21 February 2013

यह वक़्त नहीं, एक मुकदमा है : चंद्रकांत देवताले



चंद्रकांत देवताले 18-19 फरवरी को दिल्ली में थे. मौक़ा था साहित्य अकादमी पुरस्कार ग्रहण करने का. बेहद सहज स्वभाव वाले देवताले जी, जिन्होंने सच बोलने की अपनी जिद के कारण झूठ यानी कविता का रास्ता चुना,  ने इस मौके पर राइटर्स मीट कार्यक्रम में अपनी कविता और अपने समय पर एक कवि की जमीन पर खड़े हो कर बात की। सम्मान लेने के बाद दिए गए उनके वक्तव्य को आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इसमें न वैचारिकी का घटाटोप है न अपने लिखे को महिमामंडित करने की कोई कोशिश… यह एक कवि  का अपनी कविता पर दिल से दिया हुआ वक्तव्य है. 
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मंच पर आसीन मेरे सभी समानधर्मा हमसफर साथी! भवन में उपस्थित सुधीजनों,
यह प्रतिष्ठित प्रसंग मेरे लिए आत्ममुग्धता का नहीं, आप सबके बीच होने और अपनी आवाज की  सार्थकता के एहसास का है. इस बुलडोजर सुनामी समय में जो हर तरह से विस्थापित कर रहा है, एक कवि क्या कह और और कर सकता है! फिर भी बहुत कुछ जो उमड़-घुमड़ रहा है मेरे भीतर, अव्यवस्थित ही सही, संक्षेप में कहने की कोशिश करूंगा. मैं अपनी ही बात  कहूंगा- क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि कविता या कवियों का कोई प्रवक्ता नहीं हो सकता.

मेरे भीतर से आवाज आ रही है कि मैं आपको बता दूं कि भाषा की धरती मुझे कहां और कैसे मिली और मेरे नसीब में कविता का घर कैसे आया? घर न दान में, न उधार में, न किराये का. यह घर पुरखों और मेरे बचपन, किशोरावस्था, परिवार, कस्बे, शहर के वातावरण ने दिया विरासत में. आदिवासी इलाके में जन्म, ताप्ती-नर्मदा किनारे बचपन, गांव के नाते-रिश्ते आज तक मेरे साथ हैं. इंदौर में द्वितीय विश्वयुद्ध और स्वतंत्रता आंदोलन की बहस के साथ कविता सुनने का अवसर मिलता था अपने घर में. 1942 में मेरे बड़े भाई स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुए. दूसरा भाई साहित्य प्रेमी हुआ.

आज से लगभग 62 वर्ष पूर्व नर्मदा नदी में छपाक-छपाक करते जो मैं बुदबुदा रहा था, घर आ कर मैंने नोट किया तो एक सहपाठी ने कहा- यह तो कविता हो गयी. 1952 में हाई स्कूल पत्रिका में मेरी ‘मजदूर’ शीर्षक से पहली कविता छपी. तब मैं नवीं का छात्र था. संत कबीर, सियारामशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आदि पुरखों की कविता पंक्तियों ने मुझे संस्कार, सोच व जीवन-दृष्टि प्रदान की, जिनसे मेरी पक्षधरता-प्रतिबद्धता तभी तय हो गयी. बाद में बुद्ध, भगत सिंह, निराला, मुक्तिबोध, परसाई आदि के कारण यह परिपुष्ट हुई.
यह भी बताना चाहूंगा कि मुझे नकाबपोश कवि होना कभी नहीं सुनाया. मेरी इच्छा आज तक जीवित है कि मैं जहां भी होऊं कवि होने की खुशबू आसपास के लोगों को मुझसे मिले और जिन्हें चुभना चाहिए मेरे कांटे चुभें. जिस तरह मनुष्य उसी तरह कवि एक साथ. दोनों के बीच विभाजन नहीं. यह भी कि जैसे मनुष्यता पेशा नहीं हो सकता, कविताई भी धंधा नहीं हो सकती.

चौवन में 'नई दुनिया', इंदौर में फिर सत्तावन में 'ज्ञानोदय', 'धर्मयुग' में कविता प्रकाशित हुई. यहां मुझे अपनी मां एकाएक याद आ रही है. कविता के कारण मुझे बचाती हुई. वाकया 1960 का है. मैं हिंदी साहित्य में  एमए प्रथम श्रेणी, आठ-दस महीनों से बेकार भटक रहा था. आत्महत्या की बात बार-बार मन में आती. इस इरादे को अंजाम देने के पहले मैंने एक कविता लिखी- ‘मेरे मरने के बाद’. उसमें यह भी था कि रामू पानवाले को दो सौ तीस रुपये चुका देना- कैसे भी, बेचारे ने बिन पैसे मांगे बेकारी के ध्वस्त दिनों में पान खिलाए हैं मुझको.’ यह कविता मेरे बड़े भाई के हाथ लग गयी और उन्होंने मां को सुना दी. मां बहुत रोई-धोई और चुपचाप पानवाले का हिसाब चुकता कर आ गयी. इस तरह संतप्त मां को देखने के बाद कोई कैसे मर सकता था, तो कविता के कारण बचा और ऋणमुक्त भी हुआ.

हां! कविता बचाती तो है, पर सौगात होते हुए भी कवि होना एक नैतिक सजा है. सतत दोहरी जासूसी जमाने और खुद की भी. कवि वैसे भी अन्याय विरोधी और विद्रोही होता है. मुक्तिबोध ने कहा भी है कि ‘सच्चा लेखक अपने खुद का दुश्मन होता है. वह अपनी आत्मा की शांति भंग करके ही लेखक बना रहता है’. शायद  ऐसी ही पीड़ा के साथ हिंदी साहित्य के प्रणेता भारतेंदु हरिश्चंद्र ने एक सौ तीस वर्ष पूर्व अपने भारत दुर्दशा नाटक में आह्वान किया था कि आओ भाई इकट्ठे हो कर आंसू बहाओ अब भारत की दयनीय अवस्था देखी नहीं जाती. बीसवीं सदी के प्रारंभ में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था- हम क्या थे? क्या हो गये? क्या होंगे अभी?’ आज एक सदी के बाद निरंतर डेंजरस होते जा रहे शाइनिंग इंडिया में हम भाषा-विचार-सृजन-संस्कृति के एक तरह से पहरेदार क्या कहेंगे?

मैं भी प्रश्नों-संदेहों और संकोच के बाणों से बिंधा इस महादुर्दशा के बारे में क्या कहूं? आप सब मुझसे ज्यादा ही जानते हैं. हमसे कोई पूछनेवाला भी नहीं कि ‘क्यों खामोश थे कविगण’...‘सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्...’.ध्वस्त होते समय में साहित्यकार-बौद्धिक वर्ग कहां है? जैसा कि हेमिंगवे ने कहा था बिना घायल हुए कोई कवि नहीं हो सकता. हां हमारे पास जख्म हैं. धरती-पर्यावरण-जन संस्कृति-हमारी अस्मिता-देशीयता-भाषा और बहुजनपदीय विविधता के तहस-नहस होने के जख्म ही जख्म.
अस्सी प्रतिशत आबादी तक स्वराज का सम्मान, आधुनिकता की सुविधाओं के साथ शिक्षा-स्वास्थ्य, वैज्ञानिक सोच-समझ आज तक क्यों नहीं पहुंचा पाये? समृद्धि संपन्नता के जगमगाते  द्वीप और विपन्नता का महासमुद्र.

वैश्विक पूंजी, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और ताकतवरों के सामने सब कुछ बिकाऊ है. कई-कई जमातों-तबकों में बंटा संकीर्णतावादी सोच समाज में भेदभाव-नफरत फैलाते अराजकता जैसा वातावरण बना रहा है. और यह सब आभासी तरक्की की घोषणाओं के बीच हो रहा है. टेलीविजन दिन-रात कूड़ा-करकट फेंकते, बाजारवादी क्रांति का शंखनाद कर रहा है और विचार की जगह नष्ट कर असहिष्णुता को बढ़ावा दे रहा है.
साहित्य-विचार और वाणी को नारेबाजी के भभ्भड़ में हमने एक विराट वाशिंग मशीन के हवाले कर दिया है. यदि बुद्ध,  चंडीदास, नानक, तुकाराम और रहीम जैसों के वचनों को मन आचरण में थोड़ी भी जगह दी होती, तो हमारी आज जैसी नियति नहीं होती. फिर भी बहकानेवाले आशावाद और आत्मघाती निराशा से बचते हुए साहस के साथ अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हमें कोशिश तो करते ही रहना है और याद रखना है मार्खेज का कहा-‘प्रसिद्धि आसमान में खतरे की तरह मंडराती है.
और अंत में थोड़ा कुछ कविता की ही जुबानी.

  • मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/ मेरी कोशिश यह रही/ पत्थरों की  हवा में टकरायें मेरे शब्द/ और बीमारी की डूबती नब्ज थामकर/ ताजा पत्तियों की सांस बन जाएँ 
  • ऐसे ज़िंदा रहने से नफरत है मुझे / जिसमें हर कोई आये और मुझे अच्छा कहे/ मैं हर किसी की तारीफ़ करते भटकता रहूँ/ मेरे दुश्मन न हों/ और मैं इसे अपने हक़ में बड़ी बात मानूं। 
  • सच बोलकर सम्भव नहीं था / सच को बताना/ इसीलिये मैंने चुना झूठ का रास्ता/ कविताओं का 
  • यह वक़्त नहीं एक मुकदमा है या तो गवाही दो या हो जाओ गूंगे/ हमेशा हमेशा के वास्ते 
  • होगा जो कवि/  वही तो कहेगा/ खटाक से खुलते चाक़ू की तरह 
मैं समझ नहीं पा रहा कि  किन शब्दों में आप सबको धन्यवाद् दूँ। शायद हमारे बीच यह आवश्यक भी नहीं  मैं आपका
-चंद्रकांत देवताले 

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