20 October 2013

मेरे पास लेखक बनने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था : एलिस मुनरो

2013 के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार पानेवाली कनाडा की एलिस मुनरो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों में गिनी जाती हैं. लम्बी कहानी का फॉर्म चुननेवाली मुनरो राजनीतिक कहानियाँ नहीं लिखतीं, मन के भीतर झांकती हैं. उनकी कहानियों में मनोविज्ञान, खासकर स्त्री मनोविज्ञान की गहरी पकड़ देखी जा सकती है. कनाडा के सुदूर हिस्से में अपना ज्यादातर वक्त बितानेवाली मुनरो का एक किसान की बेटी से नोबेल पुरस्कार पाने का सफ़र, विपरीत परिस्थितियों में एक साधारण स्त्री की महान उपलब्धि हासिल करने का सफ़र है. मुनरो पर गंभीरता पूर्वक और ठहरकर लिखा चाहिए। फिलहाल पेरिस रिव्यू और वर्जीनिया क्वार्टरली रिव्यू में छपे उनके साक्षात्कारों के कुछ अंशों को मिलाकर उनका एक आत्मवक्तव्य।।। अखरावट 



 मैं जब 21 साल की थी, तब से लगातार लिख रही हूं. आज मैं 81 साल की हूं. (इस साल 2013 में 82 वर्ष की उम्र में एलिस मुनरो ने लेखन से संन्यास लेने की घोषणा की).  जब मेरी पहली किताब प्रकाशित हुई, उस वक्त मैं करीब 36 साल की थी. मैं ये कहानियां वर्षों से लिख रही थी. आखिरकार रायर्सन प्रेस के एक कनाडाई प्रकाशक (बाद में इसे मैकग्रॉ-हिल ने खरीद लिया) ने मुझे खत लिखा और पूछा कि क्या मेरे पास इतनी कहानियां हैं, जिनसे एक किताब प्रकाशित की जा सके? उनकी योजना तीन लेखकों की एक सम्मिलित किताब निकालने की थी. यह योजना शक्ल नहीं ले पायी, लेकिन उनके पास मेरी कहानियां थीं. फिर उन्होंने वह प्रकाशन छोड़ दिया, लेकिन उन्होंने मेरी कहानियां एक दूसरे संपादक के सुपुर्द कर दीं. नये संपादक  ने मुझसे कहा कि अगर आप तीन और कहानियां लिख सकती हैं, तो आपकी एक किताब आ जायेगी. इस तरह मैंने तीन और कहानियां लिखीं, ‘इमेजेज’, ‘वाकर ब्रदर्स कॉवबॉय’ और पोस्टकार्ड. इनमें से ज्यादातर कहानियां टैमारैक रिव्यू में प्रकाशित हुई. यह एक छोटी सी अच्छी और साहसी पत्रिका थी.

मैंने जब लिखने की शुरुआत की, उस वक्त मेरी महत्वाकांक्षा उपन्यास लिखने की थी. मैंने कहानियां लिखनी शुरू कीं, क्योकिं मेरे पास जितना वक्त था, उसमें यही लिखा जा सकता था. मैं घर और बच्चों को संभालने के बीच से बहुत ज्यादा वक्त नहीं निकाल पाती थी. इन कामों से मुझे लिखने के लिए जितना वक्त मिलता था, उसमें उपन्यास नहीं लिखा जा सकता था. लिखते-लिखते मैंने कहानी का एक ऐसा फॉर्म (रूप) हसिल किया, जो कहानियों के लिए प्राय: इस्तेमाल नहीं किया जाता. मैंने परंपरा से अलग लंबी कहानियों का रूप विकसित किया. मुझे लगा कि मैं जो कहना चाहती हूं, वह लंबी कहानियों में ही मुमकिन है. यह शुरू में काफी कठिन था, क्योंकि कहानी एक ऐसी विधा है, जिससे लोग उम्मीद करते हैं कि यह बहुत बड़ी न हो. वह निश्चित लंबाई की हो. लोग छोटी कहानियां चाहते हैं और मेरी कहानियां इस मायने में थोड़ी अलग थीं कि वे बड़ी होती जाती थीं. जो कुछ अलग तरह की बातें कहती थीं. मैं खुद नहीं जानती, कम से कम ज्यादातर मौकों पर मैं यह  नहीं जानती कि कहानी कितनी बड़ी होनेवाली है. लेकिन मैं इसके अपने आकार हासिल करने पर आश्चर्यचकित नहीं होती हूं. उसे जितनी जगह चाहिए, मैं उसे देती हूं. वैसे भी, मुझे इस बात की कोई परवाह नहीं कि मैं जो लिख रही हूं उसे क्या नाम दिया जा रहा है, किस विधा के अंतर्गत रखा जा रहा है. इसे कहानी कहा जा रहा है, या कुछ और. या कुछ भी. यह अपने आप में एक कथा है और मेरे लिए इतना ही महत्वपूर्ण है.

मेरे लिए लिखना हमेशा काफी कठिन रहा है. जी हां, हर दौर मैं यह काफी कठिन रहा है. मैं बहुत धीरे-धीरे लिखती हूं. मैं अपने लिखे को कई बार लिखती हूं. लिखती हूं, फिर लिखती हूं. फिर लिखती हूं. इसके बाद मैं इसे छपने के लिए भेजती हूं. अकसर ऐसा होता है कि कुछ समय बीतने के बाद मैं इसे फिर से लिखना चाहती हूं. कभी-कभी ऐसा लगता है कि कुछ शब्द इतने महत्वपूर्ण और जरूरी हैं, कि उन्हें कहानी में जरूर से शामिल किया जाना चाहिए. मैंने कई बार अपनी कहानियों में उनके लिखे जाने के काफी बाद में सुधार किया है, जो अकसर गलत फैसला साबित हुआ. क्योंकि जब मैं सुधार कर रही थी, उस समय मैं उस कहानी की लय में बिल्कुल भी नहीं थी. कई बार ऐसा होता है कि जब मैं कहानियों को बाद में पढ़ती हूं, तो उसका कोई हिस्सा, कुछ शब्द मुझे खटकते हैं. मुझे लगता है कि इन शब्दों को जो काम करना चाहिए, वे नहीं कर पा रहे. फिर मैं उन्हें फिर से लिखती हूं. लेकिन जब मैं कहानी को फिर से पढ़ती हूं, तो वे कहानी के प्रवाह को भंग करते दिखते हैं. इसलिए, मैं ऐसा करने को लेकर ज्यादा आश्वस्त नहीं हूं. ऐसे व्यवहार से बचना चाहिए. एक बिंदु ऐसा होना चाहिए, जहां हम खुद से कहें कि अब यह कहानी मेरी नहीं है. जैसा हम बच्चे के लिए कहते हैं.

मेरे पास लेखक बनने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था, क्योंकि मेरे पास इतने पैसे नहीं थे. मुझे मालूम था कि मैं यूनिवर्सिटी में सिर्फ दो साल रहनेवाली हूं, क्योंकि मुझे मिल रहा वजीफा दो सालों के लिए ही था. यह मेरे जीवन में एक अवकाश की तरह था. वह एक सुनहरा दौर था. जब मैं बच्ची थी, तब पूरे घर की जिम्मेवारी मेरे ऊपर थी. इसलिए यूनिवर्सिटी का वक्त, मेरे जीवन का एकमात्र  ऐसा दौर था, जब मुझे घर का काम नहीं करना होता था. यूनिवर्सिटी का दूसरा साल खत्म होने के साथ ही मैंने शादी कर ली. उस वक्त मैं 20 साल की थी. हम लोग वैंकूवर चले गये. यह एक बड़ा क्षण था. इसके साथ रोमांच जुड़ा था. बाहर जाने का बसने का रोमांच. जल्दी ही हम एक ठीक-ठाक मध्यवर्गीय जीवन जीने लगे. हम एक घर लेने और एक बच्चे के बारे में सोच रहे थे और समय गंवाये बगैर हमने ऐसा कर भी लिया. मैं सिर्फ 21 साल की थी, जब मेरा पहला बच्चा हुआ. हां इस दौरान मैं  लगातार लिख रही थी. जब मैं गर्भ से थी, उस दौर में मैं काफी व्यग्रता के साथ लगातार लिखती रहती थी, क्योंकि मुझे यह डर था कि इसके बाद मैं कभी नहीं लिख पाऊंगी. हर बार गर्भ के दौरान मुझे इस ख्याल ने गहरे तक मथा कि मुझे बच्चे के जन्म से पहले कुछ बड़ा करना चाहिए. हालांकि, मैं इस दौरान मुझसे कुछ भी बड़ा नहीं हुआ. जब मेरे बच्चे छोटे थे, उस समय मेरे लिखने का वक्त तब आता था, जब वे स्कूल चले जाते थे. उन दिनों में मैं काफी मेहनत किया करती थी. मेरे पति और मेरी एक किताब की दुकान थी. जब मैं वहां काम करती थी, उन दिनों में भी मैं घर में दोपहर तक रहती थी. मुझे इस वक्त घर का काम करना होता था, लेकिन मैं इसी समय में लिखा भी करती थी. बाद में, जब मैं हर दिन बुक स्टोर नहीं जाती थी, मैं तब तक लिखा करती थी, जब तक सभी लोग दोपहर के खाने के लिए घर लौटकर नहीं आ जाते थे. जब वे करीब ढाई बजे के करीब चले जाते थे, मैं अपने लिए जल्दी में  एक कप कॉफी बनाती थी, फिर घर का काम करती थी. मेरी कोशिश होती थी कि मैं शाम होने से पहले सबकुछ निबटा लूं.

लोग कहते हैं कि मेरी भाषा कवितामय है. मैं कविताएं आज भी यदा-कदा लिखती हूं. मुझे कविता का विचार पसंद है. लेकिन जब आप गद्य लिख रहे होते हैं, तब आपको इस बात को लेकर हमेशा सचेत रहना पड़ता है कि आप गद्य को जानबूझ कर कवितामय न बना दें. गद्य की भाषा में पैनापन होना चाहिए. और अब मुझे इसी तरह लिखना पसंद है.

हां मुझे  लोक-कथाएं आकर्षित करती हैं. लेकिन, एक लेखक होने के नाते यह किसी को नहीं पता होता कि वह किस ओर आकर्षित होगा. आप पहले से कुछ तय नहीं करते. अचानक आपको एहसास होता है कि हां, मुझे यह लिखना है. ऐसे लिखना है. हां, यह जरूर है कि लोग जो कहानियां सुनाते हैं, मैं उन्हें ध्यान से सुनती हूं. उनकी लय को पकड़ने की कोशिश करती हूं और फिर लिखने की कोशिश करती हूं. मैं सोचती हूं कि लोगों को आखिर इस तरह की कहानियां इतनी पसंद क्यों आती हैं? वे उनके लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों हैं? हम लोगों से ऐसी कई कहानियां सुनते हैं, जो जीवन की विचित्रता को बयान करती हैं. मैं ऐसी कहानियां उठाती हूं, और देखने की कोशिश करती हूं कि वे मुझसे क्या कहना चाहती हैं या फिर मैं उनसे कैसा व्यवहार करना चाहती हूं.

लोग कहते हैं कि लोक-कथाएं औरतों की विधा है. मुझे यह काफी हद तक सच मालूम पड़ता है. वैसी औरतें, जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता था, यहां तक कि जब औरतों ने लिखना सीख लिया और वे लिख सकती थीं, तब भी वे कहानियां सुना रही थीं. औरतें आपस में काफी वक्त गुजारती हैं. मुझे याद है पहले औरतों को खूब खाना बनाना पड़ता था. मेरे बचपन में पुरुष खेतों में काम करते थे, जब वे काम से वापस लौटते थे, तब उन्हें खूब विस्तार से खाना परोसा जाता था. खाना जितना भव्य होता था, वह जितना स्वादिष्ट होता था, औरतें उतनी गौरवान्वित होती थीं. खाने के बाद बर्तनों का अंबार होता था और औरतें साथ मिलकर उसे साफ करती थीं. इस पूरी प्रक्रिया में वे आपस में बात कर रही होती थीं. जरूर यह काफी पुरानी बात हो चुकी है. यह गांव के जीवन की बात है. मुझे नहीं पता अब औरतें अभी भी इस तरह से बात करती हैं या नहीं?  लेकिन औरतें जब भी मिलती हैं, मुझे लगता है उनके भीतर कहानियां सुनाने की इच्छा कुलबुलाती है. वे एक-दूसरे से यह सवाल पूछना चाहती हैं, ‘तुम्हें क्या लगता है,  ऐसा क्यों हुआ?’, ‘ऐसा कहना अजीब नहीं था?’, ‘इसका क्या मतलब है?’ औरतों में शायद एक आदत होती है. वे जीवन को मौखिक रूप से व्याख्यायित करना, उसे समझना चाहती हैं. जितने पुरुषों को मैं  जातनी हूं, या जानती थी, उनमें  ऐसी कुलबुलाहट मैंने नहीं देखी. वे चीजों के बारे में ज्यादा नहीं सोचते.

यह एक वजह हो सकती है कि मैंने कहानी की विधा को चुना या कह सकते हैं कि कहानी की विधा ने मुझे चुन लिया. मुझे लोगों के साथ, उनकी बातचीत, उनके जीवन में आनेवाले आश्चर्यों पर काम करना पसंद है. मेरे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है, कि आप जिस चीज की उम्मीद नहीं कर रहे थे, वह आपके साथ हो जाये. मेरी  एक कहानी ‘रनअवे’ में एक औरत  जिसका दांपत्य जीवन काफी कठिनाइयों भरा रहा है अपने पति को छोड़ने का फैसला करती है. एक उम्रदराज और तार्किक औरत की बातों से उसे ऐसा करने का हौसला मिलता है. और जब वह बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ाती है, वह महसूस करती है कि वह ऐसा नहीं कर सकती. यह समझदारीभरा फैसला है. उसके पास उस जीवन से बाहर आने के कई कारण हैं, लेकिन वह  ऐसा नहीं कर सकती. आखिर  ऐसा क्यों होता है? मैं ऐसे विषयों पर लिखती हूं, क्योंकि मुझे यह नहीं पता कि आखिर ऐसा क्यों होता है? लेकिन मेरे लिए जरूरी है कि मैं ऐसी घटनाओं की ओर ध्यान दूं. इनमें  ऐसा कुछ है, जो ध्यान दिये जाने की मांग करती हैं.

मेरा जीवन में कई कठिनाइयां आयीं, लेकिन मेरे हिस्से में किस्मत भी थी. अगर मैं अपने से पहले की पीढ़ी के किसान की बेटी होती, तो मेरे लिए कोई संभावना नहीं होती. लेकिन जिस पीढ़ी में मैं थी, वहां छात्रवृत्तियां थीं. हालांकि, लड़कियों को उसके लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था, लेकिन लड़कियां उसे हासिल कर सकती थीं. मैं काफी उम्र में अपने लिए सोच सकती थी कि मैं एक लेखक बनूंगी.  और मैं आपको बता दूं कि कोई और ऐसा या इस तरह का नहीं सोचता था. लेकिन यह कोई सपनीली राह नहीं थी. जब मैं किशोर थी तब मैं खूब शारीरिक काम किया करती थी, क्योंकि मेरी मां ज्यादा काम नहीं कर सकती थी. लेकिन यह मुझे रोकने के लिए काफी नहीं था. मुझे लगता है, एक तरह से यह मेरी खुशकिस्मती थी. अगर मैं न्यूयॉर्क में किसी काफी धनी परिवार में जन्मी होती, ऐसे लोगों के बीच जो लेखन के बारे में सबकुछ जानते होते, तो मैं पूरी तरह से  नष्ट हो जाती. मुझे लगता कि मैं ऐसा नहीं कर सकती. लेकिन क्योंकि मेरे आसपास ऐसा कोई नहीं था, जो लिखने के बारे में सोचा करता था, इसलिए मेरे अंदर यह विश्वास आया कि ‘हां, मैं यह कर सकती हूं.’





1 comment:

  1. अति सुन्दर... सभी लेखक भाई-बहनों के लिए प्रेरणास्रोत.... धन्यवाद ..अवनीश जी...

    ReplyDelete

Follow by Email