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30 July 2013

चिनुआ अचेबे : पश्चिमी सभ्यता की श्रेष्ठता के मिथक को ध्वस्त करनेवाला लेखक

अफ्रीकी साहित्य खासकरआधुनिक अफ्रीकी उपन्यास के पितामह कहे जानेवाले चिनुआ अचेबे  के निधन के बाद पर यह लेख संशोधनों के साथ फॉरवर्ड प्रेस में छपा था. असंशोधित लेख यह रहा...

 
पिछले छह दशकों में जिन लोगों ने पश्चिमी  सभ्यता की श्रेष्ठता के गढे गये मिथक को ध्वस्त करने में योगदान दिया उनमें अचेबे का नाम प्रमुख है. अचेबे ने न सिर्फ अफ्रीकी लेखन को विश्व मानचित्र पर जगह दिलायी, बल्कि इस दुष्प्रचार को भी मुंहतोड़ जवाब दिया कि 'अफ्रीकी नस्लीय रूप से हीन हैं.' नेल्सन मंडेला ने अचेबे को अफ्रीका को बाकी दुनिया तक ले कर जाने वाला और ऐसा लेखक कहा है, जिसके साथ रहते हुए "जेल की दीवारें टूट गयी थीं.’’ इससे थोड़ा और आगे जाकर यह कहा जा सकता है कि अचेबे उन लेखकों में शामिल रहे, जिन्होंन यह बताया कि तीसरी दुनिया के लोग, खासकर इन देशों के जनजातीय समाज किस तरह साझे इतिहास से बंधे हुए हैं.

थिंग्स फाल अपार्ट/ द सेंटर कांट होल्ड (चीजें बिखर जाती हैं, केंद्र ही स्थिर नहीं रह पाता). चिुनुआ अचेबे ने अपने पहले और बहुचर्चित  उपन्यास थिंग्स फॉल अपार्ट का शीर्षक आइरिश कवि वाइबी येट्स की कविता सेकंड कमिंग की इन पंक्तियों से लिया. अपने इस उपन्यास में, जिसकी अब तक करीब सवा करोड़ कॉपी बिक  चुकी है और 50 से अधिक भाषाओं में जिसका अनुवाद हो चुका है, चिनुआ अचेबे ने अफ्रीकी समाज की धुरी के ही चरमरा जाने की ऐतिहासिक त्रासदी को बयां किया. द गार्डियन ने इस उपन्यास की समीक्षा करते हुए लिखा था,‘‘इस उपन्यास ने अफ्रीका बारे में पश्चिम के नजरिये को सिर  के बल खड़ा कर दिया"- वह नजरिया जो अब तक सिर्फ गोरे उपनिवेशवादियों के दृष्टिकोण पर आधारित था.

यह उपनिवेशवादी नजरिया क्या है? यह कि अफ्रीका का उपनिवेशीकरण ‘‘हीन’’ और ‘‘आदिम’’ की संज्ञा से नवाजे गये लोगों को सभ्य बनाने के लिए किया गया था. यह वह वैचारिक आधार था, जिसका सहारा लेकर अपनी तमाम हिंसा और बर्बरता के रक्त रंजित इतिहास के बावजूद यूरोप ने अफ्रीका, एशिया, अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया के उपनिवेशीकरण को वैधानिकता प्रदान करने की कोशिश की है.. ‘‘थिंग्स फॉल अपार्ट’’ सिर्फ नाइजीरिया, या अफ्रीका का नहीं, दुनिया के उन तमाम मुल्कों का उपन्यास बन जाता है, जिन्हें अपने तथाकथित सभ्यता मिशन में यूरोपीय शक्तियों द्वारा अपना गुलाम बनाया गया था. यह उपन्यास उस पश्चिमी प्रचार को  बेहद रचनात्मक तरीके से ध्वस्त करता है, जिसके मुताबिक गोरों के आगमन से पहले अफ्रीकी कबीलाई समाज न्याय और शासन की किसी भी अवधारणा से अपरिचित था.  थिंग्स फॉल अपार्ट में चिनुआ अचेबे दुनिया के पाठकों को गोरों के आगमन से ठीक पहले के अफ्रीकी कबीलाई समाज में जाते हैं और यह दिखाते हैं कि भले उपर से देखने पर यह समाज ‘‘आधुनिकता’’ के सांचे से कहीं बार छिटका हुआ और आदिम नजर आता है, लेकिन अपने आंतरिक  रूप में इन समाजों में भी न्याय, शासन, शान्ति की चाहत कुछ वैसी ही थी, जिस पर आधुनिक यूरोप "गर्व" करता है. अचेबे इस तथाकथित बर्बर अफ्रीकी समाज को यहां ‘‘सभ्य" यूरोपीय समाज के बरक्स रखते हैं और यह दिखाते हैं कि किस तरह उनके आगमन के बाद परंपरागत अफ्रकी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनतिक संस्थाएं तहस-नहस कर दी गयीं. यह उपन्यास साम्राज्यवादी शोषण के वैश्विक चरित्र को सामने लाता है. यह बेवजह नहीं है कि थिंग्स फॉल अपार्ट पढ़ते हुए आपको अचानक छोटा नागपुर पठार पर लड़ते हुए सिद्धो-कान्हो और बिरसा मुंडा याद आ जाते हैं, जो अपनी आजादी, परंपरागत संस्कृति और धार्मिक विश्वास की रक्षा करने के लिए उठ खड़े हुए थे.

प्ेरिस रिव्यू को करीब डेढ़ दशक पहले दिये गये साक्षात्कार में चिनुआ अचेबे ने कहा था, "जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया और पढ़ना सीखा, मेरा सामना दूसरे लोगों और दूसरी धरती की कहानियों से हुआ. ये कहानियां मुझे बहुत अच्छी लगती थीं. इनमें कई अजीब-अतार्किक किस्म की होती थीं. थोड़ा और बड़ा होने पर रोमांच कथाओं से मेरा वास्ता पड़ा. तब मुझे नहीं पता था कि मुझे उन बर्बर-आदिम लोगों के साथ खड़ा होना है, जिनका मुठभेड़ अच्छे गोरे लोगों से हुआ था. मैंने सहज बोध से गोरे लोगों का पक्ष लिया. वे अच्छे थे! वे काफी अच्छे थे! बुद्धिमान थे! दूसरी तरफ के लोग ऐसे नहीं थे. वे मूर्ख थे. बदसूरत थे. इस तरह मुझे "अपनी कहानी के न होने" के खतरे से परिचय हुआ. एक महान कहावत है- जब तक शेर की तरफ से इतिहास लिखनेवाला नहीं होगा, जब तक शिकारी का इतिहास हमेशा शिकारी को ही महिमामंडित करेगा. यह बात बहुत बाद तक मेरी समझ में नहीं आयी. जब मुझे एहसास हुआ कि मुझे लेखक बनना है, तब मुझे यह पता था कि मुझे वह इतिहासकार बनना है जो शेर का इतिहास लिखे, शिकारी का नहीं. यह किसी अकेले का काम नहीं है. यह एक ऐसा काम है, जिसे हम सबको मिलकर साथ करना है, ताकि शिकार के इतिहास में शेर की पीड़ा, उसका कष्ट, उसकी बहादुरी भी झलके."

जाहिर है चिनुआ अचेबे को यह मालूम था कि उन्हें सिर्फ शब्दों की साधना नहीं करनी है, बल्कि शब्दों के सहारे एक खोये और अपमानित किये गये इतिहास को फिर से खड़ा करना है.  अफ्रीका पर लिखे गये उनके उपन्यासों की ट्रायोलाजी- "थिंग्स फाल अपार्ट", "नो लॉन्गर एट ईज" और "ऐरो ऑफ  गॉड" में उनकी इस कोशिश को साफ महसूस किया जा सकता है. लेकिन इस क्रम मे वे कहीं भी इतिहास को लौटा लाने की नोस्टालजिया से ग्रस्त नहीं दिखते और अफ्रीकियों की आलोचना और उन पर व्यंग्य करने से भी नहीं कतराते हैं. उनका चैथा उपन्यास ‘‘ ए मैन ऑफ द पीपुल’’ इसकी मिसाल है.

.अपने ऐतिहासिक लेख ‘‘ एन इमेज ऑफ अफ्रीका: रेसिज्म इन कोनराडस हार्ट ऑफ डार्कनेस’’(1975) में अचेबे ने कोनराड .( जोसेफ कोनराड ने अफ्रीका पर 'हार्ट ऑफ डार्कनेस' नामक उपन्यास बर्बर बनाम सभ्यता के विमर्श पर केंद्रित करके लिखा था) की इस बात के लिए तीखी आलोचना की कि इसमें अफ्रीकी महादेश को पहचान में आ सकने लायक मानवता के किसी भी चिह्न से खाली युद्धभूमि में बदल दिया और अफ्रीकियों की भूमिका परजीवी तक सीमित कर दी गयी.

चिनुआ अचेबे का पूरे लेखन में शोषित अश्वेतों का इतिहासकार होने की जद्दोजहद दिखायी देती है. खुद उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘‘लेखक सिर्फ लेखक नहीं होता. वह एक नागरिक भी होता है.’’ उनका मानना था कि गंभीर और अच्छे साहित्य का अस्तित्व हमेशा से मानवता की मदद उसकी सेवा करने के लिए रहा है. चिनुआ अचेबे के लेखन में अफ्रीकी  मानवता के  प्रति ही नहीं विश्व की तमाम शोषित मानवताओं के प्रति इस पक्षधरता को आसानी से चिह्नित किया जा सकता है.


8 April 2013

"लिखना एक तरह से कैद में चले जाना है" : चिनुआ अचेबे


अफ्रीकी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले चिनुआ अचेबे, जिनका निधन पिछले महीने २१ मार्च को हो गया, ने लेखन को हमेशा एक तरह का रचनातमक  एक्टिविज्म माना. उनका लेखन महज एक लेखक की रचना यात्रा नहीं बल्कि अफ्रीकी महादेश की पीड़ा की भी यात्रा है. उनके लेखन और  संघर्ष को यह साक्षात्कार (जिसे यहाँ आत्म वक्तव्य की शक्ल में ढाला गया है) काफी गहराई से सामने लाता है...आपके लिए इस आत्म वक्तव्य का दूसरा और आख़िरी हिस्सा. यहाँ उन्होंने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में महत्वपूर्ण बातें कही हैं. : अखरावट




सृजन की प्रक्रिया हर रचना के लिए एक समान नहीं होती. मुझे लगता है कि सबसे पहले एक सामान्य विचार आता है, उसके ठीक बाद अहम किरदार आते हैं. हम लोगों सामान्य विचारों के समुद्र के बीच में रहते हैं, इसलिए यह अपने आप में उपन्यास नहीं है, क्योंकि सामान्य विचार अनगिनत संख्या में हैं. लेकिन जिस क्षण एक खास विचार एक किरदार से जुड़ जाता है, यह कुछ ऐसा होता है, जैसे कोई इंजन चल पड़े. तब एक उपन्यास बनने लगता है. यह खासकर उन उपन्यासों के संदर्भ में सही बैठता है, जिसमें विशिष्ट और कद्दावर चरित्र होते हैं, जैसे देवता के बाण में एजुलू. ऐसे उपन्यासों में जिसमें किरदार का व्यक्तित्व उस तरह का सब पर छा जानेवाला नहीं होता है, जैसे नो लॉन्गर एट ईज, मुझे लगता है कि एक सामान्य विचार कम से कम शुरुआती अवस्था में ज्यादा अहम होता है. लेकिन जब यह शुरुआती अवस्था बीत जाती है, सामान्य विचार और चरित्र में कोई ज्यादा अंतर नहीं होता है. दोनों अहम हो जाते हैं. 

जैसे कोई उपन्यास आगे बढ़ता है, मैं प्लॉट या थीम के बारे में ज्यादा चिंता नहीं करता हूं. सारी चीजें खुद ब खुद आती हैं, क्योंकि तब किरदार कहानी को अपने हिसाब से मोड़ रहे होते हैं. एक बिंदु पर आकर लगता है कि जैसे आपका घटनाओं पर उस तरह का नियंत्रण नहीं है, जैसा आपने सोचा था. कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें वहां होना ही चाहिए, नहीं तो कहानी अधूरी लगेगी. और ऐसी चीजें खुद ब खुद आ जाती हैं. जब ऐसा नहीं होता है, तब आप मुश्किल में होते हैं और उपन्यास रुक जाता है. 

मेरे लिए लिखना एक कठिन काम है. कठिन शब्द इसे बताने के लिए काफी नहीं है. यह एक तरह से एक कुश्ती की तरह है. आपको विचारों और कहानी के साथ कुश्ती लड़नी होती है. इसके लिए काफी ऊर्जा की जरूरत होती है. लेकिन इसी क्षण यह काफी रोचक भी है. इसलिए लिखना एक साथ कठिन और आसान दोनों है. आपको यह स्वीकार करना होता है कि जब आप लिख रहे होते हैं, तब आपकी जिंदगी पहले वाली नहीं रह जाती. मेरे लिए लिखना एक तरह से कैद में चले जाना है. फिर चाहे कितना भी वक्त लगे आप इस कैद से बाहर नहीं आ सकते. इसलिए यह एक साथ कठिन और उल्लास देनेवाला, दोनों है. 

मैंने महसूस किया है कि मैं सबसे अच्छा तब लिखता हूं, जब मैं नाइजीरिया में अपने घर में होता हूं. लेकिन आदमी  दूसरी जगहों पर भी रह कर काम करना सीखता है. जिस परिवेश के बारे में मैं लिख रहा हूं, लिखने के लिहाज से वह परिवेश मेरे लिए सहज होता है. दिन का वक्त खास मायने नहीं रखता. मैं सुबह जागनेवाला व्यक्ति नहीं हूं. मुझे बिस्तर से बाहर निकलना अच्छा नहीं लगता, इसलिए मैं पांच बजे जगकर लिखना नहीं शुरू करता, हालांकि मैंने सुना है कि कई लोग ऐसा करते हैं. मैं अपने दिन की शुरुआत के बाद लिखना शुरू करता हूं और रात गये तक लिख सकता हूं. लिखने का अनुशासन मेरे लिए यह है कि मुझे किसी भी सूरत में काम करना है. इससे फर्क  नहीं पड़ता कि मैं कितना लिख पा रहा हूं. 

मैं पेन से ही लिखता हूं. कागज पर पेन मेरे लिए सबसे मुफीद तरीका है. मैं मशीनों के साथ सहज नहीं हो पाता. जब भी मैं टाइपराइटर पर कुछ काम करना चाहता हूं, मुझे लगता कि यह मेरे और मेरे शब्दों के बीच आ रहा है. जो बाहर निकलता है, वह वैसा नहीं होता है, जो बेफिक्र होकर लिखते हुए आता. इस मामले में मैं शायद पूर्व औद्योगिक व्यक्ति हूं. 

जहां तक लेखक का सार्वजनिक बहसों में खुद को शामिल करने का सवाल है, मुझे लगता है कि इसके लिए कोई सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता. लेकिन मुझे लगता है कि लेखक सिर्फ लेखक नहीं होता. वह एक नागरिक भी होता है. मेरा हमेशा से मानना रहा है कि गंभीर और अच्छे साहित्य का अस्तित्व हमेशा से मानवता की मदद उसकी सेवा करने के लिए रहा है. न कि उसे सवालों के घेरे में लाने या उस पर दोषारोपण करने के लिए. कोई कला कैसे कला कही जा सकती है, अगर इसका मकसद मानवता को हताश करना हो. हां, यह मानवता को असहज कर सकता है. यह मानवता के खिलाफ नहीं हो सकता. यही कारण है कि मैं नस्लवाद को असहनीय मानता हूं. कुछ लोगों को लगता है कि मेरे कहने का मतलब  यह है कि अपने लोगों की प्रशंसा करनी चाहिए. भगवान के लिए जाइये और मेरी किताबें पढ़िये. मैं अपने लोगों की प्रशंसा नहीं करता. मैं उनका सबसे बड़ा आलोचक हूं. कुछ लोगों को लगता है कि मेरा छोटा सा पर्चा- द ट्रॉबल विद  नाइजीरिया, थोड़ा अतिवादी था. मैं अपने लेखन के कारण हर तरह की समस्या में पड़ता रहा हूं. कला को हमेशा मानवता के पक्ष में होना चाहिए. 
समाप्त .

पेरिस रिव्यू में छपे एक पुराने साक्षात्कार के आधार पर तैयार 


7 April 2013

लेखक को इतिहासकार होना होता है...: चिनुआ अचेबे


अफ्रीकी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले चिनुआ अचेबे, जिनका निधन पिछले महीने २१ मार्च को हो गया, ने लेखन को हमेशा एक तरह का रचनातमक  एक्टिविज्म माना. उनका लेखन महज एक लेखक की रचना यात्रा नहीं बल्कि अफ्रीकी महादेश की पीड़ा की भी यात्रा है. उनके लेखन और  संघर्ष को यह साक्षात्कार (जिसे यहाँ आत्म वक्तव्य की शक्ल में ढाला गया है) काफी गहराई से सामने लाता है...आप भी पढ़िए : अखरावट 




जहां तक बचपन में कहानियां लिखने की प्रेरणा की बात है, उस दौर में कहानियां लिखना संभव नहीं था. इसलिए तब इस बारे में सोचा भी नहीं. हां, इतना जरूर है कि मुझे यह पता था कि मुझे कहानियां पसंद हैं. कहानियां जो मेरे घर में सुनायी जाती थीं, पहले मेरी मां द्वारा. फिर मेरी बड़ी बहन द्वारा. जैसे कछुए की कहानी- या कोई भी कहानी जो मैं लोगों की बातचीत के भीतर से ढूंढ़ लेता था. जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया, तब जो कहानियां मैं पढ़ा करता था, वे मुझे अच्छी लगती थीं. वे दूसरी तरह की कहानियां थीं. लेकिन मुझे अच्छी लगती थीं. नाईजीरिया के मेरे हिस्से में मेरे माता-पिता ईसाई धर्म में धर्मांतरित होनेवाले शुरुआती लोगों में से थे. उन्होंने सिर्फ धर्म ही नहीं बदला था, मेरे पिता ईसाई धर्म प्रचारक भी थे. वे और मेरी मां  वर्षों तक इग्बोलैंड के विभिन्न हिस्सों में ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए घूमते रहे. मैं छह भाई बहनों में पांचवां था. जब मैं बड़ा हो रहा था, तब तक मेरे पिता रिटायर हो चुके थे और अपने परिवार के साथ अपने पुश्तैनी गांव में आकर बस गये थे. 

जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया और पढ़ना सीखा, मेरा सामना दूसरे लोगों और दूसरी धरती की कहानियों से हुआ. ये कहानियां मुझे बहुत अच्छी लगती थीं. इनमें कई अजीब-अतार्किक किस्म की होती थीं. जब मैं बड़ा हुआ, मैंने रोमांच कथाओं को पढ़ना शुरू किया. तब मुझे नहीं पता था कि मुझे उन बर्बर-आदिम लोगों के साथ खड़ा होना है, जिनका मुठभेड़ अच्छे गोरे लोगों से हुआ था. मैंने सहज बोध से गोरे लोगों का पक्ष लिया. वे अच्छे थे! वे काफी अच्छे थे! बुद्धिमान थे! दूसरी तरफ के लोग ऐसे नहीं थे. वे मूर्ख थे. बदसूरत थे. इस तरह मुझे अपनी कहानी के न होने के खतरे से परिचय हुआ. एक महान कहावत है- जब तक शेर की तरफ से इतिहास लिखनेवाला नहीं होगा, जब तक शिकारी का इतिहास हमेशा उसे ही महिमामंडित करेगा. यह बात बहुत बाद तक मेरी समझ में नहीं आयी. जब मुझे एहसास हुआ कि मुझे लेखक बनना है, तब मुझे यह पता था कि मुझे वह इतिहासकार बनना है. यह किसी अकेले का काम नहीं है. यह एक ऐसा काम है, जिसे हम सबको मिलकर साथ करना है, ताकि शिकार के इतिहास में शेर की पीड़ा, उसका कष्ट, उसकी बहादुरी भी झलके.            

मेरी उच्च शिक्षा इबादान विश्वविद्यालय में हुई. तब यह नया-नया खुला ही था. एक तरह से यह उपनिवेशवादी समय के विरोधाभासों का आईना था. अगर अंगरेजों ने नाइजीरिया में कुछ बेहतर काम किये, तो इबादान उनमें से एक था. यह लंदन यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज के तौर पर शुरू हुआ था. उपनिवेशी शासन में चीजें ऐसी ही होती थीं. आप किसी और की पूंछ के तौर पर काम करना शुरू करते हैं.  मुझे जो डिग्री मिली वह लंदन यूनिवर्सिटी की ही थी. आजादी जब आयी, तब इसके प्रतीकों में से एक यह भी था कि इबादान यूनिवर्सिटी के तौर पर अस्तित्व में आया. 

मैंने पढ़ाई विज्ञान से शुरू की. फिर अंगरेजी, फिर इतिहास फिर धर्म. मुझे ये विषय काफी रोचक और काम के लगे. धर्म का अध्ययन मेरे लिये नया और उत्सुकता पैदा करनेवाला था, क्योंकि इसमें सिर्फ ईसाई धर्म दर्शन शामिल नहीं था, इसमें पश्चिमी अफ्रीका के धर्मों का अध्ययन भी शामिल था. वहां मुझे जेम्स वेल्स नाम के एक शिक्षक मिले. वे प्रभावशाली उपदेशक थे. एक बार उन्होंने मुझसे कहा, हम तुम्हें शायद वह नहीं पढ़ा सकते जिसकी तुम्हें जरूरत है, हम तुम्हें सिर्फ वही पढ़ा सकते हैं, जितना हम जानते हैं. मुझे लगा वे बेहद मार्के की बात कह रहे हैं. यह मुझे मिली सबसे अच्छी सीख थी. मैंने वहां सचमुच वैसा कुछ नहीं सीखा जिसकी मुझे जरूरत थी, सिवाय इस भाव के कि मुझे अपने बल पर अपना रास्ता बनाना है. अंगरेजी विभाग इसका उम्दा उदाहरण था. वहां मौजूद लोग इस विचार पर ही हंस देते कि हम में से कोई लेखक बनेगा. 

मेरी पहली दो किताबों- "थिंग्स फॉल अपार्ट" और नो लॉन्गर एट ईज के टाइटल क्रमश: आइरिश और अमेरिकी कवियों की कविताओं की पंक्तियों से हैं. ऐसा शायद इसलिए था कि ऐसा एक तरह के दिखावे के लिए था. मैंने अंगरेजी से जनरल डिग्री ली थी. और मुझे इसका प्रदर्शन करना था. लेकिन येट्स! मुझे भाषा के प्रति उसकी मोहब्बत, उसका प्रवाह अच्छा लगता था. वे दिल से हमेशा सही पक्ष में रहे. 

मेरे उपन्यास "थिंग्स फॉल अपार्ट" की पांडुलिपि की कहानी लंबी है. सबसे पहले तो यह लगभग खो ही गयी थी. 1957 में मैं स्कॉलरशिप कुछ दिन बीबीसी में जाकर पढ़ाई करने के लिए लंदन गया था. मैं थिंग्स फॉल अपार्ट का पहला ड्रॉफ्ट अपने साथ ले गया था, ताकि मैं इसे पूरा कर सकूं. वहां मैंने वहां अपने एकमात्र नाइजीरियाई साथी के कहने पर वह पांडुलिपी बीबीसी में इंस्ट्रक्टर और उपन्यासकार गिलबर्ट फेल्फ्स को दी. पांडुलिपी पाकर उन्होंने कोई उत्साह नहीं दिखाया था. वे होते भी क्यों? लेकिन उन्होंने काफी विनम्रता के साथ वह पांडुलिपी ले ली थी. वे मेरे अलावा पहले व्यक्ति थे, जिन्हें वह पांडुलिपी रोचक लगी थी. बल्कि उन्हें इसने इस  तरह प्रभावित किया था कि एक शनिवार वे मुझे खोजते रहे, ताकि वे मुझे इसके बारे में बता सकें. मैं लंदन से बाहर आ गया था. जब उन्हें इसका पता लगा, तो उन्होंने पता लगाया कि मैं कहां हूं और मेरे होटल में फोन किया और मेरे लिए पलट कर उन्हें फोन करने का संदेश छोड़ा. उनका यह संदेश मिलने पर मैं पूरी तरह बाग-बाग हो गया. मैंने अपने आप से कहा कि शायद उन्हें उपन्यास पसंद नहीं आया. फिर लगा कि अगर ऐसा होता, तो उन्होंने मुझे फोन ही क्यों किया होता! कुछ भी हो, मैं काफी रोमांचित था. जब मैं लंदन वापस लौटा, तो उन्होंने कहा, यह लाजवाब है. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं चाहता हूं कि यह उपन्यास मैं अपने प्रकाशक को दिखाऊं! मैंने कहा- हां, लेकिन अभी नहीं, क्योंकि मुझे लगता है कि इसका फॉर्म सही नहीं है. मैं तीन परिवारों की गाथा लिखना चाह रहा था, इसलिए मैंने अपने पहले ड्राफ्ट में काफी कुछ समेटने की कोशिश की थी, इसलिए मुझे लग रहा था कि मुझे कुछ क्रांतिकारी करने की जरूरत है, ताकि मैं इसे ज्यादा बड़ा कलेवर दे सकूं. 

इंग्लैंड में मैंने एक टाइपिंग एजेंसी का विज्ञापन देखा था. मुझे  एहसास था कि अगर आप प्रकाशक पर सचमुच प्रभाव जमाना चाहते हैं, तो आपको अपनी पांडुलिपी टाइप कराके भेजनी चाहिए. मैंने अपने हाथ से लिखी उपन्यास पांडुलिपि, जो उसकी एकमात्र पांडुलिपी थी, नाइजीरिया से लंदन पार्सल कर दी. उन्होंने जवाब भेजा कि पांडुलिपी की टाइपिंग के लिए प्रत्येक कॉपी के हिसाब से 32 पाउंड लगेंगे. मैंने ब्रिटिश पोस्टल आॅर्डर से यह रकम भेज दी. इसके बाद महीनों गुजर गये, लेकिन उनकी तरफ से कुछ भी सुनने को नहीं मिला. मैं उन्हें चिट्ठियां लिखता रहा. लिखता रहा. उधर से कोई जवाब नहीं आया. एक शब्द भी नहीं. मैं चिंता में  दुबला और  दुबला और दुबला होता जा रहा था. आखिरकार मैं खुशकिस्मत था. जिस ब्रॉडकास्टिंग हाउस में मैं काम करता था, उसमें मेरे बॉस छुट्टियों में  लंदन जा रहे थे. उन्हें मैंने इसके बारे में बताया. आखिरकार लंदन में उनकी कोशिशों के बाद मुझे थिंग्स फॉल अपार्ट की टाइप की हुई कॉपी मिली. सिर्फ एक. न कि दो. खैर जब यह वापस लौट कर आयी तब मैंने इसे अपने प्रकाशक हिनेमैन को भेजा. उन्होंने इससे पहले कभी कोई अफ्रीकी उपन्यास नहीं देखा था. उन्हें नहीं पता था कि इस उपन्यास के साथ आखिर करना क्या है! उन्होंने लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स के इकोनॉमिक्स और राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर से इस पर सलाह मांगी. वे हाल ही में नाइजीरिया से लौटे थे. उन्होंने इस उपन्यास के बारे में लिखा था, जो मेरे प्रकाशक के अनुसार किसी उपन्यास पर की गयी सबसे छोटी टिप्पणी थी. "विश्वयुद्ध के बाद का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास". पहले  इस उपन्यास की काफी कम कॉपी छापी गयी थी. ऐसा उन्होंने पहले कभी नहीं किया था. लेकिन यह काफी जल्दी आउट आॅफ प्रिंट हो गया. उपन्यास की कहानी इसी जगह पर रुक जाती अगर प्रकाशक ने इसके पेपरबैक संस्करण को छापने का एक और जुआ नहीं खेला होता. इस तरह  अफ्रीकी राइटर्स सीरीज अस्तित्व में आया. ऐलन हिल को अफ्रीकी साहित्य की खोज के लिए ब्रिटेन में सम्मानित किया गया. 

जारी 

पेरिस रिव्यू में करीब डेढ़ दशक पहले छपे साक्षात्कार का अनुवाद 

23 March 2013

नहीं रहा अफ्रीकी साहित्य का पिता



अफ्रीकी साहित्य के पिता कहे जानेवाले चिनुआ अचेबे के निधन की खबर तीसरी दुनिया के साहित्य में दिलचस्पी रखने वाले हर व्यक्ति को व्यथित कर गयी है। ल्योसा और मार्खेज जैसे लैटिन अमेरिकी साहित्यकारों के साथ अफ्रीका के अचेबे उन साहित्यकारों में शामिल रहे जिन्होंने विश्व साहित्य के नक़्शे पर तीसरी दुनिया की दमदार उपस्थिति दर्ज करायी। तीसरी दुनिया की कहानियों को वैश्विक गल्प का हिस्सा बनाया। वर्ष 1958 में उनके द्वारा लिखा पहला उपन्यास 'थिंग्स फॉल अपार्ट' बेहद लोकप्रिय हुआ था। दुनियाभर में इस उपन्यास की एक करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। पचास से ज्यादा भाषाओं में इस उपन्यास का अनुवाद हुआ है। यह उपन्यास साम्राज्यवाद के चरित्र को सटीक तरीके से सामने लाता है. अचेबे को श्रद्धांजलि  देता हुआ गार्जियन में छपे एलिसन फ्लड के लेख का हिंदी अनुवाद. 




चिनुआ अचेबे  नहीं रहे. वे बयासी साल के थे. नाइजीरिया के उपन्यासकार अचेबे को कई लोग अफ्रीकी साहित्य के पिता की पदवी देते हैं. 

पेंगुइन के प्रकाशन निदेशक सिमोन विंडर ने उनकी मौत के बाद उन्हें बेहद उल्लेखनीय शख्सीयत की संज्ञा देते हुए कहा कि वे महानतम अफ्रीकी साहित्यकार थे. अचेबे के परिवार ने निजता और एकांत का अनुरोध करते हुए ‘सर्वकालिक महान साहित्यिक आवाजों में से एक’ को  श्रद्धांजलि दी. ‘ जो एक प्यारे पति, पिता,  चाचा और दादा भी थे. जिनकी बुद्धिमत्ता और साहस उन सभी के लिए प्रेरणा है, जो उन्हें जानते थे. ’ उपन्यासकार, कवि और निबंधकार-  एचेबे संभवतः सबसे ज्यादा अपने पहले उपन्यास थिंग्स फाॅल अपार्ट के लिए जाने जाते हैं. इग्बो योद्धा ओकोन्कवो और उपनिवेशवादी शासन के दौर की कहानी कहनेवाले इस उपन्यास की दुनियाभर में एक करोड़ से ज्यादा काॅपियां बिक चुकी हैं और इसका प्रकाशन 50 से ज्यादा भाषाओं में हो चुका है. इस उपन्यास में अचेबे पाठक को उस इग्बो गांव में लेकर जाते हैं, जिसमें 19वीं सदी के आखिरी में गोरे लोगों का आगमन हो रहा है. उपन्यास का शीर्षक डब्लु बी यीट्स की कविता की पंक्तियों थिंग्स फाल अपार्ट/ द सेंटर कांट होल्ड...( चीजें चरमरा कर बिखर जाती है...केंद्र ही स्थिर नहीं रह पाता) से लिया गया है ....उपन्यास में ओकोन्कवो का दोस्त ओबिरीका कहता है, ‘‘गोरा आदमी बहुत चालाक है...वह बहुत चुपचाप और शांत तरीके से अपने धर्म के साथ आया था...हम उसकी मूर्खता को देख कर आश्चर्यचकित हुए थे और उसे यहां रहने की इजाजत दे दी. अब उसने हमारे भाइयों को जीत लिया है. हमारा कबीला अब कभी एकता के साथ, भाई-भाई की तरह नहीं रह सकता. ’’ कवयित्री जैकी हे ने अचेबे को अफ्रीकी गल्प का पितामह कहा था. जिसने दूसरों को भी राह दिखाई. साथ में यह भी जोड़ा था कि उन्होंने थिंग्स फाॅल अपार्ट अनगिनत बार पढ़ी है. 

अचेबे को उनके काव्य संग्रह क्रिस्मस इन बियाफ्रा के लिए काॅमनवेल्थ पोएट्री प्राइज से नवाजा गया था. वे अपने उपन्यास एंटहिल्स ऑफ़ सवाना’ के लिए 1987 के बुकर प्राइज फाइनलिस्ट थे. 2007 में उन्हें मैन बुकर इंटरनेशनल प्राइज दिया गया. उस समय ज्यूरी की अध्यक्षता कर रहे एलेन शोवाल्टर ने अचेबे के लिए कहा था, ‘‘ उन्होंने आधुनिक अफ्रीकी उपन्यास की नींव रखी.’’ उनके साथी जज दक्षिण अफ्रीकी नोबेल विजेता नैडीन गाॅर्डीमर ने कहा था, उनके फिक्शन मनोवैज्ञानिक उपन्यास, जॉयसियन चेतना और अनुक्रमों के उत्तर आधुनिक विखंडन का मौलिक संश्लेषण हैं.’’ उनको पढ़ना एक आह््लादकारी अनुभव है..प्रकाशित होना है.’’ 


नेल्सन मंडेला ने अचेबे को अफ्रीका को बाकी दुनिया तक ले कर जाने वाला और ऐसा लेखक कहा है, जिसके साथ रहते हुए जेल की दीवारें टूट गयी थीं.’’

अचेबे को उनके प्रभावषाली लेख, ‘‘ एन इमेज आॅफ अफ्रीका: रेसिज्म इन कोनाड्र्स हार्ट आॅफ डार्कनेस’’(1975) के लिए भी जाना जाता है. यह कोनार्ड की तीखी आलोचना है.( जोसेफ कोनार्ड ने हार्ट ऑफ़  डार्कनेस नामक उपन्यास अफ्रीका में बर्बर बनाम सभ्यता के विमर्ष पर केंद्रित करके लिखा था)  इस लेख में अचेबे कहते हैं कि कोनार्ड ने अफ्रीकी महादेश को पहचान में आ सकने लायक मानवता के किसी भी चिह्न से खाली एक पराभौतिक युद्धभूमि मे बदल दिया. जिसमें घुमक्कड़ यूरोपियन उसकी उसकी मुष्किलों में दिलचस्पी लेता है.’’ क्या कोई उपहासपूर्ण, बेतुके और घिनौने घमंड को महसूस नहीं कर सकता, जिसमें एक क्षुद्र यूरोपीय दिमाग की संतुष्टि के लिए अफ्रीकियों की भूमिका परजीवी तक सीमित कर दी गयी है! इस लेख को कोनार्ड के की किताब पर सबसे सशक्त और मौलिक हस्तक्षेप माना जाता है, जिसने साहित्यिक पाठ के सामाजिक अध्ययन की शुरुआत की. खासकर इस बात की कि 20वीं सदी की साहित्यिक कल्पना पर सत्ता संबंध का क्या प्रभाव पड़ा?


1930 में नाइजीरिया के ओगिडी में जन्मे अचेबे को यूनिवर्सिटी ऑफ़ इबादान से छात्रवृत्ति मिली. बाद में उन्होंने नाइजीरिया ब्राडकास्टिंग सर्विस के लिए बतौर स्क्रिप्ट राइटर भी काम किया. उन्होंने ‘‘थिंग्स फाल  अपार्ट’’ उपन्यास अंगरेजी में लिखा, जिसके लिए न्गूगी वा थियोंगो समेत कइयों ने उनकी आलोचना की है. लेकिन अचेबे ने कहा है कि ‘‘मुझे लगा कि अंगरेजी भाषा मेरे अफ्रीकी अनुभवों का भार उठाने में कामयाब हो पायेगी. हां मुझे  इस बात का एहसास था कि इसे नयी अंगरेजी होना होगा, जो अफ्रीकी परिवेष में जंचने लायक हो.’’ 

थीम के रूप में नाइजीरिया 

1966 में प्रकाशित हुआ अचेबे का चैथा उपन्यास ‘‘ए मैन ऑफ़ द पीपुल’’ ने उपन्यास के प्रकाशन से ठीक पहले हुए तख्तापलट का का पूर्वानुमान लगाया था.’’ उन्होंने गार्जियन से कहा था, मैंने उपन्यास का अंत एक तख्तापलट से किया था. यह अपने आप में उपहास लायक था. क्योंकि नाइजीरिया इतना बड़ा देश है कि यहां ऐसे तख्तापलट की कोई संभावना नहीं बनती थी. यह उपन्यास के लिए सही था. उसी रात वहां तख्तापलट हो गया.  और हमारे भीतर बची कोई ऐसी आशा कि चीजें ठीक हो जायेंगी, बिखर गयी. वह
ऐसी रात थी, जिससे हम आज तक बाहर नहीं आ पाये हैं. उनकी सबसे हालिया किताब ‘‘ देयर वाज एन कंट्री’’ थी. यह 1967-70 के नाइजीरियाई गृह युद्ध का वृत्तांत है. अचेबे बियाफ्रा राज्य के नाइजीरिया से अलग होने के समर्थक थे. (बियाफ्रा दक्षिण-पूर्वी नाइजीरिया स्वतंत्रता की मांग करनेवाला राज्य था. जिसका अस्तित्व 1967 से 1970 तक बना रहा.) लेकिन 1970 में गृह युद्ध के समाप्त होने के बाद अचेबे ने राजनीति से संन्यास ले लिया. क्योंकि उन्हें लगा कि राजनीति में शामिल ज्यादातर लोग इसमें सिर्फ निजी लाभ के लिए हैं.’’ और खुद को अकादमिक कार्यों के प्रति समर्पित कर दिया. 

1990 में नाइजीरिया में हुई एक कार दुर्घटना के बाद उनके शरीर के कमर से नीचे का हिस्सा  लकवाग्रस्त हो गया. जिसने उन्हें अमेरिका जाने पर विवश कर दिया. लेकिन वह नाइजीरिया को बेतरह याद करते रहे. 
अचेबे ने दो बार नाइजीरिया सरकार की उन्हें कमांडर ऑफ़ फेडरल रिपब्लिक की पदवी देने की पेशकश को ठुकरा दिया था. एक बार 2004 में और दूसरी बार 2011 में. 2004 में उन्होंने लिखा था, ‘ कुछ समय से मैं नाइजीरिया के घटनाक्रमों को काफी भय और हताशा के साथ देख रहा हूं. मैंने खासकर अपने गृह राज्य अनांबरा में व्याप्त अराजकता को देखा है, जहां कुछ आवारों का गिरोह उंचे रसूख के दम पर मेरी मातृभूमि को पूरी तरह दीवालिया और कानून-प्रशासन रहित राज्य बनाने के लिए कृत-संकल्प लिये नजर आता है. मैं इन छुटभैयों के गिरोहों के मनमानेपन और राष्ट्रपति की खामोशी, अगर इसमें उनकी मिलीभगत नहीं है, से  पूरी तरह व्यथित हूं. आपके संरक्षण में आज के नाइजीरिया की स्थिति इतनी खतरनाक है कि खामोश रहना मुमकिन नहीं है...मुझे निश्चित तौर पर अपनी निराशा को दर्ज करना चाहिए और मुझे दिये गये सम्मान को ठुकरा कर अपना विरोध दर्ज करना चाहिए...