10 March 2013

जो लिखना चाहा लिखा, न प्रकाशकों की कमी रही, न पाठकों की : नरेंद्र कोहली

नरेन्द्र कोहली को २२वें सम्मान के लिए चुना गया है. 


वरिष्ठ रचनाकार नरेंद्र कोहली हिंदी साहित्य में पौराणिक और ऐतिहासिक गाथाओं-चरित्रों पर महाकाव्यात्मक उपन्यास रचने वाले लेखक के रूप में जाने जाते हैं. लेकिन, उनके लेखन में विधाओं की बहुलता है और वे कथाकार के साथ व्यंग्यकार भी हैं. भारत-पाक विभाजन के बाद झारखंड के जमशेदपुर में पले -बढे. नरेंद्र कोहली ने राम, कृष्ण और विवेकानंद जैसे महापुरुषों को अपना आदर्शमाना और उनके नायकत्व को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया. हाल में उन्हें 22वें व्यास सम्मान से नवाजे जाने की घोषणा की गयी है. नरेंद्र कोहली ने अपने लेखन, समाज, साहित्य पर प्रीति सिंह परिहार से लम्बी बातचीत की.....यहाँ साक्षात्कार को आत्मवक्तव्य में ढाला गया है.  

अकसर लोग मुझसे पूछते हैं कि आपके लेखन की शुरुआत कैसे हुई, लिखने के लिए किसने प्रेरित किया? तो मैं कहता हूं कि क्या कोई प्रेरणा या घटना आपको लेखक बना सकती है! मैं मानता हूं कि लेखक बनता नहीं, पैदा होता है. यह बात हर कलाकार पर लागू होती है. अब यह अलग बात है कि वह किस कोटि का है और उसमें प्रतिभा की कितनी सघनता या उत्कृष्टता है. हम जो हैं, वही होते हैं. मैं लिखना चाहता था, लिखता था और लिख रहा हूं. अपनी पहली प्रकाशित रचना के बारे में जो मुझे याद आता है वो एक उर्दू पत्रिका में उर्दू में ही लिखी गयी एक छोटी सी कहानी थी. हाइस्कूल में आया तो हिंदी में लिखना शुरू किया. पटना से निकलने वाली ‘किशोर’ और धनबाद की ‘आवाज’ पत्रिका में बाल लेखक के रूप में रचनाएं प्रकाशित होती रहती थीं. इंटरमीडिएट कर रहा था, तब एक कहानी ‘पानी का जग, गिलास और केतली’ ‘सरिता’ के नये अंकुर स्तंभ में छपी. कहानियों का नियमित प्रकाशन ‘कहानी’ पत्रिका में फरवरी 1960 में छपी ‘दो हाथ’ से शुरू हुआ. रांची विवि से हिंदी में बीए ऑनर्स करने के बाद एमए करने दिल्ली आ गया. दिल्ली में आने के बाद भी बिना किसी प्रकाशक या संपादक के दरबार में हाजिर हुए डाक से भेजी गयी मेरी रचनाएं छपती रहीं. मैंने अपने उपन्यास की पांडुलिपियां भी प्रकाशकों को डाक से भेजी. उन्होंने जब कहा कि महराज अब दर्शन तो दो, तब गया. 

कथाकार के साथ मैं व्यंग्यकार तो था, लेकिन कवि कभी नहीं रहा. व्यंग्य यानी वक्रता मुझमें शुरू से थी, इसलिए मैं कटाक्ष भी करता हूं. कहानी से मेरा उपन्यास की ओर आना एक तरह से मेरे लेखन का विस्तार था. जैसे-जैसे लेखक का सार्मथ्य बढ.ता है, विकास होता है, तब वह सबकुछ को कहानी में नहीं समेट सकता. उपन्यास ऐसी विधा है जिसमें नाटक और व्यंग्य भी आ जाता है. कहानी तो होती ही है. बहुत लोग कहते हैं कि आपने कहानियां लिखना क्यों बंद कर दी, तो मुझे लगता है कि बंद कहां कर दी, जो कहानियां उगीं, सब उपन्यासों में समा गयीं. अगर नहीं समायीं, तो विलीन हो गयीं. बीच-बीच में कुछ कहानियां लिखी भी. उनकी फ्रिक्वेंसी जरूरी कम हो गयी. व्यंग्य तो आज भी लिख रहा हूं, उसी गति से. कहानी और व्यंग्य समानांतर मेरे भीतर थे, अब भी हैं. 

कई बार मुझे लगता है कि मेरे दो तरह के पाठक हैं. एक वे, जो व्यंग्य को कूड़ा मानते हैं और कहते हैं कि राम कथा लिखिए. दूसरी ओर व्यंग्य के पाठक हैं, जो कहते हैं कि आप इतने अच्छे व्यंग्यकार हैं, कहां महाभारत में घुसे हुए हैं. मैं उनसे कहता हूं कि तुम्हें जो पसंद आये वह पढ.ो. लेकिन मेरे मन में दोनों तरह के पाठक हैं और मैं दोनों के लिए लिखता हूं. इसलिए मुझे लिखने से आप नहीं रोक सकते. हां, आप अपने आपको पढ.ने से रोक लीजिए और जो अच्छा लगे वह पढ़िए .मेरी आरंभिक कहानियां अधिकांशत: परिवार, पड.ोसियों और कॉलेज पर थीं. लेकिन जब मुझे व्यापक रूप से समाज के विषय में लिखना था, मैं उपन्यास की ओर आ गया. मन की कटुता या विषाद का वमन करना हुआ तो व्यंग्य लिखा. 

लेखक के मन में बहुत बड़ी कामना होती है कि समाज में समरसता और न्याय हो. अत्याचार का राक्षस मारा जाये. उसके लेखन के मूल में कोई एक नहीं, धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक तमाम तरह की समस्याएं होती हैं. मुझसे एक बार आकाशवाणी की प्रोड्यूसर ने कहा कि आप दिल्ली में रहते हैं, वहां इतनी राजनीति है और आप महाभारत पर लिख रहे हैं? मैंने उनसे पूछा कि आपको धृतराष्ट्र और नरसिंह राव के दरबार में कोई अंतर दिखाई देता है? वे बोलीं, मैंने तो कभी ऐसे सोचा ही नहीं. मैंने कहा, तो अब सोचिए. दरअसल, राजनीति आज भी वही है, जो तब थी. युग बदलते हैं, मनुष्य का स्वभाव नहीं बदलता, जो काम, क्रोध, लोभ, मोह से बना है. मुझे जो गलत लगता है, मैं उसे मिटाने के लिए लिखता हूं. अपने दोषों से मुक्त होने, संस्कार ग्रहण करने के लिए लिखता हूं. 

राम, कृष्ण, विवेकानंद मेरे लिए नायक हैं, लेकिन उन पर उपन्यास लिखने की राजनीतिक वजहें भी रहीं. 1971 में बांग्लादेश बना, तो खबरें आयीं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों जनसामान्य के बौद्धिक नेतृत्व को समाप्त करने के लिए बुद्धिजीवियों को मारना चाहते हैं. उन्होंने सामूहिक हत्याएं की भीं. तब मेरे मन में सवाल उठा कि ऋषियों को राक्षस क्यों खाता है? इसलिए क्योंकि वे समाज का बौद्धिक नेतृत्व करते हैं. समाचार पत्रों में जो होता है, वही मुझे पौराणिक कथाओं में दिखाई देता है. अखबार पढ.ो, तो उसमें पुराण दिखता है. पुराण पढ.ो तो उसमें अखबार दिखाई देते हैं. केवल ऊपर का आवरण भित्र है. भीतर से तो बातें वही हैं. शिव के साथ जब सती का विवाह हुआ, दक्ष प्रजापति ने एक धनी श्‍वसुर की तरह अपने निर्धन दामाद का अपमान किया. आज भी यही होता है. यह किसी और लोक की कथा नहीं हैं. हमारे जीवन की सारी प्रमुख वृत्तियां और समस्याएं इसमें हैं. इसलिए मेरे लिए यह कोई अलग चीज नहीं थी. कल और आज में कोई भेद नहीं. नारी विर्मश की बात आजकल बहुत होती है. अहिल्या दोषी थीं या नहीं थीं? यह एक बहुत बड.ा प्रश्न है, उनके पक्ष और विपक्ष दोनों मेंतर्क मिलते हैं. लेकिन उनको दूषित तो मान लिया गया था. मेरे मन में तबसे यह प्रश्न है जब दिल्ली में मिसेज शर्मा अपने सम्मान की रक्षा के लिए चलती बस से कूद कर मर गयी थीं. मेरे लिए वही अहिल्या हैं. अगर एक पुरुष को चार गुंडे पकड. लें और उसकी हड्डियां तोड. दें तो पुरुष दोषी नहीं माना जाता, लेकिन स्त्री के साथ अगर अत्याचार हुआ, तो समाज उसे दोषी नहीं, दूषित तो मान ही लेता है. रामकथा कहती है कि समाज की नजर में दूषित मान ली गयी अहिल्या के चरण छुए राम ने. वह, पत्थर की तरह पड.ी हैं शिलावत, उनके पास कोई नहीं जाता. उनके पति गौतम एक नये आर्शम के कुलपति हैं, बेटा जनक का राजगुरु है, दोनों में साहस नहीं है कि उन्हें सम्मान पूर्वक अपने घर में रख सकें. राम में साहस है यह कहने का कि हां मैं उनके घर गया, मैंने उनका दिया हुआ खाया और मैंने उसके चरण छुए. अब लेखक समकालीन चीजों पर लिखे या पौराणिक कथाओं पर, बात तो वही कहनी है. अपने युग से कोई लेखक स्वतंत्र नहीं होता, माध्यम कोईभी हो सकता है. मेरे लिए इन सर्वविदित कथाओं को बिना परिवर्तन के मौलिक कथा के रूप में कहने की चुनौती थी. 

लिखने से रोकने वाली जो चीजें हैं उनमें एक स्वयं की अक्षमता है. दूसरी बाधा, परिवार, मित्र और समाज से आती है, जो कहता है कि यह क्या और क्यों लिख रहे हो. तीसरी होती है सरकार कि आप लिखेंगे तो जेल जायेंगे. मैंने इन्हें कभी बाधा नहीं माना. नहीं दोगे पुरस्कार, मत दो. क्या छीन लोगे. अभी तक तो किसी ने कुछ छीना नहीं. नौकरी मैंने अपनी इच्छा से छोड.ी. हां, सरकार के संगठन और संस्थानों में मेरे नाम का बहुत स्वागत नहीं होता. फिर भी राम जी की जब इच्छा होती है और जो सम्मान मिलना होता है, मिल ही जाता है. 

पुरस्कार में दो बातें होती हैं. एक तो धन, दूसरी सामाजिक मान्यता. दूसरी बात महत्वपूर्ण है. मेरे इस मोहल्ले में, जहां मैं 30 साल से रह रहा हूं, जो लोग मुझे जानते नहीं थे, कभी नमस्ते नहीं करते थे, व्यास सम्मान की खबर पढ. कर उन्होंने भी फोन किया. अपने लिए प्रतिष्ठा कौन नहीं चाहता. लेखक के अंदर भी यह भूख होती है. यह बहुत स्वाभाविक है. मानस का हंस में अमृत लाल नागर ने लिखा कि तुलसी कहते हैं,‘धन की लिप्सा तो छूट जाती है, यह यश की लिप्सा नहीं छूटती.’ पुरस्कार उसकी पूर्ति करते हैं. लेकिन आप जब अपनी वासना से ऊपर उठकर कला के धरातल पर आ जाते हैं, तो ये चीजें उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जातीं. यह नहीं कह रहा हूं कि मैं वहां पहुंच गया हूं, लेकिन इतना तो हो ही गया है कि मिलता है तो मिले, नहीं मिलता तो भी मुझे कोईपरवाह नहीं. मैंने जो कुछ लिखना चाहा लिखा और न मुझे प्रकाशकों की कमी रही, न पाठकों की. अब जो संस्थान और सरकार उपेक्षा करते हैं, करते रहें. ऐसा भी नहीं है कि जिसको पुरस्कार नहीं मिला, वो बड.ा लेखक नहीं बना. असल में जीवन का एक कालखंड होता है, उसके बाद हर आदमी को जाना है. मैं 73 का हो गया और कितने साल बचे हैं मेरे पास? मुश्किल से 10 या 12 साल. इससे ज्यादा तो नहीं. मेरे बाद अगर मेरी जय-जयकार भी हो, तो मैं नहीं हूं देखने के लिए. न हो तो भी मैं नहीं हूं. मैं बस लिख रहा हूं, अच्छा बुरा जो कुछ है, समय उसका निणर्य करेगा. मुझे इस निर्णय की भी चिंता नहीं. 

मेरे लिए यह तय करना मुश्किल है कि मेरी कौन सी रचना मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है. लेखक किसी रचना को जिस समय लिख रहा होता है, उस वक्त उसे वही सबसे ज्यादा प्रिय होती है. फिर भी कई खंडों में आयी ‘रामकथा’ मुझे लिखने के अलावा अन्य कई कारणों से बहुत प्रिय है. 

छोटी रचनाएं मूड की बात होती हैं. आवेश में एक सिटिंग लिखी जाती हैं. लेकिन बड.ी रचना में मूड काम नहीं करता. आप किसी रचना पर लंबे समय तक काम करते रहते हैं, तो वो भीतर से निरंतर मथती रहती है. एक अंत: सलिला की तरह अंदर बहती रहती है. ऊपर की सतह हटी और वह प्रकट हुई. यह अभ्यास की भी बात है. आप सिद्ध कर लेते हैं इस कला को कि बैठूंगा तो लिखने लगूंगा. लेखन एक साधना है और वो सिद्ध हो जाती है अभ्यास से. प्रेमचंद के बारे में आपने पढ.ा होगा कि वो बैठे लिख रहे होते थे और उनकी पत्नी उन्हें थैला दे देती थीं कि जाओ सब्जी ले आओ, तो वो सब्जी लेने चले जाते थे. सब्जी लेकर आते और थैला पत्नी को देकर फिर लिखने बैठ जाते. आप अपने पात्रों के साथ जीते रहते हैं और जब लिखने बैठते हैं, तो वे आपके भीतर से बाहर आकर खडे. हो जाते हैं. मेरे लिए जरूरी है कि मैं सुबह लिखने बैठ जाऊं. आधा या दो घंटे लिख लूं फिर बीच में चाहे कोई मिलने आये, फोन आ जाये, वो निपटाकर मैं फिर लिखने लगूंगा. लेकिन अगर सुबह मुझे किसी कारण से बैठने नहीं दिया गया और 11 बज गये, फिर मैं नहीं लिखता. 

एकाग्रता को हम समाधि तक ले जाते हैं. एकाग्रता से हमारी चेतना के ऊपर छाये बादल हटते हैं. हम सोच कर बैठते हैं कि पांच पृष्ठ लिखने हैंऔर उठते हैं, तो पच्चीस पृष्ठ लिख चुके होते हैं. ऐसा भी होता है कि सोचा 25 पृष्ठ लिखेंगे और पांच भी नहीं लिखते, क्योंकि चीजें परिपक्व नहीं होतीं. एकाग्रता जितनी सध जाये, उतना हम उसे आसानी से पाते चले जाते हैं. काव्यशास्त्र में एक जगह कहा गया है कि लेखक की एकाग्रता की वही स्थिति है, जो योगी की समाधि की. ऋषि हर समय इसी स्थिति में होते हैं जबकि लेखक उससे उठकर फिर वही साधारण आदमी हो जाता है, जो बकबक करता है, झगड.ता है, स्वार्थी भी होता है. लेकिन लिखते समय वह भी ऋषि होता है, ऐसा शास्त्रों में बताया गया है. 

लिखना-पढ.ना मेरा सबसे प्रिय और महत्वपूर्ण काम है. लेकिन लेखन से इतर जो मुझे पसंद है, वो है- गपबाजी. अपने कुछ प्रिय मित्र हों, जिनसे बात करके सुख मिले, बाकी तो घूमने, फिरने, ताश खेलने, शराब पीने के शौक मुझमें नहीं हैं. पान गोष्ठियों में भी नहीं जाता हूं. खामखा का सिर मारना मुझे पसंद नहीं है. एक अच्छी बातचीत हो, जो मन को आह्लाद और कुछ ज्ञान दे. 

साक्षात्कार मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित  


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