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20 November 2014

कविता में कहने की आदत

हिंदी के मौजूदा फैशन की अवहेलना करते हुए इस समीक्षा में युवा कवि उमाशंकर चौधरी की नहीं , उनकी कविताओं की आलोचना की गयी है. समय हो तो पढ़ें. 
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महान डच चित्रकार वाॅन गाॅग के जीवनकाल में उनके चित्रों की प्रशंसा करनेवाले कम ही थे। खुद वाॅन गाॅग को अपने बनाए चित्रों में कमियां नजर आती थीं। कभी रंगों के ज्यादा गहरे हो जाने पर, कभी रेखाओं को न साध पाने पर खीज होती थी। हताशा के क्षणों में, या इस हताश कर देनेवाले जीवन में वे अनवरत चित्र बनाते रहे। बस इसलिए कि चित्र बनाना ही उनके लिए जीवन था। रंगा हुआ कैनवस खाली कैनवस से अच्छा लगता था। वाॅन गाॅग के चित्र उनके दौर के कला व्यवसायियों, पारखियों के सौंदर्यबोध से मेल नहीं खाते थे। जाहिर है, वाॅन गाॅग का संघर्ष कला की कसौटी का था। हर फनकार को, हर नये कवि को यह संघर्ष करना पड़ता है। करना चाहिए।

युवा कवि उमा शंकर चैधरी का नया कविता संग्रह ‘‘वे तुमसे पूछेंगे डर का रंग’’ पहली नजर में एक नये कवि के इसी संघर्ष को बयान करता है। यह संग्रह हमें याद दिलाता है कि हमारा समय पल-पल बदलता नया समय है, जिसकी सतत व्याख्या की जानी चाहिए। उसे नये तरीके से समझा और दर्ज किया जाना चाहिए। कवि की इच्छा अपने समय में एक मामूली सी ही सही, लेकिन सार्थक हस्तक्षेप की है। हमारे समय में हस्तक्षेप करना क्या है? कवि का हस्तक्षेप, इसके अलावा क्या हो सकता है कि वह जब चारों ओर ‘हां’ या ‘ना’ की प्रायोजित मुद्राएं हैं, वह सच को सच और झूठ को झूठ बोल सके, बगैर इस बात की चिंता किये कि उसके शब्द सत्ता के दुर्गद्वार से टकराकर लौट आने को अभिशप्त हैं।

इस संग्रह की कविताएं अपने वर्तमान में आबद्ध हैं। कवि वर्तमान समय की भयावहता को समझने की कोशिश करता है। बड़ी बात यह है कि उसे इस बात की समझ है कि जो कुछ हमारे-इर्द गिर्द हो रहा है, उसका सिरा अनिवार्यतः राजनीति से जुड़ा है। यह बात दीगर है कि उसकी राजनीतिक विचारधारा स्पष्ट होकर सामने नहीं आती। संग्रह की पहली कविता ‘प्रधानमंत्री लेते हैं निर्णय और हम डर जाते हैं’, कवि के इस समझ का पुख्ता सबूत है। कवि महसूस करता है कि देश के मुखिया की चिंता, आम आदमी की चिंताओं से कितनी मुख्तलिफ है। यह सत्य कवि को डराता है और यह सिर्फ उसका डर नहीं है, हम सबका डर है। सत्ता का डर बेटी के गुल्लक में रखे पैसे की हिफाजती का डर बन जाता है। जब तक हम डरते हैं, किसान देखता है कि ‘‘बीज जो उसने बोये थे सब बांझ हो गये।’’ डर यह कि हर संदेश जो सत्य के तौर पर हम तक प्रेषित किया जा रहा है, वह किस तरह छल-प्रपंच में बदल गया है। सत्य, फेंटैसी- यानी ‘दिल को खुश रखने को गालिब यह ख्याल अच्छा है’ में बदल गया है। ‘बिहार में बाढ़: कुछ दृश्य, या ‘इरोम वहीं बैठी है’, फेरबदल, ‘प्रधानमंत्री पर अविश्वास’, ‘मौन की कोई भाषा नहीं होती’, ऐसी ही राजनीति से जुड़ी कविताएं हैं।

‘रात का घुप्प अंधेरा और वह लड़की’ कविता षड्यंत्र भरे समय की सच्चाई को बयान करती है। कवि के अंदर एक अजब सी बेचैनी है कि नयी-नयी सूचनाओं की बरसात के बीच भी चीजें कही जानी चाहिए। दोहरायी जानी चाहिए। बस इस कारण कि कुछ चीजें पहले भी कही जा चुकी हैं, गैरजरूरी नहीं हो जातीं। यहां एक लक्षित किये जाने लायक प्रतिबद्धता है। वह विस्मृति के रिसाइकिल बिन में डाल दी गयी चीजों को दोहराता है। यह अपने आप में एक लेखकीय जोखिम है। वह चित्र खींचता है महानगर के पाॅश इलाके में ठेले पर सब्जी बेच रहे पंद्रह साल के बच्चे का। अगले ही पल शहर से दूर देश के आदिवासियों के आवास वाले जंगलों में माओवाद से लड़ने के नाम पर हो रहा युद्ध, इस तस्वीर को काटता है। कविता को एक साथ दो सुदूर भूगोलों में स्थापित करना चीजों के आपसी संबंध को नये सिरे से परिभाषित करने की कोशिश है। विभिन्न सत्ताओं द्वारा लोगों को अलग-अलग दुनियाओं में, उनके संघर्षों के बीच कैद कर दिया गया है और इस तरह कंधे से कंधा मिलाकर प्रतिरोध करने की संभावना भी खत्म कर दी गयी है। ‘शिमला के माॅल रोड पर’ कविता पीठ पर सिलिंडर और जरूरत के दूसरे सामान लादकर पहाड़ चढ़ते और आज की सभ्यता को अपने पसीने से सींचते मेहनतकशों के साथ खड़े होने की बेचैनी की उपज है। ‘शब्द मुसलमान’ कविता हर दिन देशभक्ति के सलीब पर चढ़ते मुसलिम समाज का आईना है, तो ‘आश्चर्य तब हुआ’ इस व्यवस्था में स्वाभाविक चीजों के अस्वाभाविक और अविश्वसनीय हो जाने की त्रासद विडंबना को बयान करता है। हमारे समय की भयावहता को इसी तरह से पकड़ने की कोशिश की गयी है, ‘अब खून नहीं डर बह रहा है’ और ‘इन दिनों’ कविता में। भयावह समय का यह चित्र बेहद सशक्त है, ‘‘इन दिनों धीरे-धीरे बच्चों की भूख मरने लगी है/ आंसुओं का खारापन बढ़ने लगा है/ लोगों ने अपने दुख-दर्द के बारे में/ बातें करनी कम कर दी हैं/ कम कर दिया है उन्होंने अब लोकतंत्र के बारे में सोचना/ इन दिनों सचमुच बढ़ गयी है आदमी में तकलीफ सहने की क्षमता।’’ ऐसी ही एक कविता है- ‘क्रम’। यह कविता एक बयान है। ‘‘जो क्रम में हैं वे तमाशबीन की तरह देखते रहेंगे टुकुर-टुकुर।’’ सत्ता का पूरा चरित्र इस एक पंक्ति में खुल जाता है।

एक बड़ी बात है कि कवि के पास दुनिया को देखने की निजी दृष्टि है। यही वजह है कि वह कल्पना कर पाता है कि ‘‘क्या राहुल गांधी की बंडी की जेब में होता होगा स्टेट बैंक का एटीएम कार्ड/दिल्ली मेट्रो का स्मार्ट कार्ड...।’’ यहां एक विलक्षण कथ्य है। फेंटैसी और यथार्थ को मिलाकर यहां अपने समय के विरोधाभास को उभारने की कोशिश की गयी है। इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा कि ‘‘राहुल गांधी ही क्यों ऐसे बहुत से लोग हैं/ जिनकी जेबों में नहीं है कुछ और वे खुश हैं।’’ दरअसल जिनकी जेब में सत्ता की ताकत है,  फिर चाहे यह सत्ता राजनीति की हो या पूूंजी की, उन्हें न वर्तमान की चिंता है, न भविष्य को सुरक्षित करने की बेचैनी।
इस संग्रह की कई कविताएं निजी किस्म की हैं। उमाशंकर चैधरी ने मां, पिता बेटी, बहन,  प्रेमिका के संबंधों पर भी कविताएं लिखी हैं, लेकिन ये व्यक्तिगत होते हुए भी काफी हद तक सामाजिक हैं। एक ऐसे समय में जब हर रिश्ते के बीच समय का संघर्ष दीवार बन कर खड़ा है, संबंधों को इस तरह याद करना अच्छा लगता है। हमारे होने, हमारे ‘बीइंग’ में संबंधों की क्या अहमियत है, इसे रेखांकित करना एक बड़ा सामाजिक कर्म है। पिता पर कविता-‘सोचना पिता के बारे में’ की ये पंक्तियां आपको ठहर कर कुछ याद करने पर विवश करती है। आपको आर्द्र करती है- ‘‘एक दिन पिता नहीं रहेंगे/ मैं सोचता हूं और कांप जाता हूं/ मैं आकाश की ओर देखता हूं/ और सोचता हूं कि क्या आकाश भी एक दिन नहीं रहेगा।’’

इस संग्रह में तीन-चार कविताओं का विषय लड़की या स्त्री है। ऐसी कविताएं जब पुरुष लिखते हैं तो पाॅलिटिकली करेक्ट हो पाना, स्त्री की तरफ से सहानुभूतिपूर्वक सोच पाना चुनौतीभरा होता है। ‘‘उसे डर लगता है पुरुष के इनकार से’ की पंक्तियां हैं, ‘एक जवान, सुंदर और शादी के लिए तैयार लड़की को/सबसे अधिक डर लगता है/उसकी जिंदगी में आनेवाले पुरुष से/ और पुरुष के इनकार से।’’ यहां कवि अपने निष्कर्ष में एफर्मेटिव है, जबकि कविताओं में खासकर अगर आप पहले से ही जोखिम के क्षेत्र मे कविता कर रहे हैं, तो ऐसे निष्कर्षोंे से बचा जाना चाहिए। ‘आखिरी नहीं पहली पसंद’ कविता में इसलिए एक लड़खड़ाहट है।
उमाशंकर चैधरी की कविताएं एक ऐसे कवि की कविताएं हैं, जो अपने लिए शिल्प की तलाश कर रहा है। ये कविताएं, कविता और वृत्तांत के बीच कहीं स्थित हैं। फिर भी नये अर्थों में इन्हें ‘नये किस्म की कविता’ कहा जाये, इसके लिए अभी उन्हें और संघर्ष करना होगा। मुक्तिबोध ने बेहद संकोच के साथ लिखा था, ‘कविता में कहने की आदत नहीं, फिर भी कह दूं’, लेकिन उमाशंकर चैधरी अपनी कविता का इस्तेमाल मूल रूप से ‘कहने’ के लिए करते हैं। ‘काश बहन ने प्रतिकार किया होता’, कविता इसका प्रमाण है। यह कविता से ज्यादा वृत्तांत है। वृत्तांत किसका? सामंती सांचे में ढले हुए एक युवक का। ‘कहां है रानी का शयनकक्ष’ ‘चाय की दुकान पर पिता’ और ‘मां से पिता क्या बहुत दूर थे’ जैसी कविताओं में यही वृत्तांत है और शब्दों की फिजूलखर्ची भी। ‘चाय की दुकान पर पिता’ कविता तो पूरी कहानी कह दी गयी है। जहां वे खुद को इस आग्रह से बचाने में कामयाब हुए हैं, वहां उनकी कविता रवां होती दिखाई देती हैं।

उमाशंकर चैधरी अपनी कविता में पाठक के लिए समझने की खातिर कुछ नहीं छोड़ना चाहते। यह उनकी कविताओं में अक्सर अतिरिक्त विस्तार लाता है। उनकी कविताएं विचारों पर फिटिंग वाले कपड़े की तरह नहीं आतीं। दरअसल ये कविताएं एक बन रहे, अपना स्थान ढूंढ़ रहे कवि की कविताएं हैं। बोलते-बतियाने की शैली को कविता का गुण माना जाता है। लेकिन अभी उमाशंकर चैधरी ने इस शिल्प को पूरी तरह साधा नहीं है। वे ‘कहने’ को लेकर इतने आग्रही हैं कि अक्सर कविता का ‘कविता’ होने का आग्रह छूट जाता है। उमाशंकर चैधरी संभवतः वाॅन गाॅग से सीख सकते हैं, जिन्होंने कभी पेंटर बनने का आग्रह नहीं किया, चित्र को बिल्कुल नया और मुकम्मल रूप देने का संघर्ष किया। अगर वे अपने शिल्प को लेकर ज्यादा सतर्क रहें, उसे साधनापूर्वक अर्जित करें, शब्दों की फिजूलखर्ची से बचें, तो आनेवाले समय में उनकी कविताएं निश्चित ही अपना नया फाॅर्म लेकर सामने आएंगी, क्योंकि उनके पास कहने को काफी कुछ है। इस संग्रह मे विषयों और बिंबों की विविधता इसका संकेत करती है।
अंत में एक बात, इस संग्रह की सारी कविताएं ‘इटैलिक्स’ में क्यों छपी हैं, यह समझ से परे है।

 - उम्मीद के ताजा अंक में प्रकाशित 



21 May 2013

साहित्य का युवा नजरिया- 4


हालांकि साहित्य को पीढ़ियों में बांटना महज एक सुविधाजनक विभाजन ही माना जा सकता है, फिर भी हमने साहित्य के युवा मन की पड.ताल करने के लिए, उसमें बसनेवाली साहित्य और समाज की तसवीर को समझने के लिए मौजूदा दौर के कुछ महत्वपूर्ण रचनाकारों का चयन किया और उनसे चंद सवाल पूछे. यहां पीढ़ियों का वर्गीकरण कठोर नहीं है और कम से कम दो पीढ़ियों  तथा अलग-अलग क्षेत्रों की आवाजों को शामिल किया गया है. रचनाकारों का चयन भी किसी भी तरह प्राप्रतिनिधिक नहीं है. इस परिचर्चा में जैसी उम्मीद थी, विचारों के अलग-अलग क्षितिज हमारे सामने उभर कर आये, जो साहित्य के विविधतापूर्ण लोकतंत्र में झांकने का मौका देते हैं.

पांच लेखक : मनीषा कुलश्रेष्ठ, अनुज लुगुन, पंकज मित्र, पंकज सुबीर और उमाशंकर चौधरी 

पांच सवाल

1. मैं क्यों लिखता हूं ? 2. आपकी नजर में साहित्य की जिंदगी में क्या भूमिका है ? 3. किन पुराने लेखकों को आज के समय के करीब पाते हैं ? 4. क्या कालजयी होने की इच्छा आपको भी छू गयी है ? 5. आज के दौर के किस युवा लेखक की रचनाएं आपको प्रभावित करती हैं और क्यों ?


3.  उमाशंकर चौधरी     


‘कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे’ कविता संग्रह और ‘अयोध्या बाबू सनक गये हैं’ कहानी संग्रह. साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से नवाजा गया है. 




हर लेखक पूरी जिंदगी इस सवाल से जूझता रहता है कि आखिर वह क्यों लिख रहा है! उसके लिख भर देने से कोई क्रांति हो जायेगी ऐसा कम से कम प्रथम दृष्ट्या लगता तो नहीं है. लेकिन मुझे लगता है इसका जवाब सिर्फ यह हो सकता है कि अगर लोग लिखना छोड. दंे, संगीत छूट जाये, कला के सारे माध्यम छूट जाएं, तो यह जिंदगी कितनी नीरस और कितनी बर्बर हो जायेगी! क्रांति शब्द बड.ा हो सकता है, लेकिन साहित्य हमारे मस्तिष्क को परिष्कृत तो करता ही है.

टेरी इगलटन की तरह यह बात मुझे भी बहुत शिद्दत से लगती है कि समाज में जितनी ही चकाचौंध बढे.गी, साहित्य की अहमियत उतनी ही बढ.ती जायेगी. पिछले बीस वर्षों में देखा जा सकता है कि हमारा समाज कितना बर्बर होता जा रहा है. मनुष्य और मनुष्य के बीच विश्‍वास की महीन रेखा भी खत्म होती जा रही है. हमारा समाज, हमारी राजनीति विकास के जिस पश्‍चिमी मॉडल को अपना आदर्श मानती है, वहां हमारी संस्कृति हमसे छूटती जा रही है. भाषा का विर्मश बहुत बड.ा है. हम अपनी भाषा को छोड.ते हैं, तो उनकी पूरी मानसिकता को स्वीकार करते हैं. मैं साहित्य ही नहीं, सड.क पर हो रहे नुक्कड. नाटक से लेकर जैसलमेर की ढूह पर बैठकर अलगोझा बजाने वाले की भी इस संस्कृति को बचाने में उतनी ही अहमियत मानता हूं.

हर लेखक अपनी परंपरा से जुड.ा होता है. हम अपनी परंपरा में थोड.ा सा बदलाव लाते हैं. कुछ अच्छा करने की कोशिश करते हैं. मैं रेणु को आज के समय और अपने सबसे अधिक करीब पाता हूं. वे बडे. कथाकार थे. एक ऐसे लेखक, जो अपने समय को और भविष्य की नब्ज को पकडे. हुए थे. मुझे कविता के क्षेत्र में अमीर खुसरो और रघुवीर सहाय को आज भी बहुत प्रासंगिक मानता हूं. मैं समझता हूं कि रेणु और रघुवीर सहाय ने लेखन को समाज और राजनीति के जरूरी सवालों से सीधा-सीधा जोड.ा. किस्सागोई के लिए निस्संदेह मैं विनोद कुमार शुक्ल और उदय प्रकाश को पसंद करता हूं. और भाषा के लिए काशीनाथ सिंह और विश्‍वनाथ त्रिपाठी का बहुत बड.ा प्रशंसक हूं.

कालजयी होना या फिर इसे दूसरे शब्दों में कहें पाठकों का निरंतर प्यार पाना, यही तो लेखक को ऊर्जा देता है. अगर एक लेखक अच्छा काम करने के लिए समाज से ऊर्जा चाहता है, तो इसमें बुरा क्या है. साहित्य सृजन का काम कोई दो-चार वर्षों का नहीं है. जब तक आपके लेखन में दम नहीं होगा तमाम गुट मिल कर किसी लेखक को दो-चार वर्षों तक तो चर्चा में बनाये रख सकते हैं, लेकिन उसे कालजयी नहीं बना सकते. सारे पुरस्कार धरे के धरे रह जाते हैं. आपका लेखन ही आपको बचाता है.

मैं चूंकि कविता और कहानी दोनों लिखता हूं, इसलिए यहां मैं दोनों के संदर्भ में बात कर रहा हूं. हमारी पीढ.ी को लिखते हुए कुछ वर्ष गुजर गये हैं. आज हम यह बात कर सकते हैं कि आखिर यह पीढ.ी कितनी कारगर रही. इस पीढ.ी में काफी लोगांे ने लिखना शुरू किया था अब उसमें काफी छंटनी हो गयी है. जो बच गये हैं, उनकी एक पहचान बन चुकी है. जब पहचान बनी है, तो जरूर उनके यहां कुछ अच्छा और अलग होगा. मुझे लगता है कि बात इसपर होनी चाहिए कि हमारी पूरी पीढ.ी मिल कर हमारे समय की विभित्र समस्याओं-विषमताओं पर उंगली रख पायी या नहीं. साहित्य अंतत: कला है इसलिए प्रस्तुति के स्तर पर पसंद-नापसंद अवश्य होंगी. मेरे जेहन में भी कुछ नाम हैं अवश्य, लेकिन मैं समझता हूं कि यह सवाल एक पीढ.ी के लोगों से पूछ कर सनसनी पैदा करने से बेहतर है कि हमसे पहले की पीढ.ी या कुछ दिनों बाद हमारे बाद की पीढ.ी से पूछा जाए.