27 August 2009

तंजानिया की कला शैली: मेकोंडे





मैं कोई  कला का जानकार नहीं हूँ .संघ लोकसेवा की तैयारी के दौरान भी कला और संस्कृति के हिस्से को मैं सिर्फ गधों कि तरह रट  लिया करता था..फिर विश्व कला के बारे में, वो भी  एक अफ्रीकी देश की  कला शैली के बारे में मुझे कोई जानकारी हो इसकी कोई संभावना नहीं है..दरअसल  आज मेरी मुलाक़ात तंजानिया मूल की  एक महिला से हुई..भारत में आजकल अफ्रीका और दक्षिण एशियाई देशों के काफी लोग इलाज कराने के लिए  आते हैं..जिसे भारत सरकार मेडिकल टूरिस्म का नाम देती है..गुर्दे की खराबी का इलाज करा रहे  या कैंसर से मरते  एक आदमी और उसके परिवार के लिए  इलाज के लिए भारत आना टूरिस्म है...ऐसा भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय का मानना है...खैर..  थोडी देर बात करने के बाद फातमा नाम  की  उस महिला ने हमें अपना तंजानिया का फोन नंबर .दिया..और कहा कि तंजानिया आना तो हामारे यहाँ जरूर आना..फिर उसे radiology वार्ड में बुला लिया गया और वो चली गई.
.दरअसल  हुआ ये कि उस्से बात करते वक़्त मैं लाख चाहने के वावजूद  तंजानिया की राजधानी याद नहीं कर पाया ..सिर्फ इतना याद आया कि यह   केन्या के दक्षिण में और विक्टोरिया झील से सटा हुआ है..अभी तंजानिया कि राजधानी देखने के लिए विकिपेडिया का सहारा लिया..तब अचानक इस कला शैली  से परिचय हुआ ..
मेकोंडे तंजानिया कि एक भाषा भी है और एक जनजाति भी..मेकोंडे कला इसी मेकोंडे जनजाति द्बारा  विकसित एक पारंपरिक कलाशैली है.. कठोड़ और गहडे रंग के  एबोनी की लकडी को तराश कर विभिन्न प्रकार की  काष्ट प्रतिमाएँ बनायी जाती हैं,,  1950 के बाद माडर्न मेकोंडे आर्ट को काफी बढावा मिला है..परम्परागत रूप से इस शैली में घरेलू जीवन से जुड़े हुए चीजों की मूर्तियाँ  बनायी जाती थी  लेकिन अब abstract विचारों को  भी मूर्तियों की शक्ल में  ढालने की परम्परा शुरू हो गई है.  
यूरोपीय इतिहासकारों ने कभी  ना सिर्फ भारत,बल्कि तमाम एशियाई तथा अफ्रीकी देश को  असभ्य और बर्बर  बताकर प्रचारित किया था..मैं इस कला के नमूने को देखकर बस यही समझ पा रहा हूँ  कि इतनी संमृद्ध कला शैली असभ्य  और बर्बर लोगों के द्वारा तो विकसित नहीं की जा सकती..

26 August 2009

मंटो: निर्लिप्त घूरती आँखें





 आप  में से बहुतों ने मंटो की कहानी "खोल दो " को पढ़ा होगा.अगर आपने यह कहानी नहीं पढ़ी है तो आपके लिए यह एक अनियार्य कहानी की  तरह है. अखबारों,पत्रिकाओं,और टीवी में अभी जिस तरह जिन्ना और विभाजन छाया हुआ है उसने मुझे यह कहानी याद दिला दी.."खोल दो" ऐसी कहानी नहीं है जिसे आप याद रखना चाहते हैं,बल्कि यह उन कहानियों में से है जिन्हें आप भूल जान चाहते है..लेकिन फिर भी यह बार -बार आप तक लौट कर आती है..आपके सामने कुछ असहज सवाल खडा करने के लिए.आपको निस्तेज, सुन्न,सर्द आँखों से देखने के लिए..ये आँखे आप पर टिक जाती हैं और और धीरे धीरे आपको भी अपने आगोश में  लेने लगती हैं..एक जड़ता  आप पर हावी होने लगती है..मंटो की  यह कहानी आपके विवेक के स्थगित  कर देती है..आप सोचना चाहते हैं लेकिन कुछ  सोच नहीं पाते.. इंसानी क्रूरता ,वहशियत,बिना शोर किये,धीरे से सरक कर  पसीने से लथपथ चेहरे में चिपके गर्द की मानिंद आपके वजूद का अनचाहा हिस्सा बन  जाती  है. 

यहाँ मैं इस कहानी का एक अंश आपके सामने रख रहा हूँ..सिर्फ इसलिए कि भारत और पाकिस्तान के बंटवारे को राजनैतिक इतिहास की बहसों से पूरी तरह समझना मुमकिन नहीं है..यह बंटवारा राजनैतिक से कही ज्यादा सामाजिक और मानसिक था..मंटो की कहानियां इस बंटवारे के दौरान  इंसानियत और हैवानियत के बीच की  धुंधलाती लकीर को ताकती हुई कहानियां है..यहाँ विभाजन पर लिखी कई अन्य कहानियों की तरह घर,जमीन,सदियों के रिश्ते नाते और  सम्बन्ध के टूटने की  सामाजिक त्रासदी को उभारने कि जगह व्यक्ति की , मानसिक त्रासदी उसके मानसिक अंतर्द्वंद ,और मानसिक पतन को बयान किया  गया है .

.................एक स्ट्रेचर था ,जिस पर लाश पड़ी  थी..सराजुद्दीन छोटे-छोटे कदम उठाता उसकी और बढा..कमरे में अचानक रौशनी हुई..सराजुद्दीन ने लाश के जर्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया --"सकीना ! "
        डाक्टर जिसने कमरे की रौशनी की थी ने सराजुद्दीन से पूछा,  "क्या है ?"
     सराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका , "जी मैं .......जी मैं ........इसका बाप हूँ.."
    डाक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी लाश की नब्ज टटोली और सराजुद्दीन से कहा ,"खिड़की खोल दो .."
  सकीना के मुर्दा जिस्म में जुम्बिश हुई ..बेजान हाथों से उसने अजारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी ..बूढा सराजुद्दीन ख़ुशी से चिल्लाया ,"जिंदा है--मेरी बेटी जिंदा है --.."डाक्टर सर से पैर तक पसीने में गर्क हो गया ...


(यकीन मानिए मैं ये लाइन  टाइप कर  रहा हूँ   और मेरे भीतर  एक अजब सी सिहरन हो रही है...एक मीलों तक फैली खामोशी मुझे  घेर रही है. )

25 August 2009

जिन्ना और विभाजन पर कुछ और




इसे अपनी राय बनाने के लिए जरूरी सामग्री की तरह पढें..यहाँ कोई निष्कर्ष निकालने कि कोशिश नहीं की गई है..बस कुछ प्रचलित school of thought को  आपके सामने रख रहा हूँ.उम्मीद है इससे आपको विभाजन को समझने में मदद मिलेगी 


अगर भारत का विभाजन नहीं हुआ होता तो भारत कैसा होता ...यकीनन वैसा नहीं जैसा  आज है..भारत को ऐसा बनाने के लिए विभाजन ज़रूरी था ..नेहरु ने 1946 में कृष्णा मेनन को लिखे एक पत्र मे लिखा था कि भारत का शासन  चलने के लिए ये जरूरी है कि भारत का ,बल्कि  कहें कि पंजाब और बंगाल का विभाजन कर दिया जाए ..नेहरु ने ये भी लिखा कि आर्थिक दृष्टि से संपन्न बंगाल और पंजाब का हिस्सा भारत के साथ रहेगा और इस तरह जो पाकिस्तान बनेगा वह आर्थिक दृष्टि से अत्यं कमजोर होगा जो खुद को शायद ही संभाल सके...
साफ़ है नेहरु भी विभाजन चाहते थे...संभवतः ऐसा चाहने के लिए वे मजबूर किये गए थे.
नेहरु ने कभी जिन्ना कि तरह पकिस्तान कि मांग नहीं कि..लेकिन नेहरु की राजनीति ने पाकिस्तान कि मांग को मजबूत ही किया..पकिस्तान कि मांग 1940 में की गई थी.1940  से 1947   तक का साल भारतीय राजनीति में इतना उथल पुथल भरा  रहा कि पाकिस्तान कि मांग से निपटने के  लिए कौंग्रेस के पास कोई नीति बनाने के लिए वक़्त ही नहीं था..
जैसा कि पाकिस्तानी इतिहासकार आएशा  जलाल ने लिखा है..जिन्ना ने पकिस्तान की मांग स्वतंत्र पाकिस्तान के लिए नहीं की थी..वे तो बस इसके सहारे मुस्लिमों के लिए ज्यादा से ज्यादा रियायत,सत्ता का मुस्लिमों के हित में ज्यादा से ज्यादा विकेंद्रिकर्ण चाहते थे..यह एक  दाँव (bluff  )था..लेकिन नेहरु और पटेल ने जिन्ना के इस दाँव को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भुमिका निभायी..जितनी आसानी से ये दोनों नेता पाकिस्तान की मांग  को मान गए उससे बकौल आएशा  जलाल, खुद जिन्ना को भी हैरानी हुई थी.
कहा जाता है कि जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्सन दिवस कि घोषणा कर के समझौते कि बची - खुची आशा को भी मिटा दिया.लेकिन इस बात कि प्रायः कोई चर्चा नहीं की जाती कि आखिर जिन्ना को डायरेक्ट एक्सन दिवस की घोषणा करने कि नौबत क्यों आयी.नेहरु कि जीवनी लिखनेवाले बेंजामिन जकारिया .ने लिखा है कि कैबिनेट मिशन योजना को असफल बनाने में नेहरु का भी हाथ था..मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने भी इस बात का अपनी किताब इंडिया विन्स फ्रीडम में जिक्र किया है..आज़ाद के अनुसार कैबिनेट मिशन प्रस्ताव पर नेहरु ने जो जनसभाएं की  उसमे उन्होंने लगातार यह कहा कि हम इस प्रस्ताव से बंधे  नहीं हैं..दरअसल नेहरु केंद्रीय शासन व्यवस्था का सपना संजो चुके थे और इस सपने में वे समूहीकरण के कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव को मानने के लिए तैयार  नहीं थे...इस प्रस्ताव में शक्ति के विकेंद्रीकरण और एक कमजोर केंद्र का प्रस्ताव था....माना  ये जाता है कि नेहरु के इस रवैय्ये ने जिन्ना को डायरेक्ट एक्सन दिवस कि घोषणा करने पर मजबूर किया ..क्यूकि तब तक जिन्ना को एहसास हो चुका था को कौंग्रेस मुस्लिमों कि मांग को पूरा करने का इरादा नहीं रखती.
ये बात शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि मुस्लिम लीग के लियाकत अली जो आगे पाकिस्तान के पहले प्रधान मंत्री बने,बजट पेश करने वाले पहले भारतीय थे..यह बजट मार्च 1947   में पेश किया गया था.इसमें अमीर उद्योगपतियों  पर जिन्होंने युद्ध के समय भारी मुनाफा कमाया था,,ज्यादा कर लगाने कि मांग की गई थी.नेहरु ने भी  लगातार इस  बात पर सहमती जतायी थी.लेकिन कौंग्रेस  इसे लियाकत  अली द्बारा हिन्दू  व्यापारियों को तंग करने की नीति माना और इस बजट का विरोध किया..अंत नेहरु ने इस बजट को अस्वीकार कर दिया और इस बजट की  जगह एक पूर्णतः बदला हुआ  बजट पेश किया.गया..इस प्रकरण ने एक बार फिर इस बात को साबित किया कि भारत को मुस्लिमों के हिसाब से नहीं चलाया  जाएगा और कौंग्रेस हिदुओं का हित साधने वाली  पार्टी है..गौरतलब है कि 1946   के चुनावों में मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग को जबरदस्त सफलता मिली थी और तकरीबन 90   फीसदी से ज्यादा ऐसी सीटें उसे मिली थी.ऐसे में लीग को साथ लेकर चलना कांग्रेस के लिए जरूरी था..लेकिन यह ऐसा नहीं कर पाई.
खैर  ये बातें ये बात साबित नहीं करती कि विभाजन के लिए जिन्ना नहीं नेहरु या पटेल जिम्मेदार थे..लेकिन यह ये तो जरूर साबित करता है कि इसके लिए  सिर्फ जिन्ना ही  जिम्मेदार नहीं थे. हाँ किसकी जिम्मेदारी कितनी थी इस बात पर बहस हो सकती है..
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कही ना कही १९४६-४७ तक आते आते जो स्थितिया बन गई थी,वे सामूहिक रूप से विभाजन  के लिए जिम्मेदार बनी.इस समय तक .विभाजन सिर्फ जिन्ना या नेहरु के कोर्ट से निकल कर कलकत्ता और नोआखाली और उससे भी आगे बिहार उत्तर प्रदेश  दिल्ली और पंजाब तक पहुच गया था..और यह खुले मैदान में खून के प्यासे इंसानों द्बारा तय किया जा रहा था..
दरअसल आजादी  के बाद जिन्ना और नेहरु जो भारत चाहते थे उसमे गहरा मतभेद था..जिन्ना विकेंद्रीकरण चाहते थे तो नेहरु मजबूत  केंद्र..दोनों के गोल अलग अलग थे..ऐसे में विभाजन के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था..ये बात अलग है कि नेहरु को वैसा भारत मिला जैसा वे चाहते थे ..लेकिन जिन्ना को वैसा पकिस्तान नहीं मिला जैसा वे चाहते थे.. 
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23 August 2009

और अब खून में मिलावट

" अब भी जिसका खून ना खौला खून नहीं वो पानी है "
इसे कविता के तौर पर नहीं एक सार्वजनिक सूचना के तौर  पर पढें..  जी हाँ आपके खून के ना  खौलने का कारण शायद यही हो  


दूध में मिलावट,घी में मिलावट,मसालों में मिलावट के बाद अब खून में मिलावट ...ऐसा नहीं है की खून में मिलावट बिलकुल नयी बात है...तकरीबन दस-बारह  साल पहले जब मैं पटना में था तब मेरे एक जान -पहचान वाले को खून की जरूरत हुई थी अचानक रात में.अपने एक डॉक्टर रिश्तेदार को जब मैंने फ़ोन किया तो उन्होंने कहा की खून का इंतजाम खुद करो.. ब्लड बैंक के खून में खून कम पानी ज्यादा होता है...खून का इंतजाम किया गया ..लेकिन खून की जरूरत पड़ने पर खून देने वाले हमेशा और समय पर मिल ही जाए जरूरी नहीं ..ऐसे में ब्लड बैंक पर  ही निर्भर रहना पड़ेगा..आज खबर आयी है की इस ब्लड  बैंक के खून में मिलावट का घिनौना खेल खेला जा रहा है..खेल तो  पहले  से ही खेला जा रहा था अब खबर आयी है.. 
ये दौर ही शायद मिलावट का दौर है..आदमी ही खालिस नहीं है..आदमी की आदमियत में हिंसक लोभ नमक कि तरह घुल गया है ..शुद्ध तो कुछ भी नहीं होता ..बिलकुल  खालिस सोने के तो जेवर भी नहीं बनते..लेकिन अब मिलावट  ही दस्तूर बन गया है..सच कहे तो अब एक ही चीज ऐसी है जिसमे मिलावट नहीं है..आदमी के भीतर पैसे  कमाने की चाहत ...और इस चाहत  के लिए किसी भी चीज में मिलावट की जा सकती है..,,खून में पानी की ही नहीं..आदमी की इंसानियत में हैवानियत  की भी मिलावट ..

जिन्ना पर नयी किताब के बहाने लोकतंत्र पर बहस

एक अपील : लोकतंत्र  को  सिर्फ लोकतंत्र रहने दें , उसे फासीवादी लोकतंत्र बनाने की कोशिश ना करें 






अच्छा हुआ  कि जसवंत सिंह ने जिन्ना पर एक किताब लिखी..इससे  कुछ हुआ या नहीं हुआ, हर किसी को अपने आपको देशभक्त साबित करने का मौका तो मिल ही गया....इसमें कोई शक नहीं  कि भारतीय इतिहास में मुहम्मद अली जिन्ना की हैसियत एक खलनायक की  है....भारतीय राजनैतिक थिएटर का गब्बर सिंह और मोगाम्बो से भी बड़ा खलनायक.. यह मौका भांप कर कि जिन्ना पर किताब लिखने वाले जसवंत को गद्दार,मति - भ्रष्ट  बताकर अपने आपको देशभक्त साबित किया जा सकता है राजनैतिक पार्टियां जसवंत का सर कलम करने के लिए निकल पडी...खुद जसवंत कि पार्टी ने भी जसवंत की किताब को,और जसवंत सिंह कि सोहबत को इतना खतरनाक माना कि उससे अपना दामन बचा ले जाने की  बेचैनी से बीमार हो गई.. और जसवंत  को कारण बताओ नोटिस देने कि सभ्यता तक से  परहेज करते  हुए उन्हें पार्टी से  निष्कासित  कर दिया..
लेकिन अभी बात जिन्ना की नहीं,बात जसवंत की भी नहीं..जसवंत सिंह की किताब की तो बिलकुल नहीं...क्यूकि किताब अभी तक मेरे हाथ आयी नहीं है...और बिना किताब पढ़े और तथ्यों और तर्कों को  पढ़े बिना इस  मुद्दे पर रायशुमारी  करना कोई मतलब नहीं रखता...यह काम उनके लिए छोड़  दिया जाए जो अखबार की कतरनों से ,टीवी पर कैप्शन की  चन्द लाइनों से चंद्रमा और सूर्य तक के सारे रहस्य जान लेने की काबिलियत  रखते हैं..
यहाँ बात लोकतंत्र की...बात लोकतंत्र के उस मॉडल की जो हमने पिछले  छः दशकों में अपने यहाँ बनाया है...बात थोडी सी उस संविधान की जो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता  की गारंटी देता है...बात उस उदारवाद के छद्म मुखौटे की जिसे हमने आजादी के बाद  के इन सालों में जब मन किया है सुविधा से पहना है जब मन किया है उतार कर फेंका है..
लोकतंत्र का मतलब  क्या है ? वोट डालना और एक सरकार को चुन लेना? या एक ऐसी व्यवस्था कि स्थापना करना जहाँ सभी तरह के विचार सह अस्तित्व के साथ रह सकें..लोकतंत्र  कि बुनियादी  खासियत ही यही है कि यहाँ विभिन्न ही नहीं विपरीत तथा विरोधी मत भी एक ही साथ सांस ले सकते हैं...एक दुसरे को काटते ,घिसते,छीलते हुए..एक दुसरे को बेहतर बनाने में योगदान देते हैं ....यह उदारवादी लोकतंत्र का गुण  है.. अमेरिका में एक ही साथ एडवर्ड सईद ,नोम चोमस्की, जैसे विचारक अमेरिकी व्यवस्था की आलोचना करते हैं..लेकिन वे वहां से निकाल नहीं फेंके गए हैं...यह अमेरिकी लोकतंत्र का गुण है ..कम से कम दुनिया को दिखाने के लिए उदारवाद का एक सुन्दर  मुखौटा  तो उनके पास जरूर मौजूद है...लेकिन भारत में ऐसा मुखौटा भी  देखने को नहीं मिलता..
बात करें  सबसे पहले भाजपा के आंतरिक डेमोक्रेसी की..२२ अगस्त के हिन्दुस्तान टाइम्स में एन डी टीवी की ग्रुप एडिटर बरखा दत्ता ने  लिखा है की.." जसवंत के निष्कासन ने भाजपा के आतंरिक लोकतंत्र के दावे की कलई खोल दी है".यहाँ एक बहुत महत्वपुर्ण सवाल ये है कि .लोकतंत्र के भीतर क्या किसी व्यक्ति को किसी विषय पर अपनी राय रखने से रोका जा सकता है.क्या यह व्यक्ति के मूल अधिकारों का उल्लंघन नहीं है?
जहां तक जिन्ना के व्यक्तित्व पर ,उनके भारतीय राजनीति में स्थान पर विश्लेषण कि बात है..तो साफ़ कहा जा सकता है कि जिन्ना का मूल्यांकन कभी भी पूर्वाग्रह से रहित होकर नहीं किया गया है..जिन्ना पर सारी कहानी 1929 में  जिन्ना के 14  सूत्रीय मांग, 1940  में ,पाकिस्तान की मांग और 1946  में डाइरेक्ट एक्सन दिवस कि  घोषणा में सिमट जाती है..लेकिन जिन्ना के राजनीतिक जीवन को देखने के लिए  इससे भी भीतर जा कर इस  शख्स को जाने कि जरूरत है.....
इतिहास में जिन्ना के राजनैतिक विकास को अगर गौर से देखा जाए तो इस  बात से किसी को ऐतराज नहीं हो  सकता है..कि जिन्ना ने अपना राजनैतिक जीवन एक राष्ट्रवादी ,धर्मनिरपेक्ष नेता के तौर पर शुरू किया  था...जिन्ना किस तरह और कब कट्टरपंथी इस्लामिक राजनीति कि और झुक गए यह  देखना और समजने कि  कोशिश करना बहुत जरूरी है..ऐसा ही एक प्रयास एजी नूरानी ने अपने एक लेख "अस्सेसिंग जिन्ना "में किया है., जो 13 -26 अगस्त 2005 में फ्रंतलाइन में प्रकाशित हुआ था  .एजी नूरानी एक जाने माने विद्वान् हैं और उनका राय इस विषय में  गौर करने के लायक है. नूरानी लिखते हैं कि..जिन्ना का कांग्रेस और गांधी से अलगाव सिर्फ कट्टरपंथी  इस्लामिक राजनीति चेतना के कारण ना होकर जमीनी राजनैतिक बहसों और कांग्रेस और गांधी जी द्बारा जिन्ना के साथ किये गए व्यवहार के कारण था.(.नूरानी  के लेख पर यहाँ बहस करने कि गुंजाइश नहीं उस पर फिर कभी )..दरअसल इतिहास के प्रति सतही नजरिये  के कारण जिन्ना  को पूरी तरह समझने कि कोशिश से परहेज कर लिया जाता है..इतिहास आँखे बंद कर के विश्लेषण करने कि चीज नहीं  है.शुतुरमुर्ग कि तरह असहज सवालों से बचने कि कोशिश उन सवालों को खत्म नहीं कर देती...जिन्ना के सवाल पर हमारा रुख ऐसा ही रहा है..जिन्ना की खलनायकी  से शायद ही किसी को इनकार है..लेकिन अगर एक खलनायक देश को दो टुकडों  में बाँट देने  जैसे असंभव काम को अंजाम देने में सफल हो गया को तो उसका खलनायकत्व जरूर इमानदार तरीके से विश्लेषित  किया जान चाहिए..इसी नजरिये के  अभाव के कारण बरखा दत्ता ने लिखा है कि.."भाजपा दरअसल ये समझने से इनकार करती है कि आधुनिक भारत का इतिहास कौंग्रेस का इतिहास है."..दरअसल इस तरह कि सोच के कारण ही जिन्ना को कौंग्रेस और गांधी से अपना रास्ता अलग करना पड़ा था. 
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जसवंत सिंह की किताब को राजनैतिक गलियारे में जिस तरह देश द्रोह के प्रमाण की तरह पेश किया गया वह आश्चर्यजनक है..ऐसा करना भारतीय  राजनीति की कमजोरी को दिखाता है. लोकतंत्र में आप विचारों से सहमत या असहमत हो सकते है..विचारों के कारण किसी को सूली पर नहीं टांग सकते..जसवंत प्रकरण में यही हुआ  है..ऐसी राजनीतिक व्यवस्था तालिबानी,फासीवादी व्यवस्था  के करीब पहुचती दिखती है...


जिन्ना गलत थे ,ये इतिहास भी कहता है..ख़ास तौर से 16 अगस्त 1946 को मनाये गए सीधी कारवाई दिवस और उसके बाद पनपी साम्प्रदायिक हिंसा, जिसकी परिणति भारत के विभाजन में हुई और और जिसने भारत ही नहीं पाकिस्तानी जनता की सामूहिक स्मृति( collective memory ) पर कभी ना मिटने वाले जख्म दिए ,को भूलना संभव नहीं है..लेकिन जिन्ना क्यों जिन्ना बने  इसकी पड़ताल करने को भी  गलत करार देना, लोकतांत्रिक असहिष्णुता का ही उदाहरण है...भले ही लेखक के तर्क बिलकुल  गलत ,गैर तथ्यपरक हों  लेकिन उसे बोलने और लिखने  के  अधिकार से  वंचित नहीं  किया जा सकता .जो उसे संविधान से मिला है....,(भले लेखक दक्षिण पंथी पार्टी का हो या अति (रेडिकल )  वाम पार्टी का ही क्यों ना हो)..ऐसा लोकतंत्र जहां लेखक होने के लिए  एक उदार वामपंथी या एक कोंग्रेसी  होना जरूरी हो लोकतंत्र नहीं माना जा सकता...
  

21 August 2009

बाज़ार में महात्मा गाँधी


मैं अभी पुणे में  हूँ  .अचानक पुणे की सड़कों पर घूमते हुए यह नजारा देखा तो ठहर गया और ये तस्वीर उतार ली.यह नजारा पुणे के एम् जी रोड का है..एम् जी रोड यानी महात्मा गांधी रोड. पुणे का मुख्य बाजार ..नए नए ब्रांडों की दुकानों की जगमगाहट से जगमगाता हुआ..लेकिन तभी मन में ये बात कौंधी कि आखिर भारत के बड़े शहरों में बाजारों का नामकरण महात्मा गांधी के नाम पर क्यों किया गया है?
.बाजार और महात्मा गांधी को गलबहियां डाले घूमते हुए या कम से कम एक साथ एक ही छत के नीचे रहते हुए देख कर अचरज होना स्वाभाविक ही है.भारत में कोई भी नामकरण प्रायः बिना किसी तर्क के होता है.और बात अगर महात्मा गाँधी के नाम पर किसी नामकरण का हो तो तर्क के चौखटे के भीतर घुसने की कोई ज़रुरत ही नहीं समझी जाती. बंगलौर,पुणे,लखनऊ,तिरुअनंतपुरम ,चेन्नई,दिल्ली .इन सभी शहरों में एम् जी रोड नाम की एक सड़क पायी जाती है... जो लोग एम् जी रोड का नाम जानते हैं वे ये भी जानते होंगे कि एम् जी रोड इन शहरों का मुख्य बाजार है .एम् जी रोड से पहला अर्थ अब बाजार का ही निकलता है.वैसे मैने कल ही गूगल पर देखा की दिल्ली में जो एम् जी रोड है वह दरअसल मेहरौली- गुडगाँव रोड है,महात्मा गांधी रोड नहीं.उम्मीद है इससे महात्मा गांधी को थोडी राहत   जरूर मिली होगी..
अब इसे महज संयोग  माना  जाए या कुछ और कि महात्मा गाँधी का नाम बाजार पर सितारे कि तरह टांक दिया गया है . मेरे ख़याल से यह एक संयोग ही है.लेकिन यह संयोग भी अपने आप में बड़ा जानलेवा है.. इन शःहरों के एम् जी रोड पर पर घुमते हुए मन में ये धारणा तो बन ही सकती है कि एम् जी यानी महात्मा गांधी बाजार व्यवस्था के बड़े पैरोकार थे ..या  कि गाँधी का मुख्य एजेंडा भारत में बाजार व्यवस्था को कायम करना था..और इन बाजारों का नामकरण उनके इसी अथक प्रयास के कारण उनके नाम पर किया गया है.आपको इस बात पर हंसी आ सकती है  लेकिन ये बात ध्यान में राखी जानी चाहिए कि धारणाएं ऐसे ही बनायी जाती हैं और सामूहिक स्मृतियों को इन्ही हथियारों से मिटाया जाता है.
वैसे भारत में नामकरण जिस तरह से होता है वह जान लेने के बाद किसी को कोई ख़ास ताज्जुब नहीं होना चाहिए . क्यूकि आज भारत में तकरीबन हर चीज का नामकरण जवाहरलाल नेहरु,इंदिरा गाँधी और सबसे बढ़कर  राजीव  गाँधी के नाम पर किये जाने आपाधापी मची हुई है . देश की जितनी ज्यादा संपत्ति पर नेहरु गांधी परिवार का नाम चस्पां कर दिया जाए यही एकमात्र लक्ष्य बन गया दिखाई देता है.इन नामकरणों के पीछे किसी तर्क को खोजना नामुमकिन है..लेकिन नामकरण की इस राजनीति में महात्मा गांधी को जिस तरह खींच लिया गया है..उससे किसी की रूह रोती हो या न हो महात्मा गाँधी की रूह तो जरूर रोती होगी. बाजार व्यवस्था के विस्तार और जगमगाते वैश्वीकरण के प्रतीक एम् जी रोड में टंका हुआ महात्मा गांधी का नाम सत्य और अहिंसा के उनके पूरे दर्शन पर ही प्रश्नावाचक चिह्न लगता है.क्यूकि बाजार में अगर किसी चीज का मोल सब से कम है तो वह है सच का मोल और अपने विस्तार के लिए बाजार जिन तरीकों पर निर्भर है..वे विभिन्न रूप में हिंसक ही कहे जा सकते हैं.हिंसा और झूठ ही बाजार का संबसे मुख्य हथियार है...इस बाजार का नामकरण महात्मा गाँधी के नाम पर करना गांधी के सिद्धांतों और उनके संघर्षों के प्रति हिंसक उपेक्षा की भावना को दर्शाता है .

19 August 2009

लोर्का:समलैंगिकता,स्त्री और विद्रोह

कुछ इबारतें ऐसी होती हैं जो समय के साथ धुंधली नहीं होती बल्कि धीरे धीरे गहरी उगती जाती हैं,सिर्फ कागजों पर ही नहीं हमारे दिलों पर भी.लोर्का को,या कहें कि लोर्का के बारे में पढ़ते हुए यही एहसास हमें बार बार होता है.बीसवीं सदी के महानतम रचनाकारों में गिने जाने वाले लोर्का आज दुनिया भर में विद्रोही चेतना के प्रतीक माने जाते है तो इसके पीछे मुख्य वजह उनकी रचनाओं , विशेषकर उनके नाटकों में गुंथा हुआ स्वतंत्रता कामना की वह उत्कटता है जो कई बार विद्रोह की सीमा तक जाती है ,बिना किसी झंडाबरदारी के..
लोर्का विद्रोही था...,लोर्का का विद्रोह स्वयं उसके अपनी समलैंगिकता से उपजे हुए अंतर्द्वंद से पैदा हुआ था...,लोर्का औरतों के दुःख को इस कारण गहराई से आत्मसात कर पाया क्यूकि वह समलैंगिक था--लोर्का के बारे में पढ़ते हुए ऐसे अवलोकनों से सामना हो जाना सामान्य है.लेकिन किसी भी अन्य लेखक की तरह लोर्का को भी उसकी रचनाओं के सहारे ही जानना चाहिए.
लोर्का के नाटकों" ब्लड वेडिंग"," एरमा" ,और" हॉउस ऑफ बर्नार्दा अल्बा " को पढ़ते हुए हम लोर्का के व्यक्ति को जान सकते हैं सकते हैं , .एक वाक्य में कहा जाए तो कह सकते हैं कि ये नाटक स्त्री के अंतर्द्वंद,उसकी स्वतंत्रता कामना की उत्कटता के नाटक हैं .इन तीनो नाटकों में स्त्री की यौनिकता को मुख्या समस्या बनाया गया है .इन नाटकों ने विशेषकर "एरमा" ने स्पेनी समाज में गहरे हिलोड़ों को जन्म .दिया..
विद्रोह लोर्का का स्वाभाविक गुण था.लोर्का के पहले कविता संग्रह" द जिप्सी बलाड" बुक ने उसे जिप्सी कवि के तौर पर स्थापित किया..यह विशेषण लोर्का को कभी पसंद नहीं आया..क्यूकि लोर्का का विद्रोह जिप्सी मार्का नहीं था..वह सोच के गहरे धरातल से पनपा था.
दरअसल जैसा कि अक्सर होता है लोर्का को जनता के बीच तो लगातार लोकप्रियता मिली लेकिन पुराथान्पंथी स्पेनी समाज कि भर्त्सना का भी उसे सामना करना पड़ा.1936 में तत्कालीन सत्ता के हाथों लोर्का की ह्त्या के दशकों बाद तक स्पेन में लोर्का का नाम " विचलन" का पर्याय माना जाता रहा..लेकिन लोर्का की लोकप्रियता दुनिया के अन्य देशों में लगातार बढती रही..दरअसल स्पेनी सिविल वार के दौरान लोर्का की ह्त्या ने उसे एक आइकोन की ,एक शहीद की हैसियत भी दे दी..बड़ा रचनाकार तो वो पहले से था ही.
लोर्का राजनीतिक रुझानों वाला रचनाकार नहीं था ..हाँ मानवीय समस्याओं को संवेदनशील दृष्टी से देखने की उसमे गजब की ताकत थी.यह अलग बात है कि आज लोर्का वामपंथी विचारधारा वाले रचनाकारों के आँखों का तारा माना जाता है..लेकिन उसकी पक्षधरता राजनैतिक झंडाबरदारी के अधीन नहीं थी.
लोर्का को याद करना लोर्का को ही याद करना नहीं है..बल्कि रचनाशीलता की उस परम्परा को याद करना है..जो सिर्फ एक चीज की अधीनता स्वीकार करती है...मानवीय सरोकारों के प्रति निष्ठापूर्ण समर्पण की अधीनता ......लोर्का के लिए यह कोई स्त्री हो सकती है जैसे गोर्की के लिए एक मजदूर..या कबीर के लिए जाती धर्मं व्यवस्था से पीड़ित कोई साधारण मनुष्य ...

18 August 2009

दुखों का दुभाषिया

अमेरिका में रह रही झुम्पा लाहिरी के पहले कहानी संग्रह interpreter of maladies को पढ़ रहा हु.किताब के कवर पर लिखा हुआ है " बंगाल बोस्टन और उससे भी आगे की काहानियाँ "..इसे तकरीबन ३-४ साल पहले ट्रेन के किसी सफ़र में पढ़ा था ,,जैसे कोई भी दूसरी किताब ऐसे सफ़र में पढ़ी जाती है ...फिर किताब गुम हो गई..संयोग से अचानक किताब फिर से हाथ लग गई है .अब इसे दोबारा पढ़ रहा हूँ ..फिलहाल दो सफ़र के बीच ..नयी जगह पर -पुराने स्थाई जगह की की चिंताओं से मुक्त ना हो पाने की विवशता को झेलता हुआ..
जिसे आज हम इंडियन इंग्लिश लेखन कहते हैं ,उस लेखन में झुम्पा लाहिरी ने अपने लिए थोड़े ही समय में एक अलग मुकाम हासिल किया है..
इस कहानी संग्रह में अपनी जमीन से उखड़े हुए लोगों की जिंदगी को जिस गैर-भावुक लेकिन फिर भी एक साफ़ महसूस किये जा सकने वाली संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया वह बरबस हमें अपनी तरफ खींचता है ..
जब मैंने यह किताब पढना शुरू किया तब मैंने सोचा की इसे एक पाठक की तरह न पढ़ कर एक खोजी की तरह पढूं ....और इसे उत्तर-औपनिवेशिक लेखन की विशिष्टताओं के बरक्स परखू ..लेकिन जैसा की किसी भी अच्छे लेखन को पढ़ते हुए होता है..इस किताब को पढ़ते वक़्त भी...मेरी हैसियत एक सामान्य पाठक से ज्यादा नहीं बची.
अमेरिका में बेहतर जीवन की उम्मीद से जा बसे भारतीय लोगों के मानसिक संघर्ष को यहाँ सधे हुए सौम्य स्ट्रोकों से लाइव कैनवास पर उकेरा गया है.छोटी-छोटी बारीकियों के प्रति एक गजब की सजगता कहानियों को विश्वसनीय बनाती है.भारत से जाकर अमेरिका में बस जाना मात्र मिटटी और पानी के बदलाव की घटना नहीं है..बल्कि एक ऐसे संघर्ष की कहानी है जो अपनी परम्पराओं और सांस्कृतिक learning के साथ बिलकुल ही एक नयी दुनिया और जीवन शैली की टकराहट के कारण पैदा होती है.
"दुखों का दुभाषिया " शीर्षक कहानी एक अनूठे प्यार या कहें आकर्षण की दास्ताँ है. कोणार्क मंदिर को देखने आनेवाले पर्यटकों के लिए दुभाषिये की हैसियत से टूरिस्ट गाइड का काम करने वाले मिस्टर कपासी और बंगाली अमेरिकी मिसेज दास के बीच जिस आकर्षण का जन्म होता है..उसे प्यार के किसी टेक्स्ट बुक से नहीं समझाया जा सकता है.. मिस्टर कपासी जिसने कभी कई भाषाओं को सीख कर दुभाषिये के तौर पर दुनिया
भर की समस्याओं को सुलझाने में अपने योगदान के सपने देखे थे... अब अपने गुजराती ज्ञान के कारण लोकल डॉक्टर के पास दुभाषिये का काम करता है. दुखों के दुभाषिये का काम...यानी मरीज के कष्ट, उसकी तकलीफ डॉक्टर को बताता है.लेकिन उसके इस काम को उसकी पत्नी तक महत्वपूर्ण काम नहीं मानती..लेकिन मिसेज दास,मिस्टर कपासी के इस काम को ना सिर्फ महत्वपूर्ण बताती है बल्कि उसके अनुभवों को जानने में रूचि दिखाती है..यही से मिस्टर कपासी के मन में मिसेज दास के लिए आकर्षण पैदा होता है.... सहज आकर्षण की ये कहानी मात्र चाँद घंटों में सिमटी हुई है..लेकिन मानवीय संवेदनाओं पर कहानीकार की पकड़ इस कहानी को स्मरणीय बनाता है..
बाकी कहानियों पर एक दो दिन में.ख़ास तौर पर" मिसेज सेन " और "जब मिस्टर पिर्ज़दा रात के खाने पर आये "पर जल्दी ही..

17 August 2009

महाराष्ट्र मेरी जान

आप इसे एक हिंदी भाषी इलाके के आदमी की दिल की भडास मान सकते हैं....
लेकिन यह कुछ और नहीं बस एक क्षण है..एक ऐसा क्षण जो कभी भी कही भी किसी के साथ भी घट सकता है..
किसी के कैमरे में कैद हो जा सकता है...या कही सीधे प्रसारित भी किया जा सकता है....
ऐसा ही क्षण आया अभी हिंदी कहानीकार,कवी, उदय प्रकाश की जिंदगी में....
किसी ने ऐसे ही किसी मौके की तस्वीर निकाल ली और ब्लॉग पर डाल दिया..उसके बाद जो हुआ आप में से बहुतों को पता है...लेकिन इस तस्वीर को देख कर अगर महाराष्ट्र को कोई बन्दर कह दे तो गलती महाराष्ट्र की तो नहीं ही बतायी जा सकती...वैसे यह साम्य यहाँ पूरी तरह नहीं जँच रहा क्यूकि उदयप्रकाश एक निर्जीव साइन बोर्ड तो कतई नहीं हैं...उनके कंधे पर तो एक लगातार सोचने वाला जागरूक सर मौजूद है....तो फिर क्या माना जाए....आदमी कभी साइन बोर्ड बन जाता है...और बन्दर उसके कंधे पर बिना उसकी जानकारी के बैठ जाता है...हाँ ऐसे क्षण से बचने के लिए यह जरूरी है की उस समय कोई कैमरा वहाँ तस्वीर निकालने के लिए मौजूद ना हो....

बातें माथेरान के जंगलों की

अचानक जंगलों की बात?? जंगल तो अब आस-पास कही दीखते भी नहीं ,,दिल्ली के रिज को भी देखे अरसा हो गया है,बस में बैठता हूँ तो पता ही नहीं चलता की रिज कब बीत गया,या रिज या ऐसा कुछ अब इस शहर में है या भी नहीं..खैर मैं अभी पुणे में हूँ .यहाँ प्रकृति का अपना अलग ही मिजाज है.लेकिन बात पुणे की नहीं,यहाँ की प्रकृति की भी नहीं...बात माथेरान की..तकरीबन ८०० मीटर ऊंचाई पर बसे इस, दुनिया के सबसे छोटे हिल स्टेशन की, जो शायद एशिया का एकमात्र pedestrian हिल स्टेशन भी है ...
यहाँ . कल मुझे प्रकृति को नजदीक से देखने और उसकी खूबसूरती को अपने भीतर जज्ब करने का मौका मिला. माथेरान में बारिश बहुत होती है.अरब सागर से आने वाला बादल माथेरान में आकर दिल खोलकर बरसता है.अपने कंधे के ऊपर बादलों को महसूस करना कितना रोमांचकारी हो सकता है...खासतौर पर जब बारिश हो रही हो....इसको शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता..इसके लिए आपको खुद यहाँ होना पड़ेगा
लेकिन इस खूबसूरती तक पहुचने और उसका दोहन करने के इंसानी कवायदों ने यहाँ की प्रकृति को किस तरह नुक्सान पहुचाया है यह भी यहाँ आप बिना देखे नहीं रह पायेंगे..वैसे अब इन चीजों की और देखने और इन पर सोचने के लिए लोगों के पास शायद ही समय बचा है. टीवी पर दिखाए जा रहे गॉसिप स्टोरी में रमे लोगों,या बाजार की उठा पटक से पल छिन ख़ुशी और ग़म के बीच हिचकोले खाते लोगों के पास ना इस नुक्सान को देख पाने की आँख है ना शक्ति..
सदाबहार जंगल को माथेरान में देखने की मेरी तमन्ना, तमन्ना ही रह गयी.जो जंगल अब यहाँ बचा है वह दोयम दर्जे का ही कहा जा सकता है.चारों तरफ बोतलों और प्लास्टिक के बैग, चिप्स के पैकटों का अम्बार लगा हुआ है...सड़क और टॉय ट्रेन बनाने के लिए पहाड़ को काटने से प्राकृतिक तंत्र बिलकुल नष्ट हो गया है..झरने सूख गए है. शायद यहाँ कभी अनेको प्रजाति के पेड़ पौधे और जानवर खासतौर पर पक्षियाँ दिखाई देती होंगी ..लेकिन मैं यहाँ वैसा कुछ नहीं देख पाया... खूबसूरती को देखते हुए जब मुझे यह एहसास हुआ की इंसानी दखलंदाजी के कारण जितनी सुन्दरता मैं देख पा रहा हु..वह बस पुराने भव्य महल का एक बचा हुआ कोना मात्र है तब मुझे उस पूरे महल को ना देख पाने का दुःख सताने लगा..
यहाँ के एक स्थानीय निवासी ने बताया की अब यहाँ बारिश भी कम होती है...भू स्खलन का खतरा काफी बढ़ता जा रहा है..मिट्टियाँ पेडों की जड़ों से बह रही है...पानी की किल्लत हो गयी है...खूबसूरती तो कुछ बची ही नहीं...हाँ, टीवी, विदेशी गानों का शोर,होटलों के स्वीमिंग पूल में विहार करते युगल जोडियाँ जरूर आ गयी हैं और कुछ पैसे भी आने लगे हैं भले पानी लाने के लिए अब नीचे तक जाना पड़ता है .तब मेरा मन उदास हो गया..अखबार में पढता हु की सहयाद्री के सदाबहार वन जैव विविधता के हॉट स्पॉट हैं,मानवता के धरोहर हैं,भविष्य में मानव को जीवित रखने की उम्मीद दुनिया के ऐसे ही चन्द जगहों पर टंगी है,,,क्यूकि प्रकृति का खजाना अपने अक्षत रूप में जिन जगहों पर बचा है सहयाद्री भी उनमे से एक है...
लेकिन क्या हम भविष्य में इंसानी कौम को बचाने की कोशिश ऐसे ही कर रहे है.??.कुछ दिन पहले ही खबर पढ़ी की अमेजन के जंगल और कांगो के जंगल भी जल्दी ही आधे से कम रह जायेंगे....आने वाली सदी..बल्कि दशकों में इंसान कहाँ पनाह लेगा किस शस्य श्यामला हरित धरती से मनुहार करेगा ...यही सोच रहा हू....क्या कंप्यूटर इन्टरनेट या ऐसे ही आविष्कार प्रकृति का substitute बन पायेंगे? जवाब हम -आप सब जानते हैं..बस उसे समझने और कुछ करने की जरूरत महसूस नहीं करते...वैसे भी राखी के स्वम्बर से लेकर शाहरुख़ खान की बेइज्जती तक बहुत सारे ज्यादा जरूरी चीजें हमारे पास फिलहाल सोचने के लिए है..

15 August 2009

आजादी के ६३ वे साल गिरह पर


आजाद देश की उम्र एक साल और बढ़ गयी. टीवी पर देखा कि यह ६३ वाँ सालगिरह है देश कि आजादी का.
लेकिन कही कोई चहल पहल नहीं है.मैं फिलहाल समाचार चैनलों में swine फ्लू का epicentre बताये जा रहे पुणे शहर में हु. तीन रोज पहले ही दिल्ली से आया.दोस्तों के लाख मना करने के बावजूद. खैर छुट्टियां थी और यहाँ आने कि वजहे मौजूद थी इसलिए यहाँ चला आया. swine फ्लू के शहर में. वैसे बहुत अच्छा हुआ.यहाँ नहीं आता तो शायद कुछ छूट जाता.
फिलहाल पुणे को नकाबपोशों का शहर कहा जा सकता है..इसे आप चाहे तो दहशत भरे चेहरों का शहर भी कह सकते हैं. हवाओं में मौत के वाइरस तैर रहे हैं जैसे .. आँखों की नाव में मानो अनजाने भय ने पनाह ले ली है..
हद तो ये है की घर के बाहर क्या घर के भीतर भी लोग swine फ्लू के वाइरस के द्बारा डस लिए जाने की चिंता से दुबले हुए जा रहे हैं .एन 95 मास्क की कालाबाजारी हो रही है..प्रभु वर्ग के लोग अगर इस मास्क का जुगाड़ नहीं कर पा रहे और उनके यहाँ काम करने वाली बाई अगर गलती से वही मास्क पहने पाई जा रही है तो मालकिनों को ही नहीं मालिकों को भी उसके भाग्य से जलन होने लगी है.वे अपने सारे रसूख अपने सारी हाई contact का इस्तेमाल एन ९५ मास्क का जुगाड़ करने के लिए कर रहे हैं..लेकिन एन ९५ मास्क की कालाबाजारी हो रही है.अमीर लोग इसे ५००- १००० में खरीद कर भी अपने आप को ,और अपनी कमाई करने की ताकत को गर्व की निगाह से देख रहे हैं. खैर एक बार जब कालाबाजारी शुरू हो गयी है तब किसी भी मालकिन या मालिक को ज्यादा दिन तक अपने काम वालियों के सामने हीन महसूस करने की नौबत नहीं आने वाली है.बाजार व्यवस्था हो या सरकारी शिकंजाकशी की व्यवस्था , गरीब काम करने वालियों या करने वालों ,बसों में धक्के खाकर ऑफिस पहुचने वालों के हाथ में जरूरी चीज का ना पहुचना ही असली सच्चाई है .खैर आजादी के ६३ वे सालगिरह पर हम एक बात तो यकीनन कह सकते हैं की अतीत में लौटने के लिए हमें अतीत में जाने की जरूरत नहीं है....अतीत तो लगातार बिना बदलाव के हमारे साथ चल रहा है.खासकर उस 90 फीसदी आबादी के  लिए जिनकी आँखें बदलाव की राह देखते -देखते पथरा चुकी है..
निजाम के बदल जाने से आवाम की जिंदगी में बदलाव आ जाने की बात करने का वक़्त पीछे छूट चुका है ..पुणे में swine फ्लू के बहाने आजादी के ६३ वे साल गिरह पर मैं आजाद मुल्क की दास्ताँ का एक हिस्सा देख रहा हु.
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सुबह के इन्तजार में

हर शाम के बाद जो सुबह होती है
वो बैठी है अभी कही छुपकर,
रूठी हुई
दिए अब भी टिमटिमा रहे हैं घरों में
खामोश ,गुमशुम
बुझने को तैयार
नयी नवेली दुल्हन ने नहीं धोया हैं अभी अपना श्रृंगार
देखने के लिए खुद को भोर के उजाले में
महसूसने के लिए अपनी नयी ज़िन्दगी,
शहंशाह ने नहीं उतारा है अपना ताज
यकीन करना है उसे भी अपनी ताजपोशी का
देखनी है मुन्नू को सुबह कि पहली किरण में
अपनी कल शाम ही खरीदी गयी साइकिल
उड़ना है उस चिडिया को घोसले से
और चुन कर लाना है दाने अपने शिशु के लिए
सुबह के इन्तेजार मे सभी हैं मैं अकेला नहीं हूँ.

चमरे के जूते की दरकार

दिल्ली में अगर जीना है ,अगर यहाँ मेहनत मशक्कत करके रोजी रोटी कमानी है तो सबसे पहले आपको एक मजबूत चमरे के जूते की दरकार है जूतों के बिना आप दिल्ली में नौकरी करने की बात भी नही सोच सकते.दिक्कत ये है की मैंनेपिछले - साल जूते पहने ही नही.कहाँ वोह सैंडल पैर में डालोऔर निकल जाओ का मजा और कहाँ जूते डालो .फीते बांधो ,पोलिश करो, का झंझट .लेकिन जूते पहनने की ये आदत रोजी ोटी कमाने मेरे प्रयास में बाधा डालने वाली है यह मुझे नही मालूम था.मुझे होता भी कैसे ? मैं ठहरा पक्का घर घुस्सू किताबों में घुसाए रहने वाला किताबी कीडा कह सकते हैंआप मुझे खैर एक दिन मुझे घर से निकलना पड़ा.नौकरी की तलाश में .ओर मैं पहुच या नॉएडा.नौकरी केलिए .बिना जूते बस में सवारी करके.आपलोगों में से जिन लोगों ने ३४७,या ३५५ ,या३२३ नम्बर के बस से सफर किया होगा उनको मेरे पैरों के अंगूठे का ध्यान रहा होगा मेरी मुर्खता पर हँसी भी रही होगी .एक के ऊपर दुसरे आदमी का पैड और दुसरे आदमी के ऊपर तीसरे आदमी का पैड .हाँ जब पैड रखने के लिए और जगह नहीं तो लोग बेचारे क्या करें .मुझे भी तो अनचाहे में कितनी बार किसी दुसरे आदमी के पेडों पर ओना पैड रखना पड़ा है.
हाँ लेकिन एक बात मुझे कभी समझ नहीं आयी कि दिल्ली को worldclass बंनाने के पीछे जो धन खर्च किया जा रहा है उस धन का कोई सरोकार हमारे अंगूठों कि रक्षा करना भी है या नहीं?मुझे तो लगता हैकि सारे सजावट कि चीजों पर ही सरकार का ध्यान टिका हुआ है.बस के भीतर झाँकने कि और ठसम ठस भरे बस में यात्रा करने वाले आदमी का वर्ल्डक्लास क्या होगा इसको समझने या उस हिसाब से नीति बनाने में सरकार की कोई रूचि ही नहीं है.
खासतौर से इसबार जब बारिश भी ऊँट के मुहँ में जीरे के सामान ही दिल्ली को छू भर कर मात्र चली गयी और प्रचंड गर्मी से रोज बस में यात्रा करनेवाले साधारण लोग पसीने के परनाले में नहाते रहे तब भी शायद ही किसी नेता या अधिकारी को यह बात शायद ही ध्यान आया होगा कि शहर को बेहतर वहाँ कि जनता के लिए बनाया जाना चाहिए.. चन्द दिनों के लिए आने वाले विदेशी खिलाडियों और मुट्ठी भर सैलानियों को होस्ट करने के नाम पर जिस तरीके से बेशर्म सजावट पर ध्यान दिया जा रहा है उसे देख कर तो यही लगता है कि मायावती हों या शीला दीक्षित या कोई और.. जनता के पैसों का दुरूपयोग करते हुए राजनेताओं को सोचना नहीं पड़ता ..
एक अदना से आदमी के अंगूठे का चूर होना ,जख्म से उसका लहुलुहान हो जाना नीति निर्माताओं के जेहन में कभी आ भी सकता है यह सोचना भी अपने आप पर हंसी ही पैदा करता है..
लाचार बन गयी जनता फिलहाल अपने पिसे अंगूठों के साथ मायावती के पार्कों के हाथियों का और शीला दीक्षित के दिल्ली दरवाजों का लुफ्त उठा सकती है....नेताओं के लिए उसके अंगूठे के बारे में यानी मेरे अंगूठे के बारे में सोचने के लिए अभी काफी वक़्त बचा है .....

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