3 February 2014

अन्दर से लिखने की हूक उठती है...: मनोज रूपड़ा


मनोज रूपड़ा युवा कथाकारों की पीढ़ी में अलग से चमकता हुआ नाम हैं. उनकी कहानियाँ अपने नीरव जादुई एहसास के कारण खुद ही पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं. आप भी पढ़िए मनोज रूपड़ा से प्रीति सिंह परिहार की बातचीत। अखरावट 



आपकी कहानियां पढ़ने के लिए पाठकों को लंबा इंतजार करना पड़ता है. यह अंतराल क्यों? 
हां यह सच है, मेरी एक कहानी और दूसरी कहानी के बीच काफी लंबे अंतराल रहे हैं. इसे आप खूबी समझिये खामी लेकिन मैं अकेला ऐसा लेखक नहीं हूं , जो अपनी बात कहने या कहानी को गढ़ने में ज्यादा वक्त लेता है. आप गौर से देखेंगे तो मेरी पीढ़ी के कुछ और कथाकारों के यहां भी दो कहानियों के बीच लंबे अंतराल रहे हैं. योगेंद्र आहुजा, देवेंद्र , आनंद हर्षुल , अखिलेश ये ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने कभी तात्कालिक दबाव में या किसी संपादक की मांग के आधार पर कहानियां नहीं लिखी. क्योंकि हममे से किसी को भी भीड़ के केंद्र में खड़े रहने का लालच नहीं था. और सबसे अहम बात तो ये है कि हमने सिर्फ कहानियां नहीं लिखीं, बल्कि उसे लिखते हुए अपने स्वाभवगत अंशों को भी जिया है. एक अर्थ में यह भी कहा जा सकता है कि हमारी मूल प्रवृत्ति किसी स्क्यूबा ड्राइवर जैसी है, जो पानी में गहरे उतरता है. मुझे बहुत खुशी होती है यह देखकर कि मेरे इन समकालीन कथामित्रों ने भले ही कम कहानियां लिखी हैं, लेकिन अपनी अभिव्यक्ति में अनुभूति की सघनता को कभी नष्ट नहीं होने दिया है. लेकिन तसवीर का दूसरा पहलू ये भी है कि मैं कुछ हद तक काहिल भी हूं. मैंने तकनीक द्वारा मुहैया कराए गये साधनों और प्रवृत्तियों से खुद को अपडेट नहंी किया. तेजी से बदलती दुनिया मुझे अभिव्यक्ति का विराट अवसर दे रही है लेकिन मैं अभी तक अपने ही सुर और रंग में रमा हुआ हूं. मैं नहीं जानता के मेरे जैसे अपनी ही फिजा में रहने वाले लेखकों का क्या हश्र होगा. 

आपके पास कहानी कैसे आती है? कोई घटना या अनुभव कौन सी चीज आपको कहानी लिखने के लिए बाध्य करती है? 
घटनाओं और अनुभवों का जो समुच्चय है, उसमें लेखक की अनुभूतियों की आवा-जाही कई तरह से और बहुत स्तरों पर चलती रहती है. विषयों की भी किसी जमाने में कभी कोई कमी नहीं रही. इस दुनिया के ग्लोबल होने से पहले भी हमारे पास विविध विषय थे और आज भी हम कई कई चीजों से गुजर रहे हैं. किसी विषय के बड़े होने से कहानी नहीं बनती. मुख्य चीज है उस पहले बिंदु का मिलना, जिसमें कथा के सूत्र को पिरोया जा सके. लेकिन यह पहला ‘बिंदु’ कोई अमूर्त अवधारण नहीं है. वह बिंदु भी हमें हमारी इसी जीती जागी दुनिया से हासिल होता है. ‘साज नासाज’ का बूढ़ा सेक्सोफोनिस्ट दरअसल एक अमेरिकन हिप्पी था, जिससे गोवा के समुद्र तट पर मेरी मुलाकात हुई थी. उसने एक रॉक बीच पर अपने लिए अस्थायी कुटिया किराये पर ले रखी थी. मैंने पहली बार जब उसे सेक्सोफोन बजाते देखा और सुना तो दंग रह गया. उसने मुझे बिलकुल मंत्रमुग्ध कर दिया था. अपनी धुन पूरी करने के बाद जब उसने मेरी तरफ देखा और वह धीरे से मुस्कराया, तो मुझे लगा कि मेरे और उसके बीच कोई ट्यूनिंग हो गयी है. बस वही ट्यूनिंग ‘साज-नासज’ की बुनियाद थी. वही वह पहला बिंदु था, जिसमें मैंने ‘साज-नासाज’ जैसी लंबी कहानी के सूत्र को पिरोया था. बाद में हालांकि देशकाल और परिस्थिति के हिसाब से कहानी की बुनावट की गयी थी.  

लेखन की शुरुआत कैसे हुई? क्या इसके पीछे कोई प्रेरणा थी?
मैं कोई जन्मजात प्रतिभाशाली लेखक नहीं हूं. मेरे अंदर के कथाकार को गढ़ने में मेरे कई उस्तादों का हाथ है. मैंने कहानियां पढ़-पढ़ कर कहानियां लिखने का हुनर हासिल किया है. दुनिया के सभी लेखक मुझे लिखने के लिए प्रेरित करते हैं और मैं सिर्फ लेखन से ही नहीं, पेंटिग, संगीत, सिनेमा, गजल गायन, म्यूरल्स, इंस्टालेशन आर्ट, पत्थर की मूर्तियों, नाटकों और नृत्य से भी अपने लेखक के लिए सत हासिल करता हूं. ये सभी कला विधाएं मेरी प्रेरणा का स्रोत हैं.

आपके लेखन का रूटीन क्या होता है?
व्यवसाय हो या किसी भी तरह की नौकरी, वह कभी लेखन में बाधा नहीं बन सकती. जब आपके अंदर लिखने की हूक उठती है तो समय खुद-ब-खुद आपके कदमों में बिछ जाता है. दूसरी बात ये है कि हर लेखक का अपना अलग मूड होता है और हर किसी की कुछ न कुछ अच्छी बुरी आदतें भी. मुझमें हजार बुरी आदतों के साथ एक अच्छी आदत शुरू से ये रही है कि मैं सुबह साढ़े चार बजे तक उठा जाता हूं. फिर एक घंटे की जीमिंग या जॉगिंग के बाद छह साढ़े छह बे तक अपनी फैक्ट्री के आॅफिस में पहुंच जाता हूं और काम शुरू होने से पहले दस बज तक मेरा पढ़ना-लिखना जारी रहता है. यह लगभग मेरा रोज का रूटीन है. आमतौर पर कर्मचारियों के आते ही मैं पढ़ना-लिखना स्थगित कर देता हूं. पर कभी कभी कोई कहानी अगर फ्लो में चल रही होती है तो लेखन और प्रबंधन दोनों साथ-साथ चलता रहता है. लेकिन हर बार यह आसान नहीं होता, कभी कभी मेरे अंदर के लेखक और बिजनेसमैन के बीच जबरदस्त फाइट भी होती है. लेखक अपने रचनात्मक क्षणों का और बिजनेसमैन अपने तात्कालिक मुनाफे का नुकसान सहन नहीं कर सकता. लिहाजा कभी-कभी प्रोडक्शन लाइन और दिनभर का बना बनाया शैड्यल बिगड़ जाता है और कभी कहानी के कुछ महत्वपूर्ण वाक्य या पैराग्राफ या कभी-कभी तो पूरी ‘स्टोरी लाइन’ भी गड़बड़ा जाती है. बहरहाल थोड़ बहुत नफे नुकसान के साथ कमोबेश दोनों सिलसिले बरकरार हैं.  

सूरज प्रकाश जी के संस्मरण से पता चला कि आपको अंगरेजी नहीं आती लेकिन आप दुनिया भर की भाषाओं की फिल्में देखते हैं? 
ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि 125 करोड़ की आबादीवाले इस देश में अंगरेजी जाननेवाले सिर्फ 5 करोड़ लोगों को ही शिक्षित माना जाता है. क्या अंगरेजी के बिना शिक्षा का कोई महत्व नहीं? और दूसरी बात ये है कि शिक्षा क्या सिर्फ स्कूल और कॉलेज में ही मिलती है? स्कूल और कॉलेज से बाहर रहकर कोई शिक्षित नहीं हो सकता? मुझे लगता है कि स्कूल की चहारदीवारी के सीमित पाठ्यक्रम के अलावा भी शिक्षण और प्रशिक्षण की एक बड़ी दुनिया है. मसलन ‘साज-नासाज’ में ब्लू एंड डार्क क्लाउड नामक जो धुन है, उस धुन का कैसेट रिकॉर्ड मुझे उसी अमेरिकन हिप्पी ने तोहफे में दिसा था और तब मैं पाश्चात्य संगीत के पहले पाठ से परिचित हुआ था. बाद में मैंने वह कैसेट अपने एक नेत्रहीन मित्र और उसकी नेत्रहीन मंगेतर को तोहफे में दिया था. किसी नेत्रहीन श्रवणेंद्रियों के लिए कोई अच्छी धुन जो मायने रखती है, उसका संबंध किसी ‘भाषा’ से नहीं है. चीजों के साथ आपकी आसक्ति जितनी गहरी होगी, भाषा उतनी ही गौण हो जायेगी. आप जो भाषा को जाने बगैर चीजों को बारीकी से चीजों को बारीकी से जानने समझने की बात कह रही हैं, उसे इसी संदर्भ में देखा जा सकता है. मैं जानता हूं कि मेरे वे अंधे मित्र कभी नीले समुद्र और काले बादलों को नहीं देख पायेंगे. लेकिन वह धुन उन्हें हमेशा इस बात का एहसास कराती रहेगी कि दृष्टिहीन होने के बावजूद वे समुद्र और बादलों को देख सकते हैं. फिल्मों को भी मैं सिर्फ कहानी या संवादों के माध्यम से नहीं, बल्कि शॉट के कंपोजिशन के माध्यम से समझता हूं. मेरे लिए सिर्फ यह जानना जरूरी नहीं है कि फिल्म में कौन सी महत्वपूर्ण बात कही गयी है, मैं यह जानना चाहता हूं कि वह बात किस ढंग से कही गयी है. उस बात को शॉट के फ्रेम में लाने के लिए निर्देशक ने किन युक्तियों और साधनों का इस्तेमाल किया है.  

आपने विश्व भर की फिल्में देखी हैं. सतीश बहादुर और प्रकाश झा से फिल्म की बारीकियों के बारे में जाना है. कभी फिल्म की पटकथा लिखने या फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में जाने का ख्याल नहीं आया? 
पटकथा लेखन अपने आप में एक फुलाटाइम जॉब है, और इस काम में अधिकांशत: वही सफल हुए हैं, जिन्होंने इसे एक प्रोफेशन के रूप में चुना है. यह अपने घर में बैठकर इत्मीनान से कहानी-कविता लिखने जैसा आसान काम नहीं है. एक सिक्रप्ट राइटर को फिल्म निर्माण के कई पहलुओं के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है. और अपनी थीम को कन्विंस करवाने का हुनर भी उसमें होना चाहिए. आपकी थीम कितनी पावरफुल है यह दीगर बात है. आप किसी निर्माता या निर्देशक को कैसे कन्विंस करते हैं यह ज्यादा महत्वपूर्ण है. मेरे निजी व्यवसाय ने मुझे कभी यह मोहलत नहीं दी कि मैं किसी दूसरे प्रोफेशन की तरफ ध्यान दे सकूं और मेरे अंदर किसी को ‘कन्विंस’ करने की क्षमता भी नहीं है. जहां तक निर्देशन का सवाल है, तो मैं यह मानता हूं कि मैं भी एक फिल्म निर्देशक हूं. एक ऐसा निर्देशक, जो सेल्यूलाइड पर नहीं कोरे कागज पर अपनी फिल्म बनाता है. मेरी हर कहानी में अगर आप गौर करें, तो कहीं न कहीं एक सिनेमेटिक सीक्वेंस दिख जायेगा. इसके अलावा मैंने अपना पहला उपन्यास ‘प्रति संसार’ भी सिनेमेटिक एंगल से लिखा था. उस उपन्यास का नैरेटिव एक कैमरा था और पूरी बिंब योजना और यहां तक कि वर्णित किये गये ब्यौरे भी चाक्षुस थे. 

लिखते वक्त कौन हावी होता है? आपके भीतर का लेखक या पाठक? 
पाठक तो मेरे हमसफर हैं. मैं उनकी बाहों में बाहें डालकर आगे बढ़ता हूं. ‘प्रति संसार’ लिखते समय मुझै लग रहा था कि यह उपन्यास अपनी ऊबड़-खाबड़ प्रकृति के कारण ठीक से संप्रेषित नहीं हो पायेगा. मुझे डर था कि मेरे निजी आग्रहों और शैलीगत विविधता के कारण उपन्यास के फार्म और पाठकों के पाठकीय अवबोध के बीच कहीं कोई दरार न पड़ जाये. लेकिन ऐसा नहंी हुआ. इतने चक्करदार रास्तों से आगे बढ़ने और कई बार चकमा देने के बावजूद मेरे पाठकों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा. एक लेखक के लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है कि उसके द्वारा इस्तेमाल की गयी युक्तियां पाठकों की रुचियों में समावेशित हो गईं. उपन्यास की लय में दृष्टव्य रूप से जो जिंदगी दर्ज की गयी थी पाठक ने उसे उसी रूप में देखा.

आपने यात्राएं बहुत की हैं. यात्राओं की क्या अहमियत है जीवन और लेखन में?
यात्रा,भ्रमण और घुमक्कड़ी तीनों अलग-अलग चीजे हैं और तीनों का प्रभाव भी हमारे ऊपर अलग ढंग से पड़ता है. आज हम बनी- बनायी सड़कों पर या परिवहन के अनेक सुविधाजनक, आरामदेह और वातानुकूलित साधानों के जरिये जो सफर करते हैं, वह यात्रा नहीं है. यात्रा तो उन लोगों ने की थी, जिन्होंने पहले पहल यह सोचा था कि समुद्र के उस पार क्या है? पर्वत माला के पीछे क्या है? अनजान बीहड़ों, रेगिस्तानों और दुर्गम जंगलों के पार क्या है? और सिर्फ सोचा ही नहीं, उन्होंने उसे पार करने के लिए यात्राएं भी कीं. उन्होंने अज्ञात खतरों को चुनौती दी और वहां जा पहुंचे जहां पहले मनुष्य नहीं था. उन्होंने उन निर्जन इलाकेों में नयी दुनिया बनाई. 
बरसों पहले बसाई गयी उस दुनिया  के स्थापत्य या पुरातात्विक अवशेषों और भग्न मूर्तियों के बीच से या उनके द्वारा बनाये गये किसी रेगिस्तनी पहाड़ी या समुद्री रास्ते या किसी नदी के किनारे की सभ्यता या उन घनघोर आबादीवाले प्राचीन नगरों की इमरतों या गोथिक गलियारों या बदनाम गलियों से जब मैं गुजरता हूं तो सिर्फ स्थानीय विशेषताओं के ब्यौरे दर्ज नहीं करता, बल्कि वहां के सारे इंप्रेशंस खुद -ब-खुद मेरे अंदर दर्ज हो जाते हैं. जो लोग नोटबुक साथ लेकर आॅब्जर्वर की हैसियत से यात्रा पर जाते हैं और अपने पायचे ऊपर उठाकर चलते हैं, उन्हें सिर्फ सूखे-सपाट ब्योरे हाथ लगते हैं. वे संस्कृति के उस प्रवाह से अधूरे रह जाते हैं, जो जीवन और लेखन दोनों के लिए जरूरी है. 


आप अपनी सबसे प्रिय कहानी के तौर पर किसका ज्रिक करना चाहेंगे? 
जब मैं मुंबई में था तब फिल्म अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने अपने घर में एक गोष्ठी आयोजित की थी. विषय था ‘मेरी प्रिय कहानियां’. कहानी पाठ के लिए 66 कथाकारों का चयन हुआ था. बाकी सभी कथाकारों ने खुद अपनी लिखी हुई कहानियों में से अपनी प्रिय कहानी का चयन किया था. अंत में जब मेरी बारी आई तो मैंने कहा कि दुनिया में जब इतने बड़े-बड़े उस्तादों की कहानियां मौजूद हैं तो मेरी खुद की लिखी हुई कहानी मेरी प्रिय कहानी कैसे हो सकती है? लिहाजा मैंने अपनी कहानी का पाठ करने के बजाय एक चीनी लेखक फ्र ची छाई की कहानी ‘नाव का गीत’ का पाठ किया. वह कहानी तब भी मेरी प्रिय कहानी थी और आज भी सबसे प्रिय कहानी है. 

ऐसी साहित्यिक कृतियां जो पढ़ने के बाद जेहन में दर्ज हो गयी हों? क्या खास था उनमें?
मेरे जेहन में इतनी सारी कृतियां दर्ज हैं कि उनकी सूचि बनाना भी मुश्किल है. फिलहाल कुछ आउट स्टैंडिग रचनाओं का जिक्र किया जा सकता है. मसलन, मंजूद एहतेशाम का उपन्यास ‘बशारत मंजिल’, नार्वेजियन लेखक क्जूत हाम्सुन का उपन्यास ‘भूख’, विक्रम सेठ का उपन्यास ‘एक सा संगी’, रहा मासूम रजा का उपन्यास ‘आधां गांव’, फणीश्वर नाथ रेणु का ‘मैला आंचल’ और ‘परति परिकथा’ और इसके अलावा हाल ही में हंगरी लेखिका मागदो साबा का उपन्यास ‘दरवाजा’ मैंने पढ़ा है. बाकी सभी कृतियों का अपने-अपने ढंग से प्रभाव मेरे ऊपर रहा है लेकिन मागदो साबा के ‘दरवाजा’ ने मेरे अंदर के लेखक को झकझोर कर रख दिया. यह एक घोर एंटी इंटेलेक्चुअल उपन्यास है. उपन्यास में दो केंद्रीय पात्र हैं. एक बुद्धिजीवी लेखिका और दूसरे उसकी एक बेहद कर्मठ और उतनी ही अड़ियल मेड सर्वेंट. लेखिका में किताबी ज्ञान और उसकी नौकरानी के भयानक जीवनानुभवों के बीच जो ‘घमासान’ इस किताब में आया है, वो मैंने पहले कभी नहीं देखा था. अंत में नौकरानी की निर्मम कठोरता अपनी बुद्धिजीवी मालकिन के उन अंशों को कुचल डालती है, जो उसके व्यक्तित्व के क्षद्म और नकली हिस्से थे लेकिन इस उपन्यास का सबसे ज्यादा भरपूर और शक्तिशाली तत्व ये नहीं है कि वह अपनी मालकिन के अंदर की बुद्धिजीवी को मार डालती है. असली तथ्य तो ये है कि वह अपनी मालकिन से प्यार भी उतनी ही करती है, जितना कोई मां अपनी बेटी से करती है और अपनी इस प्यारी बेटी पर आनेवाले किसी भी संकट से वह वैसे ही निपटती है जैसे कोई मादा अपने छौने को बचाने के लिए जान लगा देती है. अद्भुत... बेमिसाल...मैंने फिक्शन निगारी के समूचे इतिहास में ऐसा फिक्शन नहीं पढ़ा था. 


इन दिनों क्या लिख रहे हैं? 
बहुत सिलसिलेवार ढंग से तो नहीं, लेकिन गाहे-बगाहे मैंने कथेतर गद्य भी लिखा है. अर्सा पहले मैंने एक लंबा लेख लिखा था ‘वास्तविक दुनिया और कलाकारों का प्रतिसंसार’ . इस लेख में मैंने एल्कहोलिज्म और ‘डेथविश’ को केंद्र में रखा था. और यह बताने की कोशिश की थी कि कैसे एक लेखक या कलाकार इस वास्तविक दुनिया के खिलाफ अपना प्रतिसंसार खड़ा करता है और इस अकेली लड़ाई में हारने के बाद कैसे शराब पीकर या सीधे आत्महत्या द्वारा अपनी आहुति देता है. एक और लेख सिनेमा में हिंसा पर केंद्रित था जिसमें मैंने पेंटागन और हॉलीवुड के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया था. फिलहाल मैं अभिनेता की निजी स्वायत्तता पर एक लेख लिख रहा हूं, जिसमें निर्देशक और अभिनेता के बीच के अंतर्द्वंदों को पकड़ने की कोशिश की जा रही है.

इस बातचीत का सम्पादित अंश हिंदी दैनिक प्रभात खबर में छपा था. यहाँ यह अविकल रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. 

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