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24 February 2014

मजाज : इंकलाब का मुतरिब

तरक्कीपसंद -रूमानी शायर मजाज  लखनवी पर डाक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी का यह लेख मजाज के लेखन की दुनिया में दाखिल होने , उसके महत्व को समझने की कुंजी देता है. आप भी पढ़ें।  अखरावट 




मैं बलरामपुर जिला गोंडा में डीएवी हाईस्कूल में पढ़ता था। पांचवें दशक की बात है। बलरामपुर लखनऊ से बहुत नजदीक है। वहां साहित्य का वातावरण उर्वर था। खास बात यह थी कि हिन्दी और उर्दू के साहित्यकारों में आत्मीयता थी। अधिकांश रचनाकार दोनों भाषाओं में लिखते-पढ़ते थे। विद्यार्थी आपस में बातें करते तो पंत, महादेवी, प्रसाद, निराला, बच्चन, जोश, जिगर, फैज, मखदूम के शेर भी सुनाते और सुनते। मजाज का नाम आते ही गंभीर हो जाते और एक खास तरह की आत्मीयता उनके व्यक्तित्व और रचनाओं से महसूस करते। अब मैं आपको एक ऐसी घटना सुनाने जा रहा हूं कि आपको क्या, खुद मुझे भी आश्चर्य होता है। मैं उन दिनों आरएसएस का प्रतिबध्द कार्यकर्ता था। शाम को शाखा अटेंड करता था। शाखा में कट्टर हिन्दूपंथी और मुस्लिम-विरोधी छात्र आते थे। एक बार स्वयं सेवकों से एक-एक कविता या गाना सुनाने को कहा गया। सभी सुनाने वालों ने हिन्दू राष्ट्र और धर्म से संबंधित उन्मादकारी पंक्तियां सुनाईं। एक लड़के का नंबर आया, तो वह सुनाने लगा:


वो इक नर्स थी चारागर जिसको कहिए
मदावा-ए-दर्द-ए जिगर जिसको कहिए
जवानी से तिंफ्ली गले मिल रही थी
हवा चल रही थी कली खिल रही थी
मेरी हुक्मरानी है अह्ले जमीं पर
ये तहरीर था सांफ उसकी जबीं पर
उसने कविता का अंत किया:
नहीं जानती है मेरा नाम तक वो
मगर भेज देती है पैगाम तक वो
ये पैगाम आते ही रहते हैं अक्सर
कि किस रोज आओगे बीमार होकर।

मेरे पास 'आहंग' की जो प्रति है, उसमें इन कविता का रचनाकाल 1934 दिया हुआ है। आ रएसएस की शाखा में इस कविता का तन्मय पाठ लोगों को अच्छा लगा। उस समय तो यह अच्छा लगना न आश्चर्यजनक था, न अस्वाभाविक। लेकिन, आज यह आश्चर्यजनक ही नहीं, अविश्वसनीय भी लग रहा है। इस घटना से अनेक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। एक तो यह कि कलात्मक सौंदर्य भिन्नताओं को एक तरफ रखकर सबको एक तार से जोड़ देता है। काव्यशास्त्र में इसी को सहृदयता कहते हैं। सहृदय का अर्थ हृदय वाला नहीं, बल्कि समान हृदय वाला होता है। संभवत: इसी अर्थ में जयशंकर प्रसाद ने सौंदर्य को चेतना व उज्जवल वरदान कहा है। दूसरी बात यह कि आरएसएस की शाखा में आने वाले किशोर वस्तुत: मुस्लिम-द्वेषी, संकीर्ण या उन्मादी नहीं थे (नहीं होते)। संगठन की विचारधारा के बावजूद उनमें संकीर्णता से ऊपर उठने की क्षमता बनी हुई थी। (बनी रहती है अवसर पाकर)

मजाज की लोकप्रियता यूं ही नहीं थी। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन चरम उत्कर्ष पर था। बयालीस के आंदोलन के बाद नेता रिहा किए जा रहे थे और प्रगतिशील चेतना की लहर चल रही थी। निस्संदेह सांप्रदायिकता का उन्माद भी बढ़ रहा था। सन् बयालीस में राष्ट्रवादी आंदोलन का साथ न देने के कारण वामपंथी पार्टी की निंदा भी हो रही थी, लेकिन इन सबके नीचे आम जनता में जनवादी प्रवृत्तियां और विचारधारा मजबूत थीं। प्रगतिशील लेखक संघ से हिन्दी और उर्दू के ही नहीं, सभी भारतीय भाषाओं के समर्थ रचनाकार जुड़े हुए थे और पराधीनता से मुक्ति के आकांक्षी थे। प्रगतिशील चेतना का सुनिश्चित सौंदर्य-बोध था, जिसमें हर प्रकार की भिन्नता और भेदभाव के विरुध्द एकजुट होने की क्षमता थी। एक ओर यह चेतना धरा पर स्वर्ग उतार लेना चाहती थी और शोषण मुक्त ऐसे समाज की स्थापना करना चाहती थी, जिसमें मनुष्य की संभावनाएं साकार हो सकें। दूसरी तरफ, वह सभी प्रकार की विषमता और कुरूपता के प्रति बेचैनी और विद्रोह की भावना का भी प्रसार कर रही थी। इस यथार्थ और स्वप्न के बीच फंसे हुए अनेक संवेदनशील साहित्यकारों की स्थिति विचित्र थी, जिन पर विचार करने से हम मजाज की कविता और व्यक्तित्व का थोड़ा-बहुत पता पा सकते हैं।

असरारुल हक मजाज बाराबंकी के शिया मुसलमान थे। जमींदारी थी। परिवार सम्पन्न था। कई भाई-बहन थे। उन्हीं के समकालीन अवध के एक और कवि थे-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और उन्हीं के समकालीन बंगाली कवि नजरुल इस्लाम थे। तेलुगु में भी श्री श्री थे। ये कवि विद्रोही भावना और अग्निवर्षिणी वाणी के लिए अपने भाषा-साहित्य में अप्रतिम माने जाते हैं। एक बात और ध्यान देने की है, इन सभी कवियों ने उत्कृष्ट प्रेम कविताएं भी लिखी हैं। नजरुल के और निराला के गीत अभूतपूर्व है। श्री श्री के गीत फिल्मों में लिखे गए हैं और मजाज की नूरा नर्स का उल्लेख तो प्रारंभ में ही हो चुका है। इन कवियों के व्यक्तित्व में सौंदर्य की, सुख-शांति की सच्ची ललक थी। कविताओं में वह अनेक बिंब-रूपों और भाषा की लय और संगीतात्मकता में व्यंजित हुई है। इस विषय में मैं मजाज की कविता रात और रेल का उल्लेख करना चाहूंगा

तेज झोंकों में वो छमछम का
सरोदे दिलनशीं
ऑंधियों में जल बरसने की सदा आती हुई
जैसे मौजों का तरन्नुम,
जैसे जल-परियों के गीत
इक-इक लय में हजारों ामामें गाती हुई
ठोंकरे खाकर लचकती
गुनगुनाती झूमती
सरगुशी में घुंघरूओं की ताल पर गाती हुई।

नम तवील है और मैंने रात में रेल का ऐसा रूप-रस और नाद भरा चित्र किसी और कवि की कविता में, मेरा मतलब है रेल पर लिखी हुई कविता में नहीं पाया है। सौंदर्य, सुख और शांति की ललक ही इन कवियों को इतना उद्विग्न करती है कि उसकी अप्राप्ति और निराशा इन्हें असंतुलित बनाती है। इनकी दिक्कत यह है कि ये कवि समझौता कर नहीं पाते। दुनियादारी निभा नहीं पाते और विषमतायुक्त समाज में चल नहीं पाते। कबीर ने लिखा था

राम वियोगी न जिए
जिए तो बौरा होइ।'
मेरे स्वर्गीय मित्र डॉ. अजमल अजमली ने मुझे बताया कि जब वे मजाज की शोक-सभा में निराला को बुलाने दारागंज की कोठरी में पहुंचे और निराला को मजाज की मृत्यु की खबर दी, तो निराला बहुत देर तक अपनी सूनी आंखों से अजमल अजमली को देखते रहे। फिर बोले- 'तो तुमने मजाज को भी मार डाला।' सौंदर्य बोध का जो पक्ष विवादी होता है, वह कुरूपता से समझौता नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को इतिहास का पर्याय बना ले और समझौता करना न आता हो, तो उसके साथ वह होना निश्चित हो जाता है, जो नजरुल इस्लाम, निराला और मजाज के साथ हुआ। हम समझौतापरस्ती का पक्ष नहीं ले सकते, लेकिन समझौता न करने वालों के प्रति नतमस्तक जरूर होते हैं। वे असफल रहे, किन्तु उनका जीवन सार्थक रहा। फिराक गोरखपुरी मजाज नहीं थे। वे संतुलित रहना भी जानते थे, लेकिन महसूस करते थे

जो कामयाब है दुनिया में उनको क्या कहिए
है आदमी की इससे बढ़कर और क्या तौहीन।

मजाा ने विषमताग्रस्त ऐतिहासिक दौर को अपने व्यक्तित्व में उतार लिया था- व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन दोनों में। कहते हैं कि असफल प्रेम ने उन्हें मानसिक रोगी बन दिया था। लेकिन, यह केवल व्यक्तिगत असफलता नहीं थी, जिसने उन्हें इस हालत में पहुंचा दिया था। वह इतिहास का पागलपन था, जिसे इन कवियों ने झेला और निष्कवच झेला। इसलिए अपनी सुरक्षा नहीं कर सके। नजरुल इस्लाम, निराला, मजाज बहुत बड़े कवि थे, लेकिन उनकी निष्ठा की पूजा करते हुए भी हम उनके जीवन को अनुकरणीय नहीं कह सकते, क्योंकि हमारी समझ में ईमानदार आदमी का कर्तव्य है कि वह जीवित रहे और संघर्ष करें और हो सके, तो सफल हो। ईमानदार की सफलता इतिहास का कर्ज है, जिसे उतारने की कोशिश करनी चाहिए।
बहरहाल, हम अपने छात्र-जीवन में मजाज की 'आवारा' नम पढ़ते थे। पुलकित होते थे। झूमते थे। माथ पीटते थे और प्रेरणा भी लेते थे। इस कविता में मानवीय भावना उन्माद की उस अवस्था में पहुंच गई है, जहां वह बहुत देर तक संभली रह नहीं सकती और उन्मादग्रस्त को तोड़ के दम लेना चाहती है। आप आवारा नज्म के इन बिंबों पर ध्यान दें

झिलमिलाते कुमकुमों की राह में जंजीर-सी
रात के हाथों में दिन की मोहिनी तस्वीर-सी
मेरे सीने पर मगर दहकी हुई शमशीर-सी
इक महल की आड़ से निकला
वो पीला माहताब
जैसा मुल्ला का अमामा,
जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी,
जैसे बेवा का शबाब।

याद रखिए कि ये बिंब उस नौजवान की मानसिकता में उभर रहे हैं, जो शहर की रात में नाशाद और नाकारा फिर रहा है। दर-बर-दर मारा फिर रहा है, क्योंकि यह बस्ती गैर की है। यह गैरियत सिर्फ एलियनेशल नहीं है। एलियनेशन में सत्ता से अलगाव होता है, लेकिन एलियनेट करने वाली यह सत्ता मजाज जैसे वामपंथी और एक्टिविस्ट शायर के लिए शोषक, साम्राज्यवादी और देश को गुलाम बनाने वाली भी है। इस सत्ता में हमारे देशी दलाल, सांप्रदायिक रजवाड़े, जमींदार और सामाजिक विषमता को बरकरार रखने और बढ़ाने वाली रूढ़ियाँ और परंपराएँ भी हैं। कवि का सौंदर्य-बोध और सौंदर्य से आकृष्ट होने की भावना अपार है। विडंबना यह है कि शोषक सत्ता ने सुंदरता पर भी कब्जा कर रखा है। कवि के क्षुब्ध मानस को समझने वाला और उसे सहलाने वाला कोई नहीं है

ये रूपहली छांव ये आकाश पर तारों पर जाल
जैसे सूंफी का तसव्वुर जैसे
आशिंक का खयाल
आह लेकिन कौन जाने
कौन समझे जी का हाल।

इस कविता में बिंबों की खास बात यह है कि वे चमकदार और आकर्षक हैं, मोहक हैं; लेकिन सब या तो टूट रहे हैं या बिखरे हैं। आकाश पर तारों का जाल है। सितारा टूट रहा है। फुलझड़ी छूट रही है। कोई चीज ठहरी हुई या किसी सिस्टम में नहीं है। वहशत और आवारगी सिर्फ कवि की मानसिकता में ही नहीं है, वह समूचे परिदृश्य में है। लेकिन, इस रात के हाथों में दिन की मोहिनी तस्वीर भी है, जो भविष्य के प्रति कवि की विचाराधारात्मक आस्था का प्रतीक है। महादेवी वर्मा की पंक्ति यादआती है'रात के डर में दिवस की चाह का शर हूं।'
इस अलगाव, ंगैरियत और विरोधी, बल्कि घृणास्पद सत्ता से लड़ने के लिए कवि के पास जो साधन हैं, वे हैं दिल पर चोट-सी पड़ने वाली सीने में हूक और सीने पर रखी दहकी हुई शमशीर:

'मेरे सीने पर मगर
दहकी हुई शमशीर-सी। '
यह आवारगी गम-ए-दिल
और
 वहशत-ए-दिल
के साथ है।'

जब गम-ए-दिल और दहशत-ए-दिल, तो कोई स्वप्न भी होगा दिल में, कुछ आरजूएं भी होंगी। नौजवान और क्रांतिकारी कवि मजाज के मन में प्रेमिका और समाजवाद या शोषणमुक्त समाज का स्वप्न एक-दूसरे में घुल-मिल गए हैं। जो उनके प्रेम-मिलन में बाधक है, वहीं शोषणमुक्त समाज का भी विरोधी है, और फिलहाल यह संभव नहीं है, इसलिए यह नहीं मुमकिन तो फिर ये दोस्त वीराने में चल।'
वीराना ऐसी जगह और सच्चे अर्थ में निर्वासित स्थिति का प्रतीक है। यह निर्वासन, जैसा कि पहले कह आए हैं, शोषक सत्ता द्वारा निष्कासन का भी प्रतीक है। कवियों के यहां निर्वासन प्राय: निष्कासन के भाव को अपने में समोए रहता है। जिस 'दहकती हुई शमशीर' का उल्लेख अभी हुआ है, वह मजाा की कविता में कई संदर्भों में आती है। 'शमशीर' उनके यहां जालिम से संघर्ष का प्रतीक है। उनका एक मशहूर शेर है-

देख शमशीर है ये साज है ये जाम है ये
तू जो शमशीर उठा ले तो बड़ा काम है ये।
यह शमशीर 'आवारा' कविता में भी आती है, खंजर के रूप में। मजाज ऊपर के शेर में नवयुवकों को शमशीर उठा लेने के लिए ललकराते हैं और 'आवारा' में वे खुद यह शमशीर उठा लेते हैं
मुंफलिसी और ये माहिर हैं, नार के सामने
सैकड़ों सुल्तान जाबिर हैं नार के सामने
सैकड़ों चंगो औ' नादिर हैं नार के सामने
ले के इक चंगो के हाथों से खंजर तोड़ दूं
ताज पर उसके दमकता है जो पत्थर तोड़ दूं।
कोई तोड़े या न तोड़े मैं ही बढ़कर तोड़ दूं।

यह रवीन्द्रनाथ का 'एकला चलो' ही नहीं है, यह भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और अशफाकुल्लाह का शहीदी जज्बा है, जो जुल्म के खिलाफ लड़ने में अपनी जान की परवाह नहीं करता दूसरे का मुंह नहीं देखता। एक तरफ से यह ईसा मसीह और गांधी का भी जज्बा है। हालांकि अहिंसा का नहीं है। इस कविता में महल की आड़ से निकलने वाले पीले माहताब की उपमा, मुल्ला के अमामे और बनिये की किताब, मुंफलिस की जवानी और बेवा के शबाब से दी गई है। पीले चंद्रमा से विधवा के यौवन और निर्धन की जवानी समझ में आ जाती है। सौंदर्य अशक्त और पराधीन है। इनका कोई सादृश्य मुल्ला के अमामे और बनिये की किताब से नहीं मालूम पड़ता। लेकिन, ये सादृश्य रूपगत नहीं भावगत हैं और जरा-सा ध्यान देने पर सादृश्-सूत्र मिल जाता है। हिन्दी कविता के पाठक मुक्तिबोध के प्रसिध्द शब्द संयोग 'चांद का मुंह टेढ़ा है' से परिचित हैं। मुल्ला का अमामा और बनिये की किताब मजाज के लिए विरक्ति नहीं, घृणा के प्रतीक हैं और आगे बढ़कर युवती-विधवा और जवान की मुंफलिसी के जिम्मेदार भी हैं। युवती के वैधव्य का जिम्मेदार मुल्ला का अमामा, सामाजिक-धार्मिक रूढ़ि और नौजवान की मुंफलिसी की जिम्मेदार बनिये की किताब है। यहां युवती के वैधव्य और युवक की गरीबी के प्रति मजाा का क्रोध उनके कारणों तक सीधे पहुंचकर सादृश्य वस्तु में रूपांतरित हो जाता है। मजाज और निराला में उन्माद और मानसिक विक्षेप बाह्य आचरण में तो दिखलाई पड़ता है, लेकिन कविता करते समय शब्द, रूप, रस, गंध, विवेक और काव्य-कौशल को क्षतिग्रस्त नहीं कर पाता, बल्कि उन्हें अधिक निखारता है। उनके काव्य विवेक को और अधिक जागृत करता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना है। इसी स्थिति के लिए निराला ने लिखा था हो- 'इसी कर्म पर वज्रपात।'

मजाज ने अनेक ऐसी गजलें कहीं हैं, जिनके शेर लोगों की जुबान पर हैं और बहुत दिनों तक बने रहेंगे। वे सिध्दहस्त शिल्पी कवि हैं और उर्दू काव्य की काव्य-रूढ़ियों, परंपराओं में निष्णात हैं। मेरे खयाल से मजाज प्रधानत: नज्मों के कवि हैं। उनकी ज्यादातर मशहूर कृतियां 'नज्म' विधा में हैं। आवारा, नूरा, नर्स, नन्हीं पुजारिन, रात में रेल, नौजवान खातून से वगैरह। मजाज की नज्में और उनकी भाषा उर्दू-हिन्दी साहित्य के इतिहास में अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। यह बात छिपी नहीं है और मान भी ली जाती है कि प्रगतिशील आंदोलन का प्रचार और प्रसार प्रधानत: उर्दू साहित्यकारों ने प्रारंभ किया। इस विषय में हिन्दी साहित्य में प्रगतिशील विचार और भाव-बोध का विस्तार बाद में हुआ। यद्यपि, हिन्दी साहित्य पर प्रगतिशील भाव-बोध का विस्तार बाद में हुआ। यद्यपि, हिन्दी साहित्य पर प्रगतिशील भाव-बोध का वर्चस्व कई दशकों तक बना रहा और कमोबेश आज भी बना है, शायद समकालीन उर्दू साहित्य की अपेक्षा ज्यादा। प्रगतिशील आंदोलन ने उर्दू-हिन्दी साहित्य की भाव परिधि का विस्तार ही नहीं किया, अभूतपूर्व ऐतिहासिक भाव-संपदा ही नहीं प्रदान की, लोकोन्मुख और लोकवादी ही नहीं बनाया। रूप और शिल्प के क्षेत्र में भी युगांतर किया। वर्गीय दृष्टि ने कविता के रूप पक्ष को जैसे एक नया मिशन दिया-हिन्दी और उर्दू की मौलिक एकता का खुसरो, वली, कबीर, जायसी, तुलसी, प्रेमचंद, निराला, जोश, जिगर, फिराक, फैज, मखदूम एक ही भाषा के रचनाकार हैं। उन्हें एक जातीयता में एकजुट करने की कुछ दिन के लिए ही सही कामयाब कोशिश की गई। हिन्दी-उर्दू साहित्य का इस दृष्टि से यह स्वर्णिम काल है। साहित्य का ऐसा युग कविता में शायद ही पहले कभी आया हो। इसके कई प्रमाण है, लेकिन उनकी यहां जरूरत नहीं है। कहना सिर्फ यह है कि मजाज प्रगतिशील आंदोलन के इसी उत्कर्ष काल के प्रसिध्द और समर्पित कवि हैं। आप आहंग मजाज का काव्य संकलन के समर्पण पर ध्यान दें:
फौ और जज्बी के नाम
जो मेरे दिल और जिगर हैं
सरदार और मंखदूम के नाम
जो मेरे दस्त औ' बाजू हैं।
यह समर्पण इस भावना का घोतक है कि काव्य-रचना एक सामूहिक प्रक्रिया है। यानी वह एक आंदोलन का रूप है।

अनेक प्रगतिशील हिन्दी-उर्दू कवियों की तरह मजाज की नज्मों में तत्सम हिन्दी की ध्वनियां, ष, क्ष, त्र, ज्ञ और उर्दू कविता में प्रयुक्त तत्सम अरबी-फारसी ध्वनियां, क, ख, ग, ज, फ, बहुत कम आती हैं। इसे आप मिली-जुली भाषा का रूप ही न समझें, यह एक वर्गीय दृष्टि से निर्मित है। तत्सम ध्वनियों का प्रयोग, भाषा की तथाकथित शुध्दता का रूप सम्पन्न, सवर्ण लोगों के बीच ही व्यवहृत होता है। गरीब, मजदूर, खेतिहर, किसान लोगों के बीच उन ध्वनियों का इस्तेमाल नहीं होता। जब जनांदोलन सक्रिय था, शक्तिशाली था, तब उनका संस्कृति मंच भी आंदोलन के एक अभेद्य अंग के रूप में अपना काम कर रहा था। मजाज चौथे और पांचवें दशक में भारत की राजनीति और संस्कृति में जनांदोलन के उभार के प्रतिनिधि कवि हैं। मजाज अपने तीव्र भाव बोध के कारण विषमता के प्रति उद्विग्नता और उन्माद, एक हद तक बिखर जाने वाली मानसिकता के वैसे ही कवि हैं, जैसे निराला और नजरुल इस्लाम। निराला और नजरुल इस्लाम की तरह वे उन्माद और बिखरन के साथ अपने तीव्र भाव बोध को काव्य शिल्प में बांध लेने वाले सिध्द कवि हैं। फैज ने 'आहंग' की भूमिका में लिखा है कि 'मजाज की ख्वा-ए-सहर' और नौजवान खातून से खिताब इस दौर की सबसे मुकम्मिल और सबसे कामयाब तरक्कीपसंद नज्मों में से हैं। मजाज इन्कलाब का ढंढोरची नहीं, इंकलाब का मुतरिब हैं।'
फैज का सम्मान करते हुए जोड़ा जा सकता है कि इन्कलाब का ढंढोरची होना कोई कम महत्वपूर्ण बात नहीं है। सौंदर्य के प्रति सचेत करने के लिए नारा भी लगाना पड़ता है।

3 February 2014

अन्दर से लिखने की हूक उठती है...: मनोज रूपड़ा


मनोज रूपड़ा युवा कथाकारों की पीढ़ी में अलग से चमकता हुआ नाम हैं. उनकी कहानियाँ अपने नीरव जादुई एहसास के कारण खुद ही पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं. आप भी पढ़िए मनोज रूपड़ा से प्रीति सिंह परिहार की बातचीत। अखरावट 



आपकी कहानियां पढ़ने के लिए पाठकों को लंबा इंतजार करना पड़ता है. यह अंतराल क्यों? 
हां यह सच है, मेरी एक कहानी और दूसरी कहानी के बीच काफी लंबे अंतराल रहे हैं. इसे आप खूबी समझिये खामी लेकिन मैं अकेला ऐसा लेखक नहीं हूं , जो अपनी बात कहने या कहानी को गढ़ने में ज्यादा वक्त लेता है. आप गौर से देखेंगे तो मेरी पीढ़ी के कुछ और कथाकारों के यहां भी दो कहानियों के बीच लंबे अंतराल रहे हैं. योगेंद्र आहुजा, देवेंद्र , आनंद हर्षुल , अखिलेश ये ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने कभी तात्कालिक दबाव में या किसी संपादक की मांग के आधार पर कहानियां नहीं लिखी. क्योंकि हममे से किसी को भी भीड़ के केंद्र में खड़े रहने का लालच नहीं था. और सबसे अहम बात तो ये है कि हमने सिर्फ कहानियां नहीं लिखीं, बल्कि उसे लिखते हुए अपने स्वाभवगत अंशों को भी जिया है. एक अर्थ में यह भी कहा जा सकता है कि हमारी मूल प्रवृत्ति किसी स्क्यूबा ड्राइवर जैसी है, जो पानी में गहरे उतरता है. मुझे बहुत खुशी होती है यह देखकर कि मेरे इन समकालीन कथामित्रों ने भले ही कम कहानियां लिखी हैं, लेकिन अपनी अभिव्यक्ति में अनुभूति की सघनता को कभी नष्ट नहीं होने दिया है. लेकिन तसवीर का दूसरा पहलू ये भी है कि मैं कुछ हद तक काहिल भी हूं. मैंने तकनीक द्वारा मुहैया कराए गये साधनों और प्रवृत्तियों से खुद को अपडेट नहंी किया. तेजी से बदलती दुनिया मुझे अभिव्यक्ति का विराट अवसर दे रही है लेकिन मैं अभी तक अपने ही सुर और रंग में रमा हुआ हूं. मैं नहीं जानता के मेरे जैसे अपनी ही फिजा में रहने वाले लेखकों का क्या हश्र होगा. 

आपके पास कहानी कैसे आती है? कोई घटना या अनुभव कौन सी चीज आपको कहानी लिखने के लिए बाध्य करती है? 
घटनाओं और अनुभवों का जो समुच्चय है, उसमें लेखक की अनुभूतियों की आवा-जाही कई तरह से और बहुत स्तरों पर चलती रहती है. विषयों की भी किसी जमाने में कभी कोई कमी नहीं रही. इस दुनिया के ग्लोबल होने से पहले भी हमारे पास विविध विषय थे और आज भी हम कई कई चीजों से गुजर रहे हैं. किसी विषय के बड़े होने से कहानी नहीं बनती. मुख्य चीज है उस पहले बिंदु का मिलना, जिसमें कथा के सूत्र को पिरोया जा सके. लेकिन यह पहला ‘बिंदु’ कोई अमूर्त अवधारण नहीं है. वह बिंदु भी हमें हमारी इसी जीती जागी दुनिया से हासिल होता है. ‘साज नासाज’ का बूढ़ा सेक्सोफोनिस्ट दरअसल एक अमेरिकन हिप्पी था, जिससे गोवा के समुद्र तट पर मेरी मुलाकात हुई थी. उसने एक रॉक बीच पर अपने लिए अस्थायी कुटिया किराये पर ले रखी थी. मैंने पहली बार जब उसे सेक्सोफोन बजाते देखा और सुना तो दंग रह गया. उसने मुझे बिलकुल मंत्रमुग्ध कर दिया था. अपनी धुन पूरी करने के बाद जब उसने मेरी तरफ देखा और वह धीरे से मुस्कराया, तो मुझे लगा कि मेरे और उसके बीच कोई ट्यूनिंग हो गयी है. बस वही ट्यूनिंग ‘साज-नासज’ की बुनियाद थी. वही वह पहला बिंदु था, जिसमें मैंने ‘साज-नासाज’ जैसी लंबी कहानी के सूत्र को पिरोया था. बाद में हालांकि देशकाल और परिस्थिति के हिसाब से कहानी की बुनावट की गयी थी.  

लेखन की शुरुआत कैसे हुई? क्या इसके पीछे कोई प्रेरणा थी?
मैं कोई जन्मजात प्रतिभाशाली लेखक नहीं हूं. मेरे अंदर के कथाकार को गढ़ने में मेरे कई उस्तादों का हाथ है. मैंने कहानियां पढ़-पढ़ कर कहानियां लिखने का हुनर हासिल किया है. दुनिया के सभी लेखक मुझे लिखने के लिए प्रेरित करते हैं और मैं सिर्फ लेखन से ही नहीं, पेंटिग, संगीत, सिनेमा, गजल गायन, म्यूरल्स, इंस्टालेशन आर्ट, पत्थर की मूर्तियों, नाटकों और नृत्य से भी अपने लेखक के लिए सत हासिल करता हूं. ये सभी कला विधाएं मेरी प्रेरणा का स्रोत हैं.

आपके लेखन का रूटीन क्या होता है?
व्यवसाय हो या किसी भी तरह की नौकरी, वह कभी लेखन में बाधा नहीं बन सकती. जब आपके अंदर लिखने की हूक उठती है तो समय खुद-ब-खुद आपके कदमों में बिछ जाता है. दूसरी बात ये है कि हर लेखक का अपना अलग मूड होता है और हर किसी की कुछ न कुछ अच्छी बुरी आदतें भी. मुझमें हजार बुरी आदतों के साथ एक अच्छी आदत शुरू से ये रही है कि मैं सुबह साढ़े चार बजे तक उठा जाता हूं. फिर एक घंटे की जीमिंग या जॉगिंग के बाद छह साढ़े छह बे तक अपनी फैक्ट्री के आॅफिस में पहुंच जाता हूं और काम शुरू होने से पहले दस बज तक मेरा पढ़ना-लिखना जारी रहता है. यह लगभग मेरा रोज का रूटीन है. आमतौर पर कर्मचारियों के आते ही मैं पढ़ना-लिखना स्थगित कर देता हूं. पर कभी कभी कोई कहानी अगर फ्लो में चल रही होती है तो लेखन और प्रबंधन दोनों साथ-साथ चलता रहता है. लेकिन हर बार यह आसान नहीं होता, कभी कभी मेरे अंदर के लेखक और बिजनेसमैन के बीच जबरदस्त फाइट भी होती है. लेखक अपने रचनात्मक क्षणों का और बिजनेसमैन अपने तात्कालिक मुनाफे का नुकसान सहन नहीं कर सकता. लिहाजा कभी-कभी प्रोडक्शन लाइन और दिनभर का बना बनाया शैड्यल बिगड़ जाता है और कभी कहानी के कुछ महत्वपूर्ण वाक्य या पैराग्राफ या कभी-कभी तो पूरी ‘स्टोरी लाइन’ भी गड़बड़ा जाती है. बहरहाल थोड़ बहुत नफे नुकसान के साथ कमोबेश दोनों सिलसिले बरकरार हैं.  

सूरज प्रकाश जी के संस्मरण से पता चला कि आपको अंगरेजी नहीं आती लेकिन आप दुनिया भर की भाषाओं की फिल्में देखते हैं? 
ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि 125 करोड़ की आबादीवाले इस देश में अंगरेजी जाननेवाले सिर्फ 5 करोड़ लोगों को ही शिक्षित माना जाता है. क्या अंगरेजी के बिना शिक्षा का कोई महत्व नहीं? और दूसरी बात ये है कि शिक्षा क्या सिर्फ स्कूल और कॉलेज में ही मिलती है? स्कूल और कॉलेज से बाहर रहकर कोई शिक्षित नहीं हो सकता? मुझे लगता है कि स्कूल की चहारदीवारी के सीमित पाठ्यक्रम के अलावा भी शिक्षण और प्रशिक्षण की एक बड़ी दुनिया है. मसलन ‘साज-नासाज’ में ब्लू एंड डार्क क्लाउड नामक जो धुन है, उस धुन का कैसेट रिकॉर्ड मुझे उसी अमेरिकन हिप्पी ने तोहफे में दिसा था और तब मैं पाश्चात्य संगीत के पहले पाठ से परिचित हुआ था. बाद में मैंने वह कैसेट अपने एक नेत्रहीन मित्र और उसकी नेत्रहीन मंगेतर को तोहफे में दिया था. किसी नेत्रहीन श्रवणेंद्रियों के लिए कोई अच्छी धुन जो मायने रखती है, उसका संबंध किसी ‘भाषा’ से नहीं है. चीजों के साथ आपकी आसक्ति जितनी गहरी होगी, भाषा उतनी ही गौण हो जायेगी. आप जो भाषा को जाने बगैर चीजों को बारीकी से चीजों को बारीकी से जानने समझने की बात कह रही हैं, उसे इसी संदर्भ में देखा जा सकता है. मैं जानता हूं कि मेरे वे अंधे मित्र कभी नीले समुद्र और काले बादलों को नहीं देख पायेंगे. लेकिन वह धुन उन्हें हमेशा इस बात का एहसास कराती रहेगी कि दृष्टिहीन होने के बावजूद वे समुद्र और बादलों को देख सकते हैं. फिल्मों को भी मैं सिर्फ कहानी या संवादों के माध्यम से नहीं, बल्कि शॉट के कंपोजिशन के माध्यम से समझता हूं. मेरे लिए सिर्फ यह जानना जरूरी नहीं है कि फिल्म में कौन सी महत्वपूर्ण बात कही गयी है, मैं यह जानना चाहता हूं कि वह बात किस ढंग से कही गयी है. उस बात को शॉट के फ्रेम में लाने के लिए निर्देशक ने किन युक्तियों और साधनों का इस्तेमाल किया है.  

आपने विश्व भर की फिल्में देखी हैं. सतीश बहादुर और प्रकाश झा से फिल्म की बारीकियों के बारे में जाना है. कभी फिल्म की पटकथा लिखने या फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में जाने का ख्याल नहीं आया? 
पटकथा लेखन अपने आप में एक फुलाटाइम जॉब है, और इस काम में अधिकांशत: वही सफल हुए हैं, जिन्होंने इसे एक प्रोफेशन के रूप में चुना है. यह अपने घर में बैठकर इत्मीनान से कहानी-कविता लिखने जैसा आसान काम नहीं है. एक सिक्रप्ट राइटर को फिल्म निर्माण के कई पहलुओं के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है. और अपनी थीम को कन्विंस करवाने का हुनर भी उसमें होना चाहिए. आपकी थीम कितनी पावरफुल है यह दीगर बात है. आप किसी निर्माता या निर्देशक को कैसे कन्विंस करते हैं यह ज्यादा महत्वपूर्ण है. मेरे निजी व्यवसाय ने मुझे कभी यह मोहलत नहीं दी कि मैं किसी दूसरे प्रोफेशन की तरफ ध्यान दे सकूं और मेरे अंदर किसी को ‘कन्विंस’ करने की क्षमता भी नहीं है. जहां तक निर्देशन का सवाल है, तो मैं यह मानता हूं कि मैं भी एक फिल्म निर्देशक हूं. एक ऐसा निर्देशक, जो सेल्यूलाइड पर नहीं कोरे कागज पर अपनी फिल्म बनाता है. मेरी हर कहानी में अगर आप गौर करें, तो कहीं न कहीं एक सिनेमेटिक सीक्वेंस दिख जायेगा. इसके अलावा मैंने अपना पहला उपन्यास ‘प्रति संसार’ भी सिनेमेटिक एंगल से लिखा था. उस उपन्यास का नैरेटिव एक कैमरा था और पूरी बिंब योजना और यहां तक कि वर्णित किये गये ब्यौरे भी चाक्षुस थे. 

लिखते वक्त कौन हावी होता है? आपके भीतर का लेखक या पाठक? 
पाठक तो मेरे हमसफर हैं. मैं उनकी बाहों में बाहें डालकर आगे बढ़ता हूं. ‘प्रति संसार’ लिखते समय मुझै लग रहा था कि यह उपन्यास अपनी ऊबड़-खाबड़ प्रकृति के कारण ठीक से संप्रेषित नहीं हो पायेगा. मुझे डर था कि मेरे निजी आग्रहों और शैलीगत विविधता के कारण उपन्यास के फार्म और पाठकों के पाठकीय अवबोध के बीच कहीं कोई दरार न पड़ जाये. लेकिन ऐसा नहंी हुआ. इतने चक्करदार रास्तों से आगे बढ़ने और कई बार चकमा देने के बावजूद मेरे पाठकों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा. एक लेखक के लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है कि उसके द्वारा इस्तेमाल की गयी युक्तियां पाठकों की रुचियों में समावेशित हो गईं. उपन्यास की लय में दृष्टव्य रूप से जो जिंदगी दर्ज की गयी थी पाठक ने उसे उसी रूप में देखा.

आपने यात्राएं बहुत की हैं. यात्राओं की क्या अहमियत है जीवन और लेखन में?
यात्रा,भ्रमण और घुमक्कड़ी तीनों अलग-अलग चीजे हैं और तीनों का प्रभाव भी हमारे ऊपर अलग ढंग से पड़ता है. आज हम बनी- बनायी सड़कों पर या परिवहन के अनेक सुविधाजनक, आरामदेह और वातानुकूलित साधानों के जरिये जो सफर करते हैं, वह यात्रा नहीं है. यात्रा तो उन लोगों ने की थी, जिन्होंने पहले पहल यह सोचा था कि समुद्र के उस पार क्या है? पर्वत माला के पीछे क्या है? अनजान बीहड़ों, रेगिस्तानों और दुर्गम जंगलों के पार क्या है? और सिर्फ सोचा ही नहीं, उन्होंने उसे पार करने के लिए यात्राएं भी कीं. उन्होंने अज्ञात खतरों को चुनौती दी और वहां जा पहुंचे जहां पहले मनुष्य नहीं था. उन्होंने उन निर्जन इलाकेों में नयी दुनिया बनाई. 
बरसों पहले बसाई गयी उस दुनिया  के स्थापत्य या पुरातात्विक अवशेषों और भग्न मूर्तियों के बीच से या उनके द्वारा बनाये गये किसी रेगिस्तनी पहाड़ी या समुद्री रास्ते या किसी नदी के किनारे की सभ्यता या उन घनघोर आबादीवाले प्राचीन नगरों की इमरतों या गोथिक गलियारों या बदनाम गलियों से जब मैं गुजरता हूं तो सिर्फ स्थानीय विशेषताओं के ब्यौरे दर्ज नहीं करता, बल्कि वहां के सारे इंप्रेशंस खुद -ब-खुद मेरे अंदर दर्ज हो जाते हैं. जो लोग नोटबुक साथ लेकर आॅब्जर्वर की हैसियत से यात्रा पर जाते हैं और अपने पायचे ऊपर उठाकर चलते हैं, उन्हें सिर्फ सूखे-सपाट ब्योरे हाथ लगते हैं. वे संस्कृति के उस प्रवाह से अधूरे रह जाते हैं, जो जीवन और लेखन दोनों के लिए जरूरी है. 


आप अपनी सबसे प्रिय कहानी के तौर पर किसका ज्रिक करना चाहेंगे? 
जब मैं मुंबई में था तब फिल्म अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने अपने घर में एक गोष्ठी आयोजित की थी. विषय था ‘मेरी प्रिय कहानियां’. कहानी पाठ के लिए 66 कथाकारों का चयन हुआ था. बाकी सभी कथाकारों ने खुद अपनी लिखी हुई कहानियों में से अपनी प्रिय कहानी का चयन किया था. अंत में जब मेरी बारी आई तो मैंने कहा कि दुनिया में जब इतने बड़े-बड़े उस्तादों की कहानियां मौजूद हैं तो मेरी खुद की लिखी हुई कहानी मेरी प्रिय कहानी कैसे हो सकती है? लिहाजा मैंने अपनी कहानी का पाठ करने के बजाय एक चीनी लेखक फ्र ची छाई की कहानी ‘नाव का गीत’ का पाठ किया. वह कहानी तब भी मेरी प्रिय कहानी थी और आज भी सबसे प्रिय कहानी है. 

ऐसी साहित्यिक कृतियां जो पढ़ने के बाद जेहन में दर्ज हो गयी हों? क्या खास था उनमें?
मेरे जेहन में इतनी सारी कृतियां दर्ज हैं कि उनकी सूचि बनाना भी मुश्किल है. फिलहाल कुछ आउट स्टैंडिग रचनाओं का जिक्र किया जा सकता है. मसलन, मंजूद एहतेशाम का उपन्यास ‘बशारत मंजिल’, नार्वेजियन लेखक क्जूत हाम्सुन का उपन्यास ‘भूख’, विक्रम सेठ का उपन्यास ‘एक सा संगी’, रहा मासूम रजा का उपन्यास ‘आधां गांव’, फणीश्वर नाथ रेणु का ‘मैला आंचल’ और ‘परति परिकथा’ और इसके अलावा हाल ही में हंगरी लेखिका मागदो साबा का उपन्यास ‘दरवाजा’ मैंने पढ़ा है. बाकी सभी कृतियों का अपने-अपने ढंग से प्रभाव मेरे ऊपर रहा है लेकिन मागदो साबा के ‘दरवाजा’ ने मेरे अंदर के लेखक को झकझोर कर रख दिया. यह एक घोर एंटी इंटेलेक्चुअल उपन्यास है. उपन्यास में दो केंद्रीय पात्र हैं. एक बुद्धिजीवी लेखिका और दूसरे उसकी एक बेहद कर्मठ और उतनी ही अड़ियल मेड सर्वेंट. लेखिका में किताबी ज्ञान और उसकी नौकरानी के भयानक जीवनानुभवों के बीच जो ‘घमासान’ इस किताब में आया है, वो मैंने पहले कभी नहीं देखा था. अंत में नौकरानी की निर्मम कठोरता अपनी बुद्धिजीवी मालकिन के उन अंशों को कुचल डालती है, जो उसके व्यक्तित्व के क्षद्म और नकली हिस्से थे लेकिन इस उपन्यास का सबसे ज्यादा भरपूर और शक्तिशाली तत्व ये नहीं है कि वह अपनी मालकिन के अंदर की बुद्धिजीवी को मार डालती है. असली तथ्य तो ये है कि वह अपनी मालकिन से प्यार भी उतनी ही करती है, जितना कोई मां अपनी बेटी से करती है और अपनी इस प्यारी बेटी पर आनेवाले किसी भी संकट से वह वैसे ही निपटती है जैसे कोई मादा अपने छौने को बचाने के लिए जान लगा देती है. अद्भुत... बेमिसाल...मैंने फिक्शन निगारी के समूचे इतिहास में ऐसा फिक्शन नहीं पढ़ा था. 


इन दिनों क्या लिख रहे हैं? 
बहुत सिलसिलेवार ढंग से तो नहीं, लेकिन गाहे-बगाहे मैंने कथेतर गद्य भी लिखा है. अर्सा पहले मैंने एक लंबा लेख लिखा था ‘वास्तविक दुनिया और कलाकारों का प्रतिसंसार’ . इस लेख में मैंने एल्कहोलिज्म और ‘डेथविश’ को केंद्र में रखा था. और यह बताने की कोशिश की थी कि कैसे एक लेखक या कलाकार इस वास्तविक दुनिया के खिलाफ अपना प्रतिसंसार खड़ा करता है और इस अकेली लड़ाई में हारने के बाद कैसे शराब पीकर या सीधे आत्महत्या द्वारा अपनी आहुति देता है. एक और लेख सिनेमा में हिंसा पर केंद्रित था जिसमें मैंने पेंटागन और हॉलीवुड के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया था. फिलहाल मैं अभिनेता की निजी स्वायत्तता पर एक लेख लिख रहा हूं, जिसमें निर्देशक और अभिनेता के बीच के अंतर्द्वंदों को पकड़ने की कोशिश की जा रही है.

इस बातचीत का सम्पादित अंश हिंदी दैनिक प्रभात खबर में छपा था. यहाँ यह अविकल रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. 

29 December 2013

आत्मा से बादलों पर चलूँ...

राजस्थानी लोक-कथाओं को नया जीवन देनेवाले कथाकार विजयदान देथा (बिज्जी) ने 10 नवंबर को भले इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके शब्दों की उपस्थिति हमारे जीवन में हमेशा बनी रहेगी. नजदीकी मित्र अनिल बोर्दिया को लिखे पत्र में बिज्जी ने अपने सृजन और काफी कुछ अपने जीवन के बारे में भी लिखा था. यह खत बिज्जी के लेखकीय सरोकारों को समझने की कुंजी कहा जा सकता है. प्रस्तुत है उस पत्र का संपादित अंश.


सन 1958 के किसी शुभ दिन मैंने पुख्ता सोच-समझकर निर्णय लिया कि हिंदी की बजाय राजस्थानी में लिखे बिना मेरी कहानियां आकांक्षित ऊंचाइयों तक नहीं उड़ सकतीं, तब से 28 वर्ष तक विभिन्न फलों की ‘फुलवाड़ी’ सींचता रहा. संवारता रहा. पर तुम कई बार मुङो मीठे ढंग से समझाते रहे कि हिंदी की बजाय राजस्थानी में लिखने का निर्णय अव्यावहारिक, असंगत और आत्मघाती है.

हिंदी का दायरा राष्ट्रव्यापी है और राजस्थानी का एकदम सीमित. प्रांतीय मान्यता और शिक्षा के अभाव में प्रशिक्षित वर्ग बड़ी मुश्किल से तैयार हो पायेगा. तब तुम्हारा सोचना था कि मेरा संकल्प अनुचित है. समय-सापेक्ष नहीं है. और जब ‘रूंख’ की सघनता के बाद हिंदी में फिर से लिखना प्रारंभ किया, तो तुम्हारा पुरजोर आग्रह है कि मुङो केवल राजस्थानी में ही लिखना चाहिए. अनुवाद का काम तो कोई भी कर लेगा, पर मैं फकत अनुवाद ही तो नहीं करता, अनिल. हिंदी में फुलवाड़ी की कथाओं को पुन:सृजित करता हूं. राजस्थानी ‘बात’ का वजन, उसकी ध्वनि, उसके छिपे अर्थ जो व्यक्त के द्वारा अव्यक्त की ओर संकेत करते हैं, प्रच्छन्न मौन को मुखरित करते हैं - यह सब प्रखर हो जाता है. बहुत-कुछ बदल जाता है. कथानक वे ही हैं. पर कहानी के आयाम बदल जाते हैं. इसलिए कि मैं निरंतर बदलता रहता हूं. कहूं कि परिष्कृत और संशोधित होता रहता हूं. जीवित गाछ-बिरछों के उनमान प्रस्फुटित करता रहता हूं. सघन होता रहता हूं.

खुलासा करने के लिए और अधिक पीछे जाना पड़ेगा अनिल, जब मैं सन 1948 से 1950 तक ‘ज्वाला’ साप्ताहिक में काम करता था. ‘ब्लिट्ज’ की साइज के सोलह पृष्ठ निकलते थे. नियमित रूप से तीन स्तंभ लिखता था - ‘हम सभी मानव हैं’, ‘दोजख की सैर’ और ‘घनश्याम, परदा गिराओ.’ तीनों स्तंभों में कथा की बुनावट रहती थी. मानववाले स्तंभ में आज के मुहावरे में सांप्रदायिकता के खिलाफ ‘एक मानव’ के नाम से मेरी कलम अबाध चलती रहती थी. ‘दोजख की सैर’ में विभागीय भ्रष्टाचार पर कटाक्ष का स्वरूप रहता था. वह भी कथा के माध्यम से. ‘घनश्याम, पर्दा गिराओ’ में राजनेताओं का पाखंड उजागर होता था. ये तीनों स्तंभ तो लिखता ही था, पर पूरे के पूरे सोलह पृष्ठ अपने हाथ से फेयर करके प्रेस में देता था. कलम मंजती रही. धार लगती रही.      
तब एक शिफ्त मुझमें और भी थी अनिल, कि लिखने के पूर्व-चाहे किसी विधा में लिखूं कविता, कहानी, गद्यगीत, निबंध या आलोचना-न कुछ सोचता था, लिखना शुरू करने के बाद न रुकता था. न काट-छांट करता था और न लिखे हुए को फिर से पढ़ता था. प्रारंभ से ही पत्र-पत्रिकाएं गले पड़ती गयीं, सो ये सब नखरे वहां चलते नहीं थे. हर रोज समय पर काम निपटाना पड़ता था.

पर मैंने बेगार कभी नहीं टाली. आधे-अधूरे मन से कभी काम नहीं किया. मैं काम को बेगार समझता ही नहीं, चाहे अपना हो, चाहे दूसरों का. संपूर्ण निष्ठा से करता हूं. काया के सांचे में मन और आत्मा उड़ेल कर. तुमने भी कई बार ठोक-बजाकर मेरे इस स्वभाव को जांचा-परखा है. इसे तुम मेरी बेवकूफी समझो या मेरी नादानी कि.. परिश्रम के साथ पारिश्रमिक को मैंने कभी जोड़ कर देखने की चेष्ठा ही नहीं की. हाथ लग जाये तो कोई ऐतराज नहीं, न लगे तो कोई आग्रह नहीं. बस, चाकू की धार तेज व टिकाऊ होनी चाहिए. फिर उससे प्याज काटो, चाहे आलू, लौकी या बैंगन. आसानी से कट जाते हैं. शुरुआत में हिंदी के रियाज से जो धार लगी, वह राजस्थानी में उसी कौशल से काम आयी. दृष्टि हमेशा ऊपर की ओर रखी कि शरीर से न भी हो, पर मन और आत्मा से बादलों पर चलूं. लहराती बिजलियों को बाहुपाश में भरूं और बादलों के बीच ही नहाऊं. धोऊं. चांदनी से प्यास बुझाऊं!        
मेरी रचनाओं में गहरी रुचि रखनेवाले परमहितैषी मुङो टोकते रहते हैं कि नये सृजन की कीमत पर राजस्थानी या हिंदी में पुनर्लेखन न करूं. पर मुङो इसमें प्रजापति-सा आनंद आता है. अपने ही हाथों रची सृष्टि को नया रूप प्रदान करना! यह तो अदम्य हौसले का काम है. मानों अपनी संतान को काट-कूटकर फिर से जीवित करने जैसा. जिस तरह मेरे भीतर स्रष्टा का स्वरूप नित्य-प्रति बदलता रहता है, तदनुरूप अपनी रचनाओं का रूप बदलते रहने की खातिर मेरी उत्कट अभिलाषा बनी रहती है.

यह तो पैदा किये बच्चों को वापस कोख में डालकर उसे पुनर्जन्म देना है. मेरी कशमकश को तनिक सहानुभूति से जांचो-परखो, अनिल! (अकस्मात बिजली गुल हो गयी. तीन बजे लिखने बैठा था. अब शायद पांच बजे हैं. विद्युत-मंडल की कटौती चल रही है. आजीवन चलती रहेगी.) लगता है अब तो बैटरी से चालित दो छोटी ट्यूबलाइटोंवाला चिराग खरीदना ही होगा. वरना यह कटौती तो मेरे पढ़ने-लिखने को काटती ही रहेगी. लेकिन कर्ज भी तो उतारना है. बोहरे का नहीं, मित्रों का ही. वे कभी तकादा नहीं करते.

करेंगे भी नहीं. इसलिए तो चिंता है. तपने से सोने में निखार आता है.अतएव जीवनभर परेशानियों की भरमार रही है. चलो, आर्थिक संकट का यह परोक्ष वरदान ही सही. दिन के चौबीस घंटों की अल्पावधि को सुनोयोजित करके इसी तरह बढ़ाया जा सकता है. तभी तो चालीस-बयालीस वर्षो से साढ़े तीन या पौने चार घंटे ही सोता हूं. इससे कम सोने पर झपकियां आने लगती हैं. खैर, यह शिकवा-शिकायत तो हर जिंदगी के साथ जुड़ी रहती है. सार्वजनकि रूप से रोने-धोन की बात शोभनीय नहीं लगती. मुस्कराने की चर्चा हो तो ठीक है. लिखते-पढ़ते समय सारे कष्ट संताप बिसर जाता हूं. दांत और अधरों के अलावा भीतर के हाड़-मांस, मज्जा, लहू और अंतड़ियों से मुस्कराता रहता हूं.    
(फिर प्रकाश ओझल) भयंकर खीज व झुंझलाहट हुई. छोटी-सी मोमबत्ती जला कर लिखने बैठा. सचमुच काम चल गया. अनिल तब तो दो मोटी मोमबत्तियों से बिजली की गरज पूरी हो सकती है. विश्वास रखो ‘फुलवाड़ी’ के अगले भागों में राजस्थान के प्रेमाख्यानों की सौरभ बिखेरूंगा. प्रेम के नये-नये फूल खिलाऊंगा. इसमें मेरी कलम काफी निष्णात है. वह तितली की नाई थिरकने लगती है.

इसलिए कि प्रेम के सिलसिले में असफल जो रहा हूं. उफ्फ तिरेपन वर्षो का सुदीर्घ इकतरफा यातायात! तुम तो जानते ही हो. छोड़ूं इस रामायण को.. अन्यथा राह भटक जाऊंगा. मोमबत्ती थोड़ी ही शेष रही है! सूर्योदय में मामूली वक्त बाकी है. काश! अजरुन के सखा कृष्ण मेरे लिए दो घड़ी पहले सूरज उदय कर दें, तो जयद्रथ के वध की बजाय, शब्दों में प्राण फूंकने के निमित्त ही गाण्डीव के बदले अपनी कलम चलाता रहूंगा. तब तक मोमबत्ती से सूरज की कमी पूरी हो रही है. मेरी कहानियों की तह में छिपे हुए ये अकिंचन आख्यान ही मेरे शब्दों की संजीवनी बूटी हैं.

23 October 2013

भुवनेश्वर की नजर में प्रेमचंद

इस महीने 8 तारीख (अक्तूबर) को प्रेमचंद की पुण्यतिथि थी. उस वक्त प्रेमचंद पर कुछ नया खोज रहा था, तब भुवनेश्वर की प्रेमचंद की मृत्यु  के बाद लिखी  इस ओबिचुरि से सामना हुआ. एक जीनियस पर दूसरे जीनियस की कलम से लिखा गया यह छोटा सा पीस आप भी पढ़ें। अखरावट


8 अक्तूबर ’36 को प्रेमचंद की मौत हो गयी. .

8 अक्तूबर ’36 को प्रेमचंद बहस-मुबाहसे, स्नेह और कटु आलोचना से परे हो गये. यह हिंदी के सबसे महान साहित्यिक का मामला है कि तुच्छ और खुदगर्ज मुबाहसे से परे होने के लिए 60 साल की उम्र में उसे मरना पड़ा, जिस उम्र में साहित्यिक कलमनवीसी से उपर उठता है, महात्मा और प्रेरक समझा जाता है और गोर्की के नाम पर शहर और वायुयान बनते हैं. प्रेमचंद को हिंदी का साधारण समादर भी नहीं मिल सका. वह अपनी प्रशंसक जनता के इतना निकट रहे कि उनका व्यक्तित्व सदैव नीरस बना रहा. पत्रिकाओं में कहानियां छपवाते, सिनेमा से धन पैदा करते, पुस्तकों की बिक्री के लिए साधारण प्रयत्न करते, 8 अक्तूबर, ’36 को प्रेमचंद की मौत हो गयी.

यदि प्रेमचंद का एक तुच्छ प्रशंसक आज यह लिखता है कि 8 अक्तूबर, ’36 को हिंदी-साहित्य की एक शताब्दी पर काल की मुहर लग गयी, तो वह एक ‘अति-प्रेमी’ के लांछन से कैसे बचेगा. प्रेमचंद हिंदी की एक शताब्दी थे. भविष्य का साहित्य इस युग से प्रेमचंद लेकर बाकी इत्मीनान से छोड़ देगा.
इसके अनेक कारण हैं.

यह नहीं कि उन्होंने 50 ऐसी कहानियां पैदा कीं, जो विश्व साहित्य में अपना स्थान बना सकती हैं
उन्होंने हिंदी साहित्य में एक नये जीवन का आह्वान किया. नहीं, उन्होंने साहित्य का असल रूप हिंदी को दिया, उन्होंने मौलिकता सृजित की, उन्होंने मौलिकता को एक द्रुत सजग वेश दिया, उन्होंने जैनेंद्र को पैदा किया.

प्रेमचंद की प्रतिभा और जीनियस खुद पैदा-करदां थी. वह शेली नहीं था. टैगोर नहीं था. शुरुआत में वह लिखने का शौ कीन था, बीच में वह एक कठिन संग्राम करता हुआ कलाकार और बाद में एक करेक्टर.
वह करेक्टर कैसा था?

ऐसा नहीं, जैसा गांधी या टॉलस्टॉय, जो संसार की सहस्र-फन विषमता को एक बिंदु पर आकर मिटा देता है, जो वस्तुतः कवि हो जाता है. उसका करेक्टर उनकी अनेकता थी.
ऐसी अनेकता, ऐसी वेराइटी की मिसाल विश्व साहित्य में भी नहीं मिलती. वह मोपांसा की मोर्बिडिटी से भी ऊंचा उठ गया.

उसके जीवन में एक स्वर सुनाई देता था कि वह समय के पीछे छूट गया, उसके साथी तो विक्टोरियन कलाकार थे और मरने के बाद वह विक्टोरियन हो ही गया. पर ऐसा विक्टोरियन, जो पूर्ण सहानुभूति में विश्वास रखता था, जो हनन करना भी जानता था, जो प्रकार और आकार में भेद कर सकता था, जो अपनी कला के लिए कच्चा माल लेने बार-बार सीधा, जीवन तक जाता था, जो समझता था, जो केवल विश्लेषक नहीं था.

हाँ,  वह फ्रायड के बाद का साहित्यिक था और सदा फ्रायद से दूर रहा. सेक्स एक बड़ी शक्ति है, पर साहित्य से उसका संबंध स्थापित करना कलाकार की इच्छा पर है. अगर उसने अपनी स्वतंत्रता से हम डीएच लारेंस और मोरिस डि कॉरन पढ़नेवालों को निराश किया तो वह कसूरवार नहीं है और न हम.

माधुरी, १९३६ में प्रकाशित

22 October 2013

उस देश का यारो क्या कहना !


मनोहर श्याम जोशी का व्यंग्य पढ़िए और देखिये कि हमारा क्षयग्रस्त कल कैसे हमारे आज में जीवित है, बल्कि वह अधिक जर्जर, अधिक रुग्न ही हुआ है.  भारत में चूंकि समय नहीं बदलता, इसलिए अपने समय पर सटीक टिप्पणी  कालजयी हो जाती है. यह कुछ ऐसी ही मनोहर कालजयी टिप्पणी है, एक खिलंदड़ेपन  का अंदाज लिए हुए.   अखरावट 

 

उस देश का यारो क्‍या कहना? और क्‍यों कहना? कहने से बात बेकार बढ़ती है। इसीलिए उस देश का बड़ा वजीर तो कुछ कहता ही नहीं था। कहना पड़ जाता था तो पिष्‍टोक्तियों में ही बोलता था। पिष्‍टोक्तियों से कोई नहीं पिटता। पिष्‍टोक्तियाँ हजम भी आसानी से होती हैं। सच, कहने में कोई अर्थ नहीं है, कहना पर व्‍यर्थ नहीं, कहने पर मिलती है एक तल्‍लीनता और एक पारिश्रमिक का चेक (कई बार फोन करने और चिट्ठी भेजने पर)। तो मैं उस देश के बारे में कुछ कहने बैठा हूँ जो दुनिया का सबसे अधिक सफाई-पसंद देश है। यह सही है कि वहाँ कीचड़ से भी होली खेली जाती है, लेकिन यह भी सही है कि वहाँ के वातावरण में ही सफेदी लानेवाले कुछे ऐसे विशिष्‍ट रसायन पाए जाते हैं कि सारी होली के बाद बेचारे ढूँढ़नेवाले कीचड़ के दाग ढूँढ़ते ही रह जाते हैं। वहाँ के आमोद-प्रिय निवासी एक-दूसरे पर कीचड़ जमकर फेंकते हैं लेकिन कीचड़ किसी पर लगता या जमता नहीं है। हर कोई, हर क्षण बेदाग सफाई का, हँसता हुआ नूरानी विज्ञापन बना रह पाता है।

गैर-सफाई-पसंद देशों में मानो सारा महत्व ही कीचड़ का है। जिस पर जरा-सी कीचड़ उछलती है, उसे घबराकर पद से, और कभी-कभी तो जीवन से ही त्‍यागपत्र दे बैठने की सूझती है। मगर उस सफाई-पसंद देश में कीचड़ कमल का कुछ बिगाड़ नहीं पाता है। बल्कि पंक जितना ही ज्‍यादा उछले-गिरे, पंकज उतना ही देदीप्‍य होता जाता है। उस देश के समझदार लोग इसीलिए कीचड़ महज शौकिया उछालते हैं, एक शगल के नाते उछालते हैं। इस मामले में वे कभी सीरियस नहीं होते। सीरियसली तो वह कमल की प्रार्थना ही करते हैं।
उस सफाई-पसंद देश के निवासी अपना दिमाग बार-बार साफ करते रहते हैं। इससे उन्‍हें सिर्फ काम की ही बातें याद रहती हैं। शहर के अंदेशे उनके दिमाग पर बोझ नहीं बनते हैं। इतिहास की स्‍मृति सहज उत्‍साह की राह में बाधा नहीं डाल पाती है। उस देश के निवासी अपना दिल भी साफ करते रहने के बारे में बहुत सजग हैं। इसीलिए वे अपनी सारी भावनाएँ अपने पर और अपनों पर केंद्रित रख पाते हैं। रो लेने की विधि, चीखने-चिल्‍लाने की विधि से बेहतर समझते हैं। वे जानते हैं कि चीखने-चिल्‍लाने से तो रक्‍तचाप ही बढ़ना है। रो लेने से और कुछ नहीं तो मन की शांति तो मिलेगी। और वह मिलेगी तो फिर शांत मन से अपनी और अपनों की समस्‍याओं का विचार कर सकेंगे। चित्त शांत होने से रक्‍तचाप भी नीचे आएगा। नित्‍य नियम से रोकर दिल की सफाई करते रहनेवाले उस देश के निवासी हार्ट अटैक और स्‍ट्रोक जैसी उन बीमारियों से बचे रह पाते हैं जो चीखने-चिल्‍लानेवाले देशों में बहुत व्‍यापक रूप से फैल गई हैं।

जहाँ तक पेट साफ रखने का सवाल है, इस मामले में तो उस देश के निवासी जगदगुरु सिद्ध हुए हैं। उनके यहाँ की एक कब्‍जहर भूसी का तो आज उन्‍नत देश के निवासी तक सुबह-सुबह जय-घोष करते पाए जाते हैं।
उस सफाई-पसंद देश में छोटे-से-छोटा अनुष्‍ठान भी बाहरी और भीतरी शुचिता के बारे में पूरी तरह आश्‍वस्‍त हो जाने पर ही करने की स्‍वस्‍थ परंपरा रही है। उस देश में उस बाहरी और भीतरी शुचिता के बारे में केवल एक मंत्र पढ़कर और तीन बार आचमन करके आश्‍वस्‍त हो सकने की सुविधाप्रद परंपरा भी रही है। उस सफाई-पसंद देश के नागरिक हिसाब साफ रखने में यकीन करते हैं और जब हिसाब साफ कर दिया जाता है तब वे स्‍वयं हमेशा लेनदार साबित होते हैं, प्रतिपक्ष देनदार। उस देश के निवासी साफ बात कहने और करने का आग्रह करते हैं और बहुत सफाई से बात कहना और करना बखूबी जानते हैं। वे अपने शत्रुओं तक को मारते नहीं, बस साफ कर देते हैं। उनके सफाई-पसंद होने का इससे बड़ा क्‍या प्रमाण होगा कि वे झूठ तक साफ-साफ बोलते हैं।

इन सफाई-पसंद नागरिकों को बराबर प्रेरणा देते रहने के लिए संसार की सबसे पवित्र नदी उसी देश में बहती है जो मैल को ही नहीं, पाप को भी काट देती है। सबसे पवित्र पर्वत-माला उसी देश के केशों में लिपटी है। और उस देश की मिट्टी तो इतनी पवित्र है कि उससे तिलक करने की सलाह दी जाती है। आज भी वहाँ की जनता अपने नेताओं के चरणों से लिपटी हुई इस पवित्र धूल को माथे से लगाकर धन्‍य होती है। उस देश की माटी स्‍वयं तो पवित्र है ही, अपने स्‍पर्श मात्र से शुचिता प्रदान करने की अद्भुत क्षमता रखती है।

तो क्‍या आश्‍चर्य जो उस देश की बहुसंख्‍यक आबादी सदा धूलि-धूसरित रहती आई है और अपने बच्‍चों को धूल में लोट लगाता देखकर पुलकित होती रही है। यही नहीं, हाथ धोने के लिए वह इस माटी को महँगे और महकते विदेशी साबुनों से बेहतर समझती आई है। इधर जब से उस देश में टेलीविजन ने उपभोक्‍ता संस्‍कृति के नाम पर विदेशी साबुनों का विज्ञापन शुरू किया है, कुछ कमजोर कलेजेवाले लोग घबरा उठे हैं और अपने देश की पवित्रता पर आँच आने का खतरा देख रहे हैं। सौभाग्‍य से उस देश में नेतृत्‍व हमेशा ऐसे ही लोगों के हाथ में रहता आया है, जो उस देश को ठीक-ठाक जानते हैं। न ज्‍यादा, न कम। बस इतना कि कम जाननेवालों से कह सकें कि आप नहीं जानते हैं, इसलिए आपके हितों के संरक्षण और संवर्द्धन का काम हम अपने हाथों में लिए ले रहे हैं। और जो ज्‍यादा जानते हों, उन्‍हें बता सकें कि जिस देश में यह पवित्र नदी विशेष बहती है, उसमें ज्‍यादा जाननेवाले अपने देश को ठीक से न पहचानने के लिए अभिशप्‍त रहे हैं।

तो विदेशी साबुनों का आक्रमण होने पर इन नेताओं ने कहा कि जिस देश में पवित्र नदी विशेष बहती है, उस देश के निवासी आज भी देश की माटी से जुड़े हुए हैं। उसी को जोत-बोकर अपना पेट पाल रहे हैं। उसी से बने हुए घरों में वे रहते हैं। रात को उसी पर सुख की नींद सोते हैं। और सुबह उसी पर निवृत्त होकर, उसी से शौच करते हैं, किसी सिने-तारिका के सौंदर्य साबुन से नहीं। तमाम पश्चिमी प्रभाव के बावजूद, टी.वी. से फैलती सांस्‍कृतिक टी.बी. के बावजूद, हमारे देश की असली आबादी को न ग्‍लैमररूम माने जा सकनेवाले बाथरूम में कोई आस्‍था हुई है, और न टायलेट पेपर से सफाई करने में कोई श्रद्धा। सच तो यह है कि वह आज भी इन पश्चिमी चोंचलों से अपरिचित है।

यह ठीक है कि गाँव के लोग शहरों की तरफ भागने लगे हैं। दूसरों की क्‍यों कहें स्‍वयं हम भी गाँवों से शहर में आ बसे हैं। लेकिन इसका यह अर्थ ह‍रगिज नहीं लगाया जाना चाहिए कि देश पश्चिम के प्रभाव में आ रहा है या कि उसका शहरीकरण हो रहा है। इससे तो केवल यह संकेत मिलता है कि देश में लोकतंत्र स्‍वस्‍थ है, सबल है। शहरों पर, सत्ता पर, उच्‍चवर्गीय शहरियों की बपौती नहीं रह गई है। झोंपड़ेवाले भी सरकारी बँगला-कोठी के दावेदार बन गए हैं।

नेताओं ने यह भी कहा कि गाँववालों के शहर में आने के बावजूद गाँवों की आबादी घट बिलकुल नहीं रही है। जनसंख्‍या के आँकड़े बताते हैं कि हमारे देश की अधिकतर आबादी अब भी गाँवों में ही रहती है। परमात्‍मा हमारे देश की पवित्र छवि को बनाए रखने के लिए इतना चिंतित है कि उसने देश-माता को एक अद्भुत वरदान दे डाला है। चाहे विकास के कितने भी पंचवर्षीय आयोजन पूरे हो जाएँ, चाहे तेरे कितने भी बेटों के लिए कितना भी आरक्षण कर दिया जाए, चाहे तेरे कितने भी बेटे शहरों को चले जाएँ, तू जहाँ है वहीं रहेगी, पवित्र धूल से धूसरित गाँव में। और जब देश की माता ग्रामवासिनी रहेगी, तब देश भी ग्रामवासी ही रहेगा।

जरा ये भी देखिएगा कि गाँव से शहरों में आई हुई यह आबादी अपने नित्‍य कर्म में अपनी जमीन से, अपनी माटी से अपना यह पवित्र संबंध बराबर जोड़े हुए है। गाँव से आई जनता को तो शहर में रेल पटरी के आसपास या फिर सरकारी बँगले में बँधी हुई अपनी-अपनी भैंस की पीठ पर हाथ फेरते हुए इन नेताओं ने शंकालुओं को यह भी समझाया कि जो लोग हमारी तरह गाँव से शहर आ गए हैं, वे भी अपने नित्‍य कर्म में अपनी जमीन और माटी से अपना वह पवित्र संबंध बराबर जोड़े हुए हैं। गाँव से आई जनता को तो शहर में रेल पटरी के आसपास या फिर पार्कों में अपनी जमीन से संपर्क साधे देखते ही होंगे आप, कभी हमारे सरकारी बँगलों और निजी शहरी फार्म हाउसों में सुबह-सुबह कोई आएँगे तो पाएँगे कि विदेशी कमोड हमारे लिए कब्‍जकारी है और हमारे ग्‍लैमररूम जैसे बाथरूम में लिक्विड सोप से अधिक सम्‍मान देश की माटी को प्राप्‍त है।

जब कुछ संवाददाताओं ने देश की बहुसंख्‍यक आबादी के माटी से जुड़े इस संबंध को ही देश के गंदे होने का प्रमाण बताया और एक हाथ की तर्जनी और अँगूठे से दोनों नथुने बंद करके दूसरे हाथ की तर्जनी सफाई-पसंद देश की तथाकथित गंदगी की ओर उठाते हुए हैरान होकर पूछा कि यहाँ लोग साँस भी कैसे ले पाते हैं? तब नेता बोले, काश कि कभी आप अपने नथुने खोलते और स्‍वयं अनुभव करके देखते कि और तमाम चीजों के साथ-साथ हमारे देश का पवन भी पावन है और उनके जैसे पतितों का भी उद्धार कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी नाक के साथ-साथ आप फिरंगी और फिरंगीवत आलोचकों ने अपनी आँखें भी बंद कर रखी हैं अन्‍यथा आप निश्‍चय ही ये देख पाते कि हमारे देश की बहुसंख्‍यक आबादी, इसी हवा से निर्मित हमारे चुनावी वादों पर जीती आई है।

नेताओं ने इस ओर भी ध्‍यान दिलाया कि सफाई-पसंद देश को आकंठ गंदगी में डूबा हुआ बताने के दुस्‍साहस को कभी व्‍यंग्‍य-विडंबना में तो कभी मानवीय चिंता में छिपा जाने की कोशिश करते हैं। सफाई-पसंद देश में गंदगी देखने-दिखानेवाले इन लोगों को उन्‍होंने 'नाबदान के नायब इंस्‍पेक्‍टर' और 'गंदे चहबच्‍चे के बच्‍चे' ठहराकर अपनी ग्रामवासिनी माता की तथाकथित गंदगी की सफाई में ऐसे-ऐसे तर्क दिए कि आलोचकों के मुँह खुले रह गए और बोलती बंद हो गई। उदाहरण के लिए उस देश के नेताओं ने कहा कि अलग-अलग देशकाल में गंदगी की परिभाषा अलग-अलग तरह की होती आई है क्‍योंकि सौंदर्य-बोध देशकाल सापेक्ष है। अस्‍तु जैसे आपको हमारी अपनी नाक अपनी जमीन पर सिनक देना गंदा लगता है, उसी तरह हमें आपका नाक रूमाल में सिनककर रूमाल को अपनी जेब में रख लेना गंदा लगता है। अगर आप तटस्‍थ होके देखें तो इस मामले में ही नहीं और तमाम बातों में भी आपकी गंदगी, हमारी गंदगी से कुछ ज्‍यादा ही गंदी ठहरेगी।
नाबदान के नायब इंस्‍पेक्‍टरों से उस देश की नेता बिरादरी यह कहती थी कि गंदगी दरअसल आपके दिमाग में है। इसीलिए आप हमारी तथाकथित गंदगी में ही अटके रह जाते हैं। हमारी सफाई आपको नजर ही नहीं आती है। अरे आपको हमारा गलियों में कूड़ा फेंकना तो नजर आता है लेकिन इससे पहले जब हम घर की सफाई करके वह कूड़ा जमा कर रहे होते हैं तब आप आँखें मींच लेते हैं। अजी सच तो ये है कि जब आप हमारी गंदगी का मजाक उड़ा रहे होते हैं तब आप वस्‍तुतः हमारी गरीबी का मजाक उड़ा रहे होते हैं और यह भूल जाते हैं कि इस गरीबी के लिए आप ही पूरी तरह जिम्‍मेदार हैं। हम इस देश के नेता जरूर हैं मगर इस देश का बेड़ा गर्क कर सकनेवाले तो आप विदेशी ही थे, हैं और रहेंगे। अगर सच्‍चे मन से हिसाब लगाएँगे तो पाएँगे कि हमारी विराट आबादी को देखते हुए हमारी गंदगी कुछ भी नहीं है। आप लोगों की प्रति व्‍यक्ति आय ही नहीं, प्रति व्‍यक्ति गंदगी भी हमसे सौ-गुनी है।

उस देश को ठीक-ठाक जाननेवाले लोग उस देश की गंदगी की ही नहीं, हर कमजोरी की तसल्‍लीबख्‍श सफाई देते रहे। इसीलिए सारी दु‍निया अंततः यह मानने को मजबूर हुई कि तमाम गरीबी और गंदगी के बावजूद वही दुनिया का सबसे ज्‍यादा सफाई-पसंद देश है। वहाँ हर कोई सफाई मॉंगता है और हर कोई सफाई दे सकता है।
"इस बारे में मैं कोई टिप्‍पणी नहीं करना चाहता" जैसी कायर उक्तियाँ उस देश के कायर-से-कायर नेता तक के लबों पर कभी नहीं आतीं।

उस सफाई-पसंद देश में सफाई माँगने के नाम पर गंदगी फैलाना, खोदखाद कूड़ा सबके सामने बिखरा देना अच्‍छा नहीं समझा जाता है, इसलिए एक अलिखित-सा समझौता है कि सफाई माँगी जरूर जाए, मगर जो सफाई दी जाए, उसे जहाँ तक हो सके, स्‍वीकार कर लिया जाए। सफाई हमेशा बहुत साफ और सरल दी जाती है ताकि कोई ऐसा न कह सके कि गोलमाल बात करके कुछ छिपाने की कोशिश की जा रही है। सबसे साफ और सरल सफाई वह मानी जाती है जिसमें आरोप को बिलकुल बेबुनियाद बताया गया हो। उदाहरण के लिए एक बार वहाँ छोटे वजीर पर यह आरोप लगा कि उसने अपने भाई की मदद से विदेशों में घूस खाई है। उसने पहले सफाई दी कि मैंने कोई घूस नहीं खाई है। मेरे पास जो भी पैसा आया है, जायज तरीकों से ही आया है। इस पर आरोप लगानेवाले ने सिद्ध करना चाहा कि भाई ने पैसा नाजायज तरीके से कमाया और नाजायज तरीके की कमाई में छोटे वजीर ने हिस्‍सा लिया है। छोटे वजीर ने बयान दिया कि इस बारे में मैंने अपने भाई से सफाई माँगी है और उसका कहना है कि आरोप बेबुनियाद है। मैं मानवीय भाईचारे में विश्‍वास करता हूँ। आप न करते हों तो आगे बात मेरे भाई से कीजिए।

किसी की सफाई को देर-सवेरे न मान लेना उस सफाई-पसंद देश में शिष्‍टाचार के विरुद्ध समझा जाता है। फिर भी विदेशी प्रभाव में आए कुछ लोग किसी भी सफाई से संतुष्‍ट न होकर आरोप लगाते चले जाते हैं। ऐसी दशा में उस देश में पुलिस का एक पूरा विभाग ही सत्‍यासत्‍य की जाँच के लिए खोल दिया गया है। सफाई-पसंद देश के निवासी अनिवार्य रूप से उसकी जाँच के नतीजों के बारे में भी सफाई माँगते हैं। इसीलिए उस देश में जाँच कमीशन और प्रवर समिति बैठाकर गंभीर कांडों की गहराई तक जाने का प्रावधान है।

किनारे पर बैठकर पानी में पाँव डाले हुए वह कमीशन, गहराई के विषय में पूर्वानुमान करते हुए काफी समय लेता है। इस बीच वह मामला सफाई-पसंद देश की स्‍मृति से साफ हो चुका होता है। कमीशन उस नतीजे पर पहुँचता है कि गहराई तो ऐसी है कि सारी व्‍यवस्‍था को ले डूबे लेकिन अब उसमें जाने से कोई फायदा नहीं है। आवश्‍यकता इस बात की है कि आइंदा सावधानी बरती जाए ताकि गंदे-गंदे आरोप लगने से इस सफाई-पसंद देश में गंदगी न फैले। गंदे आरोप लगानेवाले स्‍वयं इस विषय में बहुत सजग रहते थे कि कहीं हमारी वजह से हमारे देश का वातावरण गंदा न हो। इसीलिए वे सत्तारूढ़ व्‍यक्ति के पीछे हमेशा हाथ धोकर ही पड़ते थे। मगर जैसे ही सत्तावान मेहरबान होकर उन्‍हें कुछ दे देता है, वे उसके समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं।

गंदे आरोपों के बीच भी देश को स्‍वच्‍छ रखने के विषय में उस देश की नेता बिरादरी कितनी सजग है इसका एक अत्‍यंत सुंदर उदाहरण 'नीले होंठ कांड' में मिलता है। हुआ यह कि एक बार उस देश के किसी बड़े वजीर की घर से दूर अकस्‍मात मृत्‍यु हो गई। उसके पुत्र ने अपने पिता के शव के नीले होंठों की ओर जनता का ध्‍यान दिलाते हुए यह आशंका व्‍यक्‍त की कि मेरे पिता की हत्‍या की गई है। उसके चमचों ने नए बड़े वजीर पर परोक्ष ढंग से आरोप लगाया कि उसने सत्ता हथियाने के लिए पिछले बड़े वजीर की हत्‍या करा दी। लेकिन अंततः सफाई-पसंदी के हित में पिछले बड़े वजीर के पुत्र ने नए बड़े वजीर की यह सफाई मान ली कि पिछले बड़े वजीर दिल का दौरा पड़ने से पहले जामुन खा रहे थे और इसीलिए उनके होंठ नीले हो गए थे। पिछले बड़े वजीर के पुत्र ने न केवल यह सफाई मान ली बल्कि अपने चमचों के लगाए आरोपों से फैली गंदगी को दूर करने की खातिर नए बड़े वजीर का यह अनुरोध भी स्‍वीकार कर लिया कि वह अपने पिता का अधूरा काम पूरा करने के लिए फिलहाल छोटा वजीर बन जाए।

तो उस सफाई-पसंद देश में आरोप जितना ही गंभीर होता है, सफाई उतनी ही सरल होती है। आरोप को संगीन बनाने के लिए नित नए सबूत जुटानेवाले, उस देश में यह देखकर बहुत हैरान होते हैं कि संगीनी के साथ-साथ बढ़ती सफाई की सरलता आखिरकार बहुत सादगी से उनका ही सफाया कर देती है। सफाई-पसंद नागरिक सफाई देनेवाले की मासूमियत के कायल होते हैं और वही-वही आरोप दोहराए चले जानेवाले को सनसनी के नाम पर बोरियत फैलानेवाला ठहराते हैं।

उदाहरण के लिए एक बार वहाँ किसी विदेशी तोप की खरीद में कमीशन के पैसे खुद खा जाने का गंभीर आरोप बड़े वजीर पर लगाया गया। वह अपने को निर्दोष बताते रहे। उन्‍होंने कहा कि सर्वविदित है कि हम डायटिंग कर रहे हैं। इसलिए यह कल्‍पनातीत है कि हमने पैसे जैसी गरिष्‍ठ चीज खाई होगी। किसी और ने खा ली हो तो उसकी भी हमें कोई जानकारी नहीं है। जानकारी मिलेगी तो बताएँगे और आप निश्चित रहें, पैसा खाने के दोषी देश के कानून के अनुसार अवश्‍य दंड पाएँगे। आरोप लगानेवाले कहते रहे कि आप पूछेंगे, तभी तो जानकारी पाएँगे। जवाब में उन्‍हें यही सफाई सुनने को मिलती रही कि हम तमाम नियम-कायदों का पालन करते हुए पूछताछ कर रहे हैं। वही आरोप और वही सफाई का क्रम इतना लंबा चला कि उस सफाई-पसंद देश की पब्लिक झुँझला उठी और बोली कि जिन लोगों को उस तोप के सिवा कुछ नहीं सूझता है, उन्‍हें उसी तोप से उड़ा दिया जाए।

उस सफाई-पसंद देश में सफाइयाँ भी दो तरह की होती हैं, एक सार्वजनिक और एक निजी। सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई सफाई नहीं दी जाती है जिससे देश के वातावरण की स्‍वच्‍छता को आँच पहुँच सकती हो। निजी सफाई भी दो तरह की होती है। एक वह जो विश्‍वस्‍त मित्र के कान में कही जा सके और दूसरी वह जिसके बारे में कहा जा सके कि या तो मैं जानता हूँ या मेरा परमात्‍मा जानता है, और हाँ आरोप लगानेवाला भी। और चूँकि आरोप लगानेवाला उस बात को कहकर पहले ही वातावरण काफी गंदा कर चुका होता है इसलिए जिस पर आरोप लगा हो उसका यह कर्तव्‍य हो जाता है कि सफाई देकर उस गंदगी को साफ करे, यह नहीं कि स्‍वयं उसमें लोट लगाने लगे। यही कारण है कि सफाई के मामले में उस देश के सत्तावान लोग सार्वजनिक और निजी को हर हालत में अलग ही रखते थे।

एक बार को आप उन्‍हें सरकारी गाड़ी का घर की सब्‍जी लाने के लिए इस्‍तेमाल न करने के लिए मजबूर कर सकते थे। एक बार को आप उन्‍हें वजीर पद क्‍या, संसार भी छोड़ देने के वर्षों-वर्षों बाद तक सरकारी कोठी अपने ही नाम रखे रहने के लिए राजी कर सकते थे, लेकिन मजाल है जो आप उनसे किसी सार्वजनिक मंच से वह सफाई बुलवा देते, जो वे एक-दूसरे के कान में बोल दिया करते थे।

कोई साहब आपत्ति कर रहे हैं कि उस सफाई-पसंद देश का नाम क्‍यों नहीं ले रहा हूँ, इस बारे में तुरंत सफाई दूँ। लगता है ये भी उसी सफाई-पसंद देश के नागरिक हैं। तो साहब, मेरी सार्वजनिक सफाई ये है कि सठिया जाने के कारण मैं उस देश का नाम भी भूल गया हूँ। अब आपसे क्‍या छिपाऊँ, मैं तो अपने तीन बेटों के एक ही अक्षर से शुरू होनेवाले नामों तक में बुरी तरह गड़बड़ाने लगा हूँ। मेरे सामने इसके अलावा अब कोई रास्‍ता ही नहीं रह गया है कि उनमें से कोई भी सामने आए, मैं क्रम से तीनों के नाम लेता चला जाऊँ। कहना न होगा कि इससे जहाँ पहले बेटे को बहुत सुविधा हुई है, वहीं तीसरे को इतनी असुविधा कि अब उसने अपने कोट या कमीज पर अपनी नाम-पट्टी लगानी शुरू कर दी है। दिक्‍कत यह है कि मेरी निगाह भी सठिया गई है और मैं उस नाम-पट्टी को तभी पढ़ सकता हूँ जब वह मेरी निगाह से चौथाई मीटर की दूरी पर हो। जहाँ तक मेरे दूसरे बेटे का सवाल है उसने अपनी इस स्थिति को स्‍वीकार कर लिया है कि मेरा नाम, मेरे पिता द्वारा दूसरी कोशिश में ही सही पुकारा जाएगा।

अब आप अपने कान मेरे होंठों के करीब ले आए हैं तो निजी सफाई भी दे डालूँ। उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेरा साहस घटता चला गया है। अब कौन इस उम्र में नाम लेकर झमेले में पड़े।

हिंदी समय की साईट से साभार

20 October 2013

मेरे पास लेखक बनने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था : एलिस मुनरो

2013 के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार पानेवाली कनाडा की एलिस मुनरो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों में गिनी जाती हैं. लम्बी कहानी का फॉर्म चुननेवाली मुनरो राजनीतिक कहानियाँ नहीं लिखतीं, मन के भीतर झांकती हैं. उनकी कहानियों में मनोविज्ञान, खासकर स्त्री मनोविज्ञान की गहरी पकड़ देखी जा सकती है. कनाडा के सुदूर हिस्से में अपना ज्यादातर वक्त बितानेवाली मुनरो का एक किसान की बेटी से नोबेल पुरस्कार पाने का सफ़र, विपरीत परिस्थितियों में एक साधारण स्त्री की महान उपलब्धि हासिल करने का सफ़र है. मुनरो पर गंभीरता पूर्वक और ठहरकर लिखा चाहिए। फिलहाल पेरिस रिव्यू और वर्जीनिया क्वार्टरली रिव्यू में छपे उनके साक्षात्कारों के कुछ अंशों को मिलाकर उनका एक आत्मवक्तव्य।।। अखरावट 



 मैं जब 21 साल की थी, तब से लगातार लिख रही हूं. आज मैं 81 साल की हूं. (इस साल 2013 में 82 वर्ष की उम्र में एलिस मुनरो ने लेखन से संन्यास लेने की घोषणा की).  जब मेरी पहली किताब प्रकाशित हुई, उस वक्त मैं करीब 36 साल की थी. मैं ये कहानियां वर्षों से लिख रही थी. आखिरकार रायर्सन प्रेस के एक कनाडाई प्रकाशक (बाद में इसे मैकग्रॉ-हिल ने खरीद लिया) ने मुझे खत लिखा और पूछा कि क्या मेरे पास इतनी कहानियां हैं, जिनसे एक किताब प्रकाशित की जा सके? उनकी योजना तीन लेखकों की एक सम्मिलित किताब निकालने की थी. यह योजना शक्ल नहीं ले पायी, लेकिन उनके पास मेरी कहानियां थीं. फिर उन्होंने वह प्रकाशन छोड़ दिया, लेकिन उन्होंने मेरी कहानियां एक दूसरे संपादक के सुपुर्द कर दीं. नये संपादक  ने मुझसे कहा कि अगर आप तीन और कहानियां लिख सकती हैं, तो आपकी एक किताब आ जायेगी. इस तरह मैंने तीन और कहानियां लिखीं, ‘इमेजेज’, ‘वाकर ब्रदर्स कॉवबॉय’ और पोस्टकार्ड. इनमें से ज्यादातर कहानियां टैमारैक रिव्यू में प्रकाशित हुई. यह एक छोटी सी अच्छी और साहसी पत्रिका थी.

मैंने जब लिखने की शुरुआत की, उस वक्त मेरी महत्वाकांक्षा उपन्यास लिखने की थी. मैंने कहानियां लिखनी शुरू कीं, क्योकिं मेरे पास जितना वक्त था, उसमें यही लिखा जा सकता था. मैं घर और बच्चों को संभालने के बीच से बहुत ज्यादा वक्त नहीं निकाल पाती थी. इन कामों से मुझे लिखने के लिए जितना वक्त मिलता था, उसमें उपन्यास नहीं लिखा जा सकता था. लिखते-लिखते मैंने कहानी का एक ऐसा फॉर्म (रूप) हसिल किया, जो कहानियों के लिए प्राय: इस्तेमाल नहीं किया जाता. मैंने परंपरा से अलग लंबी कहानियों का रूप विकसित किया. मुझे लगा कि मैं जो कहना चाहती हूं, वह लंबी कहानियों में ही मुमकिन है. यह शुरू में काफी कठिन था, क्योंकि कहानी एक ऐसी विधा है, जिससे लोग उम्मीद करते हैं कि यह बहुत बड़ी न हो. वह निश्चित लंबाई की हो. लोग छोटी कहानियां चाहते हैं और मेरी कहानियां इस मायने में थोड़ी अलग थीं कि वे बड़ी होती जाती थीं. जो कुछ अलग तरह की बातें कहती थीं. मैं खुद नहीं जानती, कम से कम ज्यादातर मौकों पर मैं यह  नहीं जानती कि कहानी कितनी बड़ी होनेवाली है. लेकिन मैं इसके अपने आकार हासिल करने पर आश्चर्यचकित नहीं होती हूं. उसे जितनी जगह चाहिए, मैं उसे देती हूं. वैसे भी, मुझे इस बात की कोई परवाह नहीं कि मैं जो लिख रही हूं उसे क्या नाम दिया जा रहा है, किस विधा के अंतर्गत रखा जा रहा है. इसे कहानी कहा जा रहा है, या कुछ और. या कुछ भी. यह अपने आप में एक कथा है और मेरे लिए इतना ही महत्वपूर्ण है.

मेरे लिए लिखना हमेशा काफी कठिन रहा है. जी हां, हर दौर मैं यह काफी कठिन रहा है. मैं बहुत धीरे-धीरे लिखती हूं. मैं अपने लिखे को कई बार लिखती हूं. लिखती हूं, फिर लिखती हूं. फिर लिखती हूं. इसके बाद मैं इसे छपने के लिए भेजती हूं. अकसर ऐसा होता है कि कुछ समय बीतने के बाद मैं इसे फिर से लिखना चाहती हूं. कभी-कभी ऐसा लगता है कि कुछ शब्द इतने महत्वपूर्ण और जरूरी हैं, कि उन्हें कहानी में जरूर से शामिल किया जाना चाहिए. मैंने कई बार अपनी कहानियों में उनके लिखे जाने के काफी बाद में सुधार किया है, जो अकसर गलत फैसला साबित हुआ. क्योंकि जब मैं सुधार कर रही थी, उस समय मैं उस कहानी की लय में बिल्कुल भी नहीं थी. कई बार ऐसा होता है कि जब मैं कहानियों को बाद में पढ़ती हूं, तो उसका कोई हिस्सा, कुछ शब्द मुझे खटकते हैं. मुझे लगता है कि इन शब्दों को जो काम करना चाहिए, वे नहीं कर पा रहे. फिर मैं उन्हें फिर से लिखती हूं. लेकिन जब मैं कहानी को फिर से पढ़ती हूं, तो वे कहानी के प्रवाह को भंग करते दिखते हैं. इसलिए, मैं ऐसा करने को लेकर ज्यादा आश्वस्त नहीं हूं. ऐसे व्यवहार से बचना चाहिए. एक बिंदु ऐसा होना चाहिए, जहां हम खुद से कहें कि अब यह कहानी मेरी नहीं है. जैसा हम बच्चे के लिए कहते हैं.

मेरे पास लेखक बनने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था, क्योंकि मेरे पास इतने पैसे नहीं थे. मुझे मालूम था कि मैं यूनिवर्सिटी में सिर्फ दो साल रहनेवाली हूं, क्योंकि मुझे मिल रहा वजीफा दो सालों के लिए ही था. यह मेरे जीवन में एक अवकाश की तरह था. वह एक सुनहरा दौर था. जब मैं बच्ची थी, तब पूरे घर की जिम्मेवारी मेरे ऊपर थी. इसलिए यूनिवर्सिटी का वक्त, मेरे जीवन का एकमात्र  ऐसा दौर था, जब मुझे घर का काम नहीं करना होता था. यूनिवर्सिटी का दूसरा साल खत्म होने के साथ ही मैंने शादी कर ली. उस वक्त मैं 20 साल की थी. हम लोग वैंकूवर चले गये. यह एक बड़ा क्षण था. इसके साथ रोमांच जुड़ा था. बाहर जाने का बसने का रोमांच. जल्दी ही हम एक ठीक-ठाक मध्यवर्गीय जीवन जीने लगे. हम एक घर लेने और एक बच्चे के बारे में सोच रहे थे और समय गंवाये बगैर हमने ऐसा कर भी लिया. मैं सिर्फ 21 साल की थी, जब मेरा पहला बच्चा हुआ. हां इस दौरान मैं  लगातार लिख रही थी. जब मैं गर्भ से थी, उस दौर में मैं काफी व्यग्रता के साथ लगातार लिखती रहती थी, क्योंकि मुझे यह डर था कि इसके बाद मैं कभी नहीं लिख पाऊंगी. हर बार गर्भ के दौरान मुझे इस ख्याल ने गहरे तक मथा कि मुझे बच्चे के जन्म से पहले कुछ बड़ा करना चाहिए. हालांकि, मैं इस दौरान मुझसे कुछ भी बड़ा नहीं हुआ. जब मेरे बच्चे छोटे थे, उस समय मेरे लिखने का वक्त तब आता था, जब वे स्कूल चले जाते थे. उन दिनों में मैं काफी मेहनत किया करती थी. मेरे पति और मेरी एक किताब की दुकान थी. जब मैं वहां काम करती थी, उन दिनों में भी मैं घर में दोपहर तक रहती थी. मुझे इस वक्त घर का काम करना होता था, लेकिन मैं इसी समय में लिखा भी करती थी. बाद में, जब मैं हर दिन बुक स्टोर नहीं जाती थी, मैं तब तक लिखा करती थी, जब तक सभी लोग दोपहर के खाने के लिए घर लौटकर नहीं आ जाते थे. जब वे करीब ढाई बजे के करीब चले जाते थे, मैं अपने लिए जल्दी में  एक कप कॉफी बनाती थी, फिर घर का काम करती थी. मेरी कोशिश होती थी कि मैं शाम होने से पहले सबकुछ निबटा लूं.

लोग कहते हैं कि मेरी भाषा कवितामय है. मैं कविताएं आज भी यदा-कदा लिखती हूं. मुझे कविता का विचार पसंद है. लेकिन जब आप गद्य लिख रहे होते हैं, तब आपको इस बात को लेकर हमेशा सचेत रहना पड़ता है कि आप गद्य को जानबूझ कर कवितामय न बना दें. गद्य की भाषा में पैनापन होना चाहिए. और अब मुझे इसी तरह लिखना पसंद है.

हां मुझे  लोक-कथाएं आकर्षित करती हैं. लेकिन, एक लेखक होने के नाते यह किसी को नहीं पता होता कि वह किस ओर आकर्षित होगा. आप पहले से कुछ तय नहीं करते. अचानक आपको एहसास होता है कि हां, मुझे यह लिखना है. ऐसे लिखना है. हां, यह जरूर है कि लोग जो कहानियां सुनाते हैं, मैं उन्हें ध्यान से सुनती हूं. उनकी लय को पकड़ने की कोशिश करती हूं और फिर लिखने की कोशिश करती हूं. मैं सोचती हूं कि लोगों को आखिर इस तरह की कहानियां इतनी पसंद क्यों आती हैं? वे उनके लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों हैं? हम लोगों से ऐसी कई कहानियां सुनते हैं, जो जीवन की विचित्रता को बयान करती हैं. मैं ऐसी कहानियां उठाती हूं, और देखने की कोशिश करती हूं कि वे मुझसे क्या कहना चाहती हैं या फिर मैं उनसे कैसा व्यवहार करना चाहती हूं.

लोग कहते हैं कि लोक-कथाएं औरतों की विधा है. मुझे यह काफी हद तक सच मालूम पड़ता है. वैसी औरतें, जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता था, यहां तक कि जब औरतों ने लिखना सीख लिया और वे लिख सकती थीं, तब भी वे कहानियां सुना रही थीं. औरतें आपस में काफी वक्त गुजारती हैं. मुझे याद है पहले औरतों को खूब खाना बनाना पड़ता था. मेरे बचपन में पुरुष खेतों में काम करते थे, जब वे काम से वापस लौटते थे, तब उन्हें खूब विस्तार से खाना परोसा जाता था. खाना जितना भव्य होता था, वह जितना स्वादिष्ट होता था, औरतें उतनी गौरवान्वित होती थीं. खाने के बाद बर्तनों का अंबार होता था और औरतें साथ मिलकर उसे साफ करती थीं. इस पूरी प्रक्रिया में वे आपस में बात कर रही होती थीं. जरूर यह काफी पुरानी बात हो चुकी है. यह गांव के जीवन की बात है. मुझे नहीं पता अब औरतें अभी भी इस तरह से बात करती हैं या नहीं?  लेकिन औरतें जब भी मिलती हैं, मुझे लगता है उनके भीतर कहानियां सुनाने की इच्छा कुलबुलाती है. वे एक-दूसरे से यह सवाल पूछना चाहती हैं, ‘तुम्हें क्या लगता है,  ऐसा क्यों हुआ?’, ‘ऐसा कहना अजीब नहीं था?’, ‘इसका क्या मतलब है?’ औरतों में शायद एक आदत होती है. वे जीवन को मौखिक रूप से व्याख्यायित करना, उसे समझना चाहती हैं. जितने पुरुषों को मैं  जातनी हूं, या जानती थी, उनमें  ऐसी कुलबुलाहट मैंने नहीं देखी. वे चीजों के बारे में ज्यादा नहीं सोचते.

यह एक वजह हो सकती है कि मैंने कहानी की विधा को चुना या कह सकते हैं कि कहानी की विधा ने मुझे चुन लिया. मुझे लोगों के साथ, उनकी बातचीत, उनके जीवन में आनेवाले आश्चर्यों पर काम करना पसंद है. मेरे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है, कि आप जिस चीज की उम्मीद नहीं कर रहे थे, वह आपके साथ हो जाये. मेरी  एक कहानी ‘रनअवे’ में एक औरत  जिसका दांपत्य जीवन काफी कठिनाइयों भरा रहा है अपने पति को छोड़ने का फैसला करती है. एक उम्रदराज और तार्किक औरत की बातों से उसे ऐसा करने का हौसला मिलता है. और जब वह बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ाती है, वह महसूस करती है कि वह ऐसा नहीं कर सकती. यह समझदारीभरा फैसला है. उसके पास उस जीवन से बाहर आने के कई कारण हैं, लेकिन वह  ऐसा नहीं कर सकती. आखिर  ऐसा क्यों होता है? मैं ऐसे विषयों पर लिखती हूं, क्योंकि मुझे यह नहीं पता कि आखिर ऐसा क्यों होता है? लेकिन मेरे लिए जरूरी है कि मैं ऐसी घटनाओं की ओर ध्यान दूं. इनमें  ऐसा कुछ है, जो ध्यान दिये जाने की मांग करती हैं.

मेरा जीवन में कई कठिनाइयां आयीं, लेकिन मेरे हिस्से में किस्मत भी थी. अगर मैं अपने से पहले की पीढ़ी के किसान की बेटी होती, तो मेरे लिए कोई संभावना नहीं होती. लेकिन जिस पीढ़ी में मैं थी, वहां छात्रवृत्तियां थीं. हालांकि, लड़कियों को उसके लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था, लेकिन लड़कियां उसे हासिल कर सकती थीं. मैं काफी उम्र में अपने लिए सोच सकती थी कि मैं एक लेखक बनूंगी.  और मैं आपको बता दूं कि कोई और ऐसा या इस तरह का नहीं सोचता था. लेकिन यह कोई सपनीली राह नहीं थी. जब मैं किशोर थी तब मैं खूब शारीरिक काम किया करती थी, क्योंकि मेरी मां ज्यादा काम नहीं कर सकती थी. लेकिन यह मुझे रोकने के लिए काफी नहीं था. मुझे लगता है, एक तरह से यह मेरी खुशकिस्मती थी. अगर मैं न्यूयॉर्क में किसी काफी धनी परिवार में जन्मी होती, ऐसे लोगों के बीच जो लेखन के बारे में सबकुछ जानते होते, तो मैं पूरी तरह से  नष्ट हो जाती. मुझे लगता कि मैं ऐसा नहीं कर सकती. लेकिन क्योंकि मेरे आसपास ऐसा कोई नहीं था, जो लिखने के बारे में सोचा करता था, इसलिए मेरे अंदर यह विश्वास आया कि ‘हां, मैं यह कर सकती हूं.’





30 July 2013

चिनुआ अचेबे : पश्चिमी सभ्यता की श्रेष्ठता के मिथक को ध्वस्त करनेवाला लेखक

अफ्रीकी साहित्य खासकरआधुनिक अफ्रीकी उपन्यास के पितामह कहे जानेवाले चिनुआ अचेबे  के निधन के बाद पर यह लेख संशोधनों के साथ फॉरवर्ड प्रेस में छपा था. असंशोधित लेख यह रहा...

 
पिछले छह दशकों में जिन लोगों ने पश्चिमी  सभ्यता की श्रेष्ठता के गढे गये मिथक को ध्वस्त करने में योगदान दिया उनमें अचेबे का नाम प्रमुख है. अचेबे ने न सिर्फ अफ्रीकी लेखन को विश्व मानचित्र पर जगह दिलायी, बल्कि इस दुष्प्रचार को भी मुंहतोड़ जवाब दिया कि 'अफ्रीकी नस्लीय रूप से हीन हैं.' नेल्सन मंडेला ने अचेबे को अफ्रीका को बाकी दुनिया तक ले कर जाने वाला और ऐसा लेखक कहा है, जिसके साथ रहते हुए "जेल की दीवारें टूट गयी थीं.’’ इससे थोड़ा और आगे जाकर यह कहा जा सकता है कि अचेबे उन लेखकों में शामिल रहे, जिन्होंन यह बताया कि तीसरी दुनिया के लोग, खासकर इन देशों के जनजातीय समाज किस तरह साझे इतिहास से बंधे हुए हैं.

थिंग्स फाल अपार्ट/ द सेंटर कांट होल्ड (चीजें बिखर जाती हैं, केंद्र ही स्थिर नहीं रह पाता). चिुनुआ अचेबे ने अपने पहले और बहुचर्चित  उपन्यास थिंग्स फॉल अपार्ट का शीर्षक आइरिश कवि वाइबी येट्स की कविता सेकंड कमिंग की इन पंक्तियों से लिया. अपने इस उपन्यास में, जिसकी अब तक करीब सवा करोड़ कॉपी बिक  चुकी है और 50 से अधिक भाषाओं में जिसका अनुवाद हो चुका है, चिनुआ अचेबे ने अफ्रीकी समाज की धुरी के ही चरमरा जाने की ऐतिहासिक त्रासदी को बयां किया. द गार्डियन ने इस उपन्यास की समीक्षा करते हुए लिखा था,‘‘इस उपन्यास ने अफ्रीका बारे में पश्चिम के नजरिये को सिर  के बल खड़ा कर दिया"- वह नजरिया जो अब तक सिर्फ गोरे उपनिवेशवादियों के दृष्टिकोण पर आधारित था.

यह उपनिवेशवादी नजरिया क्या है? यह कि अफ्रीका का उपनिवेशीकरण ‘‘हीन’’ और ‘‘आदिम’’ की संज्ञा से नवाजे गये लोगों को सभ्य बनाने के लिए किया गया था. यह वह वैचारिक आधार था, जिसका सहारा लेकर अपनी तमाम हिंसा और बर्बरता के रक्त रंजित इतिहास के बावजूद यूरोप ने अफ्रीका, एशिया, अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया के उपनिवेशीकरण को वैधानिकता प्रदान करने की कोशिश की है.. ‘‘थिंग्स फॉल अपार्ट’’ सिर्फ नाइजीरिया, या अफ्रीका का नहीं, दुनिया के उन तमाम मुल्कों का उपन्यास बन जाता है, जिन्हें अपने तथाकथित सभ्यता मिशन में यूरोपीय शक्तियों द्वारा अपना गुलाम बनाया गया था. यह उपन्यास उस पश्चिमी प्रचार को  बेहद रचनात्मक तरीके से ध्वस्त करता है, जिसके मुताबिक गोरों के आगमन से पहले अफ्रीकी कबीलाई समाज न्याय और शासन की किसी भी अवधारणा से अपरिचित था.  थिंग्स फॉल अपार्ट में चिनुआ अचेबे दुनिया के पाठकों को गोरों के आगमन से ठीक पहले के अफ्रीकी कबीलाई समाज में जाते हैं और यह दिखाते हैं कि भले उपर से देखने पर यह समाज ‘‘आधुनिकता’’ के सांचे से कहीं बार छिटका हुआ और आदिम नजर आता है, लेकिन अपने आंतरिक  रूप में इन समाजों में भी न्याय, शासन, शान्ति की चाहत कुछ वैसी ही थी, जिस पर आधुनिक यूरोप "गर्व" करता है. अचेबे इस तथाकथित बर्बर अफ्रीकी समाज को यहां ‘‘सभ्य" यूरोपीय समाज के बरक्स रखते हैं और यह दिखाते हैं कि किस तरह उनके आगमन के बाद परंपरागत अफ्रकी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनतिक संस्थाएं तहस-नहस कर दी गयीं. यह उपन्यास साम्राज्यवादी शोषण के वैश्विक चरित्र को सामने लाता है. यह बेवजह नहीं है कि थिंग्स फॉल अपार्ट पढ़ते हुए आपको अचानक छोटा नागपुर पठार पर लड़ते हुए सिद्धो-कान्हो और बिरसा मुंडा याद आ जाते हैं, जो अपनी आजादी, परंपरागत संस्कृति और धार्मिक विश्वास की रक्षा करने के लिए उठ खड़े हुए थे.

प्ेरिस रिव्यू को करीब डेढ़ दशक पहले दिये गये साक्षात्कार में चिनुआ अचेबे ने कहा था, "जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया और पढ़ना सीखा, मेरा सामना दूसरे लोगों और दूसरी धरती की कहानियों से हुआ. ये कहानियां मुझे बहुत अच्छी लगती थीं. इनमें कई अजीब-अतार्किक किस्म की होती थीं. थोड़ा और बड़ा होने पर रोमांच कथाओं से मेरा वास्ता पड़ा. तब मुझे नहीं पता था कि मुझे उन बर्बर-आदिम लोगों के साथ खड़ा होना है, जिनका मुठभेड़ अच्छे गोरे लोगों से हुआ था. मैंने सहज बोध से गोरे लोगों का पक्ष लिया. वे अच्छे थे! वे काफी अच्छे थे! बुद्धिमान थे! दूसरी तरफ के लोग ऐसे नहीं थे. वे मूर्ख थे. बदसूरत थे. इस तरह मुझे "अपनी कहानी के न होने" के खतरे से परिचय हुआ. एक महान कहावत है- जब तक शेर की तरफ से इतिहास लिखनेवाला नहीं होगा, जब तक शिकारी का इतिहास हमेशा शिकारी को ही महिमामंडित करेगा. यह बात बहुत बाद तक मेरी समझ में नहीं आयी. जब मुझे एहसास हुआ कि मुझे लेखक बनना है, तब मुझे यह पता था कि मुझे वह इतिहासकार बनना है जो शेर का इतिहास लिखे, शिकारी का नहीं. यह किसी अकेले का काम नहीं है. यह एक ऐसा काम है, जिसे हम सबको मिलकर साथ करना है, ताकि शिकार के इतिहास में शेर की पीड़ा, उसका कष्ट, उसकी बहादुरी भी झलके."

जाहिर है चिनुआ अचेबे को यह मालूम था कि उन्हें सिर्फ शब्दों की साधना नहीं करनी है, बल्कि शब्दों के सहारे एक खोये और अपमानित किये गये इतिहास को फिर से खड़ा करना है.  अफ्रीका पर लिखे गये उनके उपन्यासों की ट्रायोलाजी- "थिंग्स फाल अपार्ट", "नो लॉन्गर एट ईज" और "ऐरो ऑफ  गॉड" में उनकी इस कोशिश को साफ महसूस किया जा सकता है. लेकिन इस क्रम मे वे कहीं भी इतिहास को लौटा लाने की नोस्टालजिया से ग्रस्त नहीं दिखते और अफ्रीकियों की आलोचना और उन पर व्यंग्य करने से भी नहीं कतराते हैं. उनका चैथा उपन्यास ‘‘ ए मैन ऑफ द पीपुल’’ इसकी मिसाल है.

.अपने ऐतिहासिक लेख ‘‘ एन इमेज ऑफ अफ्रीका: रेसिज्म इन कोनराडस हार्ट ऑफ डार्कनेस’’(1975) में अचेबे ने कोनराड .( जोसेफ कोनराड ने अफ्रीका पर 'हार्ट ऑफ डार्कनेस' नामक उपन्यास बर्बर बनाम सभ्यता के विमर्श पर केंद्रित करके लिखा था) की इस बात के लिए तीखी आलोचना की कि इसमें अफ्रीकी महादेश को पहचान में आ सकने लायक मानवता के किसी भी चिह्न से खाली युद्धभूमि में बदल दिया और अफ्रीकियों की भूमिका परजीवी तक सीमित कर दी गयी.

चिनुआ अचेबे का पूरे लेखन में शोषित अश्वेतों का इतिहासकार होने की जद्दोजहद दिखायी देती है. खुद उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘‘लेखक सिर्फ लेखक नहीं होता. वह एक नागरिक भी होता है.’’ उनका मानना था कि गंभीर और अच्छे साहित्य का अस्तित्व हमेशा से मानवता की मदद उसकी सेवा करने के लिए रहा है. चिनुआ अचेबे के लेखन में अफ्रीकी  मानवता के  प्रति ही नहीं विश्व की तमाम शोषित मानवताओं के प्रति इस पक्षधरता को आसानी से चिह्नित किया जा सकता है.


28 July 2013

कवि का डीएनए उसके जीवन में ही निहित होता है : अरुण कमल

हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि अरुण कमल की कविताएं युगों के संधिस्थल पर खड.ी हैं. उनकी कविताएं इस संक्रमण का दस्तावेज तो हैं ही, व्यवस्था को लेकर आक्रोश, आम आदमी के प्रति पक्षधरता और जिंदगी के लिए उम्मीद का स्वर भी इनमें गहरे तक मिला हुआ है. पिछले दिनों अरुण कमल से उनके रचनाकर्मे पर लम्बी बात की युवा पत्रकार प्रीति सिंह परिहार ने. यहाँ साक्षात्कार को आत्म वक्तव्य में ढाला गया है. आप भी पढ़ें..अखरावट 


लेखन की शुरुआत कैसे हुई, यह ठीक-ठीक तो याद नहीं. शुरू में आप कुछ शब्दों को इधर-उधर से मिला कर जोड.ते हंै. तुक मिलाते हैं. फिर उसमें संगीत पैदा होता है, तब कोई बात बनती है. इस तरह धीरे-धीरे आप कविता की ओर बढ.ने लगते हैं. आप दूसरों को पढ. कर प्रेरणा लेते हैं. आसपास की जिंदगी को बारीकी से देखते हैं, तो लगता है इसे कैसे कविता में बदला जाये! यह सिलसिला चलता रहता है.

कविता में ज्यादा बातों को कम में कहा जा सकता है. यह सुविधा दूसरी विधाओं में नहीं है. यह भी है कि किस विधा में आप अपने आपको ज्यादा बेहतर ढंग से व्यक्त कर सकते हैं. स्वामीनाथन चित्रकार थे और कवि भी, लेकिन अंतत: वह चित्रकार ही हैं. रवींद्रनाथ टैगोर और निराला जैसी प्रचंड प्रतिभाओं को छोड. दें. मेरे जैसे औसत किस्म के लेखक, अधिक से अधिक एक विधा में काम कर सकते हैं.

एक कवि का डीएनए उसके जीवन में ही निहित होता है. कवि ही नहीं, यह बात हर व्यक्ति पर लागू होती है. अगर मुझे पढ.ने-लिखने की सुविधा नहीं मिलती, मेरे पिता जी को साहित्य से प्रेम नहीं होता और बचपन से मैं इतनी किताबें नहीं देखता, तो शायद ही कविता की ओर आता. मैं बहुत ही साधारण आर्थिक स्थिति का आदमी रहा हूं. अभी तक मेरे पास दुनिया में न कहीं जमीन है, न मकान. शायद यह मेरे सर्वहारा होने की स्थिति है. यह भी मुझे कई तरह की बेचैनियों की तरफ ले जाती है. दुनिया के उन सारे लोगों से मेरा संबंध जोड.ती है, जो बेघर, बेरोजगार और बेवतन हंै. जो जीवन आप वरण करते हैं या जो जीवन आपको मिलता है इस समाज द्वारा, वही अतंत: आपके सृजन के चरित्र को निर्धारित करता है. मुझे नहीं लगता कि एक भ्रष्ट, धनलोलुप, सत्तालोलुप आदमी कविता लिख सकता है. महान दार्शनिक दीदरो ने कहा था,‘कला से प्रेम के लिए धन के प्रति हिकारत की भावना का होना जरूरी है.’ मुझमें वो हिकारत तो है ही, मनुष्य और कविता के लिए प्रेम भी है.

बुद्ध ने कहा था, दुख है. दुख का कारण है. बुद्ध ने यह भी कहा था कि उसका निवारण भी है. निर्वाण ही उनके लिए निवारण है. लेकिन कुछ दुख ऐसे हैं जिनका कोई निवारण नहीं. पर बहुत से दुख ऐसे भी हैं जिन्हें घटित होने से रोका जा सकता है. बिहार में अभी जिन बाों की मौत हुई, क्या यह उनकी किस्मत थी? नहीं, जानबूझकर उन्हें यह मौत दी गयी. उत्तराखंड में जो हजारों लोग मारे गये, क्या यह कोई दैवीय आपदा थी? नहीं. यह भौतिक दुख हैं. मेरी कविताओं में इन सभी दुखों के बारे में चिंता है. यही कविता का काम है.

कविता भीतर से आपकी भावनाओं को प्रभावित करती है. कविता बताती है कि आप जीवन को इस तरह से देखें. जैसे पाब्लो नेरुदा कहते थे,‘मैं इस पृथ्वी की हर वस्तु को इस तरह देखना चाहता हूं, जैसे मनुष्य ने पहली बार देखा होगा.’ यह काम न विज्ञान, न तकनीक और न ही दर्शन कर सकता है. केवल कविता ही कर सकती.

मैं कविताएं पढ.ता हूं, तो मुझे कविता मिलती है. कविता से कविता जन्म लेती है, जैसे एक दीप से दूसरा दीप जलता है. कभी किसी कविता को पढ.ते हुए लगता है, अरे यह अनुभव तो था मेरे पास. ऐसे ही कभी कोई पंक्ति आती है मन में, तो उसे याद कर लेता हूं. कई बार कागज पर लिख लेता हूं. यह भी होता है कि कुछ पंक्तियां आपस में जुड.ती जायें और कविता बने. यह भी हुआ कि मैंने बहुत कोशिश की लेकिन कविता नहीं बनी और मैंने उसे छोड. दिया. कई वर्षों के बाद वह एक पंक्ति, एक बिंब, एक टुकड.ा कहीं पर काम आ गया. वैसे ही जैसे बढ.ई लकड.ी के एक-एक टुकडे. का उपयोग करते हैं. वो कुछ भी फेंकते नहीं. लकड.ी का बुरादा भी नहीं, जिसे जाडे. में सुलगा कर वो गरमी पाते हैं. मेरे साथ कुछ ऐसा ही है. मैं इंतजार करता हूं, कई बार उस मुहूर्त का, प्रयत्न पूर्वक भी. हालांकि जैसे- जैसे उम्र बढ.ती है, यह भी लगता है कि वह स्फूर्ति जो शुरू में थी, अब कम हो रही है.

मुझे अभी भी अपनी जो कविता सबसे अधिक प्रिय है वह मैंने 25-26 की उम्र में लिखी थी. ‘अपना क्या है इस जीवन में, सब तो लिया उधार, सारा लोहा उन लोगों का, अपनी केवल धार.’ व्यक्ति और समाज, भाषा और कवि के संबंध को लेकर जितने तरह के प्रश्न हो सकते हैं, यह कविता उन्हें अपनी तरह से व्यक्त करती है. जीवन का अर्थ क्या है? इसका भी अपनी तरह से संधान करती है.

लेखक होने के चलते मैंने बहुत सी यात्राएं कीं देश और विदेश की. लेखक होने के कारण ही मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. और जब यह पुरस्कार मिला, तो बहुत लोगों का विरोध भी मिला. हिंदी में इतना विरोध न पहले हुआ किसी का, न बाद में. भगवान न करे कि किसी और का हो भी. लेकिन जैसा कि मेरी आदत है, पुरस्कार में प्राप्त ताम्रपत्र वगैरह मैंने एक बक्से में बंद कर रख दिया. मेरे लिए और क्या महत्व था उसका! एक रोज मैं जब बक्से की सफाई कर रहा था, मैंने देखा कि उसमें लगे लकड.ी के स्तंभ को घुन खा गया. अंतत: सारे पुरस्कार और तमगों को घुन ही तो खा जाते हैं और जो बचती है, वो कीर्ति है.

मुझे लगता है जिंदगी में जीने का दो मौका मिलना चाहिए, एक अभ्यास का दूसरा वास्तविक. ऐसा हो, तो बचपन को मैं वैसे ही रखूंगा, जैसा 16 साल की उम्र तक मैंने जिया. अभाव के बावजूद बहुत भरा-पूरा बचपन. बाद का जीवन मैं बदल दूंगा. बिल्कुल निद्र्वंद्व होकर घूमूंगा. अलग-अलग समूहों के साथ रहूंगा. कोई नौकरी नहीं करूंगा. इससे बड.ा दुख दुनिया में नहीं है. अगर आप सचमुच रचना चाहते हैं, तो आपको कोई नौकरी नहीं करना चाहिए. लेकिन इसके लिए आपके पास टॉल्स्टॉय या रवींद्रनाथ टैगोर जैसी पृष्ठभूमि हो या फिर आप तुलसीदास, कबीर और निराला की तरह फक्कड. हों. इस फक्कड.पन के साथ मैं पूरी दुनिया घूमना चाहता हूं, पैदल. लेकिन इस फक्कड.पन के लिए साहस चाहिए. बडे. कवियों में ही यह साहस होता है.

स्कूल के दिनों से मुझे फिल्में देखने का बहुत शौक रहा है. अभी भी है लेकिन अब भाग कर और किताबें बेचकर फिल्में नहीं देखता. अब इतने पैसे हो गये हैं कि जब चाहूं फिल्म देख लूं. हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं की फिल्में भी देखता हूं. सत्यजीत रे की फिल्म ‘अपूर संसार’, और ‘पाथेर पंचाली’ पसंद हैं. विदेशी फिल्मों में सबसे प्रिय है अकीरा कुरासावा की ‘इकिरु’. यह मनुष्य के जीवन की अर्थवत्ता की खोज करनेवाली एक महान फिल्म है.

मुझे बचपन में सब्जियों की बागवानी का भी बहुत शौक था. लेकिन वह बचपन के बाद पूरा नहीं हुआ, क्योंकि उसके लिए जमीन चाहिए. एक शौक और है खाना बनाने का. इसमें मैं बहुत तरह के प्रयोग करता हूं. हालांकि खाना बनाना कविता से भी ज्यादा कठिन है, लेकिन इसमें प्रयोग की गुंजाइश बहुत है. क्योंकि खाना ही एक ऐसी चीज है, हर आदमी जिसके स्वाद को पहचान सकता है. साथ ही मुझे बिल्कुल सुनसान सड.क पर चलना अच्छा लगता है. अकसर मैं छुट्टियों की दोपहर, जब सड.कें अधिकतर खाली होती हैं, उनमें घूमता हूं.

मेरी बहुत इच्छा है एक उपन्यास लिखने की. मेरा मानना है कि अभी तक हिंदी में एक भी उपन्यास ऐसा नहीं, जो दुनिया के महान उपन्यासों की टक्कर का हो. मैं यह तो नहीं कहता कि इस कमी को पूरा करूंगा, क्योंकि यह तो असंभव है मेरे लिए. लेकिन यह इच्छा मेरी जरूर है कि मैं एक उपन्यास लिखूं. देखिये कब होता है.

२८ जुलाई, २०१३ के प्रभात खबर में प्रकाशित 

30 June 2013

हमें किसी का सम्मान नहीं चाहिए, कैसा भी आचार्यत्व नहीं चाहिए : नागार्जुन

हिंदी साहित्य में नागार्जुन का व्यक्तित्व अपने आप में अकेला है. वे प्रतिबद्ध कवि तो थे ही, ‘प्रतिबद्ध घुमक्कड.’ भी थे. काफी पहले नागार्जुन से प्रख्यात कथाकार मनोहर श्याम जोशी ने एक लंबा साक्षात्कार लिया था. यह साक्षात्कार एक तरह से नागार्जुन की छोटी जीवनी है. नागार्जुन की जयंती पर उस साक्षात्कार का संपादित अंश. : अखरावट 



नागार्जुन नामक इस व्यक्ति को, जो विष्णु नागर की कविताओं की प्रशंसा कर रहा है, जो मुझे यह बता रहा है कि उसने किसको चिट्ठी में क्या लिख दिया है, जो सुड.क-सुड.क कर अब चायपान कर रहा है, मैं जानता हूं और वर्षों से. किंतु बहुत निकट से नहीं. दूसरे शब्दों में यह कि मैं जानता तो हूं, मगर वैसे नहीं.. ‘ऐसे’ मैं क्या जानता हूं? यही कि बाबा भला आदमी है. हिंदी साहित्य में ‘भले आदमियों’ की एक अलग और दुर्लभ प्रजाति चली आ रही है. यह ‘भलापन’ कुछ-बहुत स्वभाव से मापा जाता है और बहुत-कुछ व्यक्ति विशेष के महत्वाकांक्षी न होने से. कहीं आडे. न आने से. भले आदमियों के बारे में बुरा सुनने का सुख एकांत में भी प्राप्त नहीं हो पाता. कोई सर्वज्ञ आपको अलग से ले जाकर कान में यह नहीं बताता कि ‘दरअसल इनका यह है कि.. समझ गये ना! हां..बस-बस-बस.’ मुक्तिबोध के उठ जाने के बाद भलेपन के क्षेत्र में बाबा और शमशेर भाई दो शीर्षस्थ प्रतियोगी माने गये हैं. वही स्वभाव की सरलता, सभी पीढ.ियों के लोगों में उठना बैठना, नये कृतिकारों की प्रशंसा करना, जिनसे भी संबंध रखना बहुत घरेलू और साहित्यिक स्तर पर, महत्वाकांक्षी न होना- सामाजिक और साहित्यिक दोनों ही स्तरों पर; कविताएं कहीं भी किसी भी कॉपी-डायरी में या कागज की चिंदी पर लिख देना, खो देना; आधुनिक बिरादरी में होने के बावजूद क्लासिकी और परंपरागत साहित्य में रुचि और गति रखना, और कम्युनिस्टों की नजदीकी के बावजूद पार्टी संगठन से न कोई विशेष प्रीति होना, न कोई विशेष प्राप्ति- ‘भाई’ और ‘बाबा’ में काफी समानताएं हैं. किंतु इस तथ्य को भी रेखांकित करना आवश्यक समझा गया है कि शमशेर ‘भाई ही हैं, ‘बाबा’ नहीं और नागार्जुन चाहे कितने भी भोले हों, आप उन्हें भाई-भाई वाले दावं में ला नहीं सकते. और फिर बाबाओं में ऐसा है कि खुश हो गये, तो वरदहस्त, उखड. गये तो त्रिनेत्र. नाराज़ी कुछ हलकों में नागार्जुन के भोलेपन का अवमूल्यन कराती आयी है. 

‘ऐसे’ मैं यह भी जानता हूं कि बाबा मसिजीवी हैं. रॉयल्टी वसूली की चिंता में कहते हैं,‘वहां से पैसा वसूलें, तो दो बोरा धान डलवा डलवा आयें, फिर निश्‍चिंत निकल जायें घुमक्कड.ी पर’ शायद ही कोई ऐसा साहित्यकार हो, जो लेखन और जीविका में, सृजन और अर्जन में इतना सीधा संबंध जोड.ता हो, और डंके की चोट पर, खंड काव्य लिख रहे हैं आजकल. थोड.ा पौराणिक-क्लासिक ऐसा थीम हो, तो खंडकाव्य झट कोर्स में लग जाता है. उपन्यास भी हम छोटा ही लिखते हैं. बृहद उपन्यास में झंझट है, आकार बड.ा होगा, तो कीमत भी ज्यादा होगी. कहां से खरीदेगा विद्यार्थी!

नहीं,‘साहित्यकार’ इस तरह नहीं बोलते, लेकिन नागार्जुन तो बाबा हैं..

..सवाल यह है कि ‘वैसे’ नागार्जुन क्या चीज हैं? अजी बगैर ‘वैसे’ हुए कोई लेखक-कवि हुआ है आज तक!
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वह घरवाली, वह गरीब ब्राह्मनी एक के बाद एक चार बाों को जन्म देती है, मगर बचता कोई नहीं. तब वैद्यनाथ धाम की विशेष सेवा करता है, मिसिर परिवार और जो बा जन्म लेता है, जीवित रहता है, उसका नाम रखा जाता है- वैद्यनाथ मिसिर. बुआजी का आग्रह होता है, इसे ठक्कन कहो! ठक्कन, ठगनेवाला, जो ठगने मात्र को आया है. कोईभरोसा नहीं, कब यह भी रूठ कर चला जाये. चश्मेबद्दूर ठक्कन कहने से शायद बच जाये. पसीजे कुछ और बना रह जाये यहां अपनी तिरस्कृता-उपेक्षिता मां की गोदी में.

‘हम गांव जायेंगे, तो बूढे. लोग अबभी बुलायेंगे, अरेठक्कन! नागार्जुन कहने से नहीं चीन्हेंगे- समझ गये ना?’

ठक्कन चार-पांच साल का था कि उसकी मां एक और बा जन कर अपनी उम्र के चालीसवें वर्ष में भगवान को प्यारी हुईं. ठक्कन को लगता है कि उसे अपनी मां का पिता द्वारा निरंतर अपमान किये जाने की स्मृति है.

..वितृष्णा, उसका बचपन इस एक शब्द में समेटा जा सकता है. यद्यपि पंडितों के घर जन्मा बालक भी चार साल की उम्र में इस शब्द को कहां जानता होगा! 

वितृष्णा होती थी हमको, समझ गये ना? चाची हमारी माता के लिए दो पैसा की दवा नहीं करने देती थी. हमको बराबर लगा कि पिता चाची के इशारों पर माता की उपेक्षा करते हैं. समझ गये ना! 

कवि नागार्जुन के बचपन में बांस-वन, कदली गाछ, काली घटा, आम्र मंजरी, पोखर-वोखर आप लाख ढूंढ.िये नहीं मिलेंगे. आप स्थापित करना चाहें, ठक्कन की स्मृति करने नहीं देगी. आपने सही कहा कि ‘बड. दिब लागल कदमक फूल’ लेकिन ठक्कन को कदंब के फूलोंवाला नहीं, वह गांव याद आता है, जहां कदम-कदम पर धर्म-मोक्ष के झंडाबरदार अर्थ-कामविषयक कानाफूसी करते थे. शायद ही किसी कवि की स्मृति में अपने गांव की इतनी गैर-रूमानी छवि हो, जितनी नागार्जुन के मन में है. तुलसी चौरा पर संझवाती-वंझवाती तो खैर हैइये नहीं, आप धरती-पुत्र की प्रगतिशीलता से धड.कती जिंदादिली भी यहां नहीं पाइयेगा. 

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राजनीति में भी बाबा का टूर बेढब रहा है. गांधीवादी, सुभाषवादी, समाजवादी, साम्यवादी, जयप्रकाशवादी, हर जमात में उठे-बैठे हैं. कहीं भी जमे नहीं हैं.’ 

फारवर्ड ब्लाकिस्ट हम इसलिए नहीं रहे कि सुभाष ने गलत निर्णय किया, तोजो-हिटलर से सांठ-गांठ कर ली. 

क्या सभी ने गलत निर्णय किये? कोई भी दल, कोई भी नेता ऐसा नहीं निकलता, जिसने अधिकतर निर्णय सही किये हों? 

जिसने जो गलत निर्णय किया, सो हमने कहा, साफ कहा, मुंह पर कहा. इससे न हम उनके शत्रु हो गये, न वे हमारे. राहुल जी की मने कोई कम आलोचना की हमने? प्रेम के क्षेत्र में उनकी महानता हमें कभी पसंद नहीं आयी. एक र्मतबा हमने उन्हें 36 प्रेमिकाओं-विवाहितों का हिसाब लगा कर दिया था. उनका तरंग में आकर लिखना, ढीलम-पोलम, जैसा का तैसा, यह हमें कभी ठीक नहीं लगा. कई बार उनसे बहुत बहस हुई. कहते थे कसने-मांजने का काम अगली पीढ.ी करेगी. उनकी महंतगिरी की हमने आलोचना की. प्रयाग के साहित्यिक महंतों पर जब हमने प्रहार किया, राहुलजी को भी नहीं बख्शा,यद्यपि मित्र कहते थे कि उनका नाम न लो, उन्हें मत घसीटो, वे अपनी राजनीतिक विचारधारा के हैं. 

विधिवत किसी भी दल के कार्यकर्ता नहीं बने. यद्यपि उन्हें कम्युनिस्ट समझा जाता है और उनका काव्य राजनीतिक रंग में रंगा हुआ है. ऐसा क्यों?

जब हम किसी स्थान में बसे ही नहीं, तब किसी राजनीतिक दल में कैसे बस जाते! आदमी किसी एक जगह रहता है, तभी न जाकर काम कर सकता है पार्टी का. ढोलक-मजीरा बजाने का ही काम ले भले, पर सुबह-शाम आरती के समय ढोलक- मजीरा बजाने के लिए उपलब्ध तो हो!

सुना बाबा झगड.ा हो जाता है, बहुत जल्दी? 

गलत बात को हम गलत कहते हैं. झगड.ा हो, हो. आपने ठप्पा लगाया, मैंने भी बगैर पूछे लगा दिया. आपने कहा अंगूठा टेको, हमने अंगूठा टिका दिया- वह हमसे नहीं होता. कम्युनिस्टों में संगठन बहुत टाइट किस्म का होता है. समाजवादियों का भी टाइट है, मगर कुछ कम. 

तो क्या बाबा संगठन के खिलाफ हैं?

हम संगठन के विरुद्ध नहीं हैं, लेकिन संगठन के साथ होने का मतलब अगर यह लगाया जाता हो कि हम अपने विवेक के शत्रु हो जायें, तो हमें स्वीकार नहीं. हम सर्वहारा के साथ हैं, अपनी राजनीति में, अपने साहित्य में, किंतु हमें इस विषय में किसी की लगायी कोई कैद मंजूर नहीं है. समझ गये ना? हमें जो करना है, अपनी तरह से करते हैं. हमें किसी का सम्मान नहीं चाहिए, कैसा भी आचार्यत्व नहीं चाहिए. 

आचार्यत्व से परहेज!

आचार्यत्व बहुत महंगा पड.ता है, समझ गये ना? एक होता है साहित्य, एक होती है साहित्य की राजनीति. हम साहित्यवाले हैं. हमारा वह नहीं है कि छह-सात कमेटियों की शोभा बढ.ा रहे हैं और साहित्य में कुछ कर-धर नहीं पा रहे. 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तो आचार्य थे?

वह निभा ले गये आचार्यत्व. यह हम जानते हैं. एक्सेप्शन होता है हर रूल का. बाकी आचार्यत्व का मतलब ही यह है कि साहित्यिक लुटिया डूबी. हमारे मित्र थे चतुरानंद मिर्श. नितांत प्रतिभाशाली. दो बहुत सुंदर उपन्यास लिखे. फिर राजनीतिक गति को प्राप्त हुए. रमेश सिन्हा का क्या हुआ! ओपी सिंघल का क्या हुआ! और नामवर! नामवर सिंह के लिए हमको बहुत दया आती है. इतना मेधावी व्यक्ति और एक लाइन नहीं लिख पाता, एक लाइन!

(यह साक्षात्कार मूल रूप से संभवत: 1981 में ‘आलोचना’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. ‘नया पथ’ के नागार्जुन विशेषांक, 2011 से साभार.)