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9 February 2014

मैंने लेखन के किसी भी नियम को नहीं माना : पंकज दुबे

बड़े हुए झारखंड के चाईबासा में, ग्रेजुएशन के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी पहुंचे. मास्टर्स के लिए लंदन का सफर तय किया और पढ़-लिख कर बीबीसी में पत्रकार हो गये. कुछ एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी करने की धुन फिल्म राइटिंग में ले आयी. फिल्म लिखते हुए ही किताब के राइटर हो गये. अपने पहले ही उपन्यास ‘लूजर कहीं का’ से पाठकों ही नहीं, गैर-पाठकों के बीच भी लोकप्रियता पा रहे  लेखक पंकज दुबे से प्रीति सिंह परिहार की बातचीत के अंश.



‘लूजर कहीं का’ उपन्यास लिखने का ख्याल कैसे आया ?
दरअसल, मैंने जिंदगी में कभी कोई उपन्यास पढ़ा नहीं है. कोर्स की किताबों के अलावा कोई किताब मुङो दिलचस्प नहीं लगती थी. उपन्यास से पहले मैंने ‘लूजर कहीं का’ फिल्म लिखी. फिल्म लिखते हुए मुङो लगा कि फिल्म लेखन की अपनी एक सीमा है. इसमें वो सारी बातें नहीं आ सकतीं, जो मैं कहना चाहता हूं. उपन्यास में सारी बातें आ सकती हैं. लेकिन मैंने कभी खुद कोई उपन्यास पढ़ा नहीं था. मन में सवाल आया कि क्यों! तो जवाब मिला कि कभी कोई उपन्यास दिलचस्प नहीं लगा. मुङो लगा कि मेरे जैसे तो बहुत लोग होंगे, जो गैर-पाठक होंगे, किताबें नहीं पढ़ते होंगे. इस तरह ख्याल आया कि क्यों न एक ऐसी किताब लिखी जाये जो गैर-पाठकों को भी पाठक बना दे. जाहिर है इसकी शर्त थी किताब का दिलचस्प और मनोरंजक होना. मैंने इस किताब को लिखने में एक साल तक मेहनत की. जब मैं खुद पूरी तरह संतुष्ट हो गया, तब मैंने इसे आगे बढ़ाया.

आपने कभी कोई उपन्यास नहीं पढ़ा, तो क्या लेखन का किसी तरह का अभ्यास था पहले से?
मैंने साहित्यिक लेखन के किसी भी तरह के नियम को नहीं माना, क्योंकि मुङो उसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी. हां, लिखने का पैशन बचपन से था. खूब सारे प्रेम पत्र लिखता था स्कूल के दिनों से. क्लास में कोई लड़की बहुत पसंद आ गयी, तो उसके लिए प्रेम-पत्र लिखता, लेकिन उसे देता नहीं था. पिटाई का खतरा था. जब लड़की से अच्छी दोस्ती हो जाती, तब बताता था, ‘इफ यू डोंट माइंड, मैंने तुम्हारे लिए लव लेटर लिखा था, पढ़ लो यार, अब तो हम फ्रेंड्स हैं.’ उन लेटर्स को पढ़ कर किसी को मुझसे प्यार नहीं होता था. हां, हम अच्छे दोस्त हो जाते थे. इस पूरे प्रोसेस में लिखने का खूब अभ्यास हुआ. इंटरनेट आने के बाद चैटिंग के माध्यम से लिखने का अभ्यास जारी रहा. इन सारी चीजों के साथ सेंसऑफ ह्यूमर का होना भी काम आया. इस किताब को लिखते वक्त मुङो यह भी लगा कि अगर आप खुद को केंद्र में रख कर मजाक बनाते हैं, तो दूसरों को ज्यादा आनंद आता है. अगर आप ज्ञान मोड में आ गये कि मैं तो    लेखनी से समाज ही बदल दूंगा, तो  फिर      बात नहीं    बनेगी. इसलिए  मैंने अपनी नॉन सीरियसनेस को  सीरियसली लेने की कोशिश की ताकि नॉन सीरियस रीडर मेरे पा आ जायें. जो पढ़ना नहीं चाहते, इस बहाने से पढ़ाया जाये.


क्या इसे आत्मकथात्मक उपन्यास माना जाये?
यह पूरी तरह से आत्मकथात्मक नहीं है. किसी भी इनसान की पूरी जिंदगी हमेशा इतनी दिलचस्प नहीं होती. मान सकते हैं कि 17 फीसदी मेरी जिंदगी से जुड़े अनुभव हैं, तो 20-21 फीसदी चार दोस्तों की जिंदगी के दिलचस्प हिस्से. कोशिश की है कि पांडे अनिल कुमार सिन्हा की पूरी यात्र इंटरेस्टिंग हो. लेकिन इसमें सब जिंदगी की हकीकत है. फिक्शन कुछ भी नहीं है. फिक्शन पिटाई खाने से बचने के लिए इस्तेमाल किया जानेवाला शब्द है. कहीं न कहीं नाम बदल कर अलग-अलग भौगोलिक स्थितियों में चीजें तो घटती ही हैं.



तो क्या इसे अतीत की यात्र कह सकते हैं?
मैं इसे एक काउबेल्ट कॉमेडी की तरह देख रहा हूूं. यह एक छोटे से शहर से आये स्टूडेंट की कहानी है, जो दिल्ली विश्वविद्यालय में बाबूजी से आइएएस बनने का उधार का सपना लेकर आया  है और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. हर दिन उसे दिल्ली की एक लड़की लूजर बता रही है- इसके कपड़े कैसे हैं, इसे अंगरेजी नहीं आती, ये तो सीमा को शीमा जी बोलता है. अब तक उसे सिर्फ यह पता था कि उसे अंगरेजी नहीं आती, लेकिन यहां महसूस होता है कि उसे हिंदी भी नहीं आती. वह इस जद्दोजहद में होता है कि कैसे अपनी पहचान बदले, कैसे स्वीकारा जाये. बाद में उसे महसूस होता है कि अपने आप को बदलने की कोशिश बेवकूफी है. खुद को स्वीकारने की यात्र है यह. हर इनसान अपने आप में यूनिक है, हमें कुछ और बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, इसी बात को नॉन- ज्ञान मोड में बताने की कोशिश है यह किताब. क्या जरूरी है कि हर इनसान, समझदारी की बात करनी हो तो गांधीजी की तरह बात करे या विवेकानंद ही बन जाये. आप हंसते-हंसाते हुए भी कुछ काम की बातें बोल सकते हैं.


आपने इसे हिंदी-अंगरेजी दोनों भाषाओं में लिखा है. पहले किस भाषा में लिखा?
दोनों साथ-साथ ही लिखा. जैसे एक चैप्टर अगर अंगरेजी में लिखा, तो फिर उसका शब्दश: हिंदी में अनुवाद नहीं किया, बस समझ लिया कि इस चैप्टर में ये चीजें हैं, इन चरित्रों से जुड़ी हुई, उसे ही हिंदी में लिख दिया. जब जिस भाषा में मन किया, लिखता गया. कई बार तीन-चार चैप्टर हिंदी के लगातार लिख दिये, फिर इंगलिश में उसे कवरअप कर दिया. मुङो दोनों भाषाओं से प्रेम है. अंगरेजी और हिंदी दोनों मेरे साथ हैं और दोनों को पढ़नेवाले मेरे ढेर सारे दोस्त हैं.

 क्या दोनों भाषाओं में प्रकाशित होने के चलते भी इसकी लोकप्रियता बढ़ी है?
फायदा तो मिलता है अंगरेजी में लिखने का. लेकिन हिंदी के प्रति जो ट्रीटमेंट है समाज का, वह मुझे दुखी करता है. अंगरेजी में होने की वजह से सोशल मीडिया में किताब को बहुत ज्यादा जगह मिली. लंदन तक में जो लोग लिख रहे हैं किताब के बारे में, वे यह भी लिख रहे हैं कि यह हिंदी में भी है. बायलिंगुअल ऑथर है. ऑस्ट्रेलिया के नेशनल रेडियो एसबीएस से मेरा जो इंटरव्यू आया, उसमें भी यह बताया गया. तो दोनों भाषाओं का जो गंठबंधन मैंने कराने की कोशिश की है, उससे ये शादी बड़ी अच्छी चल रही है.

मूलरूप में प्रभात खबर में प्रकाशित  

24 December 2013

नौ वर्षों तक मिलजुल मन का शिल्प खोजती रही...

साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजी गयीं  मृदुला गर्ग ने  रचनात्मक साधना की राह पर लम्बी और सार्थक यात्रा की है. पिछले साल  प्रीति सिंह परिहार ने मृदुला गर्ग से उनके रचनात्मक सफ़र पर  लम्बी बातचीत की थी . यहाँ इस बातचीत को आत्मवक्तव्य में ढाला गया है. अखरावट 



साहित्य मुझे बचपन से ही बहुत आकर्षित करता रहा है. नौ साल की थी तबसे ही मैंने साहित्यिक किताबें पढ़ना शुरू कर दिया था. घर में सभी को साहित्य पढ़ने का शौक था, इसलिए मुझे भी आसानी से हर तरह की महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियां उपलब्ध थीं. मैंने बहुत छोटी उम्र में ही शरतचंद्र और बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय जैसे लेखकों की कृतियां पढ़ ली थीं.
लेकिन लेखन के बारे में तब कुछ सोचा नहीं था. हां, अपने आसपास के जीवन और स्थितियों को देखकर उन्हें व्यक्त करने की उथल-पुथल मन में जरूर चलती रहती थी. मैं साहित्य पढ़ती थी, लेकिन मैंने पढ़ाई अर्थशास्त्र से की और बाद में यही विषय पढ़ाने भी लगी. इसी बीच मेरी शादी हो गयी और मैं दिल्ली जैसे महानगर के माहौल से सीधे बिहार के एक छोटे से इंडस्ट्रियल कस्बे- डालमिया नगर आ गयी. यहां की जिंदगी बिलकुल अलग थी. आस-पास छोटे-छोटे गांव थे. गांव मैंने पहले भी देखे थे, लेकिन अक्सर गांव को लेकर हमारे दिमाग में एक तरह का नॉस्टेल्जिया होता है.
पर अब मैं गांव की विषम परिस्थितियों और व्याप्त शोषण को महसूस कर रही थी. यहां गरीबी, अकाल देखकर लगा कि इसे लिखना चाहिए. लेकिन कैसे? इन सब चीजों का उस अर्थशास्त्र से खास सामंजस्य बैठता नहीं था जो हमें तब साठ के दशक में पढ़ाया गया था. शुरू में मैंने अर्थशास्त्रीय विषयों पर लेख लिखे तब भी कहा गया कि ये लेख साहित्यिक ज्यादा लगते हैं. फिर लगा मैं जो कहना चाहती हूं वह साहित्यिक तरीके से ही व्यक्त हो सकता है, कहानी या उपन्यास के जरिए.
अब इसके लिए मुझे पात्र चाहिए थे, जिससे मैं समाज का बाह्य स्वरूप लिखकर ना रह जाऊं. लोगों के आंतरिक और व्यैक्तिक जीवन को पूरे भावनात्मक आलोड़न के साथ व्यक्त करूं. इसके साथ ही घर-परिवार भी आगे बढ़ रहा था. बच्चों के जन्म के बाद मेरी रचनात्मक ऊर्जा बहुत तेजी से विकसित हुई. बीत चुके जीवन से मेरा जुड़ाव शुरू हुआ. हमारे समय के मूल्य और व्यवस्थाओं से आमना-सामना हुआ. उनसे प्रेरणा मिली और पात्र भी.
मैंने छोटे बच्चों के रहते लेखन शुरू किया गुंजान माहौल में. इसी दौरान मैं बिहार से कर्नाटक की एक छोटी सी जगह बागलकोट आ गयी. यह तब इतना पिछड़ा इलाका था कि यहां स्कूल तक नहीं था. मैंने बागलकोट में अंगरेजी, हिंदी और कन्नड़ भाषा का एक स्कूल शुरू किया. स्कूल के लिए बहुत जद्दोजहद कर शिक्षक और प्रिंसिपल इकठ्ठा किये. यह मेरी जिंदगी का बहुत अहम पड़ाव था. मैं बच्चों को सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ने लगी. इसी क्रम में स्कूल में मैंने मिड समर नाइट ड्रीम नाटक का मंचन कराया. नाटक में एक छोटे से बच्चे का अभिनय अभिभूत करने वाला था. उसे देखकर मुझे लगा कि हर इंसान के भीतर रचनात्मक ऊर्जा होती है.
इस एहसास के साथ मेरे भीतर भी रचनात्मक ऊर्जा विकसित होती रही. स्कूल और घर की व्यस्तता के बाद जो वक्त मिलता, मैं लिखने बैठ जाती थी. मुझे लगता है कि लिखने के लिए एक खास क्षण में जेहन में उभर रहे जुनून की बड़ी भूमिका होती है. कई बार आपके पास बहुत वक्त होता है, लेकिन आप लिख नहीं पाते. लेकिन, कई बार बहुत व्यस्तता के बाद भी समय चुराकर, रात भर जागकर भी आप लिखते हैं. मेरे साथ भी ऐसा ही होता है. मैं अपनी ज्यादातर कहानियां एक बैठक में ही पूरी करती हूं. मेरी ऐसी ही एक बहुत लंबी कहानी है कितनी कैदें. इसे मैंने एक रात के सफर में ट्रेन में लिखा था.
कई बार ऐसा होता है कि अरसे से दिमाग में खदबदा रही कहानी किसी उत्प्रेरक क्षण में सामने आकर खड़ी हो जाती है और मैं लिखने से खुद को रोक नहीं पाती. तब सबकुछ से वक्त चुराकर लिखना पड़ता है. लेकिन सबसे अधिक लेखन मैंने गर्मियों के दिनों में किया. इसलिए नहीं की मुझे यह मौसम पसंद है, बल्कि इसलिए क्योंकि इस समय बच्चों की परीक्षाएं हो जाती थीं और मेहमान भी बहुत कम आते थे. ऐसे में दिल्ली की गर्मी में बस एक कूलर मिल जाए और थोड़ा सा एकांत. वैसे मुझे बारिश बहुत उद्वेलित करती है. अपनी कहानी मीरा नाची मैंने बहुत तेज बारिश के दौरान बालकनी में बैठकर लिखी.
कई बार कुछ लिख लेने के बाद एक खालीपन के साथ बहुत सारा सुकून भी होता है और तब लगता है कि जिंदगी बस यहीं खत्म हो जाए, अब कोई तमन्ना बाकी नहीं. मीरा नाची शहर के नाम और डेफोडिल जल रहे हैं लिखने के बाद मैं इस अहसास से गुजरी. लेकिन उपन्यास पूरा होने के बाद मैं अकसर खालीपन और उदासी से घिर जाती हूं. ऐसा लगता है अपना जो कुछ बहुत निजी था, वह क्यों दे दिया. फिर इस मनोस्थिति से उबरने में वक्त लगता है. जरूरी नहीं की आपकी रचना पूरी होकर आपको संतोष ही दे. कहानी लिखने के बाद दर्द से छुटकारा मिलने जैसी अनुभूति होती है, लेकिन उपन्यास में अपना सबकुछ खो जाने का भाव होता है.
मैं कभी कोई योजना बनाकर, नोट्स लेकर नहीं लिखती. एक धुंधला सा ख्याल मन में चलता रहता है. पता भी नहीं होता कि वह लिखा जायेगा भी कि नहीं. लेकिन किसी एक उत्प्रेरक क्षण में वह धुंध मिट जाती है और सबकुछ साफ दिखायी देने लगता है. तब रचना शब्दाकार लेने लगती है. चितकोबरा उपन्यास मैंने 26 दिन में लिखा और यह 26 अध्याय में है. इसे बीच से भी पढ़ेंगे तो अधूरा नहीं लगेगा. लिखने के बाद मैंने इसे आरोह-अवरोह के क्रम में जमाया. इसमें एक स्त्री के प्रेम की कहानी है जहां सेक्स वजिर्त नहीं है.
लेकिन यह उपन्यास बहुत से गलत कारणों से चर्चा में रहा. इसे लेकर बेवजह का हल्ला मचाया गया जबकि मैंने इसमें एक स्त्री के शरीर और आत्मा से संबंधित विचारों को व्यक्त किया है. दरअसल, स्त्री की संरचना में द्वैत होता है- शरीर और दिमाग के बीच. मैं इसमें एक ऐसी प्रेम कथा कह रही थी जिसमें प्रेम पैशन था और विचार भी. एक ऐसी औरत की कथा जो भावप्रवण भी है और बहुत प्रज्ञावान भी. उसी प्रज्ञा और भावावेग के साथ 26 दिनों तक सुबह 4 बजे से 6 बजे तक मैं नियमित रूप से लिखती रही थी. 
रचना की प्रक्रिया जीवन के साथ हर पल चलती रहती है. मैं जब लिखना शुरू करती हूं, तो वह शुरुआत नहीं अंत होता है. मेरी रचना प्रक्रिया का पहला और शुरुआती हिस्सा शिल्प की खोज है. सोच और एहसास को शब्दों मे ढालने का सिलसिला रचना प्रक्रिया का अंतिम चरण होता है. यह अंतिम चरण कुछ घंटों में या कभी साल, डेढ़ साल में पूरा हो जाता है लेकिन इसके पूर्वार्ध में यानी शिल्प के जन्म में कितना समय लगेगा, कहा नहीं जा सकता.
मेरे उपन्यास ‘मिलजुल मन’ को लिखने का ऐलान मैंने 1998 में कर दिया था, लेकिन 9 साल तक इसका शिल्प नहीं सूझा.अचानक एक रात मुझे इसका शिल्प मिल गया. इसके बाद डेढ़ साल में यह उपन्यास पूरा हो गया. शिल्प किसी दबाव में या बहुत खोजने पर नहीं मिलता, कभी भी अचानक मिल जाता है. कई बार तेज बुखार में भी. मैंने अपनी कहानी ‘डेफोडिल जल रहे हैं तेज बुखार में लिखी है. मैंने बहुत भीड़ और गुंजान माहौल के बीच रहते हुए भी खुद को उससे काटकर अपना एकांत बनाया है और उसमें लिखा है.मेरा पहला ड्राफ्ट ही अंतिम होता है. इसके बाद उसे सिर्फ प्रूफ के लिहाज से ही पढ़ती हूं.
मैंने लेखन बहुत देर से शुरू किया और उसके बाद तेज रफ्तार में लिखती चली गयी. बाद में थोड़ा अंतराल आया, लेकिन ऐसा अंतराल कभी नहीं रहा कि लेखन में बाधक बन सके. जब उपन्यास नहीं लिख रही होती, तो लेख, कॉलम और कहानियां लिखती रही. यह बिलकुल ऐसे था जैसे पहाड़ी नदी मैदान में उतर आती है, तो धीरे चलने लगती है.
इन दिनों मेरा कुछ कहानियां लिखने का मन है और एक उपन्यास भी बहुत धुंधला सा है जेहन में. जिंदगी रही तो उसे भी लिख सकूंगी. फिलहाल जल्द ही पाठकों के सामने मेरी नयी कहानियां होंगी.
प्रीति सिंह परिहार युवा पत्रकार हैं.