पाती. तब सबकुछ से वक्त चुराकर लिखना पड़ता है. लेकिन सबसे अधिक लेखन मैंने गर्मियों के दिनों में किया. इसलिए नहीं की मुझे यह मौसम पसंद है, बल्कि इसलिए क्योंकि इस समय बच्चों की परीक्षाएं हो जाती थीं और मेहमान भी बहुत कम आते थे. ऐसे में दिल्ली की गर्मी में बस एक कूलर मिल जाए और थोड़ा सा एकांत. वैसे मुझे बारिश बहुत उद्वेलित करती है. अपनी कहानी मीरा नाची मैंने बहुत तेज बारिश के दौरान बालकनी में बैठकर लिखी.
कई बार कुछ लिख लेने के बाद एक खालीपन के साथ बहुत सारा सुकून भी होता है और तब लगता है कि जिंदगी बस यहीं खत्म हो जाए, अब कोई तमन्ना बाकी नहीं. मीरा नाची शहर के नाम और डेफोडिल जल रहे हैं लिखने के बाद मैं इस अहसास से गुजरी. लेकिन उपन्यास पूरा होने के बाद मैं अकसर खालीपन और उदासी से घिर जाती हूं. ऐसा लगता है अपना जो कुछ बहुत निजी था, वह क्यों दे दिया. फिर इस मनोस्थिति से उबरने में वक्त लगता है. जरूरी नहीं की आपकी रचना पूरी होकर आपको संतोष ही दे. कहानी लिखने के बाद दर्द से छुटकारा मिलने जैसी अनुभूति होती है, लेकिन उपन्यास में अपना सबकुछ खो जाने का भाव होता है.
मैं कभी कोई योजना बनाकर, नोट्स लेकर नहीं लिखती. एक धुंधला सा ख्याल मन में चलता रहता है. पता भी नहीं होता कि वह लिखा जायेगा भी कि नहीं. लेकिन किसी एक उत्प्रेरक क्षण में वह धुंध मिट जाती है और सबकुछ साफ दिखायी देने लगता है. तब रचना शब्दाकार लेने लगती है. चितकोबरा उपन्यास मैंने 26 दिन में लिखा और यह 26 अध्याय में है. इसे बीच से भी पढ़ेंगे तो अधूरा नहीं लगेगा. लिखने के बाद मैंने इसे आरोह-अवरोह के क्रम में जमाया. इसमें एक स्त्री के प्रेम की कहानी है जहां सेक्स वजिर्त नहीं है.
लेकिन यह उपन्यास बहुत से गलत कारणों से चर्चा में रहा. इसे लेकर बेवजह का हल्ला मचाया गया जबकि मैंने इसमें एक स्त्री के शरीर और आत्मा से संबंधित विचारों को व्यक्त किया है. दरअसल, स्त्री की संरचना में द्वैत होता है- शरीर और दिमाग के बीच. मैं इसमें एक ऐसी प्रेम कथा कह रही थी जिसमें प्रेम पैशन था और विचार भी. एक ऐसी औरत की कथा जो भावप्रवण भी है और बहुत प्रज्ञावान भी. उसी प्रज्ञा और भावावेग के साथ 26 दिनों तक सुबह 4 बजे से 6 बजे तक मैं नियमित रूप से लिखती रही थी. 
रचना की प्रक्रिया जीवन के साथ हर पल चलती रहती है. मैं जब लिखना शुरू करती हूं, तो वह शुरुआत नहीं अंत होता है. मेरी रचना प्रक्रिया का पहला और शुरुआती हिस्सा शिल्प की खोज है. सोच और एहसास को शब्दों मे ढालने का सिलसिला रचना प्रक्रिया का अंतिम चरण होता है. यह अंतिम चरण कुछ घंटों में या कभी साल, डेढ़ साल में पूरा हो जाता है लेकिन इसके पूर्वार्ध में यानी शिल्प के जन्म में कितना समय लगेगा, कहा नहीं जा सकता.
मेरे उपन्यास ‘मिलजुल मन’ को लिखने का ऐलान मैंने 1998 में कर दिया था, लेकिन 9 साल तक इसका शिल्प नहीं सूझा.अचानक एक रात मुझे इसका शिल्प मिल गया. इसके बाद डेढ़ साल में यह उपन्यास पूरा हो गया. शिल्प किसी दबाव में या बहुत खोजने पर नहीं मिलता, कभी भी अचानक मिल जाता है. कई बार तेज बुखार में भी. मैंने अपनी कहानी ‘डेफोडिल जल रहे हैं तेज बुखार में लिखी है. मैंने बहुत भीड़ और गुंजान माहौल के बीच रहते हुए भी खुद को उससे काटकर अपना एकांत बनाया है और उसमें लिखा है.मेरा पहला ड्राफ्ट ही अंतिम होता है. इसके बाद उसे सिर्फ प्रूफ के लिहाज से ही पढ़ती हूं.
मैंने लेखन बहुत देर से शुरू किया और उसके बाद तेज रफ्तार में लिखती चली गयी. बाद में थोड़ा अंतराल आया, लेकिन ऐसा अंतराल कभी नहीं रहा कि लेखन में बाधक बन सके. जब उपन्यास नहीं लिख रही होती, तो लेख, कॉलम और कहानियां लिखती रही. यह बिलकुल ऐसे था जैसे पहाड़ी नदी मैदान में उतर आती है, तो धीरे चलने लगती है.
इन दिनों मेरा कुछ कहानियां लिखने का मन है और एक उपन्यास भी बहुत धुंधला सा है जेहन में. जिंदगी रही तो उसे भी लिख सकूंगी. फिलहाल जल्द ही पाठकों के सामने मेरी नयी कहानियां होंगी.
प्रीति सिंह परिहार युवा पत्रकार हैं. 

18 December 2013

एक छाया चेहरे से गुजरी जैसे पत्ता खड़का हो

हिंदी समय डॉट कॉम पर मृदुला जी के अज्ञेय पर लिखे इस संस्मरण पर नजर पड़ी. यह संस्मरण सिर्फ अज्ञेय के बारे में नहीं, मृदुला गर्ग के बारे में भी काफी कुछ कहता है. : अखरावट


अज्ञेय से मेरी पहली मुलाकात 1974 में हुई, जब मेरी बहिन मंजुल भगत का पहला कहानी संग्रह गुलमोहर के गुच्छे भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ। मैं दस बरस दिल्ली से बाहर रहने के बाद, तभी वापस लौटी थी। 1970-71 में हम दोनों ने, करीब-करीब एक साथ, लेखन शुरू किया था। मेरी तब तक कोई पुस्तक छपी न थी।

मंजुल की पहली किताब के प्रकाशन की खुशी में सप्रू हाउस में चायपान था। लगे हाथों दो-चार लेखक-आलोचक किताब पर बातचीत भी करनेवाले थे। एक दिन, अचानक, मंजुल मेरे घर आईं और बोलीं, 'मजा तब आए जब जलसे में अज्ञेय आएँ।' मैंने कहा, 'बुला लेते हैं।'

आप समझ गए होंगे, हम हिंदी साहित्य के राजनीतिक शिष्टाचार से किस कदर अनभिज्ञ थीं। अलबत्ता अज्ञेय के साहित्य से नहीं। ख़ूब पढ़ा था उन्हें। उन दिनों, अज्ञेय हिंदी साहित्य गगन पर सूर्य की तरह देदीप्यमान थे। पर चूँकि मंजुल ने एम.ए अंग्रेजी में नाम लिखवाया था, डिग्री भले न ली हो और मैंने एम.ए करके तीन साल अर्थशास्त्र पढ़ाया था, हमें हिंदी जगत के सोपानतंत्र और चरण-स्पर्शीय शिष्टाचार की आदत न थी। मिरांडा हाउस और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में, नामी-गिरामी प्रोफेसरों और अर्थशास्त्रियों से हम बराबरी के दर्जे पर बहस करते रहे थे। घर का संस्कार भी बौद्धिक और उदार था, हर उम्र का सदस्य अपनी राय देने को सर्वथा स्वतंत्र था। दरअसल पिता जी का अज्ञेय से अच्छा परिचय था पर उन्होंने उनसे बात करने से इन्कार कर दिया। कहा, हम दोनों से अपना रिश्ता वे तभी जाहिर करेंगे जब वे हमारे पिता की तरह जाने जा सकें, हम उनकी बेटियों की तरह नहीं। तकदीर हमारी, ऐसे नैतिक जन हमारी ही किस्मत में लिखे थे!

हमने तय किया, अज्ञेय को फोन करके जलसे में आमंत्रित किया जाए। फिर हमने काल्पनिक सिक्का उछाला, जो हमेशा की तरह, मेरे विपरीत पड़ा। यानी फोन करने का जिम्मा मेरा हुआ। फोन मिलाया गया, अज्ञेय ने खुद उठाया या उन्हें दिया गया, याद नहीं। मैंने कहा, 'वात्स्यायन जी, मेरा नाम मृदुला गर्ग है, आप मुझे नहीं जानते। मेरी बड़ी बहिन हैं, मंजुल भगत, उन्हें भी आप नहीं जानते। उनकी पहली किताब गुलमोहर के गुच्छे छप कर आई है। उस खुशी में हम फलाँ तारीख को फलाँ वक्त सप्रू हाउस में चायपान कर रहे हैं, आप आइए।'

पूछा गया, किताब कहाँ से छपी थी। मैंने बतलाया, भारतीय ज्ञानपीठ से।

तब मंजुल ने मेरे हाथ से फोन ले लिया और बोलीं, 'यह वही भारतीय ज्ञानपीठ है जिसने सुमित्रानन्दन पंत को पुरस्कार दिया था।'

वात्स्यायन जी ने कहा,'समझ रहा हूँ पर पुस्तक मेरे पास आई नहीं।'

'ओहो, हम आ कर दे जाते हैं। बंगाली मार्केट से आपके घर कौन-से नंबर की बस आती है?'

'रहने दीजिए,' अज्ञेय ने कहा और फोन कट गया।

मैंने कहा,'अजीब अहमक है तू। उनसे बस का नंबर पूछने की क्या जरूरत थी। हम खुद पता कर लेते।'

वह बोली, 'तू कौन कम बेवकूफ है। मैं मृदुला गर्ग हूँ, आप मुझे नहीं जानते, वह मंजुल भगत है, आप उसे नहीं जानते… ऐसे भला कोई आता है।'

हमने तय पाया कि अज्ञेय नहीं आएँगे।

पर वे आए। सबसे पहले आए। देर तक रहे। किताब देखी, शायद एक कहानी पढ़ भी डाली, बोले, 'ऐसी बहिनों को देखने का मोह कैसे छोड़ता, जो अपनी पुस्तक की खुशी खुद मना रही हों।'

मंजुल ने दबे स्वर में मुझसे कहा, 'यह तो ऐसे है कि कोई पूछे, आप अपने जूते खुद पॉलिश करते हैं तो जनाब कहें, आप किसके करते हैं?' यानी हम बौड़म समझ नहीं पाए कि अपनी किताब की खुशी खुद क्यों नहीं मनाई जा सकती।

उनसे नहीं कहा तो उनके व्यक्तित्व के प्रभामण्डल के दबाव में। यह वह जमाना था जब रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद किसी लेखक की सदेह छवि मोहित करती थी तो अज्ञेय की। अपनी छवि की तराश में वे सजग-सतर्क थे। एक शब्द में कहना हो तो उस छवि को यही नाम दूँगी, तराश। तराशी हुई दाढ़ी, तराश के साथ इस्तरी किया लिबास, तराशा-सधा स्वर, तराशे हुए तेवर। तराशा रचनाकर्म और चिंतन। तराशी हुई आत्मकथा यानी शेखर एक जीवनी। तराशी यायावरी। तराशा प्रेम, कई बार या एक बार भी नहीं? वैसा ही अहम्। दूसरे के अहम् को तराश कर बौना बनाने का माद्दा। साधारण को तराश कर सानुपातिक कर डालने का भी। उनके व्याख्यानों से बढ़ कर मेरे लिए धरोहर उनका वह तेवर है, जिसके चलते वे किसी के आगे झुकते न थे। एक गोष्ठी में पोलैंड के विख्यात हिंदी अध्येता, स्मेकल साहेब ने हिंदीवालों को शुद्ध हिंदी न बोलने पर धिक्कारा। अज्ञेय ने निहायत संयमित स्वर में विरोध जतलाते हुए कहा, हमारी भाषा है, हम जैसे चाहें बोलें; हम निरंतर उसे परिवर्तित करते हैं, करना चाहिए। एक प्रगतिशील गोष्ठी में इसलिए बोलने से इन्कार कर दिया, क्योंकि उनके हिसाब से, विचार-विमर्श का स्तर बचकाना था। खूब मनाने पर भी नहीं माने, उठ कर चले गए। जबकि बाकी दिग्गज, मान-मनौवल का खेल खेलने के बाद, देर तक बोलने पर राजी हो गए।

अज्ञेय अपनी संजीदगी और दीर्घ मौन के लिए मशहूर थे। यह हमारा सौभाग्य था कि हमने उन्हें पहले-पहल मुस्कराते, हँसते, मजाक करते देखा। यहाँ तनिक संशोधन जरूरी है। आमने-सामने भले उस दिन पहली बार देखा था पर दूर से उनकी सुस्मित, खिलंदड़ी छवि के साक्षी काफी अर्से से रहे थे। यकीन के लिए यह जानना काफी है कि हम मीरांडा हाउस में उन दिनों पढ़े थे, जब कपिला मलिक (वात्स्यायन) वहाँ अंग्रेजी पढ़ाती थीं और वात्स्यायन जी का उनसे प्रेमयोग चल रहा था। अब अज्ञेय की गुरु गंभीर छवि को देखते हुए, 'अफेयर' तो कहा नहीं जा सकता! कपिला जी पूरे मिरांडा हाउस की लाडली बेटी थीं। वात्स्यायनी से उनका विवाह हुआ तो लगा हमीं ने बेटी विदा की। उनकी आशिकी और शख्सियत की कशिश वात्स्यायन के उपन्यास नदी के द्वीप में बखूबी महसूस की। कोई कितना 'अज्ञेय' क्यों न हो, आशिकी के सफर के दौरान बे-मुस्कराए कैसे रह सकता है? लिहाजा हमने दूर से जब उन्हें देखा तो दमकती मुस्कान लिए। कपिला जी से उनका संबंध-विच्छेद हुआ तो उसका दुख, हमने अपनी रगों में महसूस किया। यह बात और है कि इला जी से भी हमारा परिचय था और वे हमें भाती भी खूब थीं। शिशु के लिए उनकी उद्दाम अतृप्त लालसा के भी हम साक्षी रहे। पर वह अवांतर प्रसंग है।

वापस कवि से पहली सदेह मुलाकात पर आया जाए। कुछ न कह कर, बहुत कुछ कह गए थे उस दिन अज्ञेय! हमें ईमानदारी का अमूल्य सबक सिखला दिया था या समझिए कि पिता जी की सीख पर मुहर लगा दी थी। उस बेलौस ईमानदारी की वजह से, आगे चल कर, हमने तरह-तरह के अन्याय सहे पर ईमानदारी नहीं छोड़ी। चाय के दौरान उनका पिता जी से मिलना भी हो गया और उनके यह कहने से कि, 'तो आप इन के पिता हैं,' हमारे हाथ लॉटरी लग गई। पिता जी सार्वजनिक रूप से हमारे पिता तजवीज हो गए!

अज्ञेय के कहे का निहितार्थ समझने में हमें देर नहीं लगी थी। हिंदी साहित्य जगत में ईमानदारी से अपनी भावनाएँ प्रकट करने का रिवाज नहीं था। हर लेखक अजब दार्शनिक या गुस्सैल मुद्रा अपनाए घूमता था, जैसे सहित्य का जनाजा कंधों पर उठाए हो। प्रेम, कला, शिल्प, वैयक्तिक अस्मिता, रस आदि तिरस्कार और उपेक्षा के भाव थे, बल्कि यूँ समझिए कि 'भाव' ही तिरस्कृत था। घोषित प्रगतिशील, पत्नी के निःस्वार्थ प्रेम का भरपूर मज़ा लेते हुए, 'प्रेम' को नकारते थे। अफीम खाने से परहेज न था पर धर्म को अफीम कह कर धिक्कारते थे। मेहनताने का चेक मिलने पर उसे भुना, शराब पीना प्रगतिशीलता थी पर बच्चों के लिए मिठाई खरीदना, उच्चवर्गीय प्रतिक्रियावाद। छोटी दीवाली पर हुई रेडियो रिकार्डिंग के बाद, मैं इस 'व्यापार' की भुक्तभोगी रही थी। धुरंधर से धुरंधर लेखक, कलम हाथ में थामे, इंतजार करने पर मजबूर था कि शिल्प सूझे तो विचार की धारा को रचनात्मक कृति बनाए पर शिल्प के अदम्य अकर्षण को, पाश्चात्य अनुकरण बतला कर, लांछित करने से, बाज नहीं आता था। भूल जाता था कि मार्क्सवाद स्वयं धुर पाश्चात्य फलसफा है या कला और सौंदर्यबोध को कोस कर, वह मार्क्स के अपूर्व भाषा ज्ञान और कलात्मक शिल्प को तिरस्कृत कर रहा था।

ऐसे माहौल में भाषा और शिल्प के अदभुत चितेरे अज्ञेय का कला के प्रति समर्पित बने रह कर, साहित्यिक बिरादरी का सम्मान जीतना, चमत्कार से कम न था। अनेक गोष्ठियों में उन्हें ईमानदारी और साहस के साथ अपने नितांत मौलिक चिंतन को शब्द देते सुन चुकी थी। दिनमान के संपादक रहते, उन्होंने प्राग,वारसॉ जैसे अंग्रेजों के दिए उच्चारण को छोड़, यूरोप के शहरों के मूल नाम, प्राहा, वरसावा आदि लिखना शुरु किया था। अफसोस, हमारी उपनिवेशवादी मानसिकता, सच्चाई हजम न कर पाई और उनके जाने के बाद, हम अंग्रेजियत पर लौट आए। पर मुझे लगता है आगे चल कर, कोलकाता, मुंबई आदि नामकरण, उन्हीं के डाले बीज से पनपे थे।

उस पहली मुलाकात के बाद, अज्ञेय से गोष्ठियों में मिलना होता रहा पर साक्षात अकेले मिलना, छह बरस बाद तब हुआ, जब 1980 में, मेरा चौथा उपन्यास अनित्य छपा। पहला उपन्यास 1975 में छपा था पर मंजुलवाला वाकया दुहराने का मौक़ा न था। दुहराव में तिलिस्म नहीं होता। यूँ भी, प्रकाशक द्वारा आयोजित गोष्ठी में, बतौर अध्यक्ष, जैनेंद्र जी आए थे। जैनेंद्र और अज्ञेय के बीच तनातनी अर्से से चल रही थी। सुना था जैनेंद्र ने कहीं अज्ञेय का परिचय अपने अनुवादक की तरह दे डाला था, जिससे जाहिर है, तनातनी और बढ़ गई थी। वात्स्यायन को जैनेंद्र का दिया 'अज्ञेय' उपनाम ही पसंद न था। अपनी नापसंदगी वे छुपाते न थे पर अचरज, उपनाम का प्रयोग करते जाने से भी एतराज न था। दरअसल यह इस बात का सबूत था कि वात्स्यायन नाम का कवि, धरती के ऊपर नहीं, धरती पर विचरनेवाला जीव था। मानवीय गुण-दोष संपूर्त।

धरती को अगर प्रकृति या पर्यावरण का पर्याय मानें तो अज्ञेय से ज़्यादा कौन था था धरती का? पत्ते-पत्ते में उनकी गहरी काव्यात्मक ही नहीं, दार्शनिक रुचि थी। वैज्ञानिक जानकारी भी कम न थी। कौन-सी वनस्पति कब-कहाँ उगी, किस जैविक तर्क के तहत पनपी, किस-किस तरह हरियाई और नष्ट हुई, उनसे ज्यादा किसी कवि ने न जाना, न जानने की कोशिश की। प्रकृति का नैसर्गिक संगीत उनके लेखन में यूँ तरंगित था कि उसकी सौंदर्यानुभूति ही नहीं, उस में निहित गहन चिंतन भी, प्रकृति के विलक्षण तर्क से प्रेरित होता था। यही कारण था कि उनके अतुल्य और विपुल गद्य साहित्य के बावजूद, अंततः उनके नाम के साथ 'कवि' शब्द उपनाम की तरह जुड़ा, जैसे रवींद्रनाथ ठाकुर के साथ 'कविवर गुरुदेव' या शेक्सपीयर के साथ 'द बार्ड'।

1980 में तमिल लेखक पोट्टेकट को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था। उस उपलक्ष्य में शाम के चायपान में मंजुल और मेरी मुलाकात, अज्ञेय और पोट्टेकट से एक साथ हुई। चित्र खींचे जा रहे थे। पता नहीं अज्ञेय को क्या सूझा कि मंद स्मित के साथ, मंजुल और मेरे एक तरफ खड़े हो गए, पोट्टेकट को दूसरी तरफ खड़े होने को इशारा करके बोले, 'हम इनके द्वारपाल हो जाएँ।' यह हँसी- मजाक कितना दुर्लभ था, मैंने बाद में समझा। वहीं उन्होंने मुझे बतलाया कि किसी पत्रिका में मेरे उपन्यास की समीक्षा निकली थी, कहा, 'बड़ी तारीफ की है आपकी।', फिर जोड़ा, 'घर आएँ तो बात हो सकती है।' मुझ कूढ़मग्ज़ की समझ में भी आ गया कि उपन्यास उहोंने पढ़ लिया है।

मैं तिपहिया ले कर, केवेंटर ईस्ट, उनके बँगले पर पहुँची; तय वक्त से पाँच मिनट बाद। शहर के शहरीपन की कैद से छूटा, गजब इलाका था। घर था कि मिल कर नहीं दे रहा था। मैं वक्त की पाबंदी का सबक घुट्टी में पिए थी, लिहाजा तिपहिए से उतरते ही, आकुल स्वर में, देर से आने के लिए माफी माँगी। उनके चेहरे पर मुस्कान-सी छलकी, एक भौंह ने हरकत की और वे बोले, 'आइए'। मुझे लगा, सिर्फ पाँच मिनट की देरी के लिए क्षमा माँगना उन्हें भाया है। जहाँ तक मुझे याद है, रमेशचंद्र शाह तथा कुछ अन्य जन बाहर बरामदे में थे। अज्ञेय मुझे सीधे बैठक में ले गए। सबसे पहले जो उन्होंने कहा, उससे अचरज भी हुआ और उनकी छवि की तराश भी बिगड़ी। कहा कि मेरे पिछले उपन्यास चित्तकोबरा पर सारिका में बहस पढ़ी थी पर उपन्यास नहीं। अनित्य पढने के बादचित्तकोबरा मँगा कर पढ़ी। चकित, मैं सोच रही थी, अगर अज्ञेय जैसा मनमौजी और दबंग व्यक्ति, सारिका की फूहड़ टिप्पणियों से प्रभावित हो, चित्तकोबरा पढ़ने से परहेज कर सकता था तो आम जन का क्या हाल हुआ होगा? तब तक चुप्पी का पाठ हृदयंगम कर लिया था, सो अपनी भवों को तनिक ऊपर उठा, सम पर ले आई पर कुछ कहा नहीं। अज्ञेय ने क्षणांश को मुझे ताका। एक छाया चेहरे पर थिरक कर गुजर गई, जैसे पत्ता खड़का हो। फिर वे अनित्य पर बात करने लगे। बहुत बातें हुईं, दुहराना बेकार है, कोई गवाह है नहीं। कुछ दिन पहले चंद्रकांत बांदिवडेकर ने मुझसे कहा कि अनित्य अज्ञेय को पसन्द आया था पर उसका भी कोई गवाह नहीं है, सो आपका मानना, न मानना, दोनों उचित होंगे। हाँ, उस बातचीत में एक दिलचस्प प्रसंग था, जिसे बाँटना चाहती हूँ। स्मृति में अटका है, ज्यों का त्यों।

उपन्यास के अनित्य नामक पात्र के बारे में उन्होंने कहा कि कैसा मोहभंग है उसका जब वह बार-बार लौट आता है। प्रतिवाद में मैंने कहा, 'यही तो अंतर है यायावर और संन्यासी में। संन्यासी जाता है तो लौटता नहीं, यायावर लौट-लौट आता है। तभी तो यायावर कहलाता है, नहीं?'

यायावरी के विशेषज्ञ अज्ञेय से वह कहना, गुरु-शिष्य परंपरा के दरबार में गुस्ताखी ही मानी जाएगी। पर मुझे आदत थी, डाक्टर वी.के.आर.वी राव और के. एन. राज जैसे दिग्गज गुरुओं से बहस करने की। सो निःसंकोच अपना मत दे डाला। उन्होंने उत्तर नहीं दिया। न विरोध, न अनुमोदन; बस इस बार पत्ता जरा जोर से खड़का। एक सुरमुई छाया चेहरे से हो कर गुजरी और कमरे में मौन पसर गया। चुप्पी खिंचती गई। उनकी चुप्पी की दीर्घता से मैं स्वयं परिचित न थी पर उसका बखान पर्याप्त सुन रखा था, इसलिए कुछ देर बाद उठ खड़ी हुई, कहा, 'नमस्कार।'

'जाएँगी?' वे बोले। एक बार फिर, चेहरे पर छाया लहराई पर वह पहली छाया से कुछ अलग थी।' बैठिए,' उन्होंने कहा,' इला नाश्ता ला रही हैं।' किसी अदृश्य संगत के अंतर्गत, इला जी व नाश्ते की ट्रे लिए सेवक तुरंत उपस्थित हो गए। मैं बैठ गई। और कर भी क्या सकती थी! सोचा, मुझे इला जी के पास छोड़, अज्ञेय बाहर चले जाएँगे पर वे गए नहीं। कुछ औपचारिक बातचीत के बाद, पता नहीं क्यों, इला जी और मेरे बीच, लेखक के अहम् पर बात चल निकली। चोट खाए थी, शायद इसलिए मेरे मुँह से निकला,'लेखक में अहंकार तो होता ही है।' इस बार अज्ञेय के चेहरे को जिस छाया ने धूमिल किया, वह गुजरी नहीं, टिकी रही। मैंने तुरंत संशोधन किया, 'अहंकार नहीं, अहम् कहना चाहिए था।' छाया हट गई। फिर जाने मुझे क्या सूझा कि, आ बैल मुझे मार की तर्ज पर, उनकी आँखों में आँखें डाल कर कहा, 'वैसे व्यeवहारिक अंतक दोनों में है नहीं।' कहने के साथ, अपना पर्स उठा, चलने की तैयारी भी कर ली। सोचा इस बार उनके चेहरे पर जो उभरेगा, देर तक झेला न जाएगा। पर हुआ यह कि माथे पर शिकन आते-आते बिला गई और वे मुस्करा दे। मेरा मंतव्य समझ, मेरे ही अस्त्र से मुझे परास्त कर दिया। मैं नतमस्तक हुई।

एक बात और। उनके पिचहत्तरवे जन्म दिवस पर कई समारोह हुए थे। उन्हीं में से एक में आपसी बातचीत में उन्होंने कहा था, हमारे यहाँ, 75 नहीं, 77 वर्ष और 77 दिन की आयु महत्वपूर्ण है। पता नहीं क्यों, मैंने, जिसने कभी डायरी नहीं रखी, हाथ की पुस्तिका में यह दर्ज कर लिया। उनकी मृत्यु हुई तो वह कथन याद आया। उस पड़ाव पर वे पहुँचे नहीं थे। यह लेख लिखते हुए पुस्तिका खोजने का प्रयास तक मैंने नहीं किया। इतनी प्रिय वस्तुएँ नष्ट हो चुकीं कि वह भी बिला गई होगी कहीं। खोजने का मन नहीं है, याददाश्त काफी है। सबूत न होने पर भी गलत नहीं हूँगी, क्योंकि यह बात मेरे सपने में आ सकने वाली है नहीं।

यहाँ कमलनी खिलती है

वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजने का फैसला अकादमी के देर आयद पर दुरुस्त आयद की परंपरा के अनुकूल ही है. फिलहाल पढ़ते हैं उनकी एक कहानी. "यहाँ कमलनी खिलती है". : अखरावट  


वीराने में दो औरतें मौन बैठी थीं। पास-पास नहीं, दूर; अलग, दो छोरों पर असम्पृक्त। एक नजर देख कर ही पता चल जाता था कि उनका आपस में कोई सम्बन्ध न था; वे देश के दो ध्रुवों पर वास करने वाली औरतें थीं।
एक औरत सूती सफ़ेद साड़ी में लिपटी थी। पूरी की पूरी सफ़ेद; रंग के नाम पर न छापा, न किनारा, न पल्लू। साड़ी थी एकदम कोरी धवल, पर अहसास, उजाले का नहीं, बेरंग होने का जगाती थी। मैली-कुचैली या फिड्डी-धूसर नहीं थी। मोटी-झोटी भी नहीं, महीन बेहतरीन बुनी-कती थी जैसी मध्य वर्ग की उम्रदराज़ शहरी औरतें आम तौर पर पहनती हैं। हाँ, थी मुसी-तुसी। जैसे पहनी नहीं, बदन पर लपेटी भर हो। बेख़याली में आदतन खुँसी पटलियाँ, कन्धे पर फिंका पल्लू और साड़ी के साथ ख़ुद को भूल चुकी औरत। बदन पर कोई ज़ेवर न था, न चेहरे पर तनिक-सा प्रसाधन, माथे पर बिन्दी तक नहीं। वीराने में बने एक मझोले अहाते के भीतर बैठी थी वह। चारों तरफ से खुला, बिला दरोदीवार, गाँव के चौपाल जैसा, खपरैल से ढका गोल अहाता।
दरअसल, वीराना वीरान था भी और नहीं भी। दो बीघा जमीन का टुकड़ा, दो फुट ऊँची चाहरदीवारी से घिरा था। दीवार इंसान की बनाई हुई थी, इसलिए उसे वीराने का हिस्सा नहीं माना जा सकता था। पर उसकी गढ़न स्त्री की साड़ी जैसी बेरंग-बेतरतीब थी; यूँ कि उसका होना-न होना बेमानी था। वह बस थी; पेड़-पत्तों से महरूम, उस खारी धरती की निर्जन सारहीनता को बाँध, कम करने के बजाय बढ़ा रही थी। उस जमीन को घेरते वक्त, घेरने वाले का इरादा, उसे आबाद करने का नहीं था। दिल की वीरानी को हरदम रौंदते यादों के काफिले को जीते-जीते, बाक़ी की जिंन्दगी जीने की कूवत पैदा करने के लिए, जिस एकान्त की जरूरत होती है, उसी को निजी बनाने की कोशिश थी। कभी-कभी सुकून पाने को वीराने में ही ठौर बनाना पड़ता है; वैसा ही ठौर था वह मझोला छाजन।
पर अचरज, इंसानों को बसाने का जज्बा भले न रहा हो, फूलते-फलते पेड़ लगाने का इरादा जरूर था। इरादा कि उम्मीद! जिद या दीवानगी! जो था, कारगर न हुआ। धरती में खार की पहुँच इतनी गहरी थी और निकास के अभाव में, बरसात के ठहरे पानी की मियाद इतनी लम्बी कि पेड़ों का उगना, मुश्किल ही नहीं, करीब-करीब नामुमकिन था। कुछ झाऊं और कीकर जरूर उग आते थे जब-तब। पर जब और तब के बीच का फासला इतना कम होता कि पता न चलता, कब थे कब नहीं। उगते, हरसाते, ललचाते और मुक्ति पा जाते। जब पहले-पहल, पहला झाऊं उगा तो बड़ी पुख्तगी के साथ इरादा, उम्मीद बना कि बस अब वह भरे भले नहीं पर जंगली पेड़ वहाँ हरे जरूर होंगे। और उसके एकाध साल बाद, जमीन ममतामयी हुई तो फलदार पेड़ भी उग सकेंगे। झाऊं के बाद कीकर उगे तो उम्मीद भी उमगती चली गई, अंकुर से पौध बनती। सरदी पड़ने पर कीकर पीले पड़ कर सूख गये; झाऊं भी गिनती के दस-बीस बचे। तब भी उम्मीद ने दम न तोड़ा। लगा इस बरस पाला ज्यादा पड़ गया, अगली बार सब ठीक हो जाएगा। जब अगले बरस भी सिलसिला वही रहा तो धीरे-धीरे, जंगली पौधों के पेड़ बनने से पहले गलने-सूखने के साथ, उम्मीद क्या, ज़िद तक दम तोड़ गई।
दूसरी औरत छाजन के बाहर, चहारदीवारी के भीतर बैठी थी, हैंड पम्प के पास। फिसड्डी, पैबन्द लगी कुर्ती और ढीली सलवार पहने थी। अर्सा पहले जब नया जोड़ा बना था तो रंग ठीक क्या रहा होगा, कहा नहीं जा सकता था। और जो हो, सफेद वह कभी नहीं था। मैला-कुचैला या बेतरतीब फिंका हुआ अब भी नहीं। दुरुस्त न सही चुस्त जरूर था, देह पर सुशोभित। सीधी तनी थी उसकी मेहनतकश देह, उतनी ही जितनी पहली की दुखी-झुकी-लुकी। ज़ाहिर था वह निम्न से निम्नतर वर्ग की औरत थी। गाँव की वह औरत, जो दूसरों के खेतों पर फी रोज मजदूरी करके एक दिन की रोज़ी-रोटी का जुगाड़ करती है पर खुदकाश्त जमीन न होने पर भी रहती किसान है। जमीन से जुड़ाव में; अपनी भाव-भंगिमा में। वह इस ऊसर धरती के साथ पली-बढ़ी थी। उसे उपजाऊ से खार होते देखा था। कोई नहर बनाई थी सरकार ने। पर पानी के निकास का सही बन्दोबस्त न होने पर खार इधर के खेतों की तरफ दौड़ा था और हरियल धरती को कल्लर बना कर छोड़ा था। आदमकद पेड़ उगाने की न उसने कभी उम्मीद की, न किसी और ने जिद। उसने आस लगाई तो बस कमतर श्रेणी का धान उगाने वाले खेतिहरों की फसल की बुवाई-कटाई की, जो कमोबेश पूरी होती रही, दो-एक सालों के फासले पर। जब सूखा पड़ता और फसल सिरे से गायब हो जाती तो सरकार राहत के लिए जहाँ सड़क-पुल बनाती, वहीं मजूरी करने चली जाती। जिस दिन मजूरी नहीं, उस दिन कमाई नहीं; रोटी नहीं। बिला काम-धाम, आराम से बैठने की उसे आदत न थी। सोने और जागने के बीच सिर्फ काम का फासला जानती थी, इसलिए चन्द मिनट बेकार क्या बैठी, आप से आप आँखें मुँद गईं। इतनी गहरी सोई कि ओढ़नी बदन से हट, सिर पर टिकी रह गई। निस्पंद बैठे हुए भी उसकी देह जिंदगी की थिरकन का भास देती रही। साँस का आना-जाना, छाती का उठना-गिरना, मानो उसकी रूहानियत के परचम हों।
कल उसने दूनी मजदूरी करके, घरवाले और बच्चे के लिए कुछ रोटी-प्याज बचा रखा था कि आज काम पर न जा, यहाँ बैठ पाए। ऐसा भाग कम होता था कि एक दिन में दो दिनों के गुजारे लायक अन्न जुट जाए। सबकुछ बरखा भरोसे जो था। सचमुच पिछले दो बरस बड़भागी बीते थे। पिछले बरस भी बरखा इतनी हो गई थी कि धान की फसल ठीक-ठाक हो और उसे कटाई का काम मिलता रहे। और इस बरस... इस बरस तो यूँ टूट कर बरसा था सावन कि बिला खेत-जमीन, हरिया लिया था जिया। तभी न कल दूनी मजदूरी का जुगाड़ हुआ और आज यहाँ बैठने आ पाई। जानती थी पहली औरत आज आएगी; पिछले दो बरसों से आ रही थी।
मुँदने से पहले उसकी आँखें दीवार के परली तरफ टिकी थीं। दीवार की बाँध में बँध कर, उधर की निचली जमीन के गड्डों-खड्डों पर, उमग-घुमग कर बरसा पानी जो ठहरा, तो भरा-पूरा पोखर बन लिया। और उसमें खिल आए कमलनी के अनगिन फूल। जहाँ तक वह जानती थी; और इस इलाके के बारे में शायद ही कुछ था जो वह नहीं जानती थी; तो इस बरस से पहले, किसी बरस यहाँ कमलनी नहीं खिली थी।
हे मैया, अजब माया है थारी! इस बरस कमलनी भी यों खिली ज्यों बरसा पानी; अटाटूट। देवी पारवती का चमत्कार नहीं तो क्या कहें इसे? वह जाने थी भली भाँत, पारवती के कहे पर ही खिली थी कमलनी यूँ घटाटोप। कहा होगा शिवजी से कि प्राणप्यारे खिला दो, छोरी खातिर उसकी नाईं कमलनी। बाबा शंकर मना करते तो कैसे; सूरत छोरी की ज्यों पारवती की परछाईं। दिप-दिप मुख पर देवी जोगी मुस्कान लिए खत्म हुई थी; पल भर को जो छोरे का हाथ अपने हाथ से छूटने दिया हो। जैसे ही गाड़ी ट्रेक्टर से टकराई, सोने से छोरा-छोरी मिट्टी हो गए। यह औरत, जो दो बरस से यहाँ आया करे है; जने क्या सोच बंजर को आड़ दे, बीज छींटा करे है, छोरे की माँ है।
सफेद झुकी औरत की आँखें उसकी देह की तरह बेजान नहीं थीं। जब-तब उनमें यादों का बरसाती अंधड़ सरगोशियाँ कर उठता। कभी काली आँधी की किरकिर धूल तो कभी साँवले मेह की झिलमिल टपकन। प्यार से पगे पल की याद कुलांच भरती कि विरह से सना उपरांत लपक कर उसे दबोच लेता।
वह उन्हें पूरा नहीं खोलती थी, न इधर-उधर ताकने की इजाजत देती थी। निगाहें यूँ नीचे झुकी रहतीं जैसे अपने दुख पर शर्मिन्दा हों। पर इधर-उधर न देखने की कोशिश जितनी करे, प्रकृति को पूरी तरह पछाड़ कहाँ पाती थी? गाहे बगाहे नजर फिसल ही जाती, यहाँ-वहाँ। उसकी दूसरी कोशिश भी नाकाम रहती। बोझिल अधखुली आँखों को पूरी तरह मूँद, यह उम्मीद करने की, कि इस वीराने में यादों के भंवर में डूब, नींद आ जाएगी। एकाध दफा यह तो हुआ कि भंवर से दो-एक खुशनुमा लम्हे जेहन में उभरे और बरबस ओंठों पर हल्की मुस्कराहट तिर गई। पर ज्यादा देर टिकी नहीं... अनचाहे-मनचाहे उगे झाऊं-कीकर की तरह समाधिस्थ हो गई। बची रही चीखती-चीरती एक आवृत्ति...पहले गुजरी इस तिथि की...
कभी ऐसा भी हुआ कि अधखुली आँखों से उसने उम्मीद के इस वीराने को फल-फूल से लदा देख लिया। बेर, कैर, करौंदों से ही नहीं, जामुन और आम के झुरमुट से हरियाया। पर भ्रम रहा भ्रम ही; दीवानगी में भी वह जाने रही कि वह दीवानगी थी, असलियत या सच्चाई नहीं। उन जबरन मुंदी, अधमुंदी आँखों में जब नींद कभी न आई तो सपने कैसे आते? नहीं आए इसी से दीवानगी को दीवानगी जाने रही और वीराने को वीराना।
अब भी, हमेशा की तरह, उसने जबरन आँखें मूँदीं तो छलावे-सी मायावी, नामालूम-सी खुशबू ने पलकों पर दस्तक दी। कहाँ से आई खुशबू? क्या आँख लग गई, सपना आ बैठा उसके रूमाल का रूप ले, भीगी पलकों पर? आँखें औचक खुलीं तो इधर-उधर भटक भी लीं।
उसने देखा... जमीन को घेरे जो दो फुटी दीवार खड़ी थी, उसके दूसरी तरफ बाहर पानी ही पानी था। इतना पानी! हाँ होता है, देख चुकी है न दो बार। बरसात होने पर, उम्मीद का यह वीरान बगीचा, पानी से भरा उथला नाला बन, खुद अपने पेड़-पौधों को निगल जाता है। पर यह मौत का साया फेंकता पानी नहीं, कुछ और है। इसमें तो बेशुमार कमलनी खिली हैं! दर्जनों, बीसियों, सैंकड़ों की तादाद में। वह चौंक कर खड़ी हो गई। कमलनी! यहाँ, जहाँ कभी कुछ खिलता नहीं। समझी! आखिरकार उसे नींद आ ही गई और यह सलोना सपना दिखला गई।
मन्त्र मुग्ध वह उठी और यन्त्र-बिद्ध कदमों से दीवार के पास पहुँच गई। कमलनी बदस्तूर खिली रही; मन के तिलिस्मी पेड़ों की तरह बिलाई नहीं। उस पार जाने के लिए वह दीवार में, हैंड पम्प के पास बनी, फाँक की तरफ बढ़ी तो वहाँ एक स्त्री मूर्ति देख, स्तब्ध-अवसन्न रह गई। कहाँ से आई यह प्रतिमा, उसने तो लगवाई नहीं, करुणा से ओतप्रोत देव-मूर्ति... तब... कौन लगा गया... किसने तराशी ऐसी दिलकश... उसकी साँस रुक गई... मूर्ति की छाती उठती-गिरती साँस से हिल रही थी। यह तो... जिन्दगी की हलचल से लबालब, बादामी आँखें पूरी खोल सपनों में खोई... उसकी बहू थी? दिंन्दा?
पर उसे तो उसने ख़ुद अपने हाथों...
सिर में घुमेर उठी और वह चक्कर खा वहीं उसके बराबर में ढह गई। पसीने से तरबतर बदन से चिपकी साड़ी का पल्लू कन्धों से लरज, दूसरी औरत की ओढ़नी की तरह जमीन पर बिछ गया। वह बेखबर उठँगी पड़ी रही। उस औरत ने करुण वात्सल्य से भीगी दृष्टि उस पर डाली पर अपनी जगह से हिली नहीं; सहारा दे उसे उठाया नहीं।
सिर हाथों में थाम, उसने खुद को सम्भाला और अपनी उसी झुकी, दुखी, जीवन से हताश, मुक्ति की तलाश में दिग्भ्रमित मुद्रा में बैठ गई। निगाह बरबस ऊपर उठी तो दूसरी औरत की स्निग्ध नजर से जा टकराई।
नजर के साथ चेहरा आँखों की राह जेहन में पहुँचा तो हाहाकार करते दिल ने समझा, वह नितान्त अजनबी औरत थी। निश्चल रह कर भी, अपनी साँसों के स्पंदन से उस निष्कम्प सन्नाटे को आबाद कर रही थी। खुली बादामी आँखों, उसी मंजर को ताक रही थी, जिसे सपना जान, मोहपाश में बँधी, वह फिर-फिर देखने की पगलाई ख्वाहिश लिए, चली आई थी। उनकी साझा नजरों के सामने हर तरफ कमलनी ही कमलनी थी।
दोनों पास-पास मौन बैठी, एक दिशा में ताक रही थीं। पहली औरत अपने से बेखबर थी और दूसरी से भी; पर दूसरी, पहली से पूरी तरह खबरदार थी। स्नेहिल, ममता में रची-पगी दृष्टि, जब-तब उस पर डाल, वापस कमलनी के घटाटोप की तरफ़ मोड़ लेती।
कितना वक्त गुजराः कुछ पल, चन्द लम्हे, एक घन्टा, एक पहर; कौन हिसाब रखता। बेखयाली में गुम पहली औरत भला क्या कयास लगाती, कितने बरस बीते वहाँ? लगा, रेत की मानिन्द हाथों से फिसली पूरी जिन्दगी बीत ली। याद आया, यहाँ साँप के एक जोड़े ने बसेरा किया था। केंचुल छोड़ एक दिन सरक लिए। फिर नहीं लौटे। मोर-मोरनी भी भटक आए थे एक बार, जब बरसात से पहले, कुछ पेड़ उम्मीद बन उगे थे। वे भी चले गए न लौटने के लिए। वही बार-बार लौट आती है यहाँ। कब हुआ था वह सब? क्या पिछले साल ही? अब कहाँ थे वे? यहीं कहीं थे आस-पास या गये? सब गए; सब के सब?
दूसरी बेखबर नहीं थी। आश्वस्त थी कि दिन ढलने में अभी वक्त था। साँझ उतरने पर, जब कमलनी पँखुड़ियाँ समेटना शुरू करेगी, तभी घर पलट पाएगी, सोच कर ही वीराने में पाँव रखा था। उसे पता था, छोरे की माँ छोरे की पुन्न तिथि पर साँझ घिरने पर ही वहाँ से पलटती थी। कमलनी कल फिर खिलेगी; सूरज उगने के साथ। पर पारवती अपने शिव को साथ ले जो गई सो गई। दो बरस बाद ये सौगात भेजी माँ के लिए; ढेरोढेर कमलनी के फूल। यहीं से पानी ले जाती थीं गाँव भर की औरतें। इस बरस हर जबान पर यही नाम था; जहाँ कमलनी खिलती है।
बरसात बाद के अगहन महीने की दुपहरी का तेज ताप, जिसमें हरिण भी काले पड़ जाते हैं, मद्धिम पड़ना शुरू हुआ तो दमकती-चमकती कमलनी, स्त्री की आर्द्र दृष्टि की तरह सौम्य दीखने लगीं। उसने अचकचा कर ऊपर आसमान की तरफ देखा; हाँ, सूरज चलाचली की ओर बढ़ रहा था। उसने ओढ़नी सिर से खींच, पूरा बदन ढका और असमंजस भरी निगाह से पास बैठी औरत को निहारा। निहोरा अब भी था उसमें पर हल्की दुविधा का भास लिए।
थिर मूरत में हरकत हुई तो पहली औरत मायाजाल से निकल ठोस जमीन पर आ गिरी। पर कमलनी... वे तो अब भी खिली थीं। कुछ सिमटी-सकुचाई जरूर थीं, नई दुल्हिन की तरह। पर थीं सब की सब वहीं; मगन मन पानी के ऊपर तैरती। नहीं, मायावी नहीं था वह लोक जिसमें विचर, वह अभी-अभी लौटी थी। कमलनी थीं, वाकई थीं।
बेध्यानी टूटी तो जो पहले नहीं सूझा था, अब सोच बैठी। कौन थी वह औरत; यहाँ क्यों बैठी थी? हैंड पम्प से पानी लेने आई होगी। इस खारे इलाके का पानी भी खारा था; कुओं का ही नहीं, गहरे खुदे नल कूप का भी। वह खुदवा कर देख चुकी थी। मीठा पानी सिर्फ सरकार की कृपा से मिलता था। उसकी जमीन पर था मीठे पानी का एक हैंड पम्प। उसी ने कह-सुन कर लगवाया था। सुबह सकारे गाँव की औरतें उससे पानी भरने आती थीं। पर इतनी देर रुक-ठहर कोई बैठती न थी। भागती-दौड़ती आईं, पानी भरते-भरते आपस में दो बोल बोले और चल दीं। कभी वह नजर आ गई तो शर्मीली-सी दुआ-सलाम उससे भी कर ली,बस।
उठने-उठने को होती दूसरी औरत बैठी थी अब तक। पर उसके बदन की कसमसाहट पहली को उठने पर आमादा कर रही थी। क्या वे किसी काम के सिलसिले में आपस में टकराई थीं? याद आया, एक बार, एक स्वयंसेवी संस्था से दो औरतें यहाँ आई थीं; गाँव की औरतों को क्या-कुछ बतलाने। बड़ी मुश्किल से औरतों को इकट्ठा किया था पर बात आगे बढ़ी न थी। कैसे बढ़ती? औरतें चाहती थीं रोजगार और वे देती थीं, मात्र सलाह। तो... उसने क्या किया? कुछ नहीं। सोचा भी नहीं कि कुछ कर सकती थी।
फिर एक बार... अरे पिछले बरस ही तो, धान की थोड़ी-सी फसल भी हुई थी इस जमीन पर; कुछ औरतें काट ले गई थीं। उनमें रही होगी यह भी। पर... आज... एक बरस बाद... इतनी देर से यहाँ क्यों बैठी है? कौन है यह, क्यों है?
कौन हो सकती है? गरीब घर की किसान औरत, और क्या। पर... आँखों से झरती कण-कण अनुकम्पा; सीधी-तनी-कृश देह से तरंगित वत्सल राग? पेबन्द लगी फिड्डी पोशाक में दिपदिप करती देवी-सी आकृति... उसकी बहू... नहीं पार्वती है यह साक्षात! वही... वही... और कोई नहीं...
कुछ पल गुजरे...एक पहर और बीता...
सूरज अवसान की तरफ़ बढ़ा, कमलनी सकुचाईं, मायाजाल तिड़कता चला गया। इतना कि तमाम संकोच-झिझक के बावजूद, सपनलोक से बेवफाई कर, वहजमीनी सवाल कर बैठी।
"कुछ चाहिए?"
"ना,"
उसने कहा," सोचा, इकली कैसे बैठोगी।"

7 December 2013

मंडेला ने पूरे महाद्वीप को माफ़ करना सिखाया

जॉन द्रमनी महामा घाना के राष्ट्रपति हैं. वे कई किताबों के लेखक भी हैं. मंडेला  की  स्मृति में उनका यह लेख न्यूयार्क टाइम्स में छपा है. अखरावट 



कई वर्षों तक ऐसा लगता रहा कि नेल्सन मंडेला की सिर्फ एक तसवीर ली गयी है. इसमें नेल्सन मंडेला के बाल बिखरे हुए से थे. गाल भरा हुआ था. उनकी निगाहों में एक गहरी प्रतिबद्धता को महसूस किया जा सकता था. लेकिन, यह एक ब्लैक एंड व्हाइट तसवीर थी. यह काफी धुंधली थी और काफी पुरानी नजर आती थी.  यह एक ऐसे व्यक्ति के दस्तावेज के समान थी, जिसका वक्त अरसा पहले बीत चुका था.

    1960 के दशक के शुरुआती दिनों में अफ्रीकी मूल निवासियों के साथ किये जा रहे बर्बर व्यवहार और दमन से आजिज आकर, मंडेला ने सफलतापूर्वक गुरिल्ला युद्ध की हिंसक योजना प्रस्तावित की थी. इसके मूल में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की सैन्य शाखा के गठन का विचार था. अपने गठन के कुछ वर्षों के भीतर ही, इस सैन्य इकाई, जिसे देश की बरछी (उमकोंतो वी सिजवे) नाम दिया गया था, का पता लग गया और इसके शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. 1964 में मंडेला को देश-द्रोह का दोषी करार दिया गया और उन्हें आजन्म कारावास की सजा सुना दी गयी. 

    मुकदमे की सुनवाई के दौरान, अपने वक्तव्य में मंडेला ने कहा था, ‘ मैंने हमेशा से एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र समाज की कामना की है, जिसमें सभी लोग समभाव और बराबरी के मौके के साथ रह सकें.’ उन्होंने कहा, ‘यह वह आदर्श है, जिसके लिए मैं जीना चाहता हूं और जिसे मैं हासिल करना चाहता हूं. और अगर जरूरत पड़ी, तो इस आदर्श के लिए मैं अपने प्राणों की कुर्बानी देने को भी तैयार हूं.’ मैं तब महज पांच साल का था, जब मंडेला कैदी नंबर 46664 बने थे और उन्हें उनके जीवन के बचे हुए हिस्से को रॉबेन द्वीप पर बिताने के लिए भेज दिया गया था. रॉबेन द्वीप केप टाउन के ठीक उत्तर में स्थित महज पांच वर्गमील का जमीन का टुकड़ा है. यहां कुष्ठ रोगियों की एक बस्ती थी, एक पागलखाना था और कई जेल थे. यह निर्वासन, सजा और अलगाव की भूमि थी. यहां लोगों को भेजा जाता था और भुला दिया जाता था.

    लेकिन, उस फोटोग्राफ की चीखती हुई छवि ने हमें भूलने नहीं दिया. 1970 के दशक में मैं अफ्रीकी यूथ कमांड का सदस्य था. यह सामाजिक और राजनीतिक अन्यायों के खिलाफ विरोध करनेवाले कार्यकर्ताओं का एक समूह था. हम मंडेला को अपना आदर्श मानते थे. हम उस फोटोग्राफ के पोस्टर्स को अपने डॉरमिट्री के कमरों में टांगते थे. हम उस तसवीर को परचों पर छापते थे. हमने मंडेला को अप्रासंगिकता के बियाबान में गुम हो जाने देने से इनकार कर दिया. हमने मार्च निकाले, प्रदर्शन किये, कंसर्ट्स का आयोजन किया, बहिष्कार किया, याचिकाओं पर दस्तखत किये. प्रेस वक्तव्य जारी किया. रंगभेद की बुराई का विरोध करने के लिए और मंडेला का नाम लोगों की जुबान पर बनाये रखने के लिए, हमसे जो कुछ बन सकता था, हमने वह सब किया. यहां तक कि हमने सरकार की इजाजत से श्वेत श्रेष्ठता का प्रचार करनेवाले जॉन वॉर्स्टर, जिमी क्रूगर जैसे नेताओं का पुतला भी जलाया.

अफ्रीकी महाद्वीप पर आजादी, एक हकीकत थी, जिसके लिए हम संघर्ष करने को तैयार थे. लेकिन, इसके बावजूद हम लोगों ने कहीं न कहीं अपने मन को समझा दिया था कि मंडेला अपने जीवन की आखिरी सांस तक जेल में ही रहेंगे और हमारे जीवन के खत्म हो जाने के बाद भी दक्षिण अफ्रीका में समानता का राज स्थापित नहीं होगा. तब, 11 फरवरी, 1990 को एक चमत्कार हुआ. मंडेला जेल से बाहर चल कर आये.
दुनिया इस क्षण को देखकर थम गयी. हमारे लिए यह कल्पना करना कठिन था कि अगर हम मंडेला की जगह होते, तो हम क्या करते? हमसब एक बखान न किये जा सकनेवाले गुस्से, बदले की कार्रवाई का इंतजार कर रहे थे. किसी भी तार्किक दिमाग के लिए इसका औचित्य समझना शायद कठिन नहीं होता. उनके जीवन के 27 साल नष्ट हो गये थे. चमकते हुए निर्दयी सूरज के नीचे चूना-पत्थर के खदान में हर रोज काम करने से, वह भी बिना किसी सुरक्षा चश्मे के,  उनकी आंसुओं की ग्रंथियां नष्ट हो गयी थीं.. इसने वर्षों तक मंडेला से रोने की क्षमता से भी महरूम कर दिया. लेकिन, इसके बावजूद, इस व्यक्ति ने माफ कर देने की वकालत की.  ‘अपने दृढ़ विश्वास के कारण जेल जाना और जिस चीज में आप यकीन करते हैं, उसके लिए हर कष्ट को सहने के लिए तैयार रहना, अपने साथ ज्यादती नहीं है. परिणामों की परवाह किये बगैर धरती पर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना किसी व्यक्ति की सफलता है.’

    जब मैं पहली बार मंडेला से मिला, तब तक उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा जा चुका था. वे उस देश के राष्ट्रपति चुन लिये गये थे, जिस धरती पर उन्हें और दूसरे सभी अश्वेत लोगों को कुछ समय पहले तक मताधिकार से वंचित रखा गया था. वे एक आइकॉन बन गये थे- सिर्फ आशाओं के ही नहीं, बल्कि जख्मों के भरने की संभावना के भी.
    मैं तब राजनीति में नया था. संसद का सदस्य और संचार मंत्री था. यह केप टाउन की मेरी पहली यात्रा थी. मैं दोस्तों के साथ काफी देर बाहर रहा था और होटल के अपने कमरे तक जाने के लिए लिफ्ट का इंतजार कर रहा था.  जब लिफ्ट का दरवाजा खुला, तो सामने मंडेला थे. मैं एक कदम पीछे हट गया. उस घड़ी मैं जम सा गया था.  जब मंडेला बाहर निकले, तब उन्होंने मेरी तरफ देखा और अपना सिर हिलाया. मैं उनके इस शिष्टाचार का जवाब नहीं दे पाया.  मैं अपनी जगह से हिल नहीं पाया, न ही पलकें झपका पाया. मैं बस स्तब्ध सा वहां खड़ा रहा, यह सोचते हुए कि मेरी आंखों के सामने वह व्यक्ति था, जिसके लिए हमने मार्च निकाले थे, गाने गाये थे, आंसू बहाये थे. यह उस ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफ में जज्ब हो गया व्यक्ति है. यहां वह व्यक्ति था, जिसने दक्षिण अफ्रीका के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे अफ्रीका महाद्वीप की नयी नैतिक धुरी का निर्माण किया था.

यह महज संयोग नहीं है कि मंडेला की जेल से रिहाई के बाद के वर्षों में अफ्रीका का एक बड़ा हिस्सा लोकतंत्र और कानून के शासन की ओर मुड़ता गया.  मंडेला ने जिस तरह से शांति का प्रयोग आजादी के लिए किया, उसने अफ्रीका को यह दिखाया कि अगर हमें  उपनिवेशवाद द्वारा पैदा किये गये बंटवारे और खुद अपने द्वारा दिये गये जख्मों से बाहर निकलना है, तो दयालुता और क्षमा करने की भावना को गवर्नेंस का अहम हिस्सा बनना होगा. लोगों की तरह की देशों को भी अपने पर गुजरे दुखों को समझना चाहिए और उन्हें दूर करने के लिए रास्तों की खोज करनी चाहिए. यह टूटे हुए को फिर से एक बनाने के लिए जरूरी है.

उस रात मैंने मंडेला को अपने बगल से गुजरते हुए देखा था. मैं समझता हूं कि उनकी कहानी- ‘आजादी का लंबा रास्ता’ (द लांग वॉक टू फ्रीडम), अफ्रीका महाद्वीप की भी कहानी थी. किसी जमाने में हमारे महाद्वीप पर जिस घृणा की भावना का बोलबाला था, उसकी जगह आज प्रेरणा (इंसपिरेशन) ने ले ली है. युद्ध, तख्तापलट, रोग, गरीबी और अत्याचार के दुखों के हमले के कारण महाद्वीप में बहनेवाली निराशा की अंत:धारा का स्थान एक टिकाऊ और लगातार विस्तार लेते हुए संभावनाओं के एहसास ने ले लिया है.
जब नेल्सन मंडेला जेल में थे, तब सिर्फ उनका ही रूपांतरण नहीं हो रहा था, हम सभी उन वर्षों में बदल रहे थे. और अफ्रीका आज अगर बेहतर हुआ है, तो उसमें इसकी बड़ी भूमिका है.

30 November 2013

भारतीय सौन्दर्य और प्रेम का जादू - ''रूप'' की रुबाईयाँ

 फिराक गोरखपुरी पर बहुत ही आत्मीयता और दिल की लहर में  बहते हुए लिखा है मनीषा कुलश्रेष्ठ ने. आप भी पढ़िए और आनंद लीजिये। अखरावट 
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रूप जैसी बहुचर्चित और लोकप्रिय तथा एक मील पत्थर साबित हुई सौन्दर्यमय, संगीतमय पुस्तक का सूत्रपात द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में हुआ था। एक रुबाई से आरंभ हुआ यह संग्रह 100 दिनों में साढे तीन सौ से ज्यादा रुबाईयों का संग्रह बन गया था। उर्दू के प्रख्यात शायर स्वयं फिराक गोरखपुरी कहते हैं कि रूप की रुबाईयों में नि:स्संदेह एक भारतीय हिन्दू स्त्री का चेहरा है, चाहे रुबाईयाँ उर्दू में क्यों न लिखी गई हों। रूप की भूमिका में वे लिखते हैं -
" मुस्लिम कल्चर बहुत ऊंची चीज है, और पवित्र चीज है, मगर उसमें प्रकृति, बाल जीवन, नारीत्व का वह चित्रण या घरेलू जीवन की वह बू–बास नहीं मिलती, वे जादू भरे भेद नहीं मिलते जो हिन्दू कल्चर में मिलते हैं। कल्चर की यही धारणा हिन्दू घरानों के बर्तनों में, यहाँ तक कि मिट्टी के बर्तनों में, दीपकों में, खिलौनों में, यहाँ तक कि चूल्हे चक्की में, छोटी छोटी रस्मों में और हिन्दू की सांस में इसी की ध्वनियाँ, हिन्दू लोकगीतों को अत्यन्त मानवीय संगीत और स्वार्गिक संगीत बना देती है।
बाबुल मोर नइहर छुटल जाए
ऊ डयोढी तो परबत भई, आंगन भयो बिदेस
यह तो हमें गालिब भी नहीं दे सके, इकबाल भी नहीं दे सके, चकबस्त भी नहीं दे सके। इधर आईए, रूप की रुबाईयों में भारतीयता किस तरह सांस ले रही है, इसका कुछ कुछ अंदाजा होगा। हिन्दू संस्कृति किसी एक अवतार या पैगम्बर या धार्मिक ग्रन्थ की देन नहीं है। यह संस्कृति संपूर्ण भारत के सामूहिक जीवन से क्रमश: उगी है। भौतिकता और आध्यात्म का समन्वय इस संस्कृति की विशेषता है।"

और फिराक ने सच ही लिखा था ये रुबाईयाँ नहीं भारतीय स्त्री के सौन्दर्य का जादू हैं।
है रूप मैं वो खटक, वो रस, वो झंकार
कलियों के चटकते वक्त जैसे गुलजार
या नूर की उंगलियों से देवी कोई
जैस शबे-माह में बजाती हो सितार

ये रंगे निशात, लहलहाता हुआ गात
जागी जागी सी काली जुल्फ़ों की रात
ऐ प्रेम की देवी बता दे मुझको
ये रूप है या बोलती तसवीरे हयात
वैसे रुबाई अरबी भाषा का शब्द है। रुबाई संगीतपूर्ण काव्यकला है। रुबाई में चार पंक्तियां होती हैं, पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति का तुकान्त काफिया एक सा होता है। तीसरी पंक्ति तुकान्त से मुक्त होती है। कभी चारों ही एक से तुकान्त वाली होती हैं। रुबाई का एक विशेष छन्द होता है। रूप में रुबाई कला के बारे में लिखते हुए कहा गया है कि - '' रुबाई की चारों पंक्तियां एक सम्पूर्ण कविता होती है और पहली ही पंक्ति से रुबाई अपनी प्रत्येक पंक्ति द्वारा लहरों की तरह उठती है और चौथी पंक्ति में अंतिम लहर तट को चूम लेती है।'' कहते हैं रुबाई लिखने की कला बडी ज़टिल व सूक्ष्मता से परिपूर्ण होती है जैसे हाथी दांत पर बारीक नक्काशी, इसे कहना या लिखना हरेक के बस की बात नहीं। गालिब और इकबाल भी इस क्षेत्र में अच्छी कृतियां न दे सके। फिराक गोरखपुरी को रुबाई लिखने वाले गिने चुने सिद्धहस्तों में गिना गया है। रूप की रुबाइयों में जहाँ यौवन, प्रेम और अथाह सौन्दर्य का सागर बहा है वहीं लौकिक में अलौकिक चेतना के समन्वय का दार्शनिक रूप भी दृष्टिगोचर होता है।
नभ मण्डल गूंजता है तेरे जस से
गुलशन खिलते हैं गम के खारो खस से
संसार में जिन्दगी लुटाता हुआ रूप
अमृत बरसा रहा है जोबन रस से।
फिराक की इन संगीतमय रुबाइयों में अपने यौवन से बेखबर कमसिन किशोरी से लेकर, प्रेमिका, भांवरे लेती परीणीता, सुहागरात को लाज से भरी नव वधू, सुहागरात के बाद स्नान करती वधु, सद्यस्नात: स्त्री, विरहिणी, भाई को राखी बांधती, बच्चे को नहलाती, दुलराती मां, सारे त्यौहार पूरी श्रद्धा से मनाती हुई गाय को पुचकार कर चारा खिलाती, रामायण पढती भारतीय हिन्दू स्त्री के हर रूप की छब बडे ही भाव भीने शब्दों में बांध कर रख दी गई है। एक एक रुबाई प्रेम और सौन्दर्य का छलकता हुआ अमृत पात्र है।
माथे की यह कहकशां ये जोबन की लहर
पडते ही झपक झपक जाती है नजर
वो रूप जहां दोनों समय मिलते हों
आँखों में सुहागरात, मुखडे पर सहर

चढती हुई नदी है कि लहराती है
पिघली हुई बिजली है कि बल खाती है
पहलू में लहक के भींच लेती है वो जब
न जाने कहाँ बहा ले जाती है

चढती जमुना का तेज रेला है कि जुल्फ़
बल खाता हुआ सियाह कौंदा है कि जुल्फ़
गोकुल की अंधेरी रात देती हुई लौ
घनश्याम की बांसुरी का लहरा है कि जुल्फ़
खुश्बू से मशाम आँखों के बस जाते हैं
गुंचे से फिजांओं में बिकस जाते हैं
झुकती है तेरी आँख सरे - खलवते - नाज
या कामिनी के फूल बरस जाते हैं।

गंगा वो बदन कि जिसमें सूरज भी नहाये
जमुना बालों की, तान बंसी की उडाय
संगम वो कमर, आँख ओझल लहराय
तहे-आब सरस्वती की धारा बल खाय
एक स्त्री के सौन्दर्य को रोम रोम को आँख बना कर निरखा है शायर ने और हजारों हजार सुन्दर उपमानों से सजा डाला कि जुल्फ जुल्फ न होकर गंगा स्नान को उमडती भीड से लेकर चीन के एक नगर खुतुन जहां कस्तूरी बहुत मिलती है, की महकती रातें तक बन गयी हैं। आँखें हैं कि तारों को भी लोरियां सुनाकर सुला दें। प्रेम में पगी भारतीय स्त्री गंगा, जमुना से लेकर सीता, राधा, लक्ष्मी का स्वरूप लेकर उतर आई है इन रुबाइयों में।
जब पिछले पहर प्रेम की दुनिया सो ली
कलियों की गिरह पहली किरन ने खोली
जोबन रस छलकाती उठी चंचल नार
राधा गोकुल में जैसे खेले होली

ये हल्के, सलोने, सांवलेपन का समां
जमुना के जल में और आसमानों में कहां
सीता पे स्वयंबर में पडा राम का अक्स
या चाँद के मुखडे पर है जुल्फों का धुंआ

जब प्रेम की घाटियों में सागर उछले
जब रात की बादियों में तारे छिटके
नहलाती फिजां को आई रस की पुतली
जैसे शिव की जटा से गंगा उतरे
इन अद्वितीय रुबाईयों में भारतीयता की महक अलग - अलग मौसमों से चुराई गयी है हमारी संस्कृति में मौसमों के महत्व से शायर अछूते नहीं, हर मौसम में वे स्त्री के रूप की छटा बिखेर देते हैं इन शब्दों में -
ये चैत की चाँदनी में आना तेरा
अंग अंग निखरा हुआ, लहराया हुआ
रस और सुगंध से जवानी बोझल
एक बाग है बौर आए हुए आमों का
फिराक इन रुबाईयों में एक भारतीय गृहस्थन के विभिन्न रुपों पर फिदा हैं, चाहे फिर वह बच्चे को नहलाती माँ हो या राखी बंधवाती बहन या घर को दीपकों की कतार से सजाती पत्नी।
आँगन में लिये चाँद के टुकडे क़ो खडी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद भरी
रह रह कर हवा में जो लोका देती
गूंज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी
फिराक की इन रूबाईयों ने पारम्परिक भारतीय स्त्री के रूप को अमरत्व दे दिया है।
मण्डप के तले खडी है रस की पुतली
जीवन साथी से प्रेम की गांठ बंधी
महके शोलों के गिर्द भांवरों के समय
मुखडे पर नर्म धूप सी पडती हुई

आंगन में सुहागिनी नहा के बैठी
रामायण जानुओं पे रक्खी है खुली
जाडे क़ी सुहानी धूप खुले गेसू की
परछांई चमकते सफहे पर पडती हुई
फिराक की इन रुबाइयों में जहाँ हिन्दी और उर्दू का गंगा-जमनी संगम मिलता है, वहीं फारसी और अरबी के कई क्लिष्ट शब्दों को भी संजोया है और यूं संजोया है कि रुबाइयों का संगीत और रस जरा भी फीका न हो। और वे शब्द अपने आप में इतने पूर्ण और अर्थमय हैं कि उनकी जगह कोई और शब्द रुबाई के रस को कम कर सकता था। इसीलिये साथ में हिन्दी अर्थ तारांकित कर नीचे लिखे गये हैं।
इंसा के नफस(श्वास) में भी ये एजाज (ज़ादू) नहीं
तुझसे चमक उठती है अनासिर की जबीं(तत्वों का माथा)
एक मोजिजये-खामोश(मौन चमत्कार) तरजे-रफ्तार (चाल का ढंग)
उठते हैं कदम कि सांस लेती है जमीं
फिराक के इस जादू रूप की भाषा वहां भी मन मोह लेती है जहां उन्होंने दृश्य खींचने में ठेठ देशज शब्दों को शामिल किया है, मसलन -
चौके की सुहानी आंच, मुखडा रौशन
है घर की लक्ष्मी पकाती भोजन
देते हैं करछुल के चलने का पता
सीता की रसोई के खनकते बर्तन
फिराक की रूबाईयों को पढ क़र बहुत से प्रसिद्ध लोगों ने सराहना की है, यह वह समय था जब कविता विशुद्ध रसमय कविता होती थी, लोग अपनी रचनाओं की प्रशंसा न कर अपने समकालीनों की प्रशंसा किया करते थे ना कि विकट आलोचनाएं। आज कविता ऐसे ही वादों और आलोचनाओं के घेरे में अपनी पहचान खोती जा रही है -

रूप की रुबाइयों में बुद्धकाल, मुस्लिमयुग और टेगोर के युग से लेकर आज तक की भारतीय संस्कृति अपनी झलकियां दिखाती हुई नजर आती है। - सरोजिनी नायडू

फिराक ने इन रुबाईयों में मोती पिरो दिया है, इसका प्रकाशन जब भी होगा लोगों की आँखें खुल जाएंगी। - प्रेमचंद

मैं क्या कविता करता हूँ , कविता तो फिराक करते हैं। - सुमित्रानंदन पंत

प्रयाग आकर अगर तुमने फिराक के मुंह से फिराक की कविता नहीं सुनी तो व्यर्थ प्रयाग आए।- निराला

फिराक तुम जादू करते हो।- सज्जाद जहीर

ये रुबाइयां युगयुगान्तर तक भारतीय संस्कृति का अनुभव कराती रहेंगी। - डॉ राजेन्द्र प्रसाद

इन रुबाइयों ने मुझ पर गहरा असर छोडा है। ये रीडिसकवरी ऑफ इण्डिया है। - जवाहरलाल नेहरू

और सराहना के ये शब्द दिलों से निकले शब्द है क्योंकि रूप की रुबाइयां हैं ही दिलकश। रूप की अंतिम रुबाई के साथ जो एक शाश्वत सत्य है -
पैगम्बरे-इश्क हूँ समझ मेरा मकाम
सदियों में फिर सुनाई देगा ये पयाम
वो देख कि आफताब सजदे में गिरे
वो देख कि उठे देवता भी करने को सलाम


28 October 2013

कविता लिखना, भाषा सीखना है : असद जैदी

 वरिष्ठ कवि असद जैदी को पढ.ना अपने समय, समाज और राजनीति को पहले से बेहतर तरीके से देखना और समझना है. अपनी कविताओं से समय के साथ संवाद करनेवाले असद जैदी से प्रीति सिंह परिहार की बातचीत के मुख्य अंश...अखरावट



‘कविता’ आपके लिए क्या है ?

कविता समाज में एक आदमी के बात करने का तरीका है. पहले अपने आप से, फिर दोस्तों से, तब उनसे जिनके चेहरे आप नहीं जानते, जो अब या कुछ बरस बाद हो सकता है आपकी रचना पढ.ते हों. कविता समाज को मुखातिब बाहरी आवाज नहीं, समाज ही में पैदा होनेवाली एक आवाज है, चाहे वह अंतरंग बातचीत हो, उत्सव का शोर हो या प्रतिरोध की चीख. यह एक गंभीर नागरिक कर्म भी है. कविता आदमी पर अपनी छाप छोड.ती है. जैसी कविता कोई लिखता है वैसा ही कवि वह बनता जाता है और किसी हद तक वैसा ही इंसान.

लेखन की शुरुआत कैसे हुई? क्या इसके पीछे कोई प्रेरणा थी?

खुद अपने जीवन को उलट-पुलट कर देखते, जो पढ.ने, सुनने और देखने को मिला है उसे संभालने से ही मेरा लिखने की तरफ झुकाव हुआ. घर में तालीम की कद्र तो थी पर नाविल पढ.ने, सिनेमा देखने, बीड.ी-सिगरेट पीने, शेरो-शायरी करने, गाना गाने या सुनने को बुरा समझा जाता था. यह लड.के के बिगड.ने या बुरी संगत में पड.ने की अलामतें थीं. लिहाजा अपना लिखा अपने तक ही रहने देता था. मगर मिजाज में बगावत है, यह सब पर जाहिर था.

कविता विधा ही क्यों?

शायद सुस्ती और कम लागत की वजह से. मुझे लगता रहता था असल लिखना तो कविता लिखना ही है. यह इस मानी में कि कविता लिखना भाषा सीखना है. कविता भाषा की क्षमता से रू-ब-रू कराती है और उसे किफायत से बरतना भी सिखाती है. कविता एक तरह का ज्ञान देती है, जो कथा-साहित्य या ललित गद्य से बाहर की चीज है. वह सहज ही दूसरी कलाओं को समझना और उनसे मिलना सिखा देती है. हर कवि के अंदर कई तरह के लोग- संगीतकार, गणितज्ञ, चित्रकार,फिल्मकार, कथाकार,मिनिएचरिस्ट,अभिलेखक, दार्शनिक, नुक्ताचीन र्शोता और एक खामोश आदमी- हरदम मौजूद होते हैं.

अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताएं.

मैं अकसर एक मामूली से सवाल का जवाब देना चाहता हूं. जैसे : कहो क्या हाल है? या, देखते हो? या, उधर की क्या खबर है? या, तुमने सुना वो क्या कहते हैं? या, तुम्हें फलां बात याद है? या, यह कैसा शोर है? जहां तक मैं समझ पाया हूं, मेरे प्रस्थान बिंदु ऐसे ही होते हैं. कई दफे अवचेतन में बनती कोई तसवीर या दृश्यावली अचानक दिखने लगती है, जैसे कोई फिल्म निगेटिव अचानक धुल कर छापे जाना मांगता हो. मिर्जा ने बड.ी अच्छी बात कही है- ‘हैं .ख्वाब में हनोज जो जागे हैं .ख्वाब में.’ दरअसल, रचना प्रक्रिया पर ज्यादा ध्यान देने से वह रचना प्रक्रिया नहीं रह जाती, कोई और चीज हो जाती है. यह तो बाद में जानने या फिक्र में लाने की चीज है. यह काम भी रचनाकार नहीं, कोई दूसरा आदमी करता है- चाहे वह उसी के भीतर ही बैठा हो- जो रचना में कोई मदद नहीं करता.

अपनी रचनाशीलता का अपने परिवेश, समाज, परिवार से किस तरह का संबंध पाते हैं?

संबंध इस तरह का है कि ‘दस्ते तहे संग आमद: पैमाने वफा है’ (गालिब). मैं इन्ही चीजों के नीचे दबा हुआ हूं, इनसे स्वतंत्र नहीं हूं. लेकिन मेरे लेखन से ये स्वतंत्र हैं, यह बड.ी राहत की बात है.

क्या साहित्य लेखन के लिए किसी विचारधारा का होना जरूरी है?

पानी में गीलापन होना उचित माना जाये या नहीं, वह उसमें होता है. समाज-रचना में कला वैचारिक उपकरण ही है- आदिम गुफाचित्रों के समय से ही. विचारधारा ही जबान और बयान को तय करती है, चाहे आप इसको लेकर जागरूक हों या नहीं. बाजार से लाकर रचना पर कोई चीज थोपना तो ठीक नहीं है, पर नैसर्गिक या रचनात्मक आत्मसंघर्ष से अर्जित वैचारिक मूल्यों को छिपाना या तथाकथित कलावादियों की तरह उलीच कर या बीन कर निकालना बुरी बात है. यह उसकी मनुष्यता का हरण है. और एक झूठी गवाही देने की तरह है.

क्या आपको लगता है कि मौजूदा समय-समाज में कवि की आवाज सुनी जा रही है?

मौजूदा व.क्त खराब है, और शायद इससे भी खराब व.क्त आने वाला है. यह कविता के लिए अच्छी बात है. कविकर्म की चुनौती और जिम्मेदारी, और कविता का अंत:करण इसी से बनता है. अच्छे वक्तों में अच्छी कविता शायद ही लिखी गयी हो. जो लिखी भी गयी है वह बुरे व.क्त की स्मृति या आशंका से कभी दूर न रही. जहां तक कवि की आवाज के सुने जाने या प्रभावी होने की बात है, मुझे पहली चिंता यह लगी रहती है कि दुनिया के हंगामे और कारोबार के बीच क्या हमारा कवि खुद अपनी आवाज सुन पा रहा है? या उसी में एब्जॉर्ब हो गया है, सोख लिया गया है? अगर वह अपने स्वर, अपनी सच्ची अस्मिता, अपनी नागरिक जागरूकता को बचाए रख सके, तो बाकी लोगों के लिए भी प्रासंगिक होगा.

आपके एक समकालीन कवि ने लिखा है (अपनी उनकी बात: उदय प्रकाश) ‘आपके साथ हिंदी की आलोचना ने न्याय नहीं किया.’ क्या आपको भी ऐसा लगता है?

मैं अपना ही आकलन कैसे करूं! या क्या कहूं? ऐसी कोई खास उपेक्षा भी मुझे महसूस नहीं हुई. मेरी पिछली किताब मेरे खयाल में गौर से पढ.ी गयी और चर्चा में भी रही. कुछ इधर का लेखन भी. इस बहाने कुछ अपना और कुछ जगत का हाल भी पता चला.

इन दिनों क्या नया लिख रहे हैं और लेखन से इतर क्या, क्या करना पसंद है?

कुछ खास नहीं. वही जो हमेशा से करता रहा हूं. मेरी ज्यादातर प्रेरणाएं और मशगले साहित्यिक जीवन से बाहर के हैं, लेकिन मेरा दिल साहित्य में भी लगा रहता है. समाज-विज्ञानों से सम्बद्ध विषयों पर ‘थ्री एसेज’ प्रकाशनगृह से किताबें छापने का काम करता हूं. और अपना लिखना पढ.ना भी करता ही रहता हूं. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, खास कर खयाल गायकी, सुनते हुए और विश्‍व सिनेमा देखते हुए एक उम्र गुजार दी है.

ऐसी साहित्यिक कृतियां जो पढ.ने के बाद जेहन में दर्ज हो गयी हों? क्या खास था उनमें?

चलते-चलते ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते. मैं पुराना पाठक हूं. जवाब देने बैठूं, तो बकौल शाइर,‘वो बदखू और मेरी दास्ताने-इश्क तूलानी/ इबारत मु.ख्तसर, कासिद भी घबरा जाये है मुझसे.’ कुछ आयतें जो बचपन में रटी थीं और अंतोन चेखव की कहानी ‘वान्का’ जो किशोर उम्र में ही पढ. ली थीं जेहन में न.क्श हो गयी हैं. इसके बाद की फेहरिस्त बहुत लंबी है.

26 October 2013

संयुक्त राष्ट्र में दिया गया मलाला यूसुफजई का भाषण

संयुक्त राष्ट्र  में दिया गया मलाला यूसुफजई का भाषण किसने लिखा, यह शोध का विषय होना चाहिए.   वैसे , जिसने भी यह भाषण लिखा है उसने  कई मकसदों को इसमें एकसाथ मिलाया है. कोई चाहे तो इसे ग्लोबल प्रोपगेंडा भी  कह सकता है. फिलहाल अगर आपकी इच्छा है, रूचि है, तो "मलाला दिवस" के मौके पर  दिए गए मलाला यूसुफ़जई के इस भाषण को पढ़ सकते हैं.



आदरणीय बान की मून, महासचिव संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष वुक जेरेमिक, वैश्विक शिक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र के राजदूत श्री गाॅर्डन ब्राउन, मुझसे बड़े आदरणीय जन, मेरे प्यारे भाइयों और बहनों.

अस्सलाम अलैकुम...

एक लंबे वक्फे के बाद फिर से बोलना, मेरे लिए एक फख्र की बात है. यहां इतने सम्मानीय लोगों के बीच होना मेरे जीवन की एक महान घड़ी है. मेरे लिए यह बेहद गौरव की बात है कि मैंने महरूम बेनजीर भुट्टो का शॉल ओढ़ रखा है. मुझे यह नहीं पता कि मैं कहां से अपनी बात शुरू करूं. मुझे यह नहीं मालूम कि लोग मुझसे क्या बोलने की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन सबसे पहले उस खुदा का शुक्रिया जिनकी निगाह में हम सब बराबर हैं. आप सभी लोगों का शुक्रिया जिन्होंने मेरी सलामती और नयी जिंदगी के लिए दुआ मांगी. लोगों ने मुझे जितना प्यार दिया है, उस पर यकीन करना मुश्किल है. मुझे दुनिया के कोने-कोने से मेरी खुशामती की दुआओं से भरे हजारों कार्ड और तोहफे मिले हैं. आप सभी को इनके लिए शुक्रिया. उन बच्चों का शुक्रिया जिनके मासूम अल्फाज मेरी हौसला अफजाई करते हैं. अपने से बड़ों का शुक्रिया, जिनकी दुआओं ने मुझे मजबूती दी है. मैं पाकिस्तान और ब्रिटेन हाॅस्पीटल के अपने डाॅक्टरों, नर्सों व कर्मचारियों को, साथ ही यूनाइटेड अरब अमीरात सरकार को शुक्रिया कहना चाहती हूं, जिन्होंने स्वस्थ होने में मेरी मदद की.

मैं संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मूल को उनके ग्लोबल एजुकेशन फर्स्ट  (सबसे पहले शिक्षा की वैश्विक  मुहिम) की पहल का,  साथ ही वैश्विक शिक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र के राजदूत  गाॅर्डन ब्राउन का और संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष वुक जेरेमिक का पुरी तरह समर्थन करती हूं. वे दुनिया को लगातार जो लीडरशिप दे रहे हैं, उसके लिए मैं उनकी शुक्रगुजार हूं. आप,  हम सभी को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं.

मेरे प्यारे भाइयों ओर बहनों, एक बात को हमेशा गांठ बांध कर याद रखिए, मलाला दिवस, मेरा दिवस नहीं है. यह वैसी हर महिला, हर बच्चे और हर लड़की का दिन है, जिसने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठायी है.

सैकड़ों मानवाधिकार कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता न सिर्फ अपने अधिकारो के लिए आवाज उठा रहे हैं, बल्कि वे शान्ति, शिक्षा और समानता के अपने लक्ष्यों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. आतंकवादियों के हाथों हजारों लोग मारे गये हैं, लाखों लोग घायल हुए हैं. मैं उनमें से ही एक हूं. इसलिए मैं यहां खड़ी हूं, क्योंकि मैं कई लड़कियों में से एक हूं. मैं सिर्फ अपनी तरफ से नहीं बोल रही हूं, बल्कि उन सभी की तरफ से बोल रही हूं, जिनकी आवाज नहीं सुनी जाती. उनकी तरफ से जिन्होंने अपने अधिकारों की खातिर लड़ाई लड़ी है. शान्ति के साथ रहना उनका हक है. गरिमा और सम्मान के साथ रहना उनका हक है. समानता और अवसर की मौजूदगी उनका हक है. शिक्षित होना उनका हक है.

मेरे प्यारे साथियों, नौ अक्तूबर, 2012 को तालिबान ने मेरे माथे के बायें हिस्से में गोली मारी थी. उन्होंने मेरी साथियों पर भी गोलियां बरसायीं. उन्होंने सोचा कि गोलियां हमें खामोश कर देंगी. लेकिन वे हार गये. और उस खामोशी से हजारों आवाजें बाहर निकल पड़ीं. आतंकवादियों ने सोचा कि वे मेरे मकसद को बदल देंगे और मेरी महत्वाकांक्षाओं के पर कतर देंगे. लेकिन इसने मेरे जीवन में कुछ भी नहीं बदला, सिवाय इस बात के कि मेरी कमजोरियां, डर और निराशा खत्म हो गयी. मेरे अंदर,एक शक्ति,  क्षमता और साहस का जन्म हुआ. मैं आज भी वही मलाला हूं, मेरी आशाएं वैसी ही हैं. मेरे सपने भी पहले की ही तरह जिंदा हैं. प्यारे भाइयों और बहनों मैं किसी के खिलाफ नहीं हूं. मैं यहां इसलिए नही खड़ी हूं ताकि तालिबान या किसी दूसरे आतंकी संगठन से बदला लेने की भाषा मे बात करूं. मैं यहां खड़ी हूं ताकि हर बच्चे के लिए शिक्षा का आधिकार की मांग उठा सकूं. मैं तालिबान और दूसरे कट्टरपंथी आतंकवादियों के बच्चे-बच्चियों के लिए शिक्षा की वकालत करती हूं. मेरे मन में उस तालिब के लिए भी नफरत नहीं, जिसने मुझे गोली मारी. अगर मेरे हाथों में बंदूक होती और वह मेरे सामने खड़ा होता, तो भी मैं उस पर गोली नहीं चलाती. यह वह करुणा है, जो मैंने दया के पैगंबर मोहम्मद, ईसा मसीह और भगवान बुद्ध से सीखी है. यह परिवर्तन की वह परंपरा है, जो मुझे मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला और मोहम्मद अली जिन्ना से विरासत में मिली है.

यह अहिंसा का वह फलसफा है जिसका पाठ मैंने मैंने गांधी, बाचा खान और मदर टेरेसा से सीखा है. लोगों को को माफ करने की यह क्षमता मैंने अपने माता-पिता से सीखी है. मेरी आत्मा मुझसे यही कह रही है कि अमन के साथ रहो और हर किसी से प्यार करो.

मेरे प्यारे भाइयों और बहनों हम अंधेरे का महत्व तब समझते हैं, जब हमारा सामना अंधेरे से होता है. हमें अपनी आवाज का महत्व तब पता चलता है, जब हमें खामोश कराया जाता है. इसी तरह उत्तरी पाकिस्तान के स्वात में जब हमने बंदूकें देखीं, तब हमें किताब और कलम का महत्व पता चला. पुरानी कहावत कि कलम तलवार से ज्यादा ताकतवर होती है, सही है. कट्टरवादियों को किताबों और कलमों से डर लगता है. शिक्षा की शक्ति उनमें खौफ पैदा करती है. महिलाएं उन्हें भयभीत करती हैं. महिलाओं की आवाज की ताकत उन्हें डराती है.  यही वजह है कि उन्होंने हाल ही में क्वेटा में किये गये हमले में 14 मासूम बच्चों की जान ले ली. यही कारण है कि वे महिला शिक्षिकाओं की हत्या करते हैं. यही कारण है किवे रोज स्कूलों को बम से उड़ा रहे हैं, क्योंिक वे पहले भी और आज भी उस बदलाव और समानता से डरे हुए हैं जो हम समाज में ला सकते हैं.  मुझे याद है कि हमारे स्कूल के एक लड़के से एक पत्रकार ने सवाल किया था, ‘तालिबान शिक्षा के खिलाफ क्यों हैं?’ उसने बेहत सहजता से इसका जवाब दिया था, ‘ क्योंकि एक तालिब को नहीं मालूम कि उस किताब के भीतर क्या लिखा है. ’ उनको लगता है कि भगवान एक पिलपिला, रूढ़ीवादी जीव है, जो लोगों के सिर पर सिर्फ इसलिए बंदूक तान देगा, क्योंकि वे स्कूल जा रहे हैं.

आतंकवादी अपने निजी फायदों के लिए इसलाम के नाम का दुरुपयोग कर रहे हैं. पाकिस्तान एक शान्तिप्रेमी लोकतांत्रिक देश है. पख्तून अपने बच्चों और बच्चियों के लिए शिक्षा चाहते हैं. इसलाम शान्ति, मानवता और भाइचारे का मजहब है. इसके अनुसार हर किसी का कर्तव्य है कि हर बच्चा-बच्ची शिक्षा हासिल करे. शिक्षा के लिए शांति जरूरी है. दुनिया के कई हिस्सों में खासकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवाद, युद्ध और संघर्ष बच्चों को स्कूल जाने से रोक रहे हैं. हम लोग सचमुच में इन युद्धों से थक गये हैं. दुनिया के कई हिस्सों में इसकी वजह से बच्चों और महिलाओं को कई तरह के कष्टों का सामना करना पड़ रहा है.

भारत में मासूम गरीब बच्चे बाल श्रम के शिकार हैं. नाईजीरिया में कई स्कूल तबाह कर दिये गये हैं. अफगानिस्तान में चरमपंथ ने लोगों के जीवन को प्रभावित किया है. कम उम्र की लड़कियों को घरेलू बाल मजदूर के तौर पर काम करना पड़ता है. उन्हें कम उम्र में शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है.गरीबी, उपेक्षा, नस्लवाद और मौलिक अधिकारों से महरूम किया जाना; ये वे समस्याएं हैं, जिनका सामना आज स्त्री और पुरुष दोनों को करना पड़ रहा है.

आज मैं महिलाओं के अधिकारों और लड़कियों की शिक्षा पर सबसे ज्यादा बात इसलिए कर रही हूं क्योंकि सबसे ज्यादा कष्ट वे ही उठा रही हैं. एक समय था जब महिला कार्यकर्ता  अपने अधिकारों के लिए पुरुषों से आगे आने की अपील करती थीं, लेकिन अब हम यह काम खुद करेंगे. मैं पुरुषों से यह नहीं कह रही कि वे स्त्रियों के अधिकारों के लिए बोलना छोड़ दें, लेकिन मैं मानती हूं कि माहिलाओं को खुद आजाद होना होगा और अपने अधिकारों के लिए खुद आवाज उठानी होगी. इसलिए मेरे प्यारे भाइयों और बहनों यह आवाज उठाने का वक्त है.इसलिए आज हम विष्व के नेताओं से यह अपील करते हैं कि वे अपनी नीतियों को षांति और समृद्धि के पक्ष में बदलें. मैं उनसे अपनी करती हूं कि उनकी नीतियां बच्चों और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए होनी चाहिए. केई ऐसा समझौता जो महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ जाता है, हमें मंजूर नहीं है.

हम दुनिया की सभी सरकारों से हर बच्चे के लिए मुफ्त और अनिवार्य षिक्षा की व्यवस्था करने की अपील करते है. हम उनसे आतंकवाद और खून-खराबे के खिलाफ संघर्ष करने की, बच्चों को अत्याचारों से बचाने की दरख्वास्त करते हैं. हम विकसित देशों से अपील करते हैं कि वे विकासशील देशों में लड़कियों के लिए शिक्षा के अवसरों में वृद्धि लाने में मदद करें.  हम दुनिया के सभी समुदायों से अपील करते हैं कि वे सहिष्णु बनें और जाति, नस्ल, धर्म, पंथ या एजेंडे पर आधारित पूर्वाग्रहों से मुक्त  हो कर स्त्रियों की आजादी और समानता को सुनिष्चित करने की दिशा में कदम बढ़ाएं, जिससे वे अपना विकास कर पायें.हम सभी तब तक सफल नहीं हो सकते, जब कि आधी आबादी को पिछड़ेपन में जीने के लिए मजबूर किया जायेगा. हम दुनिया भर की अपनी बहनों से अपील करना चाहते हैं कि वे साहसी बनें, अपने भीतर ताकत पैदा करें और अपने भीतर दबी संभावनाओं को हासिल करें.

मेरे प्यारे भाइयों और बहनों हम हर बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए स्कूल और शिक्षा चाहते हैं. हम शान्ति  और शिक्षा की मंजिल तक अपनी यात्रा को ले जाने के लिए कृत संकल्प हैं. हमें कोई नहीं रोक सकता. हम अपने अधिकारों के लिए आवाज उठायेंगे और बदलाव लेकर आयेंगे. हम अपने शब्दों की ताकत को पहचानते हैं. हमारे शब्द पूरी दुनिया को बदल सकते हैं, क्योंकि हम सब साथ हैं, शिक्षा के उद्देश्य के लिए एकजुट हैं. और अगर हमें अपने लक्ष्यों को हासिल करना है, तो हमें अपने आप को शिक्षा के शस्त्र से ताकतवर बनाना होगा और खुद एकता और बहनापे के मजबूत कवच से अपनी रक्षा करनी होगी.

भाइयों और बहनों हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया की एक बड़ी आबादी गरीबी, अन्याय और उपेक्षा का दंश झेल रही है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि करोड़ों बच्चे स्कूल से बाहर हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे भाई-बहन एक चमकते शान्तिपूर्ण भविष्य का इंतजार कर रहे हैं.

इसलिए आएं, अशिक्षा, गरीबी और आतंकवाद के खिलाफ एक महान संघर्ष की शुरुआत करें. आएं हम सब अपनी कलम और किताबों को हाथों में थाम लें. उनसे ज्यादा ताकतवर अस्त्र और कोई नहीं है. एक बच्चा, एक शिक्षक, एक किताब और एक कलम दुनिया को बदल सकते हैं. शिक्षा ही एकमात्र समाधान है. सबसे पहले शिक्षा. एजुकेशन फर्स्ट।

शुक्रिया.



23 October 2013

भुवनेश्वर की नजर में प्रेमचंद

इस महीने 8 तारीख (अक्तूबर) को प्रेमचंद की पुण्यतिथि थी. उस वक्त प्रेमचंद पर कुछ नया खोज रहा था, तब भुवनेश्वर की प्रेमचंद की मृत्यु  के बाद लिखी  इस ओबिचुरि से सामना हुआ. एक जीनियस पर दूसरे जीनियस की कलम से लिखा गया यह छोटा सा पीस आप भी पढ़ें। अखरावट


8 अक्तूबर ’36 को प्रेमचंद की मौत हो गयी. .

8 अक्तूबर ’36 को प्रेमचंद बहस-मुबाहसे, स्नेह और कटु आलोचना से परे हो गये. यह हिंदी के सबसे महान साहित्यिक का मामला है कि तुच्छ और खुदगर्ज मुबाहसे से परे होने के लिए 60 साल की उम्र में उसे मरना पड़ा, जिस उम्र में साहित्यिक कलमनवीसी से उपर उठता है, महात्मा और प्रेरक समझा जाता है और गोर्की के नाम पर शहर और वायुयान बनते हैं. प्रेमचंद को हिंदी का साधारण समादर भी नहीं मिल सका. वह अपनी प्रशंसक जनता के इतना निकट रहे कि उनका व्यक्तित्व सदैव नीरस बना रहा. पत्रिकाओं में कहानियां छपवाते, सिनेमा से धन पैदा करते, पुस्तकों की बिक्री के लिए साधारण प्रयत्न करते, 8 अक्तूबर, ’36 को प्रेमचंद की मौत हो गयी.

यदि प्रेमचंद का एक तुच्छ प्रशंसक आज यह लिखता है कि 8 अक्तूबर, ’36 को हिंदी-साहित्य की एक शताब्दी पर काल की मुहर लग गयी, तो वह एक ‘अति-प्रेमी’ के लांछन से कैसे बचेगा. प्रेमचंद हिंदी की एक शताब्दी थे. भविष्य का साहित्य इस युग से प्रेमचंद लेकर बाकी इत्मीनान से छोड़ देगा.
इसके अनेक कारण हैं.

यह नहीं कि उन्होंने 50 ऐसी कहानियां पैदा कीं, जो विश्व साहित्य में अपना स्थान बना सकती हैं
उन्होंने हिंदी साहित्य में एक नये जीवन का आह्वान किया. नहीं, उन्होंने साहित्य का असल रूप हिंदी को दिया, उन्होंने मौलिकता सृजित की, उन्होंने मौलिकता को एक द्रुत सजग वेश दिया, उन्होंने जैनेंद्र को पैदा किया.

प्रेमचंद की प्रतिभा और जीनियस खुद पैदा-करदां थी. वह शेली नहीं था. टैगोर नहीं था. शुरुआत में वह लिखने का शौ कीन था, बीच में वह एक कठिन संग्राम करता हुआ कलाकार और बाद में एक करेक्टर.
वह करेक्टर कैसा था?

ऐसा नहीं, जैसा गांधी या टॉलस्टॉय, जो संसार की सहस्र-फन विषमता को एक बिंदु पर आकर मिटा देता है, जो वस्तुतः कवि हो जाता है. उसका करेक्टर उनकी अनेकता थी.
ऐसी अनेकता, ऐसी वेराइटी की मिसाल विश्व साहित्य में भी नहीं मिलती. वह मोपांसा की मोर्बिडिटी से भी ऊंचा उठ गया.

उसके जीवन में एक स्वर सुनाई देता था कि वह समय के पीछे छूट गया, उसके साथी तो विक्टोरियन कलाकार थे और मरने के बाद वह विक्टोरियन हो ही गया. पर ऐसा विक्टोरियन, जो पूर्ण सहानुभूति में विश्वास रखता था, जो हनन करना भी जानता था, जो प्रकार और आकार में भेद कर सकता था, जो अपनी कला के लिए कच्चा माल लेने बार-बार सीधा, जीवन तक जाता था, जो समझता था, जो केवल विश्लेषक नहीं था.

हाँ,  वह फ्रायड के बाद का साहित्यिक था और सदा फ्रायद से दूर रहा. सेक्स एक बड़ी शक्ति है, पर साहित्य से उसका संबंध स्थापित करना कलाकार की इच्छा पर है. अगर उसने अपनी स्वतंत्रता से हम डीएच लारेंस और मोरिस डि कॉरन पढ़नेवालों को निराश किया तो वह कसूरवार नहीं है और न हम.

माधुरी, १९३६ में प्रकाशित

22 October 2013

उस देश का यारो क्या कहना !


मनोहर श्याम जोशी का व्यंग्य पढ़िए और देखिये कि हमारा क्षयग्रस्त कल कैसे हमारे आज में जीवित है, बल्कि वह अधिक जर्जर, अधिक रुग्न ही हुआ है.  भारत में चूंकि समय नहीं बदलता, इसलिए अपने समय पर सटीक टिप्पणी  कालजयी हो जाती है. यह कुछ ऐसी ही मनोहर कालजयी टिप्पणी है, एक खिलंदड़ेपन  का अंदाज लिए हुए.   अखरावट 

 

उस देश का यारो क्‍या कहना? और क्‍यों कहना? कहने से बात बेकार बढ़ती है। इसीलिए उस देश का बड़ा वजीर तो कुछ कहता ही नहीं था। कहना पड़ जाता था तो पिष्‍टोक्तियों में ही बोलता था। पिष्‍टोक्तियों से कोई नहीं पिटता। पिष्‍टोक्तियाँ हजम भी आसानी से होती हैं। सच, कहने में कोई अर्थ नहीं है, कहना पर व्‍यर्थ नहीं, कहने पर मिलती है एक तल्‍लीनता और एक पारिश्रमिक का चेक (कई बार फोन करने और चिट्ठी भेजने पर)। तो मैं उस देश के बारे में कुछ कहने बैठा हूँ जो दुनिया का सबसे अधिक सफाई-पसंद देश है। यह सही है कि वहाँ कीचड़ से भी होली खेली जाती है, लेकिन यह भी सही है कि वहाँ के वातावरण में ही सफेदी लानेवाले कुछे ऐसे विशिष्‍ट रसायन पाए जाते हैं कि सारी होली के बाद बेचारे ढूँढ़नेवाले कीचड़ के दाग ढूँढ़ते ही रह जाते हैं। वहाँ के आमोद-प्रिय निवासी एक-दूसरे पर कीचड़ जमकर फेंकते हैं लेकिन कीचड़ किसी पर लगता या जमता नहीं है। हर कोई, हर क्षण बेदाग सफाई का, हँसता हुआ नूरानी विज्ञापन बना रह पाता है।

गैर-सफाई-पसंद देशों में मानो सारा महत्व ही कीचड़ का है। जिस पर जरा-सी कीचड़ उछलती है, उसे घबराकर पद से, और कभी-कभी तो जीवन से ही त्‍यागपत्र दे बैठने की सूझती है। मगर उस सफाई-पसंद देश में कीचड़ कमल का कुछ बिगाड़ नहीं पाता है। बल्कि पंक जितना ही ज्‍यादा उछले-गिरे, पंकज उतना ही देदीप्‍य होता जाता है। उस देश के समझदार लोग इसीलिए कीचड़ महज शौकिया उछालते हैं, एक शगल के नाते उछालते हैं। इस मामले में वे कभी सीरियस नहीं होते। सीरियसली तो वह कमल की प्रार्थना ही करते हैं।
उस सफाई-पसंद देश के निवासी अपना दिमाग बार-बार साफ करते रहते हैं। इससे उन्‍हें सिर्फ काम की ही बातें याद रहती हैं। शहर के अंदेशे उनके दिमाग पर बोझ नहीं बनते हैं। इतिहास की स्‍मृति सहज उत्‍साह की राह में बाधा नहीं डाल पाती है। उस देश के निवासी अपना दिल भी साफ करते रहने के बारे में बहुत सजग हैं। इसीलिए वे अपनी सारी भावनाएँ अपने पर और अपनों पर केंद्रित रख पाते हैं। रो लेने की विधि, चीखने-चिल्‍लाने की विधि से बेहतर समझते हैं। वे जानते हैं कि चीखने-चिल्‍लाने से तो रक्‍तचाप ही बढ़ना है। रो लेने से और कुछ नहीं तो मन की शांति तो मिलेगी। और वह मिलेगी तो फिर शांत मन से अपनी और अपनों की समस्‍याओं का विचार कर सकेंगे। चित्त शांत होने से रक्‍तचाप भी नीचे आएगा। नित्‍य नियम से रोकर दिल की सफाई करते रहनेवाले उस देश के निवासी हार्ट अटैक और स्‍ट्रोक जैसी उन बीमारियों से बचे रह पाते हैं जो चीखने-चिल्‍लानेवाले देशों में बहुत व्‍यापक रूप से फैल गई हैं।

जहाँ तक पेट साफ रखने का सवाल है, इस मामले में तो उस देश के निवासी जगदगुरु सिद्ध हुए हैं। उनके यहाँ की एक कब्‍जहर भूसी का तो आज उन्‍नत देश के निवासी तक सुबह-सुबह जय-घोष करते पाए जाते हैं।
उस सफाई-पसंद देश में छोटे-से-छोटा अनुष्‍ठान भी बाहरी और भीतरी शुचिता के बारे में पूरी तरह आश्‍वस्‍त हो जाने पर ही करने की स्‍वस्‍थ परंपरा रही है। उस देश में उस बाहरी और भीतरी शुचिता के बारे में केवल एक मंत्र पढ़कर और तीन बार आचमन करके आश्‍वस्‍त हो सकने की सुविधाप्रद परंपरा भी रही है। उस सफाई-पसंद देश के नागरिक हिसाब साफ रखने में यकीन करते हैं और जब हिसाब साफ कर दिया जाता है तब वे स्‍वयं हमेशा लेनदार साबित होते हैं, प्रतिपक्ष देनदार। उस देश के निवासी साफ बात कहने और करने का आग्रह करते हैं और बहुत सफाई से बात कहना और करना बखूबी जानते हैं। वे अपने शत्रुओं तक को मारते नहीं, बस साफ कर देते हैं। उनके सफाई-पसंद होने का इससे बड़ा क्‍या प्रमाण होगा कि वे झूठ तक साफ-साफ बोलते हैं।

इन सफाई-पसंद नागरिकों को बराबर प्रेरणा देते रहने के लिए संसार की सबसे पवित्र नदी उसी देश में बहती है जो मैल को ही नहीं, पाप को भी काट देती है। सबसे पवित्र पर्वत-माला उसी देश के केशों में लिपटी है। और उस देश की मिट्टी तो इतनी पवित्र है कि उससे तिलक करने की सलाह दी जाती है। आज भी वहाँ की जनता अपने नेताओं के चरणों से लिपटी हुई इस पवित्र धूल को माथे से लगाकर धन्‍य होती है। उस देश की माटी स्‍वयं तो पवित्र है ही, अपने स्‍पर्श मात्र से शुचिता प्रदान करने की अद्भुत क्षमता रखती है।

तो क्‍या आश्‍चर्य जो उस देश की बहुसंख्‍यक आबादी सदा धूलि-धूसरित रहती आई है और अपने बच्‍चों को धूल में लोट लगाता देखकर पुलकित होती रही है। यही नहीं, हाथ धोने के लिए वह इस माटी को महँगे और महकते विदेशी साबुनों से बेहतर समझती आई है। इधर जब से उस देश में टेलीविजन ने उपभोक्‍ता संस्‍कृति के नाम पर विदेशी साबुनों का विज्ञापन शुरू किया है, कुछ कमजोर कलेजेवाले लोग घबरा उठे हैं और अपने देश की पवित्रता पर आँच आने का खतरा देख रहे हैं। सौभाग्‍य से उस देश में नेतृत्‍व हमेशा ऐसे ही लोगों के हाथ में रहता आया है, जो उस देश को ठीक-ठाक जानते हैं। न ज्‍यादा, न कम। बस इतना कि कम जाननेवालों से कह सकें कि आप नहीं जानते हैं, इसलिए आपके हितों के संरक्षण और संवर्द्धन का काम हम अपने हाथों में लिए ले रहे हैं। और जो ज्‍यादा जानते हों, उन्‍हें बता सकें कि जिस देश में यह पवित्र नदी विशेष बहती है, उसमें ज्‍यादा जाननेवाले अपने देश को ठीक से न पहचानने के लिए अभिशप्‍त रहे हैं।

तो विदेशी साबुनों का आक्रमण होने पर इन नेताओं ने कहा कि जिस देश में पवित्र नदी विशेष बहती है, उस देश के निवासी आज भी देश की माटी से जुड़े हुए हैं। उसी को जोत-बोकर अपना पेट पाल रहे हैं। उसी से बने हुए घरों में वे रहते हैं। रात को उसी पर सुख की नींद सोते हैं। और सुबह उसी पर निवृत्त होकर, उसी से शौच करते हैं, किसी सिने-तारिका के सौंदर्य साबुन से नहीं। तमाम पश्चिमी प्रभाव के बावजूद, टी.वी. से फैलती सांस्‍कृतिक टी.बी. के बावजूद, हमारे देश की असली आबादी को न ग्‍लैमररूम माने जा सकनेवाले बाथरूम में कोई आस्‍था हुई है, और न टायलेट पेपर से सफाई करने में कोई श्रद्धा। सच तो यह है कि वह आज भी इन पश्चिमी चोंचलों से अपरिचित है।

यह ठीक है कि गाँव के लोग शहरों की तरफ भागने लगे हैं। दूसरों की क्‍यों कहें स्‍वयं हम भी गाँवों से शहर में आ बसे हैं। लेकिन इसका यह अर्थ ह‍रगिज नहीं लगाया जाना चाहिए कि देश पश्चिम के प्रभाव में आ रहा है या कि उसका शहरीकरण हो रहा है। इससे तो केवल यह संकेत मिलता है कि देश में लोकतंत्र स्‍वस्‍थ है, सबल है। शहरों पर, सत्ता पर, उच्‍चवर्गीय शहरियों की बपौती नहीं रह गई है। झोंपड़ेवाले भी सरकारी बँगला-कोठी के दावेदार बन गए हैं।

नेताओं ने यह भी कहा कि गाँववालों के शहर में आने के बावजूद गाँवों की आबादी घट बिलकुल नहीं रही है। जनसंख्‍या के आँकड़े बताते हैं कि हमारे देश की अधिकतर आबादी अब भी गाँवों में ही रहती है। परमात्‍मा हमारे देश की पवित्र छवि को बनाए रखने के लिए इतना चिंतित है कि उसने देश-माता को एक अद्भुत वरदान दे डाला है। चाहे विकास के कितने भी पंचवर्षीय आयोजन पूरे हो जाएँ, चाहे तेरे कितने भी बेटों के लिए कितना भी आरक्षण कर दिया जाए, चाहे तेरे कितने भी बेटे शहरों को चले जाएँ, तू जहाँ है वहीं रहेगी, पवित्र धूल से धूसरित गाँव में। और जब देश की माता ग्रामवासिनी रहेगी, तब देश भी ग्रामवासी ही रहेगा।

जरा ये भी देखिएगा कि गाँव से शहरों में आई हुई यह आबादी अपने नित्‍य कर्म में अपनी जमीन से, अपनी माटी से अपना यह पवित्र संबंध बराबर जोड़े हुए है। गाँव से आई जनता को तो शहर में रेल पटरी के आसपास या फिर सरकारी बँगले में बँधी हुई अपनी-अपनी भैंस की पीठ पर हाथ फेरते हुए इन नेताओं ने शंकालुओं को यह भी समझाया कि जो लोग हमारी तरह गाँव से शहर आ गए हैं, वे भी अपने नित्‍य कर्म में अपनी जमीन और माटी से अपना वह पवित्र संबंध बराबर जोड़े हुए हैं। गाँव से आई जनता को तो शहर में रेल पटरी के आसपास या फिर पार्कों में अपनी जमीन से संपर्क साधे देखते ही होंगे आप, कभी हमारे सरकारी बँगलों और निजी शहरी फार्म हाउसों में सुबह-सुबह कोई आएँगे तो पाएँगे कि विदेशी कमोड हमारे लिए कब्‍जकारी है और हमारे ग्‍लैमररूम जैसे बाथरूम में लिक्विड सोप से अधिक सम्‍मान देश की माटी को प्राप्‍त है।

जब कुछ संवाददाताओं ने देश की बहुसंख्‍यक आबादी के माटी से जुड़े इस संबंध को ही देश के गंदे होने का प्रमाण बताया और एक हाथ की तर्जनी और अँगूठे से दोनों नथुने बंद करके दूसरे हाथ की तर्जनी सफाई-पसंद देश की तथाकथित गंदगी की ओर उठाते हुए हैरान होकर पूछा कि यहाँ लोग साँस भी कैसे ले पाते हैं? तब नेता बोले, काश कि कभी आप अपने नथुने खोलते और स्‍वयं अनुभव करके देखते कि और तमाम चीजों के साथ-साथ हमारे देश का पवन भी पावन है और उनके जैसे पतितों का भी उद्धार कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी नाक के साथ-साथ आप फिरंगी और फिरंगीवत आलोचकों ने अपनी आँखें भी बंद कर रखी हैं अन्‍यथा आप निश्‍चय ही ये देख पाते कि हमारे देश की बहुसंख्‍यक आबादी, इसी हवा से निर्मित हमारे चुनावी वादों पर जीती आई है।

नेताओं ने इस ओर भी ध्‍यान दिलाया कि सफाई-पसंद देश को आकंठ गंदगी में डूबा हुआ बताने के दुस्‍साहस को कभी व्‍यंग्‍य-विडंबना में तो कभी मानवीय चिंता में छिपा जाने की कोशिश करते हैं। सफाई-पसंद देश में गंदगी देखने-दिखानेवाले इन लोगों को उन्‍होंने 'नाबदान के नायब इंस्‍पेक्‍टर' और 'गंदे चहबच्‍चे के बच्‍चे' ठहराकर अपनी ग्रामवासिनी माता की तथाकथित गंदगी की सफाई में ऐसे-ऐसे तर्क दिए कि आलोचकों के मुँह खुले रह गए और बोलती बंद हो गई। उदाहरण के लिए उस देश के नेताओं ने कहा कि अलग-अलग देशकाल में गंदगी की परिभाषा अलग-अलग तरह की होती आई है क्‍योंकि सौंदर्य-बोध देशकाल सापेक्ष है। अस्‍तु जैसे आपको हमारी अपनी नाक अपनी जमीन पर सिनक देना गंदा लगता है, उसी तरह हमें आपका नाक रूमाल में सिनककर रूमाल को अपनी जेब में रख लेना गंदा लगता है। अगर आप तटस्‍थ होके देखें तो इस मामले में ही नहीं और तमाम बातों में भी आपकी गंदगी, हमारी गंदगी से कुछ ज्‍यादा ही गंदी ठहरेगी।
नाबदान के नायब इंस्‍पेक्‍टरों से उस देश की नेता बिरादरी यह कहती थी कि गंदगी दरअसल आपके दिमाग में है। इसीलिए आप हमारी तथाकथित गंदगी में ही अटके रह जाते हैं। हमारी सफाई आपको नजर ही नहीं आती है। अरे आपको हमारा गलियों में कूड़ा फेंकना तो नजर आता है लेकिन इससे पहले जब हम घर की सफाई करके वह कूड़ा जमा कर रहे होते हैं तब आप आँखें मींच लेते हैं। अजी सच तो ये है कि जब आप हमारी गंदगी का मजाक उड़ा रहे होते हैं तब आप वस्‍तुतः हमारी गरीबी का मजाक उड़ा रहे होते हैं और यह भूल जाते हैं कि इस गरीबी के लिए आप ही पूरी तरह जिम्‍मेदार हैं। हम इस देश के नेता जरूर हैं मगर इस देश का बेड़ा गर्क कर सकनेवाले तो आप विदेशी ही थे, हैं और रहेंगे। अगर सच्‍चे मन से हिसाब लगाएँगे तो पाएँगे कि हमारी विराट आबादी को देखते हुए हमारी गंदगी कुछ भी नहीं है। आप लोगों की प्रति व्‍यक्ति आय ही नहीं, प्रति व्‍यक्ति गंदगी भी हमसे सौ-गुनी है।

उस देश को ठीक-ठाक जाननेवाले लोग उस देश की गंदगी की ही नहीं, हर कमजोरी की तसल्‍लीबख्‍श सफाई देते रहे। इसीलिए सारी दु‍निया अंततः यह मानने को मजबूर हुई कि तमाम गरीबी और गंदगी के बावजूद वही दुनिया का सबसे ज्‍यादा सफाई-पसंद देश है। वहाँ हर कोई सफाई मॉंगता है और हर कोई सफाई दे सकता है।
"इस बारे में मैं कोई टिप्‍पणी नहीं करना चाहता" जैसी कायर उक्तियाँ उस देश के कायर-से-कायर नेता तक के लबों पर कभी नहीं आतीं।

उस सफाई-पसंद देश में सफाई माँगने के नाम पर गंदगी फैलाना, खोदखाद कूड़ा सबके सामने बिखरा देना अच्‍छा नहीं समझा जाता है, इसलिए एक अलिखित-सा समझौता है कि सफाई माँगी जरूर जाए, मगर जो सफाई दी जाए, उसे जहाँ तक हो सके, स्‍वीकार कर लिया जाए। सफाई हमेशा बहुत साफ और सरल दी जाती है ताकि कोई ऐसा न कह सके कि गोलमाल बात करके कुछ छिपाने की कोशिश की जा रही है। सबसे साफ और सरल सफाई वह मानी जाती है जिसमें आरोप को बिलकुल बेबुनियाद बताया गया हो। उदाहरण के लिए एक बार वहाँ छोटे वजीर पर यह आरोप लगा कि उसने अपने भाई की मदद से विदेशों में घूस खाई है। उसने पहले सफाई दी कि मैंने कोई घूस नहीं खाई है। मेरे पास जो भी पैसा आया है, जायज तरीकों से ही आया है। इस पर आरोप लगानेवाले ने सिद्ध करना चाहा कि भाई ने पैसा नाजायज तरीके से कमाया और नाजायज तरीके की कमाई में छोटे वजीर ने हिस्‍सा लिया है। छोटे वजीर ने बयान दिया कि इस बारे में मैंने अपने भाई से सफाई माँगी है और उसका कहना है कि आरोप बेबुनियाद है। मैं मानवीय भाईचारे में विश्‍वास करता हूँ। आप न करते हों तो आगे बात मेरे भाई से कीजिए।

किसी की सफाई को देर-सवेरे न मान लेना उस सफाई-पसंद देश में शिष्‍टाचार के विरुद्ध समझा जाता है। फिर भी विदेशी प्रभाव में आए कुछ लोग किसी भी सफाई से संतुष्‍ट न होकर आरोप लगाते चले जाते हैं। ऐसी दशा में उस देश में पुलिस का एक पूरा विभाग ही सत्‍यासत्‍य की जाँच के लिए खोल दिया गया है। सफाई-पसंद देश के निवासी अनिवार्य रूप से उसकी जाँच के नतीजों के बारे में भी सफाई माँगते हैं। इसीलिए उस देश में जाँच कमीशन और प्रवर समिति बैठाकर गंभीर कांडों की गहराई तक जाने का प्रावधान है।

किनारे पर बैठकर पानी में पाँव डाले हुए वह कमीशन, गहराई के विषय में पूर्वानुमान करते हुए काफी समय लेता है। इस बीच वह मामला सफाई-पसंद देश की स्‍मृति से साफ हो चुका होता है। कमीशन उस नतीजे पर पहुँचता है कि गहराई तो ऐसी है कि सारी व्‍यवस्‍था को ले डूबे लेकिन अब उसमें जाने से कोई फायदा नहीं है। आवश्‍यकता इस बात की है कि आइंदा सावधानी बरती जाए ताकि गंदे-गंदे आरोप लगने से इस सफाई-पसंद देश में गंदगी न फैले। गंदे आरोप लगानेवाले स्‍वयं इस विषय में बहुत सजग रहते थे कि कहीं हमारी वजह से हमारे देश का वातावरण गंदा न हो। इसीलिए वे सत्तारूढ़ व्‍यक्ति के पीछे हमेशा हाथ धोकर ही पड़ते थे। मगर जैसे ही सत्तावान मेहरबान होकर उन्‍हें कुछ दे देता है, वे उसके समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं।

गंदे आरोपों के बीच भी देश को स्‍वच्‍छ रखने के विषय में उस देश की नेता बिरादरी कितनी सजग है इसका एक अत्‍यंत सुंदर उदाहरण 'नीले होंठ कांड' में मिलता है। हुआ यह कि एक बार उस देश के किसी बड़े वजीर की घर से दूर अकस्‍मात मृत्‍यु हो गई। उसके पुत्र ने अपने पिता के शव के नीले होंठों की ओर जनता का ध्‍यान दिलाते हुए यह आशंका व्‍यक्‍त की कि मेरे पिता की हत्‍या की गई है। उसके चमचों ने नए बड़े वजीर पर परोक्ष ढंग से आरोप लगाया कि उसने सत्ता हथियाने के लिए पिछले बड़े वजीर की हत्‍या करा दी। लेकिन अंततः सफाई-पसंदी के हित में पिछले बड़े वजीर के पुत्र ने नए बड़े वजीर की यह सफाई मान ली कि पिछले बड़े वजीर दिल का दौरा पड़ने से पहले जामुन खा रहे थे और इसीलिए उनके होंठ नीले हो गए थे। पिछले बड़े वजीर के पुत्र ने न केवल यह सफाई मान ली बल्कि अपने चमचों के लगाए आरोपों से फैली गंदगी को दूर करने की खातिर नए बड़े वजीर का यह अनुरोध भी स्‍वीकार कर लिया कि वह अपने पिता का अधूरा काम पूरा करने के लिए फिलहाल छोटा वजीर बन जाए।

तो उस सफाई-पसंद देश में आरोप जितना ही गंभीर होता है, सफाई उतनी ही सरल होती है। आरोप को संगीन बनाने के लिए नित नए सबूत जुटानेवाले, उस देश में यह देखकर बहुत हैरान होते हैं कि संगीनी के साथ-साथ बढ़ती सफाई की सरलता आखिरकार बहुत सादगी से उनका ही सफाया कर देती है। सफाई-पसंद नागरिक सफाई देनेवाले की मासूमियत के कायल होते हैं और वही-वही आरोप दोहराए चले जानेवाले को सनसनी के नाम पर बोरियत फैलानेवाला ठहराते हैं।

उदाहरण के लिए एक बार वहाँ किसी विदेशी तोप की खरीद में कमीशन के पैसे खुद खा जाने का गंभीर आरोप बड़े वजीर पर लगाया गया। वह अपने को निर्दोष बताते रहे। उन्‍होंने कहा कि सर्वविदित है कि हम डायटिंग कर रहे हैं। इसलिए यह कल्‍पनातीत है कि हमने पैसे जैसी गरिष्‍ठ चीज खाई होगी। किसी और ने खा ली हो तो उसकी भी हमें कोई जानकारी नहीं है। जानकारी मिलेगी तो बताएँगे और आप निश्चित रहें, पैसा खाने के दोषी देश के कानून के अनुसार अवश्‍य दंड पाएँगे। आरोप लगानेवाले कहते रहे कि आप पूछेंगे, तभी तो जानकारी पाएँगे। जवाब में उन्‍हें यही सफाई सुनने को मिलती रही कि हम तमाम नियम-कायदों का पालन करते हुए पूछताछ कर रहे हैं। वही आरोप और वही सफाई का क्रम इतना लंबा चला कि उस सफाई-पसंद देश की पब्लिक झुँझला उठी और बोली कि जिन लोगों को उस तोप के सिवा कुछ नहीं सूझता है, उन्‍हें उसी तोप से उड़ा दिया जाए।

उस सफाई-पसंद देश में सफाइयाँ भी दो तरह की होती हैं, एक सार्वजनिक और एक निजी। सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई सफाई नहीं दी जाती है जिससे देश के वातावरण की स्‍वच्‍छता को आँच पहुँच सकती हो। निजी सफाई भी दो तरह की होती है। एक वह जो विश्‍वस्‍त मित्र के कान में कही जा सके और दूसरी वह जिसके बारे में कहा जा सके कि या तो मैं जानता हूँ या मेरा परमात्‍मा जानता है, और हाँ आरोप लगानेवाला भी। और चूँकि आरोप लगानेवाला उस बात को कहकर पहले ही वातावरण काफी गंदा कर चुका होता है इसलिए जिस पर आरोप लगा हो उसका यह कर्तव्‍य हो जाता है कि सफाई देकर उस गंदगी को साफ करे, यह नहीं कि स्‍वयं उसमें लोट लगाने लगे। यही कारण है कि सफाई के मामले में उस देश के सत्तावान लोग सार्वजनिक और निजी को हर हालत में अलग ही रखते थे।

एक बार को आप उन्‍हें सरकारी गाड़ी का घर की सब्‍जी लाने के लिए इस्‍तेमाल न करने के लिए मजबूर कर सकते थे। एक बार को आप उन्‍हें वजीर पद क्‍या, संसार भी छोड़ देने के वर्षों-वर्षों बाद तक सरकारी कोठी अपने ही नाम रखे रहने के लिए राजी कर सकते थे, लेकिन मजाल है जो आप उनसे किसी सार्वजनिक मंच से वह सफाई बुलवा देते, जो वे एक-दूसरे के कान में बोल दिया करते थे।

कोई साहब आपत्ति कर रहे हैं कि उस सफाई-पसंद देश का नाम क्‍यों नहीं ले रहा हूँ, इस बारे में तुरंत सफाई दूँ। लगता है ये भी उसी सफाई-पसंद देश के नागरिक हैं। तो साहब, मेरी सार्वजनिक सफाई ये है कि सठिया जाने के कारण मैं उस देश का नाम भी भूल गया हूँ। अब आपसे क्‍या छिपाऊँ, मैं तो अपने तीन बेटों के एक ही अक्षर से शुरू होनेवाले नामों तक में बुरी तरह गड़बड़ाने लगा हूँ। मेरे सामने इसके अलावा अब कोई रास्‍ता ही नहीं रह गया है कि उनमें से कोई भी सामने आए, मैं क्रम से तीनों के नाम लेता चला जाऊँ। कहना न होगा कि इससे जहाँ पहले बेटे को बहुत सुविधा हुई है, वहीं तीसरे को इतनी असुविधा कि अब उसने अपने कोट या कमीज पर अपनी नाम-पट्टी लगानी शुरू कर दी है। दिक्‍कत यह है कि मेरी निगाह भी सठिया गई है और मैं उस नाम-पट्टी को तभी पढ़ सकता हूँ जब वह मेरी निगाह से चौथाई मीटर की दूरी पर हो। जहाँ तक मेरे दूसरे बेटे का सवाल है उसने अपनी इस स्थिति को स्‍वीकार कर लिया है कि मेरा नाम, मेरे पिता द्वारा दूसरी कोशिश में ही सही पुकारा जाएगा।

अब आप अपने कान मेरे होंठों के करीब ले आए हैं तो निजी सफाई भी दे डालूँ। उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेरा साहस घटता चला गया है। अब कौन इस उम्र में नाम लेकर झमेले में पड़े।

हिंदी समय की साईट से साभार

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