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9 November 2014

पैट्रिक मोदियानो: स्मृति का संरक्षक


साहित्य के लिए २०१४ के नोबेल पुरस्कार विजेता पैट्रिक मोदियानो ऐतिहासिक ज्ञान की भंगुरता को पाठक के सामने लाते हैं। वे पाठक की राष्ट्रीयता पर ध्यान दिये बगैर, उसे बताते हैं कि निजी और सामूहिक दोनों ही पहचान वाष्पशील होती हैं और भले ही अतीत हमारे हाथों की पकड़ में न आये, लेकिन वह हमारे वर्तमान का  निर्धारण करता है। पैट्रिक मोदियानो को समझने के क्रम में मूल रूप से पाखी  के ताजा अंक के लिए लिखे गए लेख को आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं
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‘‘भूलने की क्षमता रखनेवाले लोग खुशनसीब होते हैं, क्योंकि वे अपनी गलतियों से भी आसानी से उबर जाते हैं।’’
. -फ्रेडरिक नीत्शे

पैट्रिक मोदियानो 
भूलना एक सुविधावादी कर्म है। जेन आॅस्टन ने अपनी किताब ‘परसुएशन’ में लिखा है, ‘जब  दर्द बीत जाता है, तब उसे याद करना सुख देता है।’  लेकिन क्या हो अगर गलती व्यक्ति की नहीं, इतिहास की हो? क्या हो अगर इतिहास, चेतना की किसी दरार में आकर फंस जाए? अतीत को पोंछ कर मिटा देना, जीने के लिए जरूरी है, लेकिन यह हमेशा मुमकिन नहीं होता। कुछ लोग, कुछ पीढि़यां, कुछ समुदाय अतीतग्रस्त होते हैं। अतीत उनके सामने बीता हुआ कल नहीं होता, बल्कि हर लम्हा साथ चलता है। सीने पर रखे किसी बोझ की तरह, जिससे कोई निजात नहीं है। जिसके साथ जीना, अनिवार्यता है। मजबूरी है। इतिहास और स्मृति के साथ कुछ ऐसा ही रिश्ता है 2014 के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार से नवाजे गये फ्रेंच उपन्यासकार पैट्रिक मोदियानो का।

फ्रेंच उपन्यासकार पैट्रिक मोदियानो को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा वैश्विक साहित्यिक जगत के लिए चकित कर देनेवाली खबर थी। यह बात दीगर है कि पुरस्कार घोषणा से चैबीस घंटे पहले अचानक नोबेल पुरस्कारों के सट्टा बाजार में मोदियानो का भाव बढ़ गया था और पुरस्कार जीतने की उनकी संभावना को लेकर अटकलें तेज हो गयी थीं। इसके बावजूद ‘फेवरिट’ के तौर पर केन्याई लेखक न्गुगी वा थियोंग’ओ और जापानी लेखक हारुकी मुरुकामी का नाम सूची में आखिरी समय तक सबसे ऊपर बताया जा रहा था। थियोंग’ओ पिछले कुछ वर्षों से पुरस्कार की दौड़ में आगे माने जाते रहे हैं, लेकिन एक बार फिर जब विजेता के नाम की घोषणा हुई, तब उनके नाम की जगह साहित्य बिरादरी के लिए लगभग अनजान रहे पैट्रिक मोदियानो का नाम दुनिया ने सुना।

नोबेल पुरस्कार समिति ने मोदियानो को पुरस्कार देने की घोषणा इस प्रशस्ति के साथ की ‘‘फाॅर द आर्ट आॅफ मेमोरी, विद विच ही हैज इवोक्ड द मोस्ट अनग्रास्पेबल ह्यूमन डेस्टिनीज एंड अनकवर्ड द लाइफ वल्र्ड आॅफ आॅकुपेशन’’ इसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह किया जा सकत है, ‘‘ स्मृति की कला के लिए, जिसके सहारे उन्होंने व्याख्याओं से परे इंसानी नियतियों की कथा कही है, और (नाजी) अधिग्रहण के दौर की दुनिया को पूरी जीवंतता के साथ उजागर किया है।’’

यह पहली बार नहीं है, जब नोबेल अकादमी ने व्यापक साहित्यिक बिरादरी के लिए लगभग अनजान रहे एक लेखक को पुरस्कार से नवाजा है। पिछले दो वर्षों की ही बात करें, तो चीनी लेखक ‘मो यान’ और कनाडाई लेखिका ‘एलिस मुनरो’ को नोबेल पुरस्कार से नवाजने की घोषणा के बाद भी कुछ इसी तरह की आश्चर्यमिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं। बहरहाल, हमारे पास मोदियानो को समझने के लिए जो सामग्री मौजूद है, वह कुछ अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं और नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद उन पर प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों में बिखरी है।  मोदियानों ने अब तक 25 से ज्यादा उपन्यास लिखे हैं, लेकिन इनमें से गिने-चुने उपन्यासों का ही अंगरेजी में अनुवाद हुआ है। एक तथ्य यह भी है कि नोबेल पुरस्कार मिलने के वक्त मोदियानो के उपन्यासों के अंगरेजी अनुवाद दुकानों में उपलब्ध नहीं थे। इनमें से ज्यादादर ‘आउट आॅफ प्रिंट’ हैं। ऐसे में मोदियानो पर कोई भी लेखन सेकेंडरी सोर्सेज पर ही आधारित हो सकता है और कुछ हद तक आॅनलाइन दुकानों पर उपलब्ध ‘सर्च वारंट’ (मूल रूप से फ्रांसीसी में ‘दोरा ब्रुदेर’ शीर्षक से प्रकाशित) जैसी ई-बुक के आधार पर। तो, फिलहाल हमारे सामने सवाल यह है कि पैट्रिक मोदियानो को अकादमिक-साहित्यिक जगत किस तरह से देखता है, उनके लेखन के बारे में कैसी राय रखता है? पिछले तीन-चार दशकों में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, जर्नलों तथा किताबों में मोदियानो के रचनाकर्म पर लेखकों की टिप्पणियां उनके बारे में क्या कुछ बताती हैं? इसके साथ ही संक्षिप्त साक्षात्कारों, अपनी आत्मकथात्मक उपन्यासों और अपनी आत्मकथा ‘अन पेडिग्री’ में मोदियानो ने अपने जीवन और अपने लेखन के बारे जो कुछ कहा है, उसके सहारे भी उनक लेखन जगत को जानने की कोशिश की जा सकती है।

पैट्रिक मोदियानो का लेखन उनकी यहूदी पहचान के साथ गुत्थमगुत्था है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान फ्रांस पर नाजी कब्जे (1940-44) के ठीक बाद जन्मे मोदियानो का लेखन, दार्शनिक शब्दावली में कहें, तो ‘व्हू आई एम’, यानी ‘मैं कौन हूं’ के सवाल के जवाब की तनाव भरी अंतहीन खोज है। मोदियानो के ज्यादातर उपन्यास ‘पहचान’ की भूल-भूलैया में विचरण करते हैं। उनका मूल मकसद इतिहास के तहखाने छिपे चिह्नों के सहारे अपने अस्तित्व, अपने ‘होने’ का प्रमाण हासिल करना है। मोदियानो इतिहास के जिस खंड की यात्रा करते हैं, वह मूलतः फ्रांस के यहूदियों के जीवन के बिखरने का और यहूदियों के साथ फ्रांस के विद्वेषपूर्ण और गैर-दोस्ताना व्यवहार का इतिहास है। उनके उपन्यासों का लोकेल मुख्यतः पेरिस की गलियां और रास्ते हैं, और वक्त है फ्रांस पर नाजी कब्जे का। उनके उपन्यासों में पेरिस की गलियों के नाम, कैफे, छोटे-छोटे वाकये, इतनी प्रामाणिकता के साथ आते हैं कि उन्हें ‘साहित्यक पुरातत्वशास्त्री’ कहा जाने लगा है। ऐसा इसलिए, क्योकि मोदियानो की कलम जमींदोज हो गये इतिहास के उत्खनन का काम करती है।

फ्रांस के इतिहास के उस शर्मसार कर देनेवाले दौर में ‘क्या हुआ’, की तफ्तीश, मोदियानो के लेखन का केंद्रीय तत्व है। मोदियानो हमें इतिहास के उस दौर में ले ले जाते हैं, जिसे ‘शिफ्ट-डिलीट’ मार कर मिटाने, गुमशुदगी के बियाबान में धकेलने की तमाम कोशिशें की गयी हैं। मोदियानो के साहित्यिक परिदृश्य पर आगमन से पहले एक देश के तौर पर फ्रांस इन चार वर्षों को स्वीकारने, उससे नजरें मिलाने के लिए शायद ही तैयार था। फ्रांस को सामूहिक विस्मृति का पाठ पढ़ाया जा रहा था। विस्मृति, इसलिए ताकि किसी अपराधबोध के बिना जिया जा सके। पैट्रिक मोदियानो का लेखन इतिहास और स्मृति की पुनर्खोज, पुनर्संधान और उस इतिहास में अपना अंश खोजने का सतत उपक्रम है।

पैट्रिक मोदियानो के उपन्यास फ्रेंच इतिहास और स्मृति के एक बेहद तनाव भरे दौर के बारे में, जिसे फ्रांस की ‘एकल पहचान’, ‘एकल भाषा’, ‘एकल संस्कृति’ के चादर के भीतर ढकने की पूरी परियोजना विश्वयुद्धोत्तर काल में चली, को लेकर असहज करने वाले सवाल पूछते हैं। मोदियानो फ्रेंच होने के गौरव को कटघरे में खड़ा करते हैं। उसके वर्तमान को इतिहास के सवालों से समस्याग्रस्त करते हैं। यूरोप में आज की तारीख में ऐसे लेखक बहुत कम हैं, जो आधुनिक यहूदी इतिहास से इस तरह आक्रांत, इस तरह ग्रस्त हंै। ‘दोरा ब्रुदेर, जिसमें उन्होंने पोलैंड के आस्विट्ज कैंप में भेजी गयी एक युवा लड़की की पहचान तलाशने, उसकी तस्वीर उकेरने की कोशिश की गयी है, समेत उनके तमाम उपन्यास द्वितीय विश्वयुद्ध कालीन फ्रांस की परिस्थितियों से बेहद गहराई से प्रभावित हैं।

मोदियानो ने एक साक्षात्कार में कहा था कि उनकी स्मृति, उनके जन्म से पहले शुरू होती है। यह अर्जित की गयी स्मृति है। मोदियानो अपने लेखन में इस स्मृति को पुनर्जीवित करने की कोशिश नहीं करते, बल्कि हाथ से फिसल गये, लेकिन आत्मा से गुंथे हुए अतीत को सामने लाकर उससे मुक्त होना चाहते हैं। ‘ला फिगोरो’ को दिये गये एक साक्षात्कार में मोदियानो कहा था, ‘‘लंबे समय से मुझे एक ही सपना बार-बार आता रहा है। मैं स्वप्न देखता हूं, कि मुझे अब लिखने की जरूरत नहीं है, कि मैं मुक्त (स्मृति से) हो गया हूं। लेकिन मैं, मुक्त नहीं होता। मुझे हमेशा लगता है कि मैं एक ही जमीन को बार-बार साफ कर रहा हूं और यह यह काम कभी समाप्त नहीं होता।’’ 2011 में फ्रांस टुडे को दिये गये एक साक्षात्कार में मोदियानो ने कहा था, ‘‘ अपने हर उपन्यास के बाद मुझे लगता है कि मैंने अपने बोझ को हटा दिया है, लेकिन मुझे यह मालूम होता है कि मैं बार-बार इस ओर (इस समय, इस इतिहास में) आऊंगा। उन छोटे-छोटे नामालूम से ब्यौरों से जूझूंगा, जो मेरे होने का हिस्सा है। आखिरकार हम सब की  नियति उस समय और जगह से जुड़ी होती है, जिसमें हम जन्मे होते हैं। मोदियानो ने एक से अधिक बार यह स्वीकार किया है कि लगभग पचास वर्षों के अपने लेखन कॅरियर में वे एक ही किताब लिख रहे हैं। दिलचस्प यह है कि हर किताब अधूरी है, ठीक उसी तरह जिस तरह से उनके उपन्यासों के मुख्य पात्रों की खोज हमेशा अधूरी रहती है। जाहिर है, मोदियानो के लिए लेखन बौद्धिक शगल नहीं है, बल्कि भावनात्मक अनिवार्यता है। मोदियानो का कहना है, लेखन उनके लिए कत्तई आनंदित होने का जरिया नहीं है, बल्कि एक बोझ है, जिससे वे खुद को मुक्त नहीं कर सकते; जिसे साथ-साथ ढोते जाना उनकी मजबूरी है। उन्होंने इसकी तुलना कोहरे में यात्रा करने से की है, जब व्यक्ति को यह नहीं मालूम होता है कि वह कहां जा रहा है, लेकिन फिर भी वह यात्रा को रोकता नहीं है।

‘फ्रांस टुडे’ को दिये साक्षात्कार में मोदियानो ने अपने साहित्यिक कॅरियर के बारे में कहा था कि दअरसल उन्होंने कुछ और करने के बारे में नहीं सोचा- ‘मेरे पास कोई डिप्लोमा नहीं था। हासिल करने के लिए कोई निश्चित लक्ष्य नहीं था। लेकिन एक युवा लेखक के लिए इतनी कम उम्र में लिखना शुरू करना काफी कठिन होता है।’ मोदियानो कहते हैं कि वे अपने शुरुआती उपन्यासों को पढ़ने से बचते हैं, करण यह नहीं है कि वे उन्हें अब पसंद नहीं करते। बल्कि इस कारण से कि वे उनसे अपना रिश्ता ठीक-ठीक जोड़ नहीं पाते। शायद इसकी वजह यह भी है कि मोदियानो अपने उपन्यासों के द्वारा एक ऐसी दुनिया नहीं रचते, जिसे वे साथ लेकर चलना चाहें, बल्कि एक ऐसी दुनिया का सामना करते हैं, उसे उद्घाटित करते हैं, जिससे वे मुक्त होना चाहते हैं।

मोदियानो के लेखन का स्रोत, उसका कच्चा माल फ्रांस के नाजी अधिग्रहण के दौर में एक यहूदी पिता की संतान के तौर पर बीते उनके बचपन की जटिल जीवन-परिस्थितियों में छिपा है। हालांकि, लंबे समय तक मोदियानो अपने जन्म की तारीख 1947 में बताते रहे, लेकिन बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि उनका जन्म असल में 1945 में हुआ था। ऐसा संभवतः उन्होंने अपने लेखन के स्रोत से दूरी प्रदर्शित करने की मंशा से से किया हो। जाहिर है, होलोकाॅस्ट के अत्याचार के दौर में मानवता के खिलाफ अपराध करनेवालों से मिलीभगत रखनेवाले व्यक्ति का बेटा होने की सच्चाई ने गहरे स्तर पर मोदियानो में ‘पहचान’ का संकट पैदा किया। यह पहचान का संकट, वह पहचान जिसे लेकर वे चल नहीं सकते, मगर जिसे अपने कंधे से उतार फेंकना भी उनके वश में नहीं, ही मोदियानो के लेखन का मूल बीज रहा है। नाजी कब्जे के ठीक बाद जन्मे इस व्यक्ति के लेखकीय सफर में उनका बचपन हमेशा एक ‘रिमाइंडर’ की तरह उनसे टकराता है। जो उनके ‘होने’ को एक खास दिशा देता है। यह होना, होने और न होेने के बीच में है। यह खुद को जानने और खुद को न जानने के बीच की दशा है।

पैट्रिक मोदियानो का जन्म एक सेफार्डिक यहूदी परिवार में हुआ था। उनके पिता इटली मूल के एक यहूदी थे। उनकी मां एक बेल्जियन अदाकारा थीं। अपनी मां के बारे में मोदियानो ने भावुकता के बिना लिखा है और उन्हें बिल्कुल शुष्क हृदय की औरत बतलाया है। मोदियानो के माता-पिता की मुलाकात द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अधिगृहीत पेरिस में हुई। मोदियानो के पिता ने यहूदियों की पहचान करानेवाले पीले सितारे को पहनने से इनकार कर दिया और किसी तरह से यहूदी शिनाख्तगी से और इस तरह बाकी अभागे यहूदियों की तरह नाजी सेना द्वारा कांसन्ट्रेशन कैंप भेजे जाने से बच गये थे। उन्होंने युद्ध के दौर में काला बाजारी की। कहा जाता है कि उनका ‘गेस्टापो’ के साथ संबंध रहा। ‘गेस्टापो’ नाजी कब्जे वाले यूरोप की खुफिया और बदनाम पुलिस सेवा थी। उनके अपराधी तत्वों के साथ भी संबंध रहे। मोदियानो एक साक्षात्कार में कहा था, ‘‘वे नाजी कब्जे के गोबरटीले के उत्पाद हैं। यह एक ऐसा बेहूदा-विचित्र दौर था, जब दो ऐसे लोग आपस में मिले, जिन्हें कभी नहीं मिलना चाहिए था, और दुर्घटना के तौर पर उनकी एक संतान हुई। ’’

मोदियानो का बचपन एक अराजक माहौल में बीता। सबसे पहले उनका लालन-पालन उनके नाना-नानी ने किया। सरकारी अनुदान की मदद से ही वे सेकंडरी शिक्षा हासिल कर सके। उनके पिता अक्सर नदारद रहते थे और मां यात्राओं पर। इस दौर में ही वे अपने भाई रुडी के नजदीक आये, जिसकी मृत्यु दस साल की उम्र में ल्यूकेमिया से हो गयी। मोदियानो ने अपने शुरुआती लेखन को अपने भाई को समर्पित किया है। समय की मार मोदियानो पर कैसी पड़ी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब मोदियानो ने अपने संस्मरण की किताब ‘अन-पेडिग्री‘/माई पेडिग्री’ लिखी, तब उन्होंने कहा था, ‘‘यह किताब इस बारे में नहीं है कि मैंने क्या किया, बल्कि इस बारे में है कि दूसरों ने खासकर मेरे अभिभावकों ने मेरे साथ क्या किया?’’ अपने माता-पिता के साथ मोदियानो के संबंध सामान्य नहीं रहे। अल्जीरियाई युद्ध के दौरान मोदियानो पेरिस में फंस गये थे। जब उन्होंने अपने पिता से थोड़े  पैसे मांगे, तो उनके पिता ने पुलिस बुला ली थी। अपने गणित के शिक्षक रेमंड क्यून्यू के संपर्क में आने के बाद मोदियानो लेखन की ओर मुखातिब हुए। जब उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजियों की मदद करनेवाले एक यहूदी के बारे में लिखा, तो उनके पिता इस बात से इतने नाराज हुए कि उन्होंने बाजार में उपलब्ध सारी प्रतियां खरीदने की कोशिश की।

यह अकारण नहीं है कि मोदियानो बार-बार अतीत के दुर्निवार आकर्षण के बिंधे चले आते हैं। उनके लेखन में उनका, उनके समुदाय का और उनके देश का अतीत, गहरे तक जड़ जमा कर बैठा है। यहां गायब हो जाने का खतरा है। नैतिक सीमाएं धुंधलाई हुई सी हैं। और यह लेखकीय भाव आयातित या साधारणीकृत नहीं है। मोदियानो ने एक साक्षात्कार में खुद कहा था, ‘‘यह स्वाभाविक है, क्योंकि यह मेरे जीवन का हिस्सा है।’’ उनके मुताबिक, ‘‘वैसे तमाम लोगों की तरह जिनके पास, अपनी जमीन या जड़ नहीं होती है, मैं भी अपने प्राक् इतिहास से ग्रस्त हूं। मेरा यह प्राक् इतिहास अधिग्रहण का भ्रष्ट और शर्मनाक दौर है। मुझे हमेशा लगा कि मैं इस दुःस्वप्न की पैदावार हूं।’’

मोदियानो के पास अपना विशिष्ट परिवेश है, जो पेरिस की सड़कों-गलियों से बना है। उनके पात्र छू लेने भर की दूरी पर नहीं, बल्कि थोड़े दूर खड़े होते हैं। यहां स्मृतियां साफ और स्पष्ट नहीं हैं, बल्कि धुंधलायी हुई सी हैं। यहां पीले पड़ चुके अखबारों की कतरनें और उनसे झांकती खबरें हैं, जो नापे न जा सकने वाली इतिहास की दूरी से हम तक आती हैं। ये तत्व मिलकर उनके उपन्यासों के इर्द-गिर्द एक रहस्यमयी लोक रचते हैं। उनके उपन्यास आपको सम्मोहित करते हैं और उनका जादू समय बीतने के साथ सर चढ़ कर बोलने लगता है, अपने टुकड़े-टुकड़े मधुर तान से आपकी चेतना पर दस्तक देता रहता है। इन उपन्यासों में यहां-वहां एक झिझक है, झूठे संकेत हैं, भ्रम हैं, जो लेखकों को विभिन्न घटनाओं को साथ मिलाने को कहते हैं। इनमें से कुछ घटनाएं वर्णित होती हैं, कुछ घटनाएं ऐसी भी होती हैं, जिन्हें लेखक पाठक से छिपा लेता है। मोदियानो ने रहस्यमयी चीजों के प्रति अपने प्रेम को स्वीकार भी किया है। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, ‘चीजें, जितनी छिपी हुई और रहस्यमयी होती हैं, मुझमें उतनी ज्यादा उत्सुकता जगाती हैं। मैं उन चीजों में भी रहस्य खोजने की कोशिश करता हूं, जिनमें रहस्य जैसा कुछ नहीं होता।’’ एक लेखक के तौर पर फ्रांस में व्यापक प्रसिद्धि और सम्मान पाने के बावजूद मोदियानो मीडिया और पब्लिसिटी से दूर रहे हैं। वे अपने उपन्यासों की तरह ही अपने पाठकों के लिए एक रहस्यमयी व्यक्तित्व की तरह हैं। इसने फ्रांस में एक खास शब्द ‘मोदियानेस्क’ को जन्म दिया है, जिसका अर्थ होता है, एक रहस्मय व्यक्ति या स्थिति।

लेखक के तौर पर मोदियानो का सफर 1968 में शुरू होता है। ‘बाॅस्टन पोस्ट’ के लिए राॅबर्ट जेरित्स्की ने लिखा है, ‘‘1968 को फ्रांस में ‘छात्र क्रांति’ के वर्ष के तौर पर याद किया जाता है। इस छात्र क्रांति ने फ्रांस में काफी कुछ बदला। युद्ध के बाद जन्मी पीढ़ी ने युद्ध के दौरान फ्रांस में जो कुछ हुआ, उसको लेकर अपने अभिभावकों द्वारा ओढ़ ली गयी चुप्पी को चुनौती दी। मोदियानो ने इस विद्रोह को ‘ला प्लास दिताॅयल’(1968) के पन्नों पर जिया है। इसमें युद्ध काल में फ्रांस में मौजूद यहूदी विरोधी भावना पर तीखा व्यंग्य है। इस उपन्यास के बाद रातों-रात फ्रांस को नाजियों के साथ समझौता करनेवाले एक देश के तौर पर अपनी पहचान से सामना करने की जरूरत आन पड़ी।’’

‘ला प्लास दिताॅयल’ जर्मन कब्जे के दौर और उसकी विरासत की कहानी को फिक्शन और यथार्थ से मिलाता है। तब से लेकर हर दो साल में उनका एक उपन्यास आता रहा है। वे खुद स्वीकार करते हैं कि उनका हर उपन्यास स्मृति, पहचान, अनुपस्थिति और क्षति की स्थायी थीम पर थोड़े से रद्दोबदल के साथ लिखा गया है। पहली नजर में लगता है कि ये उपन्यास जासूसी उपन्यासों से प्रभावित हैं, लेकिन मोदियानो के लेखन को गौर से और शुरू से देखने पर यह आसानी से मालूम चलता है कि मोदियानो ने लेखन की अपनी ही दुनिया बनायी है।

‘ला प्लास दिताॅयल‘ जिसका अंगरेजी में शाब्दिक अनुवाद ‘स्टार्स प्लेस’ है (यहां स्टार का संबंध उस पीले सितारे से है, जिसे हर यहूदी को अपनी पहचान बताने के लिए नाजी कब्जे के दौर में पहनना पड़ता था ), फ्रांस में नाजियों के साथ सांठ-गांठ करनेवाले विची के शासनकाल के बारे में बताता है, जो प्रतिक्रियावादी और यहूदी विरोधी था। ओरा अवनी, ने ‘येल फ्रेंच स्टडीज’ (अंक-85) में लिखे अपने लेख ‘पैट्रिक मोदियानो: अ फ्रेंच ज्यू’ में लिखा था, ‘‘यह उपन्यास हमारे समय के सबसे विवादग्रस्त सामूहिक पहचान, यानी यहूदी पहचान के मुश्किल सवाल से टकराता है... इस उपन्यास में आत्मभ्रम पैदा करनेवाली स्मृतियों के सहारे उस फ्रांस को जीवंत किया गया है, जिसके मन में यहूदियों के प्रति स्वाभाविक नफरत है, जो यहूदियों को ‘वास्तविक फ्रांस’ में मिलावट करनेवाला, उसे भ्रष्ट करनेवाला मानता है।’’ यह कोई रहस्य नहीं है कि फ्रांस में यहूदियों के प्रति वैमनस्य का इतिहास पुराना है और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यह चरम पर पहुंच गया था। फ्रेंच लोग यहूदियों को विदेशी मानते रहे हैं। फ्रांस का इतिहास ही नहीं, वहां का साहित्य भी यहूदियों को विदेशियों के तौर पर दिखाता रहा है। यह विरोध-भावना नयी नहीं है, नया है यहूदी पहचान के सहारे दिक्-काल का सफर। लेकिन, मार्शल प्रुस्त की तरह मोदियानो समय को पुनः हासिल करने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उसे तरलीकृत करके उसकी विरासत को वाष्पित कर देना चाहते हैं। वैसे यह अतीत उतना एब्सट्रैक्ट या गूढ़ नहीं है। प्रुस्त के लिए अतीत व्यक्तिगत है, जबकि मोदियानो के लिए यह अतीत अनिवार्य रूप से सामूहिक है।

मोदियानो ऐतिहासिक ज्ञान की भंगुरता को पाठक के सामने लाते हैं। वे पाठक की राष्ट्रीयता पर ध्यान दिये बगैर, उसे बताते हैं कि निजी और सामूहिक दोनों ही पहचान वाष्पशील होती हैं और भले ही अतीत हमारे हाथों की पकड़ में न आये, लेकिन वह हमारे वर्तमान को निर्धारण करता है। मोदियानो की नजरों में इतिहास हमेशा अधूरा और कच्चा होता है। यानी वे इतिहास की परिवर्तनशीलता में यकीन करते हैं। वे मानते हैं कि जो इतिहास हमें दिया गया है, जरूरी नहीं है कि वह मुकम्मल हो, पूर्वाग्रहों से मुक्त हो।

मोदियानो का मन इतिहास में रमता है। इतिहास को वे एक जासूस की तरह खोजते हैं। जिग्सा पजल के टुकड़ों को जोड़ते हुए वे एक खोई हुई तस्वीर को फिर से हासिल करना चाहते हैं। लेकिन, यह प्रक्रिया किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती। अंत में हाथ में जो कुछ आता है, उसका कोई ठोस रूप-रंग-आकार नहीं होता। मोदियानो के उपन्यास ‘मिसिंग पर्सन’ की कहानी इतिहास की तंग ही नहीं, अक्सर बंद गलियों में मोदियानो की यात्रा का दिलचस्प उदाहरण है। 1978 में प्रतिष्ठित गाॅनकोर्ट प्राइज से सम्मानित की गयी इस कृति में मिसिंग पर्सन यानी गुमशुदा व्यक्ति एक जासूस है। वह इस उपन्यास का मुख्य पात्र भी है। जासूस बनने से पहले की जिंदगी के बारे में उसे कुछ भी याद नहीं। उसे अपना नाम और राष्ट्रीयता तक का पता नहीं। आखिरकार वह अपनी विस्मृत जिंदगी का सुराग ढूंढ़ने की ठानता है। उपन्यास के मुख्य नायक रोलां के लिए संकट का क्षण, जब उसका अतीत उससे छिन गया था, फ्रांस पर नाजी कब्जे का दौर है। वह छोटे-छोटे सुरागों के सहारे अपने अतीत की फिर से रचना करना चाहता है। लेकिन कोई मुकम्मल तस्वीर नहीं बनती। यह एक दिलचस्प रहस्य कहानी है, जिसमें एक ही व्यक्ति ‘विक्टिम’ भी है, मुद्दई भी है, जासूस भी है और गवाह भी। अंत में रोलां की यह यात्रा ऐसे जगह पर पहुंचती है, जहां वह शुरुआती बिंदु से बहुत दूर आ चुका होता है, लेकिन मंजिल अभी भी मीलों दूर होती है। यह मोदियानो की अपनी शैली है। दरअसल अब तक किसी भी उपन्यास में मोदियानो की यात्रा पूरी नहीं हुई है, क्योंकि उनकी खोज मुकम्मल नहीं हुई है। जिस दिन उनकी खोज पूरी हो जायेगी, संभवतः उनका उपन्यास लेखन भी रुक जायेगा। बात उनके उपन्यासों पर जासूसी उपन्यासों के करीब होने के ठप्पे की। ‘टेलीरामा मैग्जीन’ को दिये गये एक साक्षात्कार में मोदियानो ने कहा था, ‘‘मेरे अंदर हमेशा वह  इच्छा और नाॅस्टेल्जिया थी कि मैं जासूसी उपन्यास लिख पाऊं। जासूसी उपन्यासों की मुख्य थीम का मैं बंधक रहा हूं। यही थीम है- गुमशुदगी, पहचान की समस्या, जादुई  अतीत की वापसी।’’

मोदियानो के लेखन की मूल थीम, स्मृति है और इसे मोदियानो ने किस तरह साधा है, पुनर्रचित किया है, यह संभवतः उनके उपन्यास ‘दोरा ब्रुदेर’ (अंगरेजी अनुवाद:द सर्च वारंट) में पूरी चैंध के साथ देखा जा सकता है। दोरा ब्रुदेर न सिर्फ कथा के तौर पर बल्कि उसके शिल्प के लिहाज से भी मास्टरपीस के तौर पर गिना जाता है। इसमें कई विधाओं का फ्यूजन है। यहां एक साथ, जीवनी, आत्मकथा और जासूसी उपन्यास के रूपों को आपस में मिलाकर उपन्यास की मुख्य किरदार दोरा का इतिहास कहा गया है। पूर्वी यूरोपीय यहूदी आप्रवासियों की संतान दोरा नाजी दोरा अधिग्रहण से पहले ईसाई मिशन की सुरक्षा से भाग निकली थी।  उसके माता-पिता ने उसके लापता होने का इश्तिहार 31 दिसंबर, 1941 के फ्रेंच अखबार ‘पेरिस साॅयर’ में छपवाया था। नौ महीने बाद इस दोरा का नाम उसके पिता के साथ पोलैंड के आस्विट्ज के काॅन्संट्रेशन कैंप में भेजे गये लोगों में शामिल था। इन नौ महीनों में दोरा कहां रही? उसकी कहानी क्या थी? इस रहस्य को जानने के उपक्रम ने ही उपन्यास का रूप लिया है। जीन शाॅरबोन्यू ने दोरा ब्रुदेर/सर्च वारंट की समीक्षा करते हुए लिखा है, ‘‘दोरा ब्रुदेर ने अपना अस्तित्व ग्रहण कर लिया, ठीक उसी तरह जिस तरह से मोदियानो का अपना अस्तित्व है।  दोरा की किस्मत का किस्सा जानने की मोदियानो की कोशिश उनकी अपनी जिंदगी को अर्थवत्ता देती है। उनके पहचान को उजागर करती है। ...यह खोज एक इतिहास के एक लापता व्यक्ति को फिर से जीवित करने की तरह है, इतिहास को पुनः अस्तित्वमान करने जैसा है। इस तरह से मोदियानो ‘स्मृति के संरक्षक’ की भूमिका इख्तियार कर लेते हैं। वे दोरा को एक चेहरा और एक पहचान देते हैं। लेकिन साथ ही यह भी बताते हैं कि जब बात नाजी कब्जे की आती है, तो फ्रेंच स्मृति किस तरह से कसौटी पर खरी नहीं उतरती। यही कारण है कि मोदियानो अदृश्य हो चुके इतिहास के वक्फे के खिलाफ जंग छेड़ते हैं। ’’

मोदियानो के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनके उपन्यास पेरिस और फ्रांस के बारे में, उसके इतिहास के एक खास दौर के बारे में हैं और इस तरह से इसकी स्वीकार्यता की अपनी एक सीमा है। लेकिन आलोचक इससे इत्तिफाक नहीं रखते। मोदियानो को पढ़ते हुए हम भले इतिहास के एक ही क्षण में बार-बार दाखिल हो रहे होते हैं, लेकिन पाठक यह महसूस किये बिना नहीं रहता कि मोदियानो की चिंता उसकी चिंता भी है। खासकर इस मायने में कि वह इतिहास की अर्थवत्ता खोजने की कोशिश करते हैं, आज से उसके रिश्ते की पहचान करना चाहते हैं और इतिहास की हमारी समझ को प्रश्नांकित करते हैं। विलियम फाॅकनर की तरह ही मोदियानो हमें बताते हैं कि अतीत मरता नहीं है, बल्कि सही से देखें, तो यह अतीत भी नहीं होता। यह हमसे अभिन्न होता है। हर पल हमें आकार देता रहता है।

डिस्क्लेमर: लेखक का ‘मोदियानो एक्सपर्ट’ होने का रत्तीभर भी दावा नहीं है। यह मूलतः इंटरनेट पर पैट्रिक मोदियानो पर उपलब्ध सामग्री के  प्रारम्भिक शोध पर आधारित एक परिचयात्मक लेख है। 
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25 February 2013

मेरे पांव पूरी तरह जमीन पर हैं : मो यान





वर्ष 2012 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार चीनी भाषा के लेखक मो यान को दिया गया . यान के लेखन में फ्रांज काफ्का के मनोविश्लेषण, माक्र्वेज के जादुई यथार्थवाद और फाकनर की पैनी नजर का सम्मिश्रण देखा जा सकता है. वे अपनी रचनाओं में कल्पना, यथार्थ और इतिहास और समाजिक संदर्भों को पिरोते हुए बीते कल के साथ वर्तमान से भी मुठभेड़ करते हैं. मो यान के लेखन को उन्हीं के शब्दों के सहारे समेटता हुआ एक पुराना लेख… 

नोबेल पुरस्कार मिलने की खबर पाकर मुझे हैरानी भरी खुशी के साथ-साथ थोड़ा भय भी हुआ. हैरानी इसलिए, क्योंकि मुझे इस बात की थोड़ी सी भी उम्मीद नहीं थी कि मैं यह पुरस्कार जीतूंगा. खुश पुरस्कार मिलने के कारण था. भयभीत इसलिए, क्योंकि मुझे अब तक नहीं पता कि आखिर मैं इसका सामना किस तरह से करूं. इसका कारण मुझमें प्रेस की अचानक बढ़ गयी रुचि भी है. सबसे बड़ी बात, मैं नहीं जानता कि नोबेल पुरस्कार जीतने के बाद क्या लोग मुझे ज्यादा गौर से देखेंगे और और मेरी कमियां ढूंढ़ेंगे!
दुनियाभर में और चीन में भी कई बेहतरीन लेखक हैं. मुझे मालूम है कि मेरे पुरस्कार जीत लेने का यह मतलब नहीं है कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूं. मेरे पांव पूरी तरह से जमीन पर हैं, और मुझे उम्मीद है कि साक्षात्कार और मीडिया के अटेंशन का दौर जल्द ही समाप्त हो जायेगा, जिससे कि मैं अपने काम में फिर से लग पाऊंगा. एक लेखक के लिए सबसे जरूरी चीज उसका काम, वास्तविक जीवन को गौर से देखना और अपने देश के लिए प्रेम है. मुझे लगता है कि इसी वजह से मुझे पुरस्कार दिया गया है, क्योंकि मैं लोगों के बारे में एक मानवीय और संवेदना भरे दृष्टिकोण से लिखता हूं. इस बात की ज्यादा परवाह किये बगैर कि मैं जिन पर लिख रहा हूं, वे अच्छे हैं या खराब.
नोबेल पुरस्कार समीति ने मेरे लेखन को हैलुशिनेटरी रियलिज्म (आत्म भ्रम से परिपूर्ण यथार्थ) की संज्ञा दी है. यह मेरे लेखन की अच्छी व्याख्या है. 1987 में मैंने एक लेख लिखा था. इसमें मैंने चीनी लेखकों और विलियम फाकनर और ग्रैबियल गार्सिया माक्र्वेज के बीच के संबंध की चर्चा की थी. इन दोनों महान फनकारों का मेरे ऊपर बहुत बड़ा प्रभाव रहा है.

इन लोगों के लेखन को पढ़ने के बाद ही मैं यह समझ पाया कि साहित्य इस तरह भी लिखा जा सकता है. ये दोनों लेखक लगातार धधकते हुए ज्वालामुखी के समान हैं. आप उनके बहुत नजदीक नहीं जा सकते. आप पिघल जायेंगे. मेरे लिए यह जरूरी है कि मैं उनसे दूर जाऊं, ऐसा करके ही मैं अपने आपको खोने से बचा सकता हूं. वैसे मुझे नहीं लगता कि नोबेल समिति का यह कहना पूरी तरह सही है कि मैंने हैलुशिनेटरी यथार्थ, दंत कथाओं, इतिहास और वर्तमान का संलयन किया है. बल्कि इसकी जगह मैं कहूंगा कि मेरे उपन्यासों में कल्पना, लोक कथाओं, सामाजिक समस्याओं और ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश है. हालांकि मुझे लगता है कि उन्होंने मेरे उपन्यासों को समझा है.
यह पुरस्कार मुझे मिला होता, या न मिला होता, मैं यह कहना चाहूंगा कि मेरे अंदर अपनी मातृभूमि और अपने देश के लोगों के प्रति गहरा लगाव है. मैं इस बात के लिए शुक्रगुजार हूं कि मैं यहां बड़ा हुआ और मेरे खाते में जीवन के ये अनुभव आये. मेरे कई शुरुआती कामों की पृष्ठभूमि मेरे इर्द-गिर्द का परिवेश है. मेरी किताबों के कई पात्र उन लोगों से प्रभावित हैं, जिनके साथ मैं बड़ा हुआ. इस धरती और यहां के लोगों के बगैर मैं वह नहीं हो पाता, जो मैं आज हूं.
जब मैंने पहले-पहल लिखना शुरू किया, उस समय एक वातावरण मेरे चारों और मौजूद था. यह काफी वास्तविक था और जो कहानियां मैंने लिखीं, वे मेरे व्यक्तिगत अनुभव थे. लेकिन जैसे-जैसे मैं लगातार लिखता जा रहा हूं और मेरा लिखा प्रकाशित होता जा रहा है, मेरे दिन प्रति दिन के अनुभवों का भंडार खत्म होता जा रहा है, इसलिए मुझे अपने लेखन में थोड़ी सी कल्पना की मिलावट की जरूरत महसूस होती है. कई बार इसमें कुछ फंतासी भी होता है.
मैंने हमेशा बड़ों के मुंह से कहानियां सुनीं. इसमें परीकथाएं भी थीं, दंत कथाएं भी थीं. इतिहास और हमारे क्षेत्र में हुई स्थानीय लड़ाइयां भी थीं. किंवदंती बन चुके लोगों के किस्से भी थे. आपदाओं की कहानियां भी थीं. ये मेरे लेखन का स्नेत हैं. मैं इन सबका इस्तेमाल अपने उपन्यासों में करता हूं. गांव में बिताया हुआ मेरा जीवन मेरे लिए एक निधि के समान है.

अगर आप लेखक नहीं हैं, तो शायद आपको यह निधि काम की न लगे. लेकिन, मेरे जैसे लेखक के लिए यह बेहद बेशकीमती और महत्वपूर्ण है. यही वह कारण है कि मेरे उपन्यास अलग तरह के हैं. अगर मैं क्लासिक उपन्यास पढ़ते हुए बड़ा हुआ होता, तो मैं मो यान नहीं बन पाया होता.
मैं अपने उपन्यासों की बिक्री बढ़ने की खबर से घबरा जाता हूं. उनकी बिक्री जितनी ज्यादा बढ़ती है, मेरा डर भी उतना ही बढ़ता है. कई पाठक यह धारणा बना लेंगे कि नोबेल पुरस्कार पाने वाले का लेखन जरूर सर्वश्रेष्ठ का भी सर्वश्रेष्ठ होगा. मुझे डर है कि उन्हें मेरे लेखन से निराशा हो सकती है.
मैंने पहली बार 1981 में लिखना शुरू किया. उस समय तक मैंने माक्र्वेज या फाकनर को नहीं पढ़ा था. मैंने पहली बार इन्हें 1984 में पढ़ा. और इसमें कोई शक नहीं कि उनका मेरे लेखन पर गहरा असर रहा है. मैंने यह महसूस किया कि मेरे अनुभव उनके अनुभव से काफी मिलते जुलते हैं. लेकिन यह महसूस करने में काफी वक्त लगा. अगर मैंने उन्हें पहले पढ़ा होता, मैं शायद उनके जैसे किसी मास्टरपीस का अब तक सृजन कर पाता.

मैंने अपनी शुरुआती रचनाओं में काफी मात्र में स्थानीय बोली के शब्द, उसके मुहावरे और अलंकार का इस्तेमाल किया है. इसका कारण यह भी है कि मेरे भीतर कभी इस बात का ख्याल भी नहीं आया था कि मेरी रचनाओं का दूसरी भाषाओं में कभी अनुवाद भी होगा. बाद में मैंने महसूस किया कि इस तरह की भाषा अनुवादक के लिए कई मुश्किलें खड़ी करती है. लेकिन बोलियों और मुहावरों का इस्तेमाल न करना मेरे लिए मुमकिन नहीं है. क्योंकि मुहावरों वाली भाषा गहन ऊर्जा से भरी और अभिव्यक्तिपूर्ण होती है.

और यह किसी खास लेखक की पहचान माने जाने वाली भाषा का सर्वोत्कृष्ठ हिस्सा होता है. इसलिए एक तरफ मैं कुछ प्रयोगों को बदलने की कोशिश करता हूं, लेकिन वहीं अपने अनुवादक से यह उम्मीद भी करता हूं कि वे मुहावरों को सही तरीके से ध्वनित करें. मेरे ख्याल से यह आदर्श स्थिति है.
यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं है कि मैं अपनी भाषा में जिस तरह से पाठकों तक कोई विचार पहुंचाने की कोशिश करूं, वह दूसरों तक भी वैसे ही पहुंचे. वैसे मैं मानता हूं कि दुनियाभर में हर जगह पाठक एक जैसे होते हैं. हर जगह ऐसे लोग होंगे जिन्हें मेरा काम पसंद आता होगा, कुछ ऐसे भी होंगे जिन्हें मेरा लिखा बिल्कुल पसंद नहीं आता होगा. मैं उन्हें ऐसा करने या न करने के लिए उन पर दबाव नहीं बना सकता. इसलिए हकीकत यही है कि हर लेखक अपने लिए खास तरह का पाठक चुनता है.

मुझे लगता है कि सीमाएं और सेंसरशिप साहित्य सृजन के लिए बेहतर ही हैं. दरअसल, साहित्य में तमाम पद्धतियों का अपना राजनीतिक आचरण होता है. जैसे कि हमारे वास्तविक जीवन में कुछ तीखे और संवेदनशील मुद्दे हो सकते हैं और उन्हें छुए जाने की अपेक्षा नहीं होती. ऐसे में लेखक उन्हें जीवंत, निर्भीक और वास्तविक पहचान के साथ लेकिन कल्पना का इस्तेमाल कर लिखता है.
(ग्रांटा और अन्य पत्र-पत्रिकाओं को दिये गये साक्षात्कार के आधार पर तैयार)