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14 March 2013

तुर्की के समाज का आईना : स्नो


इस पुरानी समीक्षा को देख कर यह लग रहा है की जल्दबाजी और स्पेस की कमी के दबाव में की गयी अखबारी समीक्षा किस तरह अधूरी रह जाती है. इन दिनों पामुक को पढ़ते हुए इस लिखे हुए की याद आयी. उम्मीद है इस पर फिर से कुछ लिखूंगा.




ओरहन पामुक वर्तमान समय के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक हैं. बहुत कम लेखकों को इतनी लोकप्रियता नसीब होती है, जितनी पामुक को मिली है. कहा जाता है कि तुर्की की जनता पामुक के उपन्यास कुछ इस तरह पढ़ती है, जैसे अपनी नब्ज टटोल रही हो. लेकिन, पामुक की यह लोकप्रियता सिर्फ तुर्की तक ही सीमित नहीं है. पूरी दुनिया पर उनकी लेखनी का जादू सर चढ़ कर बोलता है.
वर्ष 2004 में प्रकाशित ‘स्नो’ की गिनती पामुक के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में होती है. इस उपन्यास का हिंदी में भी अनुवाद हो चूका है. पिछले कुछ वर्षो में हिंदी में विदेशी भाषाओं के महत्वपूर्ण उपन्यासों के अनुवादों का जो चलन शुरू हुआ है, इसे उसी कड़ी में देखा जा सकता है. 
'स्नो’ जमा देने वाली बर्फ के भीतर से प्रेम और राजनीति की धधकती हुई कहानी कहता है. पामुक के दूसरे उपन्यासों की ही तरह यह उपन्यास तुर्की समाज की आत्मा की यात्र है. एक ऐसे तुर्की की यात्रा जो एक साथ विभाजन की शाश्वत पीड़ा, आशा, हताशा और रहस्य से भरा हुआ है. इस उपन्यास का केंद्रीय नायक ‘का’ है. एक कवि. निराशा से भरा हुआ, लेकिन फिर भी लोगों के आकर्षण का केंद्र. उसने वर्षो से कुछ नया नहीं लिखा. उपन्यास में का खुद अपनी कहानी नहीं कहता. उसकी हत्या के बाद उसकी कहानी कथावाचक द्वारा सुनाई जाती है, जिसका नाम ओरहन है. 'का' का पुराना दोस्त.
उपन्यास की शुरुआत का के 12 वर्षो के राजनीतिक निर्वासन के बाद इंस्तांबुल लौटने से होती है. वह अपनी मां की अंत्येष्टि करने को लौटा है. कार्स के लिए वह अपनी यात्र शुरू ही करता है कि एक भयंकर बर्फ की आंधी उसे घेर लेती है. तुर्की में ‘कार ’ का अर्थ होता है बर्फ. मूल तुर्की में यह उपन्यास इसी नाम से छपा था. का अपनी पहचान एक पत्रकार के रूप में बताता है, जिसका मकसद हाल में हुई कुछ हत्याओं के रहस्य को सुलझाना है. लेकिन यही उसका वास्तविक मकसद नहीं है.
दरअसल, प्रेम की एक पुरानी डोर उसे अपनी ओर खींच रही है. वह इपेक को देखना चाहता है. इपेक जो उसके छात्र जीवन की दोस्त है. इपेक की शादी का के एक वक्त के दोस्त से हुई थी, जो अब कट्टरपंथी राजनेता बन गया है. दोनों के बीच अब तलाक हो गया है. बर्फ के कारण का आगे नही बढ़ पाता. वह एक पुराने खडंहर हो चुके शहर के चक्कर लगाता है. यहां इतिहास बार-बार उसके सामने प्रकट होता है. प्राचीन ऑटोमन साम्राज्य के अवशेष, खाली अर्मीनियाई चर्च, रूसी शासकों के भूत और अतातुर्क की तसवीर.
अतातुर्क जिसने आधुनिक तुर्की गणतंत्र की नींव रखी और एक क्रूर आधुनिकता के कार्यक्रम तुर्की वासियों पर लाद दिया. जिसमें सिर ढकने वाले स्कार्फ पर प्रतिबंध भी शामिल था. का को एक पत्रकार के रूप में रखकर पामुक ने विभिन्न विचारों और आवाजों को अपने उपन्यास में शामिल करने में सफलता हासिल की है. यहां एक टूटे हुए साम्राज्य के भीतर उठने वाले कई सवाल पाठक के सामने प्रकट होते हैं. मसलन, हमें ताकतवर होना चाहिये था. हमें अपने ऊपर शर्म आनी चाहिए. आखिर ऐसा किसकी वजह से हुआ? साथ ही है अपनी अस्मिता को लेकर असहजता. यही तुर्की की ऐसे जगहों की प्रमुख आवाज है और स्नो उपन्यास की भी.
‘का’ मृत लड़कियों के बारे में पता करना चाहता है. लेकिन उसे विरोध का सामना करना पड़ता है. तुर्की की धर्मनिरपेक्ष सरकार नहीं चाहती कि वह लड़कियों की आत्महत्या पर लिखे. सरकार इसे अपनी इज्जत पर धब्बे की तरह देखती है. उसे पुलिसिया जासूस घेर लेते हैं. आम नागरिक भी उसके प्रति शंकालु हो जाते हैं. का देखता है कि तुर्की की धर्मनिरपेक्ष सरकार धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ही किस तरह से क्रूरता बरत रही है और कैसे इसके खिलाफ इसलामी कट्टरपंथ अपनी जड़ें जमा रहा है.
उपन्यास में एक घटना है जब ‘का’ एक पेस्ट्री की दुकान में खड़ा होता है, तभी कुछ बंदूकधारी आते हैं और हिजाब पहन कर आने वाली छात्र को संस्थान से बाहर करन वाले संस्थान के निदेशक की हत्या कर देते हैं. वह किसी तरह उस इसलामी कट्टरपंथी ब्लू से मिलता है, जिसका हाथ संस्थान के निदेशक की हत्या में है. यहां वह इसलामी कट्टरपंथियों की दलील सुनता है.
यह संभवत: पामुक का पहला उपन्यास है जिसमें स्त्री को इतनी प्रमुखता दी गयी है और वह कथानक के केंद्र में है. यहां दो प्रमुख और शक्तिशाली स्त्री पात्र हैं. एक, भावनात्मक रूप से टूटी हुई इपेक और उसकी जिद्दी बहन कादीफे. इसके साथ ही हिजाब वाली वे मृत लड़कियां भी हैं, जिनका इस्तेमाल सभी अपने राजनीतिक फायदे के लिए कर रहे हैं. का इन लड़कियों की अनंत पीड़ा को समझता है.
वह महसूस करता है कि समाज के उन पर ढाये गये अत्याचार उतने पीड़ादायक नहीं थे, जितनी पीड़ादायक यह सच्चाई है कि इन्होंने बिना कोई चेतावनी दिये, एक दिन अपने रोजाना के कामों के बीच आत्महत्या का रास्ता चुन लिया.
यह उपन्यास तुर्की के समाज की बेचैनी को गहराई से देखने की कोशिश करता है. का कोई निर्णय कर पाने में खुद को असमर्थ पाता है. उसे न तो पश्चिम के ज्ञानोदय पर पूरा यकीन है, न ही उसे तुर्की में पनप रहे कट्टरपंथ में ही अपने लिए जगह दिखाई देती है. आखिरकार उसे फैसला नहीं लेना पड़ता. उसकी हत्या कर दी जाती है. पामुक के हर उपन्यास का असल हीरो तुर्की है. स्नो भी इस मायने में कोई अलग नहीं है. यह एक ऐसा उपन्यास है जिसके सहारे तुर्की और वहां के समाज के मानस को पढ़ा जा सकता है.

12 March 2013

उपन्यास को पढ़ना एक लैंडस्केप पेंटिंग में दाखिल होना है : ओरहन पामुक



हमारे समय  के बेहद महत्वपूर्ण उपन्यासकार ओरहन पामुक का लेखन पाठक पर जादू सा असर करता है. पामुक ने उपन्यास के साथ साथ साहित्य पर भी काफी लिखा है. दूसरों के लेखन पर भी और अपने लिखने और पढने पर भी. "द नेव एंड  द सेंटीमेंटल  नॉवेलिस्ट" के पहले लेख "व्हाट आवर माइंड्स डू व्हेन वी रीड  नॉवेल" में पामुक ने उपन्यास को एक प्रतिबद्ध पाठक  की नजर से देखा है. लेख के हिंदी अनुवाद की तीसरी कड़ी.



वार एंड पीस उपन्यास में जिस तरह से टाल्सटाय ने पियरे का पहाड़ी की चोटी से बोरोडिनो युद्ध देखने का वर्णन किया है, वह मेरे लिए उपन्यास को पढने मॉडल है.

उपन्यास पढ़ते वक्त हम महसूस करते हैं कि लेखक कई ब्योरों को जानबूझ कर पूर्व नियोजित तरीके से बुन रहा है. आगे बढ़ते हुए अपनी स्मृति में इन ब्योरों को संरक्षित रखने की हमें जरूरत महसूस होती है. ऐसे ब्योरे इस दृश्य में किसी पेंटिंग की तरह साफ-साफ नजर आते हैं. पाठक को एहसास होता है कि वह शब्दों के बीच न होकर किसी लैंडस्केप पेंटिंग के सामने खड़ा है. यहां दृश्यात्मक ब्योरे देने के प्रति लेखक की सतर्कता और शब्दों को लैंड स्केप पेंटिंग में उतार लेने में पाठक की कामयाबी निर्णायक भूमिका में है.

हम ऐसे उपन्यास भी पढ़ते हैं जो बड़े लैंडस्केप, या युद्ध के मैदान में घटित नहीं होते, बल्कि जिनकी कथा कमरों में चलती है. घुटन भरे घर के भीतर के माहौल में. काफ्का का मेटामॉरफॉसिस इसका अच्छा उदाहरण है. इन कहानियों को भी हम उसी तरह से पढ़ते हैं, जैसे हम किसी दृश्यभूमि को देख रहे हैं. अपने मस्तिष्क की आंखों के सहारे इसे एक चित्र में बदलते हुए. हम दृश्य के वातावरण के अनुसार ही ढल जाते हैं, खुद को उससे प्रभावित होने के लिए न सिर्फ छोड़ देते हैं. बल्कि इसकी लगातार खोज भी करते रहते हैं.

मैं एक दूसरा उदाहरण टाल्स्टाय के ही यहां से देता हूं. यह खिड़की के बाहर निहारने जैसी स्थिति से संबंधित है और यह बताता है कि किसी उपन्यास को पढ़ते हुए कोई कैसे उपन्यास के लैंडस्केप में दाखिल हो सकता है. यह दृश्य सार्वकालिक महानतम उपन्यास 'अन्ना कैरेनिना' का है. अन्ना की मास्को में व्रोंसकी से मुलाकात हुई है. रात में अपने घर लौटते के लिए वह पीटर्सबर्ग की ट्रेन में बैठी है. वह खुश है क्योंकि अगली सुबह वह अपने बच्चे और पति से मिलेगी. यहां इस उपन्यास के अनुवाद से मैं उद्धरण दे रहा हूं.

"अन्ना ने अपने हैंडबैग से एक पेपर नाइफ और एक उपन्यास निकाल लिया. लेकिन वह कुछ भी नही पढ़ पाती है. शुरू में वह लोगों की भागदौड़ से परेशान थी. और जब ट्रेन चलनी शुरू हो गयी, तो वह वहां मची शोर  से खुद को नहीं बचा पायी. उधर बांयी हाथ की तरफ की खिड़की में लगे शीशे पर बर्बफारी की तड़तड़ाहट, कंडक्टर का वहां से गुजरना, बाहर भीषण बर्फ की आंधी (ब्लीजार्ड) की बातें - इन सभी चीजों ने मिल कर उसका ध्यान बंटा दिया. आगे भी यह सारा कुछ ऐसा ही था. गाड़ी का उसी तरह हिलना और धक्का देना, खिड़की पर बर्फ का उसी तरह आवाज करते हुए गिरते रहना, तुरंत गरम हवा, तो तुरंत ठंडी हवा का बारी-बारी से आनेवाला झोंका, धुंधलकी रोशनी मे उन्हीं-उन्हीं चेहरों का फिर-फिर दिखाई पड़ना, बार-बार वही आवाजें- इन चीजों के बीच ही अन्ना ने पढ़ना शुरू  किया. वह जो पढ़ रही थी वह समझ रही थी. लेकिन इस तरह से पढ़ना उसके लिए सुखकारी नहीं था. दूसरों के जीवन की छाया का पीछा करना उसे अच्छा नहीं लग रहा था. उसमें खुद से उस दुनिया को जी लेने की जबरदस्त चाहत थी. जब वह किसी उपन्यास में किसी नायिका को किसी बीमार आदमी की तीमारदारी करती देखती थी, तो वह बीमार आदमी के कमरे के चारों और खामोश कदमों में चहलकदमी करना चाहती थी. जब वह किसी संसद सदस्य को कोई भाषण देते हुए सुनती थी, तो उसमें कामना जगती थी कि काश! यह भाषण मैं दे रही होती! जब उसने यह  पढ़ा कि किस  तरह से लेडी मैरी ने शिकारी कुत्ते को साध लिया और सबको आश्चर्यचकित कर दिया, तो उसके मन में भी वैसा खुद करने की तमन्ना जगी थी. लेकिन उसके पास ऐसा कुछ भी करने को नहीं था. और इसलिए धारदार चाकू पर अपनी छोटे हाथों की उंगलियां चलाते हुए, वह खुद को जबरदस्ती पढ़ने में लगा रही थी. "


अन्ना पढ़ पाने में असमर्थ क्यों है? क्योंकि वह व्रोंसकी के बारे में सोच पाने से खुद को नहीं रोक पा रही है. क्योकि वह जीना चाहती है. अगर वह उपन्यास पर एकाग्रचित्त हो पाती, तो वह आसानी से यह कल्पना कर पाती कि अपने घोड़े पर सवाल लेडी मैरी शिकाकारी कुत्तों का पीछा कर रही है. वह इस दृश्य को ऐसे देख पाती जैसे वह इसे अपनी खिड़की से देख रही हो, और धीरे-धीरे वह उस दृश्य में खुद शामिल हो जाती.

कई उपन्यासकारों को लगता है कि किसी उपन्यास के पहले पन्ने को पढ़ना किसी लैंडस्केप पेंटिंग में दाखिल होने जैसा है. चलिए याद करते हैं कि स्टेंडहल किस तरह से 'द रेड एंड दि ब्लैक' की शुरुआत करते हैं. हम सबसे पहले काफी दूर से वेरियर शहर को देखते हैं. वह पहाड़ी जिस पर यह अवस्थित है. सफेद घर जिन पर लाल खपरैलों वाली छतें हैं. फूलते हुए चेस्टनट के पेड़ गुच्छों में नजर आते हैं और किसी जमाने में  शहर को किले की तरह घेरनेवाला ढांचा जो अब अवशेषों में ही बचा है. नीचे डूब्स नदी बह रही है. तब हम उन आरा मिलों को देखते हैं, उन कारखानों को देखते हैं, रंगीन छींट वाले कपड़े- टाॅयल्स पिंटेस का निर्माण करते हैं.
सिर्फ एक पेज के बाद हमारी मुलाकात मेयर से हो चुकी होती है, जो इस उपन्यास का केंद्रीय किरदार है. हम उसके दिमाग के सांचे की पहचान भी कर चुके होते हैं. एक उपन्यास को पढ़ने का असली सुख दुनिया को बाहर बैठ कर देखने में नहीं है, बल्कि उन चरित्रों और किरदारों की आंखों से उस दुनिया को देखने में है, जिसमें वे रह रहे हैं. जब हम कोई उपन्यास पढ़ रहे होते हैं, तो हम लंबे-लंबे दृश्यों, जल्दी-जल्दी फिसल रहे क्षणों, सामान्य विचारों और विशिष्ट घटनाओं के बीच तेजी से खुद को डोलता हुआ पाते हैं. इतनी तेज रफ्तार से जो किसी भी दूसरी साहित्यिक विधा में संभव नहीं है.

जारी 


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19 February 2013

उपन्यास की जादुई दुनिया


 हमारे समय  के बेहद महत्वपूर्ण उपन्यासकार ओरहन पामुक का लेखन पाठक पर जादू सा असर करता है. पामुक ने उपन्यास के साथ साथ साहित्य पर भी काफी लिखा है. दूसरों के लेखन पर भी और अपने लिखने और पढने पर भी. द नेव एंड  द सेंटीमेंटल  नॉवेलिस्ट का पहला लेख व्हाट आवर माइंड्स डू व्हेन वी रीड नावेल में पामुक ने उपन्यास को एक प्रतिबद्ध पाठक  की नजर से देखा है. लेख के हिंदी अनुवाद की दूसरी कड़ी.


उपन्यास पढ़ते वक्त हमारी आत्मा, हमारे दिमाग में क्या चल रहा होता है?  उस समय हमारे भीतर पैदा हो रहा रोमांच, उस रोमांच से कैसे अलग होता है, जिसे हम फिल्म देखते वक्त, किसी पेंटिंग को निहारते वक्त, कोई कविता, यहां तक कि महाकाव्य को सुनते वक्त महसूस करते हैं! एक उपन्यास समय-समय पर हमें जीवनी, फिल्म, कविता, पेंटिंग, या परीकथा से मिलने वाली खुशी दे सकता है. लेकिन इस कला का सच्चा और विशिष्ट  प्रभाव मौलिक रूप से दूसरी साहित्यिक विधाओं, फिल्म, चित्रकारी, से अलग है. इस अंतर को दर्शाने की शुरुआत मैं आपको यह बताने से कर सकता हूं कि जवानी के दिनों में पूरे भावावेश में उपन्यास पढ़ते वक्त मैं क्या करता था और मेरे भीतर किस तरह की जटिल छवियां जन्म लिया करती थीं.
म्यूजियम घूमने जानेवाले किसी व्यक्ति की तरह, जो सबसे पहले किसी पेंटिंग से अपनी आंखों(दृष्टि इंद्रिय) का मनोरंजन करना चाहता है, उन दिनों मैं सक्रियता, द्वंद्व, और लैंडस्केप की समृद्धि को प्राथमिकता दिया करता था. यह महसूस करना कि मैं किसी के निजी जीवन का गुप्त रूप से साक्षी बन रहा हूं और  सामान्य रास्तों के के स्याह  हिस्सों का अन्वेषण करना मुझे आनंदित किया करता था. लेकिन यह मत समझिए कि मेरे भीतर जो चित्र बना करते थे वे हमेशा बेचैन किस्म के होते थे. जवानी के दिनों में उपन्यास पढ़ते हुए कभी मेरे भीतर एक व्यापक, गहरा और बेहद शांत लैंडस्केप का जन्म होता था और कभी रोशनी बाहर चली जाती थी और स्याह और सफेद के किनारे स्पष्ट हो कर एक दूसरे से अलग हो जाया करते थे. छायाएं चक्कर काटने लगती थीं. कभी-कभी मैं इस एहसास पर चकित होता रहता था कि पूरी दुनिया अलग ही रोशनी से बनी हुई है. और कभी-कभी सुबह का धुंधलका बाकी हर चीज पर छा जाता था-पूरा ब्रह्मांड एक भावना, एक स्टाइल में तब्दील हो जाया करता था. मुझे इससे खुशी मिला करती थी. मुझे एहसास होता था कि मैं इस खास वातावरण के लिए ही वह किताब पढ़ रहा था.

धीरे-धीरे जैसे में उपन्यास के भीतर के जीवन में दाखिल होता था, मुझे लगता था कि इंस्तांबुल के बेशिकताश में अपने घर मैं बैठे हुए उपन्यास के पन्ने पलटने से पहले मेरी अपनी ही क्रियाओं की छायाएं- एक ग्लास पानी पीना,  मेरी मां के साथ हुआ मेरा संवाद, मेरे दिमाग में आये विचार और वह छोटा सा असंतोष जो मैंने अपने मन में पाला था, सब धीरे धुंधले हो कर समाप्त होते जा रहे हैं. मुझे एहसास होता था कि वह नारंगी हाथकुर्सी जिस पर मैं बैठा हूं, वह बगल में रखा हुआ बदबू  देता ऐश ट्रे, कालीन बिछा हुआ कमरा, गली में फुटबाल खेलते और एक दूसरे पर चिल्लाते बच्चे, बहुत दूर नौकाओं से आनेवाली सीटी की आवाज, इन  सबका अस्तित्व मेरे दिमाग में सिकुड़ रहा है और एक नयी दुनिया- शब्द  दर शब्द, वाक्य दर वाक्य मेरे सामने खुद को प्रकट कर रही है. जैसे-जैसे में पन्ने पर पन्ने पढ़ता जाता था, यह नया जगत मेरे सामने शीशे की तरह साफ होता जाता था, उन गुप्त चित्रों की तरह जो रीएजेंट डालने के बाद धीरे-धीरे प्रकट होते हैं. रेखाएं, छायाएं, घटनाएं और पात्र प्रखर हो उठते थे. उन शुरुआती क्षणों में वैसी हर चीज जिसके कारण उपन्यास की दुनिया में मेरा प्रवेश देर से हुआ, पात्रों, वस्तुओं और घटनाओं याद करने और उनकी छवि बनाने में जिन चीजों ने अवरोध पैदा किया, मुझे दुख पहुंचाते थे, परेशान करते थे. मुख्य पात्र, जिसके किसी दूर के रिश्तेदार की असल नातेदारी मुझे याद नहीं आती थी,  कोई संवाद जिसके बारे में मुझे लगा था कि इसके दोहरे मायने हैं, लेकिन मैं उस दूसरे  मायने को समझ नहीं पाता था, यह सब मुझे बेहद परेशान किया करता था. और जब मेरी आंखें शब्दों से गुजर रही होती थीं, मैं थोरी अधीरता और खुशी के साथ यह कामना किया करता था कि सारी चीजें अपनी जगह पर व्यवस्थित हो जायेंगी. उस समय मेरी सोच के सारे दरवाजे पूरी तरह खुल जाते थे, जैसे किसी कमजोर जानवर को बिल्कुल अनजान जगह पर छोड़ दिया गया हो. मेरा दिमाग लगभग खलबली की स्थिति में काफी तेज चलने लगता था. जैसे ही मैं अपना पूरा ध्यान उपन्यास के ब्योरों पर लगाता था, ताकि उस दुनिया का अभ्यस्त हो सकूं, जिसमें मैं दाखिल होने जा रहा हूं, मुझे शब्दों को दृश्यात्मकता देने में, उपन्यास में वर्णित घटनाओं की छवि बनाने में मुश्किल आने लगती थी.
कुछ देर बाद यह गहन और थका देनेवाला प्रयास रंग लाता था और मेरे सामने वह भव्य लैंडस्केप प्रकट हो जाता था, जिसे मैं देखना चाहता था. जैसे कि कोई बड़ा महाद्वीप कोहरे को चीर कर अपने समस्त रंगों के साथ आंखो के सामने प्रकट हो जाये. तब मैं उपन्यास में दर्ज घटनाओं और ब्योरों को कुछ इस कदर देख पाता  था, जैसे कि कोई अपनी खिड़की से बाहर के दृश्यों को आसानी से देख रहा हो...

जारी...



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ओरहन पामुक की किताब 'द नेव एंड द सेंटीमेंटल नोवेलिस्ट' के पहले अध्याय 'व्हाट आवर माइंड्स डू, व्हेन वी रीड नोवेल्स' का अंश 

18 February 2013

उपन्यास दूसरा जीवन हैं...



 हमारे समय  के बेहद महत्वपूर्ण उपन्यासकार ओरहन पामुक का लेखन पाठक पर जादू सा असर करता है. पामुक ने उपन्यास के साथ साथ साहित्य पर भी काफी लिखा है. दूसरों के लेखन पर भी और अपने लिखने और पढने पर भी. द नेव एंड  द सेंटीमेंटल नॉवेलिस्ट का पहला लेख व्हाट आवर माइंड्स डू व्हेन वी रीड नावेल में पामुक ने उपन्यास को एक प्रतिबद्ध पाठक  की नजर से देखा है. लेख के हिंदी अनुवाद की पहली कड़ी..
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उपन्यास दूसरा जीवन हैं. सेकेंड लाइव्स. फ्रांसीसी कवि गेरार्ड दि नेरवाल ने जिस सपने की बात की थी, उपन्यास ठीक उसी तरह हमारे जीवन के रंगों और जटिलताओं के बारे में बात करते हैं, जिसमें ढेर सारे लोग होते हैं, ढेर सारे चेहरे और ढेर सारी वस्तुएं. जिनके बारे में हमें यह लगता है कि हम उन्हें पहचानते हैं. सपनों की तरह उपन्यास पढ़ते वक्त, हमारा सामना जिन चीजों से होता है, हम उनकी असाधारणता के इस कदर वशीभूत हो जाते हैं कि हममें अपने देश-काल का बोध समाप्त हो जाता है. हम अपने आपको काल्पनिक घटनाओं और लोगों के बीच पाते हैं, जिन्हें हम देख रहे होते हैं. तब हमें वह काल्पनिक जगत जिससे हमारा सामना हो रहा है, जिसका हम लुत्फ ले रहे होते हैं, वास्तविक जीवन से भी ज्यादा वास्तविक लगता है.
चूंकि ये दूसरी जिंदगियां हमें यथार्थ से भी ज्यादा यथार्थ लग सकती हैं, इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि हम उपन्यास को यथार्थ की जगह प्रतिस्थापित कर देते हैं, या कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि हमें उपन्यास से यथार्थ का भ्रम होता है. लेकिन हम कभी भी इस भ्रम के लिए शिकायत नहीं करते. न ही अपनी सोच के बचकानेपन पर. इसके उलट, जैसा कि कई बार कुछ सपनों के लिए होता है, हम चाहते हैं कि उपन्यास चलता रहे, खत्म न हो. हम आशा करते हैं, यह दूसरी जिंदगी हममें यथार्थ और प्रामाणिकता का सतत बोध जगाती रहे. कल्पित कथाओं के बारे में हमारी जानकारी के बावजूद हम  परेशान और असहज हो जाते हैं, जब उपन्यास इस वास्तविक जिंदगी के भ्रम को बचाने में नाकाम हो जाता है.  हम सपने को सच मानकर सपने देखते हैं. सपने की यही परिभाषा है. इसी तरह हम उपन्यास पढ़ते हैं, उन्हें यथार्थ मान कर- लेकिन, कहीं न कहीं हमारे मन में यह एहसास भी होता है कि हमारा ऐसा मानना गलत है. यह अंतर्विरोध उपन्यास की प्रकृति से जन्म लेता है. हम अपनी बात की शुरुआत इस बात पर जोर देते हुए कर सकते हैं कि उपन्यास की कला अंतर्विरोधी स्थितियों पर एक साथ यकीन करने की हमारी क्षमता से जन्म लेता है.

''हम सपने को सच मानकर सपने देखते हैं. सपने की यही परिभाषा है. इसी तरह हम उपन्यास पढ़ते हैं, उन्हें यथार्थ मान कर- लेकिन, कहीं न कहीं हमारे मन में यह एहसास भी होता है कि हमारा ऐसा मानना गलत है. यह अंतर्विरोध उपन्यास की प्रकृति से जन्म लेता है. "

मैं 40 वर्षों से उपन्यास पढ़ रहा हूं. मैं जानता हूं कि उपन्यास को लेकर हम अनेक मुद्रा अख्तियार कर सकते हैं. अनेक तरीकों से हम अपनी अपनी आत्मा और दिमाग को इसे सुपुर्द कर सकते हैं. इसे हल्के में ले सकते हैं. गंभीरता से भी. और ठीक इसी तरह मैंने अपने अनुभव से जाना है कि एक उपन्यास को पढ़ने के भी कई तरीके हो सकते हैं. हम कभी तर्क के सहारे पढ़ते हैं. कभी आंखों से, कभी कल्पनाओं के सहारे, कभी दिमाग का  एक छोटा सा अंश खर्च कर. कभी हम उपन्यास को उस तरह से पढ़ते हैं, जिस तरह से हम उसे पढ़ना चाहते हैं और कभी-कभी अपने अस्तित्व के रेशे-रेशे को उसे समा कर. मेरी युवावस्था में एक दौर ऐसा था जब मैं पूरे समर्पण के साथ, यहां तक कि हर्षोन्मत्ता की स्थिति में उपन्यास पढ़ा करता था.  उन वर्षों में यानी अठारह से तीस वर्ष की आयु तक (1970-1982) मैं अपने दिमाग और आत्मा में उमड़नेवाले हर भाव को उस तरह बयान कर चाहता था, जिस तरह एक चित्रकार पहाड़ों, मैंदानों, पेड़ों और नदियों से भरे किसी चटक, जटिल, उर्जावान लैंडस्केप को पूरी बारीकी और स्पष्टता से उकेरता है.

जारी....
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ओरहन पामुक की किताब THE NAIVE AND THE SENTIMENTAL NOVELIST में संकलित  WHAT OUR MINDS DO WHEN WE READ NOVELS लेख का शुरूआती अंश...