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31 March 2013

ख्वाबों की या भय की भाषा!


पिछले दिनों जब संघ लोकसेवा आयोग ने सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में अंगरेजी के परचे के अंक को कुल अंकों में जोड़ने का फैसला सुनाया, तो इसने हिंदीभाषी राज्यों के छात्रों के भीतर एक गहरे आक्रोश को जन्म दिया. हालांकि चौतरफा विरोध के बाद सरकार ने इस फैसले को टाल दिया, लेकिन इसने एक बार फिर हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के ऊपर अंगरेजी को तरजीह देने की लंबी चली आ रही मानसिकता को उजागर किया है. हर बार की तरह एक बार फिर अंगरेजी के पैरोकारों ने यह तर्क दिया कि अंगरेजी अंतरराष्टÑीय भाषा है. पूरे देश की संपर्क भाषा है. यह कैरियर और तरक्की की भाषा है. अंगरेजी के पक्ष में दिये जाने वाले तर्कों की हकीकत और उसकी राजनीति पर केंद्रित यह लेख मैंने कुछ दिन पहले लिखा था. इस बीच संघ लोक सेवा  आयोग ने अंग्रेजी के अंकों को मुख्य परीक्षा में जोड़ने के निर्णय को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया है और एक भारतीय भाषा और एक अंग्रेजी के पन्ने में क्वालीफाईंग नंबर लाने की पुरानी व्यवस्था को पुनः लागू कर दिया है.





स्कूल का नाम नहीं बताऊंगा. लेकिन यह न समझा जाये कि स्कूल का नाम न लेने के कारण यह घटना अवास्तविक या काल्पनिक है. वाकया जानने के बाद आपको एहसास होगा कि यह तो आपके आसपास की दुनिया का ही किस्सा है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप पटना में रहते हैं या रांची में. दिल्ली में या मुंबई में.

दिल्ली में मैं जिस घर में रहता हूं, उसके ठीक पीछे नगर निगम का एक प्राइमरी स्कूल है.  बच्चे अपनी कक्षाओं में पूरे कंठ से शोर मचाते रहते हैं और उनकी आवाज मेरी चेतना तक को भेदती रहती है, लेकिन शिक्षक नदारद रहते हैं, तो नदारद ही रहते हैं. हाल यह है कि जब कभी किसी शिक्षक की 'ए फॉर एप्पल"  जैसी कोई आवाज मेरे कानों में गूंजती है, मैं अचानक घबरा सा जाता हूं. सरकारी स्कूल की दशा को लेकर यह कोई खोज नहीं है. उन्हें, जिनके बच्चों को इस स्कूल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वे इस हकीकत को कहीं भली-भांति जानते हैं. फिलहाल मैं दिल्ली की एक घटना की जिक्र करना चाहूंगा. मेरे घर एक बिजली मिस्त्री काम करने के लिए आया करता है. उसका नाम लक्ष्मण है. पिछले साल वह मेरे घर पंखा लगाने आया था. पीछे स्कूल से आ रहे शोर को सुन कर वह गुस्से और लाचारी से भर उठा. गुस्सा स्कूल की दशा को देखकर. लाचारी इस बात की कि पिछले साल आर्थिक दिक्कतों के कारण उसे अपने बच्चों का इस साल सरकारी स्कूल में दाखिला कराना पड़ा. लेकिन उसने तय कर रखा था कि वह अगले साल अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में डाल देगा. प्राइवेट स्कूल... जहां उसके बच्चे अंगरेजी पढ़ सकेंगे. जिंदगी बना सकेंगे.

‘अंगरेजी! पढ़ेगा, तो साहब बनेगा. अंगरेजी नहीं पढ़ेगा, तो हमारी तरह बिजली मिस्त्री या ऐसा ही कोई छोटा-मोटा काम करेगा.’ जाहिर है वह अपने बच्चे का दाखिला मॉडर्न स्कूल या डीपीएस में कराने का ख्वाब नहीं देख रहा था. न उन दर्जनों स्कूलों में जिनकी फीस हर महीने हजारों में है. उसके बच्चे अगले साल कहां गये होंगे! गलियों के कोने में मॉडर्न सेंट जोसेफ, न्यू सेंट मैरी, सेक्रेड सेंट अगस्तस, न्यू देलही सेंट जेवियर्स जैसे किसी स्कूल में. जहां न स्कूल के नाम पर कायदे की इमारत है. न खेलने की जगह. न मिड डे मील. न ट्रेंड शिक्षक. फिर वह बिजली मिस्त्री अपने बच्चों को अंगरेजी स्कूल में क्यों भेजना चाहता था! क्योंकि वह अपने अनुभवों से जान चुका है कि अगर उसे अपने बच्चों का भविष्य बनाना है, तो उसे उन्हें अंगरेजी की शिक्षा देनी ही होगी.

यहीं एक दूसरी तसवीर है. दिल्ली के ही मुखर्जी नगर इलाके की. दिल्ली का यह वह इलाका है, जहां देशभर के परीक्षार्थी सिविल सेवा की तैयारी करते हैं.  पिछले दिनों जब संघ लोकसेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा के सिलेबस में बदलाव की घोषणा करते हुए अंगरेजी के पर्चे के अंक को कुल अंकों में जोड़ने की बात की, तो कई सपने जैसे एक साथ जमीन पर आ गिरे. हिंदी माध्यम से परीक्षा की तैयारी करनेवाले छात्रों में इस फैसले को लेकर गहरा आक्रोश था. हिंदीभाषी राज्यों के छात्र महसूस कर रहे थे कि यह फैसला अंगरेजी माध्यम के छात्रों को फायदा पहुंचाने के लिए लिया गया है. इन छात्रों का साफ कहना था कि यह हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी करनेवालों के प्रति सोचे-समझे अन्याय की तैयारी है. मूलत: बिहार के सुपौल जिले के रहनेवाले और पिछले तीन वर्षों से दिल्ली में रह कर सिविल सेवा की तैयारी करनेवाले रजनीश रत्नाकर के कहे में उनके गुस्से और बेबसी के भाव को आसानी से पढ़ा जा सकता था-‘ पिछली बार मैं पांच नंबर से मेरिट लिस्ट में आने से रह गया था. अब मेरे लिए मेरिट लिस्ट में जगह बना पाना नामुमकिन हो गया है. मेरे लिए ही क्यों उन सभी परीक्षार्थियों के लिए जो हिंदी माध्यम में परीक्षा की तैयारी करते हैं. जिनकी शिक्षा अंगरेजी माध्यम स्कूलों में नहीं हुई है.

ये दोनों बहुत दूर की तसवीरें हैं. बिल्कुल दो अलग दुनिया की. दोनों तसवीरों का साझा सूत्र क्या है? गौर से देखें तो लक्ष्मण और रजनीश दोनों में आपको एक भय नजर आयेगा. भय- अंगरेजी के हाथों पीछे छूट जाने का. इसमें शक नहीं कि अंगरेजी हमारे समय की कैरियर की भाषा बन गयी है. लेकिन, सही मायने में यह विशेषाधिकार की भाषा है, जो नौकरियों में एक अभिजात वर्ग का एकाधिकार सुनिश्चित करती है.
यह भविष्य के रास्तों पर एक भाषा के वर्चस्व का भय ही है, जो लक्ष्मण जैसे करोड़ों भारतीयों में यह भाव पैदा करता है कि उसके बच्चे की तालीम अंगरेजी में ही होनी चाहिए. उसे अंगरेजी में अच्छे भविष्य का सुनहरा सपना साकार होता दिखाई देता है. वह ऐसा मानता है, क्योंकि उसे बार-बार विभिन्न तरीकों से ऐसा बताया जाता है. इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकनी ने अपनी किताब ‘इमैजिनिंग इंडिया’ में लिखा है, ‘भारतीय जनसंख्या के लिए अंगरेजी उभरते सपनों की भाषा है- आकर्षक नौकरी और तेजी से उभरते मध्यवर्ग में प्रवेश पाने का पासपोर्ट है.’ निलेकनी गलत नहीं हैं, क्योंकि उदारीकरण के बाद जिस तरक्की पर भारत गर्व करना चाहता है, उसका श्रेय बीपीओ, सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री, प्रबंधन के क्षेत्र में काम करनेवाले अंगरेजी भाषी नये युवा मध्यवर्ग को दिया जाता है. हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा लेनेवाला युवा इस तरक्की से बाहर हैं. अंगरेजी में हाथ तंग होने के कारण इस दुनिया में उसके लिए ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा है.

संघ लोकसेवा आयोग 
जब संघ लोकसेवा आयोग जैसी संस्था भी अपने फैसले से सिविल सेवा में अंगरेजी में शिक्षित वर्ग का एकाधिकार सुनिश्चित करने की कोशिश करती दिखे, तो इस भय का बढ़ना लाजिमी है. संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में अंगरेजी के एक पेपर को अनिवार्य करने की हालिया कोशिशों को क्षेत्रीय भाषा के छात्रों के साथ अन्याय करने की लंबी चली आ रही नीति के विस्तार के तौर पर देखा जा सकता है. हालांकि यह कोशिश फिलहाल विफल हो गयी है, लेकिन इसने एक पुराने संदेश को दोहराने का काम तो किया ही है कि अगर आप शीर्ष पर पहुंचने का कोई ख्वाब देखना चाहते हैं, तो वह ख्वाब अंगरेजी में देखना ही बेहतर है. हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में देखे गये ख्वाब की इबारत काफी धुंधली होती है. लोकसेवा आयोग के इस फैसले के अर्थों को स्पष्ट करते हुए प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘इस फैसले का मंतव्य साफ है कि या तो खुद को अंगरेजी में सिद्ध करो या ऊंची नौकरियों यानी उन ओहदों से दूर रहो, जहां से देश का भविष्य संवारा जाता है. आयोग का यह फैसला भूमंडलीकृत दुनिया में अंगरेजी से जान-पहचान को बढ़ावा देनेवाला नहीं है, बल्कि बहु-भाषिकता से परिभाषित होनेवाली एक सभ्यता के भीतर एकभाषी अभिजन गढ़ने की कोशिश है. यह प्रतिभा को पुरस्कार देनेवाला नहीं, बल्कि भावी सिविल सर्वेंट के चयन के सामाजिक दायरे को जान-बूझ कर छोटा करने की कोशिश है. फैसले से निकलनेवाला संदेश यह है कि देश की 99 फीसदी आबादी जिन जबानों को बोलती है, उसकी काम चलाऊ जानकारी भी जरूरी नहीं है.’ पिछले साल हिंदी दिवस के सिलसिले में सीएसडीएस के भारतीय भाषा कार्यक्रम के संपादक अभय कुमार दुबे ने नौकरशाही के भाषायी चरित्र पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी,‘पहले संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में दी ही नहीं जा सकती थी. लेकिन 70 के दशक में दौलत सिंह कोठारी की सिफारिशों के बाद इसे क्षेत्रीय भाषाओं में भी आयोजित किया जाने लगा. इसके बाद संघ लोकसेवा आयोग में बैठने वाले छात्रों की संख्या में दिन दोगुनी रात चौगुनी बढ़ोतरी हुई है. रिक्शे वाले का बेटा, दफ्तर में चपरासी की नौकरी करने वाले का बेटा भी इस परीक्षा में कामयाब हो रहा है. आज इस अभिजन ब्यूरोक्रेसी की दीवारें चटक रही हैं.’ उन्होंने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी, ‘भाषा के जितने भी मोरचे थे, उनमें से ज्यादातर में अंगरेजी का वर्चस्व समाप्त हो गया है या हो रहा है. अगर केंद्रीय ब्यूरोक्रेसी से अंगरेजी के प्रभुत्व को समाप्त कर दिया जाये, तो हिंदी आधी लड़ाई खुद जीत लेगी. जरूर यह लड़ाई आसान नहीं है.’ यूपीएससी के फैसले में इसी लड़ाई की आहट सुनी जा सकती है.

जाहिर है, लक्ष्मण जैसा आम भारतीय यह लड़ाई लड़ने में खुद को अक्षम पाता है. यही कारण है कि वह इस फैसले पर पहुंचता है कि उसे किसी भी हाल में अपने बच्चे को अंगरेजी में शिक्षा देनी है. यही वह सोच है, जिसने देश में अंगरेजी मीडियम और प्राइवेट स्कूल के व्यवसाय को आश्चर्यजनक विस्तार दिया है. शहर से गांव तक. गांव से शहर तक. यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी झोपड़पट्टियों में अंगरेजी माध्यम के प्राइवेट स्कूलों की संख्या में खासी बढ़ोतरी देखी गयी है. ‘असर’ की हालिया रिपोर्ट से यह बात सामने आयी है कि पूरे देश में ग्रामीण भागों में भी प्राइवेट स्कूलों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या का अनुपात बढ़ा है. 2006 में ग्रामीण क्षेत्रों में जहां  6-14 वर्ष के आयु वर्ग के 18.7 फीसदी बच्चे प्राइवेट स्कूल में भर्ती थे, वहीं 2012 में यह बढ़ कर 28.3 फीसदी हो गया. यह अलग बात है कि जब ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे पांचवीं के छात्रों से अंगरेजी वाक्य पढ़ने को कहा गया तो पचास फीसदी से ज्यादा बच्चे ऐसा नहीं कर पाये.

लक्ष्मण से कुछ दिन पहले फिर मुलाकात हुई. मैंने उससे पूछा कि उसके बच्चे कहां पढ़ रहे हैं. उसने उत्साह के साथ जवाब दिया कि चार महीने बाद ही उसने अपने दोनों बच्चों का दाखिला प्राइवेट स्कूल में करा दिया था. उसके चेहरे पर इस बार एक संतोष था. इस उम्मीद का संतोष कि अब उसके बच्चे अंगरेजी के ज्ञान के अभाव में अपनी उम्र के दूसरे बच्चों से पिछड़ जाने पर मजबूर नहीं होंगे और जीवन में कुछ बेहतर कर पायेंगे. मैंने उससे स्कूल का नाम नहीं पूछा. न यह पूछा कि स्कूल में पढ़ाई कैसी होती है? लक्ष्मण को मालूम है कि वहां ‘अंगरेजी की पढ़ाई होती है’ और उसके लिए इतना ही काफी है.

20 March 2013

भारत पर चे ग्वेरा


क्यूबाई क्रान्ति के ठीक बाद चे ग्वेरा , फिदेल कास्त्रो के दूत के तौर पर भारत आये थे. इस यात्रा के दौरान उन्होंने जवाहर लाल नेहरु से मुलाकात की थी और भारत की दशा, क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष, संघर्ष के गांधीवादी तरीके,  नेहरूवादी विकास, भारत में व्याप्त असमानता आदि विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकट किये थे.  भारत पर उनका लिखा एक संस्मरण कुछ साल पहले अंग्रेजी पत्रिका फ्रंटलाइन छपा था..उसी संस्मरण का एक अंश...




काहिरा से हमने सीधे भारत के लिए उड़ान भरी. 39 करोड़ लोगों का देश, जिसका क्षेत्रफल 30 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है.

भूमि के नाट्य का एहसास यहाँ मिस्र से ज्यादा होता. यहां मिट्टी की उर्वरता रेगिस्तानी मिस्र से कहीं ज्यादा है. लेकिन सामाजिक अन्याय ने भूमि के असमान और मनमाने वितरण को जन्म दिया है. जिसका परिणाम है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों के पास काफी जमीन है, जबकि बहुतों के पास कुछ भी नहीं
.
भारत को ब्रिटेन ने 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत के दौरान अपना उपनिवेश बनाया था. निश्चित तौर पर इस जीत के साथ आजादी बनाये रखने के संघर्ष की कहानी भी जुड़ी हुई है, लेकिन अंगरेजों की सैन्य क्षमता इस मामले में निर्णायक साबित हुई. भारत के फलते-फूलते हस्तकरघा उद्योग को साम्राज्यवादी संरचना के हाथों काफी नुकसान उठाना पड़ा जो भारतीयों की आर्थिक आत्मनिर्भरता को समाप्त करने पर आमादा थे, ताकि उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए साम्राज्य का कर्जदार बनाया जा सके. यह स्थिति पूरी 19वीं शताब्दी के दौरान बनी रही. 20वीं शताब्दी जिसमें हम रह रहे हैं,  यह देश कई विद्रोहों का साक्षी भी बना , जिसमें कई बेगुनाहों की जान गयी.

दुसरे विश्वयुद्ध से बाहर निकलते हुए अंगरेजी साम्राज्य के विखंडन के संकेत काफी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे थे. भारत में रहस्यवादी-आध्यात्मिक व्यक्तित्व वाले(मिस्टिक फिगर)  महात्मा गांधी के नेतृत्व में  चलाये जा रहे निष्क्रिय प्रतिरोध ने आखिर कार वर्षों से कामना की जा रही आजादी के लक्ष्य को हासिल किया. गांधी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने भारत की बागडोर संभाली. नेहरू को एक ऐसे देश का नेतृत्व मिला, जिसकी चेतना अनंत वर्षों के बाहरी वर्चस्व के कारण रुग्ण हो गयी थी, और जिसकी अर्थव्यवस्था को लंदन के मेट्रोपाॅलिटन बाजारों के लिए सस्ते दामों में सामान मुहैया कराने के लिए मजबूर किया गया था. भूमि का पुनर्वितरण किया जाना था और देश को भविष्य की आर्थिक तरक्की के लिए औद्योगिकीकृत किया जाना था. कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने खुद को इस लक्ष्य के प्रति बेहद उत्साह के साथ समर्पित किया.

इस विशालकाय और अतिसाधारण देश में ऐसी कई संस्थाएं और रवायतें हैं जो वर्तमान समय की सामाजिक समस्याओं को लेकर बनायी गयी हमारी अवधारणा से मेल नहीं खाती हैं. प्रासंगिक नजर नहीं आतीं.
हमारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था समान है. अपमान और उपनिवेशीकरण का इतिहास भी एक जैसा है. हमने प्रगति की समान दिशा चुनी है. बावजूद इसके कि हमारे समाधान काफी मिलते-जुलते हैं और एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं, वास्तव में वे काफी अलग हैं. कुछ वैसे, जैसे दिन, रात से होता है. हमारे देश में कृषि सुधार की एक बड़ी आंधी ने कैमागुवे (क्यूबा का एक प्रांत) में बड़ी जोतों को  समाप्त कर दिया. अब यह लहर पूरे देश में अबाध रूप से फैल रही है और इसे रोक पाना अब मुमकिन नहीं है. बड़ी जोतों को समाप्त किया जा रहा है और गरीब किसानों को मुफ्त में जमीन का वितरण किया जा रहा है.

लेकिन महान भारत देश इस मामले में काफी प्राच्यवादी सतर्कता और कंजूसी दिखा रहा है. वह काफी फूंक-फूक कर कदम रखते हुए बड़े भूपतियों को भूमिहीन किसानों को भूमि देने का न्याय करने के लिए राजी कर रहा है और किसानों को इस  जमीन के लिए पैसे चुकाने के लिए मना रहा है. इस तरह दुनिया में सबसे पवित्र, समझदार और गरीब बना दिये गये लोगों को घोर वंचितता से बाहर लाने की प्रक्रिया इतनी से चल रही है कि नजर ही नहीं आती.

7 March 2013

जिसने गरीब जनता की तरफ से लड़ाई लड़ी और जीत दर्ज की


 वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज की मृत्यु पर "द गार्जियन "में छपा मशहूर राजनीतिक टिप्पणीकार तारिक अली का लेख  


"वेनेजुएला शावेज को चाहनेवालों और उनके आलोचकों के बीच बंटा हुआ है. वे मृत्यु तक अपराजित रहे. लेकिन असल इम्तिहान आगे है. जनता को संगठित कर सामाजिक लोकतंत्र की जो व्यवस्था उन्होंने बनायी, उसे आगे ले जाने की जरूरत है. क्या उनके उत्तराधिकारी इस जिम्मेदारी को निभा पायेंगे? एक तरह से शावेज के बोलिवेरियन प्रयोग की सबसे बड़ी परीक्षा यही है."


एक बार मैंने उनसे पूछा था ‘आपकी नजर में कौन बेहतर है, वह दुश्मन जो आपसे नफरत करता है, जिसे यह पता है कि आप क्या कर रहे हैं, या वह जो उपेक्षापूर्ण  भाव से अलग-थलग रहता है. जवाब में पहले वे हँसे थे. फिर उन्होंने कहा, पहले तबके के लोग, क्योंकि वे मुझे यह एहसास कराते हैं कि मैं सही रास्ते पर जा रहा हूँ।  ह्यूगो शावेज की मौत आश्चर्य की तरह नहीं आयी. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी मौत को स्वीकार करना आसान हो गया है. शावेज की मौत के साथ हमने उत्तर साम्यवादी काल के चंद आखिरी कद्दावर राजनीतिक शख्सीयतों में से एक को खो दिया है. किसी जमाने में वेनेजुएला, वहां सत्ता में बैठे भ्रष्ट लोगों के कारण, अमेरिका का सुरक्षित चारागाह था.
शावेज की जीत से पहले शायद ही कोई वेनेजुएला की बात करता था, उसके बारे में सोचता था. 1999 में शावेज की जीत के बाद पश्चिम के हर महत्वपूर्ण मीडिया घरानों को लगा कि वेनेजुएला में अपना संवाददाता जरूर होना चाहिए. हालांकि चूंकि वे सभी एक ही बात कहने वाले थे, (कि वेनेजुएला साम्यवादी शैली के तानाशाही शासन की कगार पर खड़ा है) इसलिए ज्यादा बेहतर होता कि वे अपने संसाधनो को इस तरह जाया करने की जगह उसका मिलजुल कर इस्तेमाल करते.



शावेज से मेरी पहली मुलाकात 2002 में हुई. ठीक उस सैनिक तख्तापलट की नाकाम कोशिश के बाद, जिसे अमेरिका और स्पेन ने हवा दी थी. इसके बाद कई बार उनसे मिलने का मौका मिला. उन्होंने मुझसे ब्राजील के पोर्टो एलेग्रे मे होनेवाले वर्ल्ड सोशल फोरम में आने का न्योता दिया था. वहां उनका मुझसे सवाल था, -आप अब तक वेनेजुएला क्यों नहीं आये हैं? जल्दी आइये.’ मैंने उनकी बात मानी. मुझे उनके बारे मे जो चीज सबसे ज्यादा प्रभावित करती थी, वह थी उनकी खरी-खरी कहने की आदत और उनका साहस. कई बार जो सिर्फ उनकी व्यग्रता या हड़बड़ाहट जैसी दिखाई देती थी, वह दरअसल काफी सोची-विचारी प्रतिक्रिया होती थी.
एक  ऐसे समय में जब दुनिया मूक हो गयी थी. जब सेंटर-लेफ्ट और सेंटर-राइट के बीच अंतर करना काफी मुश्किल हो गया था, और दोनों के नेता पैसा कमाने को ही अपना लक्ष्य मान चुके थे, शावेज ने राजनीतिक लैंडस्केप में नयी जगमगाहट पैदा की.

वे एक कभी न थकनेवाले व्यक्ति की तरह मालूम होते थे. घंटो अपने देश की जनता के साथ गर्माहट भरी गूंजती आवाज में, जिसमें एक तीखी वाक् पटुता होती थी संवाद करते थे. इसमें कुछ ऐसा होता था कि आप चाह कर  भी उसकी ओर ध्यान दिये बगैर नहीं रह सकते थे. उनकी आवाज आश्चर्यजनक रूप से दूर-दूर तक जाती थी. उनके भाषण में धर्म वाक्यों की भरमार हुआ करती थी, लैटिन अमेरिका और वेनेजुएला का इतिहास हुआ करता था. 19वीं शताब्दी के क्रांतिकारी नेता सिमोन बोलिवर की उक्तियां हुआ करती थीं. विश्व  की स्थिति पर टिप्पणियां होती थीं. गाने होते थे. वे अपने श्रोताओं से पूछते थे,  "बुर्जुआ तबके को जनता के  बीच मेरे गाने से शर्मिंदगी होती है. क्या आपको यह खराब लगता है?" जवाब में ‘न’ का जबरदस्त स्वर उभरता था.  तब वे उन्हें साथ में गाने और गुनगुनाने को कहते थे. ‘‘ जोर से गाओं ताकि शहर के पूर्वी हिस्से में बसे वे लोग तुम्हारी आवाज को सुन सकें.’’ इसी तरह की एक रैली में उन्होंने मुझसे कहा, तुम आज थके हुए से दिखाई दे रहे हो. क्या तुम शाम तक साथ दे पाओगे. मेरा जवाब था, ‘’यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितनी देर तक भाषण देनेवाले हैं.’’ उन्होंने वादा किया,‘ यह छोटा भाषण होगा. तीन घंटे के भीतर, बोलिवेरियनों ने, (शावेज के समर्थक इसी नाम से जाने जाते हैं) एक नया राजनीतिक कार्यक्रम प्रस्तावित किया, जो वाशिंगटन सहमति: (अपने देष में नव-उदारवाद और बाहर युद्ध) को चुनौती देता था. शावेज को लगातार निशाना बनाये जाने की यही वजह बना. यह तय है कि उनकी मृत्यु के बाद भी ऐसी कोशिशें लंबे अरसे तक चलती रहेंगी.
उनके जैसे राजनेता लगातार अस्वीकार्य होते गये थे. उन्हें सबसे ज्यादा क्षोभ इस बात से होता था कि किस तरह दक्षिण अमेरिकी मुख्यधारा के राजनीतिज्ञ अपने ही नागरिकों के प्रति अवमानना भरी उपेक्षा का भाव रखते हैं. वेनेजुएला का संभ्रांत वर्ग अपने नस्लवाद के लिए कुख्यात है. वे अपने ही देश के चुने हुए राष्ट्रपति को असभ्य और असंस्कृत मानते थे. एक जैम्बो, जो अफ्रीकी और मूल देसी नस्लों की संकर संतान था, जिस पर यकीन नहीं किया जा सकता था. उनके समर्थकों को निजी टेलीविजन पर बंदरों की तरह दर्शाया जाता था. कोलिन पावेल को काराकस में अमेरिकी दूतावास को सार्वजनिक तौर पर तब डांट लगानी पड़ी जब उसकी एक पार्टी में शावेज को एक गोरिल्ला की तरह दर्शाया गया था.

क्या वे इससे हैरान हुए थे. चेहरे पर सोच की मुद्रा के साथ उनका जवाब था- ‘‘नहीं. मैं यहीं रहता हूं. उन्हें अच्छी तरह से पहचानता हूं. हमारे यहां इतनी बड़ी तादाद में लोग सेना में भर्ती होते हैं, उसका एक कारण यह है कि यहां दूसरे दरवाजे बंद हैं.’’ लेकिन अब ऐसा नहीं है. वे शायद ही किसी भ्रम में रहते थे. उन्हें इस बात का एहसास था कि स्थानीय शत्रु यूं ही बेवजह निर्वात में गुस्सा नहीं होते, उनके खिलाफ साजिश नहीं रचते. उनके पीछे दुनिया का सबसे ताकतवर देश खड़ा है. कुछ पल के लिए उन्हें लगा था कि ओबामा थोड़े से अलग होंगे. लेकिन, होंडुरास के सैनिक तख्तापलट ने उनकी ऐसी किसी  धारणा का अंत कर दिया.

अपने देश  की जनता के प्रति उनका कर्तव्यबोध जबरदस्त था. वे उनके जैसे ही थे. यूरोप के समाजवादी डेमोक्रेट्स की तरह उन्हें ऐसा कोई विश्वास कभी नहीं रहा कि मानवता की बेहतरी कारपोरेशनों और बैंकरों के राज में होगी और ऐसा वे 2008 में वाल स्ट्रीट के चारों खाने चित्त होने से काफी पहले कह चुके थे.
काराकस में मैंने उनसे बोलिवेरियन परियोजना के बारे में पूछा था. वे इसके प्रति काफी स्पष्ट थे. अपने कई अति उत्साही समर्थकों की तुलना में कहीं ज्यादा साफ और स्पष्ट. ‘‘मैं माक्र्सवादी क्रांति की रूढि़यों में यकीन नहीं करता हूं. मैं नहीं मानता कि हम सर्वहारा क्रांति के युग में जी रहे हैं. हर चीज की पुनव्र्याख्या की जानी चाहिए. यथार्थ हमें हर दिन यही बता रहा है. क्या वेनेजुएला में आज हमारा लक्ष्य निजी संपत्ति का खात्मा, एक वर्गहीन समाज की रचना करना है? मुझे ऐसा नहीं लगता. लेकिन कोई मुझे यह कहे कि चूंकि हकीकत यही है, इसलिए गरीबों की मदद के लिए कुछ नहीं किया जा सकता, वे गरीब जिन्होंने इस देश को अमीर बनाया है, और कभी मत भूलो कि इनमें से कई गुलाम मजदूर थे, तब मेरा कहना है कि, भाई मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता. मैं यह कभी स्वीकार नहीं करूंगा कि इस देश में कभी भी संपत्ति का पुनर्वितरण नहीं हो सकता. हमारा उच्च वर्ग तो टैक्स तक चुकाना पसंद नहीं करता. यह भी एक कारण है कि वे मुझसे नफरत  क्यों करते हैं. हमने कहा, तुम्हें अपना टैक्स जरूर चुकाना चाहिए. मेरा यकीन है कि युद्ध में मारा जाना कहीं बेहतर है, बनिस्बत कि इसके कि पवित्र क्रांतिकारी विचारों का झंडा उठाये रखो और करने के नाम पर कुछ मत करो. यह मुझे एक सुविधाजनक काम लगता है. एक अच्छा बहाना. कोशिश करो और अपनी क्रांति को जमीन पर उतारने की पहल करो. युद्ध के मैदान में जाओ. सही दिशा में थोड़ी सी भी दूरी तय करो. भले ही यह दूरी मिलीमीटर बराबर ही क्यों न हो, बजाय इसके कि सिर्फ यूटोपियाई ख्यालों में खोए रहो.



फिदेल कास्त्रों के साथ उनकी नजदीकी को कई लोगों ने पिता-पुत्र के रिश्ते की तरह देखा है. यह अधूरी सच्चाई है. पिछले साल काराकस में उस हाॅस्टपीटल के बाहर भारी भीड़ जमा हो गयी थी, जहां वे कैंसर के इलाज के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे. लोगों की आवाज लगातार तेज से तेज होती जा रही थी.शावेज ने छत पर एक लाउडस्पीकर सिस्टम लगाने का आदेश दिया और जनता को संबोधित किया. हवाना में टेलीसुर में यह दृष्य देख रहे फिदेल कास्त्रो स्तब्ध रह गये थे. उन्होंने तुरंत अस्पताल के डाइरेक्टर को फोन लगााया.‘ मैं फिदेल कास्त्रो बोल रहा हूं. तुम्हें तत्काल निलंबित कर दिया जाना चाहिए. उसे तुरंत बिस्तर पर ले जाओ और उसे कहो कि ऐसा मैंने कहा है.’’

दोस्ती से ऊपर शावेज कास्त्रो और चे ग्वेरा को ऐतिहासिक फ्रेम में देखते थे. वे बोलिवर और एंटेनियो जो सुक्रे के 20वीं शताब्दी के वारिस थे. इन्होंने दक्षिण अमेरिकी महादेश को एकीकृत करने की कोशीश की. लेकिन यह जैसे समुद्र में हल चलाने जैसा था. शावेज अपने चारों आदर्शों की तुलना में इस ख्वाब के कहीं नजदीक तक पहुंचे. वेनेजुएला में उनकी सफलता ने एक तरह की महादेशीय प्रक्रिया को जन्म दिया. बोलिविया और इक्वाडोर में समाजवादियों की जीत हुई. लुला और डिल्मा के नेतृत्व में ब्राजील ने भले ही समाजवादी माॅडल को न अपनाया हो, लेकिन उन्होंने पश्चिम को उन्हें आपस में लड़ाने, एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की छूट नहीं दी.  पश्चिमी पत्रकार अकसर यह कहा करते थे कि लुला शावेज से बेहतर हैं. लेकिन पिछले साल लुला ने सार्वजनिक तौर पर घोषणा की कि वे  शावेज का समर्थन करते हैं। हमारे महाद्वीप के लिए उनके महत्व को कभी भी कम करके नहीं आंका जाना चाहिए.

पश्चिम  में शावेज की सबसे लोकप्रिय छवि एक अत्याचारी तानाशाह की है. बोलिवेरियन संविधान जनता के व्यापक बहुमत से स्वीकार किया गया था. इसका विरोध वहां के विपक्ष, मीडिया, स्थानीय सीएनएन और पश्चिम  समर्थक सभी लोग करते आये हैं. यह दुनिया का एकमात्र संविधान है जिसमें राष्ट्रपति को दस्तखतों पर आधारित जनमत संग्रह के सहारे पद से हटाने की संभावना बनायी गयी है. विपक्ष ने 2004 में शावेज को हटाने के लिए इस रास्ते के उपयोग की कोशिश भी की थी. इस तथ्य के बावजूद कि इनमें से कई दस्तखत मरे लोगों के नाम पर भी किये गये थे, वेनेजुएला की सरकार को इस चुनौती को स्वीकार कर लिया. वोट से पहले आखिरी सप्ताह में मैं काराकास में था. जब मैं शावेज से मिला वे जनमत सर्वेक्षणों के आंकड़ों मे लगे हुए थे. उन्होंने कहा कि यह काफी नजदीकी मामला हो सकता है. मैंने पूछा, अगर आप हार गये तो? बिना किसी हिचक के उनका जवाब था, मैं इस्तीफा दे दूंगा.’ वे जीत गये.

क्या कभी ऐसा होता है कि वे थक जाएं, अवसाद महसूस करें, आत्म विश्वास को हिलता हुआ महसूस करें. हां, उनका जवाब था. लेकिन यह तख्तापलट की कोशिशों या जनमत संग्रह के वक्त नहीं हुआ था. ऐसा तब हुआ था जब भ्रष्ट तेल संघों ने हड़ताल की घोषणा कर दी थी और मध्यवर्ग भी इसके समर्थन में था. क्योंकि इससे सारी जनता, खाासकर गरीबों को परेशानी होती. उन्होंने मुझसे कहा था, ‘अपने आफिस में बैठे-बैठे मैं उकता गया था. इसलिए लोगों की बात सुनने और ताजी हवा में सांस लेने के लिए मैं अपने दो साथी कामरेडों और एक सुरक्षाकर्मी के साथ निकल पड़ा. लोगों ने मुझसे जो कहा, उसने मुझे हिला कर रख दिया. एक औरत मेरे  पास आयी. उसने मुझसे कहा, शा वेज मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें कुछ दिखाती हूं. मैं उसके पीछे-पीछे उसके छोटे से घर में गया. उसका पति और उसके बच्चे सूप के पकने का इंतजार कर रहे थे. ‘देखो में जलावन के तौर पर किस चीज का इस्तेमाल कर रही हूं. चारपायी का तख्त. कल मैं इसके पाये को जलाऊंगी. इसके बाद टेबल भी जलावन में जायेगी. फिर खिडकिया, कुर्सिया. हम जूझते रहेंगे, और बचे रहेंगे, लेकिन तुम अभी हार मत मानो. मैं जब बाहर निकल रहा था, तब बच्चे निकल कर आये और उन्होंने हाथ मिलाते हुए कहा, हम बियर के बिना रह सकते हैं, लेकिन आप इन बद्जातों (भ्रष्ट तेल यूनियनों) को जरूर सबक सिखाओ.



उनके जीवन की आंतरिक हकीकत क्या थी? कोई व्यक्ति जो खास स्तर का बुद्धिमान हो, संस्कृति और व्यक्तित्व वाला हो, उसके स्वाभाविक स्वभाव-झुकाव लोगों को हमेशा दिखाई नहीं देते. शावेज तलाकशुदा थे, लेकिन अपने  नाती-नातिनों के प्रति उनका स्नेह कभी संदेहों में नहीं रहा. जिन औरतों से भी उन्होंने प्यार किया, और ऐसी औरतें काफी कम थीं, सब ने शावेज को  एक दिलदार प्रेमी के तौर पर याद किया है. वह भी एक दूसरे से अलग होने के काफी अरसे बाद.


जो देश वे अपने पीछे छोड़ कर जा रहे हैं, क्या वह एक स्वर्ग है? नहीं बिल्कुल भी नहीं. ऐसा कैसे हो सकता था, अगर उन समस्याओं को देखा जाये, जो उनके सामने थीं. लेकिन वे अपने पीछे एक बदला हुआ समाज छोड़ कर गये हैं, जिसमें गरीब यह महसूस करते हैं कि शासन में उनकी भी अहम हिस्सेदारी है. इसके अलावा उनकी लोकप्रियता की और दूसरी व्याख्या नहीं हो सकती. वेनेजुएला शावेज को चाहनेवालों और उनके आलोचकों के बीच बंटा हुआ है. वे मृत्यु तक अपराजित रहे. लेकिन असल इम्तिहान आगे है. जनता को संगठित कर सामाजिक लोकतंत्र की जो व्यवस्था उन्होंने बनायी, उसे आगे ले जाने की जरूरत है. क्या उनके उत्तराधिकारी इस जिम्मेदारी को निभा पायेंगे? एक तरह से शावेज के बोलिवेरियन प्रयोग की सबसे बड़ी परीक्षा यही है.

एक बात जिसके प्रति हम निश्चिन्त हो सकते हैं, उनके शत्रु उन्हें मृत्यु के बाद भी शान्ति से नहीं रहने देंगे. और उनके समर्थक, पूरे महाद्वीप और दूसरी जगहों के गरीब, उन्हें एक ऐसे राजनीतिक नेता के तौर पर देखेंगे, जिसने उनसे विपरीत स्थितियों में भी सामाजिक अधिकारों का वादा किया और उन्हें पूरा भी किया. एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जिसने उनकी तरफ से लड़ाई लड़ी और जीत दर्ज की.

तारिक अली अंतर्राष्ट्रीय वाम के जाने पहचाने चेहरे, राजनीतिक टिप्पणीकार और लेखक हैंलम्बे समय से न्यू लेफ्ट रिव्यू का सम्पादन कर रहे हैं।


26 February 2013

आजादी के संघर्ष की शुरुआत लोगों की भूख से होती है : चे ग्वेरा


क्यूबाई क्रान्ति के ठीक बाद चे ग्वेरा , फिदेल कास्त्रो के दूत के तौर पर भारत आये थे. इस यात्रा के दौरान उन्होंने जवाहर लाल नेहरु से मुलाकात की थी और भारत की दशा, क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष, संघर्ष के गांधीवादी तरीके,  नेहरूवादी विकास, भारत में व्याप्त असमानता आदि विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकट किये थे.  चे ग्वेरा के भारत दौरे पर मानश भट्टाचार्जी ने "द हिन्दू "में हाल में ही  "गांधी एंड द गुरिल्ला "नाम से एक लिखा था, जो भारत ,खासकर गांधी को लेकर चे ग्वेरा के विचारों को समझने की एक नयी दृष्टि देने वाला है. इस लेख को पढ़िए हिंदी मे.    
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ज्यां पाल सार्त्र, अरनेस्टो चे ग्वेरा(1928-1976) से इस हद तक प्रभावित थे, कि उन्होंने ग्वेरा को उनकी मृत्यु के बाद अपने समय का संपूर्ण इंसान(कंपलीट ह्यूमन बीइंग) कह कर पुकारा था. यह पुनर्जागरण पुरुष के लिए इस्तेमाल किया गया संदर्भ था, जो सार्त्र की नजरों में एक साथ भाईचारे और क्रांतिकारी विचारों का आदर्श था. अर्जेंटीना की धरती पर जन्मे और बाद में क्यूबाई क्रांति के अहम चेहरे के तौर पर जाने गए  मार्क्सवादी क्रांतिकारी चे ने खुद ‘ उस नये इंसान’ ( द न्यू मैन) की बात की थी, जो लिंगभेदी नहीं होगा(जेंडर ब्लाइंड होगा), साम्राज्य विरोधी और जनता का निस्पृह सेवक होगा. चे ने इस नये इंसान को अमेरिका की ‘प्रजा’ निर्माण की इच्छा के बरक्स रखा, जिसकी दिलचस्पी "टायलेट क्रांति" लाने के प्रति ज्यादा है.
चे ने अपने सामाजिक और राजनीतिक आशावाद को जिलाए रखने की खातिर क्यूबा में अमेरिकी की प्रभुता की समाप्त के लिए भीषण संघर्ष किया. क्रांति के सफल होने के ठीक बाद फिदेल कास्त्रो ने चे को भारत सहित दुनिया के कई देशों में बतौर दूत भेजा था .

चे और उनके साथ आये शिष्टमंडल ने नेहरू से नयी दिल्ली में उनके दफ्तर में मुलाकात की. चे ने बाद में इस मुलाकात के बारे में कहा था कि नेहरू उनसे पितामही स्नेह और अपनापे के साथ मिले. नेहरू के व्यवहार पर इस टिप्पणी में संभवतः एक कटाक्ष भी छिपा है. हालांकि कहा जाता  है कि चे नेहरू से प्रभावित थे और उन्हें पसंद करते थे. जॉन ली एंडरसन ने अपनी किताब ‘चे ग्वेरा: ए रिवोल्यूशनरी लाइफ’ में लिखा है कि चे ने ‘द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया को काफी चाव से पढ़ा था और जिन हिस्सों ने उन्हें उद्वेलित किया था, उसे अंडरलाइन किया था। साथ-साथ बगल में टिप्पणियां भी की थी. हालांकि दुर्भाग्यवश एंडरसन ने उन पंक्तियों का जिक्र नहीं किया है।  लेकिन यह कल्पना करना मुमकिन है कि चे,  नेहरू की राज्य नियंत्रित उत्पादन के समाजवादी माडल के तहत औद्योगिकीकरण करने की ललक से प्रभावित रहे हों. भारत के बारे में चे ने लिखा भी है, ‘भारत को औद्योगीकृत होना होगा. यह भविष्य के आर्थिक विकास की नींव तैयार करेगा.’


लेकिन चे ने विकास और औद्योगिकीकरण के बेहतर संकेतों को भारत की भीषण गरीबी के आईने में देखा जिसका अनुभव उन्हें कलकत्ता यात्रा के दौरान हुआ था.  इसने भारत में व्याप्त गहरी सामाजिक असमानता का चे से परिचय कराया. भारत यात्रा पर लिखते हुए चे ने भारत की मिट्टी की तुलना मिस्र की मिट्टी से की है, जहां वे कुछ दिन पहले ही गये थे. चे लिखते हैं कि भारत की मिट्टी मिस्र की मिट्टी से कहीं बेहतर और उपजाऊ  है. लेकिन सामाजिक अन्याय ने भूमि के ऐसे मनमाने बंटवारे को जन्म दिया है, जिसमे मुट्ठी भर लोगों के पास काफी ज्यादा जमीन है, और ज्यादतर के पास कुछ भी नहीं.

हालांकि चे  ने भारत में आर्थिक असमानता की समस्या को कलमबद्ध किया, लेकिन वे नेहरू के भारत के बारे में कोई पहले से तय निष्कर्ष देने से थोड़ी दूर ही रहे. भारत पर चे का स्वर तल्ख होने की जगह कुल मिलाकर आशावादी कहा जा सकता है. वे संभवतः समाजवादी धड़े के नजदीक खड़े देशों के साथ दोस्ताना संबंध बनाने के फिदेल कास्त्रो के निर्देश का पालन कर रहे थे.

दो हफ्ते के इस दौरे के आखिर में कश्मीर की धरती भूकंप से हिल उठी थी. इस आपदा पर चे ने कश्मीर के भाई के समान (ब्रदर पीपुल) लोगों को मदद देने की इच्छा जतायी थी. हालांकि यह एक गैर-राजनीतिक घटना थी, लेकिन कश्मीर की सहायता करने की चे की इच्छा और - ‘ब्रदर पीपुल’ जैसे पदबंध का इस्तेमाल आपदा के बीच में एक कामरेडशिप की भावना को जगाता है.

चे ने इस यात्रा के बारे में सबसे उल्लेखनीय बात संभवतः इन शब्दों में दर्ज की है- "भारत में युद्ध शब्द लोगों की चेतना से इतना दूर है कि उन्होंने अपने स्वतंत्रता संघर्ष के सबसे तनाव भरे चरण में भी इसका इस्तेमाल नहीं किया.’’ चे ग्वेरा के इन शब्दों में प्रतिरोध के गांधीवादी तरीकों के प्रति ग्वेरा के मन में प्रशंसा भाव को देखा जा सकता है, जो साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में भारत के असैनिक संघर्ष के लिए बड़े स्तर पर जिम्मेदार था. चे ने गांधी को एक रहस्यमयी शख्सीयत कह कर पुकारा था. हालांकि अपने इस संबोधन की उन्होने व्याख्या नहीं की थी. आल इंडिया रेडियो पर के पी भानुमती को दिये गये इंटरव्यू मे ग्वेरा ने कहा था, "आपके पास गांधी हैं साथ ही दर्शन की एक पुरानी परंपरा भी है. लैटिन अमेरिका में हमारे पास दोनों में से कोई भी नहीं है. यही कारण है कि हमारी  दृष्टि दूसरे तरीके से विकसित हुई है.’’ चे ने इस प्रकार यह कहा था कि किसी समाज की राजनीतिक दृष्टि विचार की पुरानी संस्कृति की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर निर्भर करती है. चे अपनी इस टिप्पणी से आधुनिकता के आने से पहले चिंतन की ऐसी परंपरा के महत्व को भी स्वीकारते नजर आते हैं. उनका आशय  संभवतः यह भी है कि ऐसी पंरपरा के बगैर गांधी जैसी शख्सीयत का आविर्भाव नामुमकिन था. क्योंकि गांधी अकेली शख्सीयत थे,  जिन्होंने आधुनिकता की विचारधारा को चुनौती दी थी और इसके खिलाफ राजनीतिक मुहिम को दिशा दी थी.

हालांकि चे ने भानुमती से यह जोर दे कर कहा था कि  एक व्यावहारिक क्रांतिकारी अपना संघर्ष खुद शुरू  करता है और ऐसा करते हुए मार्क्स के नियमों पर चल रहा होता  है, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया था कि गांधी के संघर्ष और उसके तरीके में अपनी खूबियां थीं. गांधी पर चे का यह कथन विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों में जन्म लेनेवाले अलग-अलग राजनीतिक व्यवहारों को लेकर उनके खुलेपन को दिखाता है. अपने इंटरव्यू के दौरान चे के लिए थोड़ा असहज क्षण उस वक्त आया था, जब भानुमती ने उनसे कहा,‘ एक बहुधार्मिक समाज में कम्युनिस्ट रूढि़यां स्वीकार नहीं की जायेंगी.’ इस लगभग उकसावे पर चे संयत बने रहे थे और खुद को कम्युनिस्ट कहने की जगह खुद को समानता और शोषण से मुक्ति में यकीन करनेवाला समाजवादी(सोशलिस्ट)कहा था. यहां उन्होंने एक महत्वपूर्ण आधारभूत बात कही थी,‘‘ आजादी के संघर्ष की शुरुआत लोगों की भूख से होती है.’’

अगर गांधी के संघर्ष का जन्म हिंसा की आलोचना से हुआ था, चे की विचारधारा उस व्यवस्था पर आक्रमण करने की बात करती थी जो इंसानों को मूलभूत जरूरतों से महरूम करके एक हिंसा को जीवन में बिठा देती है. चे की नजरों में भूख, भूखे व्यक्ति पर थोपी गयी एक हिंसक स्थिति है. वे मानते थे कि इस स्थिति से टकराने के लिए हिंसा का रास्ता अनिवार्य है. गांधी मानते थे कि हिंसा एक बूमरैंग(पलट कर वार करनेवाला) है, जिसका इस्तेमाल भले शोषित पर किया जाये, लेकिन वह पलट कर शोषक पर हमला करता है.
हिंसा से चे का गहरा नाता रहने के बावजूद उन्होंने जिस तरह से एक ऐतिहासिक संदर्भ में संभव हो सके संघर्ष के गांधीवादी अहिंसक तरीके की सराहना की, उसे क्रांतिकारी विचारों के लिए अच्छी खुराक कहा जा सकता है.

इस लेख का मूल रूप से प्रकाशन 23 फरवरी के द हिन्दू में हुआ था।