20 February 2013

कोई पार्ट टाइम कवि नहीं होता : चन्द्रकान्त देवताले


चंद्रकांत देवताले से यह साक्षात्कार उन्हें 2012 का हिंदी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा के ठीक बाद प्रीति सिंह परिहार ने लिया था। इस साक्षात्कार में देवताले जी ने एक ना सिर्फ अपने लेखन बल्कि समय और समाज से जुड़े सवालों का भी जवाब दिया। यह साक्षात्कार एक कवि के नजर से साहित्य और समाज को जानने का मौका देता है. 
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  •  लेखन के लिए कविता की विधा का ही चयन क्यों किया?
  • पहला सृजनात्मक स्फुरण सहजागत होता होगा. 1951-52 में नदी नर्मदा में तैरते-छपाछप करते जो मन में उमड़ रहा था, वह मेरी पहली कविता हुई. तब आठवीं का छात्र था. हिंदी विषय में कविता-कहानी-निबंध पढ़ते ही थे. यह साहित्य है और विधा इसे कहते हैं, बाद में मालूम पड़ा. इसमें मेरा कोई चुनाव नहीं. कविता मेरे लिए ऐसी है- लगभग देश-बोली-मां जैसी. जिसका मैंने चयन नहीं किया. 



  • आपके लेखन की मूल चिंता क्या है और इसका सबसे मुश्किल पक्ष क्या है? 
  • एक चौकन्ने आदिवासी की तरह ही लेखक की मूल चिंता के केंद्र में मनुष्य और जीवन हैं. फिर इनसे जुड़े प्रकृति-पर्यावरण-भाषा सब ही. लेकिन कॉरपोरेट पूंजी की आंधी और वैश्वीकरण की सुनामी के कारण मची आपाधापी के बीच सबकुछ ही चिंता में तब्दील हो रहा है. सबसे बड़ी दिक्कत यही कि कौन कहे, किसे कहे और कौन है, जो एकजुट हो सोचते-समझते सुने कवि-लेखक की आवाज. सबकुछ गड़बड़ है. और कवि लेखकों के पास हो ही नहीं सकते समाधान के सम्मोहक नुस्खे, जो बांट रहे नेता, पाखंडी-मार्गदर्शक और वे सब, जो पूंजी-सत्ता-जमीन और मानुषधर्म भी हथियाने के लिए बेताब . फिर रचनाकार भी तो नहीं एकजुट. 


  • आपकी रचनाशीलता में पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि की भूमिका क्या रही? 
  • गांव में जन्म, नदी-सतपुड़ा के पहाड़-जंगलों के बीच खेत-खलिहान के साथ गांव के सभी रिश्ते-नातों के संबोधन. ऊंच-नीच, जात-पांत का भेद नहीं. फिर इंदौर में मिला किताबों का घर. स्वतंत्रता आंदोलन की हलचल घर और शहर में थी. एक भाई की डायरी से कविताएं बांचता, बड़ा भाई स्वतंत्रता आंदोलन में गिरफ्तार हुआ. कबीर-तुलसी की पंक्तियां पिता बात-बात में दुहराते. कॉलेज में प्रथम वर्ष- द्वितीय वर्ष के दौरान कामरेड होमीदाजी की सभाओं में शामिल होना फिर उनके लिए छात्रों के साथ चुनाव-प्रचार सीमित क्षेत्र में. अलग से प्रकृति, प्रतिबद्धता, विचारधारा, जीवन के लिए सयास कुछ नहीं. समग्र-प्रभाव. कविता खुद से बता देती है कि वह कहां से आयी है. 


  • आपकीकविताओं में प्रकृति से जुड़ी चीजें बार-बार आती हैं, इस जुड़ाव की कोई खास वजह?
  • प्रकृति के बीच रहने और उससे जुड़ने के कारण. सचेत ढंग से नहीं. चौदह-पंद्र्रह स्थानांतरण. छोटी-छोटी जगहों में प्रेम के साथ रहा. वहां का वैभव और जीवन संघर्ष, उसमें शामिल होकर महसूस करता रहा. 

  • आपकीकविता कैसे जन्म लेती है और उसके शब्दाकार होने की प्रक्रिया क्या होती है? 
  • यह सबसे कठिन प्रश्न है. कब कौन सा अनुभव, घटना, स्मृति अवचेतन-चेतन में मथने लगती और उभर आती शब्दों में कागज पर. कब, कहां, कैसे रचता हूं कविता, कभी बता नहीं पाया. चलते-फिरते-भटकते-यात्रा में रहते, हर कहीं. कोई पार्ट टाइम कवि नहीं होता. फिर भी हर समय मेज पर झुका नहीं रहता. 

  • अब तक के लेखकीय सफर और अपनी सबसे पसंदीदा कविता के बारे में कुछ कहें?
  • पहली कविता 1953 में हाईस्कूल पत्रिका में छपी. फिर 1954 में शहर के अखबार नई दुनिया में. 57-58 में ज्ञानोदय-धर्मयुग में. यानी लगभग पचास-पचपन वर्ष. रास्ता ढूंढ़ते-भूलते- कभी लड़खड़ाते, कहते रहने का मौका नहीं चूका है मैंने. फिर मेरे पास लेखन का कोई हिसाब नहीं. कई हैं पसंदीदा कविताएं, ‘मैं आपसे पूछ रहा आप बताएं-पांच-सात कविताओं के नाम और उनका तापमान’. 

  • कभी कुछ सोचा हुआ न लिख पाने की पीड़ा या रचना में कहीं कुछ छूट जाने का एहसास भी होता है?
  • बहुत कुछ हमेशा बचा रह जाता है. बरसों बाद भी लगता है कविता में यह होता, यह नहीं होता. पर इसमें परेशान होने जैसा कुछ नहीं. ‘कभी खत्म नहीं होती कविता’.

  • एक लेखक के लिए पुरस्कार के मायने क्या हैं? 
  • सम्मान का अर्थ इससे अधिक नहीं कि आपकी आवाज को सुना-पहचाना गया और सोचने-समझनेवाले समाज ने सार्थक माना. जिन्हें पुरस्कार नहीं मिलता वे कम महत्वपूर्ण नहीं हो जाते.

  • वर्तमान समय-समाज का सबसे बड़ा संकट क्या है, साहित्य की इससे उबरने में क्या भूमिका देखते हैं? 
  • वैश्विक अर्थ-व्यवस्था हमारे समाज को हांक रही है. हमारे उदार सत्ताधारी नयी-नयी ईस्ट इंडिया कंपनियों को व्यापार के लिए आमंत्रित कर रहे हैं. मुट्ठी भर लोग समृद्धि के द्वीप पर फरेबी ख्वाब दिखाते और अस्सी प्रतिशत के लगभग जन-जीवन विपन्नता और वंचनाओं का शिकार- फिर विस्फोट प्रसार माध्यम सन्निपात फैलाने में मगन. इसका असर सृजनात्मक जगत पर भी पड़ा है.   रचनाकार विरोध, गवाही और छद्म को बेधने का कार्य कर ही रहा है. पर जैसा मुक्तिबोध ने कहा-साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा करना मूर्खता है, रचनाकार को शब्दों से बाहर आना होगा. पर यह उतना आसान नहीं. बेहद विकट हो गया कवि कर्म आज. 

  • लेखन से इतर क्या पसंद है? 
  • यह प्रश्न बेहद दिलचस्प है. मैं जो कह रहा उस पर भरोसा करना. यद्यपि संकेत भर कर रहा...बचपन से पेड़-पौधों में रुचि रही, जो अभी तक कायम है. पर्यावरण-हरियाली के लिए कुछ न कुछ किया. पेंटिंग में भी. 1964 में 60 से अधिक चित्रों की प्रदर्शनी. हां! पंरिदों-गिलहरी से बहुत प्यार रहा. ब्लैक डॉग भी है, जिसे मैं बकु पंडित कहता हूं, मेरा प्रिय साथी है वह इन दिनों. मुझसे भी उम्र दराज पर वही मुझे सुबह घुमाता है. सब्जी बाजार जाना मुझे बहुत पसंद है. जहां-जहां गया देश में सब्जी मार्केट जरूर गया. बस्तर में आदिवासी हाट के दिन पूरे समय मंडराता रहा दो हाटों में. पर्यटन-गपशप और संगीत से भी जुड़ाव. अंतिम बात, मैं बहुत चटोरा हूं. खाने को बहुत इंजॉय करता हूं. कुकिंग और व्यंजन बनाने की प्रतियोगिता में पुरस्कृत भी हुआ हूं. फ्यूजन करते व्यंजनों को नया स्वाद देना सुहाता है. ‘आम्र पायस’ और ‘भुट्टे के दूध की नुक्ती’ पर पुरस्कार मिला था. अब दरख्तों और परिंदों के साथ अकेलापन भी अच्छा लगता है. बौद्धिक दांभिक और पाखंडियों से दूर रहते साधारण जनों से बातचीत प्राणवंत लगती है.           

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