20 November 2014

कविता में कहने की आदत

हिंदी के मौजूदा फैशन की अवहेलना करते हुए इस समीक्षा में युवा कवि उमाशंकर चौधरी की नहीं , उनकी कविताओं की आलोचना की गयी है. समय हो तो पढ़ें. 
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महान डच चित्रकार वाॅन गाॅग के जीवनकाल में उनके चित्रों की प्रशंसा करनेवाले कम ही थे। खुद वाॅन गाॅग को अपने बनाए चित्रों में कमियां नजर आती थीं। कभी रंगों के ज्यादा गहरे हो जाने पर, कभी रेखाओं को न साध पाने पर खीज होती थी। हताशा के क्षणों में, या इस हताश कर देनेवाले जीवन में वे अनवरत चित्र बनाते रहे। बस इसलिए कि चित्र बनाना ही उनके लिए जीवन था। रंगा हुआ कैनवस खाली कैनवस से अच्छा लगता था। वाॅन गाॅग के चित्र उनके दौर के कला व्यवसायियों, पारखियों के सौंदर्यबोध से मेल नहीं खाते थे। जाहिर है, वाॅन गाॅग का संघर्ष कला की कसौटी का था। हर फनकार को, हर नये कवि को यह संघर्ष करना पड़ता है। करना चाहिए।

युवा कवि उमा शंकर चैधरी का नया कविता संग्रह ‘‘वे तुमसे पूछेंगे डर का रंग’’ पहली नजर में एक नये कवि के इसी संघर्ष को बयान करता है। यह संग्रह हमें याद दिलाता है कि हमारा समय पल-पल बदलता नया समय है, जिसकी सतत व्याख्या की जानी चाहिए। उसे नये तरीके से समझा और दर्ज किया जाना चाहिए। कवि की इच्छा अपने समय में एक मामूली सी ही सही, लेकिन सार्थक हस्तक्षेप की है। हमारे समय में हस्तक्षेप करना क्या है? कवि का हस्तक्षेप, इसके अलावा क्या हो सकता है कि वह जब चारों ओर ‘हां’ या ‘ना’ की प्रायोजित मुद्राएं हैं, वह सच को सच और झूठ को झूठ बोल सके, बगैर इस बात की चिंता किये कि उसके शब्द सत्ता के दुर्गद्वार से टकराकर लौट आने को अभिशप्त हैं।

इस संग्रह की कविताएं अपने वर्तमान में आबद्ध हैं। कवि वर्तमान समय की भयावहता को समझने की कोशिश करता है। बड़ी बात यह है कि उसे इस बात की समझ है कि जो कुछ हमारे-इर्द गिर्द हो रहा है, उसका सिरा अनिवार्यतः राजनीति से जुड़ा है। यह बात दीगर है कि उसकी राजनीतिक विचारधारा स्पष्ट होकर सामने नहीं आती। संग्रह की पहली कविता ‘प्रधानमंत्री लेते हैं निर्णय और हम डर जाते हैं’, कवि के इस समझ का पुख्ता सबूत है। कवि महसूस करता है कि देश के मुखिया की चिंता, आम आदमी की चिंताओं से कितनी मुख्तलिफ है। यह सत्य कवि को डराता है और यह सिर्फ उसका डर नहीं है, हम सबका डर है। सत्ता का डर बेटी के गुल्लक में रखे पैसे की हिफाजती का डर बन जाता है। जब तक हम डरते हैं, किसान देखता है कि ‘‘बीज जो उसने बोये थे सब बांझ हो गये।’’ डर यह कि हर संदेश जो सत्य के तौर पर हम तक प्रेषित किया जा रहा है, वह किस तरह छल-प्रपंच में बदल गया है। सत्य, फेंटैसी- यानी ‘दिल को खुश रखने को गालिब यह ख्याल अच्छा है’ में बदल गया है। ‘बिहार में बाढ़: कुछ दृश्य, या ‘इरोम वहीं बैठी है’, फेरबदल, ‘प्रधानमंत्री पर अविश्वास’, ‘मौन की कोई भाषा नहीं होती’, ऐसी ही राजनीति से जुड़ी कविताएं हैं।

‘रात का घुप्प अंधेरा और वह लड़की’ कविता षड्यंत्र भरे समय की सच्चाई को बयान करती है। कवि के अंदर एक अजब सी बेचैनी है कि नयी-नयी सूचनाओं की बरसात के बीच भी चीजें कही जानी चाहिए। दोहरायी जानी चाहिए। बस इस कारण कि कुछ चीजें पहले भी कही जा चुकी हैं, गैरजरूरी नहीं हो जातीं। यहां एक लक्षित किये जाने लायक प्रतिबद्धता है। वह विस्मृति के रिसाइकिल बिन में डाल दी गयी चीजों को दोहराता है। यह अपने आप में एक लेखकीय जोखिम है। वह चित्र खींचता है महानगर के पाॅश इलाके में ठेले पर सब्जी बेच रहे पंद्रह साल के बच्चे का। अगले ही पल शहर से दूर देश के आदिवासियों के आवास वाले जंगलों में माओवाद से लड़ने के नाम पर हो रहा युद्ध, इस तस्वीर को काटता है। कविता को एक साथ दो सुदूर भूगोलों में स्थापित करना चीजों के आपसी संबंध को नये सिरे से परिभाषित करने की कोशिश है। विभिन्न सत्ताओं द्वारा लोगों को अलग-अलग दुनियाओं में, उनके संघर्षों के बीच कैद कर दिया गया है और इस तरह कंधे से कंधा मिलाकर प्रतिरोध करने की संभावना भी खत्म कर दी गयी है। ‘शिमला के माॅल रोड पर’ कविता पीठ पर सिलिंडर और जरूरत के दूसरे सामान लादकर पहाड़ चढ़ते और आज की सभ्यता को अपने पसीने से सींचते मेहनतकशों के साथ खड़े होने की बेचैनी की उपज है। ‘शब्द मुसलमान’ कविता हर दिन देशभक्ति के सलीब पर चढ़ते मुसलिम समाज का आईना है, तो ‘आश्चर्य तब हुआ’ इस व्यवस्था में स्वाभाविक चीजों के अस्वाभाविक और अविश्वसनीय हो जाने की त्रासद विडंबना को बयान करता है। हमारे समय की भयावहता को इसी तरह से पकड़ने की कोशिश की गयी है, ‘अब खून नहीं डर बह रहा है’ और ‘इन दिनों’ कविता में। भयावह समय का यह चित्र बेहद सशक्त है, ‘‘इन दिनों धीरे-धीरे बच्चों की भूख मरने लगी है/ आंसुओं का खारापन बढ़ने लगा है/ लोगों ने अपने दुख-दर्द के बारे में/ बातें करनी कम कर दी हैं/ कम कर दिया है उन्होंने अब लोकतंत्र के बारे में सोचना/ इन दिनों सचमुच बढ़ गयी है आदमी में तकलीफ सहने की क्षमता।’’ ऐसी ही एक कविता है- ‘क्रम’। यह कविता एक बयान है। ‘‘जो क्रम में हैं वे तमाशबीन की तरह देखते रहेंगे टुकुर-टुकुर।’’ सत्ता का पूरा चरित्र इस एक पंक्ति में खुल जाता है।

एक बड़ी बात है कि कवि के पास दुनिया को देखने की निजी दृष्टि है। यही वजह है कि वह कल्पना कर पाता है कि ‘‘क्या राहुल गांधी की बंडी की जेब में होता होगा स्टेट बैंक का एटीएम कार्ड/दिल्ली मेट्रो का स्मार्ट कार्ड...।’’ यहां एक विलक्षण कथ्य है। फेंटैसी और यथार्थ को मिलाकर यहां अपने समय के विरोधाभास को उभारने की कोशिश की गयी है। इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा कि ‘‘राहुल गांधी ही क्यों ऐसे बहुत से लोग हैं/ जिनकी जेबों में नहीं है कुछ और वे खुश हैं।’’ दरअसल जिनकी जेब में सत्ता की ताकत है,  फिर चाहे यह सत्ता राजनीति की हो या पूूंजी की, उन्हें न वर्तमान की चिंता है, न भविष्य को सुरक्षित करने की बेचैनी।
इस संग्रह की कई कविताएं निजी किस्म की हैं। उमाशंकर चैधरी ने मां, पिता बेटी, बहन,  प्रेमिका के संबंधों पर भी कविताएं लिखी हैं, लेकिन ये व्यक्तिगत होते हुए भी काफी हद तक सामाजिक हैं। एक ऐसे समय में जब हर रिश्ते के बीच समय का संघर्ष दीवार बन कर खड़ा है, संबंधों को इस तरह याद करना अच्छा लगता है। हमारे होने, हमारे ‘बीइंग’ में संबंधों की क्या अहमियत है, इसे रेखांकित करना एक बड़ा सामाजिक कर्म है। पिता पर कविता-‘सोचना पिता के बारे में’ की ये पंक्तियां आपको ठहर कर कुछ याद करने पर विवश करती है। आपको आर्द्र करती है- ‘‘एक दिन पिता नहीं रहेंगे/ मैं सोचता हूं और कांप जाता हूं/ मैं आकाश की ओर देखता हूं/ और सोचता हूं कि क्या आकाश भी एक दिन नहीं रहेगा।’’

इस संग्रह में तीन-चार कविताओं का विषय लड़की या स्त्री है। ऐसी कविताएं जब पुरुष लिखते हैं तो पाॅलिटिकली करेक्ट हो पाना, स्त्री की तरफ से सहानुभूतिपूर्वक सोच पाना चुनौतीभरा होता है। ‘‘उसे डर लगता है पुरुष के इनकार से’ की पंक्तियां हैं, ‘एक जवान, सुंदर और शादी के लिए तैयार लड़की को/सबसे अधिक डर लगता है/उसकी जिंदगी में आनेवाले पुरुष से/ और पुरुष के इनकार से।’’ यहां कवि अपने निष्कर्ष में एफर्मेटिव है, जबकि कविताओं में खासकर अगर आप पहले से ही जोखिम के क्षेत्र मे कविता कर रहे हैं, तो ऐसे निष्कर्षोंे से बचा जाना चाहिए। ‘आखिरी नहीं पहली पसंद’ कविता में इसलिए एक लड़खड़ाहट है।
उमाशंकर चैधरी की कविताएं एक ऐसे कवि की कविताएं हैं, जो अपने लिए शिल्प की तलाश कर रहा है। ये कविताएं, कविता और वृत्तांत के बीच कहीं स्थित हैं। फिर भी नये अर्थों में इन्हें ‘नये किस्म की कविता’ कहा जाये, इसके लिए अभी उन्हें और संघर्ष करना होगा। मुक्तिबोध ने बेहद संकोच के साथ लिखा था, ‘कविता में कहने की आदत नहीं, फिर भी कह दूं’, लेकिन उमाशंकर चैधरी अपनी कविता का इस्तेमाल मूल रूप से ‘कहने’ के लिए करते हैं। ‘काश बहन ने प्रतिकार किया होता’, कविता इसका प्रमाण है। यह कविता से ज्यादा वृत्तांत है। वृत्तांत किसका? सामंती सांचे में ढले हुए एक युवक का। ‘कहां है रानी का शयनकक्ष’ ‘चाय की दुकान पर पिता’ और ‘मां से पिता क्या बहुत दूर थे’ जैसी कविताओं में यही वृत्तांत है और शब्दों की फिजूलखर्ची भी। ‘चाय की दुकान पर पिता’ कविता तो पूरी कहानी कह दी गयी है। जहां वे खुद को इस आग्रह से बचाने में कामयाब हुए हैं, वहां उनकी कविता रवां होती दिखाई देती हैं।

उमाशंकर चैधरी अपनी कविता में पाठक के लिए समझने की खातिर कुछ नहीं छोड़ना चाहते। यह उनकी कविताओं में अक्सर अतिरिक्त विस्तार लाता है। उनकी कविताएं विचारों पर फिटिंग वाले कपड़े की तरह नहीं आतीं। दरअसल ये कविताएं एक बन रहे, अपना स्थान ढूंढ़ रहे कवि की कविताएं हैं। बोलते-बतियाने की शैली को कविता का गुण माना जाता है। लेकिन अभी उमाशंकर चैधरी ने इस शिल्प को पूरी तरह साधा नहीं है। वे ‘कहने’ को लेकर इतने आग्रही हैं कि अक्सर कविता का ‘कविता’ होने का आग्रह छूट जाता है। उमाशंकर चैधरी संभवतः वाॅन गाॅग से सीख सकते हैं, जिन्होंने कभी पेंटर बनने का आग्रह नहीं किया, चित्र को बिल्कुल नया और मुकम्मल रूप देने का संघर्ष किया। अगर वे अपने शिल्प को लेकर ज्यादा सतर्क रहें, उसे साधनापूर्वक अर्जित करें, शब्दों की फिजूलखर्ची से बचें, तो आनेवाले समय में उनकी कविताएं निश्चित ही अपना नया फाॅर्म लेकर सामने आएंगी, क्योंकि उनके पास कहने को काफी कुछ है। इस संग्रह मे विषयों और बिंबों की विविधता इसका संकेत करती है।
अंत में एक बात, इस संग्रह की सारी कविताएं ‘इटैलिक्स’ में क्यों छपी हैं, यह समझ से परे है।

 - उम्मीद के ताजा अंक में प्रकाशित 



9 November 2014

पैट्रिक मोदियानो: स्मृति का संरक्षक


साहित्य के लिए २०१४ के नोबेल पुरस्कार विजेता पैट्रिक मोदियानो ऐतिहासिक ज्ञान की भंगुरता को पाठक के सामने लाते हैं। वे पाठक की राष्ट्रीयता पर ध्यान दिये बगैर, उसे बताते हैं कि निजी और सामूहिक दोनों ही पहचान वाष्पशील होती हैं और भले ही अतीत हमारे हाथों की पकड़ में न आये, लेकिन वह हमारे वर्तमान का  निर्धारण करता है। पैट्रिक मोदियानो को समझने के क्रम में मूल रूप से पाखी  के ताजा अंक के लिए लिखे गए लेख को आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं
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‘‘भूलने की क्षमता रखनेवाले लोग खुशनसीब होते हैं, क्योंकि वे अपनी गलतियों से भी आसानी से उबर जाते हैं।’’
. -फ्रेडरिक नीत्शे

पैट्रिक मोदियानो 
भूलना एक सुविधावादी कर्म है। जेन आॅस्टन ने अपनी किताब ‘परसुएशन’ में लिखा है, ‘जब  दर्द बीत जाता है, तब उसे याद करना सुख देता है।’  लेकिन क्या हो अगर गलती व्यक्ति की नहीं, इतिहास की हो? क्या हो अगर इतिहास, चेतना की किसी दरार में आकर फंस जाए? अतीत को पोंछ कर मिटा देना, जीने के लिए जरूरी है, लेकिन यह हमेशा मुमकिन नहीं होता। कुछ लोग, कुछ पीढि़यां, कुछ समुदाय अतीतग्रस्त होते हैं। अतीत उनके सामने बीता हुआ कल नहीं होता, बल्कि हर लम्हा साथ चलता है। सीने पर रखे किसी बोझ की तरह, जिससे कोई निजात नहीं है। जिसके साथ जीना, अनिवार्यता है। मजबूरी है। इतिहास और स्मृति के साथ कुछ ऐसा ही रिश्ता है 2014 के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार से नवाजे गये फ्रेंच उपन्यासकार पैट्रिक मोदियानो का।

फ्रेंच उपन्यासकार पैट्रिक मोदियानो को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा वैश्विक साहित्यिक जगत के लिए चकित कर देनेवाली खबर थी। यह बात दीगर है कि पुरस्कार घोषणा से चैबीस घंटे पहले अचानक नोबेल पुरस्कारों के सट्टा बाजार में मोदियानो का भाव बढ़ गया था और पुरस्कार जीतने की उनकी संभावना को लेकर अटकलें तेज हो गयी थीं। इसके बावजूद ‘फेवरिट’ के तौर पर केन्याई लेखक न्गुगी वा थियोंग’ओ और जापानी लेखक हारुकी मुरुकामी का नाम सूची में आखिरी समय तक सबसे ऊपर बताया जा रहा था। थियोंग’ओ पिछले कुछ वर्षों से पुरस्कार की दौड़ में आगे माने जाते रहे हैं, लेकिन एक बार फिर जब विजेता के नाम की घोषणा हुई, तब उनके नाम की जगह साहित्य बिरादरी के लिए लगभग अनजान रहे पैट्रिक मोदियानो का नाम दुनिया ने सुना।

नोबेल पुरस्कार समिति ने मोदियानो को पुरस्कार देने की घोषणा इस प्रशस्ति के साथ की ‘‘फाॅर द आर्ट आॅफ मेमोरी, विद विच ही हैज इवोक्ड द मोस्ट अनग्रास्पेबल ह्यूमन डेस्टिनीज एंड अनकवर्ड द लाइफ वल्र्ड आॅफ आॅकुपेशन’’ इसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह किया जा सकत है, ‘‘ स्मृति की कला के लिए, जिसके सहारे उन्होंने व्याख्याओं से परे इंसानी नियतियों की कथा कही है, और (नाजी) अधिग्रहण के दौर की दुनिया को पूरी जीवंतता के साथ उजागर किया है।’’

यह पहली बार नहीं है, जब नोबेल अकादमी ने व्यापक साहित्यिक बिरादरी के लिए लगभग अनजान रहे एक लेखक को पुरस्कार से नवाजा है। पिछले दो वर्षों की ही बात करें, तो चीनी लेखक ‘मो यान’ और कनाडाई लेखिका ‘एलिस मुनरो’ को नोबेल पुरस्कार से नवाजने की घोषणा के बाद भी कुछ इसी तरह की आश्चर्यमिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं। बहरहाल, हमारे पास मोदियानो को समझने के लिए जो सामग्री मौजूद है, वह कुछ अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं और नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद उन पर प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों में बिखरी है।  मोदियानों ने अब तक 25 से ज्यादा उपन्यास लिखे हैं, लेकिन इनमें से गिने-चुने उपन्यासों का ही अंगरेजी में अनुवाद हुआ है। एक तथ्य यह भी है कि नोबेल पुरस्कार मिलने के वक्त मोदियानो के उपन्यासों के अंगरेजी अनुवाद दुकानों में उपलब्ध नहीं थे। इनमें से ज्यादादर ‘आउट आॅफ प्रिंट’ हैं। ऐसे में मोदियानो पर कोई भी लेखन सेकेंडरी सोर्सेज पर ही आधारित हो सकता है और कुछ हद तक आॅनलाइन दुकानों पर उपलब्ध ‘सर्च वारंट’ (मूल रूप से फ्रांसीसी में ‘दोरा ब्रुदेर’ शीर्षक से प्रकाशित) जैसी ई-बुक के आधार पर। तो, फिलहाल हमारे सामने सवाल यह है कि पैट्रिक मोदियानो को अकादमिक-साहित्यिक जगत किस तरह से देखता है, उनके लेखन के बारे में कैसी राय रखता है? पिछले तीन-चार दशकों में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, जर्नलों तथा किताबों में मोदियानो के रचनाकर्म पर लेखकों की टिप्पणियां उनके बारे में क्या कुछ बताती हैं? इसके साथ ही संक्षिप्त साक्षात्कारों, अपनी आत्मकथात्मक उपन्यासों और अपनी आत्मकथा ‘अन पेडिग्री’ में मोदियानो ने अपने जीवन और अपने लेखन के बारे जो कुछ कहा है, उसके सहारे भी उनक लेखन जगत को जानने की कोशिश की जा सकती है।

पैट्रिक मोदियानो का लेखन उनकी यहूदी पहचान के साथ गुत्थमगुत्था है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान फ्रांस पर नाजी कब्जे (1940-44) के ठीक बाद जन्मे मोदियानो का लेखन, दार्शनिक शब्दावली में कहें, तो ‘व्हू आई एम’, यानी ‘मैं कौन हूं’ के सवाल के जवाब की तनाव भरी अंतहीन खोज है। मोदियानो के ज्यादातर उपन्यास ‘पहचान’ की भूल-भूलैया में विचरण करते हैं। उनका मूल मकसद इतिहास के तहखाने छिपे चिह्नों के सहारे अपने अस्तित्व, अपने ‘होने’ का प्रमाण हासिल करना है। मोदियानो इतिहास के जिस खंड की यात्रा करते हैं, वह मूलतः फ्रांस के यहूदियों के जीवन के बिखरने का और यहूदियों के साथ फ्रांस के विद्वेषपूर्ण और गैर-दोस्ताना व्यवहार का इतिहास है। उनके उपन्यासों का लोकेल मुख्यतः पेरिस की गलियां और रास्ते हैं, और वक्त है फ्रांस पर नाजी कब्जे का। उनके उपन्यासों में पेरिस की गलियों के नाम, कैफे, छोटे-छोटे वाकये, इतनी प्रामाणिकता के साथ आते हैं कि उन्हें ‘साहित्यक पुरातत्वशास्त्री’ कहा जाने लगा है। ऐसा इसलिए, क्योकि मोदियानो की कलम जमींदोज हो गये इतिहास के उत्खनन का काम करती है।

फ्रांस के इतिहास के उस शर्मसार कर देनेवाले दौर में ‘क्या हुआ’, की तफ्तीश, मोदियानो के लेखन का केंद्रीय तत्व है। मोदियानो हमें इतिहास के उस दौर में ले ले जाते हैं, जिसे ‘शिफ्ट-डिलीट’ मार कर मिटाने, गुमशुदगी के बियाबान में धकेलने की तमाम कोशिशें की गयी हैं। मोदियानो के साहित्यिक परिदृश्य पर आगमन से पहले एक देश के तौर पर फ्रांस इन चार वर्षों को स्वीकारने, उससे नजरें मिलाने के लिए शायद ही तैयार था। फ्रांस को सामूहिक विस्मृति का पाठ पढ़ाया जा रहा था। विस्मृति, इसलिए ताकि किसी अपराधबोध के बिना जिया जा सके। पैट्रिक मोदियानो का लेखन इतिहास और स्मृति की पुनर्खोज, पुनर्संधान और उस इतिहास में अपना अंश खोजने का सतत उपक्रम है।

पैट्रिक मोदियानो के उपन्यास फ्रेंच इतिहास और स्मृति के एक बेहद तनाव भरे दौर के बारे में, जिसे फ्रांस की ‘एकल पहचान’, ‘एकल भाषा’, ‘एकल संस्कृति’ के चादर के भीतर ढकने की पूरी परियोजना विश्वयुद्धोत्तर काल में चली, को लेकर असहज करने वाले सवाल पूछते हैं। मोदियानो फ्रेंच होने के गौरव को कटघरे में खड़ा करते हैं। उसके वर्तमान को इतिहास के सवालों से समस्याग्रस्त करते हैं। यूरोप में आज की तारीख में ऐसे लेखक बहुत कम हैं, जो आधुनिक यहूदी इतिहास से इस तरह आक्रांत, इस तरह ग्रस्त हंै। ‘दोरा ब्रुदेर, जिसमें उन्होंने पोलैंड के आस्विट्ज कैंप में भेजी गयी एक युवा लड़की की पहचान तलाशने, उसकी तस्वीर उकेरने की कोशिश की गयी है, समेत उनके तमाम उपन्यास द्वितीय विश्वयुद्ध कालीन फ्रांस की परिस्थितियों से बेहद गहराई से प्रभावित हैं।

मोदियानो ने एक साक्षात्कार में कहा था कि उनकी स्मृति, उनके जन्म से पहले शुरू होती है। यह अर्जित की गयी स्मृति है। मोदियानो अपने लेखन में इस स्मृति को पुनर्जीवित करने की कोशिश नहीं करते, बल्कि हाथ से फिसल गये, लेकिन आत्मा से गुंथे हुए अतीत को सामने लाकर उससे मुक्त होना चाहते हैं। ‘ला फिगोरो’ को दिये गये एक साक्षात्कार में मोदियानो कहा था, ‘‘लंबे समय से मुझे एक ही सपना बार-बार आता रहा है। मैं स्वप्न देखता हूं, कि मुझे अब लिखने की जरूरत नहीं है, कि मैं मुक्त (स्मृति से) हो गया हूं। लेकिन मैं, मुक्त नहीं होता। मुझे हमेशा लगता है कि मैं एक ही जमीन को बार-बार साफ कर रहा हूं और यह यह काम कभी समाप्त नहीं होता।’’ 2011 में फ्रांस टुडे को दिये गये एक साक्षात्कार में मोदियानो ने कहा था, ‘‘ अपने हर उपन्यास के बाद मुझे लगता है कि मैंने अपने बोझ को हटा दिया है, लेकिन मुझे यह मालूम होता है कि मैं बार-बार इस ओर (इस समय, इस इतिहास में) आऊंगा। उन छोटे-छोटे नामालूम से ब्यौरों से जूझूंगा, जो मेरे होने का हिस्सा है। आखिरकार हम सब की  नियति उस समय और जगह से जुड़ी होती है, जिसमें हम जन्मे होते हैं। मोदियानो ने एक से अधिक बार यह स्वीकार किया है कि लगभग पचास वर्षों के अपने लेखन कॅरियर में वे एक ही किताब लिख रहे हैं। दिलचस्प यह है कि हर किताब अधूरी है, ठीक उसी तरह जिस तरह से उनके उपन्यासों के मुख्य पात्रों की खोज हमेशा अधूरी रहती है। जाहिर है, मोदियानो के लिए लेखन बौद्धिक शगल नहीं है, बल्कि भावनात्मक अनिवार्यता है। मोदियानो का कहना है, लेखन उनके लिए कत्तई आनंदित होने का जरिया नहीं है, बल्कि एक बोझ है, जिससे वे खुद को मुक्त नहीं कर सकते; जिसे साथ-साथ ढोते जाना उनकी मजबूरी है। उन्होंने इसकी तुलना कोहरे में यात्रा करने से की है, जब व्यक्ति को यह नहीं मालूम होता है कि वह कहां जा रहा है, लेकिन फिर भी वह यात्रा को रोकता नहीं है।

‘फ्रांस टुडे’ को दिये साक्षात्कार में मोदियानो ने अपने साहित्यिक कॅरियर के बारे में कहा था कि दअरसल उन्होंने कुछ और करने के बारे में नहीं सोचा- ‘मेरे पास कोई डिप्लोमा नहीं था। हासिल करने के लिए कोई निश्चित लक्ष्य नहीं था। लेकिन एक युवा लेखक के लिए इतनी कम उम्र में लिखना शुरू करना काफी कठिन होता है।’ मोदियानो कहते हैं कि वे अपने शुरुआती उपन्यासों को पढ़ने से बचते हैं, करण यह नहीं है कि वे उन्हें अब पसंद नहीं करते। बल्कि इस कारण से कि वे उनसे अपना रिश्ता ठीक-ठीक जोड़ नहीं पाते। शायद इसकी वजह यह भी है कि मोदियानो अपने उपन्यासों के द्वारा एक ऐसी दुनिया नहीं रचते, जिसे वे साथ लेकर चलना चाहें, बल्कि एक ऐसी दुनिया का सामना करते हैं, उसे उद्घाटित करते हैं, जिससे वे मुक्त होना चाहते हैं।

मोदियानो के लेखन का स्रोत, उसका कच्चा माल फ्रांस के नाजी अधिग्रहण के दौर में एक यहूदी पिता की संतान के तौर पर बीते उनके बचपन की जटिल जीवन-परिस्थितियों में छिपा है। हालांकि, लंबे समय तक मोदियानो अपने जन्म की तारीख 1947 में बताते रहे, लेकिन बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि उनका जन्म असल में 1945 में हुआ था। ऐसा संभवतः उन्होंने अपने लेखन के स्रोत से दूरी प्रदर्शित करने की मंशा से से किया हो। जाहिर है, होलोकाॅस्ट के अत्याचार के दौर में मानवता के खिलाफ अपराध करनेवालों से मिलीभगत रखनेवाले व्यक्ति का बेटा होने की सच्चाई ने गहरे स्तर पर मोदियानो में ‘पहचान’ का संकट पैदा किया। यह पहचान का संकट, वह पहचान जिसे लेकर वे चल नहीं सकते, मगर जिसे अपने कंधे से उतार फेंकना भी उनके वश में नहीं, ही मोदियानो के लेखन का मूल बीज रहा है। नाजी कब्जे के ठीक बाद जन्मे इस व्यक्ति के लेखकीय सफर में उनका बचपन हमेशा एक ‘रिमाइंडर’ की तरह उनसे टकराता है। जो उनके ‘होने’ को एक खास दिशा देता है। यह होना, होने और न होेने के बीच में है। यह खुद को जानने और खुद को न जानने के बीच की दशा है।

पैट्रिक मोदियानो का जन्म एक सेफार्डिक यहूदी परिवार में हुआ था। उनके पिता इटली मूल के एक यहूदी थे। उनकी मां एक बेल्जियन अदाकारा थीं। अपनी मां के बारे में मोदियानो ने भावुकता के बिना लिखा है और उन्हें बिल्कुल शुष्क हृदय की औरत बतलाया है। मोदियानो के माता-पिता की मुलाकात द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अधिगृहीत पेरिस में हुई। मोदियानो के पिता ने यहूदियों की पहचान करानेवाले पीले सितारे को पहनने से इनकार कर दिया और किसी तरह से यहूदी शिनाख्तगी से और इस तरह बाकी अभागे यहूदियों की तरह नाजी सेना द्वारा कांसन्ट्रेशन कैंप भेजे जाने से बच गये थे। उन्होंने युद्ध के दौर में काला बाजारी की। कहा जाता है कि उनका ‘गेस्टापो’ के साथ संबंध रहा। ‘गेस्टापो’ नाजी कब्जे वाले यूरोप की खुफिया और बदनाम पुलिस सेवा थी। उनके अपराधी तत्वों के साथ भी संबंध रहे। मोदियानो एक साक्षात्कार में कहा था, ‘‘वे नाजी कब्जे के गोबरटीले के उत्पाद हैं। यह एक ऐसा बेहूदा-विचित्र दौर था, जब दो ऐसे लोग आपस में मिले, जिन्हें कभी नहीं मिलना चाहिए था, और दुर्घटना के तौर पर उनकी एक संतान हुई। ’’

मोदियानो का बचपन एक अराजक माहौल में बीता। सबसे पहले उनका लालन-पालन उनके नाना-नानी ने किया। सरकारी अनुदान की मदद से ही वे सेकंडरी शिक्षा हासिल कर सके। उनके पिता अक्सर नदारद रहते थे और मां यात्राओं पर। इस दौर में ही वे अपने भाई रुडी के नजदीक आये, जिसकी मृत्यु दस साल की उम्र में ल्यूकेमिया से हो गयी। मोदियानो ने अपने शुरुआती लेखन को अपने भाई को समर्पित किया है। समय की मार मोदियानो पर कैसी पड़ी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब मोदियानो ने अपने संस्मरण की किताब ‘अन-पेडिग्री‘/माई पेडिग्री’ लिखी, तब उन्होंने कहा था, ‘‘यह किताब इस बारे में नहीं है कि मैंने क्या किया, बल्कि इस बारे में है कि दूसरों ने खासकर मेरे अभिभावकों ने मेरे साथ क्या किया?’’ अपने माता-पिता के साथ मोदियानो के संबंध सामान्य नहीं रहे। अल्जीरियाई युद्ध के दौरान मोदियानो पेरिस में फंस गये थे। जब उन्होंने अपने पिता से थोड़े  पैसे मांगे, तो उनके पिता ने पुलिस बुला ली थी। अपने गणित के शिक्षक रेमंड क्यून्यू के संपर्क में आने के बाद मोदियानो लेखन की ओर मुखातिब हुए। जब उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजियों की मदद करनेवाले एक यहूदी के बारे में लिखा, तो उनके पिता इस बात से इतने नाराज हुए कि उन्होंने बाजार में उपलब्ध सारी प्रतियां खरीदने की कोशिश की।

यह अकारण नहीं है कि मोदियानो बार-बार अतीत के दुर्निवार आकर्षण के बिंधे चले आते हैं। उनके लेखन में उनका, उनके समुदाय का और उनके देश का अतीत, गहरे तक जड़ जमा कर बैठा है। यहां गायब हो जाने का खतरा है। नैतिक सीमाएं धुंधलाई हुई सी हैं। और यह लेखकीय भाव आयातित या साधारणीकृत नहीं है। मोदियानो ने एक साक्षात्कार में खुद कहा था, ‘‘यह स्वाभाविक है, क्योंकि यह मेरे जीवन का हिस्सा है।’’ उनके मुताबिक, ‘‘वैसे तमाम लोगों की तरह जिनके पास, अपनी जमीन या जड़ नहीं होती है, मैं भी अपने प्राक् इतिहास से ग्रस्त हूं। मेरा यह प्राक् इतिहास अधिग्रहण का भ्रष्ट और शर्मनाक दौर है। मुझे हमेशा लगा कि मैं इस दुःस्वप्न की पैदावार हूं।’’

मोदियानो के पास अपना विशिष्ट परिवेश है, जो पेरिस की सड़कों-गलियों से बना है। उनके पात्र छू लेने भर की दूरी पर नहीं, बल्कि थोड़े दूर खड़े होते हैं। यहां स्मृतियां साफ और स्पष्ट नहीं हैं, बल्कि धुंधलायी हुई सी हैं। यहां पीले पड़ चुके अखबारों की कतरनें और उनसे झांकती खबरें हैं, जो नापे न जा सकने वाली इतिहास की दूरी से हम तक आती हैं। ये तत्व मिलकर उनके उपन्यासों के इर्द-गिर्द एक रहस्यमयी लोक रचते हैं। उनके उपन्यास आपको सम्मोहित करते हैं और उनका जादू समय बीतने के साथ सर चढ़ कर बोलने लगता है, अपने टुकड़े-टुकड़े मधुर तान से आपकी चेतना पर दस्तक देता रहता है। इन उपन्यासों में यहां-वहां एक झिझक है, झूठे संकेत हैं, भ्रम हैं, जो लेखकों को विभिन्न घटनाओं को साथ मिलाने को कहते हैं। इनमें से कुछ घटनाएं वर्णित होती हैं, कुछ घटनाएं ऐसी भी होती हैं, जिन्हें लेखक पाठक से छिपा लेता है। मोदियानो ने रहस्यमयी चीजों के प्रति अपने प्रेम को स्वीकार भी किया है। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, ‘चीजें, जितनी छिपी हुई और रहस्यमयी होती हैं, मुझमें उतनी ज्यादा उत्सुकता जगाती हैं। मैं उन चीजों में भी रहस्य खोजने की कोशिश करता हूं, जिनमें रहस्य जैसा कुछ नहीं होता।’’ एक लेखक के तौर पर फ्रांस में व्यापक प्रसिद्धि और सम्मान पाने के बावजूद मोदियानो मीडिया और पब्लिसिटी से दूर रहे हैं। वे अपने उपन्यासों की तरह ही अपने पाठकों के लिए एक रहस्यमयी व्यक्तित्व की तरह हैं। इसने फ्रांस में एक खास शब्द ‘मोदियानेस्क’ को जन्म दिया है, जिसका अर्थ होता है, एक रहस्मय व्यक्ति या स्थिति।

लेखक के तौर पर मोदियानो का सफर 1968 में शुरू होता है। ‘बाॅस्टन पोस्ट’ के लिए राॅबर्ट जेरित्स्की ने लिखा है, ‘‘1968 को फ्रांस में ‘छात्र क्रांति’ के वर्ष के तौर पर याद किया जाता है। इस छात्र क्रांति ने फ्रांस में काफी कुछ बदला। युद्ध के बाद जन्मी पीढ़ी ने युद्ध के दौरान फ्रांस में जो कुछ हुआ, उसको लेकर अपने अभिभावकों द्वारा ओढ़ ली गयी चुप्पी को चुनौती दी। मोदियानो ने इस विद्रोह को ‘ला प्लास दिताॅयल’(1968) के पन्नों पर जिया है। इसमें युद्ध काल में फ्रांस में मौजूद यहूदी विरोधी भावना पर तीखा व्यंग्य है। इस उपन्यास के बाद रातों-रात फ्रांस को नाजियों के साथ समझौता करनेवाले एक देश के तौर पर अपनी पहचान से सामना करने की जरूरत आन पड़ी।’’

‘ला प्लास दिताॅयल’ जर्मन कब्जे के दौर और उसकी विरासत की कहानी को फिक्शन और यथार्थ से मिलाता है। तब से लेकर हर दो साल में उनका एक उपन्यास आता रहा है। वे खुद स्वीकार करते हैं कि उनका हर उपन्यास स्मृति, पहचान, अनुपस्थिति और क्षति की स्थायी थीम पर थोड़े से रद्दोबदल के साथ लिखा गया है। पहली नजर में लगता है कि ये उपन्यास जासूसी उपन्यासों से प्रभावित हैं, लेकिन मोदियानो के लेखन को गौर से और शुरू से देखने पर यह आसानी से मालूम चलता है कि मोदियानो ने लेखन की अपनी ही दुनिया बनायी है।

‘ला प्लास दिताॅयल‘ जिसका अंगरेजी में शाब्दिक अनुवाद ‘स्टार्स प्लेस’ है (यहां स्टार का संबंध उस पीले सितारे से है, जिसे हर यहूदी को अपनी पहचान बताने के लिए नाजी कब्जे के दौर में पहनना पड़ता था ), फ्रांस में नाजियों के साथ सांठ-गांठ करनेवाले विची के शासनकाल के बारे में बताता है, जो प्रतिक्रियावादी और यहूदी विरोधी था। ओरा अवनी, ने ‘येल फ्रेंच स्टडीज’ (अंक-85) में लिखे अपने लेख ‘पैट्रिक मोदियानो: अ फ्रेंच ज्यू’ में लिखा था, ‘‘यह उपन्यास हमारे समय के सबसे विवादग्रस्त सामूहिक पहचान, यानी यहूदी पहचान के मुश्किल सवाल से टकराता है... इस उपन्यास में आत्मभ्रम पैदा करनेवाली स्मृतियों के सहारे उस फ्रांस को जीवंत किया गया है, जिसके मन में यहूदियों के प्रति स्वाभाविक नफरत है, जो यहूदियों को ‘वास्तविक फ्रांस’ में मिलावट करनेवाला, उसे भ्रष्ट करनेवाला मानता है।’’ यह कोई रहस्य नहीं है कि फ्रांस में यहूदियों के प्रति वैमनस्य का इतिहास पुराना है और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यह चरम पर पहुंच गया था। फ्रेंच लोग यहूदियों को विदेशी मानते रहे हैं। फ्रांस का इतिहास ही नहीं, वहां का साहित्य भी यहूदियों को विदेशियों के तौर पर दिखाता रहा है। यह विरोध-भावना नयी नहीं है, नया है यहूदी पहचान के सहारे दिक्-काल का सफर। लेकिन, मार्शल प्रुस्त की तरह मोदियानो समय को पुनः हासिल करने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उसे तरलीकृत करके उसकी विरासत को वाष्पित कर देना चाहते हैं। वैसे यह अतीत उतना एब्सट्रैक्ट या गूढ़ नहीं है। प्रुस्त के लिए अतीत व्यक्तिगत है, जबकि मोदियानो के लिए यह अतीत अनिवार्य रूप से सामूहिक है।

मोदियानो ऐतिहासिक ज्ञान की भंगुरता को पाठक के सामने लाते हैं। वे पाठक की राष्ट्रीयता पर ध्यान दिये बगैर, उसे बताते हैं कि निजी और सामूहिक दोनों ही पहचान वाष्पशील होती हैं और भले ही अतीत हमारे हाथों की पकड़ में न आये, लेकिन वह हमारे वर्तमान को निर्धारण करता है। मोदियानो की नजरों में इतिहास हमेशा अधूरा और कच्चा होता है। यानी वे इतिहास की परिवर्तनशीलता में यकीन करते हैं। वे मानते हैं कि जो इतिहास हमें दिया गया है, जरूरी नहीं है कि वह मुकम्मल हो, पूर्वाग्रहों से मुक्त हो।

मोदियानो का मन इतिहास में रमता है। इतिहास को वे एक जासूस की तरह खोजते हैं। जिग्सा पजल के टुकड़ों को जोड़ते हुए वे एक खोई हुई तस्वीर को फिर से हासिल करना चाहते हैं। लेकिन, यह प्रक्रिया किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती। अंत में हाथ में जो कुछ आता है, उसका कोई ठोस रूप-रंग-आकार नहीं होता। मोदियानो के उपन्यास ‘मिसिंग पर्सन’ की कहानी इतिहास की तंग ही नहीं, अक्सर बंद गलियों में मोदियानो की यात्रा का दिलचस्प उदाहरण है। 1978 में प्रतिष्ठित गाॅनकोर्ट प्राइज से सम्मानित की गयी इस कृति में मिसिंग पर्सन यानी गुमशुदा व्यक्ति एक जासूस है। वह इस उपन्यास का मुख्य पात्र भी है। जासूस बनने से पहले की जिंदगी के बारे में उसे कुछ भी याद नहीं। उसे अपना नाम और राष्ट्रीयता तक का पता नहीं। आखिरकार वह अपनी विस्मृत जिंदगी का सुराग ढूंढ़ने की ठानता है। उपन्यास के मुख्य नायक रोलां के लिए संकट का क्षण, जब उसका अतीत उससे छिन गया था, फ्रांस पर नाजी कब्जे का दौर है। वह छोटे-छोटे सुरागों के सहारे अपने अतीत की फिर से रचना करना चाहता है। लेकिन कोई मुकम्मल तस्वीर नहीं बनती। यह एक दिलचस्प रहस्य कहानी है, जिसमें एक ही व्यक्ति ‘विक्टिम’ भी है, मुद्दई भी है, जासूस भी है और गवाह भी। अंत में रोलां की यह यात्रा ऐसे जगह पर पहुंचती है, जहां वह शुरुआती बिंदु से बहुत दूर आ चुका होता है, लेकिन मंजिल अभी भी मीलों दूर होती है। यह मोदियानो की अपनी शैली है। दरअसल अब तक किसी भी उपन्यास में मोदियानो की यात्रा पूरी नहीं हुई है, क्योंकि उनकी खोज मुकम्मल नहीं हुई है। जिस दिन उनकी खोज पूरी हो जायेगी, संभवतः उनका उपन्यास लेखन भी रुक जायेगा। बात उनके उपन्यासों पर जासूसी उपन्यासों के करीब होने के ठप्पे की। ‘टेलीरामा मैग्जीन’ को दिये गये एक साक्षात्कार में मोदियानो ने कहा था, ‘‘मेरे अंदर हमेशा वह  इच्छा और नाॅस्टेल्जिया थी कि मैं जासूसी उपन्यास लिख पाऊं। जासूसी उपन्यासों की मुख्य थीम का मैं बंधक रहा हूं। यही थीम है- गुमशुदगी, पहचान की समस्या, जादुई  अतीत की वापसी।’’

मोदियानो के लेखन की मूल थीम, स्मृति है और इसे मोदियानो ने किस तरह साधा है, पुनर्रचित किया है, यह संभवतः उनके उपन्यास ‘दोरा ब्रुदेर’ (अंगरेजी अनुवाद:द सर्च वारंट) में पूरी चैंध के साथ देखा जा सकता है। दोरा ब्रुदेर न सिर्फ कथा के तौर पर बल्कि उसके शिल्प के लिहाज से भी मास्टरपीस के तौर पर गिना जाता है। इसमें कई विधाओं का फ्यूजन है। यहां एक साथ, जीवनी, आत्मकथा और जासूसी उपन्यास के रूपों को आपस में मिलाकर उपन्यास की मुख्य किरदार दोरा का इतिहास कहा गया है। पूर्वी यूरोपीय यहूदी आप्रवासियों की संतान दोरा नाजी दोरा अधिग्रहण से पहले ईसाई मिशन की सुरक्षा से भाग निकली थी।  उसके माता-पिता ने उसके लापता होने का इश्तिहार 31 दिसंबर, 1941 के फ्रेंच अखबार ‘पेरिस साॅयर’ में छपवाया था। नौ महीने बाद इस दोरा का नाम उसके पिता के साथ पोलैंड के आस्विट्ज के काॅन्संट्रेशन कैंप में भेजे गये लोगों में शामिल था। इन नौ महीनों में दोरा कहां रही? उसकी कहानी क्या थी? इस रहस्य को जानने के उपक्रम ने ही उपन्यास का रूप लिया है। जीन शाॅरबोन्यू ने दोरा ब्रुदेर/सर्च वारंट की समीक्षा करते हुए लिखा है, ‘‘दोरा ब्रुदेर ने अपना अस्तित्व ग्रहण कर लिया, ठीक उसी तरह जिस तरह से मोदियानो का अपना अस्तित्व है।  दोरा की किस्मत का किस्सा जानने की मोदियानो की कोशिश उनकी अपनी जिंदगी को अर्थवत्ता देती है। उनके पहचान को उजागर करती है। ...यह खोज एक इतिहास के एक लापता व्यक्ति को फिर से जीवित करने की तरह है, इतिहास को पुनः अस्तित्वमान करने जैसा है। इस तरह से मोदियानो ‘स्मृति के संरक्षक’ की भूमिका इख्तियार कर लेते हैं। वे दोरा को एक चेहरा और एक पहचान देते हैं। लेकिन साथ ही यह भी बताते हैं कि जब बात नाजी कब्जे की आती है, तो फ्रेंच स्मृति किस तरह से कसौटी पर खरी नहीं उतरती। यही कारण है कि मोदियानो अदृश्य हो चुके इतिहास के वक्फे के खिलाफ जंग छेड़ते हैं। ’’

मोदियानो के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनके उपन्यास पेरिस और फ्रांस के बारे में, उसके इतिहास के एक खास दौर के बारे में हैं और इस तरह से इसकी स्वीकार्यता की अपनी एक सीमा है। लेकिन आलोचक इससे इत्तिफाक नहीं रखते। मोदियानो को पढ़ते हुए हम भले इतिहास के एक ही क्षण में बार-बार दाखिल हो रहे होते हैं, लेकिन पाठक यह महसूस किये बिना नहीं रहता कि मोदियानो की चिंता उसकी चिंता भी है। खासकर इस मायने में कि वह इतिहास की अर्थवत्ता खोजने की कोशिश करते हैं, आज से उसके रिश्ते की पहचान करना चाहते हैं और इतिहास की हमारी समझ को प्रश्नांकित करते हैं। विलियम फाॅकनर की तरह ही मोदियानो हमें बताते हैं कि अतीत मरता नहीं है, बल्कि सही से देखें, तो यह अतीत भी नहीं होता। यह हमसे अभिन्न होता है। हर पल हमें आकार देता रहता है।

डिस्क्लेमर: लेखक का ‘मोदियानो एक्सपर्ट’ होने का रत्तीभर भी दावा नहीं है। यह मूलतः इंटरनेट पर पैट्रिक मोदियानो पर उपलब्ध सामग्री के  प्रारम्भिक शोध पर आधारित एक परिचयात्मक लेख है। 
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27 February 2014

पॉपुलर संस्कृति में महादेव


शिव को देखने के कई तरीके हैं. शिव पहले अनार्य महादेव हैं. उन्हें दलितों भी देव कहा जाता है. आज के समय में वे सबसे पॉपुलर भगवान् हैं. शिवरात्रि के मौके पर पॉपुलर कल्चर में शिव पर यह लेख युवा पत्रकार पावस नीर ने लिखा है. : अखरावट


शिव- देवादिदेव, महादेव, भोलेनाथ या महाकाल। रूप कोई भी हो लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि 33 करोड़ देवी-देवताओं के इस देश में शिव अलग स्थान रखते हैं।  उनकी यह लोकप्रियता केवल धार्मिक ही नहीं है। देह पर भस्म रमाए, डमरू की ताल पर तांडव करने वाले, भांग का भोग लगाने वाले शिव किसी भगवान से अधिक कोई रॉकस्टार लगते हैं। 

ऐसे में इस बात में कोई आश्चर्य नही है कि आज की युवा पीढ़ी में शिव सबसे लोकप्रिय है। खुद को धार्मिक दिखाने में कोफ्त करने वाली युवा पीढ़ी को शिव अपने से लगते हैं। 
न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में शिव की लोकप्रियता बढती जा रही है और शायद यही वजह है कि आज के साहित्य से लेकर मनोरंजन की दुनिया में शिव का बोलबाला है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन माध्यमों में शिव  की महत्ता न केवल कायम है बल्कि उसे एक नए रूप में देखा, समझा और परोसा भी जा रहा है। 

क्यों प्रासंगिक हैं शिव

पौराणिक किरदार हमेशा से हमारे साहित्य, सिनेमा और टीवी के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे हैं। हनुमान, राम या कृष्ण अभी भी हमारे पसंदीदा किरदारों में से हैं और निस्संदेह शिव सबसे लोकप्रिय हैं। वह  समाज से दूर अकेले रहते हैं। त्रिशूल लिए-सर्पमाला पहने शमशानों या गुफाओं में घूमते रहते हैं। वह संन्यासी भी है और गृहस्थ भी। तंत्र-संगीत-कला के संरक्षक हैं। समाज में हाशिये पर खड़े लोगों (भूतों-प्रेतों-असुरोंके प्रिय हैं। जेनरेशन नेक्स्ट के शब्दों में कहें तो - शिव एक कूल डूड हैं। शिव का यही रूप लोगों को उनकी ओर आकर्षित करता है। बाजार भी इस बात को समझ रहा है और  शायद यही कारण है कि आदिदेव कहलाने वाले शिव अब नए रूप में नजर आते हैं। 

शिव के मिथक को लेकर लिखी गई नमिता गोखले की 'द बुक ऑफ़ शिवा' और एंडी मैकडेर्मोट की 'द वॉल्ट ऑफ़ शिवा' बेस्टसेलर्स में शामिल रहे हैं।  इनमें भी शिव की कहानी को अलग तरीके से देखा गया है। इनमे भी शिव सिर्फ एक ईश्वरीय शक्ति भर नहीं हैं। वह कभी एक सस्पेंस थ्रिलर का हिस्सा हैं तो कहीं भारतीय दर्शन को समझने का एक रास्ता।   

कुछ ही दिनों पहले बाज़ार में आई अमीश की 'द ओथ ऑफ़ वायुपुत्राज़बेस्टसेलर्स में शामिल हो चुकी है। यह अमीश की मेलुहा श्रृंखला का तीसरा और आखिरी उपन्यास है। इससे पहले उनकी 'दी इमोरट्ल्स ऑफ़ मेलुहाऔर 'दी सीक्रेट ऑफ़ नागाजकी भी लाखों प्रतियाँ बिक चुकी हैं। तो  ऐसा क्या है जो अमीश के इन उपन्यासों को इतना लोकप्रिय बना रहा है? वह है इनमें शिव का चित्रण। 

जेन नेक्स्ट के शिव

अमीश की इन किताबों में शिव को नए रूप में देखा गया है। अमीश के शिव भगवान नहीं हैं। उनकी शुरुआत किसी आम इंसान जैसी है। मानसरोवर के पास रहने वाले एक कबीले के मुखिया से भारत का उद्धार करने की क्षमता रखने वाले नीलकंठ तक का उनका सफ़र किसी ऐसे इंसान के कहानी है जिसपर अचानक ही महानता लाद दी जाती है। शिव न सिर्फ यह भार उठाते हैं बल्कि  सत्य की लड़ाई को निर्णायक परिणति भी ले जाते है। दरअसल यह एक पूरी कहानी एक आम शिव के महादेव बनने की है।  



यह आम शिव हम जैसा ही है। शिव के पौराणिक आचरण के दूर वह हमें अपने ही दौर के किसी नायक सा लगता है। वह हमारी ही तरह प्रेम करता है, दोस्तों के साथ मंडली बनाकर सुख-दुःख बांटता है, गाता है-नाचता हैनिराश भी होता है और कभी-कभी उसके मुह से गाली भी निकलती है। हालाँकि इन सब 'आम' चीज़ों के बीच शिव में कुछ ख़ास बातें भी हैं। उसके अपने आदर्श है, वह भेदभाव से ऊपर है, अपने मातहतों का दोस्त है और सबसे बढ़कर एक सच्चा प्रेमी है।

शिव की यह बातें ही उन्हें युवा पीढ़ी का प्रिय बनाती हैसीधे शब्दों में शिव  वैसे है जैसे हम सब बनना चाहते हैं।  ग्लोबल होती इस दुनिया में शिव एक ऐसे हीरो के रूप में नजर आते हैं जिसके आदर्श आज की पीढ़ी के मेल खाते हैं। साथ ही शिव का फक्कड़पन और बेफिक्र अंदाज उन्हें हमारे नजदीक ले आते हैं। शायद शिव ही एकमात्र ऐसे देव हैं जिनके प्रति भय और प्रेम की भावनाएं एक साथ मन में आती हैं।  

किसी सुपरहीरो से कम नहीं

जब विनामिका कॉमिक्स ने अपनी नई श्रृंखला के लिए लोगों को कोई पौराणिक किरदार सुझाने को कहा तो सबसे ज्यादा लोगों ने शिव का नाम लिया। विनामिका कॉमिक्स की श्रृंखला ‘शिवा- द लिजेंड ऑफ इमॉर्टल्स में शिव के जीवन का अनछुए पहलुओं को छुआ गया है। एक साक्षात्कार में  विनामिका कॉमिक्स के सीईओ करन वीर अरोड़ा कहते हैं- ‘शिव एक करिश्माई किरदार हैं। वह अन्य देवों की तरह परफेक्ट नहीं है। वह क्रोधी हैं हैं, गलतियां करते हैं और यही वे हमें खुद जैसे लगते हैं। उनकी कहानी में सबुकुछ है- रोमांस, एक्शन, ड्रामा। शिव शारीरिक रूप से भी एक चमत्कारिक व्यक्तित्व हैं।   

सिल्वर स्क्रीन पर भी छाए
साहित्य के आलावा फिल्मों, थिएटर और टीवी में भी शिव छाए हुए हैं। करण जौहर के मेलुहा ट्रिलॉजी पर फिल्म बनाने की खबरें हैं। फिल्म में शिव का किरदार हृतिक रोशन निभा सकते हैं। 



इसके अलावा टीवी पर देवों के देव महादेव खूब टीआरपी कमा रहा है। यूं तो यह शो शिव की पौराणिक कहानी पर ही आधारित है लेकिन युवा पीढ़ी को ध्यान में रखते हुए इसका ट्रीटमेंट अलग तरीके से किया गया है। किसी अन्य पौराणिक शो की तरह ही इसके सेट भव्य हैं लेकिन इसमें भी असल ध्यान शिव को एक सामाजिक आदर्श के रूप में पेश करने पर है। शिव किसी ईश्वरीय देव से अधिक एक आदर्श युवा नायक नजर आते हैं जिसकी सही और गलत की सीमाएं तय हैं। वह किसी के साथ भी अत्याचार होते नहीं देख सकते चाहे वह असुर ही क्यों न हों। उन्हें अपने परिवार से प्रेम तो हैं लेकिन उनकी गलतियां भी माफ नहीं करते। समय के हिसाब से वह मजाकिया भी हैं और क्रोध आने पर संहारक भी बन जाते हैं।   

सत्यम शिवम सुंदरम

दरअसल शिव का सबसे बड़ा आकर्षण उनके चरित्र में हैं। शिव की सबसे बड़ी सफलता यह है कि वह सबसे हैं और उनके लिए सभी बराबर हैं। उनका यही दैवी समाजवाद आज के दौर के उस युवा को लुभाता है जो बाजार बनी इस दुनिया हिस्सा तो है लेकिन उसके बाहर जाने को छटपटा भी रहा है।  यही बात उन्हें इस पीढ़ी के लिए एक ईश्वर से ज्यादा एक आइकन बनाती है।  तभी तो वे हमारी टी-शर्ट पर नजर आते हैं और हमारे संगीत में उनकी छाप है।  यह बात बाजार भी समझता है और  इसे भुनाता भी है। शायद यही वजह है कि बाजार और इंसान दोनों के लिए इस दौर में भी शिव ही सत्य हैं और सुंदर भी।   

(इस लेख के साथ अमीश त्रिपाठी का एक इंटरव्यू भी प्रकाशित हुआ था. शाम तक उस इंटरव्यू को भी उपलब्ध कराने कि कोशिश कि जायेगी) 




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