20 January 2014

गुलजार ने सुचित्रा सेन को सम्मान में ‘सर’ कहा था

गायन में न जाकर अभिनय-संसार में उनका आगमन हुआ और पचास के दशक से सत्तर के दशक के मध्य तक वे अपने आकर्षक व्यक्तित्व, सौंदर्य, केश-विन्यास, देह भाषा, आंखों, अभिनय क्षमता और ग्लैमर के कारण सभी सिने दर्शकों की प्रिय अभिनेत्री बनी रहीं. दिलीप कुमार ने पहली बार किसी महिला में ‘अदभुत सौंदर्य और बुद्धि’को एक साथ महसूस किया. गुलजार ने उन्हें ‘सर’ कहा है. ‘आंधी’में गुलजार ने उनके संवाद को डब नहीं कराया..... सुचित्रा सेन के अवसान पर पढ़िए रविभूषण का लेख : अखरावट

बांग्ला-हिंदी फिल्मों की सुविख्यात-सुप्रशंसित अभिनेत्री सुचित्रा सेन (6 अप्रैल 1931-17 जनवरी 2014) के निधन के साथ बांग्ला फिल्म के एक युग का अवसान हो गया है. वे अपूर्व सुंदरी थीं, जिनकी तुलना हॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री ग्रेटा गाबों से की जाती है. सत्यजित रे और ऋत्विक घटक की फिल्मों में काम न करने के बाद भी वे बंगाल की महान जनप्रिय अभिनेत्री थीं. बचपन में घर का नाम कृष्णा और स्कूल का नाम रमा सुचित्रा सेन नाम के आगे नहीं जाना जाता. फिल्म निर्माता सुकुमार दासगुप्ता के सचिव नीतीश राय ने रमा सेन को सुचित्रा सेन नाम दिया. कानन देवी के बाद वे बांग्ला फिल्मों की सर्वाधिक प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं. सावित्री और सुप्रियो से कहीं अधिक ख्यात और जनप्रिय-टॉलीवुड की प्रथम महिला.
सुचित्रा सेन हमारे समय में एक उदाहरण हैं. पैंतीस वर्ष तक एकांत में रहना अविश्वसनीय लग सकता है, पर सुचित्रा सेन ने जो निर्णय लिया, उस पर वे अडिग रहीं. दादा साहेब फाल्के पुरस्कार उन्होंने इसलिए नहीं लिया कि उन्हें इसके लिए घर से बाहर निकलना पड़ता. उन्होंने कभी किसी को आॅटोग्राफ नहीं दिया. ममता बनर्जी जब उनसे चौथी बार मिलीं, उन्होंने पूछा- ‘तुमि आमार के होओ बोलो तो? केनो आसचो बार-बार?’ ‘शेष कोथाय’ (1952) से लेकर ‘प्रणय पाश’ (1978) तक सुचित्रा सेन ने 61 फिल्मों में काम किया-52 बांग्ला फिल्मों और सात हिंदी फिल्मों में. ‘देवदास’ (1955) उनकी पहली हिंदी फिल्म थी और ‘आंधी’ (1975) अंतिम. ‘देवदास’ और ‘मुसाफिर’ (1957) में वे दिलीप कुमार, ‘चंपाकली’ (1957) में भारत भूषण, ‘बंबई का बाबू’ (1960) और सरहद (1960) में देवानंद, ‘ममता’ (1966) में धर्मेंद्र और ‘आंधी’(1975) में संजीव कुमार के साथ थीं. ‘ममता’ में एक साथ सुचित्रा सेन मां और बेटी की दोहरी भूमिका में थीं. ‘मुसाफिर’ में दिलीप कुमार रसे सीनियर शेखर नायक थे. 31 फिल्मों में-‘साढ़े चौयात्तर’ (1953) उत्तम कुमार के साथ उनकी पहली फिल्म थी और ‘प्रियो बांधबी’ (1975) अंतिम. पहली फिल्म ‘शेष कोथाय’ (1952) कभी रिलीज नहीं हुई. उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी एलिजावेथ टेलर और रिचर्ड बर्टन की जोड़ी की तरह अविस्मरणीय और ऐतिहासिक है.
सुचित्रा सेन की अंतिम फिल्म ‘प्रणय पाश’ मात्र चार सप्ताह तक चली. इसके बाद 1978 में उन्होंने फिल्मों से संन्यास ले लिया. 35 वर्ष तक वे सबसे दूर. सबसे अलग रहीं. मुनमुन सेन ने, जो स्वयं एक मशहूर अभिनेत्री हैं, ने अपनी मां की निजता का सम्मान किया. मृत्यु के बाद भी सुचित्रा सेन का पार्थिव शरीर पूरी तरह ढंका हुआ था. उनके प्रशंसक उन्हें देख नहीं सके. 35 वर्ष में केवल दो बार वे घर से बाहर सार्वजनिक स्थलों पर देखी गयीं. 24 जुलाई 1980 को बांग्ला फिल्मों के महानायक उत्तम कुमार के निधन पर वे शव के पास पहुंचीं, कुछ क्षण खड़ी रहीं और लौट गयीं. दूसरी बार 1982 में कलकत्ता में एक फिल्मोत्सव के दौरान एक फिल्म देखने के अवसर पर उन्हें देखा गया. उनके बारे में कभी कोई गॉसिप नहीं छपा. 16 वर्ष की उम्र में 1947 में उनका विवाह कलकत्ता के बार-एट-लॉ आदिनाथ सेन के पुत्र दिबनाथ सेन के साथ हुआ. पति के प्रोत्साहन से वे फिल्म में आयीं. पिता करुणामय दास गुप्ता हेडमास्टर थे और मां इंदिरा गृहिणी थीं. बांग्ला देश के पाबना में जन्मी सुचित्रा सेन की आरंभिक रुचि गायन में थी. गायन में न जाकर अभिनय-संसार में उनका आगमन हुआ और पचास के दशक से सत्तर के दशक के मध्य तक वे अपने आकर्षक व्यक्तित्व, सौंदर्य, केश-विन्यास, देह भाषा, आंखों, अभिनय क्षमता और ग्लैमर के कारण सभी सिने दर्शकों की प्रिय अभिनेत्री बनी रहीं. दिलीप कुमार ने पहली बार किसी महिला में ‘अदभुत सौंदर्य और बुद्धि’को एक साथ महसूस किया. गुलजार ने उन्हें ‘सर’ कहा है. ‘आंधी’में गुलजार ने उनके संवाद को डब नहीं कराया.
सुचित्रा सेन के पति का निधन 1969 में अमेरिका में एक दुर्घटना में हुआ. सुचित्रा सेन ने विवाह नहीं किया. वे अपनी बेटी मुनमुन सेन और मुनमुन सेन की दो बेटियों-राइमा और रिया, जो अभिनेत्री हैं, के साथ रहीं. विश्व में केवल दो महान अभिनेत्रियां-ग्रेटा गाबों और सुचित्रा सेन उदाहरण हैं, जिन्होंने लगभग 35 साल तक अपने को ग्लैमर, प्रचार और सार्वजनिक जीवन से अलग कर एकांत का जीवन जिया, अपनी निजता को महत्व दिया. पुरस्कार-सम्मान सब एक समय के बाद गौण हो जाते हैं. हमारा चिंतन हमारे जीवन को निर्धारित करता है. 1963 में सुचित्रा सेन को अंतरराष्टÑीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ था. मॉस्को फिल्म समारोह में ‘सात पाके बंधा’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था. रोमांटिक नायिका के रूप में सुचित्रा सेन अन्यतम थीं. ‘उत्तर फाल्गुनी’, ‘हास्पिटल’, ‘आंधी’, ‘दीप ज्वेले जाइ’,‘कमल लता’ और ‘राजलक्ष्मी ओ’ ‘श्रीकांतो’ में प्रोसेनजीत सुचित्रा सेन की भूमिका यादगार मानते हैं. ऋतुपर्णो सेनगुप्ता उनकी पांच फिल्मों के पांच जीतो-‘हरानो सुर’ के ‘तुमि जे आमार’, ‘पाथे होलो देरी’, के ‘ए सुध गानेर दिन’, ‘आंधी’, के ‘एई सुंदरो स्वर्णाली सोन्धाए’ को अधिक याद करते हैं, जो उन पर थे. ‘सप्तपदी’ और ‘दीप ज्वेले जाई’ में सुचित्रा ने अपनी भूमिका कठिन मानी थी. उन्होंने अपनी फिल्में दर्शकों के साथ कई बार देखी. और हर बार उन्हें कुछ-न-कुछ कमी का अहसास होता रहा.
सुचित्रा सेन का जीवन गरिमामय था. अकेले रहते हुए भी उन्होंने कभी अपने को अकेला नहीं समझा. गोपाल कृष्ण राय की पुस्तक ‘सुचित्रार कथा’ (आनन्द 1992) से उनके बारे में बहुत कुछ जाना ही नहीं, सीखा भी जा सकता है. वे यह समझ नहीं पाती थीं कि उनके एकांत को लेकर लोग परेशान और चिंतित क्यों हैं? वे अपने आवास पर आये आत्मीय जनों से मिलती थीं, हंसती और बातें करती थीं. अपने समय की सर्वाधिक ‘ग्लैमरस’ अभिनेत्री का गरिमापूर्ण जीवन हमारे समय में एक उदाहरण था. उनके होठों, भौहों, केश-विन्यास (‘खुले केश् अशेष शोभा झर रहे’) परिधान साड़ी (साड़ी-ब्लाउज. सबमें एक आकर्षण था, गरिमा थी. ऐसी गरिमा का उनके साथ ही लोप हो गया. गरिमापूर्ण सौंदर्य था सुचित्रा सेन का. मुनमुन सेन ने अपनी मां को क्वीन कहा है. वे जो भी कुछ हैं, उसका श्रेय उन्हें दिया है. बेटी ही नहीं, नातिन राइमा सेन और रिया सेन पर भी उनका प्रभाव है. लेखक की संतानें अब लेखक नहीं होतीं. सुचित्रा सेन के परिवार की दो पीढ़ियां अभिनय-क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं. सुचित्रा सेन रामकृष्ण मिशन की सदस्या बनीं. फरवरी 1995 में. सरस्वती पूजा के दूसरे दिन वे स्वर्गीय भरत महाराज के निवास पर पहुंची थीं. सत्तर के दशक से, 1978 के बाद उन्होंने रामकृष्ण मिशन में ‘आंतरिक शांति’ महसूस की थी. रामकृष्ण मठ के दसवें अध्यक्ष स्वामी वीरेश्वरानंद से उन्होंने दीक्षा ली थी. बेलूर मठ में उनका आना कम ही सही, होता था. 2000 में वे अंतिम बार मठ में गयी थीं. वे रामकृष्ण परमहंस, मां शारदा देवी और स्वामी विवेकानंद के बारे में बातें करती थीं.दुर्गा पूजा के अवसर पर वे मठ में एक लाल साड़ी और दस हजार की राशि देती थीं. ध्यान और प्रार्थना में उन्हें आंतरिक शांति मिलती थी. आत्मा की अनश्वरता में उनका विश्वास था. सुचित्रा सेन ने कहा है कि सब कुछ होने पर भी वे किसे खोज रही हैं? किस प्रकार का व्यक्ति? साथी? या क्या यह कोई शक्ति है, जो मनुष्य से बड़ी है-नि:स्वार्थ और पवित्र.
 

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