19 August 2009

लोर्का:समलैंगिकता,स्त्री और विद्रोह

कुछ इबारतें ऐसी होती हैं जो समय के साथ धुंधली नहीं होती बल्कि धीरे धीरे गहरी उगती जाती हैं,सिर्फ कागजों पर ही नहीं हमारे दिलों पर भी.लोर्का को,या कहें कि लोर्का के बारे में पढ़ते हुए यही एहसास हमें बार बार होता है.बीसवीं सदी के महानतम रचनाकारों में गिने जाने वाले लोर्का आज दुनिया भर में विद्रोही चेतना के प्रतीक माने जाते है तो इसके पीछे मुख्य वजह उनकी रचनाओं , विशेषकर उनके नाटकों में गुंथा हुआ स्वतंत्रता कामना की वह उत्कटता है जो कई बार विद्रोह की सीमा तक जाती है ,बिना किसी झंडाबरदारी के..
लोर्का विद्रोही था...,लोर्का का विद्रोह स्वयं उसके अपनी समलैंगिकता से उपजे हुए अंतर्द्वंद से पैदा हुआ था...,लोर्का औरतों के दुःख को इस कारण गहराई से आत्मसात कर पाया क्यूकि वह समलैंगिक था--लोर्का के बारे में पढ़ते हुए ऐसे अवलोकनों से सामना हो जाना सामान्य है.लेकिन किसी भी अन्य लेखक की तरह लोर्का को भी उसकी रचनाओं के सहारे ही जानना चाहिए.
लोर्का के नाटकों" ब्लड वेडिंग"," एरमा" ,और" हॉउस ऑफ बर्नार्दा अल्बा " को पढ़ते हुए हम लोर्का के व्यक्ति को जान सकते हैं सकते हैं , .एक वाक्य में कहा जाए तो कह सकते हैं कि ये नाटक स्त्री के अंतर्द्वंद,उसकी स्वतंत्रता कामना की उत्कटता के नाटक हैं .इन तीनो नाटकों में स्त्री की यौनिकता को मुख्या समस्या बनाया गया है .इन नाटकों ने विशेषकर "एरमा" ने स्पेनी समाज में गहरे हिलोड़ों को जन्म .दिया..
विद्रोह लोर्का का स्वाभाविक गुण था.लोर्का के पहले कविता संग्रह" द जिप्सी बलाड" बुक ने उसे जिप्सी कवि के तौर पर स्थापित किया..यह विशेषण लोर्का को कभी पसंद नहीं आया..क्यूकि लोर्का का विद्रोह जिप्सी मार्का नहीं था..वह सोच के गहरे धरातल से पनपा था.
दरअसल जैसा कि अक्सर होता है लोर्का को जनता के बीच तो लगातार लोकप्रियता मिली लेकिन पुराथान्पंथी स्पेनी समाज कि भर्त्सना का भी उसे सामना करना पड़ा.1936 में तत्कालीन सत्ता के हाथों लोर्का की ह्त्या के दशकों बाद तक स्पेन में लोर्का का नाम " विचलन" का पर्याय माना जाता रहा..लेकिन लोर्का की लोकप्रियता दुनिया के अन्य देशों में लगातार बढती रही..दरअसल स्पेनी सिविल वार के दौरान लोर्का की ह्त्या ने उसे एक आइकोन की ,एक शहीद की हैसियत भी दे दी..बड़ा रचनाकार तो वो पहले से था ही.
लोर्का राजनीतिक रुझानों वाला रचनाकार नहीं था ..हाँ मानवीय समस्याओं को संवेदनशील दृष्टी से देखने की उसमे गजब की ताकत थी.यह अलग बात है कि आज लोर्का वामपंथी विचारधारा वाले रचनाकारों के आँखों का तारा माना जाता है..लेकिन उसकी पक्षधरता राजनैतिक झंडाबरदारी के अधीन नहीं थी.
लोर्का को याद करना लोर्का को ही याद करना नहीं है..बल्कि रचनाशीलता की उस परम्परा को याद करना है..जो सिर्फ एक चीज की अधीनता स्वीकार करती है...मानवीय सरोकारों के प्रति निष्ठापूर्ण समर्पण की अधीनता ......लोर्का के लिए यह कोई स्त्री हो सकती है जैसे गोर्की के लिए एक मजदूर..या कबीर के लिए जाती धर्मं व्यवस्था से पीड़ित कोई साधारण मनुष्य ...

2 comments:

  1. बहुत अच्छा लगा पढ़कर.

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  2. till this date i had only heared the name of LORCA,your blog gave me some basic and first hand information about the iconic writer.that too in a very delightful way.but it wd have been better if you had written some thing more abut his work.

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