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13 March 2013

नृत्य, सितारा और जिंदगी




भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से नवाजने की घोषणा की थी, लेकिन उन्होंने इसे अपना अपमान मानते हुए ठुकरा दिया और कहा कि देना है, तो भारत रत्न दें. और वे गलत नहीं थीं. आखिर वे सितारा देवी थीं. रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें ‘नृत्य साम्राज्ञी’ कहा था. टैगोर के  कहे गये को वे आज भी जी रही हैं. कथक  साम्राज्ञी सितारा देवी के सफ़र को याद करता हुआ यह लेख... 

क थक और सितारा देवी एक दूसरे का पर्याय हैं, यह तो बहुत बार सुना था. उनकी दमदार शख्सीयत, बेबाक अंदाज और जिंदादिली के बारे में कईबार पढ़ा भी था. उनके बारे में सुन कर और पढ. कर बनायी गयी धारणा तब हकीकत में तब्दील हो गयी, जब उन्हें तकरीबन चार साल पहले गुजरात के सौराष्ट्र स्थित गांव तलगाजडा  में एक कार्यक्रम में शिरकत करते देखा था. उनका बुढापा सहारे की उंगली थामे मंच पर पहुंचा, पर वे एक खूबसूरत गुड़िया  की तरह लग रही थीं. थोड़ी ही देर में एक युवा सितारा देवी राम वंदना के साथ थिरकने की कोशिश करने लगीं.2011 में लीजेंड ऑफ इंडिया लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड लेने दिल्ली पहुंचीं, तो वे 91 की हो चुकी थीं. एक बार फिर उन्हें देखकर लगा, बेशक उम्र पर चांदी के धागे लिपटते जाते हैं, लेकिन सितारों पर उनकी परत हावी नहीं हो पाती. खासकर तब, जब वह ‘सितारा’ सितारा देवी हों. रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें ‘नृत्य साम्राज्ञी’ कहा था. सितारा देवी उनके कहे गये को आज भी जी रही हैं. शायद यही वजह थी कि जब भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से नवाजने की घोषणा की थी, उन्होंने इसे अपना अपमान मानते हुए ठुकरा दिया और कहा कि देना है, तो भारत रत्न दें.

सितारा देवी की उम्र जितनी ही लंबी उनकी जिंदगी की दास्तान भी है. उनकी जिंदगी की किताब के पन्ने हम जैसे-जैसे पलटते जाते हैं एक महान नृत्यांगना के साथ एक अदाकारा को भी जानते हैं. जन्म के समय चेहरा टेढ़ा होने के चलते कुछ समय के लिए माता-पिता से दूर कर दी गयी लड.की को अपनी प्रतिभा से नृत्य साम्राज्ञी बनते हुए देखते हैं.


कथक को मूल रूप से कथानृत्य मानने वाली सितारा देवी के पिता सुखदेव महाराज बनारस घराने से थे और नृत्य नाटिका लिखा करते थे. संगीत और नृत्य में पारंगत सुखदेव महराज ने अपनी बेटियों को परिवार और समाज के विरुद्ध जाकर नृत्य का प्रशिक्षण दिया. इस वजह से उन्हें अपने पंरपरावादी और धार्मिक ब्राह्मण बिरादरी से बहिष्कृत भी होना पड.ा. सितारा देवी का जन्म 1920 ईस्वी में कोलकाता में दिवालीवाले दिन हुआ था. नृत्य सीखने के कारण आठ साल की उम्र में हुईउनकी शादी भी टूट गयी. बहुत छोटी उम्र में ही नृत्य प्रस्तुतियों से प्रसिद्धि पानेवाली सितारा देवी के पास फिल्मों के प्रस्ताव भी आने लगे. फिल्मकार निरंजन शर्मा के अनुरोध पर पिता ने न चाहते हुए भी महज 12-13 साल की उम्र की सितारा को मां और बुआ के साथ फिल्म ‘उषाहरण’ में काम करने मुंबई भेज दिया. इस फिल्म में उन्होंने एक बाल नृत्यांगना की भूमिका निभायी थी.

तकरीबन दो दशक तक उन्होंने फिल्मों में कभी अभिनेत्री तो कभी बतौर सहायक अदाकारा काम किया. लेकिन जब यह एहसास उन पर हावी होने लगा कि नृत्य ही उनकी असल साधना और जीवन है, उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली और खुद को शास्त्रीय नृत्य को समर्पित  कर दिया. कथक की मूल विधा को बरकरार रखते हुए सितारा देवी ने अपनी एक अलग शैली विकसित की. 55 की उम्र में उनका लगातार पौने बारह घंटे नृत्य करने का विश्‍व रिकॉर्ड लोगों को नृत्य के प्रति उनके जुनून से रूबरू कराने को काफी था. उन्हें मिले अनगिनत सम्मान और उपाधियां भारतीय शास्त्रीय नृत्य में उनके योगदान के सामने बेमानी से लगते हैं.

सितारा देवी का निजी जीवन काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा, लेकिन इसने उनकी कला को कभी प्रभावित नहीं किया. फिल्मों में काम करते हुए ही उनकी शादी के आसिफ से हुई, लेकिन दो-तीन साल बाद दोनों का अलगाव भी हो गया. एक नृत्य प्रस्तुति के दौरान सितारा की मुलाकात प्रताप बरोट से हुई. प्रताप से सितारा की शादी एक दशक पूरा करते-करते टूट गयी. लेकिन कत्थक से उनका साथ बना रहा. सितारा देवी ने युवाओं में नृत्य के प्रति जुनून की कमी का हवाला देते हुए नृत्य सिखाना बहुत पहले बंद कर दिया. लेकिन उन्हें आज भी नृत्य-कला से जुडे. कार्यक्रमों में बच्चों  जैसे आह्लाद के साथ सबसे मिलते-जुलते देखा जा सकता है. अशोक बाजपेयी ने सितारा देवी के लिये लिखा था ‘उन्हें जीना, नाचना और हंसना बखूबी आता है और उसे दूसरों के साथ बांटना भी. अब ये अलग बात है कि हम उनके दिए हुए को कितना सहेज पाते हैं...

प्रीति सिंह परिहार