24 February 2013

मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है...






साहित्य अकादमी के रवींद्र भवन सभागार में मनाया गया अरुण प्रकाश का 65वां जन्मदिन. 

अरुण प्रकाश आज होते तो 65 वर्ष के होते. दिल्ली में साहित्य अकादमी के रवींद्र भवन सभागार में पहुंचने से पहले कुछ साथी साहित्यकारों, लेखकों के फेसबुक वाल पर अरुण प्रकाश के 65वें जन्म दिन पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए लिखी गयी यह टिप्पणी अचानक झूठ और फरेब लगने लगी. कौन कहता है कि अरुण प्रकाश नहीं है! त्रिलोचन की मृत्यु के बाद समकालीन भारतीय सहित्य (जिसका उस वक्त अरुण प्रकाश संपादन कर रहे थे) का संपादकीय लिखते वक्त अरुण प्रकाश को त्रिलोचन की कविता ‘फिर न हारा’ की प्रकाश पंक्तियों की याद आयी थी. कवि के अपराजित रहने का यकीन  जैसे पक्का हुआ था. यकीन क्यों? क्योंकि कवि को मालूम है कि ‘वह साधारण निम्नवर्गीय लोगों का का हो गया’ है. अरुण प्रकाश जब त्रिलोचन की इन पंक्तियों को उद्धृत कर रहे होंगे तब उन्हें शायद इस बात का एहसास भी होगा कि उनकी राह भी उस कवि की ही है. जो कभी नहीं हारेगा. क्योंकि उनकी प्रतिबद्धता निस्कंप रूप से आम लोगों के प्रति रही.

अरुण प्रकाश के 65वें जन्मदिवस पर फिर-फिर स्मरण करने का जो उपक्रम अरुण प्रकाश के परिवार, अंतिका प्रकाशन के कर्ता-धर्ता, कहानीकार गौरीनाथ ने मिलकर उनके जाने के बाद शुरू किया है, उसके पहले आयोजन से उभर कर आनेवाले स्वर उस जहीन कहानीकार, संपादक, गद्यकार, आलोचक ओर सबसे बढ़ कर विलक्षण व्यक्तित्व के इसी तरह लगातार अपराजित रहने की तस्दीक कर गया.

अरुण प्रकाश याद किये गये. उन पर बात हुई. उनके लिखे पर बात हुई. बेहद सिलसिलेबार और ब्योरेबार तरीके से. अरुण प्रकाश पर बात करने के लिए जमा हुए नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, लीलाधर मंडलोई और रमेश उपाध्याय. इस मौके पर अंतिका प्रकाशन से आयी अरुण प्रकाष की तीन किताबों, ‘उपन्यास के रंग, भैया एक्सप्रेस, जल-प्रांतर (इन दोनों संग्रहों का नये सिरे से पुनर्प्रकाशन हुआ है.) का औपचारिक तौर पर विमोचन भी किया गया. कार्यक्रम का संचालन सत्यानंद निरुपम ने किया.
वरिष्ठ आलोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह से आग्रह किया गया था कि वे अरुण प्रकाश से जुड़े संस्मरणों को श्रोताओं के साथ साझा करें. अरुण प्रकाश की रुखसती के बाद दिल्ली में हुई उनसे मुलाकातों, बहसों, बौद्धिक नोंक-झोंक, उनकी विश्वकोषीय जानकारी के कायल होने के कई प्रसंग तो लिखे और सुनाये जा चुके हैं, लेकिन यह शायद पहली बार था, जब अरुण प्रकाश का बिहार के बरौनी-निपनिया में बिताया गया जीवन का जीवंत चलचित्र की तरह आँखों में उतर आया.  अरुण प्रकाश का जन्म निपनिया गांव में हुआ था. यह गांव गंगा की एक उपधारा "बाया" के किनारे बसा है. इस गांव में हर साल बाढ़ आया करती थी. प्रकृति हर साल यहां विनाशलीला रचती थी. जाहिर है इस संस्मरण से इस सवाल का  जवाब मिला कि आखिर अरुण प्रकाश की कालजयी कृति के तौर पर स्वीकारी जानेवाली "जल-प्रांतर" कहानी का मूल उत्स क्या था. उस अनुभव की प्रामाणिकता का राज क्या है! इस संस्मरण में अरुण प्रकाश के जीवन के ऐसे कई  आयाम उभर कर सामने आये जिसके बारे में बाद में खुद अरुण प्रकाश के पुत्र मनु प्रकाश ने कहा कि उन्हें भी अपने पिता के जीवन के इस हिस्से की जानकारी नहीं थी.

कवि लीलाधर मंडलोई ने अरुण प्रकाश की अंतिका प्रकाशन  से पिछले वर्ष आयी और बेहद सराही गयी किताब "गद्य की पहचान" पर विस्तार से चर्चा की.  कथेतर साहित्य पर संभवतः पहली बार इतने प्रामाणिक ढंग से लिखी गयी यह किताब किस तरह आलोचना की नयी जमीन तोड़ती है और किस तरह आलोचना का नया मुहावरा  रचती है, इसके बारे में लीलाधर मंडलोई ने काफी विस्तार से बताया.

वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी अरुण प्रकाश के काफी करीब रहे. उनके लेखन को नजदीक से देखनेवाले भी. विश्वनाथ त्रिपाठी को अरुण प्रकाश के स्वभाव के जिद्दीपन से आत्मीयतापूर्ण कोफ्त होती है. एक बार फिर त्रिपाठी जी ने उस जिद्दीपन को याद किया. अरुण प्रकाश के उत्कट जीवन-संघर्ष को याद किया. त्रिपाठी जी मानते हैं कि शायद यही कारण रहा है कि उनके व्यक्तित्व मे ऊबड़-खाबड़पन था. लेकिन जीवन का स्पर्श और जीवन की समझ में उनमें जबरदस्त थी. उनमें एक अद्भुत संतुलन था. बोलने-लिखने-आत्मीयता लेने में. यहीं विश्वनाथ त्रिपाठी ने एक प्रसंग सुनाया, जो अरुण प्रकाश के विचार के संतुलन, दृष्टि की स्पष्ठता और संपादकीय जिम्मेदारियो के प्रति ईमानदारी को बताता है. त्रिपाठी जी ने अरुण प्रकाश के साथ मिल कर रामविलास शर्मा की मृत्यु पर वसुधा के विशेषांक का संपादन किया था. रामविलास शर्मा पर नामवर सिंह का एक तल्खी लिया हुअ लेख, जो पहले प्रकाशित हो चुका था, त्रिपाठी जी उस विशेषांक में प्रकाषित करना चाहते थे. क्यों, क्योंकि बाकी कइयों के साथ वे भी उस लेख से दुखी हुए थे, और चाहते थे कि इस अंक में रामविलासजी पर नामवर सिंह का लिखा हुआ यह सबसे कठोर लेख भी जाये. लेकिन, अरुण प्रकाश ने उस लेख को नहीं छापा. जब त्रिपाठी जी ने सवाल पूछा तो अरुण प्रकाश का जवाब था, ‘आप रामविलास शर्मा पर विशेषांक निकाल रहे हैं, या नामवर सिंह पर.'

इस जवाब ने त्रिपाठी जी को अरुण प्रकाश के विचार के संतुलन का कायल बना दिया. अरुण प्रकाश जिद्दी थे. अपने स्वभाव के अनुरूप वे उसे छाप सकते थे. लेकिन पत्रिका की  मर्यादा थी, जो निभानी थी. और आलोचना में आलोचना दृष्टि की क्या बात! त्रिपाठी जी ने कहा कि अरुण प्रकाश की रचनाओं में भी यह आलोचना दृष्टि दिखाई देती है. यह  वह दृष्टि है, जो मानती और जानती है कि साहित्य का जनतंत्र राजनीति के जनतंत्र से कहीं बड़ा होता है. इसलिए तो अरुण प्रकाश जल-प्रांतर कहानी में रूढ़िवादी, ब्राह्णवादी पंडित को भी करुणा देना नहीं भूलते हैं. यह सहित्य का जनतंत्र है, जो समावेशी है, और इस जनतंत्र की समावेशी प्रकृति का उन्हें बखूबी ध्यान था. विश्वनाथ त्रिपाठी अरुण प्रकाश की कहानियों के कायल तो हैं, ही अब उनकी आलोचना के भी कायल हो गये हैं."उपन्यास के रंग" किताब की भूमिका ही इसका प्रमाण है.  और आखिर क्यों न हों. हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों पर किस कालक्रम दोष का आरोप लगाया जाता है, अरुण प्रकाश इतिहास के इस क्रम दोष को दूसरा ही अर्थ और आयाम जो देते है. अलग-अलग समय के ऐतिहासिक पात्रों की एक साथ उपस्थिति को दोष नहीं "इतिहास की आवाजाही" कहते हैं. द्विवेदीजी के संस्कारी पाठक जानते हैं कि यह आवाजाही भारतीय मानस की वह प्रवृत्ति है जिससे वह ‘मिथकों’, किंवदंतियों का निर्माण करती है और नायकों को अपना लेती है.

अपने अध्यक्षीय भाषण में नामवर सिंह ने अरुण प्रकाश की किताब पर पहली नजर में बने इम्प्रेशन के आधार पर कहा कि अरुण प्रकाश ने हजारीप्रसाद द्विवेदी की दुखती रग, कमजोरी और सबलता दोनों को ही पहचाना है. दूधनाथ सिंह के उपन्यास "आखिरी कलाम" की जो धज्जियां उड़ायी हैं...नामवर सिंह के मुताबिक़ आखिरी कलाम की इतनी अच्छी आलोचना आज तक लिखी नहीं गयी. नामवर सिंह ने कहा कि अरुण प्रकाष कम्युनिस्ट थे और अपनी राजनीतिक दृष्टि से वे कभी पीछे नहीं हटे. ऐसे समय में भी नहीं, जब लोग इससे बचने लगे थे. उनकी यह दृष्टि उनके पूरे लेखन में दिखाई देती है. नामवर सिंह ने कहा कि अरुण प्रकाश का सारा का सारा साहित्य एक लंबी लड़ाई है. टिकाउ साहित्य वह होता है, जो अपने साथ, अपने समय के साथ, व्यवस्था के खिलाफ लड़ता है. अरुण प्रकाश का साहित्य ऐसा ही है. अरुण प्रकाश ने अपनी रचनाओं को हथियार बना कर वह लड़ाई लड़ी. अरुण प्रकाश ने कहा भी है "मेरा लेखन ही मेरी लड़ाई है"। नामवर सिंह ने अरुण प्रकाश के शब्दों को आगे बढाते हुए जोड़ा  "उनका उपन्यास पढ़ना उस लड़ाई में शामिल होना है."
उपन्यास पर लिखी गयी यह किताब नामवर सिंह को एक नजर में कितनी पसंद आयी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इसे राल्फ फाक्स की किताब, "नोबेल एंड द पीपुल" के बाद कथा साहित्य की आलोचना पर दूसरी सबसे अच्छी किताब बताया.  और जैसे कहा गया है कि "रंग लायेगी एक दिन हमारी फाकामस्ती भी एक दिन", उसी तरह हिंदी साहित्य जगत में यह किताब हमेषा याद की जायेगी और रंग लायेगी.

आखिर में अरुण प्रकाश के पुत्र मनु प्रकाश ने धन्यवाद ज्ञापन किया. मनु को कुछ दिन पहले विश्वनाथ  त्रिपाठी ने कहा था कि अरुण से हर बार मिलना उत्सव जैसा होता था. 65वें जन्मदिन पर रवींद्र भवन में ऐसा ही एक उत्सव का माहौल था. यह उत्सव था, अरुण प्रकाश के लेखन पर विचारोत्तेजक बहस का. अरुण प्रकाश के 65वें जन्मदिन के कार्यक्रम से लौटते हुए डी टी सी की बस में कतील शिफाई के एक मिसरे की याद आती रही,
"ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मर के भी मेरी जान तुम्हे चाहूँगा / तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको /ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है…"

अरुण प्रकाश आज भी अपने चाहने वालों को कुछ ऐसे ही चाह रहे हैं। उनकी उम्र तो हमें मोहब्बत देने के लिए कम साबित हुई ही ...



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