27 March 2013

सौ साल के सिनेमा में गायब होती होली...

कभी समय था जब फ़िल्मी परदे पर होली को एक अनिवार्य आकर्षण के रूप में समाहित किया जाता था. लेकिन सिनेमा के सौवें साल तक आते आते हिंदी सिनेमा से होली लगभग गायब हो चुकी है। सौ साल का सिनेमा और होली के साथ इसके रिश्ते को बारीकी से देखा है फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने. आप भी पढ़िए और होली के रंग में डूबिये उतरिये.  





मल्टीप्लेक्सों की चमक में धब्बे के डर से पानी की बोतलों पर भी जब प्रतिबंध लगा, तो बाजार के आगे समर्पित हिंदी सिनेमा ने बगैर प्रतीक्षा किये परदे पर भी होली को दिखाना प्रतिबंधित कर लिया. शायद कथित आधुनिक सौंदर्यबोध ने आज के फिल्मकारों को यह सीख दी होगी कि होली का भदेसपन, मल्टीप्लेक्स के अति अभिजात्य वातावरण में टाट की पैबंद सरीखा दिखेगा. आश्‍चर्य नहीं कि कभी हिंदी सिनेमा के लिए अनिवार्य रही होली अब सिर्फ सिनेमा की खबरों में दिखायी देती है, सिनेमा के परदे पर नहीं. वास्तव में सिनेमा ने दर्शक बदले, तो उसके त्योहार भी बदले, आज ‘वेलेन्टाइन डे’ और ‘फ्रेंडशिप डे’ हिंदी सिनेमा सेलिब्रेट कर रही है, कभी समय था जब परदे पर होली को एक अनिवार्य आकर्षण के रूप में समाहित किया जाता था. यह वह समय था जब हिंदी फिल्में, हिंदी दर्शकों को ध्यान में रख कर बना करती थीं. उस समय -‘होली आई रे’, ‘होली’, ‘फागुन’ जैसी कई फिल्में बनी, जिसमें सारा कथानक होली के इर्द-गिर्द ही घूमता था. 

यह वह समय था, जब हिंदी सिनेमा के लिए होली वर्जनामुक्त होने का एकमात्र बहाना था. यह सिर्फ रंग और उत्साह का अवसर नहीं था, मानव मुक्ति का अवसर था, जिसमें मन की कुंठाओं, आग्रहों और पूर्वाग्रहों से मुक्ति पायी जाती थी. आज के समाज को शायद ही समझ में आये कि होली का वर्जनामुक्ति से क्या संबंध है? उनके लिए तो हरेक दिन और दिन के हर घंटे वर्जनामुक्त हैं. ‘जिस्म’ और ‘र्मडर’ के दौर में जब महेश भट्ट जैसे फिल्मकार विवाहेत्तर संबंध को स्वाभाविक मानकर चल रहे हों, जहां सहमति से सेक्स की उम्र सोलह करने के लिए दवाब बन रहा हो, वहां कैसे किसी से यह समझने की उम्मीद की जा सकती है कि ‘फूल और पत्थर’ में होली के अवसर पर पुलकित होकर मीना कुमारी क्यों गाती हैं, ‘लायी है हजारों रंग होली...’, आज की पीढ.ी के लिए यह एहसास दुर्लभ है.

जाहिर है विपुल शाह की कुछ वर्ष पहले आयी ‘वक्त- रेस अगेंस्ट टाइम’ में होली दिखायी भी जाती है, तो अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड.ा की ‘लेट्स प्ले होली’ की सरगोशियों के साथ, यहां तय करना मुश्किल हो जाता है कि यह कोई रेनडांस का सीक्वेंश है या उस होली का दृश्य जिसे हम जानते रहे हैं. यह होली के स्वभाव का ही कमाल है कि रंगों के लिए जाने जाना वाला यह त्योहार हिंदी सिनेमा में तब भी दिखाया जाता था, जब उसके पास रंगों की ताकत नहीं थी. यूं तो कई श्‍वेत-श्याम फिल्मों में होली दृश्य पूरी जीवंतता से फिल्माये गये, लेकिन 1950 में बनी ‘जोगन’ के ‘डारो रे रंग डारो रसिया’ को आज भी भुलाना संभव नहीं हो पाता. इस गीत में दिखती नरगिस की जीवंतता फिर एक बार देखने को मिली महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ में. गांव की अलमस्ती, छेड.छाड. और ,संबंधों की गरमाहट प्रदर्शित करती ‘होली आई रे कन्हाई रंग छलके, सुना दे जरा बांसुरी..’ आज भी होली के उत्साह से सराबोर कर जाती है.

‘मंगल पांडे’ में ‘भीगी चोली, चुनरी भी गीली हुई, सजना देखो मैं नीली हुई. थोड.ी-थोड.ी तू जो नसीली हुई, पतली कमर लचकीली हुई. .तुम रह-रह के फेंको न यह नजरों का जाल.अब हमें कोई रोके नहीं, कोई टोके नहीं.. ’ के बोल पर एक ओर मंगल पांडे और नर्तकी के प्रेम को परवान चढ.ते दिखाया जाता है, वहीं दूसरी ओर कम उम्र में विधवा बनी अमीशा के मन में उमडे. स्वभाविक उत्साह को भी प्रदर्शित किया जाता है. केतन मेहता के लिए मंगल पांडे के कालखंड में वर्जना को टूटते दिखाये जाने का होली के अलावा दूसरा अवसर नहीं हो सकता था.

अधिकांश हिंदी फिल्मों में होली के अवसर का उपयोग कथानक को एक नया मोड. देने के लिए ही किया गया है. राजेश खत्रा अभिनीत ‘कटी पतंग’ की, ‘आज न छोडे.ंगे हमजोली...’ के गीत होली के मूड को दोगूना ही नहीं करते, इस गीत में अभिव्यक्त एक युवा विधवा के दर्द का कंट्रास्ट इसे और भी प्रासंगिक बना देता है. कई फिल्मों में होली का अवसर प्रेम की मुखर अभिव्यक्ति के रूप में भी प्रदर्शित हुआ है. राकेश रोशन की ‘कामचोर’ में नायिका, ‘जहां मल दे गुलाल मोहे ..’ की मांग करती है, वहीं ‘डर’ में नायिका अज्ञात प्रेमी के भय से मुक्त होने का उत्साह अपने पति के साथ इन शब्दों के साथ मनाती है, ‘अंग से अंग मिलाना सजन ऐसे रंग लगाना..’.

आज जब तय रूप से हिंदी फिल्में मल्टीप्लेक्स और एनआरआइ दर्शकों को ध्यान में रख कर बनायी जा रही हैं, उसमें होली जैसे त्योहार की गुंजाइश ही नहीं बचती. हिंदी समाज में होली अभिजात्य लोगों द्वारा भी भले ही मना ली जाती रही हो, लेकिन खेलने की परंपरा सर्वहारा की ही रही है. कह सकते हैं होली का आनंद बगैर सर्वहारा हुए हम नहीं उठा सकते. निश्‍चय ही आज के कथित कॉरपोरेट दौर में जब सब कुछ एकदम करीने से चाहिए होता है, होली की भदेस सामूहिकता कैसे सूट कर सकती है. उन्हें नीली रोशनी में दिखाये जा रहे नितांत अंतरंग दृश्यों पर आपत्ति नहीं होती, लेकिन ढोल-मजीरे की थाप पर होरी का समूह गायन उन्हें अश्लील ही नहीं, विद्रुप भी लगता है. आश्‍चर्य नहीं कि लंबे अंतराल के बाद आये ‘बागवान’ के गीत ‘होली खेले रघुवीरा..’ के अतिरिक्त होली गीतों के नाम पर हिंदी सिनेमा में सत्राटा ही दिखायी पड.ता है. ‘बागवान’ की होली भी इसलिए दर्शकों को स्वीकार्य हो गयी. क्योंकि यह एक परिवार की कहानी थी, इसमें एक समाज को स्थापित करने की कोशिश की गयी थी. सबसे बढ.कर इसमें महानायक अमिताभ बच्चन थे, जहां आकर सारे फिल्मी गणित और व्याकरण ध्वस्त हो जाते हैं.



यह मात्र संयोग नहीं कि हिंदी सिनेमा के पांच कालजयी होली गीतों को याद करने की कोशिश करें तो तीन अमिताभ पर ही फिल्माये गये हैं. ‘बागवान’ से पहले ‘सिलसिला’ का रंग बरसे.., और उससे पहले ‘शोले’ का विहंगम, होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं..’. वर्षों से लोकगीत के रूप में गाये जाने वाले, रंग बरसे..का विकल्प नहीं ढूंढ.ा जा सकता. होली और होली गीत ही किसी व्यक्ति को अपने प्रेम की सार्वजनिक अभिव्यक्ति की ताकत दे सकते हैं. खासकर तब जब वह सामाजिक दायरे से बाहर भी हो. ऐसा ही स्मिता पाटिल अभिनीत ‘आखिर क्यों’ में भी दिखा था, जब नायक अपनी पत्नी के सामने ही उसकी छोटी बहन से प्रणय निवेदन कर बैठता है, ‘सात रंग में खेल रही दिलवालों की होली रे..’. ये होली गीत फिल्म के कथानक में भी महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं. और केवल नायिका के तन दिखाने का बहाना मात्र नही होते. जैसा सावन कुमार की ‘सौतन’ मे दिखा था, जब वे मॉरिशस में नायिका को ‘मेरी तो पहले ही तंग थी चोली, आ गयी बैरन होली.’ के साथ होली के रंगों में सराबोर दिखाते हैं.

सच यही है कि अधिकांश फिल्मों में होली सौंदर्य, सामाजिकता और संगीत का समन्वय ही प्रदर्शित करती आयी है. वास्तव में जिसे भुलाना संभव नहीं. ‘कोहीनूर’ को आज हम भले ही याद न कर पायें, लेकिन अपने मन से उसके ‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो’ को उतार पाना कतई संभव नहीं. वी शांताराम ने भी अपनी पहली रंगीन फिल्म ‘नवरंग’ में एक अद्भुत होली गीत रखा था, जिसे नृत्यांगना संध्या की चपलता ने अविस्मरणीय बना दिया. छेड.छाड. के साथ कुछ यूं शुरू होते हैं, गीत के बोल, कटक अटक झटपट पनघट पर चटक मटक झनकार नवेली.. और फिर प्रत्युत्तर शुरू होता है, जारे हट नटखट.. गौरतलब है कि इस गीत में नायक नायिका दोनों की ही भूमिका अकेले संध्या ने ही निभायी थी. यहां ‘नदिया के पार’ को कैसे भूला जा सकता है, जोगिड.ा सारारारा..भोजपुरी पृष्ठभूमि वाले इस गाने में नायक नायिका ही नहीं पूरा गांव रंगों में सराबोर दिखता है. बूढे. से लेकर बच्चे तक. होली के अवसर पर पारंपरिक नटुआ नाच की झलक भी शायद यहां पहली बार हिंदी फिल्म में दिखी थी.

होली की विशेषता ही है जितने रंग हैं, उतने ही मूड हैं. हिंदी सिनेमा ने कमोबेश होली के हरेक मूड को फिल्माने की कोशिश की भी की है. अब होली भी खो रही है और उसकी विशेषता भी, जाहिर है परदे से भी गुम हो रही है होली.

विनोद अनुपम राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 

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