4 March 2013

मुझसे हमेशा यह सवाल पूछा जाता है कि मेरी कविता के केंद्रीय विषय क्या हैं? : के सच्चिदानंदन


मलयालम के प्रसिद्ध कवि-आलोचक के सच्चिदानंदन को मलयालम भाषा के लिए 2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया है. पुरस्कार ग्रहण करने के बाद दिये गये अपने वक्तव्य में सच्चिदानंदन ने मलयालम कविता के साथ ही अपनी कविता के बारे में भी महत्वपूर्ण बातें कहीं. उनके अकादमी पुरस्कार वक्तव्य का दूसरा और आखिरी हिस्सा ...







मुझसे हमेशा यह सवाल पूछा जाता है कि मेरी कविता के केंद्रीय विषय क्या हैं ?

कविता को विषयों में सीमित करना काफी कठिन है क्योंकि कोई भी जटिल सी कविता कई स्तरों पर काम करती है. जैसा कि उम्बर्तो इको ने कहा है कि रचनाएं, रचनाकार से कहीं ज्यादा बुद्धिमान होती हैं. उनमें वे संभावनाएं छिपी हो सकती हैं, जो न रचनाकार को पता हों, न जिसके बारे में उसने कल्पना की हो. अपने जवाब में सतर्क हो कर मैं कहना चाहूंगा कि न्याय, स्वतंत्रता, प्रेम, प्रकृति, भाषा और मृत्यु मेरी कविता के केंद्रीय विषय रहे हैं. शायद हर कवि पर यह बात लागू होती है. जिन तत्वों ने एक कवि के तौर पर मेरा निर्माण किया, उनका नाम लूं, तो कविता की परंपरा- स्थानीय,  राष्ट्रीय के साथ ही वैश्विक, अनुभव, प्रकृति तथा इंसानों का अवलोकन, यात्राएं, दूसरे कला रूपों, जैसे संगीत, चित्रकला, सिनेमा आदि के साथ संवाद, अध्ययन और अनुवाद इन सभी ने मिलकर मेरी कल्पना के रेशों का निर्माण किया है. जहाँ तक रूप का सवाल है, इस मामले में मैं काफी खुले दिमागवाला रहा हूं. मैंने मलयालम की कई भाषिक परंपराओं का इस्तेमाल किया है. गलियों में होनेवाली बातचीत से  लेकर, कानूनी दस्तावेजों की भाषा, विभिन्न छंदीय  और गैर छ्न्दीय उपकरणों, लोक, क्लासिक और आधुनिक-- सभी कुछ का अपनी कविता में इस्तेमाल किया है…

सत्तर के दशक की प्रतिक्रियाशीलता आज भी मेरी कविता में सांस ले रही है,, हाँ यह जरूर है की मैंने उसकी सभी रूढ़ियों से खुद दूर कर लिया है. कुछ निश्चित मूल्यों के मूलतः आज मेरी प्रतिबद्धता मूलतः नैतिक है-मसलन, न्याय, समानता, स्वतंत्रता, प्रेम, सभी जीवितों के प्रति सम्मान। बाजार द्वारा संचालित एक ऐसी दुनिया जहाँ सारी चीजें  बाजार के मूल्यों से संचालित हो रही है और जिसका बहुत तेजी से और काफी हिंसक तरीके से उपनिवेशीकरण भूमंडलीकरण की शक्तियों द्वारा हो रहा है… इनका महत्व कही ज्यादा बढ़ गया है. 
भले ही मैंने सतत रूप से स्त्री मुक्ति, वंचितों के अधिकार, पारिस्थितिकीय संतुलन-सामंजस्य औरयुद्ध विहीन  दुनिया जैसे मसलों को उठाया है, साथ ही सार्वजनिक  जीवन के त्रासद मोड़ों- आपातकाल से लेकर साम्प्रदायिकता के उभार  जैसे मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया देता रहा हूँ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कई मैंने आत्म अस्तित्व,  आजादी, प्रज्ञा, प्राकृत, संबंधों, मृत्यु जैसे अस्तित्वादी सवाल पूछना बंद कर दिया है.
मेरी नजर में धार्मिक और सेकुलर में कोई अन्तर्विरोध नहीं है. मैं धार्मिक हुए बगैर भी आध्यात्मिक हो सकता हूँ। यह कुछ ऐसा है जिसे मैंने संत और सूफी कवियों, कबीर और गांधी जैसे सुधारकों से सीखा है जिन्होंने हर तरह के पदानुक्रम के खिलाफ संघर्ष किया। अलग अलग रूप में प्रकट होने वाली प्रभुता और धर्म के बाह्याडम्बर को चुनौती दी।

एक कवि को संभवतः एक खाली कागज के पन्ने से ज्यादा भय किसी और चीज से नहीं होता होगा. मुझे केवल  दुनिया की उस दमघोंटू शान्ति  से डर लगता है, जिसमे आत्मा स्वरहीन हो जाए और इंसान पत्तियों और झरनों की भाषा समझना  बंद कर दे. मुझे उम्मीद है कि मैं ऐसी दुनिया देखने को जीवित नहीं रहूँगा जब ब्रह्माण्ड अपनी पवित्रता से खाली हो जायेगा और बुराई का हर चीज पर राज होगा..!

समाप्त 

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