25 August 2009

जिन्ना और विभाजन पर कुछ और




इसे अपनी राय बनाने के लिए जरूरी सामग्री की तरह पढें..यहाँ कोई निष्कर्ष निकालने कि कोशिश नहीं की गई है..बस कुछ प्रचलित school of thought को  आपके सामने रख रहा हूँ.उम्मीद है इससे आपको विभाजन को समझने में मदद मिलेगी 


अगर भारत का विभाजन नहीं हुआ होता तो भारत कैसा होता ...यकीनन वैसा नहीं जैसा  आज है..भारत को ऐसा बनाने के लिए विभाजन ज़रूरी था ..नेहरु ने 1946 में कृष्णा मेनन को लिखे एक पत्र मे लिखा था कि भारत का शासन  चलने के लिए ये जरूरी है कि भारत का ,बल्कि  कहें कि पंजाब और बंगाल का विभाजन कर दिया जाए ..नेहरु ने ये भी लिखा कि आर्थिक दृष्टि से संपन्न बंगाल और पंजाब का हिस्सा भारत के साथ रहेगा और इस तरह जो पाकिस्तान बनेगा वह आर्थिक दृष्टि से अत्यं कमजोर होगा जो खुद को शायद ही संभाल सके...
साफ़ है नेहरु भी विभाजन चाहते थे...संभवतः ऐसा चाहने के लिए वे मजबूर किये गए थे.
नेहरु ने कभी जिन्ना कि तरह पकिस्तान कि मांग नहीं कि..लेकिन नेहरु की राजनीति ने पाकिस्तान कि मांग को मजबूत ही किया..पकिस्तान कि मांग 1940 में की गई थी.1940  से 1947   तक का साल भारतीय राजनीति में इतना उथल पुथल भरा  रहा कि पाकिस्तान कि मांग से निपटने के  लिए कौंग्रेस के पास कोई नीति बनाने के लिए वक़्त ही नहीं था..
जैसा कि पाकिस्तानी इतिहासकार आएशा  जलाल ने लिखा है..जिन्ना ने पकिस्तान की मांग स्वतंत्र पाकिस्तान के लिए नहीं की थी..वे तो बस इसके सहारे मुस्लिमों के लिए ज्यादा से ज्यादा रियायत,सत्ता का मुस्लिमों के हित में ज्यादा से ज्यादा विकेंद्रिकर्ण चाहते थे..यह एक  दाँव (bluff  )था..लेकिन नेहरु और पटेल ने जिन्ना के इस दाँव को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भुमिका निभायी..जितनी आसानी से ये दोनों नेता पाकिस्तान की मांग  को मान गए उससे बकौल आएशा  जलाल, खुद जिन्ना को भी हैरानी हुई थी.
कहा जाता है कि जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्सन दिवस कि घोषणा कर के समझौते कि बची - खुची आशा को भी मिटा दिया.लेकिन इस बात कि प्रायः कोई चर्चा नहीं की जाती कि आखिर जिन्ना को डायरेक्ट एक्सन दिवस की घोषणा करने कि नौबत क्यों आयी.नेहरु कि जीवनी लिखनेवाले बेंजामिन जकारिया .ने लिखा है कि कैबिनेट मिशन योजना को असफल बनाने में नेहरु का भी हाथ था..मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने भी इस बात का अपनी किताब इंडिया विन्स फ्रीडम में जिक्र किया है..आज़ाद के अनुसार कैबिनेट मिशन प्रस्ताव पर नेहरु ने जो जनसभाएं की  उसमे उन्होंने लगातार यह कहा कि हम इस प्रस्ताव से बंधे  नहीं हैं..दरअसल नेहरु केंद्रीय शासन व्यवस्था का सपना संजो चुके थे और इस सपने में वे समूहीकरण के कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव को मानने के लिए तैयार  नहीं थे...इस प्रस्ताव में शक्ति के विकेंद्रीकरण और एक कमजोर केंद्र का प्रस्ताव था....माना  ये जाता है कि नेहरु के इस रवैय्ये ने जिन्ना को डायरेक्ट एक्सन दिवस कि घोषणा करने पर मजबूर किया ..क्यूकि तब तक जिन्ना को एहसास हो चुका था को कौंग्रेस मुस्लिमों कि मांग को पूरा करने का इरादा नहीं रखती.
ये बात शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि मुस्लिम लीग के लियाकत अली जो आगे पाकिस्तान के पहले प्रधान मंत्री बने,बजट पेश करने वाले पहले भारतीय थे..यह बजट मार्च 1947   में पेश किया गया था.इसमें अमीर उद्योगपतियों  पर जिन्होंने युद्ध के समय भारी मुनाफा कमाया था,,ज्यादा कर लगाने कि मांग की गई थी.नेहरु ने भी  लगातार इस  बात पर सहमती जतायी थी.लेकिन कौंग्रेस  इसे लियाकत  अली द्बारा हिन्दू  व्यापारियों को तंग करने की नीति माना और इस बजट का विरोध किया..अंत नेहरु ने इस बजट को अस्वीकार कर दिया और इस बजट की  जगह एक पूर्णतः बदला हुआ  बजट पेश किया.गया..इस प्रकरण ने एक बार फिर इस बात को साबित किया कि भारत को मुस्लिमों के हिसाब से नहीं चलाया  जाएगा और कौंग्रेस हिदुओं का हित साधने वाली  पार्टी है..गौरतलब है कि 1946   के चुनावों में मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग को जबरदस्त सफलता मिली थी और तकरीबन 90   फीसदी से ज्यादा ऐसी सीटें उसे मिली थी.ऐसे में लीग को साथ लेकर चलना कांग्रेस के लिए जरूरी था..लेकिन यह ऐसा नहीं कर पाई.
खैर  ये बातें ये बात साबित नहीं करती कि विभाजन के लिए जिन्ना नहीं नेहरु या पटेल जिम्मेदार थे..लेकिन यह ये तो जरूर साबित करता है कि इसके लिए  सिर्फ जिन्ना ही  जिम्मेदार नहीं थे. हाँ किसकी जिम्मेदारी कितनी थी इस बात पर बहस हो सकती है..
 .
कही ना कही १९४६-४७ तक आते आते जो स्थितिया बन गई थी,वे सामूहिक रूप से विभाजन  के लिए जिम्मेदार बनी.इस समय तक .विभाजन सिर्फ जिन्ना या नेहरु के कोर्ट से निकल कर कलकत्ता और नोआखाली और उससे भी आगे बिहार उत्तर प्रदेश  दिल्ली और पंजाब तक पहुच गया था..और यह खुले मैदान में खून के प्यासे इंसानों द्बारा तय किया जा रहा था..
दरअसल आजादी  के बाद जिन्ना और नेहरु जो भारत चाहते थे उसमे गहरा मतभेद था..जिन्ना विकेंद्रीकरण चाहते थे तो नेहरु मजबूत  केंद्र..दोनों के गोल अलग अलग थे..ऐसे में विभाजन के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था..ये बात अलग है कि नेहरु को वैसा भारत मिला जैसा वे चाहते थे ..लेकिन जिन्ना को वैसा पकिस्तान नहीं मिला जैसा वे चाहते थे.. 
 .

2 comments:

  1. कभी जमीन के एक अदद टुकड़े पर पाँव टिका कर खड़े भर रह लेने की कोशिश... बस जब जब ये कोशिश करनी पड़ती है , बहुत भारी पड़ती है .....ब्लॉग का परिचय शानदार |

    ReplyDelete

Follow by Email