20 March 2013

भारत पर चे ग्वेरा


क्यूबाई क्रान्ति के ठीक बाद चे ग्वेरा , फिदेल कास्त्रो के दूत के तौर पर भारत आये थे. इस यात्रा के दौरान उन्होंने जवाहर लाल नेहरु से मुलाकात की थी और भारत की दशा, क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष, संघर्ष के गांधीवादी तरीके,  नेहरूवादी विकास, भारत में व्याप्त असमानता आदि विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकट किये थे.  भारत पर उनका लिखा एक संस्मरण कुछ साल पहले अंग्रेजी पत्रिका फ्रंटलाइन छपा था..उसी संस्मरण का एक अंश...




काहिरा से हमने सीधे भारत के लिए उड़ान भरी. 39 करोड़ लोगों का देश, जिसका क्षेत्रफल 30 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है.

भूमि के नाट्य का एहसास यहाँ मिस्र से ज्यादा होता. यहां मिट्टी की उर्वरता रेगिस्तानी मिस्र से कहीं ज्यादा है. लेकिन सामाजिक अन्याय ने भूमि के असमान और मनमाने वितरण को जन्म दिया है. जिसका परिणाम है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों के पास काफी जमीन है, जबकि बहुतों के पास कुछ भी नहीं
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भारत को ब्रिटेन ने 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत के दौरान अपना उपनिवेश बनाया था. निश्चित तौर पर इस जीत के साथ आजादी बनाये रखने के संघर्ष की कहानी भी जुड़ी हुई है, लेकिन अंगरेजों की सैन्य क्षमता इस मामले में निर्णायक साबित हुई. भारत के फलते-फूलते हस्तकरघा उद्योग को साम्राज्यवादी संरचना के हाथों काफी नुकसान उठाना पड़ा जो भारतीयों की आर्थिक आत्मनिर्भरता को समाप्त करने पर आमादा थे, ताकि उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए साम्राज्य का कर्जदार बनाया जा सके. यह स्थिति पूरी 19वीं शताब्दी के दौरान बनी रही. 20वीं शताब्दी जिसमें हम रह रहे हैं,  यह देश कई विद्रोहों का साक्षी भी बना , जिसमें कई बेगुनाहों की जान गयी.

दुसरे विश्वयुद्ध से बाहर निकलते हुए अंगरेजी साम्राज्य के विखंडन के संकेत काफी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे थे. भारत में रहस्यवादी-आध्यात्मिक व्यक्तित्व वाले(मिस्टिक फिगर)  महात्मा गांधी के नेतृत्व में  चलाये जा रहे निष्क्रिय प्रतिरोध ने आखिर कार वर्षों से कामना की जा रही आजादी के लक्ष्य को हासिल किया. गांधी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने भारत की बागडोर संभाली. नेहरू को एक ऐसे देश का नेतृत्व मिला, जिसकी चेतना अनंत वर्षों के बाहरी वर्चस्व के कारण रुग्ण हो गयी थी, और जिसकी अर्थव्यवस्था को लंदन के मेट्रोपाॅलिटन बाजारों के लिए सस्ते दामों में सामान मुहैया कराने के लिए मजबूर किया गया था. भूमि का पुनर्वितरण किया जाना था और देश को भविष्य की आर्थिक तरक्की के लिए औद्योगिकीकृत किया जाना था. कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने खुद को इस लक्ष्य के प्रति बेहद उत्साह के साथ समर्पित किया.

इस विशालकाय और अतिसाधारण देश में ऐसी कई संस्थाएं और रवायतें हैं जो वर्तमान समय की सामाजिक समस्याओं को लेकर बनायी गयी हमारी अवधारणा से मेल नहीं खाती हैं. प्रासंगिक नजर नहीं आतीं.
हमारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था समान है. अपमान और उपनिवेशीकरण का इतिहास भी एक जैसा है. हमने प्रगति की समान दिशा चुनी है. बावजूद इसके कि हमारे समाधान काफी मिलते-जुलते हैं और एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं, वास्तव में वे काफी अलग हैं. कुछ वैसे, जैसे दिन, रात से होता है. हमारे देश में कृषि सुधार की एक बड़ी आंधी ने कैमागुवे (क्यूबा का एक प्रांत) में बड़ी जोतों को  समाप्त कर दिया. अब यह लहर पूरे देश में अबाध रूप से फैल रही है और इसे रोक पाना अब मुमकिन नहीं है. बड़ी जोतों को समाप्त किया जा रहा है और गरीब किसानों को मुफ्त में जमीन का वितरण किया जा रहा है.

लेकिन महान भारत देश इस मामले में काफी प्राच्यवादी सतर्कता और कंजूसी दिखा रहा है. वह काफी फूंक-फूक कर कदम रखते हुए बड़े भूपतियों को भूमिहीन किसानों को भूमि देने का न्याय करने के लिए राजी कर रहा है और किसानों को इस  जमीन के लिए पैसे चुकाने के लिए मना रहा है. इस तरह दुनिया में सबसे पवित्र, समझदार और गरीब बना दिये गये लोगों को घोर वंचितता से बाहर लाने की प्रक्रिया इतनी से चल रही है कि नजर ही नहीं आती.

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