7 May 2013

साहित्यिक किस्सों की सिनेमाई रील

साहित्य और सिनेमा के रिश्ते पर यह जानकारीपरक लेख प्रीति सिंह परिहार ने तैयार किया है...
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साहित्य और सिनेमा दो अलग-अलग विधाएं हैं. विधा में अंतर के बावजूद दोनों के बीच एक धागा जुड.ा रहा है. बीच की नजदीकी जरूर समय के साथ बढ.ती-घटती रही, लेकिन कल भी साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बन रही थीं और आज भी बन रही हैं. कुछेक साहित्यक कृतियां ऐसी भी हैं, जिन्हें हर दौर के फिल्मकारों ने अपनी-अपनी तरह से परदे पर उतारा. बांग्ला लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की ‘देवदास’ इसकी एक मिसाल है. इस उपन्यास पर अब तक हिंदी, बांग्ला, उर्दू, तमिल, तेलुगु और असमिया भाषा में तकरीबन 14 फिल्में बन चुकी हैं. बॉलीवुड के चार निर्देशक अपने-अपने ढंग से ‘देवदास’ को परदे पर उतार चुके हैं. ‘देवदास’ सहित शरतचंद्र की तकरीबन 15 रचनाओं पर हिंदी और बांग्ला में फिल्में बनायी जा चुकी हैं. हिंदी में ‘बिराज बहू’,‘परिणीता’,‘मझली दीदी’,‘स्वामी’,‘छोटी बहू’,‘अपने पराये’ और ‘खुशबू’ ऐसी ही फिल्में हैं. ‘परिणीता’ को तीन बार रुपहले परदे पर जीवंत किया गया है. बांग्ला लेखक विमल मित्र की रचना ‘साहब बीबी और गुलाम’ पर इसी नाम से बनी अबरार अल्वी निर्देशित फिल्म हिंदी की एक अविस्मरणीय फिल्म मानी जाती है. परदे पर साकर हुई साहित्यिक रचनाओं में एक यादगार नाम आर के नारायाण के उपन्यास पर बनी ‘गाइड’ का भी है, जिसके गीत सुन कर आज भी हमारे दिल लरज उठते हैं और रोजी का वह खूबसूरत मासूम चेहरा हमारी आंखों में उतर आता है.

हिंदी साहित्य से फिल्मों में जगह पाने वाली सबसे अधिक रचनाएं हिंदी कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की रही हैं. 1934 में नानूभाई वकील ने ‘सेवासदन’ पर फिल्म बनायी. ‘रंगभूमि’,‘गबन’ और ‘गोदान’ जैसे सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों सहित उनकी कहानी ‘तिरया चरित्र’ और ‘हीरा मोती’ पर भी फिल्में बनीं. मृणाल सेन तेलुगु भाषा में ‘कफन’ को परदे पर लेकर आये, लेकिन मूल कहानी में कईफेरबदल के साथ. फिल्म समीक्षकों की मानें, तो ज्यादातर फिल्मकार प्रेमचंद की रचनाओं को उनके वास्तविक प्रभाव के साथ परदे पर उतारने में पूरी तरह सफल नहीं हो सके. सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की कहानियों ‘शतरंज के खिलाड.ी’ तथा ‘सद्गति’ पर इसी नाम से फिल्में बनायीं, ‘शतरंज के खिलाड.ी’ में उन्होंने बदलाव की पूरी स्वतंत्रता ली, लेकिन इसे परदे पर प्रेमचंद की रचनाओं को उतारने का सबसे सफल प्रयास माना जाता है.

शुरुआती दौर में सिनेमा साहित्य से काफी नजदीक से जुड.ा रहा. ऐसा नहीं था कि साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्में सफल ही हों. फिर भी उन पर फिल्में बन रही थीं, व्यावसायिक सफलता की परवाह के बिना, एक भरोसा लेकर कि शायद लोगों को फिल्म पसंद आ जाये. चेतन आनंद ने मैक्सिम गोर्की की रचना ‘लोवर डेप्थ’ से प्रभावित होकर ‘नीचा नगर’, तो सोहराब मोदी ने शेक्सपियर के ‘हैमलैट’ को आधार बनाकर ‘खून का खून’ बनायी. कुछ फिल्मकारों ने व्यावसायिक पक्ष को परे कर मूल कृति की आत्मा को बनाये रखते हुए सिर्फ कलात्मक पहलू को ध्यान में रखकर फिल्में बनायीं. ऐसी फिल्में चर्चा में रहीं, आलोचकों द्वारा सराही गयीं और सिनेमा से जुडे. किसी न किसी सम्मान से भी नवाजी गयीं, लेकिन दर्शक उनसे अनजान ही रहे. वहीं कुछ फिल्मकारों ने साहित्यिक रचनाओं को व्यावसायिक मानदंड की दृष्टि से परदे पर उतारा और देर-सबेर इसमें सफल भी हुए. 1964 में भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर इसी नाम से किदार शर्मा ने मीना कुमारी, अशोक कुमार और प्रदीप जैसे कलाकारों को लेकर फिल्म बनायी. फिल्म समीक्षकों की नजर में यह साधारण फिल्म थी, लेकिन इस फिल्म को ही नहीं, इसके संगीत को खूब पसंद किया गया. हिंदी की सबसे लोकप्रिय प्रेमकहानियों में से एक चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ का भी फिल्मांकन हुआ. सुनील दत्त और नंदा अभिनीत यह फिल्म मूल कहानी की तरह कोई लकीर नहीं खींच सकी.

एक दौर ऐसा बीता है, जब फिल्म जगत के लोग खूब साहित्य पढ.ा करते थे. कई बार कोई कृति उनके जेहन में कुछ इस तरह जगह बना लेती थी कि वे उसे परदे पर उतारने के लिए अपना सबकुछ दावं पर लगा देते थे. ऐसा ही कुछ हुआ मशहूर गीतकार शैलेंद्र के साथ. फणीश्‍वर नाथ रेणु की कहानी ‘मारे गये गुलफाम’ पर शैलेंद्र ने फिल्म बनाने का सपना देखा. ‘तीसरी कसम’ नाम से बनी इस फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने बासु भट्टाचार्य को सौंपी थी. मुख्य भूमिका में शैलेंद्र के अभित्र मित्र राजकपूर के साथ वहीदा रहमान थीं. इस फिल्म को उस वर्ष सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. लेकिन इसे विडंबना ही कहेंगे कि फिल्म को मिली तत्कालिक असफलता शैलेंद्र के अंत का कारण बन गयी. हालांकि उनकी मौत के बाद यह फिल्म और इसका संगीत इतना कामयाब रहा कि आज इसे हिंदी की क्लासिक फिल्मों में शुमार किया जाता है.

गीतकार शैलेंद्र के साथ जो कुछ हुआ, उससे वाकिफ होने के बाद भी साहित्यिक कृतियों की तरफ फिल्मकारों का झुकाव कम नहीं हुआ. वर्ष1969 में बासु चैटर्जी ने कथाकर राजेंद्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ पर इसी नाम से एक फिल्म बनायी. इसे बेस्ट सिनेमेटोग्राफी का नेशनल अवार्ड और फिल्म फेयर का बेस्ट स्क्रीनप्ले अवार्ड मिला. लेकिन दर्शकों के बीच फिल्म इतनी लोकप्रिय नहीं रही. इसके बाद बासु चैटर्जी ने 1974 में हिंदी की प्रसिद्ध कथा लेखिका मत्रू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर ‘रजनीगंधा’ बनायी. यह अमोल पालेकर तथा विद्या सिन्हा जैसे तब के नवोदित कलाकारों को लेकर बनायी गयी कम बजट की फिल्म थी. बावजूद इसके दर्शकों में यह खूब पसंद की गयी. इसके संगीत का जादू आज भी कायम है. 1975 में इसे फिल्म फेयर का बेस्ट क्रिटिक और बेस्ट फिल्म अवार्ड मिला. मत्रू भंडारी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आपका बंटी’ पर भी फिल्म बनीं, जो कानूनी अड.चनों के चलते ‘समय की धारा’ नाम से प्रदर्शित हुई. बासु चटर्जी ने शतरचंद्र चट्टोपाध्याय की कृतियों पर ‘स्वामी’ और ‘अपने पराये’ जैसी फिल्में बनायीं. पारिवारिक तानों-बानों से सजी ये फिल्में साधारण होकर भी दर्शकों के मन में जगह बनाने में कामयाब रहीं.

साहित्यिक कृतियों पर बन रहे लोकप्रिय सिनेमा के अलावा भी साहित्यिक रचनाओं पर फिल्में बन रही थीं. यहां दर्शक कम थे, लेकिन यथार्थ को एक सार्थकता के साथ परदे पर लाने का जुनून था. फिल्मकार मणिकौल ने मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ और नाटक ‘आषाढ. का एक दिन’ पर इसी नाम से फिल्में बनायीं. इन फिल्मों के जरिए मुख्यधारा के बरक्स समानांतर सिनेमा की एक पगडंडी बनने लगी थी. कुमार शाइनी ने निर्मल वर्मा की कहानी ‘माया दर्पण’ पर फिल्म बनायी, वहीं मणिकौल विजयदान देथा की कहानी ‘दुविधा’, मुक्तिबोध की कहानी ‘सतह से उठता आदमी’ और विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ जैसी रचनाओं में मौजूद यथार्थ को सिनेमाई परदे पर लेकर आये. उन्होंने दोस्तोवस्की के उपन्यास पर ‘इडियट’ और मलिक मोहम्मद जायसी की कविता पर ‘द क्लाउड डोर’ जैसी फिल्में भी बनायीं. विजयदान देथा की कहानी पर बनी ‘दुविधा’ के लिए मणिकौल को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया. राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा की कहानियों पर बाद के फिल्मकारों-प्रकाश झा ने ‘परिणति’ और अमोल पालेकर ने ‘पहेली’ बनायी. इस कड.ी में शैवाल की कहानी पर बनी प्रकाश झा निर्देशित ‘दामुल’ का नाम भी उल्लेखनीय है. इसे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. श्याम बेनेगल ने धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड.ा’ पर इसी नाम से फिल्म बनायी.

एक दौर ऐसा भी गुजरा जब लगा फिल्म जगत साहित्य से पूरी तरह विलग होता जा रहा है लेकिन बीच-बीच में दोनों के बीच जुड.ाव के कुछ चित्र उभरते रहे. ऐसा ही एक चित्र है ‘उमराव जान’. एक्शन फिल्मों के दौर में आयी मिर्जा हदी रुस्वा के उपन्यास ‘उमराव जान अदा’ पर मुजफ्फर अली निर्देशित इस फिल्म की लोकप्रियता को नहीं भुलाया जा सकता. हाल में चेतन भगत के उपन्यासों ‘फाइव प्वाइंट समवन’ और ‘द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माइ लाइफ’ पर ‘3 इडीयट’ और ‘काई पो चे ’ जैसी फिल्में भी सिनेमा को साहित्य से जोड.ती दिखती हैं. चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने हिंदी के प्रसिद्ध कथा लेखक काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर ‘मोहल्ला अस्सी’ नाम से फिल्म बनायी. कथाकार उदय प्रकाश की लंबी कहानी ‘मोहनदास’ पर भी फिल्म बन चुकी है. चेतन भगत का उपन्यास ‘टू स्टेट्स’ भी जल्द ही फिल्माकार होकर परदे पर आने वाला है. 



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