28 February 2013

1971 के बांग्लादेश युद्ध की तस्वीरें

1971 के बांग्लादेश युद्ध की तस्वीरें : मशहूर फोटोग्राफर रघु राय के कैमरे से...



अंगरेजी साप्ताहिक पत्रिका आउटलुक ने मशहूर फोटोग्राफर रघु राय द्वारा बांग्लादेश तुद्ध के दौरान ली गयी दुर्लभ तस्वीरों का प्रकाशन किया है. युद्ध की विभीषका व मानवीय त्रासदी को बयान करती ये तस्वीरें ऐतिहासिक दस्तावेज हैं.


1971 के बांग्लादेश युद्ध की मार्मिक तस्वीरों को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

27 February 2013

बार-बार मरता और जन्म लेता है लेखक



उड़िया लेखिका डॉ प्रतिभा राय को वर्ष 2011 के लिए 47वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने की घोषणा की गयी है. कथा लेखिका प्रतिभा राय अपने उपन्यास तथा कहानियों में चरित्र और जीवन स्थितियों को जीवंत ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं. उनके पास किस्सागोई की एक खास और प्रभावशाली भाषा है. यही वजह है कि उड़िया भाषा के अतिरिक्त भी उनका एक बड़ा पाठक वर्ग है. हिंदी में अनूदित उनके उपन्यास ‘द्रौपदी’ , ‘उसका अपना आकाश’ और ‘उत्तर मार्ग’ की प्रसिद्धि इसकी बानगी हैं. प्रतिभा राय का सृजन संसार उन्ही की जुबानी...

जीवन के किसी स्मरणीय क्षण की कलात्मक अभिव्यक्ति कहानी का रूप लेती है. कुछ खंडित क्षणों के बिंबों में उभरता हैपूर्णांग जीवन-काव्य. व्याप्तिहीन कहानी की कुछ दीप्ति में समग्र जीवन उद्भाषित हो सकता है. क्षण के खंडांश को भाव की सांद्रता में महाकाल के इतिहास में परिणत कर सकती है एक सार्थक कहानी. महासिंधु के हर बिंदु में जल ही होता है- वह पूर्णता का अंश है- फिर स्वयं-संपूर्ण भी. खंडित चंद्रकला की तरह कहानी विस्तृत जीवन का भाष्य न होने पर भी जीवन-सत्य का एक अंश है. सत्य का अंश भी सत्य है- वह मिथ्या नहीं. एक क्षुद्र रंध्र के जरिए सूर्य-दर्शन करने की तरह. बिंदु में सिंधु सृजन करना और क्षण को महाकाल में परिणत करना है कहानी का धर्म. भाव की सांद्रता, स्पष्टता और विभित्र विषयों के साथ संहति तथा समन्वय बना कर महाभाव की उपलब्धि करना अच्छी कहानी का लक्षण है. अत: कथाकार को सतर्कतापूर्वक थोडे. में बहुत कुछ कहना पड.ता है. 

किसी घटना का सीधा वर्णनकहानी नहीं बन जाता. घटना के केंद्र में जो भाव-बिंदु है- उसे प्रवाहित करना कहानी का लक्ष्य है. पर एक अच्छी कहानी की परिणति व्यंजना में होने के बजाय जिज्ञासा और भावोद्रेककारी अतृप्ति में होती है. एक अच्छी कहानी में तत्व, उपदेश, नीति, नियम का भी सीधे-सीधे प्रचार नहीं होता. अच्छी कहानी पढ. कर भी नहीं पढ. सकने की अतृप्ति का रसबोध भरा होता है. 

अच्छी कहानी में एक आघात होता है- बिजली की तरह झटका. व्यस्त जीवन के जरा-से विराम में वह आघात पैदा होता है- पर उस झटके का अनुभव ह्रदय में अमिट चिह्न् बन रह जाता है. ठीक बिजली के झटके की तरह. आघात क्षणिक पर अनुभव तीव्र, चिरस्थायी. अच्छी कहानी चेतना की समूची सत्ता को स्पंदित, मंथित कर देती है. 

पर कहानी की खास बात है मधुर विद्रोह. प्रचलित प्रथा, चलन, नीति-नियम, समाज-संस्कार, उत्पीड.न, शोषण, प्रतिकूल परिस्थिति में एक लड.ाका जीव होता है. जीवन के इस निरंतर संग्राम में वह न सिर्फ जीतता है और न सिर्फ हारता है. वह हारता है- जीतना-हारना सुनिश्‍चत जानकर भी संग्राम से पीछे नहीं हटता. अत: लेखक जब व्यवस्था के विरोध में विद्रोह करता है, मुंह खोलता है, अपने विद्रोह की घोषणा करता है, तो घटना और पात्रों के माध्यम से. अत: कथा हो या उपन्यास, सब एक-एक विद्रोह की घोषणा हैं. कहानी की हर घटना के समय लेखकीय सत्ता वहां उपस्थित रहती है. हर चरित्र में लेखकीय सत्ता का चेहरा दिख जाता है. अर्थात् कहानी लेखक की आत्मजीवनी कही जा सकती है. इसका यह अर्थ नहीं कि 200 कहानियों का लेखक जीवन की 200 घटनाएं हैं या वह 200 किंवदंतियों का नायक है. लेखक कहीं स्वयं उपस्थित है, तो कहीं दूसरे का प्रप्रतिनिधित्व करता है. अपने अंदर एवं अपने चारों ओर की घटना, अपने जीवन की और औरों के जीवन की घटनाओं में जब लेखक आत्मस्थ हो जाता है, तब लेखक और चरित्र एकात्म हो जाते हैं. लेखक भूल जाता है कि वह किसी और का प्रप्रतिनिधित्व कर रहा है. तब उसमें कोई छलना, कृत्रिमता, दूरी या औपचारिकता नहीं रहती. कथा और चरित्र-सत्ता में तब लेखक किसी और की बात नहीं कहता होता- अपने जीवन की बात ही कहता है. तब उसकी व्यक्ति-सत्ता और युग-सत्ता एकाकार हो जाती है. लेखक कोईखंडित क्षण नहीं, कोई युग नहीं, युग-युगांतर का प्रप्रतिनिधित्व करता है. उसकी चरित्र की छाया से स्वयं को मुक्त करने के बाद अपनी कहानी लिखकर और बाद में अपनी कहानी पढ.कर खुद चकित होता है- कौन है इसका स्रष्टा? क्या मैंने लिखी है कहानी? यहां वह स्वयं अपना आलोचक और विमुग्ध पाठक बना होता है. इस दृष्टि से हर कहानी लेखकीय जीवनगाथा के सिवा कुछ नहीं. 

लेखक एक जीवन में बार-बार मरता है फिर जन्म लेता है. वह उस जीवन में अगणित जीवन का स्पंदन अनुभव करता है- उस स्पंदन की उपलब्धि और अभिव्यक्ति ही कहानी है. रचनाकार कभी मोक्ष नहीं पाता. अनिर्वाण उसकी सृजन वेदना है, क्योंकि अंतर्मन में वह जितना शब्दमय है, बहि: प्रकाश में उतना शब्दमय नहीं होता. अत: कईबातें अप्रकाश्य रह जाती हैं. सृजनात्मक संरचना के बाद अपनी अंतरात्मा का कुछ अंश विमोचन होने का अनुभव रहता है उसमें. पर यह संपूर्ण मोचन नहीं. साहित्यिक अभिव्यक्ति सहसा पूर्णता में तृप्त होने के बाद अगले क्षण लेखक अपना पाठक बन जाता है, अतृप्ति और असंपूर्णता की वेदना का अनुभव करता है. पूर्ण चंद्र सिर्फ एक रात के लिए परिपूर्ण होता है, पर अगली रात को क्षय होने लगता है. यही लेखकीय तृप्ति का असंतोष का रूप है. पर यह अतृप्ति की वेदना उसे जड. नहीं करती. साहित्यक अभिव्यक्ति पर पूर्ण विराम नहीं लगाती. 

साहित्य का असल अभिप्राय है आदमी के अंदर कई कारणवश अप्रकाश्य अमूल्य संभावना के द्वार मुक्त करना. हर आदमी के अंदर मुक्ति की स्वतंत्रता की ईप्सा होती है. साहित्य मुक्ति की सांकल खोल देता है. यदि ऐसा नहीं होता है, तो लेखक पराजय स्वीकार करने को बाध्य है. रचनाकार को सहस्रनयन, अनेक ह्रदय- अगणित संवेदना का अधिकारी होना पड.ता है. साहित्य लेखक की आत्मरमण की वस्तु नहीं है, देश-काल-पात्र से ऊपर मानव की मुक्ति का द्वार है सफल साहित्य. 

एक सफल कहानीकार एक सफल उपन्यासकार हो सकता है, न भी हो. ठीक वैसे ही सफल उपन्यासकार सार्थक कहानीकार नहीं भी हो सकता. कहानी व उपन्यास एक बात नहीं है. कहानी को लंबी खींचने पर उपन्यास नहीं बन जाता और उपन्यास का संक्षिप्त सार कहानी नहीं होता. उपन्यास की कहानी व्यापक होती है, तो कहानी में प्लॉट की बजाय भाव या थीम पर अधिक जोर होता है. कहानी में उपन्यास की तरह चरित्र चित्रण नहीं होता, चरित्राभास ही ऐसी दक्षता से दिया जाता है कि चरित्र का रूप स्पष्ट उजागर हो जाये पाठकीय अंतर्जगत में. व्यंजनापूर्ण, प्रतीकधर्मी, इंगितधर्मी भाषा के जरिए एक सार्थक कहानी का सौकुमार्य खिल उठता है. पाठक मन में तृप्ति नहीं, अतृप्ति की रसना के जरिए जिज्ञासा पैदा कर देती है. 


( किताबघर से प्रकाशित उड़िया से हिंदी में अनूदित ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ की भूमिका का संपादित अंश )

26 February 2013

आजादी के संघर्ष की शुरुआत लोगों की भूख से होती है : चे ग्वेरा


क्यूबाई क्रान्ति के ठीक बाद चे ग्वेरा , फिदेल कास्त्रो के दूत के तौर पर भारत आये थे. इस यात्रा के दौरान उन्होंने जवाहर लाल नेहरु से मुलाकात की थी और भारत की दशा, क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष, संघर्ष के गांधीवादी तरीके,  नेहरूवादी विकास, भारत में व्याप्त असमानता आदि विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकट किये थे.  चे ग्वेरा के भारत दौरे पर मानश भट्टाचार्जी ने "द हिन्दू "में हाल में ही  "गांधी एंड द गुरिल्ला "नाम से एक लिखा था, जो भारत ,खासकर गांधी को लेकर चे ग्वेरा के विचारों को समझने की एक नयी दृष्टि देने वाला है. इस लेख को पढ़िए हिंदी मे.    
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ज्यां पाल सार्त्र, अरनेस्टो चे ग्वेरा(1928-1976) से इस हद तक प्रभावित थे, कि उन्होंने ग्वेरा को उनकी मृत्यु के बाद अपने समय का संपूर्ण इंसान(कंपलीट ह्यूमन बीइंग) कह कर पुकारा था. यह पुनर्जागरण पुरुष के लिए इस्तेमाल किया गया संदर्भ था, जो सार्त्र की नजरों में एक साथ भाईचारे और क्रांतिकारी विचारों का आदर्श था. अर्जेंटीना की धरती पर जन्मे और बाद में क्यूबाई क्रांति के अहम चेहरे के तौर पर जाने गए  मार्क्सवादी क्रांतिकारी चे ने खुद ‘ उस नये इंसान’ ( द न्यू मैन) की बात की थी, जो लिंगभेदी नहीं होगा(जेंडर ब्लाइंड होगा), साम्राज्य विरोधी और जनता का निस्पृह सेवक होगा. चे ने इस नये इंसान को अमेरिका की ‘प्रजा’ निर्माण की इच्छा के बरक्स रखा, जिसकी दिलचस्पी "टायलेट क्रांति" लाने के प्रति ज्यादा है.
चे ने अपने सामाजिक और राजनीतिक आशावाद को जिलाए रखने की खातिर क्यूबा में अमेरिकी की प्रभुता की समाप्त के लिए भीषण संघर्ष किया. क्रांति के सफल होने के ठीक बाद फिदेल कास्त्रो ने चे को भारत सहित दुनिया के कई देशों में बतौर दूत भेजा था .

चे और उनके साथ आये शिष्टमंडल ने नेहरू से नयी दिल्ली में उनके दफ्तर में मुलाकात की. चे ने बाद में इस मुलाकात के बारे में कहा था कि नेहरू उनसे पितामही स्नेह और अपनापे के साथ मिले. नेहरू के व्यवहार पर इस टिप्पणी में संभवतः एक कटाक्ष भी छिपा है. हालांकि कहा जाता  है कि चे नेहरू से प्रभावित थे और उन्हें पसंद करते थे. जॉन ली एंडरसन ने अपनी किताब ‘चे ग्वेरा: ए रिवोल्यूशनरी लाइफ’ में लिखा है कि चे ने ‘द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया को काफी चाव से पढ़ा था और जिन हिस्सों ने उन्हें उद्वेलित किया था, उसे अंडरलाइन किया था। साथ-साथ बगल में टिप्पणियां भी की थी. हालांकि दुर्भाग्यवश एंडरसन ने उन पंक्तियों का जिक्र नहीं किया है।  लेकिन यह कल्पना करना मुमकिन है कि चे,  नेहरू की राज्य नियंत्रित उत्पादन के समाजवादी माडल के तहत औद्योगिकीकरण करने की ललक से प्रभावित रहे हों. भारत के बारे में चे ने लिखा भी है, ‘भारत को औद्योगीकृत होना होगा. यह भविष्य के आर्थिक विकास की नींव तैयार करेगा.’


लेकिन चे ने विकास और औद्योगिकीकरण के बेहतर संकेतों को भारत की भीषण गरीबी के आईने में देखा जिसका अनुभव उन्हें कलकत्ता यात्रा के दौरान हुआ था.  इसने भारत में व्याप्त गहरी सामाजिक असमानता का चे से परिचय कराया. भारत यात्रा पर लिखते हुए चे ने भारत की मिट्टी की तुलना मिस्र की मिट्टी से की है, जहां वे कुछ दिन पहले ही गये थे. चे लिखते हैं कि भारत की मिट्टी मिस्र की मिट्टी से कहीं बेहतर और उपजाऊ  है. लेकिन सामाजिक अन्याय ने भूमि के ऐसे मनमाने बंटवारे को जन्म दिया है, जिसमे मुट्ठी भर लोगों के पास काफी ज्यादा जमीन है, और ज्यादतर के पास कुछ भी नहीं.

हालांकि चे  ने भारत में आर्थिक असमानता की समस्या को कलमबद्ध किया, लेकिन वे नेहरू के भारत के बारे में कोई पहले से तय निष्कर्ष देने से थोड़ी दूर ही रहे. भारत पर चे का स्वर तल्ख होने की जगह कुल मिलाकर आशावादी कहा जा सकता है. वे संभवतः समाजवादी धड़े के नजदीक खड़े देशों के साथ दोस्ताना संबंध बनाने के फिदेल कास्त्रो के निर्देश का पालन कर रहे थे.

दो हफ्ते के इस दौरे के आखिर में कश्मीर की धरती भूकंप से हिल उठी थी. इस आपदा पर चे ने कश्मीर के भाई के समान (ब्रदर पीपुल) लोगों को मदद देने की इच्छा जतायी थी. हालांकि यह एक गैर-राजनीतिक घटना थी, लेकिन कश्मीर की सहायता करने की चे की इच्छा और - ‘ब्रदर पीपुल’ जैसे पदबंध का इस्तेमाल आपदा के बीच में एक कामरेडशिप की भावना को जगाता है.

चे ने इस यात्रा के बारे में सबसे उल्लेखनीय बात संभवतः इन शब्दों में दर्ज की है- "भारत में युद्ध शब्द लोगों की चेतना से इतना दूर है कि उन्होंने अपने स्वतंत्रता संघर्ष के सबसे तनाव भरे चरण में भी इसका इस्तेमाल नहीं किया.’’ चे ग्वेरा के इन शब्दों में प्रतिरोध के गांधीवादी तरीकों के प्रति ग्वेरा के मन में प्रशंसा भाव को देखा जा सकता है, जो साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में भारत के असैनिक संघर्ष के लिए बड़े स्तर पर जिम्मेदार था. चे ने गांधी को एक रहस्यमयी शख्सीयत कह कर पुकारा था. हालांकि अपने इस संबोधन की उन्होने व्याख्या नहीं की थी. आल इंडिया रेडियो पर के पी भानुमती को दिये गये इंटरव्यू मे ग्वेरा ने कहा था, "आपके पास गांधी हैं साथ ही दर्शन की एक पुरानी परंपरा भी है. लैटिन अमेरिका में हमारे पास दोनों में से कोई भी नहीं है. यही कारण है कि हमारी  दृष्टि दूसरे तरीके से विकसित हुई है.’’ चे ने इस प्रकार यह कहा था कि किसी समाज की राजनीतिक दृष्टि विचार की पुरानी संस्कृति की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर निर्भर करती है. चे अपनी इस टिप्पणी से आधुनिकता के आने से पहले चिंतन की ऐसी परंपरा के महत्व को भी स्वीकारते नजर आते हैं. उनका आशय  संभवतः यह भी है कि ऐसी पंरपरा के बगैर गांधी जैसी शख्सीयत का आविर्भाव नामुमकिन था. क्योंकि गांधी अकेली शख्सीयत थे,  जिन्होंने आधुनिकता की विचारधारा को चुनौती दी थी और इसके खिलाफ राजनीतिक मुहिम को दिशा दी थी.

हालांकि चे ने भानुमती से यह जोर दे कर कहा था कि  एक व्यावहारिक क्रांतिकारी अपना संघर्ष खुद शुरू  करता है और ऐसा करते हुए मार्क्स के नियमों पर चल रहा होता  है, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया था कि गांधी के संघर्ष और उसके तरीके में अपनी खूबियां थीं. गांधी पर चे का यह कथन विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों में जन्म लेनेवाले अलग-अलग राजनीतिक व्यवहारों को लेकर उनके खुलेपन को दिखाता है. अपने इंटरव्यू के दौरान चे के लिए थोड़ा असहज क्षण उस वक्त आया था, जब भानुमती ने उनसे कहा,‘ एक बहुधार्मिक समाज में कम्युनिस्ट रूढि़यां स्वीकार नहीं की जायेंगी.’ इस लगभग उकसावे पर चे संयत बने रहे थे और खुद को कम्युनिस्ट कहने की जगह खुद को समानता और शोषण से मुक्ति में यकीन करनेवाला समाजवादी(सोशलिस्ट)कहा था. यहां उन्होंने एक महत्वपूर्ण आधारभूत बात कही थी,‘‘ आजादी के संघर्ष की शुरुआत लोगों की भूख से होती है.’’

अगर गांधी के संघर्ष का जन्म हिंसा की आलोचना से हुआ था, चे की विचारधारा उस व्यवस्था पर आक्रमण करने की बात करती थी जो इंसानों को मूलभूत जरूरतों से महरूम करके एक हिंसा को जीवन में बिठा देती है. चे की नजरों में भूख, भूखे व्यक्ति पर थोपी गयी एक हिंसक स्थिति है. वे मानते थे कि इस स्थिति से टकराने के लिए हिंसा का रास्ता अनिवार्य है. गांधी मानते थे कि हिंसा एक बूमरैंग(पलट कर वार करनेवाला) है, जिसका इस्तेमाल भले शोषित पर किया जाये, लेकिन वह पलट कर शोषक पर हमला करता है.
हिंसा से चे का गहरा नाता रहने के बावजूद उन्होंने जिस तरह से एक ऐतिहासिक संदर्भ में संभव हो सके संघर्ष के गांधीवादी अहिंसक तरीके की सराहना की, उसे क्रांतिकारी विचारों के लिए अच्छी खुराक कहा जा सकता है.

इस लेख का मूल रूप से प्रकाशन 23 फरवरी के द हिन्दू में हुआ था। 



25 February 2013

मेरे पांव पूरी तरह जमीन पर हैं : मो यान





वर्ष 2012 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार चीनी भाषा के लेखक मो यान को दिया गया . यान के लेखन में फ्रांज काफ्का के मनोविश्लेषण, माक्र्वेज के जादुई यथार्थवाद और फाकनर की पैनी नजर का सम्मिश्रण देखा जा सकता है. वे अपनी रचनाओं में कल्पना, यथार्थ और इतिहास और समाजिक संदर्भों को पिरोते हुए बीते कल के साथ वर्तमान से भी मुठभेड़ करते हैं. मो यान के लेखन को उन्हीं के शब्दों के सहारे समेटता हुआ एक पुराना लेख… 

नोबेल पुरस्कार मिलने की खबर पाकर मुझे हैरानी भरी खुशी के साथ-साथ थोड़ा भय भी हुआ. हैरानी इसलिए, क्योंकि मुझे इस बात की थोड़ी सी भी उम्मीद नहीं थी कि मैं यह पुरस्कार जीतूंगा. खुश पुरस्कार मिलने के कारण था. भयभीत इसलिए, क्योंकि मुझे अब तक नहीं पता कि आखिर मैं इसका सामना किस तरह से करूं. इसका कारण मुझमें प्रेस की अचानक बढ़ गयी रुचि भी है. सबसे बड़ी बात, मैं नहीं जानता कि नोबेल पुरस्कार जीतने के बाद क्या लोग मुझे ज्यादा गौर से देखेंगे और और मेरी कमियां ढूंढ़ेंगे!
दुनियाभर में और चीन में भी कई बेहतरीन लेखक हैं. मुझे मालूम है कि मेरे पुरस्कार जीत लेने का यह मतलब नहीं है कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूं. मेरे पांव पूरी तरह से जमीन पर हैं, और मुझे उम्मीद है कि साक्षात्कार और मीडिया के अटेंशन का दौर जल्द ही समाप्त हो जायेगा, जिससे कि मैं अपने काम में फिर से लग पाऊंगा. एक लेखक के लिए सबसे जरूरी चीज उसका काम, वास्तविक जीवन को गौर से देखना और अपने देश के लिए प्रेम है. मुझे लगता है कि इसी वजह से मुझे पुरस्कार दिया गया है, क्योंकि मैं लोगों के बारे में एक मानवीय और संवेदना भरे दृष्टिकोण से लिखता हूं. इस बात की ज्यादा परवाह किये बगैर कि मैं जिन पर लिख रहा हूं, वे अच्छे हैं या खराब.
नोबेल पुरस्कार समीति ने मेरे लेखन को हैलुशिनेटरी रियलिज्म (आत्म भ्रम से परिपूर्ण यथार्थ) की संज्ञा दी है. यह मेरे लेखन की अच्छी व्याख्या है. 1987 में मैंने एक लेख लिखा था. इसमें मैंने चीनी लेखकों और विलियम फाकनर और ग्रैबियल गार्सिया माक्र्वेज के बीच के संबंध की चर्चा की थी. इन दोनों महान फनकारों का मेरे ऊपर बहुत बड़ा प्रभाव रहा है.

इन लोगों के लेखन को पढ़ने के बाद ही मैं यह समझ पाया कि साहित्य इस तरह भी लिखा जा सकता है. ये दोनों लेखक लगातार धधकते हुए ज्वालामुखी के समान हैं. आप उनके बहुत नजदीक नहीं जा सकते. आप पिघल जायेंगे. मेरे लिए यह जरूरी है कि मैं उनसे दूर जाऊं, ऐसा करके ही मैं अपने आपको खोने से बचा सकता हूं. वैसे मुझे नहीं लगता कि नोबेल समिति का यह कहना पूरी तरह सही है कि मैंने हैलुशिनेटरी यथार्थ, दंत कथाओं, इतिहास और वर्तमान का संलयन किया है. बल्कि इसकी जगह मैं कहूंगा कि मेरे उपन्यासों में कल्पना, लोक कथाओं, सामाजिक समस्याओं और ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश है. हालांकि मुझे लगता है कि उन्होंने मेरे उपन्यासों को समझा है.
यह पुरस्कार मुझे मिला होता, या न मिला होता, मैं यह कहना चाहूंगा कि मेरे अंदर अपनी मातृभूमि और अपने देश के लोगों के प्रति गहरा लगाव है. मैं इस बात के लिए शुक्रगुजार हूं कि मैं यहां बड़ा हुआ और मेरे खाते में जीवन के ये अनुभव आये. मेरे कई शुरुआती कामों की पृष्ठभूमि मेरे इर्द-गिर्द का परिवेश है. मेरी किताबों के कई पात्र उन लोगों से प्रभावित हैं, जिनके साथ मैं बड़ा हुआ. इस धरती और यहां के लोगों के बगैर मैं वह नहीं हो पाता, जो मैं आज हूं.
जब मैंने पहले-पहल लिखना शुरू किया, उस समय एक वातावरण मेरे चारों और मौजूद था. यह काफी वास्तविक था और जो कहानियां मैंने लिखीं, वे मेरे व्यक्तिगत अनुभव थे. लेकिन जैसे-जैसे मैं लगातार लिखता जा रहा हूं और मेरा लिखा प्रकाशित होता जा रहा है, मेरे दिन प्रति दिन के अनुभवों का भंडार खत्म होता जा रहा है, इसलिए मुझे अपने लेखन में थोड़ी सी कल्पना की मिलावट की जरूरत महसूस होती है. कई बार इसमें कुछ फंतासी भी होता है.
मैंने हमेशा बड़ों के मुंह से कहानियां सुनीं. इसमें परीकथाएं भी थीं, दंत कथाएं भी थीं. इतिहास और हमारे क्षेत्र में हुई स्थानीय लड़ाइयां भी थीं. किंवदंती बन चुके लोगों के किस्से भी थे. आपदाओं की कहानियां भी थीं. ये मेरे लेखन का स्नेत हैं. मैं इन सबका इस्तेमाल अपने उपन्यासों में करता हूं. गांव में बिताया हुआ मेरा जीवन मेरे लिए एक निधि के समान है.

अगर आप लेखक नहीं हैं, तो शायद आपको यह निधि काम की न लगे. लेकिन, मेरे जैसे लेखक के लिए यह बेहद बेशकीमती और महत्वपूर्ण है. यही वह कारण है कि मेरे उपन्यास अलग तरह के हैं. अगर मैं क्लासिक उपन्यास पढ़ते हुए बड़ा हुआ होता, तो मैं मो यान नहीं बन पाया होता.
मैं अपने उपन्यासों की बिक्री बढ़ने की खबर से घबरा जाता हूं. उनकी बिक्री जितनी ज्यादा बढ़ती है, मेरा डर भी उतना ही बढ़ता है. कई पाठक यह धारणा बना लेंगे कि नोबेल पुरस्कार पाने वाले का लेखन जरूर सर्वश्रेष्ठ का भी सर्वश्रेष्ठ होगा. मुझे डर है कि उन्हें मेरे लेखन से निराशा हो सकती है.
मैंने पहली बार 1981 में लिखना शुरू किया. उस समय तक मैंने माक्र्वेज या फाकनर को नहीं पढ़ा था. मैंने पहली बार इन्हें 1984 में पढ़ा. और इसमें कोई शक नहीं कि उनका मेरे लेखन पर गहरा असर रहा है. मैंने यह महसूस किया कि मेरे अनुभव उनके अनुभव से काफी मिलते जुलते हैं. लेकिन यह महसूस करने में काफी वक्त लगा. अगर मैंने उन्हें पहले पढ़ा होता, मैं शायद उनके जैसे किसी मास्टरपीस का अब तक सृजन कर पाता.

मैंने अपनी शुरुआती रचनाओं में काफी मात्र में स्थानीय बोली के शब्द, उसके मुहावरे और अलंकार का इस्तेमाल किया है. इसका कारण यह भी है कि मेरे भीतर कभी इस बात का ख्याल भी नहीं आया था कि मेरी रचनाओं का दूसरी भाषाओं में कभी अनुवाद भी होगा. बाद में मैंने महसूस किया कि इस तरह की भाषा अनुवादक के लिए कई मुश्किलें खड़ी करती है. लेकिन बोलियों और मुहावरों का इस्तेमाल न करना मेरे लिए मुमकिन नहीं है. क्योंकि मुहावरों वाली भाषा गहन ऊर्जा से भरी और अभिव्यक्तिपूर्ण होती है.

और यह किसी खास लेखक की पहचान माने जाने वाली भाषा का सर्वोत्कृष्ठ हिस्सा होता है. इसलिए एक तरफ मैं कुछ प्रयोगों को बदलने की कोशिश करता हूं, लेकिन वहीं अपने अनुवादक से यह उम्मीद भी करता हूं कि वे मुहावरों को सही तरीके से ध्वनित करें. मेरे ख्याल से यह आदर्श स्थिति है.
यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं है कि मैं अपनी भाषा में जिस तरह से पाठकों तक कोई विचार पहुंचाने की कोशिश करूं, वह दूसरों तक भी वैसे ही पहुंचे. वैसे मैं मानता हूं कि दुनियाभर में हर जगह पाठक एक जैसे होते हैं. हर जगह ऐसे लोग होंगे जिन्हें मेरा काम पसंद आता होगा, कुछ ऐसे भी होंगे जिन्हें मेरा लिखा बिल्कुल पसंद नहीं आता होगा. मैं उन्हें ऐसा करने या न करने के लिए उन पर दबाव नहीं बना सकता. इसलिए हकीकत यही है कि हर लेखक अपने लिए खास तरह का पाठक चुनता है.

मुझे लगता है कि सीमाएं और सेंसरशिप साहित्य सृजन के लिए बेहतर ही हैं. दरअसल, साहित्य में तमाम पद्धतियों का अपना राजनीतिक आचरण होता है. जैसे कि हमारे वास्तविक जीवन में कुछ तीखे और संवेदनशील मुद्दे हो सकते हैं और उन्हें छुए जाने की अपेक्षा नहीं होती. ऐसे में लेखक उन्हें जीवंत, निर्भीक और वास्तविक पहचान के साथ लेकिन कल्पना का इस्तेमाल कर लिखता है.
(ग्रांटा और अन्य पत्र-पत्रिकाओं को दिये गये साक्षात्कार के आधार पर तैयार)

24 February 2013

मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है...






साहित्य अकादमी के रवींद्र भवन सभागार में मनाया गया अरुण प्रकाश का 65वां जन्मदिन. 

अरुण प्रकाश आज होते तो 65 वर्ष के होते. दिल्ली में साहित्य अकादमी के रवींद्र भवन सभागार में पहुंचने से पहले कुछ साथी साहित्यकारों, लेखकों के फेसबुक वाल पर अरुण प्रकाश के 65वें जन्म दिन पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए लिखी गयी यह टिप्पणी अचानक झूठ और फरेब लगने लगी. कौन कहता है कि अरुण प्रकाश नहीं है! त्रिलोचन की मृत्यु के बाद समकालीन भारतीय सहित्य (जिसका उस वक्त अरुण प्रकाश संपादन कर रहे थे) का संपादकीय लिखते वक्त अरुण प्रकाश को त्रिलोचन की कविता ‘फिर न हारा’ की प्रकाश पंक्तियों की याद आयी थी. कवि के अपराजित रहने का यकीन  जैसे पक्का हुआ था. यकीन क्यों? क्योंकि कवि को मालूम है कि ‘वह साधारण निम्नवर्गीय लोगों का का हो गया’ है. अरुण प्रकाश जब त्रिलोचन की इन पंक्तियों को उद्धृत कर रहे होंगे तब उन्हें शायद इस बात का एहसास भी होगा कि उनकी राह भी उस कवि की ही है. जो कभी नहीं हारेगा. क्योंकि उनकी प्रतिबद्धता निस्कंप रूप से आम लोगों के प्रति रही.

अरुण प्रकाश के 65वें जन्मदिवस पर फिर-फिर स्मरण करने का जो उपक्रम अरुण प्रकाश के परिवार, अंतिका प्रकाशन के कर्ता-धर्ता, कहानीकार गौरीनाथ ने मिलकर उनके जाने के बाद शुरू किया है, उसके पहले आयोजन से उभर कर आनेवाले स्वर उस जहीन कहानीकार, संपादक, गद्यकार, आलोचक ओर सबसे बढ़ कर विलक्षण व्यक्तित्व के इसी तरह लगातार अपराजित रहने की तस्दीक कर गया.

अरुण प्रकाश याद किये गये. उन पर बात हुई. उनके लिखे पर बात हुई. बेहद सिलसिलेबार और ब्योरेबार तरीके से. अरुण प्रकाश पर बात करने के लिए जमा हुए नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, लीलाधर मंडलोई और रमेश उपाध्याय. इस मौके पर अंतिका प्रकाशन से आयी अरुण प्रकाष की तीन किताबों, ‘उपन्यास के रंग, भैया एक्सप्रेस, जल-प्रांतर (इन दोनों संग्रहों का नये सिरे से पुनर्प्रकाशन हुआ है.) का औपचारिक तौर पर विमोचन भी किया गया. कार्यक्रम का संचालन सत्यानंद निरुपम ने किया.
वरिष्ठ आलोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह से आग्रह किया गया था कि वे अरुण प्रकाश से जुड़े संस्मरणों को श्रोताओं के साथ साझा करें. अरुण प्रकाश की रुखसती के बाद दिल्ली में हुई उनसे मुलाकातों, बहसों, बौद्धिक नोंक-झोंक, उनकी विश्वकोषीय जानकारी के कायल होने के कई प्रसंग तो लिखे और सुनाये जा चुके हैं, लेकिन यह शायद पहली बार था, जब अरुण प्रकाश का बिहार के बरौनी-निपनिया में बिताया गया जीवन का जीवंत चलचित्र की तरह आँखों में उतर आया.  अरुण प्रकाश का जन्म निपनिया गांव में हुआ था. यह गांव गंगा की एक उपधारा "बाया" के किनारे बसा है. इस गांव में हर साल बाढ़ आया करती थी. प्रकृति हर साल यहां विनाशलीला रचती थी. जाहिर है इस संस्मरण से इस सवाल का  जवाब मिला कि आखिर अरुण प्रकाश की कालजयी कृति के तौर पर स्वीकारी जानेवाली "जल-प्रांतर" कहानी का मूल उत्स क्या था. उस अनुभव की प्रामाणिकता का राज क्या है! इस संस्मरण में अरुण प्रकाश के जीवन के ऐसे कई  आयाम उभर कर सामने आये जिसके बारे में बाद में खुद अरुण प्रकाश के पुत्र मनु प्रकाश ने कहा कि उन्हें भी अपने पिता के जीवन के इस हिस्से की जानकारी नहीं थी.

कवि लीलाधर मंडलोई ने अरुण प्रकाश की अंतिका प्रकाशन  से पिछले वर्ष आयी और बेहद सराही गयी किताब "गद्य की पहचान" पर विस्तार से चर्चा की.  कथेतर साहित्य पर संभवतः पहली बार इतने प्रामाणिक ढंग से लिखी गयी यह किताब किस तरह आलोचना की नयी जमीन तोड़ती है और किस तरह आलोचना का नया मुहावरा  रचती है, इसके बारे में लीलाधर मंडलोई ने काफी विस्तार से बताया.

वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी अरुण प्रकाश के काफी करीब रहे. उनके लेखन को नजदीक से देखनेवाले भी. विश्वनाथ त्रिपाठी को अरुण प्रकाश के स्वभाव के जिद्दीपन से आत्मीयतापूर्ण कोफ्त होती है. एक बार फिर त्रिपाठी जी ने उस जिद्दीपन को याद किया. अरुण प्रकाश के उत्कट जीवन-संघर्ष को याद किया. त्रिपाठी जी मानते हैं कि शायद यही कारण रहा है कि उनके व्यक्तित्व मे ऊबड़-खाबड़पन था. लेकिन जीवन का स्पर्श और जीवन की समझ में उनमें जबरदस्त थी. उनमें एक अद्भुत संतुलन था. बोलने-लिखने-आत्मीयता लेने में. यहीं विश्वनाथ त्रिपाठी ने एक प्रसंग सुनाया, जो अरुण प्रकाश के विचार के संतुलन, दृष्टि की स्पष्ठता और संपादकीय जिम्मेदारियो के प्रति ईमानदारी को बताता है. त्रिपाठी जी ने अरुण प्रकाश के साथ मिल कर रामविलास शर्मा की मृत्यु पर वसुधा के विशेषांक का संपादन किया था. रामविलास शर्मा पर नामवर सिंह का एक तल्खी लिया हुअ लेख, जो पहले प्रकाशित हो चुका था, त्रिपाठी जी उस विशेषांक में प्रकाषित करना चाहते थे. क्यों, क्योंकि बाकी कइयों के साथ वे भी उस लेख से दुखी हुए थे, और चाहते थे कि इस अंक में रामविलासजी पर नामवर सिंह का लिखा हुआ यह सबसे कठोर लेख भी जाये. लेकिन, अरुण प्रकाश ने उस लेख को नहीं छापा. जब त्रिपाठी जी ने सवाल पूछा तो अरुण प्रकाश का जवाब था, ‘आप रामविलास शर्मा पर विशेषांक निकाल रहे हैं, या नामवर सिंह पर.'

इस जवाब ने त्रिपाठी जी को अरुण प्रकाश के विचार के संतुलन का कायल बना दिया. अरुण प्रकाश जिद्दी थे. अपने स्वभाव के अनुरूप वे उसे छाप सकते थे. लेकिन पत्रिका की  मर्यादा थी, जो निभानी थी. और आलोचना में आलोचना दृष्टि की क्या बात! त्रिपाठी जी ने कहा कि अरुण प्रकाश की रचनाओं में भी यह आलोचना दृष्टि दिखाई देती है. यह  वह दृष्टि है, जो मानती और जानती है कि साहित्य का जनतंत्र राजनीति के जनतंत्र से कहीं बड़ा होता है. इसलिए तो अरुण प्रकाश जल-प्रांतर कहानी में रूढ़िवादी, ब्राह्णवादी पंडित को भी करुणा देना नहीं भूलते हैं. यह सहित्य का जनतंत्र है, जो समावेशी है, और इस जनतंत्र की समावेशी प्रकृति का उन्हें बखूबी ध्यान था. विश्वनाथ त्रिपाठी अरुण प्रकाश की कहानियों के कायल तो हैं, ही अब उनकी आलोचना के भी कायल हो गये हैं."उपन्यास के रंग" किताब की भूमिका ही इसका प्रमाण है.  और आखिर क्यों न हों. हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों पर किस कालक्रम दोष का आरोप लगाया जाता है, अरुण प्रकाश इतिहास के इस क्रम दोष को दूसरा ही अर्थ और आयाम जो देते है. अलग-अलग समय के ऐतिहासिक पात्रों की एक साथ उपस्थिति को दोष नहीं "इतिहास की आवाजाही" कहते हैं. द्विवेदीजी के संस्कारी पाठक जानते हैं कि यह आवाजाही भारतीय मानस की वह प्रवृत्ति है जिससे वह ‘मिथकों’, किंवदंतियों का निर्माण करती है और नायकों को अपना लेती है.

अपने अध्यक्षीय भाषण में नामवर सिंह ने अरुण प्रकाश की किताब पर पहली नजर में बने इम्प्रेशन के आधार पर कहा कि अरुण प्रकाश ने हजारीप्रसाद द्विवेदी की दुखती रग, कमजोरी और सबलता दोनों को ही पहचाना है. दूधनाथ सिंह के उपन्यास "आखिरी कलाम" की जो धज्जियां उड़ायी हैं...नामवर सिंह के मुताबिक़ आखिरी कलाम की इतनी अच्छी आलोचना आज तक लिखी नहीं गयी. नामवर सिंह ने कहा कि अरुण प्रकाष कम्युनिस्ट थे और अपनी राजनीतिक दृष्टि से वे कभी पीछे नहीं हटे. ऐसे समय में भी नहीं, जब लोग इससे बचने लगे थे. उनकी यह दृष्टि उनके पूरे लेखन में दिखाई देती है. नामवर सिंह ने कहा कि अरुण प्रकाश का सारा का सारा साहित्य एक लंबी लड़ाई है. टिकाउ साहित्य वह होता है, जो अपने साथ, अपने समय के साथ, व्यवस्था के खिलाफ लड़ता है. अरुण प्रकाश का साहित्य ऐसा ही है. अरुण प्रकाश ने अपनी रचनाओं को हथियार बना कर वह लड़ाई लड़ी. अरुण प्रकाश ने कहा भी है "मेरा लेखन ही मेरी लड़ाई है"। नामवर सिंह ने अरुण प्रकाश के शब्दों को आगे बढाते हुए जोड़ा  "उनका उपन्यास पढ़ना उस लड़ाई में शामिल होना है."
उपन्यास पर लिखी गयी यह किताब नामवर सिंह को एक नजर में कितनी पसंद आयी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इसे राल्फ फाक्स की किताब, "नोबेल एंड द पीपुल" के बाद कथा साहित्य की आलोचना पर दूसरी सबसे अच्छी किताब बताया.  और जैसे कहा गया है कि "रंग लायेगी एक दिन हमारी फाकामस्ती भी एक दिन", उसी तरह हिंदी साहित्य जगत में यह किताब हमेषा याद की जायेगी और रंग लायेगी.

आखिर में अरुण प्रकाश के पुत्र मनु प्रकाश ने धन्यवाद ज्ञापन किया. मनु को कुछ दिन पहले विश्वनाथ  त्रिपाठी ने कहा था कि अरुण से हर बार मिलना उत्सव जैसा होता था. 65वें जन्मदिन पर रवींद्र भवन में ऐसा ही एक उत्सव का माहौल था. यह उत्सव था, अरुण प्रकाश के लेखन पर विचारोत्तेजक बहस का. अरुण प्रकाश के 65वें जन्मदिन के कार्यक्रम से लौटते हुए डी टी सी की बस में कतील शिफाई के एक मिसरे की याद आती रही,
"ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मर के भी मेरी जान तुम्हे चाहूँगा / तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको /ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है…"

अरुण प्रकाश आज भी अपने चाहने वालों को कुछ ऐसे ही चाह रहे हैं। उनकी उम्र तो हमें मोहब्बत देने के लिए कम साबित हुई ही ...



23 February 2013

भीष्म साहनी की नजर से बलराज साहनी




‘गर्म हवा’ के अंतिम दृश्य में सलीम पाकिस्तान न जाने का फैसला कर रोजी रोटी की मांग को लेकर सड़क से गुजर रहे लाल झंडों से भरे एक जुलूस में शामिल हो जाता है. यह दृश्य दरअसल, सलीम का किरदार निभा रहे प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता बलराज साहनी के जीवन भर आम आदमी के बीच बने रहने की वास्तविकता को ही बयां करता है. बलराज अभिनेता होने के साथ ही एक लेखक और गंभीर संस्कृतिकर्मी थे. यह बलराज साहनी का जन्म-शताब्दी वर्ष है. इस मौके पर एक लेखक और अभिनेता के पीछे के बलराज साहनी और उनके संघर्ष की कहानी के कुछ हिस्से आपके लिए.
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बलराज ने फिल्मों में कॅरियर बनाने का सपना तो पाल लिया था, लेकिन इस राह में कई चुनौतियां थीं. 1944 में मुंबई पहुंचने के बाद बलराज को पता चला कि वे चेतन आनंद की जिस फिल्म में काम करने के लिए आये थे, वह फिल्म आर्थिक मुश्किलों के कारण अधर में लटक गयी है. उन्होंने महसूस किया कि वे एक अनदेखी-अनजानी जगह पर अकेले हैं. सिनेमा के परदे पर अभिनेता बनने का ख्वाब एक और बात थी और फिल्म इंडस्ट्री में अपना पांव जमाना बिल्कुल दूसरी बात.

आर्थिक रूप से भी बलराज की स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी. बीबीसी में काम करते हुए बचाये गये पैसे ही उनकी पूंजी थी. लेकिन यह पूंजी बहुत दिनों तक उनका साथ नहीं दे सकती थी. पिता से पैसा मंगाने को वे तैयार नहीं थे. चेतन ने बलराज की मुलाकात अपने कुछ जानने वालों से करायी. इसके बावजूद जो कुछ हो रहा था, उसका सामना उन्हें अकेले करना था. यह एक बेहद संघर्ष भरा दौर था.
सिनेमा में कॅरियर बनाने के उनके सपने की राह में कई रोड़े थे. सबसे बड़ा रोड़ा तो यही था कि उनकी उम्र 34 साल हो गयी थी. इस उम्र में वे यह उम्मीद नहीं कर सकते थे कि उन्हें सिनेमा के परदे पर युवा हीरो की भूमिका दी जाये. मुंबई में रहते हुए वे थके और मुरझाये नजर आने लगे थे. यह वह जमाना था जब भारतीय दर्शकों को हट्टे-कट्टे गोल चेहरे वाले हीरो पसंद आते थे.

आर्थिक मुश्किलें तो थी हीं. उनके लिए लिखी गयी सिफारिशी चिट्ठियां, वादे और भरोसे कुछ भी काम नहीं आ रहे थे. बलराज की स्थिति को भांपते हुए चेतन आनंद ने फनी मजूमदार से उनके लिए बात की और उन्हें अपनी किसी फिल्म में काम देने को कहा. फनी उस समय ‘जस्टिस’ फिल्म पर काम कर रहे थे. उन्होंने बलराज को इस फिल्म में मौका दिया. रिहर्सल का पहला दिन बलराज के लिए कई यादगार अनुभवों वाला रहा. उन्हें सिनेमा की दुनिया को पहली बार नजदीक से देखने का मौका मिला.

पहले दिन की रिहर्सल का जिक्र करते हुए बलराज ने लिखा है, ‘रिहर्सल के दौरान मुझे लगा कि मेरे जबड़े एंठ रहे हैं. मैं कितनी भी कोशिश कर रहा हूं लेकिन वे सामान्य होने का नाम नहीं ले रहे. मेरी आवाज इतनी धीरे निकल रही थी कि उसे सुन पाना भी मुमकिन नहीं था. मुझे लगा कि फनी दा मेरे प्रदर्शन पर असंतोष जाहिर करेंगे, लेकिन इसकी जगह उन्होंने प्रशंसा के भाव से मेरी तारीफ की- वेरी गुड शॉट ओके. यह सुनना था कि वहां तालियां बजने लगीं. लोग सीटी बजाने लगे. कुछ मेरे पास आये और मुझे बधाई देने लगे क्योंकि फिल्मों में यह मेरा पहला क्लोजअप था. फनी दा ने मेरे अकाउंट से रसगुल्ले मंगाये और सबमें बंटवाये.

हर कोई मेरी प्रशंसा कर रहा था. मैं आश्चर्यचकित था. मैं जान रहा था कि यह झूठी प्रशंसा है. लेकिन आखिर वे ऐसा क्यों कर रहे थे? यह दरअसल, शोमैनशिप की दुनिया का बड़ा राज है, जिसे कोई आदमी धीरे-धीरे ही समझ सकता है. हां, यह झूठी प्रशंसा थी. स्टूडियो की दुनिया में कोई किसी से सच्चई बयां नहीं करता. यहां हर कोई सामने में आपकी तारीफ करता है और पीठ पीछे बुराई. बाहर के लोगों को यह छोटापन लग सकता है, लेकिन फिल्मी दुनिया के लोगों के लिए यह बड़ा बूस्टर है. यहां कोई मानसिक रूप से खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता और एक झूठी दुनिया में रहता है. यहां कोई भी दूसरे के सपने के गुब्बारे में सुई नहीं चुभाना चाहता.
बलराज के लिए कैमरे का सामना करना मुश्किलों से भरा था. उनके पास स्टेज का अनुभव था. बीबीसी में अनाउंसर रहते हुए उन्होंने नॉर्मल स्पीच की कला भी सीखी थी, जो आने वाले समय में उनके बेहद काम आने वाली थी. कैमरे के सामने सहज होने में उन्हें काफी वक्त लगा. खुद बलराज साहनी के मुताबिक कैमरे के सामने जाना मुझे कुछ ऐसा लगता था मानों किसी राक्षस के सामने खड़ा कर दिया गया है. कई बार रिहर्सल में भी सब कुछ सामान्य रहता लेकिन कैमरा सामने आते ही पता नहीं अचानक क्या होता था कि मेरा एक-एक अंग अकड़ जाता था. मेरी जुबान लड़खड़ाने लगती थी.

‘जस्टिस’ के बाद फनी दा के साथ बलराज ने उनकी अगली फिल्म ‘दूर चलें’ में भी काम किया. इस फिल्म में काम करते हुए बलराज साहनी इप्टा के संपर्क में आये. ‘दूर चलें’ के बाद आयी फिल्म ‘गुड़िया’. इस फिल्म के सेट पर आने से पहले बलराज इप्टा की प्रसिद्ध फिल्म ‘धरती के लाल’ में काम कर चुके थे. जिसे लिखा और निर्देशित किया था केए अब्बास ने. अपनी कई कमियों के बावजूद इस फिल्म ने एक नया ट्रेंड शुरू किया, जिसे विमल रॉय और सत्यजीत रॉय जैसे निर्देशकों ने आगे बढ़ाया. अब तक कैमरे के सामने उनका डर भी कम होने लगा था.
इप्टा के साथ बलराज साहनी का जुड़ाव बढ़ता जा रहा था और वे सिनेमा के साथ उसमें भी सक्रिय थे. लेकिन तब तक कम्युनिस्ट राजनीति में क्रांतिकारी बदलाव आ गया था. पार्टी ने नेहरू के खिलाफ विरोध का रुख अपना लिया था. इस नयी नीति ने इप्टा के कामकाज को बुरी तरह प्रभावित किया. उधर सरकार की नीतियां भी दमनकारी होने लगीं. इप्टा के कई पुराने सदस्य अलग हो गये. दूसरे कारणों से भी इप्टा के सदस्यों की संख्या कम होती गयी. ऐसे में इप्टा के प्रदर्शन काफी मुश्किल होते गये. उनके प्रदर्शनों पर पुलिस का पहरा होता था. लेकिन बलराज साहनी 1949 में अपनी गिरफ्तारी तक लगातार इप्टा से पूरी शिद्दत से जुड़े रहे. जेल से छूटने के बाद चेतन आनंद की फिल्म ‘बाजी’ की कहानी और स्क्रिप्ट लिखी. ‘हलचल’ फिल्म में काम किया.

‘हलचल’ के ठीक बाद बलराज को जिया सरहदी की फिल्म ‘हम लोग’ का प्रस्ताव मिला. इसमें उन्हें एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार के बेरोजगार युवक की भूमिका मिली. यह पहली फिल्म थी जिसमें बलराज काफी हद तक अपने रंग में नजर आये और कैमरे के सामने की उनकी अकड़न खत्म सी हो गयी. ‘हमलोग’ सफल रही और बलराज के अभिनय को काफी सराहा गया. अब वे आर्थिक रूप से भी बेहतर स्थिति में थे. ‘दो बीघा जमीन’ में उनकी प्रतिभा पूरी तरह परवान चढ़ पायी. वे अपने किरदार के साथ एकाकार हो गये और एक बेहतरीन स्क्रीन अभिनेता के तौर पर उनकी पहचान स्थापित हो गयी.

मुंबई के उपनगर जोगेश्वरी में दूधवालों की एक बस्ती है. ये दूधवाले उत्तर प्रदेश से हैं. जिस दिन बलराज को ‘दो बीघा जमीन’ के लिए चुना गया उस दिन से ही उन्होंने जोगेश्वरी के इन दूधवालों की कॉलनी में जाना शुरू कर दिया. वे गौर से दूधवालों के जीवन को देखा करते थे. उनके बातचीत करने, उठने-बैठने के तरीके पर गौर करते थे. उन्होंने लिखा है कि ‘दो बीघा जमीन’ में मेरी सफलता के पीछे इन दूधवालों की जिंदगी का नजदीकी मुआयना काफी काम आया.’ फिर कलकत्ता में शूटिंग के दौरान उनकी बिहार से आये एक रिक्शे वाले से मुलाकात हुई.

जब बलराज ने उसे फिल्म की कहानी सुनाई तो वह रोने लगा और उसने बताया कि यह तो बिल्कुल मेरी कहानी है. उसके पास भी दो बीघा जमीन थी, जो उसने एक जमींदार के पास गिरवी रखी थी और वह उसे छुड़ाने के लिए पिछले पंद्रह साल से कलकत्ता में रिक्शा चला रहा था. हालांकि उसे उम्मीद नहीं थी कि वह उस जमीन को कभी हासिल कर पायेगा. इस अनुभव ने उन्हें बदल कर रख दिया. उन्होंने खुद से कहा कि ‘मुझ पर दुनिया को एक गरीब, बेबस आदमी की कहानी बताने की जिम्मेदारी डाली गयी है, और मैं इस जिम्मेदारी को उठाने के योग्य होऊं या न होऊं, मुझे अपनी ऊर्जा का एक एक कतरा इस जिम्मेदारी को निभाने में खर्च करना चाहिए.’

आनंद बाजार पत्रिका में एक फिल्म समीक्षक ने फिल्म में बलराज साहनी के प्रदर्शन पर टिप्पणी की थी, ‘बलराज साहनी के अभिनय में एक जीनियस की छाप है.’ यह जीनियस उस रिक्शेवाले की देन थी. सोवियत संघ के एक निर्माता ने कहा कि बलराज साहनी के चेहरे पर एक पूरी दुनिया दिखाई देती है. बलराज ने लिखा,‘यह दुनिया उस रिक्शेवाले की थी. शर्म की बात है कि आजादी के 25 साल बाद भी वह चेहरा नहीं बदला है.’
बलराज की सफलता का राज था कि वे किसी किरदार को निभाते वक्त उसमें अपना दिल ही नहीं, आत्मा भी झोंक देते थे. काबुलीवाला फिल्म करते वक्त उन्होंने पठान काबुलीवाला के जीवन को नजदीक से जानने के लिए उसका गहन अध्ययन किया. यही कारण है कि जब आप बलराज की किसी फिल्म को याद करते हैं, तो बलराज याद नहीं आते वह किरदार याद आता है. हर किरदार अपने आप में अलग नजर आता है. अभिनेता बलराज गायब हो जाता  है. वह अपनी पहचान को किरदार में घुला देते थे. यह इस कारण होता था क्योंकि वे किरदार से गहरे स्तर पर जुड़ जाते थे. बलराज कहते थे कि एक्टिंग सिर्फ कला नहीं है, यह एक विज्ञान भी है.’

लेकिन इससे बढ़कर भी शायद एक चीज थी, वह था बलराज का सामाजिक सरोकार. वे किसी किरदार को उसके सामाजिक संदर्भो से जोड़ कर देखते थे. उन्होंने मार्क्सवाद के महत्व को स्वीकार किया. उनकी नजरों में मार्क्सवाद सिर्फ राजनीतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि दुनिया जैसी है, उसे उसी रूप से देखने की सीख देता है. वे मेहनती तो थे ही साथ ही हमेशा जमीन से जुड़े रहे. साधारण बने रहे. हमेशा दूसरों से सीखते रहते थे. लोगों की दिल खोल कर प्रशंसा कर सकते थे. घंटों तक सेट पर दिलीप कुमार को अभिनय करते देखते थे, उनके अभिनय से सीखने की कोशिश करते थे.
वे इतने साधारण बने रहे इसके पीछे एक बड़ी वजह यह थी कि वे स्क्रीन अभिनेता के समाज में महत्व को लेकर किसी भ्रम में नहीं पड़े न उसे पाला. एक बार मैं दिल्ली के कनॉट प्लेस में उनके साथ जैकेट खरीदने एक दुकान में गया. जैसा कि अकसर होता था, थोड़ी देर में लोगों ने उन्हें पहचान लिया और वहां भीड़ जमा होती गयी. वे काफी सहज भाव से लोगों को कागजों पर डायरियों पर यहां तक कि रुपये के नोटों पर ऑटोग्राफ देते रहे और बाहर निकलने की कोशिश करते रहे.

जब हम कार के पास पहुंचे तो मैंने कहा,‘यह कितना अद्भुत है. लोग आपको कितना चाहते हैं.’ बलराज ने कहा, ‘तुमने हमेशा लोगों को प्रशंसा करते सुना है. उनकी आलोचना नहीं सुनी है. जब एक एक्टर अपनी पीठ घुमाता है, तो लोग उसकी आलोचना भी करते हैं. किसी भ्रम में मत रहो. एक्टर को देखने के लिए जो भीड़ जमा होती है वह केवल एक सितारे के प्रति सामान्य जिज्ञासा के कारण जमा
होती है.’
( भीष्म साहनी द्वारा रचित बलराज साहनी की जीवनी ‘बलराज माय ब्रदर’ का अनुवादित अंश )
अनुवाद किया है अवनीश मिश्रा ने 

22 February 2013

जहाँ आस्था तर्क से बड़ी हो जाती है ...









इलाहाबाद में चल रहा कुम्भ अपने आखिरी चरण में आ गया है . बीबीसी के पत्रकार मार्क टली ने कुम्भ को न सिर्फ बेहद नजदीक से देखा है, बल्कि उस पर प्रामाणिक ढंग से लिखा भी है। उन्होंने कुम्भ को किसी सर्कस की तरह नहीं बल्कि एक सामाजिक-धार्मिक परिघटना की तरह देखा है। उनकी निगाह देसी या विदेशी पत्रकार की वह निगाह नहीं है जो सिर्फ 'ग्रैंड की खोज' में लगी रहती है। टली की किताब नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया के कुम्भ सम्बन्धी रिपोर्ताज को पढना इस लिहाज से एक रोचक अनुभव है। हालांकि यह लेख बड़ा है, फिर भी इसके अभिप्रेत को इस संपादित अनुवादित अंश में समेटने की कोशिश की गयी है। 




पहला दिन 

कुंभ मेले को दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक पर्व कहा जाता है, लेकिन यह वास्तव में कोई भी ठीक -ठीक नहीं जानता कि आखिर यह कितना बड़ा है. शायद भगवान उन श्रद्धालुओं का हिसाब रखता है, जो इलाहाबाद में कुंभ के दौरान गंगा और यमुना में अपने पाप धोते हैं. जहां तक नश्‍वर लोगों का संबंध है, सैटेलाइट फोटोग्राफ, कंप्यूटर और आधुनिक तकनीक के दूसरे साजोसामान इस संख्या का यह ठीक-ठीक या ठीक के करीब अनुमान लगा सकें. लेकिन, अभी तक इनका इस्तेमाल इस मकसद से नहीं किया गया है. इसलिए हमारे पास कहने के लिए यही हैकि 1977 के कुंभ मेले के सबसे पवित्र दिन एक करोड. लोगों ने संगम में स्नान किया था. यह यकीन करने के सारे कारण थे कि 1989 में कहीं ज्यादा लोग आयेंगे. जैसा कि मेले की तैयारियों के आधिकारिक वर्णन में कहा गया था, जनसंख्या बढ.ने और लोगों में सामान्य रूप से धार्मिक आस्था बढ.ने के कारण इस बार अनुमान है कि मुख्य स्नान दिवस के मौके पर कम से कम डेढ. करोड. लोग संगम के नजदीक स्नान करेंगे. पंडितों का कहना था कि 1989 का कुंभ मेला 144 वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण कुंभ मेला होगा, क्योंकि इस बार ग्रह-नक्षत्र विशिष्ट रूप से पवित्र दशा में हैं. मेले को लेकर पंडितों के अनुमान और आधिकारिक रपटों को मैं देख चुका था, इसलिए जब मैं मुख्य स्नान से एक सप्ताह पहले इलाहाबाद पहुंचा, तो काफी आश्‍चर्यचकित रह गया कि प्रशासन, पत्रकार और धार्मिक नेता तथा स्थानीय पंडित इस बात से चिंतित थे कि शायद इस बार श्रद्धालुओं की संख्या करोड. के पार न जाये.


मैं इलाहाबाद में अपने राजनीतिक गुरुओं में से एक संत बख्श सिंह, जो पूर्व सांसद थे, के यहां ठहरा था. मेरी पहली मुलाकात इलाहाबाद के भूतपूर्व मेयर और एक प्रभावशाली कांग्रेस नेता रामजी द्विवेदी से हुई. वे मेला सलाहकार समिति के सदस्य भी थे. रामजी ‘मिस्टर इलाहाबाद’ थे. वे हर किसी को जानते थे. कुछ भी ‘फिक्स’ कर सकते थे, जो कि भारत में हमेशा काफी महत्वपूर्ण होता है. सबसे पहले मुख्य स्नान दिवस के दिन आनेवाले श्रद्धालुओं की अनुमानित संख्या पर शंका जाहिर करनेवाले मिस्टर रामजी ही थे. लेकिन मेरे लिए यह बेहद डरावना था कि उन्होंने इस कम संख्या का कसूरवार बीबीसी को ठहराया. उन्होंने दावा किया कि बीबीसी ने कहा है कि कुंभ में दो लाख लोग भगदड. में मारे जायेंगे. मैंने रामजी को समझाना चाहा कि यह जरूर अफवाह है. दरअसल, इसमें हमारी विश्‍वसनीयता (खासकर हमारी हिंदी सेवा की) प्रदर्शित होती है, लेकिन गलत तरीके से. भारतीयों को जब किसी अफवाह को मजबूती देनी होती है, तो वे कहते हैं कि ‘मैंने यह बीबीसी में सुना है.’ रामजी ने माना कि ऐसा कोई प्रसारण कभी नहीं हुआ होगा, लेकिन उन्होंने जोड़ा,‘हो सकता हैकि यह अफवाह मेले का संचालन कर रहे अधिकारियों की तरफ से उड़ाई गयी हो. उन्होंने जानबूझ कर मेले में आनेवाले श्रद्धालुओं की संख्या को बढ़ा कर दिखाया, ताकि मेले के बजट को बढ़ा कर दिखाया जाये. और जब उन्होंने पैसा खा लिया है, तब उन्होंने इस बात की भी सफाईदेनी है कि आखिर श्रद्धालुओं की संख्या कम क्यों है..

पांच दिन बाद

महास्नान के एक दिन पहले, पांच फरवरी को संत बख्श सिंह मेरे कमरे में एक अखबार लेकर आये और कहा तुम बच गये. उन्होंने स्थानीय हिंदी अखबार अमृत मंदिर के पहले पन्ने पर आये संपादकीय को जोर से पढ. कर सुनाया, जिसका शीर्षक था- ‘आस्था की विजय.’ संपादकीय की शुरुआत इस तरह हुई थी : ‘मनगढ़ंत' हादसों के भय के बावजूद, हर तरह की अफवाहों को धता बताते हुए लोग उत्तर से, दक्षिण से, पूरब से, पश्‍चिम से, ट्रेन से, बस से टैक्सी से, ट्रैक्टर और पैदल चलते हुए प्रयाग की पावन धरा पर मौनी अमावस्या के दिन संगम में पवित्र स्नान करने के लिए पहुंच गये हैं.’ स्थानीय अखबारों ने इन अफवाहों और मनगढ़ंत हादसों की अफवाहों को फैलाने में अपनी भूमिका निभाई थी.

मैं तुरंत कपडे. पहन कर उस संपादकीय की सच्चाई जानने के लिए बाहर निकला. इंसानों का एक सैलाब संगम की ओर उमड़ा चला आ रहा था. सड.क पर हर तरह के वाहनों को प्रतिबंधित कर दिया गया था. गांवों की औरतें एक दूसरे के पल्लू को पकडे. चल रही थीं, ताकि अलग न हो जायें. पुरुष अपने माथे पर गठरियां, सूटकेस और यहां तक कि टिन के ट्रंक लेकर चले आ रहे थे. उनके पास बर्तन और वैसे सारे सामान थे, जो एक आत्मनिर्भर कैंपर के लिए जरूरी होता है. श्रद्धालु बेहद शांत भाव से आगे देखते हुए चले जा रहे थे. कहीं कोई हड़बड़ी-घबराहट नहीं थी. कोई किसी को धक्का नहीं दे रहा था. बस शांत, धीमी रफ्तार वाला जनसमूह. इस भीड. में एक बेहद बूढ.ी औरत अपनी बेटी का सहारा लिए चल रही थी. चटक रंग की पगड़ी पहने हुए राजस्थान के लोग थे. खाली पांव चल रही मध्य भारत की आदिवासी लड.की थी, जिसके पांवों में कडे. थे. हिमालय से आये हुए लोग भी थे. पूरब से बंगाली थे, हां दक्षिण भारतीय कम नजर आ रहे थे. ज्यादतर श्रद्धालु गांवों से समूह बना कर आये थे. जींस पहने लड.कियां और टेरीकॉट की पैंट पहने पुरुष भी उस भीड. में दिखाई दे रहे थे. सारे श्रद्धालु बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन से कई मील पैदल चल चुके थे. कुछ लोग रुककर सुस्ता रहे थे, ताकि संगम की ओर अंतिम प्रस्थान किया जा सके. इतने सारे लोगों के लिए टेंट की व्यवस्था की जा सके, इसका सवाल ही नहीं उठता था. जिन लोगों को जहां जगह मिली वे वहीं जम गये. शाम होते-होते मेला क्षेत्र धुएं से भर गया. गोयठों से जलने वाले हजारों-चूल्हे जल गये थे, जिसने मेरी आंखें बंद कर दीं और मुझे भारत के गांवों में बितायी हुई शामों की याद दिला दी.

महास्नान का दिन 

..गंगा के उस पार सूरज उग आया था. नदी से निकलनेवाली धुंध और लाखों-लाख श्रद्धालुओं के पांवों से उड.नेवाली धूल सूरज को ढक रही थी. श्रद्धालुओं का जन सैलाब संगम के कोने-कोने में काले बादलों की तरह फैला दिख रहा था. इस बात का अनुमान लगा पाना भी नामुमकिन था कि आखिर यहां कितने मिलियन(एक मिलियन = दस लाख) लोग थे. मैं अपना रास्ता बनाते हुए प्रेस कैंप तक पहुंचा. मैंने अपने जीवन में कभी भी इतनी शांत भीड. नहीं देखी थी. वहां कोई पागलपन, उन्माद नहीं था. बस आस्था के प्रति एक स्थिर विश्‍वास था. यह विश्‍वास कि जो किया जाना चाहिए था, किया जा चुका है. र्शद्धालुओं की बड.ी संख्या गांवों से आनेवालों की थी. उनकी आस्था ने उन्हें यह साहस दिया कि वे अफवाहों की परवाह किये बगैर, यात्रा के सारे कष्टों को झेलते हुए, कई मील पैदल चलते हुए स्नान के लिए पहुंच पाये. तब भी इन गांव वालों से कहा जाता हैकि उनकी आस्था, जो उनके लिए इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण है, महज एक अंधविश्‍वास है. उनसे कहा जाता है कि वे धर्मनिरपेक्ष बनें. अभिजात्य वर्ग के लोगों ने ज्यादातर इस मेले की उपेक्षा की. जो आये, कारों से आये और टेंट में रात बितायी.

दुनिया के किसी दूसरे देश में कुंभ मेले जैसा दृश्य मुमकिन नहीं है. इतने बडे. मेले का सफलतापूर्वक संचालन भारत की अकसर आलोचना पानेवाली प्रशासन व्यवस्था के लिए बड़ी उपलब्धि थी. लेकिन यह भारतीय जनता की कहीं बड़ी जीत थी.

(मार्क टली की किताब ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ के 'द कुम्भ मेला अध्याय का संपादित-अनुवादित अंश)

21 February 2013

यह वक़्त नहीं, एक मुकदमा है : चंद्रकांत देवताले



चंद्रकांत देवताले 18-19 फरवरी को दिल्ली में थे. मौक़ा था साहित्य अकादमी पुरस्कार ग्रहण करने का. बेहद सहज स्वभाव वाले देवताले जी, जिन्होंने सच बोलने की अपनी जिद के कारण झूठ यानी कविता का रास्ता चुना,  ने इस मौके पर राइटर्स मीट कार्यक्रम में अपनी कविता और अपने समय पर एक कवि की जमीन पर खड़े हो कर बात की। सम्मान लेने के बाद दिए गए उनके वक्तव्य को आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इसमें न वैचारिकी का घटाटोप है न अपने लिखे को महिमामंडित करने की कोई कोशिश… यह एक कवि  का अपनी कविता पर दिल से दिया हुआ वक्तव्य है. 
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मंच पर आसीन मेरे सभी समानधर्मा हमसफर साथी! भवन में उपस्थित सुधीजनों,
यह प्रतिष्ठित प्रसंग मेरे लिए आत्ममुग्धता का नहीं, आप सबके बीच होने और अपनी आवाज की  सार्थकता के एहसास का है. इस बुलडोजर सुनामी समय में जो हर तरह से विस्थापित कर रहा है, एक कवि क्या कह और और कर सकता है! फिर भी बहुत कुछ जो उमड़-घुमड़ रहा है मेरे भीतर, अव्यवस्थित ही सही, संक्षेप में कहने की कोशिश करूंगा. मैं अपनी ही बात  कहूंगा- क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि कविता या कवियों का कोई प्रवक्ता नहीं हो सकता.

मेरे भीतर से आवाज आ रही है कि मैं आपको बता दूं कि भाषा की धरती मुझे कहां और कैसे मिली और मेरे नसीब में कविता का घर कैसे आया? घर न दान में, न उधार में, न किराये का. यह घर पुरखों और मेरे बचपन, किशोरावस्था, परिवार, कस्बे, शहर के वातावरण ने दिया विरासत में. आदिवासी इलाके में जन्म, ताप्ती-नर्मदा किनारे बचपन, गांव के नाते-रिश्ते आज तक मेरे साथ हैं. इंदौर में द्वितीय विश्वयुद्ध और स्वतंत्रता आंदोलन की बहस के साथ कविता सुनने का अवसर मिलता था अपने घर में. 1942 में मेरे बड़े भाई स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुए. दूसरा भाई साहित्य प्रेमी हुआ.

आज से लगभग 62 वर्ष पूर्व नर्मदा नदी में छपाक-छपाक करते जो मैं बुदबुदा रहा था, घर आ कर मैंने नोट किया तो एक सहपाठी ने कहा- यह तो कविता हो गयी. 1952 में हाई स्कूल पत्रिका में मेरी ‘मजदूर’ शीर्षक से पहली कविता छपी. तब मैं नवीं का छात्र था. संत कबीर, सियारामशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आदि पुरखों की कविता पंक्तियों ने मुझे संस्कार, सोच व जीवन-दृष्टि प्रदान की, जिनसे मेरी पक्षधरता-प्रतिबद्धता तभी तय हो गयी. बाद में बुद्ध, भगत सिंह, निराला, मुक्तिबोध, परसाई आदि के कारण यह परिपुष्ट हुई.
यह भी बताना चाहूंगा कि मुझे नकाबपोश कवि होना कभी नहीं सुनाया. मेरी इच्छा आज तक जीवित है कि मैं जहां भी होऊं कवि होने की खुशबू आसपास के लोगों को मुझसे मिले और जिन्हें चुभना चाहिए मेरे कांटे चुभें. जिस तरह मनुष्य उसी तरह कवि एक साथ. दोनों के बीच विभाजन नहीं. यह भी कि जैसे मनुष्यता पेशा नहीं हो सकता, कविताई भी धंधा नहीं हो सकती.

चौवन में 'नई दुनिया', इंदौर में फिर सत्तावन में 'ज्ञानोदय', 'धर्मयुग' में कविता प्रकाशित हुई. यहां मुझे अपनी मां एकाएक याद आ रही है. कविता के कारण मुझे बचाती हुई. वाकया 1960 का है. मैं हिंदी साहित्य में  एमए प्रथम श्रेणी, आठ-दस महीनों से बेकार भटक रहा था. आत्महत्या की बात बार-बार मन में आती. इस इरादे को अंजाम देने के पहले मैंने एक कविता लिखी- ‘मेरे मरने के बाद’. उसमें यह भी था कि रामू पानवाले को दो सौ तीस रुपये चुका देना- कैसे भी, बेचारे ने बिन पैसे मांगे बेकारी के ध्वस्त दिनों में पान खिलाए हैं मुझको.’ यह कविता मेरे बड़े भाई के हाथ लग गयी और उन्होंने मां को सुना दी. मां बहुत रोई-धोई और चुपचाप पानवाले का हिसाब चुकता कर आ गयी. इस तरह संतप्त मां को देखने के बाद कोई कैसे मर सकता था, तो कविता के कारण बचा और ऋणमुक्त भी हुआ.

हां! कविता बचाती तो है, पर सौगात होते हुए भी कवि होना एक नैतिक सजा है. सतत दोहरी जासूसी जमाने और खुद की भी. कवि वैसे भी अन्याय विरोधी और विद्रोही होता है. मुक्तिबोध ने कहा भी है कि ‘सच्चा लेखक अपने खुद का दुश्मन होता है. वह अपनी आत्मा की शांति भंग करके ही लेखक बना रहता है’. शायद  ऐसी ही पीड़ा के साथ हिंदी साहित्य के प्रणेता भारतेंदु हरिश्चंद्र ने एक सौ तीस वर्ष पूर्व अपने भारत दुर्दशा नाटक में आह्वान किया था कि आओ भाई इकट्ठे हो कर आंसू बहाओ अब भारत की दयनीय अवस्था देखी नहीं जाती. बीसवीं सदी के प्रारंभ में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था- हम क्या थे? क्या हो गये? क्या होंगे अभी?’ आज एक सदी के बाद निरंतर डेंजरस होते जा रहे शाइनिंग इंडिया में हम भाषा-विचार-सृजन-संस्कृति के एक तरह से पहरेदार क्या कहेंगे?

मैं भी प्रश्नों-संदेहों और संकोच के बाणों से बिंधा इस महादुर्दशा के बारे में क्या कहूं? आप सब मुझसे ज्यादा ही जानते हैं. हमसे कोई पूछनेवाला भी नहीं कि ‘क्यों खामोश थे कविगण’...‘सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्...’.ध्वस्त होते समय में साहित्यकार-बौद्धिक वर्ग कहां है? जैसा कि हेमिंगवे ने कहा था बिना घायल हुए कोई कवि नहीं हो सकता. हां हमारे पास जख्म हैं. धरती-पर्यावरण-जन संस्कृति-हमारी अस्मिता-देशीयता-भाषा और बहुजनपदीय विविधता के तहस-नहस होने के जख्म ही जख्म.
अस्सी प्रतिशत आबादी तक स्वराज का सम्मान, आधुनिकता की सुविधाओं के साथ शिक्षा-स्वास्थ्य, वैज्ञानिक सोच-समझ आज तक क्यों नहीं पहुंचा पाये? समृद्धि संपन्नता के जगमगाते  द्वीप और विपन्नता का महासमुद्र.

वैश्विक पूंजी, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और ताकतवरों के सामने सब कुछ बिकाऊ है. कई-कई जमातों-तबकों में बंटा संकीर्णतावादी सोच समाज में भेदभाव-नफरत फैलाते अराजकता जैसा वातावरण बना रहा है. और यह सब आभासी तरक्की की घोषणाओं के बीच हो रहा है. टेलीविजन दिन-रात कूड़ा-करकट फेंकते, बाजारवादी क्रांति का शंखनाद कर रहा है और विचार की जगह नष्ट कर असहिष्णुता को बढ़ावा दे रहा है.
साहित्य-विचार और वाणी को नारेबाजी के भभ्भड़ में हमने एक विराट वाशिंग मशीन के हवाले कर दिया है. यदि बुद्ध,  चंडीदास, नानक, तुकाराम और रहीम जैसों के वचनों को मन आचरण में थोड़ी भी जगह दी होती, तो हमारी आज जैसी नियति नहीं होती. फिर भी बहकानेवाले आशावाद और आत्मघाती निराशा से बचते हुए साहस के साथ अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हमें कोशिश तो करते ही रहना है और याद रखना है मार्खेज का कहा-‘प्रसिद्धि आसमान में खतरे की तरह मंडराती है.
और अंत में थोड़ा कुछ कविता की ही जुबानी.

  • मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/ मेरी कोशिश यह रही/ पत्थरों की  हवा में टकरायें मेरे शब्द/ और बीमारी की डूबती नब्ज थामकर/ ताजा पत्तियों की सांस बन जाएँ 
  • ऐसे ज़िंदा रहने से नफरत है मुझे / जिसमें हर कोई आये और मुझे अच्छा कहे/ मैं हर किसी की तारीफ़ करते भटकता रहूँ/ मेरे दुश्मन न हों/ और मैं इसे अपने हक़ में बड़ी बात मानूं। 
  • सच बोलकर सम्भव नहीं था / सच को बताना/ इसीलिये मैंने चुना झूठ का रास्ता/ कविताओं का 
  • यह वक़्त नहीं एक मुकदमा है या तो गवाही दो या हो जाओ गूंगे/ हमेशा हमेशा के वास्ते 
  • होगा जो कवि/  वही तो कहेगा/ खटाक से खुलते चाक़ू की तरह 
मैं समझ नहीं पा रहा कि  किन शब्दों में आप सबको धन्यवाद् दूँ। शायद हमारे बीच यह आवश्यक भी नहीं  मैं आपका
-चंद्रकांत देवताले 

20 February 2013

कोई पार्ट टाइम कवि नहीं होता : चन्द्रकान्त देवताले


चंद्रकांत देवताले से यह साक्षात्कार उन्हें 2012 का हिंदी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा के ठीक बाद प्रीति सिंह परिहार ने लिया था। इस साक्षात्कार में देवताले जी ने एक ना सिर्फ अपने लेखन बल्कि समय और समाज से जुड़े सवालों का भी जवाब दिया। यह साक्षात्कार एक कवि के नजर से साहित्य और समाज को जानने का मौका देता है. 
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  •  लेखन के लिए कविता की विधा का ही चयन क्यों किया?
  • पहला सृजनात्मक स्फुरण सहजागत होता होगा. 1951-52 में नदी नर्मदा में तैरते-छपाछप करते जो मन में उमड़ रहा था, वह मेरी पहली कविता हुई. तब आठवीं का छात्र था. हिंदी विषय में कविता-कहानी-निबंध पढ़ते ही थे. यह साहित्य है और विधा इसे कहते हैं, बाद में मालूम पड़ा. इसमें मेरा कोई चुनाव नहीं. कविता मेरे लिए ऐसी है- लगभग देश-बोली-मां जैसी. जिसका मैंने चयन नहीं किया. 



  • आपके लेखन की मूल चिंता क्या है और इसका सबसे मुश्किल पक्ष क्या है? 
  • एक चौकन्ने आदिवासी की तरह ही लेखक की मूल चिंता के केंद्र में मनुष्य और जीवन हैं. फिर इनसे जुड़े प्रकृति-पर्यावरण-भाषा सब ही. लेकिन कॉरपोरेट पूंजी की आंधी और वैश्वीकरण की सुनामी के कारण मची आपाधापी के बीच सबकुछ ही चिंता में तब्दील हो रहा है. सबसे बड़ी दिक्कत यही कि कौन कहे, किसे कहे और कौन है, जो एकजुट हो सोचते-समझते सुने कवि-लेखक की आवाज. सबकुछ गड़बड़ है. और कवि लेखकों के पास हो ही नहीं सकते समाधान के सम्मोहक नुस्खे, जो बांट रहे नेता, पाखंडी-मार्गदर्शक और वे सब, जो पूंजी-सत्ता-जमीन और मानुषधर्म भी हथियाने के लिए बेताब . फिर रचनाकार भी तो नहीं एकजुट. 


  • आपकी रचनाशीलता में पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि की भूमिका क्या रही? 
  • गांव में जन्म, नदी-सतपुड़ा के पहाड़-जंगलों के बीच खेत-खलिहान के साथ गांव के सभी रिश्ते-नातों के संबोधन. ऊंच-नीच, जात-पांत का भेद नहीं. फिर इंदौर में मिला किताबों का घर. स्वतंत्रता आंदोलन की हलचल घर और शहर में थी. एक भाई की डायरी से कविताएं बांचता, बड़ा भाई स्वतंत्रता आंदोलन में गिरफ्तार हुआ. कबीर-तुलसी की पंक्तियां पिता बात-बात में दुहराते. कॉलेज में प्रथम वर्ष- द्वितीय वर्ष के दौरान कामरेड होमीदाजी की सभाओं में शामिल होना फिर उनके लिए छात्रों के साथ चुनाव-प्रचार सीमित क्षेत्र में. अलग से प्रकृति, प्रतिबद्धता, विचारधारा, जीवन के लिए सयास कुछ नहीं. समग्र-प्रभाव. कविता खुद से बता देती है कि वह कहां से आयी है. 


  • आपकीकविताओं में प्रकृति से जुड़ी चीजें बार-बार आती हैं, इस जुड़ाव की कोई खास वजह?
  • प्रकृति के बीच रहने और उससे जुड़ने के कारण. सचेत ढंग से नहीं. चौदह-पंद्र्रह स्थानांतरण. छोटी-छोटी जगहों में प्रेम के साथ रहा. वहां का वैभव और जीवन संघर्ष, उसमें शामिल होकर महसूस करता रहा. 

  • आपकीकविता कैसे जन्म लेती है और उसके शब्दाकार होने की प्रक्रिया क्या होती है? 
  • यह सबसे कठिन प्रश्न है. कब कौन सा अनुभव, घटना, स्मृति अवचेतन-चेतन में मथने लगती और उभर आती शब्दों में कागज पर. कब, कहां, कैसे रचता हूं कविता, कभी बता नहीं पाया. चलते-फिरते-भटकते-यात्रा में रहते, हर कहीं. कोई पार्ट टाइम कवि नहीं होता. फिर भी हर समय मेज पर झुका नहीं रहता. 

  • अब तक के लेखकीय सफर और अपनी सबसे पसंदीदा कविता के बारे में कुछ कहें?
  • पहली कविता 1953 में हाईस्कूल पत्रिका में छपी. फिर 1954 में शहर के अखबार नई दुनिया में. 57-58 में ज्ञानोदय-धर्मयुग में. यानी लगभग पचास-पचपन वर्ष. रास्ता ढूंढ़ते-भूलते- कभी लड़खड़ाते, कहते रहने का मौका नहीं चूका है मैंने. फिर मेरे पास लेखन का कोई हिसाब नहीं. कई हैं पसंदीदा कविताएं, ‘मैं आपसे पूछ रहा आप बताएं-पांच-सात कविताओं के नाम और उनका तापमान’. 

  • कभी कुछ सोचा हुआ न लिख पाने की पीड़ा या रचना में कहीं कुछ छूट जाने का एहसास भी होता है?
  • बहुत कुछ हमेशा बचा रह जाता है. बरसों बाद भी लगता है कविता में यह होता, यह नहीं होता. पर इसमें परेशान होने जैसा कुछ नहीं. ‘कभी खत्म नहीं होती कविता’.

  • एक लेखक के लिए पुरस्कार के मायने क्या हैं? 
  • सम्मान का अर्थ इससे अधिक नहीं कि आपकी आवाज को सुना-पहचाना गया और सोचने-समझनेवाले समाज ने सार्थक माना. जिन्हें पुरस्कार नहीं मिलता वे कम महत्वपूर्ण नहीं हो जाते.

  • वर्तमान समय-समाज का सबसे बड़ा संकट क्या है, साहित्य की इससे उबरने में क्या भूमिका देखते हैं? 
  • वैश्विक अर्थ-व्यवस्था हमारे समाज को हांक रही है. हमारे उदार सत्ताधारी नयी-नयी ईस्ट इंडिया कंपनियों को व्यापार के लिए आमंत्रित कर रहे हैं. मुट्ठी भर लोग समृद्धि के द्वीप पर फरेबी ख्वाब दिखाते और अस्सी प्रतिशत के लगभग जन-जीवन विपन्नता और वंचनाओं का शिकार- फिर विस्फोट प्रसार माध्यम सन्निपात फैलाने में मगन. इसका असर सृजनात्मक जगत पर भी पड़ा है.   रचनाकार विरोध, गवाही और छद्म को बेधने का कार्य कर ही रहा है. पर जैसा मुक्तिबोध ने कहा-साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा करना मूर्खता है, रचनाकार को शब्दों से बाहर आना होगा. पर यह उतना आसान नहीं. बेहद विकट हो गया कवि कर्म आज. 

  • लेखन से इतर क्या पसंद है? 
  • यह प्रश्न बेहद दिलचस्प है. मैं जो कह रहा उस पर भरोसा करना. यद्यपि संकेत भर कर रहा...बचपन से पेड़-पौधों में रुचि रही, जो अभी तक कायम है. पर्यावरण-हरियाली के लिए कुछ न कुछ किया. पेंटिंग में भी. 1964 में 60 से अधिक चित्रों की प्रदर्शनी. हां! पंरिदों-गिलहरी से बहुत प्यार रहा. ब्लैक डॉग भी है, जिसे मैं बकु पंडित कहता हूं, मेरा प्रिय साथी है वह इन दिनों. मुझसे भी उम्र दराज पर वही मुझे सुबह घुमाता है. सब्जी बाजार जाना मुझे बहुत पसंद है. जहां-जहां गया देश में सब्जी मार्केट जरूर गया. बस्तर में आदिवासी हाट के दिन पूरे समय मंडराता रहा दो हाटों में. पर्यटन-गपशप और संगीत से भी जुड़ाव. अंतिम बात, मैं बहुत चटोरा हूं. खाने को बहुत इंजॉय करता हूं. कुकिंग और व्यंजन बनाने की प्रतियोगिता में पुरस्कृत भी हुआ हूं. फ्यूजन करते व्यंजनों को नया स्वाद देना सुहाता है. ‘आम्र पायस’ और ‘भुट्टे के दूध की नुक्ती’ पर पुरस्कार मिला था. अब दरख्तों और परिंदों के साथ अकेलापन भी अच्छा लगता है. बौद्धिक दांभिक और पाखंडियों से दूर रहते साधारण जनों से बातचीत प्राणवंत लगती है.           

19 February 2013

उपन्यास की जादुई दुनिया


 हमारे समय  के बेहद महत्वपूर्ण उपन्यासकार ओरहन पामुक का लेखन पाठक पर जादू सा असर करता है. पामुक ने उपन्यास के साथ साथ साहित्य पर भी काफी लिखा है. दूसरों के लेखन पर भी और अपने लिखने और पढने पर भी. द नेव एंड  द सेंटीमेंटल  नॉवेलिस्ट का पहला लेख व्हाट आवर माइंड्स डू व्हेन वी रीड नावेल में पामुक ने उपन्यास को एक प्रतिबद्ध पाठक  की नजर से देखा है. लेख के हिंदी अनुवाद की दूसरी कड़ी.


उपन्यास पढ़ते वक्त हमारी आत्मा, हमारे दिमाग में क्या चल रहा होता है?  उस समय हमारे भीतर पैदा हो रहा रोमांच, उस रोमांच से कैसे अलग होता है, जिसे हम फिल्म देखते वक्त, किसी पेंटिंग को निहारते वक्त, कोई कविता, यहां तक कि महाकाव्य को सुनते वक्त महसूस करते हैं! एक उपन्यास समय-समय पर हमें जीवनी, फिल्म, कविता, पेंटिंग, या परीकथा से मिलने वाली खुशी दे सकता है. लेकिन इस कला का सच्चा और विशिष्ट  प्रभाव मौलिक रूप से दूसरी साहित्यिक विधाओं, फिल्म, चित्रकारी, से अलग है. इस अंतर को दर्शाने की शुरुआत मैं आपको यह बताने से कर सकता हूं कि जवानी के दिनों में पूरे भावावेश में उपन्यास पढ़ते वक्त मैं क्या करता था और मेरे भीतर किस तरह की जटिल छवियां जन्म लिया करती थीं.
म्यूजियम घूमने जानेवाले किसी व्यक्ति की तरह, जो सबसे पहले किसी पेंटिंग से अपनी आंखों(दृष्टि इंद्रिय) का मनोरंजन करना चाहता है, उन दिनों मैं सक्रियता, द्वंद्व, और लैंडस्केप की समृद्धि को प्राथमिकता दिया करता था. यह महसूस करना कि मैं किसी के निजी जीवन का गुप्त रूप से साक्षी बन रहा हूं और  सामान्य रास्तों के के स्याह  हिस्सों का अन्वेषण करना मुझे आनंदित किया करता था. लेकिन यह मत समझिए कि मेरे भीतर जो चित्र बना करते थे वे हमेशा बेचैन किस्म के होते थे. जवानी के दिनों में उपन्यास पढ़ते हुए कभी मेरे भीतर एक व्यापक, गहरा और बेहद शांत लैंडस्केप का जन्म होता था और कभी रोशनी बाहर चली जाती थी और स्याह और सफेद के किनारे स्पष्ट हो कर एक दूसरे से अलग हो जाया करते थे. छायाएं चक्कर काटने लगती थीं. कभी-कभी मैं इस एहसास पर चकित होता रहता था कि पूरी दुनिया अलग ही रोशनी से बनी हुई है. और कभी-कभी सुबह का धुंधलका बाकी हर चीज पर छा जाता था-पूरा ब्रह्मांड एक भावना, एक स्टाइल में तब्दील हो जाया करता था. मुझे इससे खुशी मिला करती थी. मुझे एहसास होता था कि मैं इस खास वातावरण के लिए ही वह किताब पढ़ रहा था.

धीरे-धीरे जैसे में उपन्यास के भीतर के जीवन में दाखिल होता था, मुझे लगता था कि इंस्तांबुल के बेशिकताश में अपने घर मैं बैठे हुए उपन्यास के पन्ने पलटने से पहले मेरी अपनी ही क्रियाओं की छायाएं- एक ग्लास पानी पीना,  मेरी मां के साथ हुआ मेरा संवाद, मेरे दिमाग में आये विचार और वह छोटा सा असंतोष जो मैंने अपने मन में पाला था, सब धीरे धुंधले हो कर समाप्त होते जा रहे हैं. मुझे एहसास होता था कि वह नारंगी हाथकुर्सी जिस पर मैं बैठा हूं, वह बगल में रखा हुआ बदबू  देता ऐश ट्रे, कालीन बिछा हुआ कमरा, गली में फुटबाल खेलते और एक दूसरे पर चिल्लाते बच्चे, बहुत दूर नौकाओं से आनेवाली सीटी की आवाज, इन  सबका अस्तित्व मेरे दिमाग में सिकुड़ रहा है और एक नयी दुनिया- शब्द  दर शब्द, वाक्य दर वाक्य मेरे सामने खुद को प्रकट कर रही है. जैसे-जैसे में पन्ने पर पन्ने पढ़ता जाता था, यह नया जगत मेरे सामने शीशे की तरह साफ होता जाता था, उन गुप्त चित्रों की तरह जो रीएजेंट डालने के बाद धीरे-धीरे प्रकट होते हैं. रेखाएं, छायाएं, घटनाएं और पात्र प्रखर हो उठते थे. उन शुरुआती क्षणों में वैसी हर चीज जिसके कारण उपन्यास की दुनिया में मेरा प्रवेश देर से हुआ, पात्रों, वस्तुओं और घटनाओं याद करने और उनकी छवि बनाने में जिन चीजों ने अवरोध पैदा किया, मुझे दुख पहुंचाते थे, परेशान करते थे. मुख्य पात्र, जिसके किसी दूर के रिश्तेदार की असल नातेदारी मुझे याद नहीं आती थी,  कोई संवाद जिसके बारे में मुझे लगा था कि इसके दोहरे मायने हैं, लेकिन मैं उस दूसरे  मायने को समझ नहीं पाता था, यह सब मुझे बेहद परेशान किया करता था. और जब मेरी आंखें शब्दों से गुजर रही होती थीं, मैं थोरी अधीरता और खुशी के साथ यह कामना किया करता था कि सारी चीजें अपनी जगह पर व्यवस्थित हो जायेंगी. उस समय मेरी सोच के सारे दरवाजे पूरी तरह खुल जाते थे, जैसे किसी कमजोर जानवर को बिल्कुल अनजान जगह पर छोड़ दिया गया हो. मेरा दिमाग लगभग खलबली की स्थिति में काफी तेज चलने लगता था. जैसे ही मैं अपना पूरा ध्यान उपन्यास के ब्योरों पर लगाता था, ताकि उस दुनिया का अभ्यस्त हो सकूं, जिसमें मैं दाखिल होने जा रहा हूं, मुझे शब्दों को दृश्यात्मकता देने में, उपन्यास में वर्णित घटनाओं की छवि बनाने में मुश्किल आने लगती थी.
कुछ देर बाद यह गहन और थका देनेवाला प्रयास रंग लाता था और मेरे सामने वह भव्य लैंडस्केप प्रकट हो जाता था, जिसे मैं देखना चाहता था. जैसे कि कोई बड़ा महाद्वीप कोहरे को चीर कर अपने समस्त रंगों के साथ आंखो के सामने प्रकट हो जाये. तब मैं उपन्यास में दर्ज घटनाओं और ब्योरों को कुछ इस कदर देख पाता  था, जैसे कि कोई अपनी खिड़की से बाहर के दृश्यों को आसानी से देख रहा हो...

जारी...



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ओरहन पामुक की किताब 'द नेव एंड द सेंटीमेंटल नोवेलिस्ट' के पहले अध्याय 'व्हाट आवर माइंड्स डू, व्हेन वी रीड नोवेल्स' का अंश 

18 February 2013

उपन्यास दूसरा जीवन हैं...



 हमारे समय  के बेहद महत्वपूर्ण उपन्यासकार ओरहन पामुक का लेखन पाठक पर जादू सा असर करता है. पामुक ने उपन्यास के साथ साथ साहित्य पर भी काफी लिखा है. दूसरों के लेखन पर भी और अपने लिखने और पढने पर भी. द नेव एंड  द सेंटीमेंटल नॉवेलिस्ट का पहला लेख व्हाट आवर माइंड्स डू व्हेन वी रीड नावेल में पामुक ने उपन्यास को एक प्रतिबद्ध पाठक  की नजर से देखा है. लेख के हिंदी अनुवाद की पहली कड़ी..
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उपन्यास दूसरा जीवन हैं. सेकेंड लाइव्स. फ्रांसीसी कवि गेरार्ड दि नेरवाल ने जिस सपने की बात की थी, उपन्यास ठीक उसी तरह हमारे जीवन के रंगों और जटिलताओं के बारे में बात करते हैं, जिसमें ढेर सारे लोग होते हैं, ढेर सारे चेहरे और ढेर सारी वस्तुएं. जिनके बारे में हमें यह लगता है कि हम उन्हें पहचानते हैं. सपनों की तरह उपन्यास पढ़ते वक्त, हमारा सामना जिन चीजों से होता है, हम उनकी असाधारणता के इस कदर वशीभूत हो जाते हैं कि हममें अपने देश-काल का बोध समाप्त हो जाता है. हम अपने आपको काल्पनिक घटनाओं और लोगों के बीच पाते हैं, जिन्हें हम देख रहे होते हैं. तब हमें वह काल्पनिक जगत जिससे हमारा सामना हो रहा है, जिसका हम लुत्फ ले रहे होते हैं, वास्तविक जीवन से भी ज्यादा वास्तविक लगता है.
चूंकि ये दूसरी जिंदगियां हमें यथार्थ से भी ज्यादा यथार्थ लग सकती हैं, इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि हम उपन्यास को यथार्थ की जगह प्रतिस्थापित कर देते हैं, या कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि हमें उपन्यास से यथार्थ का भ्रम होता है. लेकिन हम कभी भी इस भ्रम के लिए शिकायत नहीं करते. न ही अपनी सोच के बचकानेपन पर. इसके उलट, जैसा कि कई बार कुछ सपनों के लिए होता है, हम चाहते हैं कि उपन्यास चलता रहे, खत्म न हो. हम आशा करते हैं, यह दूसरी जिंदगी हममें यथार्थ और प्रामाणिकता का सतत बोध जगाती रहे. कल्पित कथाओं के बारे में हमारी जानकारी के बावजूद हम  परेशान और असहज हो जाते हैं, जब उपन्यास इस वास्तविक जिंदगी के भ्रम को बचाने में नाकाम हो जाता है.  हम सपने को सच मानकर सपने देखते हैं. सपने की यही परिभाषा है. इसी तरह हम उपन्यास पढ़ते हैं, उन्हें यथार्थ मान कर- लेकिन, कहीं न कहीं हमारे मन में यह एहसास भी होता है कि हमारा ऐसा मानना गलत है. यह अंतर्विरोध उपन्यास की प्रकृति से जन्म लेता है. हम अपनी बात की शुरुआत इस बात पर जोर देते हुए कर सकते हैं कि उपन्यास की कला अंतर्विरोधी स्थितियों पर एक साथ यकीन करने की हमारी क्षमता से जन्म लेता है.

''हम सपने को सच मानकर सपने देखते हैं. सपने की यही परिभाषा है. इसी तरह हम उपन्यास पढ़ते हैं, उन्हें यथार्थ मान कर- लेकिन, कहीं न कहीं हमारे मन में यह एहसास भी होता है कि हमारा ऐसा मानना गलत है. यह अंतर्विरोध उपन्यास की प्रकृति से जन्म लेता है. "

मैं 40 वर्षों से उपन्यास पढ़ रहा हूं. मैं जानता हूं कि उपन्यास को लेकर हम अनेक मुद्रा अख्तियार कर सकते हैं. अनेक तरीकों से हम अपनी अपनी आत्मा और दिमाग को इसे सुपुर्द कर सकते हैं. इसे हल्के में ले सकते हैं. गंभीरता से भी. और ठीक इसी तरह मैंने अपने अनुभव से जाना है कि एक उपन्यास को पढ़ने के भी कई तरीके हो सकते हैं. हम कभी तर्क के सहारे पढ़ते हैं. कभी आंखों से, कभी कल्पनाओं के सहारे, कभी दिमाग का  एक छोटा सा अंश खर्च कर. कभी हम उपन्यास को उस तरह से पढ़ते हैं, जिस तरह से हम उसे पढ़ना चाहते हैं और कभी-कभी अपने अस्तित्व के रेशे-रेशे को उसे समा कर. मेरी युवावस्था में एक दौर ऐसा था जब मैं पूरे समर्पण के साथ, यहां तक कि हर्षोन्मत्ता की स्थिति में उपन्यास पढ़ा करता था.  उन वर्षों में यानी अठारह से तीस वर्ष की आयु तक (1970-1982) मैं अपने दिमाग और आत्मा में उमड़नेवाले हर भाव को उस तरह बयान कर चाहता था, जिस तरह एक चित्रकार पहाड़ों, मैंदानों, पेड़ों और नदियों से भरे किसी चटक, जटिल, उर्जावान लैंडस्केप को पूरी बारीकी और स्पष्टता से उकेरता है.

जारी....
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ओरहन पामुक की किताब THE NAIVE AND THE SENTIMENTAL NOVELIST में संकलित  WHAT OUR MINDS DO WHEN WE READ NOVELS लेख का शुरूआती अंश...

17 February 2013

लेखन का कोई शिखर नहीं होता

विष्णु नागर मूलत: कवि हैं, लेकिन उनके भीतर एक सजग कथाकार और व्यंग्यकार भी मौजूद है. उनके लेखन की सहजता और साफगोई पाठक को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती है. अपनी व्यंग्य दृष्टि से सत्य के र्मम को भेदनेवाले विष्णु नागर के रचना संसार को जानिए उन्हीं के शब्दों में. विष्णु नागर से बातचीत की है प्रीति सिंह परिहार ने...
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बचपन से हमारे अवचेतन में कुछ दृश्य, चेहरे, ध्वनियां और संवाद बसते जाते हैं. बचपन, चाहे वह अच्छा रहा हो या बुरा, परिवार, नातेदारी, कस्बा, छात्र जीवन, संपर्क में आये लोग, पढ.ने-लिखने को मिली चीजें, इन सबसे एक आरंभिक दृष्टि का निर्माण होता है. बाद में अनुभवों का विस्तार होता है और उसमें नयी चीजें जुड.ती चली जाती हैं. मेरे लेखन में भी बचपन की ये छवियां भले सीधे-सीधे नहीं, लेकिन कहीं न कहीं अप्रत्यक्ष रूप से आती हैं. अपनी मां पर मैंने बहुत कविताएं लिखी हैं और अपने कस्बे को लेकर भी. दरअसल, मैं मध्यप्रदेश के जिस कस्बे में बड़ा हुआ, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ और नरेश मेहता जैसे महत्वपूर्ण कवि वहीं के थे. मेरे लेखन की ओर मुड.ने में इनके प्रभाव की बड़ी भूमिका रही है. 

लेखक जीवन के किसी एक पक्ष के बारे में नहीं लिखता. वह सामाजिक विसंगतियों, प्रेम, प्रकृति, बाों और सौंदर्य, सबके बारे में लिखता है. मेरे लेखन में भी यह सारी चीजें आती हैं, लेकिन समाज में मौजूद तमाम तरह की गैरबराबरी मेरे लेखन की बुनियादी चिंताओं में से एक है. आज जिसे चमकता भारत कहा जा रहा है, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा अंधेरे में है, पर उसकी कोई चिंता कहीं नहीं दिखती. धर्म, जाति और आर्थिक कारणों से व्याप्त सामाजिक विसंगतियां मुझे सबसे अधिक विचलित करती हैं. 

लेखक के मन में रचना के जन्मने का कोई तय समय नहीं होता. एक अंधेरे कमरे में बैठे, खाली दीवार को देखते, सड.क पर बेवजह भटकते, रात गये अचानक टूटी नींद के बाद कभी और कहीं भी कोई विचार मिल सकता है, कविता सूझ सकती है. अखबार की कोई बहुत छोटी सी खबर या बंद पड़ी  घड़ी भी लिखने का कारण दे सकती है. मेरे जेहन में रचना अपना शिल्प लेकर आती है. अगर वह शिल्प मैंने खो दिया, तो उस विचार का फिर मेरे लिये कोई मतलब नहीं रह जाता. सबसे बड.ी चीज होती है, किसी रचना को उसके क्रिएटिव अंत तक पहुंचाना. ऐसा कई बार आसानी से हो जाता है, तो कभी असंभव सा लगने लगता है. इस तरह रचनात्मकता में मुश्किलें और आनंद दोनों है. ‘यह मेरा रचा हुआ है’, ऐसा कह सकने का सुख आज की दुनिया में सिर्फ क्रिएटिव आदमी को ही हासिल है. लेकिन मेरी रचना महत्वपूर्ण इसलिए नहीं है कि उससे मेरा नाम जूड़ा है, बल्कि इसलिए है कि उससे मेरी पहचान जुड़ी है. 

इस दुनिया में जहां सारी चीजें पहले से तय कर दी जा रही हैं, वहां रचनात्मकता ही है जिसमें आप पूरी तरह स्वतंत्र हो सकते हैं. अगर आप स्वतंत्र होना चाहें तो. आज लेखक नाम की चिंता बहुत कम रह गयी है. खासतौर पर हिंदी लेखक की. इसलिए एक कवि या कहानीकार के तौर पर मुझे किसी व्यावसायिक मानदंड पर नहीं, अपने मानदंड पर खरा उतरना है. मुझ पर बाहर का कोई दबाव नहीं है. अब मैं जबरदस्ती कोई दबाव लाद लूं, तो उसका कोई निदान नहीं है. 

मैं रचना को प्रस्तुत करने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करता. बस अपनी बात को सीधे कह देता हूं. यह हुनर मैंने पत्रकारिता से पाया है. मुझे खुशी है कि मैं संयोग से ही सही पत्रकारिता में आ गया. पत्रकारिता ने मुझे सिखाया कि अपनी बात को सरलता से कैसे कहें. इसने ही मुझे मजदूरों, किसानों, दलितों, भोपाल गैसकांड जैसी त्रासदी को झेलेने वाले आम लागों की पीड.ा से लेकर संसद में होने वाली बहसों, राजनेताओं के व्यवहार और एक प्रधानमंत्री के साथ यात्रा सबकुछ को नजदीक से देखने का मौका दिया. इन सब चीजों ने मेरे अनुभव संसार को बढ.ाया. पत्रकारिता में, खासकर रिपोर्टिंग में एक अच्छी बात ये है कि आप जहां नहीं भी जाना चाहते, वहां जाना पड.ता है. जिन चीजों को नहीं देखना चाहते, वो देखना पड.ता है. ये अनुभव लेखन को विस्तार देते हैं. पत्रकारिता ने अनुभव की दुनिया दी और ऐसी भाषा में लिखना सिखाया, जिसे लोग आसानी से समझ सकें. दैनिक अखबारों में नियमित कॉलम लिखने के अभ्यास ने यह गुण भी विकसित किया कि लेखन के लिए मैं मूड का इंतजार नहीं करता. कभी भी लिख सकता हूं, जब समय मिले. लेकिन कोई क्रिएटिव काम करता हूं, तो मुझे घनघोर एकांत की जरूरत होती है. खासतौर पर जब मैं पहला ड्राफ्ट तैयार कर रहा होता हूं. अगर मैंने थोड़ा-बहुत काम कर लिया है, फिर शोर-गुल में भी हो, तो ज्यादा दिक्कत नहीं होती. लेकिन लेखन के लिए मेरे साथ समय या स्थान को लेकर कोई बाध्यता नहीं है. 

कविता ही लिखूं ऐसी कोई मजबूरी नहीं है मेरी. कविता लिखूं, तो कहानी न लिखूं ऐसा भी कोई प्रतिबंध नहीं. हां कविता को लेकर कहीं ज्यादा जिम्मेदार और सहज महसूस करता हूं. बुनियादी पहचान मेरी एक कवि के रूप में ही बनी. बाद में और विधाएं उसमें जुड.ती गयीं. कुछ ज्यादा जुड.ीं, कुछ कम जुड.ीं. मेरे लेखन में व्यंग्य कैसे शामिल होता गया, इसका कोई निश्‍चित जवाब नहीं है. समाज में मौजूद तमाम तरह की विसंगतियों से ही ये चीज आयी होगी. हालांकि ऐसा भी नहीं है कि मेरी रचनाएं सिर्फ व्यंग्यात्मक हैं. कहीं-कहीं व्यंग्य का मूल स्वर है. मैं मानता हूं कि लेखन का कोई शिखर नहीं होता, जिसे पाया जा सके. हमेशा लिखते रहना होता है. लिखने का काम भले कमरे में किया जाता है, लेकिन लेखन की सामग्री भटकाव और यायावरी से मिलती है. यात्रा से हम दुनिया भर के जीवन को जानते हैं. 

किसी रचना को उसके रचनात्मक अंत तक पहुंचा देने के बाद मैं उसकी बहुत चिंता नहीं करता. अपने विगत में मैंने जो भी हासिल किया, अच्छा या बुरा उसके आभामंडल में, अगर ऐसा कोई आभामंडल है तो, खुद को रखना मुझे पसंद नहीं. हमेशा कुछ नया करते रहने, समाज में कुछ और जोड.ने की कोशिश मेरे साथ चलती है. नया कर पाता हूं या नहीं, ये दूसरी बात है. कोशिश करने की तसल्ली तो रहती ही है. 

मैं अगर कोई रचनात्मक काम कर सकता था, तो वो लेखन ही है. इसके बहुत ठोस कारण हैं. मैं बहुत साधारण परिवार और एक छोटे से कस्बे में पैदा हुआ. कला के जो दूसरे क्षेत्र थे, उसके साधन मेरे पास नहीं थे और न उनमें रुचि थी. एक कलम और कागज ही मुझे सहजता से उपलब्ध थे. अगर मैं लेखक नहीं होता, तो और भी कुछ हो सकता था. मेरी बहुत इच्छा थी कि अध्यापक बनूं. आजीविका के लिए कुछ तो करता ही. लेकिन, मुझे अकसर लगता है कि मैं लेखक नहीं होता, तो बहुत बुरा आदमी हो सकता था. रचनात्मकता ने मुझे बहुत संतुलित किया है. इससे मेरे भीतर मौजूद आक्रोश को शब्दों की अभिव्यक्ति मिली. मुझे लगता है कि हर इंसान के भीतर कुछ कुंठाएं, बेचैनियां, अभाव की पीड.ा होती है. मेरे भीतर भी रही होंगी. रचनात्मकता ने मुझे इस पीड.ा में स्वयं को संतुलित रखने के साथ कुछ करते रहने का सुख दिया है.

लेखन के अलावा मुझे यूं ही अकारण भटकते रहना पसंद है. कई बार रास्ता भी नहीं पता होता है और मैं चलता रहता हूं, निरुद्देश्य. इस भटकाव का भी अपना सुख है. इसके साथ संगीत सुनना, दुनिया भर की क्लासिक फिल्में देखना पसंद है. 

प्रभात खबर में 17 फरवरी को प्रकाशित 

16 February 2013

जीवन वसंत का वह अग्रदूत..निराला अज्ञेय की नजर से

वसंत पंचमी का दिन तो बीत गया, लेकिन न निराला हमारे जीवन से व्यतीत होंगे न वसंत की हमारी इच्छा. वसंत के बहाने एक पुराना संस्मरण...बेहद पठनीय. जीवंत.
निराला का एक स्केच अज्ञेय की कलम से.
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वसंत का अग्रदूत
अज्ञेय




'निराला' जी को स्मरण करते हुए एकाएक शांतिप्रिय द्विवेदी की याद आ जाए, इसकी पूरी व्यंजना तो वही समझ सकेंगे जिन्होंने इन दोनों महान विभूतियों को प्रत्यक्ष देखा था। यों औरों ने शांतिप्रियजी का नाम प्राय: सुमित्रानंदन पंत के संदर्भ में लिया है क्योंकि वास्तव में तो वह पंतजी के ही भक्त थे, लेकिन मैं निरालाजी के पहले दर्शन के लिए इलाहाबाद में पंडित वाचस्पति पाठक के घर जा रहा था तो देहरी पर ही एक सींकिया पहलवान के दर्शन हो गए जिसने मेरा रास्ता रोकते हुए एक टेढ़ी उँगली मेरी ओर उठाकर पूछा, ''आपने निरालाजी के बारे में 'विश्वभारती' पत्रिका में बड़ी अनर्गल बातें लिख दी हैं।'' यह सींकिया पहलवान, जो यों अपने को कृष्ण-कन्हैया से कम नहीं समझता था और इसलिए हिंदी के सारे रसिक समाज के विनोद का लक्ष्य बना रहता था, शांतिप्रिय की अभिधा का भूषण था।
जिस स्वर में सवाल मुझसे पूछा गया था उससे शांतिप्रियता टपक रही हो ऐसा नहीं था। आवाज तो रसिक-शिरोमणि की जैसी थी वैसी थी ही, उसमें भी कुछ आक्रामक चिड़चिड़ापन भरकर सवाल मेरी ओर फेंका गया था। मैंने कहा, ''लेख आपने पढ़ा है ?''
''नहीं, मैंने नहीं पढ़ा। लेकिन मेरे पास रिपोर्टें आई हैं! ''
''तब लेख आप पढ़ लीजिएगा तभी बात होगी,'' कहकर मैं आगे बढ़ गया। शांतिप्रियजी की 'युद्धं देहि' वाली मुद्रा एक कुंठित मुद्रा में बदल गई और वह बाहर चले गए।

यों 'रिपोर्टें' सही थीं। 'विश्वभारती' पत्रिका में मेरा एक लंबा लेख छपा था। आज यह मानने में भी मुझे कोई संकोच नहीं है कि उसमें निराला के साथ घोर अन्याय किया गया था। यह बात 1936 की है जब 'विशाल भारत' में पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी निराला के विरुद्ध अभियान चला रहे थे। यों चतुर्वेदी का आक्रोश निरालाजी के कुछ लेखों पर ही था, उनकी कविताओं पर उतना नहीं (कविता से तो वह बिलकुल अछूते थे), लेकिन उपहास और विडंबन का जो स्वर चतुर्वेदीजी की टिप्पणियों में मुखर था उसका प्रभाव निरालाजी के समग्र कृतित्व के मूल्यांकन पर पड़ता ही था और मेरी अपरिपक्व बुद्धि पर भी था ही।

अब यह भी एक रोचक व्यंजना-भरा संयोग ही है कि सींकिया पहलवान से पार पाकर मैं भीतर पहुँचा तो वहाँ निरालाजी के साथ एक दूसरे दिग्गज भी विराजमान थे जिनके खिलाफ भी चतुर्वेदीजी एक अभियान चला चुके थे। एक चौकी के निकट आमने-सामने निराला और 'उग्र' बैठे थे। दोनों के सामने चौकी पर अधभरे गिलास रखे थे और दोनों के हाथों में अधजले सिगरेट थे।

उग्रजी से मिलना पहले भी हो चुका था; मेरे नमस्कार को सिर हिलाकर स्वीकार करते हुए उन्होंने निराला से कहा, ''यह अज्ञेय है।''

निरालाजी ने एक बार सिर से पैर तक मुझे देखा। मेरे नमस्कार के जवाब में केवल कहा, ''बैठो।''
मैं बैठने ही जा रहा था कि एक बार फिर उन्होंने कहा, ''जरा सीधे खड़े हो जाओ।''

मुझे कुछ आश्चर्य तो हुआ, लेकिन मैं फिर सीधा खड़ा हो गया। निरालाजी भी उठे और मेरे सामने आ खड़े हुए। एक बार फिर उन्होंने सिर से पैर तक मुझे देखा, मानो तौला और फिर बोले, ''ठीक है।'' फिर बैठते हुए उन्होंने मुझे भी बैठने को कहा। मैं बैठ गया तो मानो स्वगत-से स्वर में उन्होंने कहा, ''डौल तो रामबिलास जैसा ही है।''

रामविलास (डॉ. रामविलास शर्मा) पर उनके गहरे स्नेह की बात मैं जानता था, इसलिए उनकी बात का अर्थ मैंने यही लगाया कि और किसी क्षेत्र में न सही, एक क्षेत्र में तो निरालाजी का अनुमोदन मुझे मिल गया है। मैंने यह भी अनुमान किया कि मेरे लेख की 'रिपोर्टें' अभी उन तक नहीं पहुँची या पहुँचायी गई हैं।

निरालाजी सामान्य शिष्टाचार की बातें करते रहे-क्या करता हूँ, कैसे आना हुआ आदि। बीच में उग्रजी ने एकाएक गिलास की ओर इशारा करते हुए पूछा, ''लोगे ?'' मैंने सिर हिला दिया तो फिर कुछ चिढ़ाते हुए स्वर में बोले, ''पानी नहीं है, शराब है, शराब।''
मैंने कहा, ''समझ गया, लेकिन मैं नहीं लेता।''
निरालाजी के साथ फिर इधर-उधर की बातें होती रहीं। कविता की बात न उठाना मैंने भी श्रेयस्कर समझा।
थोड़ी देर बाद उग्रजी ने फिर कहा, ''जानते हो, यह क्या है ? शराब है, शराब।''
अपनी अनुभवहीनता के बावजूद तब भी इतना तो मैं समझ ही सकता था कि उग्रजी के इस आक्रामक रवैये का कारण वह आलोचना और भर्त्सना ही है जो उन्हें वर्षों से मिलती रही है। लेकिन उसके कारण वह मुझे चुनौती दें और मैं उसे मानकर अखाड़े में उतरूँ, इसका मुझे कोई कारण नहीं दीखा। यह भी नहीं कि मेरे जानते शराब पीने का समय शाम का होता, दिन के ग्यारह बजे का नहीं! मैंने शांत स्वर में कहा, ''तो क्या हुआ, उग्रजी, आप सोचते हैं कि शराब के नाम से मैं डर जाऊँगा ? देश में बहुत से लोग शराब पीते हैं।''
निरालाजी केवल मुस्कुरा दिए, कुछ बोले नहीं। थोड़ी देर बाद मैं विदा लेने को उठा तो उन्होंने कहा, ''अबकी बार मिलोगे तो तुम्हारी रचना सुनेंगे।''
मैंने खैर मनायी कि उन्होंने तत्काल कुछ सुनाने को नहीं कहा, ''निरालाजी, मैं तो यही आशा करता हूँ कि अबकी बार आपसे कुछ सुनने को मिलेगा।''
आशा मेरी ही पूरी हुई : इसके बाद दो-तीन बार निरालाजी के दर्शन ऐसे ही अवसरों पर हुए जब उनकी कविता सुनने को मिली। ऐसी स्थिति नहीं बनी कि उन्हें मुझसे कुछ सुनने की सूझे और मैंने इसमें अपनी कुशल ही समझी।

इसके बाद की जिस भेंट का उल्लेख करना चाहता हूँ उससे पहले निरालाजी के काव्य के विषय में मेरा मन पूरी तरह बदल चुका था। वह परिवर्तन कुछ नाटकीय ढंग से ही हुआ। शायद कुछ पाठकों के लिए यह भी आश्चर्य की बात होगी कि वह उनकी 'जुही की कली' अथवा 'राम की शक्तिपूजा' पढ़कर नहीं हुआ, उनका 'तुलसीदास' पढ़कर हुआ। अब भी उस अनुभव को याद करता हूँ तो मानो एक गहराई में खो जाता हूँ। अब भी 'राम की शक्तिपूजा' अथवा निराला के अनेक गीत बार-बार पढ़ता हूँ, लेकिन 'तुलसीदास' जब-जब पढ़ने बैठता हूँ तो इतना ही नहीं कि एक नया संसार मेरे सामने खुलता है, उससे भी विलक्षण बात यह है कि वह संसार मानो एक ऐतिहासिक अनुक्रम में घटित होता हुआ दीखता है। मैं मानो संसार का एक स्थिर चित्र नहीं बल्कि एक जीवंत चलचित्र देख रहा हूँ। ऐसी रचनाएँ तो कई होती हैं जिनमें एक रसिक हृदय बोलता है। विरली ही रचना ऐसी होती है जिसमें एक सांस्कृतिक चेतना सर्जनात्मक रूप से अवतरित हुई हो। 'तुलसीदास' मेरी समझ में ऐसी ही एक रचना है। उसे पहली ही बार पढ़ा तो कई बार पढ़ा। मेरी बात में जो विरोधाभास है वह बात को स्पष्ट ही करता है। 'तुलसीदास' के इस आविष्कार के बाद संभव नहीं था कि मैं निराला की अन्य सभी रचनाएँ फिर से न पढूँ, 'तुलसीदास' के बारे में अपनी धारणा को अन्य रचनाओं की कसौटी पर कसकर न देखूँ।

अगली जिस भेंट का उल्लेख करना चाहता हूँ उसकी पृष्ठभूमि में कवि निराला के प्रति यह प्रगाढ़ सम्मान ही था। काल की दृष्टि से यह खासा व्यतिक्रम है क्योंकि जिस भेंट की बात मैं कर चुका हूँ, वह सन् 36 में हुई थी और यह दूसरी भेंट सन् 51 के ग्रीष्म में। बीच के अंतराल में अनेक बार अनेक स्थलों पर उनसे मिलना हुआ था और वह एक-एक, दो-दो दिन मेरे यहाँ रह भी चुके थे, लेकिन उस अंतराल की बात बाद में करूँगा।

मैं इलाहाबाद छोड़कर दिल्ली चला आया था, लेकिन दिल्ली में अभी ऐसा कोई काम नहीं था कि उससे बँधा रहूँ; अकसर पाँच-सात दिन के लिए इलाहाबाद चला जाता था। निरालाजी तब दारागंज में रहते थे। मानसिक विक्षेप कुछ बढ़ने लगा था और कभी-कभी वह बिलकुल ही बहकी हुई बातें करते थे, लेकिन मेरा निजी अनुभव यही था कि काफ़ी देर तक वह बिलकुल संयत और संतुलित विचार-विनिमय कर लेते थे; बीच-बीच में कभी बहकते भी तो दो-चार मिनट में ही फिर लौट आते थे। मैं शायद उनकी विक्षिप्त स्थिति की बातों को भी सहज भाव से ले लेता था, या बहुत गहरे में समझता था कि जीनियस और पागलपन के बीच का पर्दा काफ़ी झीना होता है- कि निराला का पागलपन 'जीनियस का पागलपन' है, इसीलिए वह भी सहज ही प्रकृतावस्था में लौट आते थे। इतना ही था कि दो-चार व्यक्तियों और दो-तीन संस्थाओं के नाम मैं उनके सामने नहीं लेता था और अँग्रेज़ी का कोई शब्द या पद अपनी बात में नहीं आने देता था-क्योंकि यह मैं लक्ष्य कर चुका था कि इन्हीं से उनके वास्तविकता बोध की गाड़ी पटरी से उतर जाती थी।

उस बार 'सुमन' (शिवमंगल सिंह) भी आए हुए थे और मेरे साथ ही ठहरे थे। मैं निरालाजी से मिलने जानेवाला था और 'सुमन' भी साथ चलने को उत्सुक थे। निश्चय हुआ कि सवेरे-सवेरे ही निरालाजी से मिलने जाया जाएगा- वही समय ठीक रहेगा। लेकिन सुमनजी को सवेरे तैयार होने में बड़ी कठिनाई होती है। पलंग-चाय, पूजा-पाठ और सिंगार-पट्टी में नौ बज ही जाते हैं और उस दिन भी बज गए। हम दारागंज पहुँचे तो प्राय: दस बजे का समय था।

निरालाजी अपने बैठके में नहीं थे। हम लोग वहाँ बैठ गए और उनके पास सूचना चली गई कि मेहमान आए हैं। निरालाजी उन दिनों अपना भोजन स्वयं बनाते थे और उस समय रसोई में ही थे। कोई दो मिनट बाद उन्होंने आकर बैठके में झाँका और बोले, ''अरे तुम !'' और तत्काल ओट हो गए।

सुमनजी तो रसोई में खबर भिजवाने के लिए मेरा पूरा नाम बताने चले गए थे, लेकिन अपने नाम की कठिनाई मैं जानता हूँ इसीलिए मैंने संक्षिप्त सूचना भिजवायी थी कि 'कोई मिलने आए हैं'। क्षणभर की झाँकी में हमने देख लिया कि निरालाजी केवल कौपीन पहने हुए थे। थोड़ी देर बाद आए तो उन्होंने तहमद लगा ली थी और कंधे पर अँगोछा डाल लिया था।

बातें होने लगीं। मैं तो बहुत कम बोला। यों भी कम बोलता और इस समय यह देखकर कि निरालाजी बड़ी संतुलित बातें कर रहे हैं मैंने चुपचाप सुनना ही ठीक समझा। लेकिन सुमनजी और चुप रहना? फिर वह तो निराला को प्रसन्न देखकर उन्हें और भी प्रसन्न करना चाह रहे थे, इसलिए पूछ बैठे, ''निरालाजी, आजकल आप क्या लिख रहे हैं?''
यों तो किसी भी लेखक को यह प्रश्न एक मूर्खतापूर्ण प्रश्न जान पड़ता है। शायद सुमन से कोई पूछे तो उन्हें भी ऐसा ही लगे। फिर भी न जाने क्यों लोग यह प्रश्न पूछ बैठते हैं।

निराला ने एकाएक कहा, ''निराला, कौन निराला? निराला तो मर गया। निराला इज़ डेड।''

अँग्रेज़ी का वाक्य सुनकर मैं डरा कि अब निराला बिलकुल बहक जाएँगे और अँग्रेज़ी में न जाने क्या-क्या कहेंगे, लेकिन सौभाग्य से ऐसा हुआ नहीं। हमने अनुभव किया कि निराला जो बात कह रहे हैं वह मानो सच्चे अनुभव की ही बात है : जिस निराला के बारे में सुमन ने प्रश्न पूछा था वह सचमुच उनसे पीछे कहीं छूट गया है। निराला ने मुझसे पूछा, ''तुम कुछ लिख रहे हो ?''

मैंने टालते हुए कहा, ''कुछ-न-कुछ तो लिखता ही हूँ, लेकिन उससे संतोष नहीं है- वह उल्लेख करने लायक भी नहीं है।''
इसके बाद निरालाजी ने जो चार-छ: वाक्य कहे उनसे मैं आश्चर्यचकित रह गया। उन्हें याद करता हूँ तो आज भी मुझे आश्चर्य होता है कि हिंदी काव्य-रचना में जो परिवर्तन हो रहा था, उसकी इतनी खरी पहचान निराला को थी-उस समय के तमाम हिंदी आचार्यों से कहीं अधिक सही और अचूक- और वह तब जब कि ये सारे आचार्य उन्हें कम-से-कम आधा विक्षिप्त तो मान ही रहे थे।

निराला ने कहा, ''तुम जो लिखते हो वह मैंने पढ़ा है।'' (इस पर सुमन ने कुछ उमँगकर पूछना चाहा था, ''अरे निरालाजी, आप अज्ञेय का लिखा हुआ भी पढ़ते हैं?'' मैंने पीठ में चिकोटी काटकर सुमन को चुप कराया, और अचरज यह कि वह चुप भी हो गए- शायद निराला की बात सुनने का कुतूहल जयी हुआ) निराला का कहना जारी रहा, ''तुम क्या करना चाहते हो वह हम समझते हैं।'' थोड़ी देर रुककर और हम दोनों को चुपचाप सुनते पाकर उन्होंने बात जारी रखी। ''स्वर की बात तो हम भी सोचते थे। लेकिन असल में हमारे सामने संगीत का स्वर रहता था और तुम्हारे सामने बोलचाल की भाषा का स्वर रहता है।'' वह फिर थोड़ा रुक गए; सुमन फिर कुछ कहने को कुलबुलाए और मैंने उन्हें फिर टोक दिया। ''ऐसा नहीं है कि हम बात को समझते नहीं हैं। हमने सब पढ़ा है और हम सब समझते हैं। लेकिन हमने शब्द के स्वर को वैसा महत्त्व नहीं दिया, हमारे लिए संगीत का स्वर ही प्रमाण था।'' मैं फिर भी चुप रहा, सुनता रहा। मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य की बात थी कि निराला इस अंतर को इतना स्पष्ट पहचानते हैं। बड़ी तेजी से मेरे मन के सामने उनकी 'गीतिका' की भूमिका और फिर सुमित्रानंदन पंत के 'पल्लव' की भूमिका दौड़ गई थी। दोनों ही कवियों ने अपने प्रारंभिक काल की कविता की पृष्ठभूमि में स्वर का विचार किया था, यद्यपि बिलकुल अलग-अलग ढंग से। उन भूमिकाओं में भी यह स्पष्ट था कि निराला के सामने संगीत का स्वर है, कविता के स्वर और ताल का विचार वह संगीत की भूमि पर खड़े होकर ही करते हैं; जबकि स्वर और स्वर-मात्रा के विचार में पंत के सामने संगीत का नहीं, भाषा का ही स्वर था और सांगीतिकता के विचार में भी वह व्यंजन-संगीत से हटकर स्वर-संगीत को वरीयता दे रहे थे। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि 'पल्लव' के पंत, 'गीतिका' के निराला से आगे या अधिक 'आधुनिक' थे। लेकिन जिस भेंट का उल्लेख मैं कर रहा हूँ उसमें निराला का स्वर-संवेदन कहीं आगे था जबकि उस समय तक पंत अपनी प्रारंभिक स्थापनाओं से न केवल आगे नहीं बढ़े थे बल्कि कुछ पीछे ही हटे थे (और फिर पीछे ही हटते गए)। उस समय का नए से नया कवि भी मानने को बाध्य होता कि अगर कोई पाठक उसके स्वर से स्वर मिलाकर उसे पढ़ सकता है तो वह आदर्श सहृदय पाठक निराला ही है। एक पीढ़ी का महाकवि परवर्ती पीढ़ी के काव्य को इस तरह समझ सके, परवर्ती कवि के लिए इससे अधिक आप्यायित करनेवाली बात क्या हो सकती है।

सुमन ने कहा, ''निरालाजी, अब इसी बात पर अपना एक नया गीत सुना दीजिए।''
मैंने आशंका-भरी आशा के साथ निराला की ओर देखा। निराला ने अपनी पुरानी बात दोहरा दी, ''निराला इज़ डेड। आई एम नॉट निराला!''
सुमन कुछ हार मानते हुए बोले, ''मैंने सुना है, आपकी नई पुस्तक आई है 'अर्चना'। वह आपके पास है-हमें दिखाएँगे ?''
निराला ने एक वैसे ही खोये हुए स्वर में कहा, ''हाँ, आई तो है, देखता हूँ।'' वह उठकर भीतर गए और थोड़ी देर में पुस्तक की दो प्रतियाँ ले आए। बैठते हुए उन्होंने एक प्रति सुमन की ओर बढ़ायी जो सुमन ने ले ली। दूसरी प्रति निराला ने दूसरे हाथ से उठायी, लेकिन मेरी ओर बढ़ायी नहीं, उसे फिर अपने सामने रखते हुए बोले, ''यह तुमको दूँगा।''
सुमन ने ललककर कहा, ''तो यह प्रति मेरे लिए है ? तो इसमें कुछ लिख देंगे ?''

निराला ने प्रति सुमन से ले ली और आवरण खोलकर मुखपृष्ठ की ओर थोड़ी देर देखते रहे। फिर पुस्तक सुमन को लौटाते हुए बोले, ''नहीं, मैं नहीं लिखूँगा। वह निराला तो मर गया।''

सुमन ने पुस्तक ले ली, थोड़े-से हतप्रभ तो हुए, लेकिन यह तो समझ रहे थे कि इस समय निराला को उनकी बात से डिगाना संभव नहीं होगा।

निराला फिर उठकर भीतर गए और कलम लेकर आए। दूसरी प्रति उन्होंने उठायी, खोलकर उसके पुश्ते पर कुछ लिखने लगे। मैं साँस रोककर प्रतीक्षा करने लगा। मन तो हुआ कि जरा झुककर देखूँ कि क्या लिखने जा रहे हैं, लेकिन अपने को रोक लिया। कलम की चाल से मैंने अनुमान किया कि कुछ अँग्रेज़ी में लिख रहे हैं।

दो-तीन पंक्तियाँ लिखकर उनका हाथ थमा। आँख उठाकर एक बार उन्होंने मेरी ओर देखा और फिर कुछ लिखने लगे। इसी बीच सुमन ने कुछ इतराते हुए-से स्वर में कहा, ''निरालाजी, इतना पक्षपात ? मेरे लिए तो आपने कुछ लिखा नहीं और...''

निरालाजी ने एक-दो अक्षर लिखे थे; लेकिन सुमन की बात पर चौंककर रुक गए। उन्होंने फिर कहा, ''नहीं, नहीं, निराला तो मर गया। देयर इज नो निराला। निराला इज़ डेड।''
अब मैंने देखा कि पुस्तक में उन्होंने अँग्रेज़ी में नाम के पहले दो अक्षर लिखे थे-एन, आई, लेकिन अब उसके आगे दो बिंदियाँ लगाकर नाम अधूरा छोड़ दिया, नीचे एक लकीर खींची और उसके नीचे तारीख डाली 18-5-51 और पुस्तक मेरी ओर बढ़ा दी।

पुस्तक मैंने ले ली। तत्काल खोलकर पढ़ा नहीं कि उन्होंने क्या लिखा है। निराला ने इसका अवसर भी तत्काल नहीं दिया। खड़े होते हुए बोले : ''तुम लोगों के लिए कुछ लाता हूँ।''
मैंने बात की व्यर्थता जानते हुए कहा, ''निरालाजी, हम लोग अभी नाश्ता करके चले थे, रहने दीजिए।'' और इसी प्रकार सुमन ने भी जोड़ दिया, ''बस, एक गिलास पानी दे दीजिए।''
''पानी भी मिलेगा,'' कहते हुए निराला भीतर चले गए। हम दोनों ने अर्थभरी दृष्टि से एक-दूसरे को देखा। मैंने दबे स्वर में कहा, ''इसीलिए कहता था कि सवेरे जल्दी चलो।''
फिर मैंने जल्दी से पुस्तक खोलकर देखा कि निरालाजी ने क्या लिखा था। कृतकृत्य होकर मैंने पुस्तक फुर्ती से बंद की तो सुमन ने उतावली से कहा, ''देखें, देखें...''
मैंने निर्णयात्मक ढंग से पुस्तक घुटने के नीचे दबा ली, दिखाई नहीं। घर पहुँचकर भी देखने का काफ़ी समय रहेगा।
इस बीच निराला एक बड़ी बाटी में कुछ ले आए और हम दोनों के बीच बाटी रखते हुए बोले, ''लो, खाओ, मैं पानी लेकर आता हूँ,'' और फिर भीतर लौट गए।

बाटी में कटहल की भुजिया थी। बाटी में ही सफाई से उसके दो हिस्से कर दिए गए थे।
निराला के लौटने तक हम दोनों रुके रहे। यह क्लेश हम दोनों के मन में था कि निरालाजी अपने लिए जो भोजन बना रहे थे वह सारा-का-सारा उन्होंने हमारे सामने परोस दिया और अब दिन-भर भूखे रहेंगे। लेकिन मैं यह भी जानता था कि हमारा कुछ भी कहना व्यर्थ होगा-निराला का आतिथ्य ऐसा ही जालिम आतिथ्य है। सुमन ने कहा, ''निरालाजी, आप...''
''हम क्या?''
''निरालाजी, आप नहीं खाएँगे तो हम भी नहीं खाएँगे।''
निरालाजी ने एक हाथ सुमन की गर्दन की ओर बढ़ाते हुए कहा, ''खाओगे कैसे नहीं? हम गुद्दी पकड़कर खिलाएँगे।''
सुमन ने फिर हठ करते हुए कहा, ''लेकिन, निरालाजी, यह तो आपका भोजन था। अब आप क्या उपवास करेंगे ?''
निराला ने स्थिर दृष्टि से सुमन की ओर देखते हुए कहा, ''तो भले आदमी, किसी से मिलने जाओ तो समय-असमय का विचार भी तो करना होता है।'' और फिर थोड़ा घुड़ककर बोले : ''अब आए हो तो भुगतो।''
हम दोनों ने कटहल की वह भुजिया किसी तरह गले से नीचे उतारी। बहुत स्वादिष्ट बनी थी, लेकिन उस समय स्वाद का विचार करने की हालत हमारी नहीं थी।
जब हम लोग बाहर निकले तो सुमन ने खिन्न स्वर में कहा, ''भाई, यह तो बड़ा अन्याय हो गया।''
मैंने कहा, ''इसीलिए मैं कल से कह रहा था कि सवेरे जल्दी चलना है, लेकिन आपको तो सिंगार-पट्टी से और कोल्ड-क्रीम से फ़ुरसत मिले तब तो! नाम 'सुमन' रख लेने से क्या होता है अगर सवेरे-सवेरे सहज खिल भी न सकें!''
यों हम लोग लौट आए। घर आकर फिर अर्चना की मेरी प्रति खोलकर हम दोनों ने पढ़ा। निराला ने लिखा था :

To Ajneya,
the Poet, Writer and Novelist
in the foremost rank.
Ni...
18.5.51

सन् '36 और सन् '51 के बीच, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, निरालाजी से अनेक बार मिलन हुआ। उनके 'तुलसीदास' का पहला प्रकाशन 1938 में हुआ था और मैंने उनकी रचनाओं के बारे में अपनी धारणा के आमूल परिवर्तन की घोषणा रेडियो से जिस समीक्षा में की थी उसका प्रसारण शायद 1940 के आरंभ में हुआ था। मेरठ में 'हिंदी साहित्य परिषद्' के समारोह के लिए मैंने उन्हें आमंत्रित किया तो आमंत्रण उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और मेरठ के प्रवास में वह कुछ समय श्रीमती होमवती देवी के यहाँ और कुछ समय मेरे यहाँ ठहरे। होमवतीजी उस समय परिषद् की अध्यक्षा भी थीं और निरालाजी को अपने यहाँ ठहराने की उनकी हार्दिक इच्छा थी। जिस बँगले में वह रहती थीं उसके अलावा एक और बँगला उनके पास था जो उन दिनों आधा खाली था और निरालाजी के वहीं ठहरने की व्यवस्था की गई। वह बँगला होमवतीजी के आवास से सटा हुआ होकर भी अलग था, इसलिए सभी आश्वस्त थे कि अतिथि अथवा आतिथेय को कोई असुविधा नहीं होगी- यों थोड़ी चिंता भी थी कि होमवतीजी के परम वैष्णव संस्कार निरालाजी की आदतों को कैसे सँभाल पाएँगे। मेरा घर वहाँ से तीन-एक फर्लांग दूर था और छोटा भी था; सुमन, प्रभाकर माचवे और भारतभूषण अग्रवाल को मेरे यहाँ ठहराने का निश्चय हुआ था।

होमवतीजी ने श्रद्धापूर्वक निरालाजी को ठहरा तो लिया, लेकिन दोपहर का भोजन उन्हें कराने के बाद वह दौड़ी हुई मेरे यहाँ आयीं। ''भाई जी, शाम का भोजन क्या होगा ? लोग तो कह रहे हैं कि निरालाजी तो शाम को शराब के बिना भोजन नहीं करते और भोजन भी माँस के बिना नहीं करते। हमारे यहाँ तो यह सब नहीं चल सकता। और फिर अगर हम उधर अलग इंतजाम करें भी तो लाएगा कौन और सँभालेगा कौन ?''

यह कठिनाई होने वाली है इसका हमें अनुमान तो था, लेकिन होमवतीजी के उत्साह और उनकी स्नेहभरी आदेशना के सामने कोई बोला नहीं था।

उन्हें तो किसी तरह समझा-बुझाकर लौटा दिया गया कि हम लोग कुछ व्यवस्था कर लेंगे, उन्हें इसमें नहीं पड़ना होगा। संयोजकों में शराब से परिचित कोई न हो ऐसा तो नहीं था। शाम को एक अद्धा निरालाजी की सेवा में पहुँचा दिया गया और निश्चय हुआ कि भोजन कराने भी उन्हें सदर के होटल में ले जाया जाएगा।

इधर हम लोग शाम का भोजन करने बैठे ही थे कि होटल से लौटते हुए निरालाजी मेरे यहाँ आ गए। (मैं दूसरी मंजिल पर रहता था।) पता लगा कि उन्होंने ही सीधे बँगले पर न लौटकर मेरे यहाँ आने की इच्छा प्रकट की थी। सुरूर की जिस हालत में वह थे उससे मैंने यह अनुमान किया कि ऐसा निरालाजी ने इसीलिए किया होगा कि वह उस हालत में होमवतीजी के सामने नहीं पड़ना चाहते थे। (मैंने दूसरे अवसरों पर भी लक्ष्य किया कि ऐसे मामलों में उनका शिष्ट आचरण का संस्कार बड़ा प्रबल रहता था।) लेकिन यहाँ पर भी मेरी बहिन अतिथियों को भोजन करा रही थीं, इससे निरालाजी को थोड़ा असमंजस हुआ। वह चुपचाप एक तरफ एक खाट पर बैठ गए। हम लोगों ने भोजन जल्दी समाप्त करके उनका मन बहलाने की कोशिश की, लेकिन वह चुप ही रहे। एक-आध बार 'हूँ' से अधिक कुछ बोले नहीं। उनसे जो बात करता उसकी ओर एकटक देखते रहते मानो कहना चाहते हों, ''हम जानते हैं कि हमें बहलाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन हम बहलेंगे नहीं।''
एकाएक निरालाजी ने कहा, ''सुमन, इधर आओ।'' सुमनजी उनके समीप गए तो निराला ने उनकी कलाई पकड़ ली और कहा, ''चलो।''
''कहाँ, निरालाजी ?''
''घूमने।'' सुमन ने बेबसी से मेरी ओर देखा। वह भी जानते थे कि छुटकारा नहीं है और मैं भी समझ गया कि बहस व्यर्थ होगी। नीचे उतरकर मैं एक बढिय़ा-सा ताँगा बुला लाया। निरालाजी सुमन के साथ उतरे और उस पर आगे सवार होने लगे तो ताँगेवाले ने टोकते हुए कहा, ''सरकार, घोड़ा दब जाएगा-आप पीछे बैठें और आपके साथी आगे बैठ जाएँगे।''
निरालाजी क्षण ही भर ठिठके। फिर अगली तरफ़ ही सवार होते हुए बोले, ''ये पीछे बैठेंगे, ताँगा दबाऊ होता है तो तुम भी पीछे बैठकर चलाओ। नहीं तो रास हमें दो-हम चलाएँगे।''
ताँगेवाले ने एक बार सबकी ओर देखकर हुक्म मानना ही ठीक समझा। वह भी पीछे बैठ गया, रास उसने नहीं छोड़ी। पूछा, ''कहाँ चलना होगा, सरकार ?''
निरालाजी ने उसी आज्ञापना भरे स्वर में कहा, ''देखो, दो घंटे तक यह सवाल हमसे मत पूछना। जहाँ तुम चाहो लेते चलो। अच्छी सड़कों पर सैर करेंगे। दो घंटे बाद इसी जगह पहुँचा देना, पैसे पूरे मिलेंगे।''
ताँगेवाले ने कहा, 'सरकार' और ताँगा चल पड़ा। मैं दो घंटे के लिए निश्चिंत होकर ऊपर चला आया।
रात के लगभग बारह बजे ताँगा लौटा और सुमन अकेले ऊपर आए। निरालाजी देर से लौटने पर वहीं सो सकते हैं, यह सोचकर उनके लिए एक बिस्तर और लगा दिया गया था, लेकिन सुमन ने बताया कि निरालाजी सोएँगे तो वहीं जहाँ ठहरे हैं क्योंकि होमवतीजी से कहकर नहीं आए थे। लिहाजा मैंने उसी ताँगे में उन्हें बँगले पर पहुँचा दिया और टहलता हुआ पैदल लौट आया।

अगले दिन सवेरे ही होमवतीजी के यहाँ देखने गया कि सब कुछ ठीक-ठाक तो है, तो होमवतीजी ने अलग ले जाकर मुझे कहा, ''भैया, तुम्हारे कविजी ने कल शाम को बाहर जो किया हो, यहाँ तो बड़े शांत भाव से, शिष्ट ढंग से रहते हैं।''
मैंने कहा, ''चलिए, आप निश्चिंत हुईं तो हम भी निश्चिंत हुए। यों डरने की कोई बात थी नहीं।''

दूसरे दिन मैं शाम से ही निरालाजी को अपने यहाँ ले आया। भोजन उन्होंने वहीं किया और प्रसन्न होकर कई कविताएँ सुनायीं। काश कि उन दिनों टेप रिकार्डर होते-'राम की शक्तिपूजा' अथवा 'जागो फिर एक बार' अथवा 'बादल राग' के वे वाचन परवर्ती पीढिय़ों के लिए संचित कर दिए गए होते। प्राचीन काल में काव्य-वाचक जैसे भी रहे हों, मेरे युग में तो निराला जैसा काव्य-वाचक दूसरा नहीं हुआ।

रघुवीर सहाय ने लिखा है, ''मेरे मन में पानी के कई संस्मरण हैं।'' निराला के काव्य को अजस्र निर्झर मानकर मैं भी कह सकता हूँ कि 'मेरे मन में पानी के अनेक संस्मरण हैं- अजस्र बहते पानी के, फिर वह बहना चाहे मूसलाधार वृष्टि का हो, चाहे धुआँधार जल-प्रपात का, चाहे पहाड़ी नदी का, क्योंकि निराला जब कविता पढ़ते थे तब वह ऐसी ही वेगवती धारा-सी बहती थी। किसी रोक की कल्पना भी तब नहीं की जा सकती थी- सरोवर-सा ठहराव उनके वाचन में अकल्पनीय था।'
और क्योंकि पानी के अनेक संस्मरण हैं, इसलिए उन्हें दोहराऊँगा नहीं।
उन्हीं दिनों के आसपास उनसे और भी कई बार मिलना हुआ; दिल्ली में वह मेरे यहाँ आए थे और दिल्ली में एकाधिक बार उन्होंने मेरे अनुरोध किये बिना ही सहज उदारतावश अपनी नई कविताएँ सुनाईं। फिर इलाहाबाद में भी जब-तब मिलना होता; पर कविता सुनने का ढंग का अवसर केवल एक बार हुआ क्योंकि इलाहाबाद में धीरे-धीरे एक अवसाद उन पर छाता गया था जो उन्हें अपने परिचितों के बीच रहते भी उनसे अलग करता जा रहा था। पहले भी उन्होंने गाया था :

मैं अकेला
देखता हूँ आ रही
मेरी दिवस की सांध्य वेला।
... ...
जानता हूँ नदी झरने
जो मुझे थे पार करने
कर चुका हूँ
हँस रहा यह देख
कोई नहीं भेला।
अथवा
स्नेह निर्झर बह गया है
रेत-सा तन रह गया है
... ...
बह रही है हृदय पर केवल अमा
मैं अलक्षित रहूँ, यह
कवि कह गया है।


लेकिन इन कविताओं के अकेलेपन अथवा अवसाद का स्वर एकसंचारी भाव का प्रतिबिंब है जिससे दूसरे भी कवि परिचित होंगे। इसके अनेक वर्ष बाद के,

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!


का अवसाद मानो एक स्थायी मनोभाव है। पहले का स्वर केवल एक तात्कालिक अवस्था को प्रकट करता है जैसे और भी पहले की 'सखि वसंत आया' अथवा 'सुमन भर न लिए, सखि वसंत गया' आदि कविताएँ प्रतिक्रिया अथवा भावदशा को दर्शाती है। लेकिन 'अर्चना' और उसके बाद की कविताओं में हताश अवसाद का जो भाव छाया हुआ दीखता है वह तत्कालीन प्रतिक्रिया का नहीं, जीवन के दीर्घ प्रत्यवलोकन का परिणाम है जिससे निराला जब-तब उबरते दीखते हैं तो अपने भक्ति-गीतों में ही :

तुम ही हुए रखवाल
तो उसका कौन न होगा।
अथवा
वे दुख के दिन
काटे हैं जिसने
गिन-गिनकर
पल-छिन, तिन-तिन
आँसू की लड़ के मोती के
हार पिरोये
गले डालकर प्रियतम के
लखने को शशि मुख
दु:खनिशा में
उज्ज्वल, अमलिन।

कह नहीं सकता, इस स्थायी भाव के विकास में कहाँ तक महादेवीजी द्वारा स्थापित साहित्यकार संसद के उनके प्रवास ने योग दिया जिसमें निराला के सम्मान में दावतें भी हुईं तो मानो ऐसी ही जो उन्हें हिंदी कवि-समाज के निकट न लाकर उससे थोड़ा और अलग ही कर गईं। संसद के गंगा तटवर्ती बँगले को छोड़कर ही निरालाजी फिर दारागंज की अपनी पुरानी कोठरी में चले गए; वहीं अवसाद और भक्ति का यह मिश्र स्वर मुखरतर होता गया। और वहीं गहरे धुँधलके और तीखे प्रकाश के बीच भँवराते हुए निराला उस स्थिति की ओर बढ़ते गए जहाँ एक ओर वह कह सकते थे, ''कौन निराला ? निराला इज़ डेड!'' और दूसरी ओर दृढ़ विश्वासपूर्वक 'हिंदी के सुमनों के प्रति' सम्बोधित होकर एक आहत किंतु अखंड आत्मविश्वास के साथ यह भी कह सकते थे, ''मैं ही वसंत का अग्रदूत''। सचमुच वसंत पंचमी के दिन जन्म लेनेवाले निराला हिंदी काव्य के वसंत के अग्रदूत थे। लेकिन अब जब वह नहीं हैं तो उनकी कविताएँ बार-बार पढ़ते हुए मेरा मन उनकी इस आत्मविश्वास भरी उक्ति पर न अटककर उनके 'तुलसीदास' की कुछ पंक्तियों पर ही अटकता है जहाँ मानो उनका कवि भवितव्यदर्शी हो उठता है- उस भवितव्य को देख लेता है जो खंडकाव्य के नायक तुलसीदास का नहीं, उसके रचयिता निराला का ही है :

यह जागा कवि अशेष छविधर
इसका स्वर भर भारती मुक्त होएँगी
... ...
तम के अमाज्य रे तार-तार
जो, उन पर पड़ी प्रकाश धार
जग वीणा के स्वर के बहार रे जागो;
इस पर अपने कारुणिक प्राण
कर लो समक्ष देदीप्यमान-
दे गीत विश्व को रुको, दान फिर माँगो।

इस अशेष छविधर कवि ने दान कभी नहीं माँगा, पर विश्व को दिया- गीत दिया, पर उसके लिए भी रुका नहीं, बाँटते-बाँटते ही तिरोधान हो गया : मैं अलक्षित रहूँ, यह कवि कह गया है।

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