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9 June 2013

साहित्य की यह लाइव बहस...

साहित्य की दुनिया इन दिनों बहस-मुबाहिसों से गुलजार है. यह बहस पूरी तरह लाइव है. पल-पल का हिसाब, पल-पल का जवाब इसमें दिया जा रहा है. साहित्य का यह नया ‘पब्लिक स्फेयर’ (सार्वजनिक मंच) रचा है फेसबुक और ब्लॉग ने. लेकिन यह तथाकथित सार्वजनिक मंच खतरों से खाली नहीं है. साहित्य के इस नये ‘पब्लिक स्फेयर’ या मंच पर प्रीति सिंह परिहार की विशेष प्रस्तुति

यह कोईघोषित मंच नहीं, जहां किसी बहस को अंजाम तक पहुंचाया जा सके, टिप्पणी की जा सके और सवाल रखे जा सकें. लेकिन फिर भी एक लाइव बहस जारी है. बहस में शामिल चेहरे प्रत्यक्ष नमुदार नहीं हैं. उनकी उपस्थिति दर्ज कराती प्रोफाइल आमने-सामने हैं. यहां शब्द ही बहस का आगाज है और आवाज भी. पिछले कुछ वर्षों में बिना मेल-मुलाकात के ही लोगों के दोस्तों की फेहरिस्त लगतार बढ.ाने वाली सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक की वॉल में साहित्य की यह बहस आगे बढ. रही है. बिना थके. बिना थमे. इस वॉल पर निजी अनुभवों, तसवीरों से लेकर राजनीतिक, साहित्यिक और समसामयिक घटनाओं पर टिप्पणियां आम हैं. फेसबुक की वॉल एक ऐसा सार्वजनिक मंच, या नया पब्लिक स्फेयर है, जहां पर लगातार कविताएं, कहानी, संस्मरण, लेख या उसकी कुछ पंक्तियां चस्पां की जा रही हैं. लेकिन, रचनाएं फेसबुक पर वह गरमाहट नहीं पैदा कर पातीं, जैसा कोई विवादित लेख कर जाता है. कुछ लोगों का तो मानना है कि फेसबुक साहित्यिक बहस का नया अड्डा बन कर उभरा है. पिछले तीन-चार वर्षों में फेसबुक पर एक के बाद एक विवादास्पद (और अकसर कटु) बहसें चली हैं. कभी तसवीरों ने किसी बहस को जन्म दिया है, तो कभी किसी लेख, साक्षात्कार, या बहस खड.ी करने के लिए चतुरता से उठा ली गयी किसी पंक्ति ने.

हाल ही में फेसबुक पर एक लंबी बहस चली. जिसमें बडे. संपादक से लेकर वरिष्ठ कवि और युवा ‘लेखक’ तक शामिल थे. बहस के मूल में था, कवि कमलेश से उदयन वाजपेयी की लंबी बातचीत में से चुनकर निकाला गया एक बयान- ‘मानवता को सीआइए का ऋणी होना चाहिए’ है. इस बहस ने विचारधारा से लेकर व्यक्ति और अवसरवादिता तक के सिरे पकडे.. युवा कवि गिरिराज किराडू के फेसबुक वॉल से शुरू हुई यह बहस 18 अप्रैल 2013 से 4 मई 2013 तक चली. जनपक्ष ब्लॉग में इस बहस को गिरिराज किराडू - अशोक कुमार पांडेय के मार्फत ‘विचारधारा, शक्तिकेंद्र, प्रतिमानीकरण : लेखन और जीवन’ शीर्षक से सिलसिलेवार ढंग से पढ.ा जा सकता है. कथादेश के जून अंक में अर्चना वर्मा ने इस पर एक लंबा आलेख लिखा, जो जानकीपुल ब्लॉग पर भी देखा जा सकता है. यहीं इस सबके बरक्स कुछ सवाल अपनी ओर ध्यान खींचते हैं. क्या फेसबुक की वॉल हिंदी साहित्य का नया पब्लिक स्फेयर है? जनपक्ष ब्लॉग में उक्त बहस की भूमिका देखें-‘यह बहस हिंदी साहित्य के नये पब्लिक स्फेयर फेसबुक के संजीदा उपयोग का एक उदाहरण है और उसके बारे में अपरीक्षित धारणाओं का एक सशक्त प्रतिवाद भी. फेसबुक पर बहस लाइव होती है, कोई बोलता नहीं है, सब लाइव लिखते हैं.’ 

फेसबुक की इस लाइव बहस में क्या कोईवैचारिक क्षितिज बनता दिखता है? क्या यह बहस क्या हमारी साहित्यिक जमीन को मजबूत कर रही है? जिस तरह की साहित्यिक बहसें फेसबुक की वॉल पर आगे बढ.ी हैं, उनकी प्राथमिकता, प्रामाणिकता और अर्थवत्ता कौन तय करेगा? यहां ऐसे ही सवालों का जवाब दे रहे हैं तीन साहित्यकार.


१- अर्चना वर्मा 

फेसबुक सोशल मीडिया के अर्थ में पब्लिक स्फेयर माना जा सकता है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसे हम साहित्य का पब्लिक स्फेयर कह सकते हैं. साहित्य का पब्लिक स्फेयर तो यह तब होगा, जब इसमें बडे. पैमाने पर और हर विधा का साहित्य प्रप्रतिनिधित्व पा सके. फेसबुक में चली हालिया बहस, जिसे साहित्य से जोड.ा जा रहा है, कवि कमलेश के बयान पर थी. लेकिन शायद ही किसी का ध्यान इस ओर गया हो कि कमलेश खुद फेसबुक पर नहीं हैं. जिस व्यक्ति को लेकर इतनी लंबी बहस चली, उसका पक्ष सुना ही नहीं गया. ईमानदारी की बात यह होती कि वह पूरी बातचीत जिसमें से बहस का आधार बने ‘सात शब्द’ निकाले गये, वॉल पर डाली जाती. सबके सामने पूरी तसवीर तो आती! हो सकता है आगे हम फेसबुक को इस रूप में विकसित कर सकें. लेकिन अभी इसे साहित्य का पब्लिक स्फेयर कहना जल्दबाजी होगी. बजाय फेसबुक के बहुस से ब्लॉग और इ-पत्रिकाओं को हम बेशक साहित्य के सार्वजनिक मंच हिस्सा मान सकते हैं. 

फेसबुक की बनावट देखें तो, सबके मित्रों की अलग-अलग टोली है. अपने-अपने पोस्ट हैं. अभी जो कुछ सामने है, उसमें तो यही दिख रहा है कि मूल मुद्दा यानी साहित्य से जुड.ा विचार पीछे छूट जाता है और बहस व्यक्ति केंद्रित हो जाती है. इसमें बजाय विषय की तह में जाने के एक दूसरे को ध्वस्त करने की मंशा ज्यादा दिखती है. अकसर किसी भी बात का जवाब तर्क से नहीं दिया जाता, बल्कि तर्क को हास्यास्पद बना कर मन का गुबार निकालने की मंशा अधिक नजर आती है. दोस्ती-यारी में एक दूसरे की पीठ पर हाथ मार कर, चुटकुला करके, बातचीत करने का रंग दिखायी देता है. कमलेश के बयान पर फेसबुक की पूरी टिप्पणी को देखें, तो उसमें बस एक खीझ या परेशानी दिखती है कि किसी को रजा फांउडेशन से पौने दो लाख का फेलोशिप क्यों मिला? इन विवादों से तह में मौजूद चीजें तो सामने आती हैं, लेकिन यहां साहित्य भी कहीं मौजूद है यह नहीं दिखता. 

मैं फेसबुक की बहुत नियमित विजिटर नहीं हूं. लेकिन, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में अशीष नंदी के बयान को लेकर हुए विवाद पर मैंने उस वक्त एक पोस्टी लिखी थी. वह एक लेखक के बारे में त्वरित प्रतिक्रिया थी. उसे जो रिस्पांस मिला, वह चाहे जितने भी लोगों का हो, उससे एक फीडबैक वाली फीलिंग तो होती है. लेकिन जो लोग आपकी बात पर लाइक का क्लिककर रहे हैं, वो आपकी बात का र्मम भी जान रहे हैं, इस बात की कोई गारंटी नहीं है. किसी ने कोईठीक -ठाक कविता पोस्ट की और उसके बदले में किसी और ने कोई चलताऊ शेर जड. दिया, वह असल कोई संवाद नहीं है. अब तो लाइक पर भी चुटकुले बन गये हैं कि मृत्यु के संदेश पर भी लोग-बाग लाइक में क्लिक कर देते हैं. कोई जब फेसबुक पर अपनी कविता, कहानी या उपन्यास का अंश तत्काल डालता है, तो उस पर चार छह लोगों से प्रतिक्रिया मिल जाती है. वह आपसदारी में रचना पर एक फीडबैक और दोस्तों की बधाई ही होती है.

हालांकि फेसबुक पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां भी आती हैं, लेकिन यहां तात्कालिकता का दबाव इतना ज्यादा होता है कि ज्यादातर समय बहस का रुख बदल जाता है. बात गहराई तक नहीं जाती. बहस व्यक्तिगत आक्षेपों की श्रृंखला में बदल जाती है. किसी बहस में जो गंभीरता होनी चाहिए, ठहर कर सोचने का जो धैर्य होना चाहिए, संदर्भ इकट्ठा करने के लिए जिस तरह का अध्ययन होना चाहिए, वह नजर नहीं आता. अकसर लगता है कि तात्कालिकता के दबाव में एक माध्यम की शक्ति का दुरुपयोग किया जा रहा है. जिस पंक्ति पर बहस होती है, लोग उसके संदर्भ को समझे, पूरे लेख को पढे. बिना ही टिप्पणी करने लगते हैं. फतवे देने लगते हैं. सोशल मीडिया पर फैसला सुनाने की हड.बड.ी दिखाई देती है. 

हां भविष्य में फेसबुक के पब्लिक स्फेयर बन जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. इसके लिए जरूरी है कि किसी बहस को शुरू करने से पहले मूल लेख को भी जगह दी जाये. उस पर सोच समझ कर तर्क के साथ बात रखी जाये, बजाय टंगड.ी मार कर निकल जाने के. 

अगर फेसबुक पर साहित्य के पब्लिक स्फेयर की संभावना की बात है, तो मैं पहले यह देखूंगी कि इसके लिए क्या नया किया जा सकता है. अब तक जितने लोगों ने इस पर जो काम किया है, उसमें कहां क्या कम रह गया है. मेरे ख्याल से किसी के चार-पांच हजार प्रसंशकों के दायरे में फेसबुक पब्लिक स्फेयर नहीं बन सकता.

२- मंगलेश डबराल 

अभी मैं एक-डेढ. महीने से ही फेसबुक पर हूं. शायद जल्दी ही उससे बाहर आ जाऊं, क्योंकि उसमें समय बहुत लगता है. फेसबुक पर साहित्य को लेकर काफी सामग्री डाली जा रही है, लेकिन फेसबुक को साहित्य का पब्लिक स्फेयर कहना कठिन है. हालांकि कुछ लोग जरूर इसमें कायदे की बहसें, कला और संस्कृति से जुड.ी कुछ बेहतरीन चीजें लेकर आ रहे हैं. कुछ लोगों ने लिखा कि फेसबुक पर बहुत कविताएं आने लगी हैं. लेकिन, मुझे लगता है कि फेसबुक ज्यादातर लोगों के लिए अपने बारे में सूचनाएं शेयर करने का माध्यम है. यह व्यक्ति की छोटी-छोटी सफलता-विफलता की एक नोटबुक जैसा है. कुछ लोगों ने कहा कि यह उनके लिए अपनी एक पहचान की तरह है. लेकिन तमाम चीजों के बाद भी यह एक स्मिृतिविहीन माध्यम है. इसने ब्लॉग को भी काफी आघात पहुंचाया है. लोग अब ब्लॉग पर कम और फेसबुक पर ज्यादा सक्रिय दिखते हैं. ब्लॉग लिखना ज्यादा जिम्मेदारी का और गंभीर काम है. वैसी गंभीरता फेसबुक में नहीं आ पायी है. इसमें चीजें जमा होती रहती हैं और दबती जाती हैं. कुल मिलाकर यह एक चौराहे की तरह है, जहां कोईभी बिना जवाबदेही के किसी भी तरह की टिप्पणी कर चला जाता है. लेकिन, इसमें कोई संदेह नहीं कि अशोक कुमार पांडेय और वीरेंद्र यादव जैसे पांच-सात लोग फेसबुक में एक गंभीर सामाजिक, सांस्कृति बहस की जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. दरअसल, इस समय साहित्य में विचार का बहुत अभाव है. इस अभाव के कारण लोग व्यक्ति केंद्रित हो रहे हैं. इसलिए गंभीर बहस में भी जहां विचार की बात होती है, तुरंत व्यक्ति की बात भी आ जाती है. फेसबुक है भी व्यक्तिपरक माध्यम. ऐसे लोग जिन्हें चीजों की ठीक से जानकारी नहीं है, वे भी आकर टिप्पणी करते हैं. इससे बहस बीच-बीच में भटक जाती है. यहां बहस के भटकने की ज्यादा आशंका है. इसके बावजूद कुछ लोग इस बात को लेकर काफी सचेत हैं कि आज विचार की दुनिया में क्या हो रहा है? किस तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक आक्रमण हम पर हो रहे हैं? फेसबुक पर ऐसे लोग बेहतर भूमिका निप्रभाते दिख रहे हैं. इस बीच निश्‍चय ही फेसबुक का स्वरूप कुछ बदला है. बहुत सा दुलर्भ संगीत इसमें पोस्ट हुआ है. बहुत सी बहसें आ रही हैं. यह नया माध्यम है और युवा पीढ.ी के बहुत से लोग इसे एक वैचारिक मोड. दे रहे हैं. 

लेकिन विस्मृति हर युग का बहुत बड.ा लक्षण है. भूमंडलीकरण की शक्तियों का आग्रह है कि हम भूल जायें. सीआइए को लेकर जो बहस शुरू हुई है, उसमें यह सवाल तो अपनी जगह पर है कि कमलेश जी ने सीआइए के बारे में क्या कहा, लेकिन बड.ा सवाल है कि क्यों आज संसार में सीआइए की भूमिका को विस्मृत किया जा रहा है. सीआइए ने जिस तरह से लोगों का दमन किया, सत्ताएं पलटीं, कठपुतली सरकारें बैठायीं, उसको अनदेखा करने की जानबूझ कर कोशिश हो रही है. कमलेश जी अगर यह कहते हैं कि मानव जाति को सीआइए का ऋणी होना चाहिए, इसका अर्थ है कि सीआइए के अपराध को हम अनदेखा कर दें. यह पूरी बहस इस बात के विरुद्ध है. मैं भी इस बहस में शामिल हुआ हूं, लेकिन किसी व्यक्ति नहीं, बल्कि विचार का विरोध या सर्मथन करने और दबाये जा रहे तथ्यों को सामने रखने के लिए. अमेरिका ने कैसे उस दौर में ब्रेख्त और चैपलिन को तंग किया था. इसके लिए सीआइए ने बाकायदा एक संस्था बनायी थी ‘कमेटी ऑन अनअमेरिकन एक्टिविटीज’. चैपलिन ने तो तंग आकर अमेरिका ही छोड. दिया था. यह सारे तथ्य इतिहास में दबे पडे. हैं, इनको इस समय उभार कर लाना जरूरी इसलिए लगा, ताकि कमलेश जी जैसे जिम्मेदार व्यक्ति के इस गैरजिम्मेदार बयान को वैधता न मिले. कमलेश जी ने एक और बात कही कि कम्युनिस्टों ने ब्राह्मणों के खिलाफ उसी तरह काम किया, जैसा नाजियों ने यहूदियों के खिलाफ किया. इस व्यक्तव्य का अर्थ है कि आप उस इतिहास को ही ठीक से नहीं देख रहे हैं. फिलहाल फेसबुक बहस का आगाज तो कर रहा है, लेकिन उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा पा रहा.

३- प्रभात रंजन

फेसबुक को पब्लिक स्फेयर माना जाये या नहीं, लेकिन साहित्य के पब्लिक स्फेयर के रूप में यह जरूर उभरा है. खासतौर पर हिंदी साहित्य की बात करें, तो फेसबुक ने इससे जुडे. लोगों को एक बड.ा मंच दिया है. यह एक ऐसी जगह है जहां वे अपनी रचनाएं साझा कर सकते हैं, वैचारिक बहस कर सकते हैं. 

हिंदी साहित्य में अलग-अलग लेखक संगठन और गुट हैं. अब तक वे आपस में ही विचारों को साझा करते रहे हैं. लेकिन फेसुबक में अलग-अलग विचारधारा और संगठन के लोग आपस में संवाद कर सकते हैं. वैचारिकता को लेकर अब तक जो एक आडंबर हमने बना रखा था, वह छटने लगा है. फेसबुक ने हिंदी साहित्य के लिहाज से यह एक बड.ा काम किया है. इसने लेखक को स्वतंत्र स्पेस तो दिया ही है, वैचारिक गुटबंदियों को भी कमजोर किया है. 

कमलेश के सीआइए के बयान पर चली बहस में कहीं न कहीं निजी हमले भी हुए, लेकिन बहस का इस तरह निजी होना भी उसे एक वैचारिक आयाम देता है. सीआइए ही नहीं, मेरा मानना कि केजीबी को लेकर भी बात होनी चाहिए. यह बहस भी इस ओर जाती दिखी. हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि फेसबुक साहित्यिक जमीन मजबूत कर रहा है. लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि यह खोई हुई जमीन को हासिल करने का काम कर रहा है. 

यह बहस अथपूर्ण है या नहीं, लेकिन महत्वपूर्ण तो है ही. महत्वपूर्ण इसलिए, क्योंकि फेसबुक ने यह मौका दिया है कि मैं किसी वरिष्ठ लेखक से भी सीधे बात कर सकता हूं. किसी मुद्दे पर सहमति-असहमति जता सकता हूं. हां ऐसे लोग आपस में बहस कर सकते हैं, जो पहले संवाद की स्थिति में नहीं थे. ठीक है कि इसमें कटुता या निजता भी आ जाती है, लेकिन इसने निकटता भी बढ.ायी है. हां अभी लोग इसे बहुत गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. शायद इसलिए, क्योंकि फेसबुक पर चली ज्यादातर साहित्यिक बहसें व्यक्ति केंद्रित रही हैं. उदय प्रकाश के पुरस्कार मामले में लंबी बहस हुई,लेकिन उनकी कहानियों पर कोईबात नहीं हुई. कमलेश के बयान पर इतना हंगामा हुआ, लेकिन उनके कवित्व को लेकर कोई बात नहीं हुई. लेकिन यह शुरुआती स्थिति है और अभी निर्णय पर जाना ठीक नहीं. आने वाले समय में जरूर इसे एक सार्थक दिशा मिलेगी. 

भाषा को लेकर ओम थानवी और आशुतोष के बीच चले संवाद को हम दो व्यक्तियों की लड.ाई कह सकते हैं, लेकिन दो अक्षर ‘च’ और ‘ज’ को लेकर चली इतनी बड.ी बहस असल में भाषा के प्रति सजगता भी तो है. 

हिंदी साहित्य में इस समय सबसे बड.ा संकट किताबों और पत्रिकाओं की उपलब्धता का है. सवाल हैकि जो लोग सीतामढ.ी, मुज्जफरपुर, सतना जैसी जगहों में रहते हैं, वे कैसे किताबों और पत्रिकाओं तक पहुंचें? कनेक्टिविटी की इस कमी को फेसबुक और ब्लॉग ने दूर किया है. अनेक नये लोगों को इस माध्यम ने पहचान देने का काम किया है. कई लेखक फेसबुक और ब्लॉग पर पहले प्रकट हुए और बाद में उन्हें पत्र-पत्रिकाओं ने छापा. अपर्णा मनोज, लीना मल्होत्रा जैसी लेखिकाएं इसी माध्यम से आयीं. 

प्रचार माध्यम के रूप में भी फेसबुक का साहित्यिक इस्तेमाल हो रहा है. किसी पत्रिका में कौन सी रचना छपी है, इसकी जानकारी फेसबुक से मिल जाती है. कौन क्या लिख रहा है, यह पता चल जाता है. वैसे इसको पब्लिक स्फेयर से ज्यादा प्रचार माध्यम के रूप में हिंदीवालों ने अपनाया है.

12 May 2013

मां, किस्से और मार्क्वेस



अपनी जिंदगी में जिसे सबसे करीब से देख पाते हैं, वह ‘मां’ होती है. मां की छवि को पूरी तरह बयां करना संभव नहीं, लेकिन जब-तब रचनाकारों ने अपनी-अपनी तरह से इस छवि को उकेरा है. मदर्स डे पर मां के जाने के बाद भी मां के रहने को बयां करता कवि मंगलेश डबराल का यादगार संस्मरण.




कुछ दोस्तों ने सुझाव दिया था कि मैं एक टेपरिकॉर्डर लेकर रोज एक घंटे मां के सामने बैठ जाऊं, उससे कुछ-कुछ पूछता रहूं और वह जो कुछ बतायेगी उससे एक बड़ा उपन्यास बन जायेगा. गाब्रियेल गार्सिया माक्र्वेस के उपन्यासों से भी आगे का जादुई यथार्थवाद उसमें होगा. इस बात पर कभी गंभीरता से नहीं सोचा. आज लेकिन जब मां नहीं है और उसे गये हुए एक साल हो गया है, सोचता हूं कितने गजब के किस्से उसके भीतर थे. एक से एक रहस्यमय, रोमांचक, खौफनाक और अविश्‍वसनीय घटनाएं और अंधविश्‍वास, जिन पर वह खुद विश्‍वास नहीं करती थी, लेकिन उन्हें विश्‍वसनीय तरीके से बतलाती थी. एक दिन उसने एक पहाड.ी औरत की कहानी सुनायी जिसने सिर्फ लड.कियों को ही जन्म दिया था. पांच या सात बेटियां होने के बाद घर के पुरुषों ने बाद में पैदा हुई लड.की को दूध की बजाय मट्ठा पिला कर मार दिया और खेत में दफना दिया. वह औरत रोज सुबह-शाम चोरी-छिपे खेत में जाती, अपनी मरी हुई बी को गड्ढे से निकाल कर कुछ देर अपना दूध पिलाती फिर वहीं गाड. कर चली आती. करीब महीने भर वह यह करती रही और फिर उसने मान लिया कि मरी हुई बी के लिए मोह कैसा. लेकिन फिर उसके कोई संतान नहीं हुई- न लड.की न लड.का. हालांकि उसका पति बहुत चाहता था कि एक बेटा हो जाये. मरने के बाद मुखाग्नि देने के लिए बेटा तो चाहिए न!

अंत तक एक दुख मां को यह रहा कि वह बचपन में और बाद में भी पढ. नहीं पायी क्योंकि डंगवाल लोगों में (मां डंगवाल परिवार से थी) यह माना जाता था कि पढ.ी-लिखी लड.की अपने पति को खा जाती है. इसलिए उसे पढ.ाया नहीं गया और जब वह खुद बहू और फिर हम बाों की मां बनी तो हमारे घर में मेरी दो दादियों का साम्राज्य था, जो घर का सारा काम करती थीं और मां के हिस्से खेत में काम करना, पानी लाना, लकड.ी लाना जैसी जिम्मेदारियां रह गयी थीं. खेत, जंगल और गांव के नीचे पानी के दो धारे (स्रोत) वे जगहें थीं जिनसे मां सबसे अधिक परिचित थी. कई बार उसने आग्रह करके खेत में काम करते हुए अपनी तसवीरें खिंचवायी थीं. फोटो खिंचवाना उसे पसंद भी बहुत था. शायद इसलिए कि मेरे पिताजी बहुत पहले कोडक का एक बॉक्स कैमरा खरीद कर लाये थे, जो हमारे गांव में पहली बार आया था और सबको चमत्कारी चीज लगता था. बाद में मैंने उस कैमरो को पिता जी से ले लिया और कहीं खो दिया. उस कैमरे की छाप मां के भीतर रही होगी इसीलिए फोटो खिंचाते हुए वह सहज लेकिन शानदार ‘पोश्‍चर’ बनाती थी. दिल्ली में वह जब भी मेरे पास रहने आयी, रोज अखबार उठाकर जरूर देखती थी और कहती थी कि यह जो ‘जनसत्ता’ लिखा हुआ है, वह तो मैं पढ. लेती हूं, लेकिन जैसे ही कोई‘लग’ (मात्रा या रेफ) आता है, तो मुझे समझ में नहीं आता. अकसर वह मेरी बेटी अल्मा से अपना नाम लिखवाकर उसे लिखने की कोशिश करती. मेरे दादा जी ने करीब सौ बरस पहले लगभग पंद्रह सौ गढ.वाली कहावतों का संग्रह तैयार किया था. लखनऊ में नवलकिशोर प्रेस से छपे उस संग्रह की ज्यादातर कहावतें मां को कंठस्थ थीं और वह बात करते हुए अचानक कोई कहावत बोल देती. लिखना-पढ.ना या हिंदी (मतलब देस्वाली) न जानने के बावजूद उसके संप्रेषण और संवाद की क्षमता पर मुझे आश्‍चर्य होता था. हमारे घर जो भी आता उससे घंटों बात करता और प्रसत्र होकर लौटता. एक बार क्रिस्टी मैरिल अमेरिका से आयीं और दिन भर मां की बातें सुनती रहीं, हालांकि मां सिर्फ गढ.वाल में बोल रही थी. शाम को घर लौट कर जब क्रिस्टी ने यह बताया, तो मैंने पूछा कि वे मां की बात समझ भी रही थीं या नहीं. तो वे बोलीं: एक-एक बात मेरी समझ में आ रही थी. इसी तरह मेरी एक मित्र घर आयीं और मां के पास बैठ गयीं और जब जाने लगीं तो मां देर तक उनका हाथ बुढ.ापे में भी बेहद कोमल अपनी हथेलियों से सहलाती रही और फिर उसने कहा कि तुम बहुत अच्छी हो, यहीं मेरे पास रह जाओ. जब भी कोई मेहमान हमारे यहां आता और मां के पास बैठता, तो वह हमेशा हाथ से कौर बनाते हुए उसे यह संकेत देती कि खाना खाकर जाओ. 

अंधविश्‍वास, अशिक्षा और पहाड. की सवर्ण व्यवस्था में पलने के बावजूद मां कितनी आधुनिक थी, इसका प्रमाण एक बार तब मिला जब मेरा एक भतीजा शिवप्रसाद जोशी ( कवि, पत्रकार और माक्र्वेस का भक्त) अपनी सहपाठी, झारखंड निवासी शालिनी से अंतरजातीय विवाह करना चाहता था. शिव प्रसाद घोर पंडित परिवार की संतान है, लेकिन मां उस समय पहली व्यक्ति थी जिसने इस विवाह का पक्ष लिया और कहा कि इन दोनों को जोड.ी बढ.िया रहेगी. ये दोनों शायद आज भी अपनी ‘दादी’ के आभारी होंगे. हिंदू-मुसलमान, सवर्ण-अवर्ण, ब्राह्मण-अब्राह्मण की बात उसकी दृष्टि से हमेशा ही बाहर रही. यहां तक कि जंगली जीव-जंतुओं के बारे में उसकी राय हम सबको चकित करने वाली थी. जंगल से घास लाते समय उसे शायद दो-तीन बार बाघ भी दिखा था और वह कहती थी कि बाघ तो बिल्ली जैसा छोटा हो सकता है और अगर उसकी पूंछ नहीं होती तो वह साकिना (छोटी पत्तियोंवाला एक पेड.) की पत्ती के पीछे भी छिप सकता है. भालू को वह सचमुच गंदा जानवर मानती थी और कहती थी कि अगर वह पीछे पड. जाये तो जंगल में कभी ऊपर नहीं नीचे की, ढलान की ओर भागना चाहिए. इससे भालू के बाल उसकी आंखों पर आ जाते हैं और वह देख नहीं पाता. 

मेरे बारे में मां का ख्याल था कि मेरी बायीं आंख की निचली पलक पर जो तिल है उसे जरा से ऑपरेशन से निकलवा देना चाहिए, क्योंकि आंख में ऐसे तिलवाले लोग जिंदगी भर रोते रहते हैं. आयुर्वेदिक और कुछ- कुछ ऐलोपैथी के डॉक्टर की पत्नी होने के नाते उसे ऑपरेशन, इंजेक्शन, हाजमाचूर्ण, ज्वरांकुश, दंशर, सितोप्लादि चूर्ण वगैरह जो कईदवाएं हमारे घर में बनती थीं, उनके नाम याद थे. मैंने तिल का ऑपरेशन नहीं करवाया लेकिन जब मुझसे बड.ी बहन राजलक्ष्मी ने अपने चेहरे पर जन्मजात एक लंबे से काले तिल (लाखण) को निकलवा दिया, तो मां बहुत दुखी हुई क्योंकि एक ज्योतिषी ने कहा था कि इस घर में पैदा होने वाला बेटा तभी बचेगा, जब उससे पहले लाखणवाली एक लक्ष्मी जन्म लेगी. मां कहती थी-ओफ्फो भाई, लाखण क्यों हटाई होगी इसने!

नियति का विधान देखिए कि जो स्त्री जीवन भर खेतों-जंगलों-पानी के स्रोतों में भागती फिरती रही, मृत्यु ने आकर सबसे पहले उसे चलने-फिरने में असर्मथ बना दिया. बहुत समय तक वह चुपचाप, बिना कराहे पीड़ा  झेलती रही. अपनी पांच -बेटियों और दो बेटों (जिनमें से एक की मृत्यु जन्म के साल भर बाद हो गयी थी) को जन्म देने की पीड़ा का अनुभव उसकी आंतरिक शक्ति बन गया होगा. शायद असह्य पीड़ा  में ही उसने मुझे, संयुक्ता, अल्मा, मोहित या प्रमोद को पुकारने की कोशिश की होगी. जब वह धर्मशिला कैंसर अस्पताल से घर लौटती तो आने-जानेवालों से कहती कि यमराज की कचहरी में अभी मेरी सुनवाई नहीं हो रही है. उसे अपनी पांचों बेटियों से बेहद लगाव था और मेरे पिता और अपने पति के खेतों से, घर के कमरों से भी, जिनमें दवाओं की खाली शीशियां, टिन के डिब्बे बहुतायत में हैं और समझ नहीं आता कि उसका क्या करें. अंत समय में मेरी पांचों बहनें- भुवनेश्‍वरी, जगदेश्‍वरी, राजलक्ष्मी, मालती, बसु- सब आ गयी थीं. कुछ काफी पहले और कुछ बाद में. वे उसकी सेवा करती कई रातों जागती रहीं और उन्ही की उपस्थिति में उसने इस संसार की अंतिम सांस ली और उसे इसी संसार में छोड. दिया.

इस तरह एक साल बीत गया. और अब अपने गांव डांग काफलपानी में उसका वार्षिक र्शाद्ध संपत्र करने के बाद मैं यहां हूं. घर में बहनें हैं, संयुक्ता, मोहित, कौंसवाल जी और दूसरे संबंधी हैं. तसवीरें हैं, खाली शीशियां और डिब्बे हैं, कई कनस्तरों में जगह-जगह मां के रखे हुए छीमी, तोर, लोबिया के बीज हैं और एक कमरे में देवी-देवताओं की अलमारी के सामने जलता हुआ एक दिया है. माक्र्वेस का उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ मैं ऐसे ही अपने साथ ले आया था. लेकिन उसे पढ.ना व्यर्थ. 

कवि का अकेलापन से साभार 

1 May 2013

अच्छा मनुष्य हुए बिना अच्छी कविता नहीं लिखी जा सकती : मंगलेश डबराल

‘शब्द’ ‘घर का रास्ता’ खोजते हैं और ‘गुजरात के मृतक का बयान’ बनकर एक ‘कविता’ में दर्ज हो जाते हैं.‘आवाज भी एक जगह है’ जो ‘तुम्हारे भीतर’ को ‘किसी दिन’‘राग मारवा’ में ले जाती है, जहां स्मृतियों का एक संसार है. यह संसार है हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि मंगलेश डबराल की कविताओं का. मंगलेश जी से उनके सृजन संसार के बारे में कुछ दिन पहले बात की प्रीति सिंह परिहार ने. \यहां साक्षात्कार को आत्मवक्तव्य के रूप में ढाला गया है. अखरावट 




कोई बाहरी या भीतरी घटना जब तक मेरे संवेदन-तंत्र का हिस्सा नहीं हो जाती, तब तक उस पर लिखना संभव नहीं होता. लिखने का कोई तय समय भी नहीं. आमतौर पर रात में ही लिखता हूं. शुरू में सिर्फ दो-तीन पंक्तियां आती हैं, कभी वे कविता बन जाती हैं, कभी अधूरी रह जाती हैं. इस तरह अनगिनत पंक्तियां मेरे पास होंगी. 

मैं शायद अच्छाई को बचाने के लिए लिखता हूं. क्या बाजार, तकनीक और शोषण के भूमंडल में विचार, संवेदना और प्रकृति बचे रहेंगे? आदिवासी बनाम शहरी शोषक वर्ग के बीच की लड.ाई में कौन जीतेगा? क्या आदिवासियों से उनका सब कुछ लूट लिया जायेगा? एकध्रुवीय हो गये विश्‍व में हावी हो रही अमेरिकी दादागिरी से क्या एशिया बच पायेगा? एशिया विस्थापितों का शिविर बन रहा है. यह विस्थापन लोगों को कहां ले जायेगा? मेरी इस तरह की चिंताएं हैं, एक नागरिक के नाते और एक कवि के तौर पर भी. पोलैंड की कवयित्री विस्वावा शिम्बोस्र्का की एक कविता है कि ‘बीसवीं सदी में मनुष्य को एक साथ अच्छा और ताकतवर होना था. लेकिन अच्छा और ताकतवर आज भी दो मनुष्य हैं’ शायद इसलिए निराशा भी मेरी कविता में बार-बार आती है. लेकिन एक हवाई आशावाद की बजाय एक सी निराशा कहीं बेहतर है. 

एक रचनाकार के तौर पर मेरे साथ दूसरी मुश्किलें भी हैं. मुझे जो लिखना है, वो मैं नहीं लिख पाता हूं. कविता पूरी होने के बाद अकसर लगता है, यह वह नहीं, जो मैं कहना चाहता था. मेरी अपनी किताब, जिसे मैं पंसदीदा कह सकूं, मेरे पास अब तक नहीं है. वह शायद मेरा आने वाला संग्रह हो. 

बचपन में जयंशकर प्रसाद की कहानियां, खासतौर पर ‘आकाशदीप’ मुझे किसी रहस्यमयी दुनिया में ले जाती थीं. इस प्रभाव में मैंने शुरू में कहानियां लिखीं. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का ‘प्रियप्रवास’ मुझे कविता की ओर ले गया और मैं छंद में लिखने लगा. बाद में छंद का जादू टूटा. कुछ मित्रों के कारण मैं आधुनिक कविता के संपर्क में आया. तब मेरी कविता बदली और बदलती चली गयी. कहानियां भी लिखता रहा, जो ‘सारिका’,‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ आदि में प्रकाशित भी हुईं. बाद में कहानियां लिखना छूटता गया. इसका एक बड.ा कारण शायद समय की कमी रही. लेकिन, गद्य मुझे हमेशा से आकर्षित करता रहा है. 

गद्य जीवन के व्यवहार की भाषा है और कविता शायद इस व्यवहार की विशिष्ट गतिविधि. गद्य का ही एक परिष्कृत रूप. त्रिलोचन जी कहते थे कि कविता, कहानी, उपन्यास जो भी लिखो, लेकिन पूरा वाक्य लिखो. जितनी भी बड.ी कविताएं हैं, वे गद्य में हैं. ‘घन घंमड नभ गरजत घोरा/ प्रियाहीन डरपत मन मोरा’ गद्य ही है. कवियों का निकष गद्य है. फारसी में एक कहावत है, अच्छी नज्म वो है, जिसे नस्र यानी गद्य में न बदला जा सके. लेकिन अब अच्छा गद्य दुर्लभ होता जा रहा है. 

इस समय व्यापक स्तर पर विपुल कविता लिखी जा रही है. इसका एक कारण बाजार के दबाव से उपजी कशमकश भी है. समाज एक तरह के संक्रमण से गुजर रहा है. एक ओर संपत्र बनने का दबाव है, दूसरी ओर जीवन की सार्थकता का. सूचना का विनिमय बहुत तेजी से बढ.ा है. ये सूचनाएं दिमाग में एक हलचल पैदा कर ही रही हैं. जगह-जगह पहचान और अस्मिता का संघर्ष जारी है. इन सबसे अभिव्यक्ति की भूख भी बढ.ी है. 

लेखन बडे. पैमाने पर हो रहा है, लेकिन आलोचना के प्रतिमान ध्वस्त हुए हैं. जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी आलोचनात्मक नजरिया नहीं रह गया है. अमेरिका से जो कुछ हमारे पास आ रहा है, हमने मान लिया है कि वह सब अच्छा है. मध्यवर्ग कोई सवाल नहीं उठा रहा, सिर्फ ‘रिसीविंग एंड’ पर है. यह साहित्य में भी है. अच्छी रचना से खराब रचना को अलग करने का विवेक कम हो रहा है. लेकिन कोई छलनी है, जो अपने आप छानती रहती है चीजों को. कोईरचना अच्छी है या बुरी, इसे समय तय करता है. एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है, जो अच्छे को अपना लेती है और खराब को किनारे कर देती है. ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई खराब लेखक, महान लेखक हो गया. 

अच्छा मनुष्य हुए बिना अच्छी कविता नहीं लिखी जा सकती. यहां अच्छाई का अर्थ संवेदनशील होने से है. दूसरों के दर्द को अपने दर्द की तरह महसूस करने से है. यथास्थिति में बदलाव की चाह से है. अन्याय, शोषण, असमानता के खिलाफ खडे. होने से है. परिस्थितियां भी बहुत हद तक लेखक को बनाती हैं. हालांकि अब लेखक होने की अवधारणा बदल रही है. चीजों की अद्वितीयता भी समाप्त हो रही है. उत्तर-आधुनिकतावादियों ने कहा कि किताब को भूल जाइए. यह सिर्फ टेक्स्ट है, इसे चाहे ‘एक्स’ ने लिखा हो या ‘वाई’ने. यह एक बड.ा बदलाव था. बेहतर है या नहीं, मैं नहीं कह सकता. लेकिन इस बदलाव से अब इंकार नहीं किया जा सकता. 

किसी सभ्यता को बहुत उत्रत ढंग से देखने के बाद, उसे खंडहर होते देखना असहनीय है. शायद इसलिए मैं घर से कतराने लगा. उस घर को, जिसे बहुत अच्छी स्थिति में देखा हो, कातर हालात में देखना कठिन था. मेरे पहले संग्रह ‘पहाड. पर लालटेन’ में शायद यह कचोट है. पहाड., जहां मेरा बचपन बीता, मेरी कविताओं में उससे मेरा एक विचित्र और द्वंद्वपरक संबंध है. मैं जहां रहने आया वहां की कठिनाई और पहाड. के जीवन की स्मृति दोनों की टकराहट है. ब्रेख्त की एक पंक्ति मुझे बहुत प्रिय है : ‘पहाड. की यातनाएं मेरे पीछे हैं और मैदान की यातनाएं मेरे आगे.’ एक बार जनसत्ता के संस्थापक-संपादक प्रभाष जोशी और उनकी पत्नी गंगोत्री गये, तो मेरे घर भी रुके. मैं साथ में था. घर में पिता जी, मां और बड.ी बहन थी. प्रभाष जी ने मेरे माता-पिता से पूछा कि क्या यह घर आता है? पिता जी ने कहा इसने ‘घर का रास्ता’ किताब तो मुझे सर्मपित कर दी, लेकिन खुद घर का रास्ता भूल गया.

संगीत से मेरा लगाव रहा है और मुझे लगता है, अमीर खां साहब से बड.ा चितंनशील और दार्शनिक गायक बीसवीं शताब्दी में तो नहीं हुआ. वे एक महान शख्सीयत थे. उन्होंने संगीत को दरबारों और संपत्र लोगों से मुक्त किया है. लेकिन उन्हें बहुत मुसीबतें सहनी पड.ी. लोगों ने कहा, आपके पास न कोई स्पष्ट घराना है, न वैसी आवाज है. उनका घराना मुश्किल से ही तैयार हो पाया, लेकिन उन्होंने जो संगीत रचा, वह अद्भुत है. अमीर खां साहब पर मेरी कविता एक कोशिश है, हमारे सांगीतिक अंतर्विरोध को स्पष्ट करने की. दूसरी बात, संगीत तनाव को विसजिर्त करता है और उदात्तता की तरफ ले जाता है, लेकिन अमीर खां साहब का गायन तनाव को विसजिर्त नहीं करता, बल्कि र्शोता में एक रचनात्मक तनाव भर देता है. 

मैंने मृतक लोगों पर भी कविताएं लिखीं. गोरख पांडे, मोहन थपलियाल, करुणानिधान हों या गुजरात के मृतक, इनका मरना कुछ मूल्यों की मृत्यु थी. इनका जीवन बहुत ऊबड.-खाबड. रहा, लेकिन इन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया. एक कवि और क्या कर सकता है, कविता में इन्हें जीवित करने के सिवा! विदा हो चुके लोग जब किसी रचना में आ जाते हैं, उसमें जीने लगते हैं. कोई भी जब पत्रा पलटता है, उनका जीवन चल पड.ता है.

इस भयानक समय में साहित्य मनुष्य को बचाने की कोशिश तो करता ही है. बचा पाता है या नहीं, यह अलग बात है. लेकिन ऐसी बहुत सी घटनाएं हुई हैं, जब किसी रचना को पढ.कर लोगों का जीवन बदल गया. घोर निराशा से निकल कर उन्होंने फिर से जीना शुरू किया. समाज की स्मृति और संवेदना में रचनाओं का असर देर-सबेर होता है. अगर हमारा एक विशाल पढ.ा-लिखा तबका शोषण, असमानता, अन्याय के विरुद्ध है, तो उसकी संवेदना पर प्रेमचंद के उपन्यासों का कोई प्रभाव जरूर रहा होगा. साहित्य की सार्थकता मेरे लिए यही है. 

                               प्रीति सिंह परिहार युवा पत्रकार हैं