30 July 2013

चिनुआ अचेबे : पश्चिमी सभ्यता की श्रेष्ठता के मिथक को ध्वस्त करनेवाला लेखक

अफ्रीकी साहित्य खासकरआधुनिक अफ्रीकी उपन्यास के पितामह कहे जानेवाले चिनुआ अचेबे  के निधन के बाद पर यह लेख संशोधनों के साथ फॉरवर्ड प्रेस में छपा था. असंशोधित लेख यह रहा...

 
पिछले छह दशकों में जिन लोगों ने पश्चिमी  सभ्यता की श्रेष्ठता के गढे गये मिथक को ध्वस्त करने में योगदान दिया उनमें अचेबे का नाम प्रमुख है. अचेबे ने न सिर्फ अफ्रीकी लेखन को विश्व मानचित्र पर जगह दिलायी, बल्कि इस दुष्प्रचार को भी मुंहतोड़ जवाब दिया कि 'अफ्रीकी नस्लीय रूप से हीन हैं.' नेल्सन मंडेला ने अचेबे को अफ्रीका को बाकी दुनिया तक ले कर जाने वाला और ऐसा लेखक कहा है, जिसके साथ रहते हुए "जेल की दीवारें टूट गयी थीं.’’ इससे थोड़ा और आगे जाकर यह कहा जा सकता है कि अचेबे उन लेखकों में शामिल रहे, जिन्होंन यह बताया कि तीसरी दुनिया के लोग, खासकर इन देशों के जनजातीय समाज किस तरह साझे इतिहास से बंधे हुए हैं.

थिंग्स फाल अपार्ट/ द सेंटर कांट होल्ड (चीजें बिखर जाती हैं, केंद्र ही स्थिर नहीं रह पाता). चिुनुआ अचेबे ने अपने पहले और बहुचर्चित  उपन्यास थिंग्स फॉल अपार्ट का शीर्षक आइरिश कवि वाइबी येट्स की कविता सेकंड कमिंग की इन पंक्तियों से लिया. अपने इस उपन्यास में, जिसकी अब तक करीब सवा करोड़ कॉपी बिक  चुकी है और 50 से अधिक भाषाओं में जिसका अनुवाद हो चुका है, चिनुआ अचेबे ने अफ्रीकी समाज की धुरी के ही चरमरा जाने की ऐतिहासिक त्रासदी को बयां किया. द गार्डियन ने इस उपन्यास की समीक्षा करते हुए लिखा था,‘‘इस उपन्यास ने अफ्रीका बारे में पश्चिम के नजरिये को सिर  के बल खड़ा कर दिया"- वह नजरिया जो अब तक सिर्फ गोरे उपनिवेशवादियों के दृष्टिकोण पर आधारित था.

यह उपनिवेशवादी नजरिया क्या है? यह कि अफ्रीका का उपनिवेशीकरण ‘‘हीन’’ और ‘‘आदिम’’ की संज्ञा से नवाजे गये लोगों को सभ्य बनाने के लिए किया गया था. यह वह वैचारिक आधार था, जिसका सहारा लेकर अपनी तमाम हिंसा और बर्बरता के रक्त रंजित इतिहास के बावजूद यूरोप ने अफ्रीका, एशिया, अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया के उपनिवेशीकरण को वैधानिकता प्रदान करने की कोशिश की है.. ‘‘थिंग्स फॉल अपार्ट’’ सिर्फ नाइजीरिया, या अफ्रीका का नहीं, दुनिया के उन तमाम मुल्कों का उपन्यास बन जाता है, जिन्हें अपने तथाकथित सभ्यता मिशन में यूरोपीय शक्तियों द्वारा अपना गुलाम बनाया गया था. यह उपन्यास उस पश्चिमी प्रचार को  बेहद रचनात्मक तरीके से ध्वस्त करता है, जिसके मुताबिक गोरों के आगमन से पहले अफ्रीकी कबीलाई समाज न्याय और शासन की किसी भी अवधारणा से अपरिचित था.  थिंग्स फॉल अपार्ट में चिनुआ अचेबे दुनिया के पाठकों को गोरों के आगमन से ठीक पहले के अफ्रीकी कबीलाई समाज में जाते हैं और यह दिखाते हैं कि भले उपर से देखने पर यह समाज ‘‘आधुनिकता’’ के सांचे से कहीं बार छिटका हुआ और आदिम नजर आता है, लेकिन अपने आंतरिक  रूप में इन समाजों में भी न्याय, शासन, शान्ति की चाहत कुछ वैसी ही थी, जिस पर आधुनिक यूरोप "गर्व" करता है. अचेबे इस तथाकथित बर्बर अफ्रीकी समाज को यहां ‘‘सभ्य" यूरोपीय समाज के बरक्स रखते हैं और यह दिखाते हैं कि किस तरह उनके आगमन के बाद परंपरागत अफ्रकी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनतिक संस्थाएं तहस-नहस कर दी गयीं. यह उपन्यास साम्राज्यवादी शोषण के वैश्विक चरित्र को सामने लाता है. यह बेवजह नहीं है कि थिंग्स फॉल अपार्ट पढ़ते हुए आपको अचानक छोटा नागपुर पठार पर लड़ते हुए सिद्धो-कान्हो और बिरसा मुंडा याद आ जाते हैं, जो अपनी आजादी, परंपरागत संस्कृति और धार्मिक विश्वास की रक्षा करने के लिए उठ खड़े हुए थे.

प्ेरिस रिव्यू को करीब डेढ़ दशक पहले दिये गये साक्षात्कार में चिनुआ अचेबे ने कहा था, "जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया और पढ़ना सीखा, मेरा सामना दूसरे लोगों और दूसरी धरती की कहानियों से हुआ. ये कहानियां मुझे बहुत अच्छी लगती थीं. इनमें कई अजीब-अतार्किक किस्म की होती थीं. थोड़ा और बड़ा होने पर रोमांच कथाओं से मेरा वास्ता पड़ा. तब मुझे नहीं पता था कि मुझे उन बर्बर-आदिम लोगों के साथ खड़ा होना है, जिनका मुठभेड़ अच्छे गोरे लोगों से हुआ था. मैंने सहज बोध से गोरे लोगों का पक्ष लिया. वे अच्छे थे! वे काफी अच्छे थे! बुद्धिमान थे! दूसरी तरफ के लोग ऐसे नहीं थे. वे मूर्ख थे. बदसूरत थे. इस तरह मुझे "अपनी कहानी के न होने" के खतरे से परिचय हुआ. एक महान कहावत है- जब तक शेर की तरफ से इतिहास लिखनेवाला नहीं होगा, जब तक शिकारी का इतिहास हमेशा शिकारी को ही महिमामंडित करेगा. यह बात बहुत बाद तक मेरी समझ में नहीं आयी. जब मुझे एहसास हुआ कि मुझे लेखक बनना है, तब मुझे यह पता था कि मुझे वह इतिहासकार बनना है जो शेर का इतिहास लिखे, शिकारी का नहीं. यह किसी अकेले का काम नहीं है. यह एक ऐसा काम है, जिसे हम सबको मिलकर साथ करना है, ताकि शिकार के इतिहास में शेर की पीड़ा, उसका कष्ट, उसकी बहादुरी भी झलके."

जाहिर है चिनुआ अचेबे को यह मालूम था कि उन्हें सिर्फ शब्दों की साधना नहीं करनी है, बल्कि शब्दों के सहारे एक खोये और अपमानित किये गये इतिहास को फिर से खड़ा करना है.  अफ्रीका पर लिखे गये उनके उपन्यासों की ट्रायोलाजी- "थिंग्स फाल अपार्ट", "नो लॉन्गर एट ईज" और "ऐरो ऑफ  गॉड" में उनकी इस कोशिश को साफ महसूस किया जा सकता है. लेकिन इस क्रम मे वे कहीं भी इतिहास को लौटा लाने की नोस्टालजिया से ग्रस्त नहीं दिखते और अफ्रीकियों की आलोचना और उन पर व्यंग्य करने से भी नहीं कतराते हैं. उनका चैथा उपन्यास ‘‘ ए मैन ऑफ द पीपुल’’ इसकी मिसाल है.

.अपने ऐतिहासिक लेख ‘‘ एन इमेज ऑफ अफ्रीका: रेसिज्म इन कोनराडस हार्ट ऑफ डार्कनेस’’(1975) में अचेबे ने कोनराड .( जोसेफ कोनराड ने अफ्रीका पर 'हार्ट ऑफ डार्कनेस' नामक उपन्यास बर्बर बनाम सभ्यता के विमर्श पर केंद्रित करके लिखा था) की इस बात के लिए तीखी आलोचना की कि इसमें अफ्रीकी महादेश को पहचान में आ सकने लायक मानवता के किसी भी चिह्न से खाली युद्धभूमि में बदल दिया और अफ्रीकियों की भूमिका परजीवी तक सीमित कर दी गयी.

चिनुआ अचेबे का पूरे लेखन में शोषित अश्वेतों का इतिहासकार होने की जद्दोजहद दिखायी देती है. खुद उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘‘लेखक सिर्फ लेखक नहीं होता. वह एक नागरिक भी होता है.’’ उनका मानना था कि गंभीर और अच्छे साहित्य का अस्तित्व हमेशा से मानवता की मदद उसकी सेवा करने के लिए रहा है. चिनुआ अचेबे के लेखन में अफ्रीकी  मानवता के  प्रति ही नहीं विश्व की तमाम शोषित मानवताओं के प्रति इस पक्षधरता को आसानी से चिह्नित किया जा सकता है.


28 July 2013

कवि का डीएनए उसके जीवन में ही निहित होता है : अरुण कमल

हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि अरुण कमल की कविताएं युगों के संधिस्थल पर खड.ी हैं. उनकी कविताएं इस संक्रमण का दस्तावेज तो हैं ही, व्यवस्था को लेकर आक्रोश, आम आदमी के प्रति पक्षधरता और जिंदगी के लिए उम्मीद का स्वर भी इनमें गहरे तक मिला हुआ है. पिछले दिनों अरुण कमल से उनके रचनाकर्मे पर लम्बी बात की युवा पत्रकार प्रीति सिंह परिहार ने. यहाँ साक्षात्कार को आत्म वक्तव्य में ढाला गया है. आप भी पढ़ें..अखरावट 


लेखन की शुरुआत कैसे हुई, यह ठीक-ठीक तो याद नहीं. शुरू में आप कुछ शब्दों को इधर-उधर से मिला कर जोड.ते हंै. तुक मिलाते हैं. फिर उसमें संगीत पैदा होता है, तब कोई बात बनती है. इस तरह धीरे-धीरे आप कविता की ओर बढ.ने लगते हैं. आप दूसरों को पढ. कर प्रेरणा लेते हैं. आसपास की जिंदगी को बारीकी से देखते हैं, तो लगता है इसे कैसे कविता में बदला जाये! यह सिलसिला चलता रहता है.

कविता में ज्यादा बातों को कम में कहा जा सकता है. यह सुविधा दूसरी विधाओं में नहीं है. यह भी है कि किस विधा में आप अपने आपको ज्यादा बेहतर ढंग से व्यक्त कर सकते हैं. स्वामीनाथन चित्रकार थे और कवि भी, लेकिन अंतत: वह चित्रकार ही हैं. रवींद्रनाथ टैगोर और निराला जैसी प्रचंड प्रतिभाओं को छोड. दें. मेरे जैसे औसत किस्म के लेखक, अधिक से अधिक एक विधा में काम कर सकते हैं.

एक कवि का डीएनए उसके जीवन में ही निहित होता है. कवि ही नहीं, यह बात हर व्यक्ति पर लागू होती है. अगर मुझे पढ.ने-लिखने की सुविधा नहीं मिलती, मेरे पिता जी को साहित्य से प्रेम नहीं होता और बचपन से मैं इतनी किताबें नहीं देखता, तो शायद ही कविता की ओर आता. मैं बहुत ही साधारण आर्थिक स्थिति का आदमी रहा हूं. अभी तक मेरे पास दुनिया में न कहीं जमीन है, न मकान. शायद यह मेरे सर्वहारा होने की स्थिति है. यह भी मुझे कई तरह की बेचैनियों की तरफ ले जाती है. दुनिया के उन सारे लोगों से मेरा संबंध जोड.ती है, जो बेघर, बेरोजगार और बेवतन हंै. जो जीवन आप वरण करते हैं या जो जीवन आपको मिलता है इस समाज द्वारा, वही अतंत: आपके सृजन के चरित्र को निर्धारित करता है. मुझे नहीं लगता कि एक भ्रष्ट, धनलोलुप, सत्तालोलुप आदमी कविता लिख सकता है. महान दार्शनिक दीदरो ने कहा था,‘कला से प्रेम के लिए धन के प्रति हिकारत की भावना का होना जरूरी है.’ मुझमें वो हिकारत तो है ही, मनुष्य और कविता के लिए प्रेम भी है.

बुद्ध ने कहा था, दुख है. दुख का कारण है. बुद्ध ने यह भी कहा था कि उसका निवारण भी है. निर्वाण ही उनके लिए निवारण है. लेकिन कुछ दुख ऐसे हैं जिनका कोई निवारण नहीं. पर बहुत से दुख ऐसे भी हैं जिन्हें घटित होने से रोका जा सकता है. बिहार में अभी जिन बाों की मौत हुई, क्या यह उनकी किस्मत थी? नहीं, जानबूझकर उन्हें यह मौत दी गयी. उत्तराखंड में जो हजारों लोग मारे गये, क्या यह कोई दैवीय आपदा थी? नहीं. यह भौतिक दुख हैं. मेरी कविताओं में इन सभी दुखों के बारे में चिंता है. यही कविता का काम है.

कविता भीतर से आपकी भावनाओं को प्रभावित करती है. कविता बताती है कि आप जीवन को इस तरह से देखें. जैसे पाब्लो नेरुदा कहते थे,‘मैं इस पृथ्वी की हर वस्तु को इस तरह देखना चाहता हूं, जैसे मनुष्य ने पहली बार देखा होगा.’ यह काम न विज्ञान, न तकनीक और न ही दर्शन कर सकता है. केवल कविता ही कर सकती.

मैं कविताएं पढ.ता हूं, तो मुझे कविता मिलती है. कविता से कविता जन्म लेती है, जैसे एक दीप से दूसरा दीप जलता है. कभी किसी कविता को पढ.ते हुए लगता है, अरे यह अनुभव तो था मेरे पास. ऐसे ही कभी कोई पंक्ति आती है मन में, तो उसे याद कर लेता हूं. कई बार कागज पर लिख लेता हूं. यह भी होता है कि कुछ पंक्तियां आपस में जुड.ती जायें और कविता बने. यह भी हुआ कि मैंने बहुत कोशिश की लेकिन कविता नहीं बनी और मैंने उसे छोड. दिया. कई वर्षों के बाद वह एक पंक्ति, एक बिंब, एक टुकड.ा कहीं पर काम आ गया. वैसे ही जैसे बढ.ई लकड.ी के एक-एक टुकडे. का उपयोग करते हैं. वो कुछ भी फेंकते नहीं. लकड.ी का बुरादा भी नहीं, जिसे जाडे. में सुलगा कर वो गरमी पाते हैं. मेरे साथ कुछ ऐसा ही है. मैं इंतजार करता हूं, कई बार उस मुहूर्त का, प्रयत्न पूर्वक भी. हालांकि जैसे- जैसे उम्र बढ.ती है, यह भी लगता है कि वह स्फूर्ति जो शुरू में थी, अब कम हो रही है.

मुझे अभी भी अपनी जो कविता सबसे अधिक प्रिय है वह मैंने 25-26 की उम्र में लिखी थी. ‘अपना क्या है इस जीवन में, सब तो लिया उधार, सारा लोहा उन लोगों का, अपनी केवल धार.’ व्यक्ति और समाज, भाषा और कवि के संबंध को लेकर जितने तरह के प्रश्न हो सकते हैं, यह कविता उन्हें अपनी तरह से व्यक्त करती है. जीवन का अर्थ क्या है? इसका भी अपनी तरह से संधान करती है.

लेखक होने के चलते मैंने बहुत सी यात्राएं कीं देश और विदेश की. लेखक होने के कारण ही मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. और जब यह पुरस्कार मिला, तो बहुत लोगों का विरोध भी मिला. हिंदी में इतना विरोध न पहले हुआ किसी का, न बाद में. भगवान न करे कि किसी और का हो भी. लेकिन जैसा कि मेरी आदत है, पुरस्कार में प्राप्त ताम्रपत्र वगैरह मैंने एक बक्से में बंद कर रख दिया. मेरे लिए और क्या महत्व था उसका! एक रोज मैं जब बक्से की सफाई कर रहा था, मैंने देखा कि उसमें लगे लकड.ी के स्तंभ को घुन खा गया. अंतत: सारे पुरस्कार और तमगों को घुन ही तो खा जाते हैं और जो बचती है, वो कीर्ति है.

मुझे लगता है जिंदगी में जीने का दो मौका मिलना चाहिए, एक अभ्यास का दूसरा वास्तविक. ऐसा हो, तो बचपन को मैं वैसे ही रखूंगा, जैसा 16 साल की उम्र तक मैंने जिया. अभाव के बावजूद बहुत भरा-पूरा बचपन. बाद का जीवन मैं बदल दूंगा. बिल्कुल निद्र्वंद्व होकर घूमूंगा. अलग-अलग समूहों के साथ रहूंगा. कोई नौकरी नहीं करूंगा. इससे बड.ा दुख दुनिया में नहीं है. अगर आप सचमुच रचना चाहते हैं, तो आपको कोई नौकरी नहीं करना चाहिए. लेकिन इसके लिए आपके पास टॉल्स्टॉय या रवींद्रनाथ टैगोर जैसी पृष्ठभूमि हो या फिर आप तुलसीदास, कबीर और निराला की तरह फक्कड. हों. इस फक्कड.पन के साथ मैं पूरी दुनिया घूमना चाहता हूं, पैदल. लेकिन इस फक्कड.पन के लिए साहस चाहिए. बडे. कवियों में ही यह साहस होता है.

स्कूल के दिनों से मुझे फिल्में देखने का बहुत शौक रहा है. अभी भी है लेकिन अब भाग कर और किताबें बेचकर फिल्में नहीं देखता. अब इतने पैसे हो गये हैं कि जब चाहूं फिल्म देख लूं. हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं की फिल्में भी देखता हूं. सत्यजीत रे की फिल्म ‘अपूर संसार’, और ‘पाथेर पंचाली’ पसंद हैं. विदेशी फिल्मों में सबसे प्रिय है अकीरा कुरासावा की ‘इकिरु’. यह मनुष्य के जीवन की अर्थवत्ता की खोज करनेवाली एक महान फिल्म है.

मुझे बचपन में सब्जियों की बागवानी का भी बहुत शौक था. लेकिन वह बचपन के बाद पूरा नहीं हुआ, क्योंकि उसके लिए जमीन चाहिए. एक शौक और है खाना बनाने का. इसमें मैं बहुत तरह के प्रयोग करता हूं. हालांकि खाना बनाना कविता से भी ज्यादा कठिन है, लेकिन इसमें प्रयोग की गुंजाइश बहुत है. क्योंकि खाना ही एक ऐसी चीज है, हर आदमी जिसके स्वाद को पहचान सकता है. साथ ही मुझे बिल्कुल सुनसान सड.क पर चलना अच्छा लगता है. अकसर मैं छुट्टियों की दोपहर, जब सड.कें अधिकतर खाली होती हैं, उनमें घूमता हूं.

मेरी बहुत इच्छा है एक उपन्यास लिखने की. मेरा मानना है कि अभी तक हिंदी में एक भी उपन्यास ऐसा नहीं, जो दुनिया के महान उपन्यासों की टक्कर का हो. मैं यह तो नहीं कहता कि इस कमी को पूरा करूंगा, क्योंकि यह तो असंभव है मेरे लिए. लेकिन यह इच्छा मेरी जरूर है कि मैं एक उपन्यास लिखूं. देखिये कब होता है.

२८ जुलाई, २०१३ के प्रभात खबर में प्रकाशित 

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