23 October 2013

भुवनेश्वर की नजर में प्रेमचंद

इस महीने 8 तारीख (अक्तूबर) को प्रेमचंद की पुण्यतिथि थी. उस वक्त प्रेमचंद पर कुछ नया खोज रहा था, तब भुवनेश्वर की प्रेमचंद की मृत्यु  के बाद लिखी  इस ओबिचुरि से सामना हुआ. एक जीनियस पर दूसरे जीनियस की कलम से लिखा गया यह छोटा सा पीस आप भी पढ़ें। अखरावट


8 अक्तूबर ’36 को प्रेमचंद की मौत हो गयी. .

8 अक्तूबर ’36 को प्रेमचंद बहस-मुबाहसे, स्नेह और कटु आलोचना से परे हो गये. यह हिंदी के सबसे महान साहित्यिक का मामला है कि तुच्छ और खुदगर्ज मुबाहसे से परे होने के लिए 60 साल की उम्र में उसे मरना पड़ा, जिस उम्र में साहित्यिक कलमनवीसी से उपर उठता है, महात्मा और प्रेरक समझा जाता है और गोर्की के नाम पर शहर और वायुयान बनते हैं. प्रेमचंद को हिंदी का साधारण समादर भी नहीं मिल सका. वह अपनी प्रशंसक जनता के इतना निकट रहे कि उनका व्यक्तित्व सदैव नीरस बना रहा. पत्रिकाओं में कहानियां छपवाते, सिनेमा से धन पैदा करते, पुस्तकों की बिक्री के लिए साधारण प्रयत्न करते, 8 अक्तूबर, ’36 को प्रेमचंद की मौत हो गयी.

यदि प्रेमचंद का एक तुच्छ प्रशंसक आज यह लिखता है कि 8 अक्तूबर, ’36 को हिंदी-साहित्य की एक शताब्दी पर काल की मुहर लग गयी, तो वह एक ‘अति-प्रेमी’ के लांछन से कैसे बचेगा. प्रेमचंद हिंदी की एक शताब्दी थे. भविष्य का साहित्य इस युग से प्रेमचंद लेकर बाकी इत्मीनान से छोड़ देगा.
इसके अनेक कारण हैं.

यह नहीं कि उन्होंने 50 ऐसी कहानियां पैदा कीं, जो विश्व साहित्य में अपना स्थान बना सकती हैं
उन्होंने हिंदी साहित्य में एक नये जीवन का आह्वान किया. नहीं, उन्होंने साहित्य का असल रूप हिंदी को दिया, उन्होंने मौलिकता सृजित की, उन्होंने मौलिकता को एक द्रुत सजग वेश दिया, उन्होंने जैनेंद्र को पैदा किया.

प्रेमचंद की प्रतिभा और जीनियस खुद पैदा-करदां थी. वह शेली नहीं था. टैगोर नहीं था. शुरुआत में वह लिखने का शौ कीन था, बीच में वह एक कठिन संग्राम करता हुआ कलाकार और बाद में एक करेक्टर.
वह करेक्टर कैसा था?

ऐसा नहीं, जैसा गांधी या टॉलस्टॉय, जो संसार की सहस्र-फन विषमता को एक बिंदु पर आकर मिटा देता है, जो वस्तुतः कवि हो जाता है. उसका करेक्टर उनकी अनेकता थी.
ऐसी अनेकता, ऐसी वेराइटी की मिसाल विश्व साहित्य में भी नहीं मिलती. वह मोपांसा की मोर्बिडिटी से भी ऊंचा उठ गया.

उसके जीवन में एक स्वर सुनाई देता था कि वह समय के पीछे छूट गया, उसके साथी तो विक्टोरियन कलाकार थे और मरने के बाद वह विक्टोरियन हो ही गया. पर ऐसा विक्टोरियन, जो पूर्ण सहानुभूति में विश्वास रखता था, जो हनन करना भी जानता था, जो प्रकार और आकार में भेद कर सकता था, जो अपनी कला के लिए कच्चा माल लेने बार-बार सीधा, जीवन तक जाता था, जो समझता था, जो केवल विश्लेषक नहीं था.

हाँ,  वह फ्रायड के बाद का साहित्यिक था और सदा फ्रायद से दूर रहा. सेक्स एक बड़ी शक्ति है, पर साहित्य से उसका संबंध स्थापित करना कलाकार की इच्छा पर है. अगर उसने अपनी स्वतंत्रता से हम डीएच लारेंस और मोरिस डि कॉरन पढ़नेवालों को निराश किया तो वह कसूरवार नहीं है और न हम.

माधुरी, १९३६ में प्रकाशित

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