3 March 2013

अकथ के महासागर से जन्म लेती है कविता : के सच्चिदानंदन


मलयालम  के प्रसिद्ध कवि-आलोचक के सच्चिदानंदन को मलयालम भाषा के लिए 2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया है. 18-19 फरवरी को सच्चिदानंदन दिल्ली में थे. मौका था साहित्य अकादमी पुरस्कार ग्रहण करने का. पुरस्कार ग्रहण करने के बाद दिये गये अपने वक्तव्य में सच्चिदानंदन ने मलयालम कविता के साथ ही खुद की कविता के बारे में भी महत्वपूर्ण बातें कहीं. अकादमी पुरस्कार वक्तव्य के अनुवाद का पहला भाग ...




दूसरों की कविता पर बात करना  हमेशा अपनी कविता पर बात करने की तुलना में आसान होता है. मैं यह नहीं बता सकता कि मेरे पास कविता कहां से आयी. इसका स्रोत क्या था. मेरे घर में पहले शायद ही कोई कवि था. जब भी मैं इस बारे में सोचता हूं, मुझे केरल के अपने गांव में लगातार होनेवाली झमाझम बारिश की आवाज सुनाई देती है. मुझे अपने स्कूल के दिनो में पढ़ी मलयाली रामायण की वे दीप्तिमान पंक्तियां याद आाती हैं, जिसमें कवि शब्दों की देवी से प्रार्थना करता है कि उसके दिमाग में सही शब्द बिना किसी ठहराव के अंतहीन समुद्री लहरों की तरह तैरते हुए चलते आयें. मेरी मां ने मुझे बिल्लियों, कौवों और पेड़ों से बात करना सिखाया. मेरे धर्मनिष्ठ पिता से मैंने ईश्वर और आत्माओं से संवाद करना सीखा. मेरी चेतना खो चुकी दादी ने मुझे इस कभी न खत्म होनेवाली रोज की दुनिया की नीरसता से बचने के लिए अपनी एक समानांतर दुनिया रचना सिखाया. मृतकों ने मुझे सिखाया कि मैं माटी के लोगों में से ही एक रहूं. हवाओं ने मुझे चलना और कांपना सिखाया कुछ इस तरह कि यह नजर में न आये. वर्षा ने मेरे स्वर को हजारों आरोह-अवरोह सिखाए. ऐसे शिक्षकों के बीच रहते हुए यह असंभव था कि मैं कवि जैसा कुछ नहीं बनता. 

मैंने अपनी कविता को 1960 के दशक मे गंभीरता से लेना शुरू किया, जब मलयाली कविता थीम, मूड और रूप के स्तर पर क्रांतिकारी बदलावों के दौर से गुजर रही थी. उस वक्त का नया कवि जो स्वच्छंदतावाद (रोमांटिसिज्म) के अतिचार और प्रगतिवादियों के उथलेपन से थक सा गया था, एक नया और अलग काव्य मुहावरा गढ़ने की कोशिश कर रहा था. एक ऐसा मुहावरा जो समकालीन जीवन की जटिलताओं को कैद करने में समर्थ हो सके. इन कवियों ने अपनी ट्रेनिंग तीन स्रोतों से हासिल की थी. विशिष्ट रूप से- मलयालम कविता की मौखिक और लिखित परंपरा से. व्यापक स्तर पर- क्लासिकल और भारतीय कविता की आधुनिक परंपरा से. और आधुनिक यूरोपीय कविता के आवां गार्द परंपरा से. नयी लय, नये उपमान, नये बिंब, नये शब्द समूह, भावनाओं और विचारों की नयी संरचनाएं, विभिन्न संस्कृतियों के आदिरूपों, मिथकों और दंतकथाओं के क्रांतिकारी तरीके से इस्तेमाल ने मिल कर मेरी भाषा में कविता के पूरे परिदृश्य को ही बदल कर रख दिया. कुछ उसी तरह जैसा दूसरी कई भाषाओं में हो रहा था. इस बदलाव का मेरे अंदर के कवि पर गहरा प्रभाव पड़ा और उसे नयी दिशा और आयाम दे गया. हमलोग केरल कविता(पत्रिका) के पीछे लामबंद हो गये. जिसका हर त्रैमासिक अंक कविता पर बहसों, वाचनों और प्रस्तुतियों का एक मौका बना जाया करता था. केरल में आधुनिक भावबोध पर आधारित एक नया समूह विकसित हो रहा था. इस वर्ग में लेखकों के अलावा आधुनिक चित्रकार, मूर्तिकार, फिल्म निर्माता और नाट्य लेखक शामिल थे. मेरी कविताओं का पहला संग्रह ‘अंचुसूर्यन’(पांच सूर्य)1971 में प्रकाशित हुआ और आधुनिक कविता पर एक ‘कुरुक्षेत्रम’ नाम की किताब एक साल पहले. इसके बाद लगभग हर दो साल के हिसाब से 20 संग्रह आये. 2006 में सारी कविताएं 500-500 पन्ने की तीन जिल्दों में संकलित हो कर आयीं. मैंने कभी आलोचक बनने के बारे में नहीं सोचा था, लेकिन उस समय काफी कम लोग थे, जो आधुनिक भावबोध की व्याख्या कर सकते थे. इसलिए मजबूरीवश मुझे यह जिम्मेदारी निभानी पड़ी. इस क्रम में मैंने नयी कविता, नयी कहानी, आधुनिक चित्रकला पर लेख या किताबें लिखीं. उत्तर-संरचनावाद में मेरे शोध और आलोचना के क्षेत्र में मेरी कोशिशों ने मेरी कविता को शायद ही कोई मदद की हो, लेकिन निश्चित तौर पर रचनात्मक लेखन की जटिल भाषायी प्रक्रिया और हर लेखन की अज्ञात और बहुस्वरी प्रकृति को समझने में इसने मेरी मदद जरूर की. इसने मुझे अपने लेखन को लेकर कम आग्रही(पजेसिव) बनाया.

1970 के दशक के उत्तरार्द्ध में एक नयी राजनीतिक चेतना ने आधुनिक कविता में नया प्राण भरने का काम किया. अब यह व्यापक सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक स्थितियों से जिरह करने और यथास्थितिवाद की जांच करने को तैयार थी. नयी कविता को इतिहास की आंखें मिल गयीं.  इसे कुछ हद तक नये वामपंथी आंदोलन जिसने केरल और देश के कई दूसरे राज्यों में नौजवानों को अपनी ओर आकर्षित किया था और कुछ हद तक सर्वदेशीय स्तर पर कामगारों, किसानों, दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के जागरण से इसे शक्ति ऊर्जा मिली. आज मैं यह भली-भांति देख सकता हूं कि नये वामपंथी आंदोलन में कुछ गंभीर समस्याएं थीं, लेकिन इसने निश्चित तौर पर व्यापक रचनात्मक ऊर्जा को जन्म दिया, जिसने हमारी कविता, कहानी-उपन्यास, थियेटर और सिनेमा को बदल कर रख दिया. आधुनितकतावादियों की बिरादरी नये सिरे से संगठित हुई.  कुछ लेखकों का पूरी तरह से रूपांतरण हो गया, जिसने यीट्स के शब्दों में कहें तो भयावह सुंदरता (टेरिबल ब्यूटी) को जन्म दिया. कुछ में यह बदलाव सीमित स्तर पर हुआ. ये इस नयी राजनीति के प्रति सहानुभूति रखते थे. हम  सभी "जनकीय  संस्कारिका वेदी"(द फोरम फार पीपुल्स कल्चर) से जुड़े थे. इसके जर्नलों और कार्यक्रमों में आवां गार्द कला और साहित्यिक रूपों को प्रोत्साहित करने की कोशिश की गयी. लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी कवियों के साथ ही यूरोप के सामाजिक संघर्ष के कवियों के अनुवादों ने (जिनमें से ज्यादातर मैंने किये थे)  आधुनिकतावादी कविता का वैकल्पिक माडल सामने रखा. विश्वविद्यालयों के परिसर कविता पाठों और नाटकों से  गुलजार और गुंजायमान हो उठे. यही वह समय था जब मैंने कुछ यूरोपीय नाटकों का एडप्टेशन भी किया. गांधी के आखिरी दिनों पर मेरा नाटक सेकुलर आर्टिस्ट फोरम के अनुरोध पर लिखा गया था, जिसकी स्थापना में मेरा भी सहयोग रहा था. इसमें कई लेखक व कलाकार शामिल थे. उस समय तक मैं भारत भवन भोपाल, साहित्य अकादमी और आइसीसीआर के कविता कार्यक्रमों का निमंत्रित अतिथि हो चुका था. यहां होनेवाले कविता वाचनों और वर्कशापों ने मुझे विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों, खासकर कवियों के साथ ही कई विदेशी कवियों के संपर्क में आने का मौका दिया. 

सत्तर के दशक के आंदोलन का अंत दुखद तरीके से हुआ. कई युवा शहीद हुए. इनमें से कई पुलिस  द्वारा मारे गये थे, कइयों ने मोहभंग होने के कारण आत्महत्या कर ली. मैं इस परिणति से बच पाया तो सिर्फ इस  वजह से कि मैंने राजनीतिक मोर्चों और इनकी कट्टर विचारधाराओं से एक महीन दूरी बना कर रखी थी और पीछे लौटने, अलग-थलग पड़ने और टूटन की इस घड़ी को ईमानदारी के साथ अपनी कविता में अभिव्यक्त कर पाया.  इस अंतराल का इस्तेमाल मैंने अंतरावलोकन और सैद्धांतिक सवालों का जवाब खोजने के लिए किया. इसी सिलसिले में मैंने ‘‘उत्तरम’’  नामक पत्रिका की शुरुआत की. यह वह समय था जब कई बेहद नये सामाजिक आंदोलन उभर कर सामने आ रहे थे.  ये आंदोलन मानवाधिकार, उपभोक्ता आधिकार, पर्यावरण और आदिवासियों के सवाल, दलित और स्त्री मुक्ति के सवालों से जुड़े इन आंदोलनों ने उम्मीद जगायी. मैं केरल में विशिष्ट मुद्दों पर उभर रहे सूक्ष्म आंदोलनों(माइक्रो स्ट्रगल्स) जिसे फूको ने "ट्रांसवर्सल  स्ट्रगल्स" कहा है) की राजनीति को महसूस कर सकता था. इनकी नैतिक चिंताएं 70 के दशक  के आंदोलन से जुड़ी हुई तो थीं, लेकिन इसका राजनीतिक नजरिया अलग था. यह नजरिया उन राजनीतिक दलों के नजरिये से अलग था जो जमीन, जंगल, पानी, हवा, ज्ञान, और संस्कृत को सभी इंसानों की साझी संपत्ति मानते हैं और मानते हैं कि इनका इस्तेमाल लाभ के लिए नहीं किया जान चाहिए. मैं आज भी इस दर्शन में यकीन करता हूँ. 

 कविता महज मिलान करने का खेल नहीं है. इसका उद्भव अकथ के महासागर से होता है. यह वह कहना चाहती है, जो कह नहीं सकती है, बेनाम को नाम देना चाहती है. बेआवाज को आवाज  देना चाहती है.  यह अक्षत धरती को तोड़ने का काम करती है. खाली पन्नों पर अक्षर उकेरती है.  कविता जो सच उजागर करती है, मुमकिन है वह तत्काल उपयोगी न हो. लेकिन धीरे-धीरे यह सामाजिक चेतना का हिस्सा बन जाता है. कविता, गद्य से अलग होती है, तो लय या छंद के कारण नहीं. यह अंतर अंतर्विरोधों को घुलाने की इसकी ताकत में, चीजों का साकार चित्र खींचने, शब्दों और स्मृतियों को जोड़ने की तरीके में छिपा होता है. लय और तुक जरूर एक वातावरण के निर्माण में मदद करते हैं. शब्द-भंडार के परे जो दुनिया है, उसी दुनिया में इसका आकर्षण निहित है. यह स्मृतियों से निर्वासित कर दिये गये शब्दों और अनुभवों को फिर से हासिल करती है. यह हमारी मानवता का अक्षय स्मरणपत्र है. उस कभी न समझे जा सकनेवाले रहस्य का भी, जो हर तर्क को बौना बना देती है और पूर्व निर्धारित परियोजनाओं को औंधे मुंह गिरा देती है. हर सक्षम कवि ने निश्चित रूप से आविर्भाव के उन क्षणों का रोमांच और भय महसूस किया होगा. कम से कम प्रेरणा के सर्वोत्तम क्षणों में. मैंने भी न सिर्फ कुछ ऐसी कविताएं लिखते वक्त, जो मेरे पास इलहाम की तरह आयी थीं, बल्कि महान संगीत को सुनते हुए, महान साहित्यिक रचनाओं को पढ़ते हुए इसका अनुभव किया है. जैसा कि पोलिश कवि तौदेज रौसेविक्ज़ ने कहा था, कवी को अपने शब्द निश्चित के धरातल पर नहीं अनिश्चितता के अतल में रखना चाहिए...आज कला और जीवन के बीच आपसदारी किसी भी कला  के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. ताकि यह हमें पश्चिम के ऐन्थ्रोपोसेंट्रिक(मानव केन्द्रित ) विचारों से मुक्त कर सके. जो प्रकृति के बारे में युद्ध और बलात्कार की भाषा बोलता है जो पृथ्वी और इंसान को नाश की और ले जा रहा है.  
                                               
जारी 

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