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8 March 2013

भोजपुरी में क्यों नहीं बन सकती श्वास!

भोजपुरी सिनेमा के 50 साल 


पिछले महीने २२ फरवरी को भोजपुरी सिनेमा ने अपने सफ़र का पचासवां पडाव पार कर लिया. ऐसे समय में जब 25, 50, 100 उत्सव मनाने का बहाना होता है..बहसों और चर्चाओं को जन्म देने, किताबों के प्रकाशन का मौका होता है, भोजपुरी सिनेमा के आगे लगे 50 वर्ष के तमगे ने भी उसे कम से कम मुख्यधारा की बहस से अलग रखा है. भोजपुरी सिनेमा के सफ़र और इसके पूरे चरित्र को गहराई से देखता हुआ यह लेख वरिष्ठ फिल्म आलोचक विनोद अनुपम ने लिखा है. भोजपुरी सिनेमा पर किसी बहस को आगे बढाने के लिहाज से यह एक प्रस्थान बिंदु हो सकता है. 
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50 वर्ष हो गये जब भोजपुरी सिनेमा ने पहली बार बाजार में दस्तक दी थी. फिल्म से जुडे. लोग मानते हैं कि 22 फरवरी 1963 को पटना के वीणा सिनेमा में पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ.इबो’ का व्यावसायिक प्रदर्शन हुआ था. ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ.इबो’ के रूप में पहली भोजपुरी फिल्म की परिकल्पना 40 के दशक की महान अदाकारा जद्दन बाई ने की थी, जिसे कागज पर उतारा था नाजिर हुसैन ने. कहते हैं इस फिल्म की पटकथा से विमल राय इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने नाजिर साहब से इस फिल्म को हिंदी में बनाने का आग्रह किया. लेकिन नाजिर साहब के लिए भोजपुरी का अपना सिनेमा उनके निजी स्वाभिमान से जुड.ा था. अंतत: भोजपुरी में फिल्म निर्माण का जुआ उठाने के लिए बिहार के उद्योगपति विश्‍वनाथ प्रसाद शाहाबादी तैयार हुए. निर्देशन की जवाबदेही वाराणसी के युवा फिल्मकार कुंदन कुमार को सौंपी गयी. संगीत निर्देशन में बिहार से गये चित्रगुप्त का विकल्प नहीं था. गीत शैलेंद्र ने लिखे थे. 1962 की फरवरी में पटना में फिल्म का मुहूर्त हुआ और लगभग एक वर्ष के बाद पहली भोजपुरी फिल्म बन कर तैयार हुई. बिहार के दर्शकों के लिए परदे पर अपने गांव, समाज, संस्कृति को देखने, अपनी भाषा को सुनने का यह पहला मौका था. फिल्म को बड.ी सफलता मिली. शायद इसी आरंभिक सफलता ने भोजपुरी सिनेमा को समाज के बजाय बाजार के प्रति सचेत भी कर दिया. इसका दबाव आरंभिक दौर में ही दिखने लगा था, लेकिन समय के साथ यह इतना प्रभावी हो गया कि अपने सिनेमा से जुड.ा स्वाभिमान का सवाल कहीं पीछे छूट गया. 

वास्तव में क्षेत्रीय सिनेमा, क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करने की जिद से पैदा होता है. इसीलिए क्षेत्रीय सिनेमा का सरोकार मुख्यधारा के सिनेमा से भित्र धरातल पर होता है. क्षेत्रीय सिनेमा में क्षेत्र की भाषा, संस्कृति, सामाजिक, राजनीतिक, भावनात्मक समस्याओं के अलावा वह सब कुछ होता है, जो प्रदेश की गरिमा को प्रज्‍जवलित कर देने की अपार क्षमता रखता है. आरंभिक दौर में भोजपुरी सिनेमा की प्राथमिकता में सामाजिक विडंबनाएं, सांस्कृतिक सरोकार और संवेदनाएं थीं. हां, इसके साथ सुमधुर लोक संगीत भी था, जिसके लिए कभी लता मंगेशकर भी गौरवान्वित होती थीं. शायद व्यवसाय का दवाब ही था कि असमिया, मलयालम, बांग्ला और छत्तीसगढ.ी सिनेमा की तरह भोजपुरी सिनेमा का विकास अपनी जमीन पर करने की कोशिश ही नहीं हुई. न तो इसका केंद्र पटना बन पाया, न ही गोरखपुर. एक स्वतंत्र आकाश में विकसित होने के बजाय, इसने अपने आपको हिंदी के हिमालय की छांव में सुरक्षित पाया. शुरुआत तकनीशियनों से हुई, बाद में यहां के फिल्मकारों ने भी मुंबई में आशियाने तलाश लिये. कलाकार तो तैयार बैठे ही थे. वे भी मुंबई में बस गये. नतीजा यह हुआ कि 50 वर्ष गुजारने के बाद भी भोजपुरी सिनेमा की कोई स्वतंत्र पहचान न बन सकी, और न ही पहचान पाने की कोई जिद दिख रही है.

आश्‍चर्य नहीं कि मुंबई में ही विकसित मराठी सिनेमा से प्रेरित होने के बजाय भोजपुरी सिनेमा हिंदी की भोंडी नकल कर संतुष्ट होता रहा. इतना ही नहीं हिंदी के सात्रिध्य ने भोजपुरी सिनेमा को भी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय होने की गलत फहमी दे दी. आज भोजपुरी सिनेमा की बात होती है, तो लोग सीधे मॉरीशस, सूरीनाम से शुरुआत करते हैं. बॉक्स ऑफिस की बात आती है, तो हिंदी की तरह पंजाब, महाराष्ट्र, बंगाल, गुजरात के सर्किट की चर्चा होती है. कुल मिलाकर भ्रम यह फैलाया जाता है कि इसका बाजार भले ही अभी हिंदी के बराबर न हो, लेकिन होना जरूर चाहिए. 
यह गलतफहमी जहां से भी खड़ी की गयी हो, भोजपुरी सिनेमा के लिए सबसे नुकसानदायक रही. इस गलतफहमी ने भोजपुरी सिनेमा को कभी भी अपने बाजार का सही आकलन नहीं करने दिया. भोजपुरी फिल्मों का भी निश्‍चित बाजार बिहार और उत्तर प्रदेश तक ही सीमित था. लेकिन बाकी के सर्किटों को अपने बाजार में शामिल करने के लोभ में इसने भोजपुरी संस्कृति से तौबा करने की शुरुआत कर दी. जिसकी इंतहा दिखने लगी ‘लावारिस’,‘खून पसीना’, ‘विदाई’, ‘दिवाना’, ‘एक और फौलाद’, ‘चाचा भतीजा’,‘शिवा’ जैसे टाइटिलों में, जिसे देखकर यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि ये हिंदी फिल्में हैं या भोजपुरी. पोस्टरों पर नायक जींस में और नायिका को शॉर्ट स्कर्ट में देख भला कौन मानना चाहेगा की यह भोजपुरी फिल्में हैं. 




जाहिर है अपनी पहचान से तौबा करने के बाद भोजपुरी सिनेमा को मिली सफलता ने हिंदी के थके हारे फिल्मकारों को सफलता की नयी राह दिखायी और बड.ी संख्या में ऐसे फिल्मकार छोटी-बड.ी पूंजी के साथ भोजपुरी फिल्म निर्माण में कूद गये, जिन्हें भोजपुरी की कोई समझ थी ही नहीं. इन फिल्मकारों में अमिताभ बच्चन के मेकअप मैन दीपक सावंत से लेकर ‘सफलता के लिए कुछ भी करेगा’ को संकल्पित एकता कपूर तक के नाम लिए जा सकते हैं. यहां तक कि दिलीप कुमार साहब भी बहती गंगा में हाथ धोने से नहीं चूके और उन्होंने भी भोजपुरी को एक सबसे अश्लील फिल्म का तोहफा दे डाला. बाजार की गरमाहट महसूस हुई, तो दक्षिण भारतीय फिल्मकार भी नहीं चूके. उन्होंने भी भोजपुरी सिनेमा में समुद्र तट के किनारे बिकनी में नायिका को दौड.ाने के अभिनव प्रयोग तक कर डाले. 

मुश्किल तब हुई जब तात्कालिक सफलता से उत्साहित ऐसे ही फिल्मकारों का भोजपुरी सिनेमा में एकक्षत्र साम्राज्य कायम हो गया. जाहिर है भोजपुरी सिनेमा के पारिवारिक और पारंपरिक दर्शक तो इस नये दौर में उसका साथ नहीं दे सके, जिन नये दर्शकों ने शुरुआती समय में उनकी हौसलाआफजायी की थी. जैसे ही ‘दबंग’ जैसा विकल्प उनके सामने आया, करवट लेने में जरा भी देर नहीं की. मुश्किल यह है कि जब भी भोजपुरी सिनेमा को उसकी वास्तविकता की याद दिलायी जाती है, आप उसके दुश्मन में शुमार कर लिये जाते हैं. आश्‍चर्य नहीं कि बीते दस वर्षों में या कहें पचास वर्षों में भोजपुरी दर्शकों के सामने कभी कोई चयन की सुविधा नहीं रही. हमेशा से ही एक ही तरीके से, कमोवेश एक ही पृष्ठभूमि पर, एक ही विषय पर फिल्में बनती भी रहीं. बीते पचास वर्षों में प्रयोग के नाम पर देखें, तो भोजपुरी सिनेमा में एक अद्भुत सत्राटा दिखता है. यह शायद इसलिए कि भोजपुरी सिनेमा भोजपुरी के लिए बनता ही नहीं, बनता है सिर्फ बाजार के लिए. जबकि इसके बरक्स मलयालम फिल्मों में देखें तो एक तरफ अश्लीलता की बाढ. है, तो अडूर गोपालकृष्णन भी हैं. बांग्ला में बाजार के लिए फिल्में हैं, तो गौतम घोष भी हैं. मराठी में फूहड. हास्य है तो ‘श्‍वास’ भी है. भोजपुरी में ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा? शायद इसलिए कि क्षेत्रीय सिनेमा की तरह इसके प्रति हमने लगाव ही महसूस नहीं किया. भोजपुरी सिनेमा को इस नियति तक पहुंचाने में जहां भोजपुरी के सितारों और फिल्मकारों की मुख्य भूमिका रही, वहीं भोजपुरी के बुद्धिजीवी और विचारक भी इस अपराध से बरी नहीं हो सकते. इन 50 वर्षों की भोजपुरी सिनेमा की यात्रा में इस तबके की भूमिका एकदम शून्य रही. सिर्फ भोजपुरी सिनेमा की अश्लीलता पर हम स्यापा करते रहे. अपने आप को हस्तक्षेप के लिए आगे नहीं ला सके. जाहिर है आज भोजपुरी सिनेमा के लिए हमारी सारी चिंताएं बेमानी लगने लगती हैं. 

लेकिन यही प्रस्थान बिंदू भी बन सकता है. अपने व्यावसायिक शुरुआत के 50वें वर्ष में भोजपुरी सिनेमा चर्चा में है. जरूरत है ‘अरण्य रोदन’ से आगे बढ.कर अपनी जवाबदेही को स्वीकार करने और अपने आप को हस्तक्षेप के लिए प्रस्तुत करने की. यह तो तय है भोजपुरी समाज का अपना सिनेमा यदि कोई हो सकता है, तो वह भोजपुरी सिनेमा ही है. चाहे जैसा भी हो. आज जरूरत 50 वर्ष के इस बालक को स्वीकार करने की है, रिजेक्ट करने की नहीं. बडे. बजट और काल्पनिक बाजार का भ्रम छोड.कर छोटे बजट में नये प्रयोगधर्मी भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत हो सकती है. जाहिर है इसके लिए बजट का बड़ा हिस्सा सितारों के बजाय हमें शोध और पटकथा पर खर्च करना होगा. कैमरे और संपादन पर खर्च करना होगा. लाइट्स और संगीत का इस्तेमाल सीखना होगा. ‘पीपली लाइव’ और ‘वेलडन अब्बा’ आखिर भोजपुरी में क्यों नहीं बन सकती? ‘श्‍वास’ भोजपुरी में क्यों नहीं बन सकती. खासकर तब जब हमारे पास चैता के सुर भी हैं और भिखारी ठाकुर की समझ भी.


विनोद अनुपम राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं . यह लेख उन्होंने मूलतः प्रभात खबर के लिए लिखा था.