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24 December 2013

नौ वर्षों तक मिलजुल मन का शिल्प खोजती रही...

साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजी गयीं  मृदुला गर्ग ने  रचनात्मक साधना की राह पर लम्बी और सार्थक यात्रा की है. पिछले साल  प्रीति सिंह परिहार ने मृदुला गर्ग से उनके रचनात्मक सफ़र पर  लम्बी बातचीत की थी . यहाँ इस बातचीत को आत्मवक्तव्य में ढाला गया है. अखरावट 



साहित्य मुझे बचपन से ही बहुत आकर्षित करता रहा है. नौ साल की थी तबसे ही मैंने साहित्यिक किताबें पढ़ना शुरू कर दिया था. घर में सभी को साहित्य पढ़ने का शौक था, इसलिए मुझे भी आसानी से हर तरह की महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियां उपलब्ध थीं. मैंने बहुत छोटी उम्र में ही शरतचंद्र और बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय जैसे लेखकों की कृतियां पढ़ ली थीं.
लेकिन लेखन के बारे में तब कुछ सोचा नहीं था. हां, अपने आसपास के जीवन और स्थितियों को देखकर उन्हें व्यक्त करने की उथल-पुथल मन में जरूर चलती रहती थी. मैं साहित्य पढ़ती थी, लेकिन मैंने पढ़ाई अर्थशास्त्र से की और बाद में यही विषय पढ़ाने भी लगी. इसी बीच मेरी शादी हो गयी और मैं दिल्ली जैसे महानगर के माहौल से सीधे बिहार के एक छोटे से इंडस्ट्रियल कस्बे- डालमिया नगर आ गयी. यहां की जिंदगी बिलकुल अलग थी. आस-पास छोटे-छोटे गांव थे. गांव मैंने पहले भी देखे थे, लेकिन अक्सर गांव को लेकर हमारे दिमाग में एक तरह का नॉस्टेल्जिया होता है.
पर अब मैं गांव की विषम परिस्थितियों और व्याप्त शोषण को महसूस कर रही थी. यहां गरीबी, अकाल देखकर लगा कि इसे लिखना चाहिए. लेकिन कैसे? इन सब चीजों का उस अर्थशास्त्र से खास सामंजस्य बैठता नहीं था जो हमें तब साठ के दशक में पढ़ाया गया था. शुरू में मैंने अर्थशास्त्रीय विषयों पर लेख लिखे तब भी कहा गया कि ये लेख साहित्यिक ज्यादा लगते हैं. फिर लगा मैं जो कहना चाहती हूं वह साहित्यिक तरीके से ही व्यक्त हो सकता है, कहानी या उपन्यास के जरिए.
अब इसके लिए मुझे पात्र चाहिए थे, जिससे मैं समाज का बाह्य स्वरूप लिखकर ना रह जाऊं. लोगों के आंतरिक और व्यैक्तिक जीवन को पूरे भावनात्मक आलोड़न के साथ व्यक्त करूं. इसके साथ ही घर-परिवार भी आगे बढ़ रहा था. बच्चों के जन्म के बाद मेरी रचनात्मक ऊर्जा बहुत तेजी से विकसित हुई. बीत चुके जीवन से मेरा जुड़ाव शुरू हुआ. हमारे समय के मूल्य और व्यवस्थाओं से आमना-सामना हुआ. उनसे प्रेरणा मिली और पात्र भी.
मैंने छोटे बच्चों के रहते लेखन शुरू किया गुंजान माहौल में. इसी दौरान मैं बिहार से कर्नाटक की एक छोटी सी जगह बागलकोट आ गयी. यह तब इतना पिछड़ा इलाका था कि यहां स्कूल तक नहीं था. मैंने बागलकोट में अंगरेजी, हिंदी और कन्नड़ भाषा का एक स्कूल शुरू किया. स्कूल के लिए बहुत जद्दोजहद कर शिक्षक और प्रिंसिपल इकठ्ठा किये. यह मेरी जिंदगी का बहुत अहम पड़ाव था. मैं बच्चों को सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ने लगी. इसी क्रम में स्कूल में मैंने मिड समर नाइट ड्रीम नाटक का मंचन कराया. नाटक में एक छोटे से बच्चे का अभिनय अभिभूत करने वाला था. उसे देखकर मुझे लगा कि हर इंसान के भीतर रचनात्मक ऊर्जा होती है.
इस एहसास के साथ मेरे भीतर भी रचनात्मक ऊर्जा विकसित होती रही. स्कूल और घर की व्यस्तता के बाद जो वक्त मिलता, मैं लिखने बैठ जाती थी. मुझे लगता है कि लिखने के लिए एक खास क्षण में जेहन में उभर रहे जुनून की बड़ी भूमिका होती है. कई बार आपके पास बहुत वक्त होता है, लेकिन आप लिख नहीं पाते. लेकिन, कई बार बहुत व्यस्तता के बाद भी समय चुराकर, रात भर जागकर भी आप लिखते हैं. मेरे साथ भी ऐसा ही होता है. मैं अपनी ज्यादातर कहानियां एक बैठक में ही पूरी करती हूं. मेरी ऐसी ही एक बहुत लंबी कहानी है कितनी कैदें. इसे मैंने एक रात के सफर में ट्रेन में लिखा था.
कई बार ऐसा होता है कि अरसे से दिमाग में खदबदा रही कहानी किसी उत्प्रेरक क्षण में सामने आकर खड़ी हो जाती है और मैं लिखने से खुद को रोक नहीं पाती. तब सबकुछ से वक्त चुराकर लिखना पड़ता है. लेकिन सबसे अधिक लेखन मैंने गर्मियों के दिनों में किया. इसलिए नहीं की मुझे यह मौसम पसंद है, बल्कि इसलिए क्योंकि इस समय बच्चों की परीक्षाएं हो जाती थीं और मेहमान भी बहुत कम आते थे. ऐसे में दिल्ली की गर्मी में बस एक कूलर मिल जाए और थोड़ा सा एकांत. वैसे मुझे बारिश बहुत उद्वेलित करती है. अपनी कहानी मीरा नाची मैंने बहुत तेज बारिश के दौरान बालकनी में बैठकर लिखी.
कई बार कुछ लिख लेने के बाद एक खालीपन के साथ बहुत सारा सुकून भी होता है और तब लगता है कि जिंदगी बस यहीं खत्म हो जाए, अब कोई तमन्ना बाकी नहीं. मीरा नाची शहर के नाम और डेफोडिल जल रहे हैं लिखने के बाद मैं इस अहसास से गुजरी. लेकिन उपन्यास पूरा होने के बाद मैं अकसर खालीपन और उदासी से घिर जाती हूं. ऐसा लगता है अपना जो कुछ बहुत निजी था, वह क्यों दे दिया. फिर इस मनोस्थिति से उबरने में वक्त लगता है. जरूरी नहीं की आपकी रचना पूरी होकर आपको संतोष ही दे. कहानी लिखने के बाद दर्द से छुटकारा मिलने जैसी अनुभूति होती है, लेकिन उपन्यास में अपना सबकुछ खो जाने का भाव होता है.
मैं कभी कोई योजना बनाकर, नोट्स लेकर नहीं लिखती. एक धुंधला सा ख्याल मन में चलता रहता है. पता भी नहीं होता कि वह लिखा जायेगा भी कि नहीं. लेकिन किसी एक उत्प्रेरक क्षण में वह धुंध मिट जाती है और सबकुछ साफ दिखायी देने लगता है. तब रचना शब्दाकार लेने लगती है. चितकोबरा उपन्यास मैंने 26 दिन में लिखा और यह 26 अध्याय में है. इसे बीच से भी पढ़ेंगे तो अधूरा नहीं लगेगा. लिखने के बाद मैंने इसे आरोह-अवरोह के क्रम में जमाया. इसमें एक स्त्री के प्रेम की कहानी है जहां सेक्स वजिर्त नहीं है.
लेकिन यह उपन्यास बहुत से गलत कारणों से चर्चा में रहा. इसे लेकर बेवजह का हल्ला मचाया गया जबकि मैंने इसमें एक स्त्री के शरीर और आत्मा से संबंधित विचारों को व्यक्त किया है. दरअसल, स्त्री की संरचना में द्वैत होता है- शरीर और दिमाग के बीच. मैं इसमें एक ऐसी प्रेम कथा कह रही थी जिसमें प्रेम पैशन था और विचार भी. एक ऐसी औरत की कथा जो भावप्रवण भी है और बहुत प्रज्ञावान भी. उसी प्रज्ञा और भावावेग के साथ 26 दिनों तक सुबह 4 बजे से 6 बजे तक मैं नियमित रूप से लिखती रही थी. 
रचना की प्रक्रिया जीवन के साथ हर पल चलती रहती है. मैं जब लिखना शुरू करती हूं, तो वह शुरुआत नहीं अंत होता है. मेरी रचना प्रक्रिया का पहला और शुरुआती हिस्सा शिल्प की खोज है. सोच और एहसास को शब्दों मे ढालने का सिलसिला रचना प्रक्रिया का अंतिम चरण होता है. यह अंतिम चरण कुछ घंटों में या कभी साल, डेढ़ साल में पूरा हो जाता है लेकिन इसके पूर्वार्ध में यानी शिल्प के जन्म में कितना समय लगेगा, कहा नहीं जा सकता.
मेरे उपन्यास ‘मिलजुल मन’ को लिखने का ऐलान मैंने 1998 में कर दिया था, लेकिन 9 साल तक इसका शिल्प नहीं सूझा.अचानक एक रात मुझे इसका शिल्प मिल गया. इसके बाद डेढ़ साल में यह उपन्यास पूरा हो गया. शिल्प किसी दबाव में या बहुत खोजने पर नहीं मिलता, कभी भी अचानक मिल जाता है. कई बार तेज बुखार में भी. मैंने अपनी कहानी ‘डेफोडिल जल रहे हैं तेज बुखार में लिखी है. मैंने बहुत भीड़ और गुंजान माहौल के बीच रहते हुए भी खुद को उससे काटकर अपना एकांत बनाया है और उसमें लिखा है.मेरा पहला ड्राफ्ट ही अंतिम होता है. इसके बाद उसे सिर्फ प्रूफ के लिहाज से ही पढ़ती हूं.
मैंने लेखन बहुत देर से शुरू किया और उसके बाद तेज रफ्तार में लिखती चली गयी. बाद में थोड़ा अंतराल आया, लेकिन ऐसा अंतराल कभी नहीं रहा कि लेखन में बाधक बन सके. जब उपन्यास नहीं लिख रही होती, तो लेख, कॉलम और कहानियां लिखती रही. यह बिलकुल ऐसे था जैसे पहाड़ी नदी मैदान में उतर आती है, तो धीरे चलने लगती है.
इन दिनों मेरा कुछ कहानियां लिखने का मन है और एक उपन्यास भी बहुत धुंधला सा है जेहन में. जिंदगी रही तो उसे भी लिख सकूंगी. फिलहाल जल्द ही पाठकों के सामने मेरी नयी कहानियां होंगी.
प्रीति सिंह परिहार युवा पत्रकार हैं. 

18 December 2013

एक छाया चेहरे से गुजरी जैसे पत्ता खड़का हो

हिंदी समय डॉट कॉम पर मृदुला जी के अज्ञेय पर लिखे इस संस्मरण पर नजर पड़ी. यह संस्मरण सिर्फ अज्ञेय के बारे में नहीं, मृदुला गर्ग के बारे में भी काफी कुछ कहता है. : अखरावट


अज्ञेय से मेरी पहली मुलाकात 1974 में हुई, जब मेरी बहिन मंजुल भगत का पहला कहानी संग्रह गुलमोहर के गुच्छे भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ। मैं दस बरस दिल्ली से बाहर रहने के बाद, तभी वापस लौटी थी। 1970-71 में हम दोनों ने, करीब-करीब एक साथ, लेखन शुरू किया था। मेरी तब तक कोई पुस्तक छपी न थी।

मंजुल की पहली किताब के प्रकाशन की खुशी में सप्रू हाउस में चायपान था। लगे हाथों दो-चार लेखक-आलोचक किताब पर बातचीत भी करनेवाले थे। एक दिन, अचानक, मंजुल मेरे घर आईं और बोलीं, 'मजा तब आए जब जलसे में अज्ञेय आएँ।' मैंने कहा, 'बुला लेते हैं।'

आप समझ गए होंगे, हम हिंदी साहित्य के राजनीतिक शिष्टाचार से किस कदर अनभिज्ञ थीं। अलबत्ता अज्ञेय के साहित्य से नहीं। ख़ूब पढ़ा था उन्हें। उन दिनों, अज्ञेय हिंदी साहित्य गगन पर सूर्य की तरह देदीप्यमान थे। पर चूँकि मंजुल ने एम.ए अंग्रेजी में नाम लिखवाया था, डिग्री भले न ली हो और मैंने एम.ए करके तीन साल अर्थशास्त्र पढ़ाया था, हमें हिंदी जगत के सोपानतंत्र और चरण-स्पर्शीय शिष्टाचार की आदत न थी। मिरांडा हाउस और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में, नामी-गिरामी प्रोफेसरों और अर्थशास्त्रियों से हम बराबरी के दर्जे पर बहस करते रहे थे। घर का संस्कार भी बौद्धिक और उदार था, हर उम्र का सदस्य अपनी राय देने को सर्वथा स्वतंत्र था। दरअसल पिता जी का अज्ञेय से अच्छा परिचय था पर उन्होंने उनसे बात करने से इन्कार कर दिया। कहा, हम दोनों से अपना रिश्ता वे तभी जाहिर करेंगे जब वे हमारे पिता की तरह जाने जा सकें, हम उनकी बेटियों की तरह नहीं। तकदीर हमारी, ऐसे नैतिक जन हमारी ही किस्मत में लिखे थे!

हमने तय किया, अज्ञेय को फोन करके जलसे में आमंत्रित किया जाए। फिर हमने काल्पनिक सिक्का उछाला, जो हमेशा की तरह, मेरे विपरीत पड़ा। यानी फोन करने का जिम्मा मेरा हुआ। फोन मिलाया गया, अज्ञेय ने खुद उठाया या उन्हें दिया गया, याद नहीं। मैंने कहा, 'वात्स्यायन जी, मेरा नाम मृदुला गर्ग है, आप मुझे नहीं जानते। मेरी बड़ी बहिन हैं, मंजुल भगत, उन्हें भी आप नहीं जानते। उनकी पहली किताब गुलमोहर के गुच्छे छप कर आई है। उस खुशी में हम फलाँ तारीख को फलाँ वक्त सप्रू हाउस में चायपान कर रहे हैं, आप आइए।'

पूछा गया, किताब कहाँ से छपी थी। मैंने बतलाया, भारतीय ज्ञानपीठ से।

तब मंजुल ने मेरे हाथ से फोन ले लिया और बोलीं, 'यह वही भारतीय ज्ञानपीठ है जिसने सुमित्रानन्दन पंत को पुरस्कार दिया था।'

वात्स्यायन जी ने कहा,'समझ रहा हूँ पर पुस्तक मेरे पास आई नहीं।'

'ओहो, हम आ कर दे जाते हैं। बंगाली मार्केट से आपके घर कौन-से नंबर की बस आती है?'

'रहने दीजिए,' अज्ञेय ने कहा और फोन कट गया।

मैंने कहा,'अजीब अहमक है तू। उनसे बस का नंबर पूछने की क्या जरूरत थी। हम खुद पता कर लेते।'

वह बोली, 'तू कौन कम बेवकूफ है। मैं मृदुला गर्ग हूँ, आप मुझे नहीं जानते, वह मंजुल भगत है, आप उसे नहीं जानते… ऐसे भला कोई आता है।'

हमने तय पाया कि अज्ञेय नहीं आएँगे।

पर वे आए। सबसे पहले आए। देर तक रहे। किताब देखी, शायद एक कहानी पढ़ भी डाली, बोले, 'ऐसी बहिनों को देखने का मोह कैसे छोड़ता, जो अपनी पुस्तक की खुशी खुद मना रही हों।'

मंजुल ने दबे स्वर में मुझसे कहा, 'यह तो ऐसे है कि कोई पूछे, आप अपने जूते खुद पॉलिश करते हैं तो जनाब कहें, आप किसके करते हैं?' यानी हम बौड़म समझ नहीं पाए कि अपनी किताब की खुशी खुद क्यों नहीं मनाई जा सकती।

उनसे नहीं कहा तो उनके व्यक्तित्व के प्रभामण्डल के दबाव में। यह वह जमाना था जब रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद किसी लेखक की सदेह छवि मोहित करती थी तो अज्ञेय की। अपनी छवि की तराश में वे सजग-सतर्क थे। एक शब्द में कहना हो तो उस छवि को यही नाम दूँगी, तराश। तराशी हुई दाढ़ी, तराश के साथ इस्तरी किया लिबास, तराशा-सधा स्वर, तराशे हुए तेवर। तराशा रचनाकर्म और चिंतन। तराशी हुई आत्मकथा यानी शेखर एक जीवनी। तराशी यायावरी। तराशा प्रेम, कई बार या एक बार भी नहीं? वैसा ही अहम्। दूसरे के अहम् को तराश कर बौना बनाने का माद्दा। साधारण को तराश कर सानुपातिक कर डालने का भी। उनके व्याख्यानों से बढ़ कर मेरे लिए धरोहर उनका वह तेवर है, जिसके चलते वे किसी के आगे झुकते न थे। एक गोष्ठी में पोलैंड के विख्यात हिंदी अध्येता, स्मेकल साहेब ने हिंदीवालों को शुद्ध हिंदी न बोलने पर धिक्कारा। अज्ञेय ने निहायत संयमित स्वर में विरोध जतलाते हुए कहा, हमारी भाषा है, हम जैसे चाहें बोलें; हम निरंतर उसे परिवर्तित करते हैं, करना चाहिए। एक प्रगतिशील गोष्ठी में इसलिए बोलने से इन्कार कर दिया, क्योंकि उनके हिसाब से, विचार-विमर्श का स्तर बचकाना था। खूब मनाने पर भी नहीं माने, उठ कर चले गए। जबकि बाकी दिग्गज, मान-मनौवल का खेल खेलने के बाद, देर तक बोलने पर राजी हो गए।

अज्ञेय अपनी संजीदगी और दीर्घ मौन के लिए मशहूर थे। यह हमारा सौभाग्य था कि हमने उन्हें पहले-पहल मुस्कराते, हँसते, मजाक करते देखा। यहाँ तनिक संशोधन जरूरी है। आमने-सामने भले उस दिन पहली बार देखा था पर दूर से उनकी सुस्मित, खिलंदड़ी छवि के साक्षी काफी अर्से से रहे थे। यकीन के लिए यह जानना काफी है कि हम मीरांडा हाउस में उन दिनों पढ़े थे, जब कपिला मलिक (वात्स्यायन) वहाँ अंग्रेजी पढ़ाती थीं और वात्स्यायन जी का उनसे प्रेमयोग चल रहा था। अब अज्ञेय की गुरु गंभीर छवि को देखते हुए, 'अफेयर' तो कहा नहीं जा सकता! कपिला जी पूरे मिरांडा हाउस की लाडली बेटी थीं। वात्स्यायनी से उनका विवाह हुआ तो लगा हमीं ने बेटी विदा की। उनकी आशिकी और शख्सियत की कशिश वात्स्यायन के उपन्यास नदी के द्वीप में बखूबी महसूस की। कोई कितना 'अज्ञेय' क्यों न हो, आशिकी के सफर के दौरान बे-मुस्कराए कैसे रह सकता है? लिहाजा हमने दूर से जब उन्हें देखा तो दमकती मुस्कान लिए। कपिला जी से उनका संबंध-विच्छेद हुआ तो उसका दुख, हमने अपनी रगों में महसूस किया। यह बात और है कि इला जी से भी हमारा परिचय था और वे हमें भाती भी खूब थीं। शिशु के लिए उनकी उद्दाम अतृप्त लालसा के भी हम साक्षी रहे। पर वह अवांतर प्रसंग है।

वापस कवि से पहली सदेह मुलाकात पर आया जाए। कुछ न कह कर, बहुत कुछ कह गए थे उस दिन अज्ञेय! हमें ईमानदारी का अमूल्य सबक सिखला दिया था या समझिए कि पिता जी की सीख पर मुहर लगा दी थी। उस बेलौस ईमानदारी की वजह से, आगे चल कर, हमने तरह-तरह के अन्याय सहे पर ईमानदारी नहीं छोड़ी। चाय के दौरान उनका पिता जी से मिलना भी हो गया और उनके यह कहने से कि, 'तो आप इन के पिता हैं,' हमारे हाथ लॉटरी लग गई। पिता जी सार्वजनिक रूप से हमारे पिता तजवीज हो गए!

अज्ञेय के कहे का निहितार्थ समझने में हमें देर नहीं लगी थी। हिंदी साहित्य जगत में ईमानदारी से अपनी भावनाएँ प्रकट करने का रिवाज नहीं था। हर लेखक अजब दार्शनिक या गुस्सैल मुद्रा अपनाए घूमता था, जैसे सहित्य का जनाजा कंधों पर उठाए हो। प्रेम, कला, शिल्प, वैयक्तिक अस्मिता, रस आदि तिरस्कार और उपेक्षा के भाव थे, बल्कि यूँ समझिए कि 'भाव' ही तिरस्कृत था। घोषित प्रगतिशील, पत्नी के निःस्वार्थ प्रेम का भरपूर मज़ा लेते हुए, 'प्रेम' को नकारते थे। अफीम खाने से परहेज न था पर धर्म को अफीम कह कर धिक्कारते थे। मेहनताने का चेक मिलने पर उसे भुना, शराब पीना प्रगतिशीलता थी पर बच्चों के लिए मिठाई खरीदना, उच्चवर्गीय प्रतिक्रियावाद। छोटी दीवाली पर हुई रेडियो रिकार्डिंग के बाद, मैं इस 'व्यापार' की भुक्तभोगी रही थी। धुरंधर से धुरंधर लेखक, कलम हाथ में थामे, इंतजार करने पर मजबूर था कि शिल्प सूझे तो विचार की धारा को रचनात्मक कृति बनाए पर शिल्प के अदम्य अकर्षण को, पाश्चात्य अनुकरण बतला कर, लांछित करने से, बाज नहीं आता था। भूल जाता था कि मार्क्सवाद स्वयं धुर पाश्चात्य फलसफा है या कला और सौंदर्यबोध को कोस कर, वह मार्क्स के अपूर्व भाषा ज्ञान और कलात्मक शिल्प को तिरस्कृत कर रहा था।

ऐसे माहौल में भाषा और शिल्प के अदभुत चितेरे अज्ञेय का कला के प्रति समर्पित बने रह कर, साहित्यिक बिरादरी का सम्मान जीतना, चमत्कार से कम न था। अनेक गोष्ठियों में उन्हें ईमानदारी और साहस के साथ अपने नितांत मौलिक चिंतन को शब्द देते सुन चुकी थी। दिनमान के संपादक रहते, उन्होंने प्राग,वारसॉ जैसे अंग्रेजों के दिए उच्चारण को छोड़, यूरोप के शहरों के मूल नाम, प्राहा, वरसावा आदि लिखना शुरु किया था। अफसोस, हमारी उपनिवेशवादी मानसिकता, सच्चाई हजम न कर पाई और उनके जाने के बाद, हम अंग्रेजियत पर लौट आए। पर मुझे लगता है आगे चल कर, कोलकाता, मुंबई आदि नामकरण, उन्हीं के डाले बीज से पनपे थे।

उस पहली मुलाकात के बाद, अज्ञेय से गोष्ठियों में मिलना होता रहा पर साक्षात अकेले मिलना, छह बरस बाद तब हुआ, जब 1980 में, मेरा चौथा उपन्यास अनित्य छपा। पहला उपन्यास 1975 में छपा था पर मंजुलवाला वाकया दुहराने का मौक़ा न था। दुहराव में तिलिस्म नहीं होता। यूँ भी, प्रकाशक द्वारा आयोजित गोष्ठी में, बतौर अध्यक्ष, जैनेंद्र जी आए थे। जैनेंद्र और अज्ञेय के बीच तनातनी अर्से से चल रही थी। सुना था जैनेंद्र ने कहीं अज्ञेय का परिचय अपने अनुवादक की तरह दे डाला था, जिससे जाहिर है, तनातनी और बढ़ गई थी। वात्स्यायन को जैनेंद्र का दिया 'अज्ञेय' उपनाम ही पसंद न था। अपनी नापसंदगी वे छुपाते न थे पर अचरज, उपनाम का प्रयोग करते जाने से भी एतराज न था। दरअसल यह इस बात का सबूत था कि वात्स्यायन नाम का कवि, धरती के ऊपर नहीं, धरती पर विचरनेवाला जीव था। मानवीय गुण-दोष संपूर्त।

धरती को अगर प्रकृति या पर्यावरण का पर्याय मानें तो अज्ञेय से ज़्यादा कौन था था धरती का? पत्ते-पत्ते में उनकी गहरी काव्यात्मक ही नहीं, दार्शनिक रुचि थी। वैज्ञानिक जानकारी भी कम न थी। कौन-सी वनस्पति कब-कहाँ उगी, किस जैविक तर्क के तहत पनपी, किस-किस तरह हरियाई और नष्ट हुई, उनसे ज्यादा किसी कवि ने न जाना, न जानने की कोशिश की। प्रकृति का नैसर्गिक संगीत उनके लेखन में यूँ तरंगित था कि उसकी सौंदर्यानुभूति ही नहीं, उस में निहित गहन चिंतन भी, प्रकृति के विलक्षण तर्क से प्रेरित होता था। यही कारण था कि उनके अतुल्य और विपुल गद्य साहित्य के बावजूद, अंततः उनके नाम के साथ 'कवि' शब्द उपनाम की तरह जुड़ा, जैसे रवींद्रनाथ ठाकुर के साथ 'कविवर गुरुदेव' या शेक्सपीयर के साथ 'द बार्ड'।

1980 में तमिल लेखक पोट्टेकट को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था। उस उपलक्ष्य में शाम के चायपान में मंजुल और मेरी मुलाकात, अज्ञेय और पोट्टेकट से एक साथ हुई। चित्र खींचे जा रहे थे। पता नहीं अज्ञेय को क्या सूझा कि मंद स्मित के साथ, मंजुल और मेरे एक तरफ खड़े हो गए, पोट्टेकट को दूसरी तरफ खड़े होने को इशारा करके बोले, 'हम इनके द्वारपाल हो जाएँ।' यह हँसी- मजाक कितना दुर्लभ था, मैंने बाद में समझा। वहीं उन्होंने मुझे बतलाया कि किसी पत्रिका में मेरे उपन्यास की समीक्षा निकली थी, कहा, 'बड़ी तारीफ की है आपकी।', फिर जोड़ा, 'घर आएँ तो बात हो सकती है।' मुझ कूढ़मग्ज़ की समझ में भी आ गया कि उपन्यास उहोंने पढ़ लिया है।

मैं तिपहिया ले कर, केवेंटर ईस्ट, उनके बँगले पर पहुँची; तय वक्त से पाँच मिनट बाद। शहर के शहरीपन की कैद से छूटा, गजब इलाका था। घर था कि मिल कर नहीं दे रहा था। मैं वक्त की पाबंदी का सबक घुट्टी में पिए थी, लिहाजा तिपहिए से उतरते ही, आकुल स्वर में, देर से आने के लिए माफी माँगी। उनके चेहरे पर मुस्कान-सी छलकी, एक भौंह ने हरकत की और वे बोले, 'आइए'। मुझे लगा, सिर्फ पाँच मिनट की देरी के लिए क्षमा माँगना उन्हें भाया है। जहाँ तक मुझे याद है, रमेशचंद्र शाह तथा कुछ अन्य जन बाहर बरामदे में थे। अज्ञेय मुझे सीधे बैठक में ले गए। सबसे पहले जो उन्होंने कहा, उससे अचरज भी हुआ और उनकी छवि की तराश भी बिगड़ी। कहा कि मेरे पिछले उपन्यास चित्तकोबरा पर सारिका में बहस पढ़ी थी पर उपन्यास नहीं। अनित्य पढने के बादचित्तकोबरा मँगा कर पढ़ी। चकित, मैं सोच रही थी, अगर अज्ञेय जैसा मनमौजी और दबंग व्यक्ति, सारिका की फूहड़ टिप्पणियों से प्रभावित हो, चित्तकोबरा पढ़ने से परहेज कर सकता था तो आम जन का क्या हाल हुआ होगा? तब तक चुप्पी का पाठ हृदयंगम कर लिया था, सो अपनी भवों को तनिक ऊपर उठा, सम पर ले आई पर कुछ कहा नहीं। अज्ञेय ने क्षणांश को मुझे ताका। एक छाया चेहरे पर थिरक कर गुजर गई, जैसे पत्ता खड़का हो। फिर वे अनित्य पर बात करने लगे। बहुत बातें हुईं, दुहराना बेकार है, कोई गवाह है नहीं। कुछ दिन पहले चंद्रकांत बांदिवडेकर ने मुझसे कहा कि अनित्य अज्ञेय को पसन्द आया था पर उसका भी कोई गवाह नहीं है, सो आपका मानना, न मानना, दोनों उचित होंगे। हाँ, उस बातचीत में एक दिलचस्प प्रसंग था, जिसे बाँटना चाहती हूँ। स्मृति में अटका है, ज्यों का त्यों।

उपन्यास के अनित्य नामक पात्र के बारे में उन्होंने कहा कि कैसा मोहभंग है उसका जब वह बार-बार लौट आता है। प्रतिवाद में मैंने कहा, 'यही तो अंतर है यायावर और संन्यासी में। संन्यासी जाता है तो लौटता नहीं, यायावर लौट-लौट आता है। तभी तो यायावर कहलाता है, नहीं?'

यायावरी के विशेषज्ञ अज्ञेय से वह कहना, गुरु-शिष्य परंपरा के दरबार में गुस्ताखी ही मानी जाएगी। पर मुझे आदत थी, डाक्टर वी.के.आर.वी राव और के. एन. राज जैसे दिग्गज गुरुओं से बहस करने की। सो निःसंकोच अपना मत दे डाला। उन्होंने उत्तर नहीं दिया। न विरोध, न अनुमोदन; बस इस बार पत्ता जरा जोर से खड़का। एक सुरमुई छाया चेहरे से हो कर गुजरी और कमरे में मौन पसर गया। चुप्पी खिंचती गई। उनकी चुप्पी की दीर्घता से मैं स्वयं परिचित न थी पर उसका बखान पर्याप्त सुन रखा था, इसलिए कुछ देर बाद उठ खड़ी हुई, कहा, 'नमस्कार।'

'जाएँगी?' वे बोले। एक बार फिर, चेहरे पर छाया लहराई पर वह पहली छाया से कुछ अलग थी।' बैठिए,' उन्होंने कहा,' इला नाश्ता ला रही हैं।' किसी अदृश्य संगत के अंतर्गत, इला जी व नाश्ते की ट्रे लिए सेवक तुरंत उपस्थित हो गए। मैं बैठ गई। और कर भी क्या सकती थी! सोचा, मुझे इला जी के पास छोड़, अज्ञेय बाहर चले जाएँगे पर वे गए नहीं। कुछ औपचारिक बातचीत के बाद, पता नहीं क्यों, इला जी और मेरे बीच, लेखक के अहम् पर बात चल निकली। चोट खाए थी, शायद इसलिए मेरे मुँह से निकला,'लेखक में अहंकार तो होता ही है।' इस बार अज्ञेय के चेहरे को जिस छाया ने धूमिल किया, वह गुजरी नहीं, टिकी रही। मैंने तुरंत संशोधन किया, 'अहंकार नहीं, अहम् कहना चाहिए था।' छाया हट गई। फिर जाने मुझे क्या सूझा कि, आ बैल मुझे मार की तर्ज पर, उनकी आँखों में आँखें डाल कर कहा, 'वैसे व्यeवहारिक अंतक दोनों में है नहीं।' कहने के साथ, अपना पर्स उठा, चलने की तैयारी भी कर ली। सोचा इस बार उनके चेहरे पर जो उभरेगा, देर तक झेला न जाएगा। पर हुआ यह कि माथे पर शिकन आते-आते बिला गई और वे मुस्करा दे। मेरा मंतव्य समझ, मेरे ही अस्त्र से मुझे परास्त कर दिया। मैं नतमस्तक हुई।

एक बात और। उनके पिचहत्तरवे जन्म दिवस पर कई समारोह हुए थे। उन्हीं में से एक में आपसी बातचीत में उन्होंने कहा था, हमारे यहाँ, 75 नहीं, 77 वर्ष और 77 दिन की आयु महत्वपूर्ण है। पता नहीं क्यों, मैंने, जिसने कभी डायरी नहीं रखी, हाथ की पुस्तिका में यह दर्ज कर लिया। उनकी मृत्यु हुई तो वह कथन याद आया। उस पड़ाव पर वे पहुँचे नहीं थे। यह लेख लिखते हुए पुस्तिका खोजने का प्रयास तक मैंने नहीं किया। इतनी प्रिय वस्तुएँ नष्ट हो चुकीं कि वह भी बिला गई होगी कहीं। खोजने का मन नहीं है, याददाश्त काफी है। सबूत न होने पर भी गलत नहीं हूँगी, क्योंकि यह बात मेरे सपने में आ सकने वाली है नहीं।

यहाँ कमलनी खिलती है

वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजने का फैसला अकादमी के देर आयद पर दुरुस्त आयद की परंपरा के अनुकूल ही है. फिलहाल पढ़ते हैं उनकी एक कहानी. "यहाँ कमलनी खिलती है". : अखरावट  


वीराने में दो औरतें मौन बैठी थीं। पास-पास नहीं, दूर; अलग, दो छोरों पर असम्पृक्त। एक नजर देख कर ही पता चल जाता था कि उनका आपस में कोई सम्बन्ध न था; वे देश के दो ध्रुवों पर वास करने वाली औरतें थीं।
एक औरत सूती सफ़ेद साड़ी में लिपटी थी। पूरी की पूरी सफ़ेद; रंग के नाम पर न छापा, न किनारा, न पल्लू। साड़ी थी एकदम कोरी धवल, पर अहसास, उजाले का नहीं, बेरंग होने का जगाती थी। मैली-कुचैली या फिड्डी-धूसर नहीं थी। मोटी-झोटी भी नहीं, महीन बेहतरीन बुनी-कती थी जैसी मध्य वर्ग की उम्रदराज़ शहरी औरतें आम तौर पर पहनती हैं। हाँ, थी मुसी-तुसी। जैसे पहनी नहीं, बदन पर लपेटी भर हो। बेख़याली में आदतन खुँसी पटलियाँ, कन्धे पर फिंका पल्लू और साड़ी के साथ ख़ुद को भूल चुकी औरत। बदन पर कोई ज़ेवर न था, न चेहरे पर तनिक-सा प्रसाधन, माथे पर बिन्दी तक नहीं। वीराने में बने एक मझोले अहाते के भीतर बैठी थी वह। चारों तरफ से खुला, बिला दरोदीवार, गाँव के चौपाल जैसा, खपरैल से ढका गोल अहाता।
दरअसल, वीराना वीरान था भी और नहीं भी। दो बीघा जमीन का टुकड़ा, दो फुट ऊँची चाहरदीवारी से घिरा था। दीवार इंसान की बनाई हुई थी, इसलिए उसे वीराने का हिस्सा नहीं माना जा सकता था। पर उसकी गढ़न स्त्री की साड़ी जैसी बेरंग-बेतरतीब थी; यूँ कि उसका होना-न होना बेमानी था। वह बस थी; पेड़-पत्तों से महरूम, उस खारी धरती की निर्जन सारहीनता को बाँध, कम करने के बजाय बढ़ा रही थी। उस जमीन को घेरते वक्त, घेरने वाले का इरादा, उसे आबाद करने का नहीं था। दिल की वीरानी को हरदम रौंदते यादों के काफिले को जीते-जीते, बाक़ी की जिंन्दगी जीने की कूवत पैदा करने के लिए, जिस एकान्त की जरूरत होती है, उसी को निजी बनाने की कोशिश थी। कभी-कभी सुकून पाने को वीराने में ही ठौर बनाना पड़ता है; वैसा ही ठौर था वह मझोला छाजन।
पर अचरज, इंसानों को बसाने का जज्बा भले न रहा हो, फूलते-फलते पेड़ लगाने का इरादा जरूर था। इरादा कि उम्मीद! जिद या दीवानगी! जो था, कारगर न हुआ। धरती में खार की पहुँच इतनी गहरी थी और निकास के अभाव में, बरसात के ठहरे पानी की मियाद इतनी लम्बी कि पेड़ों का उगना, मुश्किल ही नहीं, करीब-करीब नामुमकिन था। कुछ झाऊं और कीकर जरूर उग आते थे जब-तब। पर जब और तब के बीच का फासला इतना कम होता कि पता न चलता, कब थे कब नहीं। उगते, हरसाते, ललचाते और मुक्ति पा जाते। जब पहले-पहल, पहला झाऊं उगा तो बड़ी पुख्तगी के साथ इरादा, उम्मीद बना कि बस अब वह भरे भले नहीं पर जंगली पेड़ वहाँ हरे जरूर होंगे। और उसके एकाध साल बाद, जमीन ममतामयी हुई तो फलदार पेड़ भी उग सकेंगे। झाऊं के बाद कीकर उगे तो उम्मीद भी उमगती चली गई, अंकुर से पौध बनती। सरदी पड़ने पर कीकर पीले पड़ कर सूख गये; झाऊं भी गिनती के दस-बीस बचे। तब भी उम्मीद ने दम न तोड़ा। लगा इस बरस पाला ज्यादा पड़ गया, अगली बार सब ठीक हो जाएगा। जब अगले बरस भी सिलसिला वही रहा तो धीरे-धीरे, जंगली पौधों के पेड़ बनने से पहले गलने-सूखने के साथ, उम्मीद क्या, ज़िद तक दम तोड़ गई।
दूसरी औरत छाजन के बाहर, चहारदीवारी के भीतर बैठी थी, हैंड पम्प के पास। फिसड्डी, पैबन्द लगी कुर्ती और ढीली सलवार पहने थी। अर्सा पहले जब नया जोड़ा बना था तो रंग ठीक क्या रहा होगा, कहा नहीं जा सकता था। और जो हो, सफेद वह कभी नहीं था। मैला-कुचैला या बेतरतीब फिंका हुआ अब भी नहीं। दुरुस्त न सही चुस्त जरूर था, देह पर सुशोभित। सीधी तनी थी उसकी मेहनतकश देह, उतनी ही जितनी पहली की दुखी-झुकी-लुकी। ज़ाहिर था वह निम्न से निम्नतर वर्ग की औरत थी। गाँव की वह औरत, जो दूसरों के खेतों पर फी रोज मजदूरी करके एक दिन की रोज़ी-रोटी का जुगाड़ करती है पर खुदकाश्त जमीन न होने पर भी रहती किसान है। जमीन से जुड़ाव में; अपनी भाव-भंगिमा में। वह इस ऊसर धरती के साथ पली-बढ़ी थी। उसे उपजाऊ से खार होते देखा था। कोई नहर बनाई थी सरकार ने। पर पानी के निकास का सही बन्दोबस्त न होने पर खार इधर के खेतों की तरफ दौड़ा था और हरियल धरती को कल्लर बना कर छोड़ा था। आदमकद पेड़ उगाने की न उसने कभी उम्मीद की, न किसी और ने जिद। उसने आस लगाई तो बस कमतर श्रेणी का धान उगाने वाले खेतिहरों की फसल की बुवाई-कटाई की, जो कमोबेश पूरी होती रही, दो-एक सालों के फासले पर। जब सूखा पड़ता और फसल सिरे से गायब हो जाती तो सरकार राहत के लिए जहाँ सड़क-पुल बनाती, वहीं मजूरी करने चली जाती। जिस दिन मजूरी नहीं, उस दिन कमाई नहीं; रोटी नहीं। बिला काम-धाम, आराम से बैठने की उसे आदत न थी। सोने और जागने के बीच सिर्फ काम का फासला जानती थी, इसलिए चन्द मिनट बेकार क्या बैठी, आप से आप आँखें मुँद गईं। इतनी गहरी सोई कि ओढ़नी बदन से हट, सिर पर टिकी रह गई। निस्पंद बैठे हुए भी उसकी देह जिंदगी की थिरकन का भास देती रही। साँस का आना-जाना, छाती का उठना-गिरना, मानो उसकी रूहानियत के परचम हों।
कल उसने दूनी मजदूरी करके, घरवाले और बच्चे के लिए कुछ रोटी-प्याज बचा रखा था कि आज काम पर न जा, यहाँ बैठ पाए। ऐसा भाग कम होता था कि एक दिन में दो दिनों के गुजारे लायक अन्न जुट जाए। सबकुछ बरखा भरोसे जो था। सचमुच पिछले दो बरस बड़भागी बीते थे। पिछले बरस भी बरखा इतनी हो गई थी कि धान की फसल ठीक-ठाक हो और उसे कटाई का काम मिलता रहे। और इस बरस... इस बरस तो यूँ टूट कर बरसा था सावन कि बिला खेत-जमीन, हरिया लिया था जिया। तभी न कल दूनी मजदूरी का जुगाड़ हुआ और आज यहाँ बैठने आ पाई। जानती थी पहली औरत आज आएगी; पिछले दो बरसों से आ रही थी।
मुँदने से पहले उसकी आँखें दीवार के परली तरफ टिकी थीं। दीवार की बाँध में बँध कर, उधर की निचली जमीन के गड्डों-खड्डों पर, उमग-घुमग कर बरसा पानी जो ठहरा, तो भरा-पूरा पोखर बन लिया। और उसमें खिल आए कमलनी के अनगिन फूल। जहाँ तक वह जानती थी; और इस इलाके के बारे में शायद ही कुछ था जो वह नहीं जानती थी; तो इस बरस से पहले, किसी बरस यहाँ कमलनी नहीं खिली थी।
हे मैया, अजब माया है थारी! इस बरस कमलनी भी यों खिली ज्यों बरसा पानी; अटाटूट। देवी पारवती का चमत्कार नहीं तो क्या कहें इसे? वह जाने थी भली भाँत, पारवती के कहे पर ही खिली थी कमलनी यूँ घटाटोप। कहा होगा शिवजी से कि प्राणप्यारे खिला दो, छोरी खातिर उसकी नाईं कमलनी। बाबा शंकर मना करते तो कैसे; सूरत छोरी की ज्यों पारवती की परछाईं। दिप-दिप मुख पर देवी जोगी मुस्कान लिए खत्म हुई थी; पल भर को जो छोरे का हाथ अपने हाथ से छूटने दिया हो। जैसे ही गाड़ी ट्रेक्टर से टकराई, सोने से छोरा-छोरी मिट्टी हो गए। यह औरत, जो दो बरस से यहाँ आया करे है; जने क्या सोच बंजर को आड़ दे, बीज छींटा करे है, छोरे की माँ है।
सफेद झुकी औरत की आँखें उसकी देह की तरह बेजान नहीं थीं। जब-तब उनमें यादों का बरसाती अंधड़ सरगोशियाँ कर उठता। कभी काली आँधी की किरकिर धूल तो कभी साँवले मेह की झिलमिल टपकन। प्यार से पगे पल की याद कुलांच भरती कि विरह से सना उपरांत लपक कर उसे दबोच लेता।
वह उन्हें पूरा नहीं खोलती थी, न इधर-उधर ताकने की इजाजत देती थी। निगाहें यूँ नीचे झुकी रहतीं जैसे अपने दुख पर शर्मिन्दा हों। पर इधर-उधर न देखने की कोशिश जितनी करे, प्रकृति को पूरी तरह पछाड़ कहाँ पाती थी? गाहे बगाहे नजर फिसल ही जाती, यहाँ-वहाँ। उसकी दूसरी कोशिश भी नाकाम रहती। बोझिल अधखुली आँखों को पूरी तरह मूँद, यह उम्मीद करने की, कि इस वीराने में यादों के भंवर में डूब, नींद आ जाएगी। एकाध दफा यह तो हुआ कि भंवर से दो-एक खुशनुमा लम्हे जेहन में उभरे और बरबस ओंठों पर हल्की मुस्कराहट तिर गई। पर ज्यादा देर टिकी नहीं... अनचाहे-मनचाहे उगे झाऊं-कीकर की तरह समाधिस्थ हो गई। बची रही चीखती-चीरती एक आवृत्ति...पहले गुजरी इस तिथि की...
कभी ऐसा भी हुआ कि अधखुली आँखों से उसने उम्मीद के इस वीराने को फल-फूल से लदा देख लिया। बेर, कैर, करौंदों से ही नहीं, जामुन और आम के झुरमुट से हरियाया। पर भ्रम रहा भ्रम ही; दीवानगी में भी वह जाने रही कि वह दीवानगी थी, असलियत या सच्चाई नहीं। उन जबरन मुंदी, अधमुंदी आँखों में जब नींद कभी न आई तो सपने कैसे आते? नहीं आए इसी से दीवानगी को दीवानगी जाने रही और वीराने को वीराना।
अब भी, हमेशा की तरह, उसने जबरन आँखें मूँदीं तो छलावे-सी मायावी, नामालूम-सी खुशबू ने पलकों पर दस्तक दी। कहाँ से आई खुशबू? क्या आँख लग गई, सपना आ बैठा उसके रूमाल का रूप ले, भीगी पलकों पर? आँखें औचक खुलीं तो इधर-उधर भटक भी लीं।
उसने देखा... जमीन को घेरे जो दो फुटी दीवार खड़ी थी, उसके दूसरी तरफ बाहर पानी ही पानी था। इतना पानी! हाँ होता है, देख चुकी है न दो बार। बरसात होने पर, उम्मीद का यह वीरान बगीचा, पानी से भरा उथला नाला बन, खुद अपने पेड़-पौधों को निगल जाता है। पर यह मौत का साया फेंकता पानी नहीं, कुछ और है। इसमें तो बेशुमार कमलनी खिली हैं! दर्जनों, बीसियों, सैंकड़ों की तादाद में। वह चौंक कर खड़ी हो गई। कमलनी! यहाँ, जहाँ कभी कुछ खिलता नहीं। समझी! आखिरकार उसे नींद आ ही गई और यह सलोना सपना दिखला गई।
मन्त्र मुग्ध वह उठी और यन्त्र-बिद्ध कदमों से दीवार के पास पहुँच गई। कमलनी बदस्तूर खिली रही; मन के तिलिस्मी पेड़ों की तरह बिलाई नहीं। उस पार जाने के लिए वह दीवार में, हैंड पम्प के पास बनी, फाँक की तरफ बढ़ी तो वहाँ एक स्त्री मूर्ति देख, स्तब्ध-अवसन्न रह गई। कहाँ से आई यह प्रतिमा, उसने तो लगवाई नहीं, करुणा से ओतप्रोत देव-मूर्ति... तब... कौन लगा गया... किसने तराशी ऐसी दिलकश... उसकी साँस रुक गई... मूर्ति की छाती उठती-गिरती साँस से हिल रही थी। यह तो... जिन्दगी की हलचल से लबालब, बादामी आँखें पूरी खोल सपनों में खोई... उसकी बहू थी? दिंन्दा?
पर उसे तो उसने ख़ुद अपने हाथों...
सिर में घुमेर उठी और वह चक्कर खा वहीं उसके बराबर में ढह गई। पसीने से तरबतर बदन से चिपकी साड़ी का पल्लू कन्धों से लरज, दूसरी औरत की ओढ़नी की तरह जमीन पर बिछ गया। वह बेखबर उठँगी पड़ी रही। उस औरत ने करुण वात्सल्य से भीगी दृष्टि उस पर डाली पर अपनी जगह से हिली नहीं; सहारा दे उसे उठाया नहीं।
सिर हाथों में थाम, उसने खुद को सम्भाला और अपनी उसी झुकी, दुखी, जीवन से हताश, मुक्ति की तलाश में दिग्भ्रमित मुद्रा में बैठ गई। निगाह बरबस ऊपर उठी तो दूसरी औरत की स्निग्ध नजर से जा टकराई।
नजर के साथ चेहरा आँखों की राह जेहन में पहुँचा तो हाहाकार करते दिल ने समझा, वह नितान्त अजनबी औरत थी। निश्चल रह कर भी, अपनी साँसों के स्पंदन से उस निष्कम्प सन्नाटे को आबाद कर रही थी। खुली बादामी आँखों, उसी मंजर को ताक रही थी, जिसे सपना जान, मोहपाश में बँधी, वह फिर-फिर देखने की पगलाई ख्वाहिश लिए, चली आई थी। उनकी साझा नजरों के सामने हर तरफ कमलनी ही कमलनी थी।
दोनों पास-पास मौन बैठी, एक दिशा में ताक रही थीं। पहली औरत अपने से बेखबर थी और दूसरी से भी; पर दूसरी, पहली से पूरी तरह खबरदार थी। स्नेहिल, ममता में रची-पगी दृष्टि, जब-तब उस पर डाल, वापस कमलनी के घटाटोप की तरफ़ मोड़ लेती।
कितना वक्त गुजराः कुछ पल, चन्द लम्हे, एक घन्टा, एक पहर; कौन हिसाब रखता। बेखयाली में गुम पहली औरत भला क्या कयास लगाती, कितने बरस बीते वहाँ? लगा, रेत की मानिन्द हाथों से फिसली पूरी जिन्दगी बीत ली। याद आया, यहाँ साँप के एक जोड़े ने बसेरा किया था। केंचुल छोड़ एक दिन सरक लिए। फिर नहीं लौटे। मोर-मोरनी भी भटक आए थे एक बार, जब बरसात से पहले, कुछ पेड़ उम्मीद बन उगे थे। वे भी चले गए न लौटने के लिए। वही बार-बार लौट आती है यहाँ। कब हुआ था वह सब? क्या पिछले साल ही? अब कहाँ थे वे? यहीं कहीं थे आस-पास या गये? सब गए; सब के सब?
दूसरी बेखबर नहीं थी। आश्वस्त थी कि दिन ढलने में अभी वक्त था। साँझ उतरने पर, जब कमलनी पँखुड़ियाँ समेटना शुरू करेगी, तभी घर पलट पाएगी, सोच कर ही वीराने में पाँव रखा था। उसे पता था, छोरे की माँ छोरे की पुन्न तिथि पर साँझ घिरने पर ही वहाँ से पलटती थी। कमलनी कल फिर खिलेगी; सूरज उगने के साथ। पर पारवती अपने शिव को साथ ले जो गई सो गई। दो बरस बाद ये सौगात भेजी माँ के लिए; ढेरोढेर कमलनी के फूल। यहीं से पानी ले जाती थीं गाँव भर की औरतें। इस बरस हर जबान पर यही नाम था; जहाँ कमलनी खिलती है।
बरसात बाद के अगहन महीने की दुपहरी का तेज ताप, जिसमें हरिण भी काले पड़ जाते हैं, मद्धिम पड़ना शुरू हुआ तो दमकती-चमकती कमलनी, स्त्री की आर्द्र दृष्टि की तरह सौम्य दीखने लगीं। उसने अचकचा कर ऊपर आसमान की तरफ देखा; हाँ, सूरज चलाचली की ओर बढ़ रहा था। उसने ओढ़नी सिर से खींच, पूरा बदन ढका और असमंजस भरी निगाह से पास बैठी औरत को निहारा। निहोरा अब भी था उसमें पर हल्की दुविधा का भास लिए।
थिर मूरत में हरकत हुई तो पहली औरत मायाजाल से निकल ठोस जमीन पर आ गिरी। पर कमलनी... वे तो अब भी खिली थीं। कुछ सिमटी-सकुचाई जरूर थीं, नई दुल्हिन की तरह। पर थीं सब की सब वहीं; मगन मन पानी के ऊपर तैरती। नहीं, मायावी नहीं था वह लोक जिसमें विचर, वह अभी-अभी लौटी थी। कमलनी थीं, वाकई थीं।
बेध्यानी टूटी तो जो पहले नहीं सूझा था, अब सोच बैठी। कौन थी वह औरत; यहाँ क्यों बैठी थी? हैंड पम्प से पानी लेने आई होगी। इस खारे इलाके का पानी भी खारा था; कुओं का ही नहीं, गहरे खुदे नल कूप का भी। वह खुदवा कर देख चुकी थी। मीठा पानी सिर्फ सरकार की कृपा से मिलता था। उसकी जमीन पर था मीठे पानी का एक हैंड पम्प। उसी ने कह-सुन कर लगवाया था। सुबह सकारे गाँव की औरतें उससे पानी भरने आती थीं। पर इतनी देर रुक-ठहर कोई बैठती न थी। भागती-दौड़ती आईं, पानी भरते-भरते आपस में दो बोल बोले और चल दीं। कभी वह नजर आ गई तो शर्मीली-सी दुआ-सलाम उससे भी कर ली,बस।
उठने-उठने को होती दूसरी औरत बैठी थी अब तक। पर उसके बदन की कसमसाहट पहली को उठने पर आमादा कर रही थी। क्या वे किसी काम के सिलसिले में आपस में टकराई थीं? याद आया, एक बार, एक स्वयंसेवी संस्था से दो औरतें यहाँ आई थीं; गाँव की औरतों को क्या-कुछ बतलाने। बड़ी मुश्किल से औरतों को इकट्ठा किया था पर बात आगे बढ़ी न थी। कैसे बढ़ती? औरतें चाहती थीं रोजगार और वे देती थीं, मात्र सलाह। तो... उसने क्या किया? कुछ नहीं। सोचा भी नहीं कि कुछ कर सकती थी।
फिर एक बार... अरे पिछले बरस ही तो, धान की थोड़ी-सी फसल भी हुई थी इस जमीन पर; कुछ औरतें काट ले गई थीं। उनमें रही होगी यह भी। पर... आज... एक बरस बाद... इतनी देर से यहाँ क्यों बैठी है? कौन है यह, क्यों है?
कौन हो सकती है? गरीब घर की किसान औरत, और क्या। पर... आँखों से झरती कण-कण अनुकम्पा; सीधी-तनी-कृश देह से तरंगित वत्सल राग? पेबन्द लगी फिड्डी पोशाक में दिपदिप करती देवी-सी आकृति... उसकी बहू... नहीं पार्वती है यह साक्षात! वही... वही... और कोई नहीं...
कुछ पल गुजरे...एक पहर और बीता...
सूरज अवसान की तरफ़ बढ़ा, कमलनी सकुचाईं, मायाजाल तिड़कता चला गया। इतना कि तमाम संकोच-झिझक के बावजूद, सपनलोक से बेवफाई कर, वहजमीनी सवाल कर बैठी।
"कुछ चाहिए?"
"ना,"
उसने कहा," सोचा, इकली कैसे बैठोगी।"