24 July 2010

नयी इबारत: क्या राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी की असफलता से हमा...

नयी इबारत: क्या राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी की असफलता से हमा...: "इंदिरा गाँधी स्टेडियम के बहार का नजारा ७० दिन शेष और, और पूरी दिल्ली खुदी पड़ी है. कल तक बारिश के लिए तरसते लोग अचानक मनाने लगे हैं की..."

क्या राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी की असफलता से हमारा सर झुक जाएगा



इंदिरा गाँधी स्टेडियम  के बहार का नजारा

७० दिन शेष और, और पूरी दिल्ली खुदी पड़ी है. कल तक बारिश के लिए तरसते लोग अचानक मनाने लगे हैं की मेघ दिल्ली से दूर ही रहें...एक तो देश की नाक का सवाल है ..दुसरे...दिल्ली के लोग हर बारिश के साथ जाम और जलभराव से इस कदर बेहाल हो रहे हैं की बारिश दुश्मन नजर आने लगी है..उस पर से यहाँ वहां हर जगह की हुई खुदाई के अपने और ही खतरे हैं...इतना तो हर व्यक्ति देख रहा है  की दिल्ली खेलों से पहले दुल्हन की तरह तो नहीं ही सज पाएगी..बहुत  संभव है कि हमें बद इन्तजामी  के कारण शर्मिंदगी का सामना करना पड़े...लेकिन क्या इतनी सारी तैयारी सिर्फ खेलों तक  सीमित थी? यह विच्त्र बात है कि जो लोग आज दिल्ली सरकार को  मौजूदा  हालात के लिए कोस रहे हैं वो कल तक यह सवाल पूछ रहे थे कि इन सारे इंतजामो में जनता कहाँ शामिल है? सारे इंतजाम किसके लिए हैं? मुट्ठी भर विदेशी खिलाडिओं के लिए?कुछ विदेशी दर्शको के लिए..?
ये है सड़कों का नजारा 
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इसमें कोई शक नहीं कि अगर हम नाकाम रहते हैं तो हमारी किरकिरी होगी.. मौजूदा हालात में हमारा प्रयास न्यूनतम तैयारी को बेहतरीन ढंग से करने के अलावा कुछ नहीं होना चाहिए....उस बच्चे कि तरह जिसे मालूम है कि उसके पास समय कम है..और फिलहाल गेस प्रश्नों को रटने में ही समझदारी है ...लेकिन दुनिया यही ख़त्म नहीं होने वाली...डेढ़ करोर लोगों को शरण देने वाला यह शहर किसी 'फैसले के दिन' पर आकर ख़त्म नहीं होने वाला...इस शहर के लिए हर दिन फैसले का दिन है...तो अब जरूरी है कि हम इस खेल से आगे सोचे और खुद से पूछे कि अब इसके आगे क्या? हम यह पूछे कि क्या इस पूरी तैयारी  का कोई हासिल नहीं है...क्या हमने कुछ भी नहीं पाया? ढेर सारे फ्लाईओवर, अंडरपास मेट्रो का जाल, हरी हरी बसें...और थोड़ी महंगी दिल्ली ..दिल्ली महंगी हुई...लेकिन अगर इन अवसंरचनाओं को बनाने के लिए दिल्ली को महंगा होना था तो क्या यह कहा जा सकता है कि  अवसंरचनाओं  के इस विकास  रोका जा सकता था? आज अगर दिल्ली में ये विकास के काम नहीं किये जाते तो .आखिर कब?   क्या तकरीबन डेढ़ करोड़  की आबादी वाले इस मेगालोपोलिस को मरने के लिए छोड़ दिया जा सकता था?   दिल्ली के हमारे देश की राजधानी होने के कारण हमें दिल्ली को जरूरी सिविल अवसंरचनाओं से आज ना कल लैस करना ही था.. 
हम तभी कुछ करते हैं जब वैसा करना हमारा आपद धर्म  हो जाता है...तो ये खेल हमारे लिए आपद धर्म बन कर आये ..जब हम इन विकास के कामो से मुह नहीं चुरा सकते थे...आप यह नहीं कह सकते कि बेहतर दिल्ली बिहार, बंगाल, उड़ीसा ,उत्तर प्रदेश से आने वाले मजदूरों के लिए महंगी हो रही है,,,,इसलिए इसे  रोक लो .....दिल्ली को जरूरी सुविधाओं से महरूम रखना किसी समस्या का हल नहीं...समस्या यह है की उन राज्यों में वैसी स्थितियां कैसे पैदा की जाए जिससे  वहाँ विकास को गति मिले और लोगों का दिल्ली की और प्रवास कम हो...आप जब तक यह नहीं समझेंगे कि भारी संख्या में प्रवास दिल्ली के लिए ही नहीं उन राज्यों के लिए भी खतरनाक हैं जहाँ से प्रवास हो रहा है..तब तक आप इस तरह की भावुक दलीलों से विकास का विरोध करने कि गलती करते रहेंगे... .
भारत जैसे देश में असफलता कभी मूल्यहीन नहीं हो सकती...क्योंकि हमारे सामने जो च्नौतियाँ हैं उसका सामना प्रयास करने से ही किया जा सकता है...और प्रयास में असफलता ना आये यह किसी गणित के फार्मूले से भी तय नहीं किया जा सकता है....हाँ इतना जरूर है असफलता तभी मूल्यवान होती है जब असफलता के कारणों की padtaal की जाए है....गलतियों को स्वीकारा जाए..जवाबदेही तय की जाए.... आप असफलता के कारण अगर अपना मुह ढाप कर छुप नहीं सकते .. हाँ  उसे ग्लोरिफाई भी नहीं कर सकते....यह जरूरी है कि हम इस बात को जाने कि असफल क्यों हुए? क्या हम गैर जरूरी चीजों में अटक कर रह गए...मसलन इंडिया गेट , सीपी, और ल्युतेंस दिल्ली में ना उलझकर हमारा ध्यान खेलो से जुडी अवसंरचनाओं पर ज्यादा लगाना चाहिए था....भले यह सर्वश्रेष्ट निर्णय नहीं होता लेकिन उपलब्ध   विकल्पों में सर्वाधिक संभव जरूर होता...बातें बहुत सारी की जानी होगी लेकिन फिलहाल दिल्ली की झोली में आयी सुविधाओं को इस खेल की उपलब्धि मानने में कोई हर्ज नहीं दिखता. क्योंकि इस तरह इस खेल ने  इस शहर की उम्र बढ़ाई है..और यहाँ के निवासियों की भी . 

20 July 2010

ताले के पीछे घर

ऐसा रोज होता है
मैं अपने घर से
बाहर
निकल जाता हूँ
उसमे ताला लगाकर 
रात में वापस आने के लिए

मेरे जाने के बाद मेरा यह घर क्या करता है
किससे बातें करता है
किसे याद करता है
मुझे कुछ नहीं मालूम
उसे मेरा जान अच्छा लगता है या नहीं मुझे यह भी नहीं पता

हर रोज मैं वापस लौटता हूँ अपने इस घर में 
उसके भीतर पसरे हुए मौन को अपनी आहटों से भंग करता हूँ 
लेकिन कभी उसके मौन के स्वर को नहीं सुनता 
उसे सुनाता हूँ दिन भर की कहानियां


                                   एकतरफा संवाद का यह सिलसिला
                                   मेरे अगले दिन फिर घर से बहार निकलने तक जारी रहता है..

क्या मेरे इस घर को पता है कि एक दिन मैं जब ताला लगाकर जाऊँगा 
तो कभी वापस नहीं आऊंगा
और उसे स्वागत करना होगा हर रोज़  किसी और का
 जैसे वह मेरा स्वागत करती है
जरूर इसके साथ  ऐसा हुआ है ऐसा पहले कभी
जब मुड़कर नहीं आया कोई जिसके लिए इसने दिन भर इन्तेजार किया
मेरा जाना तय है क्या इसलिए जब तक मैं हूँ 
वह मुझसे मिलती रहेगी ऐसे ही
 मेरे लिए खोल देगी अपने सारे गवाक्ष 
रोज देगी अपना सारा कुछ 
 लेकिन उमड़  कर मिलेगी नहीं कभी मुझसे

मेरे  बस  में होकर भी मेरी नहीं होगी कभी 

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