21 May 2013

साहित्य का युवा नजरिया- 4


हालांकि साहित्य को पीढ़ियों में बांटना महज एक सुविधाजनक विभाजन ही माना जा सकता है, फिर भी हमने साहित्य के युवा मन की पड.ताल करने के लिए, उसमें बसनेवाली साहित्य और समाज की तसवीर को समझने के लिए मौजूदा दौर के कुछ महत्वपूर्ण रचनाकारों का चयन किया और उनसे चंद सवाल पूछे. यहां पीढ़ियों का वर्गीकरण कठोर नहीं है और कम से कम दो पीढ़ियों  तथा अलग-अलग क्षेत्रों की आवाजों को शामिल किया गया है. रचनाकारों का चयन भी किसी भी तरह प्राप्रतिनिधिक नहीं है. इस परिचर्चा में जैसी उम्मीद थी, विचारों के अलग-अलग क्षितिज हमारे सामने उभर कर आये, जो साहित्य के विविधतापूर्ण लोकतंत्र में झांकने का मौका देते हैं.

पांच लेखक : मनीषा कुलश्रेष्ठ, अनुज लुगुन, पंकज मित्र, पंकज सुबीर और उमाशंकर चौधरी 

पांच सवाल

1. मैं क्यों लिखता हूं ? 2. आपकी नजर में साहित्य की जिंदगी में क्या भूमिका है ? 3. किन पुराने लेखकों को आज के समय के करीब पाते हैं ? 4. क्या कालजयी होने की इच्छा आपको भी छू गयी है ? 5. आज के दौर के किस युवा लेखक की रचनाएं आपको प्रभावित करती हैं और क्यों ?


3.  उमाशंकर चौधरी     


‘कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे’ कविता संग्रह और ‘अयोध्या बाबू सनक गये हैं’ कहानी संग्रह. साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से नवाजा गया है. 




हर लेखक पूरी जिंदगी इस सवाल से जूझता रहता है कि आखिर वह क्यों लिख रहा है! उसके लिख भर देने से कोई क्रांति हो जायेगी ऐसा कम से कम प्रथम दृष्ट्या लगता तो नहीं है. लेकिन मुझे लगता है इसका जवाब सिर्फ यह हो सकता है कि अगर लोग लिखना छोड. दंे, संगीत छूट जाये, कला के सारे माध्यम छूट जाएं, तो यह जिंदगी कितनी नीरस और कितनी बर्बर हो जायेगी! क्रांति शब्द बड.ा हो सकता है, लेकिन साहित्य हमारे मस्तिष्क को परिष्कृत तो करता ही है.

टेरी इगलटन की तरह यह बात मुझे भी बहुत शिद्दत से लगती है कि समाज में जितनी ही चकाचौंध बढे.गी, साहित्य की अहमियत उतनी ही बढ.ती जायेगी. पिछले बीस वर्षों में देखा जा सकता है कि हमारा समाज कितना बर्बर होता जा रहा है. मनुष्य और मनुष्य के बीच विश्‍वास की महीन रेखा भी खत्म होती जा रही है. हमारा समाज, हमारी राजनीति विकास के जिस पश्‍चिमी मॉडल को अपना आदर्श मानती है, वहां हमारी संस्कृति हमसे छूटती जा रही है. भाषा का विर्मश बहुत बड.ा है. हम अपनी भाषा को छोड.ते हैं, तो उनकी पूरी मानसिकता को स्वीकार करते हैं. मैं साहित्य ही नहीं, सड.क पर हो रहे नुक्कड. नाटक से लेकर जैसलमेर की ढूह पर बैठकर अलगोझा बजाने वाले की भी इस संस्कृति को बचाने में उतनी ही अहमियत मानता हूं.

हर लेखक अपनी परंपरा से जुड.ा होता है. हम अपनी परंपरा में थोड.ा सा बदलाव लाते हैं. कुछ अच्छा करने की कोशिश करते हैं. मैं रेणु को आज के समय और अपने सबसे अधिक करीब पाता हूं. वे बडे. कथाकार थे. एक ऐसे लेखक, जो अपने समय को और भविष्य की नब्ज को पकडे. हुए थे. मुझे कविता के क्षेत्र में अमीर खुसरो और रघुवीर सहाय को आज भी बहुत प्रासंगिक मानता हूं. मैं समझता हूं कि रेणु और रघुवीर सहाय ने लेखन को समाज और राजनीति के जरूरी सवालों से सीधा-सीधा जोड.ा. किस्सागोई के लिए निस्संदेह मैं विनोद कुमार शुक्ल और उदय प्रकाश को पसंद करता हूं. और भाषा के लिए काशीनाथ सिंह और विश्‍वनाथ त्रिपाठी का बहुत बड.ा प्रशंसक हूं.

कालजयी होना या फिर इसे दूसरे शब्दों में कहें पाठकों का निरंतर प्यार पाना, यही तो लेखक को ऊर्जा देता है. अगर एक लेखक अच्छा काम करने के लिए समाज से ऊर्जा चाहता है, तो इसमें बुरा क्या है. साहित्य सृजन का काम कोई दो-चार वर्षों का नहीं है. जब तक आपके लेखन में दम नहीं होगा तमाम गुट मिल कर किसी लेखक को दो-चार वर्षों तक तो चर्चा में बनाये रख सकते हैं, लेकिन उसे कालजयी नहीं बना सकते. सारे पुरस्कार धरे के धरे रह जाते हैं. आपका लेखन ही आपको बचाता है.

मैं चूंकि कविता और कहानी दोनों लिखता हूं, इसलिए यहां मैं दोनों के संदर्भ में बात कर रहा हूं. हमारी पीढ.ी को लिखते हुए कुछ वर्ष गुजर गये हैं. आज हम यह बात कर सकते हैं कि आखिर यह पीढ.ी कितनी कारगर रही. इस पीढ.ी में काफी लोगांे ने लिखना शुरू किया था अब उसमें काफी छंटनी हो गयी है. जो बच गये हैं, उनकी एक पहचान बन चुकी है. जब पहचान बनी है, तो जरूर उनके यहां कुछ अच्छा और अलग होगा. मुझे लगता है कि बात इसपर होनी चाहिए कि हमारी पूरी पीढ.ी मिल कर हमारे समय की विभित्र समस्याओं-विषमताओं पर उंगली रख पायी या नहीं. साहित्य अंतत: कला है इसलिए प्रस्तुति के स्तर पर पसंद-नापसंद अवश्य होंगी. मेरे जेहन में भी कुछ नाम हैं अवश्य, लेकिन मैं समझता हूं कि यह सवाल एक पीढ.ी के लोगों से पूछ कर सनसनी पैदा करने से बेहतर है कि हमसे पहले की पीढ.ी या कुछ दिनों बाद हमारे बाद की पीढ.ी से पूछा जाए.


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