Showing posts with label नागार्जुन. Show all posts
Showing posts with label नागार्जुन. Show all posts

30 June 2013

हमें किसी का सम्मान नहीं चाहिए, कैसा भी आचार्यत्व नहीं चाहिए : नागार्जुन

हिंदी साहित्य में नागार्जुन का व्यक्तित्व अपने आप में अकेला है. वे प्रतिबद्ध कवि तो थे ही, ‘प्रतिबद्ध घुमक्कड.’ भी थे. काफी पहले नागार्जुन से प्रख्यात कथाकार मनोहर श्याम जोशी ने एक लंबा साक्षात्कार लिया था. यह साक्षात्कार एक तरह से नागार्जुन की छोटी जीवनी है. नागार्जुन की जयंती पर उस साक्षात्कार का संपादित अंश. : अखरावट 



नागार्जुन नामक इस व्यक्ति को, जो विष्णु नागर की कविताओं की प्रशंसा कर रहा है, जो मुझे यह बता रहा है कि उसने किसको चिट्ठी में क्या लिख दिया है, जो सुड.क-सुड.क कर अब चायपान कर रहा है, मैं जानता हूं और वर्षों से. किंतु बहुत निकट से नहीं. दूसरे शब्दों में यह कि मैं जानता तो हूं, मगर वैसे नहीं.. ‘ऐसे’ मैं क्या जानता हूं? यही कि बाबा भला आदमी है. हिंदी साहित्य में ‘भले आदमियों’ की एक अलग और दुर्लभ प्रजाति चली आ रही है. यह ‘भलापन’ कुछ-बहुत स्वभाव से मापा जाता है और बहुत-कुछ व्यक्ति विशेष के महत्वाकांक्षी न होने से. कहीं आडे. न आने से. भले आदमियों के बारे में बुरा सुनने का सुख एकांत में भी प्राप्त नहीं हो पाता. कोई सर्वज्ञ आपको अलग से ले जाकर कान में यह नहीं बताता कि ‘दरअसल इनका यह है कि.. समझ गये ना! हां..बस-बस-बस.’ मुक्तिबोध के उठ जाने के बाद भलेपन के क्षेत्र में बाबा और शमशेर भाई दो शीर्षस्थ प्रतियोगी माने गये हैं. वही स्वभाव की सरलता, सभी पीढ.ियों के लोगों में उठना बैठना, नये कृतिकारों की प्रशंसा करना, जिनसे भी संबंध रखना बहुत घरेलू और साहित्यिक स्तर पर, महत्वाकांक्षी न होना- सामाजिक और साहित्यिक दोनों ही स्तरों पर; कविताएं कहीं भी किसी भी कॉपी-डायरी में या कागज की चिंदी पर लिख देना, खो देना; आधुनिक बिरादरी में होने के बावजूद क्लासिकी और परंपरागत साहित्य में रुचि और गति रखना, और कम्युनिस्टों की नजदीकी के बावजूद पार्टी संगठन से न कोई विशेष प्रीति होना, न कोई विशेष प्राप्ति- ‘भाई’ और ‘बाबा’ में काफी समानताएं हैं. किंतु इस तथ्य को भी रेखांकित करना आवश्यक समझा गया है कि शमशेर ‘भाई ही हैं, ‘बाबा’ नहीं और नागार्जुन चाहे कितने भी भोले हों, आप उन्हें भाई-भाई वाले दावं में ला नहीं सकते. और फिर बाबाओं में ऐसा है कि खुश हो गये, तो वरदहस्त, उखड. गये तो त्रिनेत्र. नाराज़ी कुछ हलकों में नागार्जुन के भोलेपन का अवमूल्यन कराती आयी है. 

‘ऐसे’ मैं यह भी जानता हूं कि बाबा मसिजीवी हैं. रॉयल्टी वसूली की चिंता में कहते हैं,‘वहां से पैसा वसूलें, तो दो बोरा धान डलवा डलवा आयें, फिर निश्‍चिंत निकल जायें घुमक्कड.ी पर’ शायद ही कोई ऐसा साहित्यकार हो, जो लेखन और जीविका में, सृजन और अर्जन में इतना सीधा संबंध जोड.ता हो, और डंके की चोट पर, खंड काव्य लिख रहे हैं आजकल. थोड.ा पौराणिक-क्लासिक ऐसा थीम हो, तो खंडकाव्य झट कोर्स में लग जाता है. उपन्यास भी हम छोटा ही लिखते हैं. बृहद उपन्यास में झंझट है, आकार बड.ा होगा, तो कीमत भी ज्यादा होगी. कहां से खरीदेगा विद्यार्थी!

नहीं,‘साहित्यकार’ इस तरह नहीं बोलते, लेकिन नागार्जुन तो बाबा हैं..

..सवाल यह है कि ‘वैसे’ नागार्जुन क्या चीज हैं? अजी बगैर ‘वैसे’ हुए कोई लेखक-कवि हुआ है आज तक!
xxxxx

वह घरवाली, वह गरीब ब्राह्मनी एक के बाद एक चार बाों को जन्म देती है, मगर बचता कोई नहीं. तब वैद्यनाथ धाम की विशेष सेवा करता है, मिसिर परिवार और जो बा जन्म लेता है, जीवित रहता है, उसका नाम रखा जाता है- वैद्यनाथ मिसिर. बुआजी का आग्रह होता है, इसे ठक्कन कहो! ठक्कन, ठगनेवाला, जो ठगने मात्र को आया है. कोईभरोसा नहीं, कब यह भी रूठ कर चला जाये. चश्मेबद्दूर ठक्कन कहने से शायद बच जाये. पसीजे कुछ और बना रह जाये यहां अपनी तिरस्कृता-उपेक्षिता मां की गोदी में.

‘हम गांव जायेंगे, तो बूढे. लोग अबभी बुलायेंगे, अरेठक्कन! नागार्जुन कहने से नहीं चीन्हेंगे- समझ गये ना?’

ठक्कन चार-पांच साल का था कि उसकी मां एक और बा जन कर अपनी उम्र के चालीसवें वर्ष में भगवान को प्यारी हुईं. ठक्कन को लगता है कि उसे अपनी मां का पिता द्वारा निरंतर अपमान किये जाने की स्मृति है.

..वितृष्णा, उसका बचपन इस एक शब्द में समेटा जा सकता है. यद्यपि पंडितों के घर जन्मा बालक भी चार साल की उम्र में इस शब्द को कहां जानता होगा! 

वितृष्णा होती थी हमको, समझ गये ना? चाची हमारी माता के लिए दो पैसा की दवा नहीं करने देती थी. हमको बराबर लगा कि पिता चाची के इशारों पर माता की उपेक्षा करते हैं. समझ गये ना! 

कवि नागार्जुन के बचपन में बांस-वन, कदली गाछ, काली घटा, आम्र मंजरी, पोखर-वोखर आप लाख ढूंढ.िये नहीं मिलेंगे. आप स्थापित करना चाहें, ठक्कन की स्मृति करने नहीं देगी. आपने सही कहा कि ‘बड. दिब लागल कदमक फूल’ लेकिन ठक्कन को कदंब के फूलोंवाला नहीं, वह गांव याद आता है, जहां कदम-कदम पर धर्म-मोक्ष के झंडाबरदार अर्थ-कामविषयक कानाफूसी करते थे. शायद ही किसी कवि की स्मृति में अपने गांव की इतनी गैर-रूमानी छवि हो, जितनी नागार्जुन के मन में है. तुलसी चौरा पर संझवाती-वंझवाती तो खैर हैइये नहीं, आप धरती-पुत्र की प्रगतिशीलता से धड.कती जिंदादिली भी यहां नहीं पाइयेगा. 

xxxxx

राजनीति में भी बाबा का टूर बेढब रहा है. गांधीवादी, सुभाषवादी, समाजवादी, साम्यवादी, जयप्रकाशवादी, हर जमात में उठे-बैठे हैं. कहीं भी जमे नहीं हैं.’ 

फारवर्ड ब्लाकिस्ट हम इसलिए नहीं रहे कि सुभाष ने गलत निर्णय किया, तोजो-हिटलर से सांठ-गांठ कर ली. 

क्या सभी ने गलत निर्णय किये? कोई भी दल, कोई भी नेता ऐसा नहीं निकलता, जिसने अधिकतर निर्णय सही किये हों? 

जिसने जो गलत निर्णय किया, सो हमने कहा, साफ कहा, मुंह पर कहा. इससे न हम उनके शत्रु हो गये, न वे हमारे. राहुल जी की मने कोई कम आलोचना की हमने? प्रेम के क्षेत्र में उनकी महानता हमें कभी पसंद नहीं आयी. एक र्मतबा हमने उन्हें 36 प्रेमिकाओं-विवाहितों का हिसाब लगा कर दिया था. उनका तरंग में आकर लिखना, ढीलम-पोलम, जैसा का तैसा, यह हमें कभी ठीक नहीं लगा. कई बार उनसे बहुत बहस हुई. कहते थे कसने-मांजने का काम अगली पीढ.ी करेगी. उनकी महंतगिरी की हमने आलोचना की. प्रयाग के साहित्यिक महंतों पर जब हमने प्रहार किया, राहुलजी को भी नहीं बख्शा,यद्यपि मित्र कहते थे कि उनका नाम न लो, उन्हें मत घसीटो, वे अपनी राजनीतिक विचारधारा के हैं. 

विधिवत किसी भी दल के कार्यकर्ता नहीं बने. यद्यपि उन्हें कम्युनिस्ट समझा जाता है और उनका काव्य राजनीतिक रंग में रंगा हुआ है. ऐसा क्यों?

जब हम किसी स्थान में बसे ही नहीं, तब किसी राजनीतिक दल में कैसे बस जाते! आदमी किसी एक जगह रहता है, तभी न जाकर काम कर सकता है पार्टी का. ढोलक-मजीरा बजाने का ही काम ले भले, पर सुबह-शाम आरती के समय ढोलक- मजीरा बजाने के लिए उपलब्ध तो हो!

सुना बाबा झगड.ा हो जाता है, बहुत जल्दी? 

गलत बात को हम गलत कहते हैं. झगड.ा हो, हो. आपने ठप्पा लगाया, मैंने भी बगैर पूछे लगा दिया. आपने कहा अंगूठा टेको, हमने अंगूठा टिका दिया- वह हमसे नहीं होता. कम्युनिस्टों में संगठन बहुत टाइट किस्म का होता है. समाजवादियों का भी टाइट है, मगर कुछ कम. 

तो क्या बाबा संगठन के खिलाफ हैं?

हम संगठन के विरुद्ध नहीं हैं, लेकिन संगठन के साथ होने का मतलब अगर यह लगाया जाता हो कि हम अपने विवेक के शत्रु हो जायें, तो हमें स्वीकार नहीं. हम सर्वहारा के साथ हैं, अपनी राजनीति में, अपने साहित्य में, किंतु हमें इस विषय में किसी की लगायी कोई कैद मंजूर नहीं है. समझ गये ना? हमें जो करना है, अपनी तरह से करते हैं. हमें किसी का सम्मान नहीं चाहिए, कैसा भी आचार्यत्व नहीं चाहिए. 

आचार्यत्व से परहेज!

आचार्यत्व बहुत महंगा पड.ता है, समझ गये ना? एक होता है साहित्य, एक होती है साहित्य की राजनीति. हम साहित्यवाले हैं. हमारा वह नहीं है कि छह-सात कमेटियों की शोभा बढ.ा रहे हैं और साहित्य में कुछ कर-धर नहीं पा रहे. 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तो आचार्य थे?

वह निभा ले गये आचार्यत्व. यह हम जानते हैं. एक्सेप्शन होता है हर रूल का. बाकी आचार्यत्व का मतलब ही यह है कि साहित्यिक लुटिया डूबी. हमारे मित्र थे चतुरानंद मिर्श. नितांत प्रतिभाशाली. दो बहुत सुंदर उपन्यास लिखे. फिर राजनीतिक गति को प्राप्त हुए. रमेश सिन्हा का क्या हुआ! ओपी सिंघल का क्या हुआ! और नामवर! नामवर सिंह के लिए हमको बहुत दया आती है. इतना मेधावी व्यक्ति और एक लाइन नहीं लिख पाता, एक लाइन!

(यह साक्षात्कार मूल रूप से संभवत: 1981 में ‘आलोचना’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. ‘नया पथ’ के नागार्जुन विशेषांक, 2011 से साभार.)