7 May 2013

साहित्य का युवा नजरिया

हालांकि साहित्य को पीढ़ियों में बांटना महज एक सुविधाजनक विभाजन ही माना जा सकता है, फिर भी हमने साहित्य के युवा मन की पड.ताल करने के लिए, उसमें बसनेवाली साहित्य और समाज की तसवीर को समझने के लिए मौजूदा दौर के कुछ महत्वपूर्ण रचनाकारों का चयन किया और उनसे चंद सवाल पूछे. यहां पीढ़ियों का वर्गीकरण कठोर नहीं है और कम से कम दो पीढ़ियों  तथा अलग-अलग क्षेत्रों की आवाजों को शामिल किया गया है. रचनाकारों का चयन भी किसी भी तरह प्राप्रतिनिधिक नहीं है. इस परिचर्चा में जैसी उम्मीद थी, विचारों के अलग-अलग क्षितिज हमारे सामने उभर कर आये, जो साहित्य के विविधतापूर्ण लोकतंत्र में झांकने का मौका देते हैं.


पांच लेखक : मनीषा कुलश्रेष्ठ, अनुज लुगुन, पंकज मित्र, पंकज सुबीर और उमाशंकर चौधरी 

पांच सवाल
1. मैं क्यों लिखता हूं ? 2. आपकी नजर में साहित्य की जिंदगी में क्या भूमिका है ? 3. किन पुराने लेखकों को आज के समय के करीब पाते हैं ? 4. क्या कालजयी होने की इच्छा आपको भी छू गयी है ? 5. आज के दौर के किस युवा लेखक की रचनाएं आपको प्रभावित करती हैं और क्यों ?


1.  मनीषा कुलश्रेष्ठ  



‘शिगाफ’ और ‘शालभंजिका’ उपन्यास सहित ‘कठपुतलियां’, ‘गंधर्व गाथा’ आदि कहानी संग्रह. लमही पुरस्कार से नवाजी गयी हैं.‘



मैंने जब होश संभाला था, मैंने पाया मुझे हिंदी विषय सबसे प्रिय लगता है और सबसे अच्छे नंबर निबंध में मुझे मिलते हैं, जब टीचर गाय, मां, नदी पर न लिखवा कर किसी घटना पर लिखवाती हैं, मसलन ‘ननिहाल में एक दिन’ या ‘ दशहरा मेला’. खूब कल्पना के घोडे. दौड.ाती! कहानियां, धारावाहिक उपन्यास पढ.ना बहुत ही जल्दी शुरू कर दिया था. लिखने का इरादा कभी न था. हिंदी लेखक का एक किताबी कैरिकेचर मन में रहता था, झोला छाप, ऐनकदार, थिगली लगा कुर्ता और हाथ में कविताओं / लेखों की मोटी पांडुलिपि! बहुत समय तक मैं लेखक तो कभी नहीं बनना चाहती थी. मैं विज्ञान पढ.ती और कथक सीखती थी. बाद में हिंदी में आयी. जीवन के कुछ रास्ते जब कहीं न जाने के लिए रुक गये, तो मैंने खुद को लिखते पाया. लिखा और भेजा छपने, तो शुरुआती एकाध अस्वीकृतियों के बाद मेरा लिखा व्यापक तौर पर छपने लगा. मैं थोड.ी कहानियां लिख कर वापस अपनी दुनिया में लौट जाना चाहती थी कि कहीं से चुनौती सी मिली, असल कसौटी तो उपन्यास है! फिर वह भी लिखा. इसलिए मेरा लेखन जब तक मुझे अपने स्तर असुंष्ट करता रहेगा, चुनौती देता रहेगा मैं लिखूंगी! एक असंतोष अपने लिखे से...यही लिखवाता है. 

सच कहूं तो, आम व्यक्ति के जीवन में तो कुछ नहीं. आजकल जब रेडीमेड विचार दृश्य माध्यमों से आपके भीतर इंजेक्ट कर दिए जाते हों, बिना सोचने-समझने की मोहलत दिये, तो साहित्य का महत्व कुछ बचता नहीं. रही बात बुद्धिजीवी वर्ग की, तो वहां विचारधाराएं इतनी कट्टरता लिये हैं कि साहित्य का आनंद और उद्वेलन मूर्छित पड.ा है.

बहुत पुरानों से क्रमश: बढूं, तो यकीनन प्रगतिशीलता से प्रेमचंद ने मिलवाया, उसे विस्तार दिया रेणु और यशपाल ने. यूं मुझे मानव संबंधों और मनोविश्लेषणात्मक तौर पर जैनेंद्र, इलाचंद्र जोशी भी सदा समसामयिक लगे. कुतरुल एन हैदर, कृष्णा सोबती, धर्मवीर भारती, निर्मल वर्मा, शैलेश मटियानी, मनोहर श्याम जोशी, मृदुला गर्ग का लिखा मुझे हमेशा हर समय के सामने खड.ा दिखता है, और वह कालजयी रहेगा. 

कालजयी बहुत बड़ा शब्द है! मैं अपने समय को ही बेलाग हो, ईमानदारी से छू सकूं वही बहुत है. 

आज का समय दो प्रकार के युवा लेखन की हदों के बीच आच्छादित है. एक ओर भाषाई कमाल, शिल्प और काल की अपरिमितता है, असमंजस है और जीवन नदारद है, दूसरी ओर जमीन, जीवन संघर्ष और भाषाई खुरदरापन है. संक्रमण का समय है और पूरी लाउडनेस के साथ है. इन दो हदों के बीच जो रच रहे हैं, वही प्रभावित करता है. कहने को तो, जो मौलिक और धड.कता हुआ है वह सब प्रिय है. मुझसे पूर्ववर्ती पीढी में मनोज रूपड़ा  गीतांजलि श्री, मधु कांकरिया मुझे प्रिय रहे. हाल ही में पहले नीलेश रघुवंशी के ‘एक कस्बे के नोट्स’ ने फिर हरेप्रकाश के उपन्यास ‘बखेड.ापुर’ ने हम सबको सुखद तौर पर चौंकाया है. शशिभूषण द्विवेदी और विमलचंद्र पांडे की लंबी कहानियां, प्रत्यक्षा की शहरी स्त्री मन की गझिन कहानियां, आकांक्षा पारे की कस्बाई युवतियों की कहानियां मुझे पठनसुख देती हैं. पठनीयता मेरे अंदर के विकट पाठक की पहली मांग रहती है. मैं पहले लेखक का नाम देखे बिना कहानियां पढ.ती हूं, पसंद आती हैं तब नाम पढ.ती हूं. किसी की कोई कहानी छूती है, तो मैं फोन जरूर करती हूं, चाहे वह रकीब हो कि हबीब! मेरे लिए रचना की श्रेष्ठता बहुत मायने रखती है, वहां रंजिशें भी रोक नहीं पातीं! यह दुर्लभ संस्कार मुझे मेरे रचना के प्रति गहरे सरोकारों से भरे इसी साहित्य संसार के वरिष्ठों ने दिया है.

मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित 

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