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22 October 2013

रफी की आवाज के राहगीर

 आपको शब्बीर कुमार याद हैं? जी हां वही ‘एक शाम रफी के नाम’ वाले शब्बीर कुमार, जिनकी आवाज से सजे ‘जब हम जवां होंगे, ‘जिहाल-ए-मिस्किन’,‘जिंदगी हर कदम एक नयी जंग है’ जैसे गीत हम आज भी गाते हैं, गुनगुनाते हैं, एफएम पर ये गीत जब बजते हैं तो  थोड़ा ठहर जाते हैं. इन्ही शब्बीर कुमार के फ़िल्मी सफ़र पर छोटा सा लेख  प्रीति सिंह परिहार का.  अखरावट


हिंदी फिल्म के महानतम पार्श्व गायकों में शुमार मोहम्मद रफी की गायिकी के अंदाज और आवाज को उनके बाद बहुत से गायकों ने अपनाने की कोशिश की और बतौर गायक एक पहचान भी हासिल की.

अस्सी के दशक में एक ऐसे ही गायक उभरे शब्बीर कुमार. जी हां वही ‘एक शाम रफी के नाम’ वाले शब्बीर कुमार. रफी साहब के इंतकाल के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए इस नाम से शुरु हुआ उनका आर्केस्ट्रा कभी पूरे देश में मशहूर हुआ था.

गुजरात के वड़ोदरा में पले-बढ़े  शब्बीर शेख, जिन्हें दुनिया शब्बीर कुमार के नाम से जानती है, रफी साहब की गायिकी के दीवाने थे. उन्होंने रेडियों में मोहम्मद रफ़ी को सुनते हुए गाना सीखा. वह भी दूसरों के घर जाकर, क्योंकि उनके पिता घर में रेडियो रखने के खिलाफ थे. फिल्मों में गाने का ख्याल दूर तक उनके जेहन में नहीं था. एक इंटरव्यू में शब्बीर ने कहा था, "जिंदगी में संगीत से पहले पेंटिंग आ गई थी. गायक न बनता तो आर्टिस्ट होता.  किसी जमाने में दो से आठ रूपये में वडोदरा में चित्र बना कर कमा लेता था और उससे अपनी पॉकेट मनी निकाल लेता था. " हाँ, शब्बीर कुमार को संगीत का बेहद शौक था.  वे इतना अच्छा गा लेते थे कि दोस्तों ने उनसे कहा कि आर्केस्ट्रा में क्यों नहीं गाते? शब्बीर आर्केस्ट्रा के लिए गाने लगे और धीरे-धीरे रफी के गीत गाने के लिए लोकप्रिय हो गये. रफी से मिलती आवाज शब्बीर कुमार को आर्केस्ट्रा की दुनिया से पार्श्व गायन में ले आयी. हुआ यूं कि अमिताभ अभिनीत ‘कुली’ के गाने रफी साहब गानेवाले थे, पर कुदरत को यह मंजूर न था. फिल्मकार मनमोहन देसाई किसी और गायक की आवाज के बारे में सोच ही नहीं पा रहे थे. तब संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने ऊषा खन्ना की मदद से शब्बीर कुमार की "खोज" की.

उस समय यह चरचा आम थी कि ‘एक लड़का आया है जिसकी आवाज मोहम्मद रफी से मिलती-जुलती है.’ कुली के गानों की लोकप्रियता से उन्हें ‘बेताब’ में गाने का मौका मिला और पार्श्व  गायन के लिए फिल्म फेयर अवॉर्ड भी. ‘बेताब’ में लता मंगेशकर के साथ उनके गाये ‘जब हम जवां होंगे’ और ‘बादल यूं गरजता है’ तो आपको याद ही होंगे. ऐसे ही कुछ और यादगार गीत,‘जिहाल-ए-मिस्किन’,‘जिंदगी हर कदम एक नयी जंग है’,‘याद तेरी आयेगी’, ‘तुम्हे अपना साथी बनाने से पहले’, "गोरी हैं कलाइयां" शब्बीर की आवाज से सजे हैं. उन्होंने लता और आशा, दोनों के साथ गाया। 1980 के दशक में शब्बीर ने लगभग हर संगीतकार के साथ काम किया.  लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर डी बर्मन, राजेश रोशन, बप्पी लाहिरी, अनु मालिक, रवींद्र जैन जैसे शीर्ष संगीत निर्देशकों ने जो संगीत रचा, उसे शब्बीर ने स्वर दिया. पर, कई सुपर हिट गानों के बाववजूद फिल्मों में शब्बीर का फ़िल्मी सफर एक दशक से ज्यादा का नहीं रहा और गायिकी का यह सितारा माया नगरी की निगाहों से ओझल सा हो गया. वैसे शब्बीर आर्केस्ट्रा की दुनिया में आज भी लोकप्रिय और सक्रिय हैं, लेकिन कभी-कभार ही किसी फिल्म गीत में उनकी आवाज सुनी जा सकती है. पेंटिंग वे आज भी करते हैं. उन्होंने सलमान खान को उनकी फिल्म दबंग का पोट्रेट बना कर दिया था. उनके बेटे दिलशाद भी उभरते  हुए गायक हैं. दिलशाद ब्लू और रा-वन के लिए गाना गा चुके हैं. 

शब्बीर अब भले फिल्मों के लिए न के बराबर गाते हों, भले हमारा बचपन पीछे छूट गया हो और हम जवान हो गए हों और जाने कहाँ आ गये हों, लेकिन हम जहाँ भी हों आज भी शब्बीर कुमार के गाये गीतों और उनकी आवाज को तो अक्सर याद करते ही रहते हैं. उनके गानों के साथ पुराने दिनों में लौटते रहते है. 

7 May 2013

साहित्यिक किस्सों की सिनेमाई रील

साहित्य और सिनेमा के रिश्ते पर यह जानकारीपरक लेख प्रीति सिंह परिहार ने तैयार किया है...
आप भी पढ़ें. अखरावट 



साहित्य और सिनेमा दो अलग-अलग विधाएं हैं. विधा में अंतर के बावजूद दोनों के बीच एक धागा जुड.ा रहा है. बीच की नजदीकी जरूर समय के साथ बढ.ती-घटती रही, लेकिन कल भी साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बन रही थीं और आज भी बन रही हैं. कुछेक साहित्यक कृतियां ऐसी भी हैं, जिन्हें हर दौर के फिल्मकारों ने अपनी-अपनी तरह से परदे पर उतारा. बांग्ला लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की ‘देवदास’ इसकी एक मिसाल है. इस उपन्यास पर अब तक हिंदी, बांग्ला, उर्दू, तमिल, तेलुगु और असमिया भाषा में तकरीबन 14 फिल्में बन चुकी हैं. बॉलीवुड के चार निर्देशक अपने-अपने ढंग से ‘देवदास’ को परदे पर उतार चुके हैं. ‘देवदास’ सहित शरतचंद्र की तकरीबन 15 रचनाओं पर हिंदी और बांग्ला में फिल्में बनायी जा चुकी हैं. हिंदी में ‘बिराज बहू’,‘परिणीता’,‘मझली दीदी’,‘स्वामी’,‘छोटी बहू’,‘अपने पराये’ और ‘खुशबू’ ऐसी ही फिल्में हैं. ‘परिणीता’ को तीन बार रुपहले परदे पर जीवंत किया गया है. बांग्ला लेखक विमल मित्र की रचना ‘साहब बीबी और गुलाम’ पर इसी नाम से बनी अबरार अल्वी निर्देशित फिल्म हिंदी की एक अविस्मरणीय फिल्म मानी जाती है. परदे पर साकर हुई साहित्यिक रचनाओं में एक यादगार नाम आर के नारायाण के उपन्यास पर बनी ‘गाइड’ का भी है, जिसके गीत सुन कर आज भी हमारे दिल लरज उठते हैं और रोजी का वह खूबसूरत मासूम चेहरा हमारी आंखों में उतर आता है.

हिंदी साहित्य से फिल्मों में जगह पाने वाली सबसे अधिक रचनाएं हिंदी कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की रही हैं. 1934 में नानूभाई वकील ने ‘सेवासदन’ पर फिल्म बनायी. ‘रंगभूमि’,‘गबन’ और ‘गोदान’ जैसे सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों सहित उनकी कहानी ‘तिरया चरित्र’ और ‘हीरा मोती’ पर भी फिल्में बनीं. मृणाल सेन तेलुगु भाषा में ‘कफन’ को परदे पर लेकर आये, लेकिन मूल कहानी में कईफेरबदल के साथ. फिल्म समीक्षकों की मानें, तो ज्यादातर फिल्मकार प्रेमचंद की रचनाओं को उनके वास्तविक प्रभाव के साथ परदे पर उतारने में पूरी तरह सफल नहीं हो सके. सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की कहानियों ‘शतरंज के खिलाड.ी’ तथा ‘सद्गति’ पर इसी नाम से फिल्में बनायीं, ‘शतरंज के खिलाड.ी’ में उन्होंने बदलाव की पूरी स्वतंत्रता ली, लेकिन इसे परदे पर प्रेमचंद की रचनाओं को उतारने का सबसे सफल प्रयास माना जाता है.

शुरुआती दौर में सिनेमा साहित्य से काफी नजदीक से जुड.ा रहा. ऐसा नहीं था कि साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्में सफल ही हों. फिर भी उन पर फिल्में बन रही थीं, व्यावसायिक सफलता की परवाह के बिना, एक भरोसा लेकर कि शायद लोगों को फिल्म पसंद आ जाये. चेतन आनंद ने मैक्सिम गोर्की की रचना ‘लोवर डेप्थ’ से प्रभावित होकर ‘नीचा नगर’, तो सोहराब मोदी ने शेक्सपियर के ‘हैमलैट’ को आधार बनाकर ‘खून का खून’ बनायी. कुछ फिल्मकारों ने व्यावसायिक पक्ष को परे कर मूल कृति की आत्मा को बनाये रखते हुए सिर्फ कलात्मक पहलू को ध्यान में रखकर फिल्में बनायीं. ऐसी फिल्में चर्चा में रहीं, आलोचकों द्वारा सराही गयीं और सिनेमा से जुडे. किसी न किसी सम्मान से भी नवाजी गयीं, लेकिन दर्शक उनसे अनजान ही रहे. वहीं कुछ फिल्मकारों ने साहित्यिक रचनाओं को व्यावसायिक मानदंड की दृष्टि से परदे पर उतारा और देर-सबेर इसमें सफल भी हुए. 1964 में भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर इसी नाम से किदार शर्मा ने मीना कुमारी, अशोक कुमार और प्रदीप जैसे कलाकारों को लेकर फिल्म बनायी. फिल्म समीक्षकों की नजर में यह साधारण फिल्म थी, लेकिन इस फिल्म को ही नहीं, इसके संगीत को खूब पसंद किया गया. हिंदी की सबसे लोकप्रिय प्रेमकहानियों में से एक चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ का भी फिल्मांकन हुआ. सुनील दत्त और नंदा अभिनीत यह फिल्म मूल कहानी की तरह कोई लकीर नहीं खींच सकी.

एक दौर ऐसा बीता है, जब फिल्म जगत के लोग खूब साहित्य पढ.ा करते थे. कई बार कोई कृति उनके जेहन में कुछ इस तरह जगह बना लेती थी कि वे उसे परदे पर उतारने के लिए अपना सबकुछ दावं पर लगा देते थे. ऐसा ही कुछ हुआ मशहूर गीतकार शैलेंद्र के साथ. फणीश्‍वर नाथ रेणु की कहानी ‘मारे गये गुलफाम’ पर शैलेंद्र ने फिल्म बनाने का सपना देखा. ‘तीसरी कसम’ नाम से बनी इस फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने बासु भट्टाचार्य को सौंपी थी. मुख्य भूमिका में शैलेंद्र के अभित्र मित्र राजकपूर के साथ वहीदा रहमान थीं. इस फिल्म को उस वर्ष सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. लेकिन इसे विडंबना ही कहेंगे कि फिल्म को मिली तत्कालिक असफलता शैलेंद्र के अंत का कारण बन गयी. हालांकि उनकी मौत के बाद यह फिल्म और इसका संगीत इतना कामयाब रहा कि आज इसे हिंदी की क्लासिक फिल्मों में शुमार किया जाता है.

गीतकार शैलेंद्र के साथ जो कुछ हुआ, उससे वाकिफ होने के बाद भी साहित्यिक कृतियों की तरफ फिल्मकारों का झुकाव कम नहीं हुआ. वर्ष1969 में बासु चैटर्जी ने कथाकर राजेंद्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ पर इसी नाम से एक फिल्म बनायी. इसे बेस्ट सिनेमेटोग्राफी का नेशनल अवार्ड और फिल्म फेयर का बेस्ट स्क्रीनप्ले अवार्ड मिला. लेकिन दर्शकों के बीच फिल्म इतनी लोकप्रिय नहीं रही. इसके बाद बासु चैटर्जी ने 1974 में हिंदी की प्रसिद्ध कथा लेखिका मत्रू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर ‘रजनीगंधा’ बनायी. यह अमोल पालेकर तथा विद्या सिन्हा जैसे तब के नवोदित कलाकारों को लेकर बनायी गयी कम बजट की फिल्म थी. बावजूद इसके दर्शकों में यह खूब पसंद की गयी. इसके संगीत का जादू आज भी कायम है. 1975 में इसे फिल्म फेयर का बेस्ट क्रिटिक और बेस्ट फिल्म अवार्ड मिला. मत्रू भंडारी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आपका बंटी’ पर भी फिल्म बनीं, जो कानूनी अड.चनों के चलते ‘समय की धारा’ नाम से प्रदर्शित हुई. बासु चटर्जी ने शतरचंद्र चट्टोपाध्याय की कृतियों पर ‘स्वामी’ और ‘अपने पराये’ जैसी फिल्में बनायीं. पारिवारिक तानों-बानों से सजी ये फिल्में साधारण होकर भी दर्शकों के मन में जगह बनाने में कामयाब रहीं.

साहित्यिक कृतियों पर बन रहे लोकप्रिय सिनेमा के अलावा भी साहित्यिक रचनाओं पर फिल्में बन रही थीं. यहां दर्शक कम थे, लेकिन यथार्थ को एक सार्थकता के साथ परदे पर लाने का जुनून था. फिल्मकार मणिकौल ने मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ और नाटक ‘आषाढ. का एक दिन’ पर इसी नाम से फिल्में बनायीं. इन फिल्मों के जरिए मुख्यधारा के बरक्स समानांतर सिनेमा की एक पगडंडी बनने लगी थी. कुमार शाइनी ने निर्मल वर्मा की कहानी ‘माया दर्पण’ पर फिल्म बनायी, वहीं मणिकौल विजयदान देथा की कहानी ‘दुविधा’, मुक्तिबोध की कहानी ‘सतह से उठता आदमी’ और विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ जैसी रचनाओं में मौजूद यथार्थ को सिनेमाई परदे पर लेकर आये. उन्होंने दोस्तोवस्की के उपन्यास पर ‘इडियट’ और मलिक मोहम्मद जायसी की कविता पर ‘द क्लाउड डोर’ जैसी फिल्में भी बनायीं. विजयदान देथा की कहानी पर बनी ‘दुविधा’ के लिए मणिकौल को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया. राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा की कहानियों पर बाद के फिल्मकारों-प्रकाश झा ने ‘परिणति’ और अमोल पालेकर ने ‘पहेली’ बनायी. इस कड.ी में शैवाल की कहानी पर बनी प्रकाश झा निर्देशित ‘दामुल’ का नाम भी उल्लेखनीय है. इसे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. श्याम बेनेगल ने धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड.ा’ पर इसी नाम से फिल्म बनायी.

एक दौर ऐसा भी गुजरा जब लगा फिल्म जगत साहित्य से पूरी तरह विलग होता जा रहा है लेकिन बीच-बीच में दोनों के बीच जुड.ाव के कुछ चित्र उभरते रहे. ऐसा ही एक चित्र है ‘उमराव जान’. एक्शन फिल्मों के दौर में आयी मिर्जा हदी रुस्वा के उपन्यास ‘उमराव जान अदा’ पर मुजफ्फर अली निर्देशित इस फिल्म की लोकप्रियता को नहीं भुलाया जा सकता. हाल में चेतन भगत के उपन्यासों ‘फाइव प्वाइंट समवन’ और ‘द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माइ लाइफ’ पर ‘3 इडीयट’ और ‘काई पो चे ’ जैसी फिल्में भी सिनेमा को साहित्य से जोड.ती दिखती हैं. चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने हिंदी के प्रसिद्ध कथा लेखक काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर ‘मोहल्ला अस्सी’ नाम से फिल्म बनायी. कथाकार उदय प्रकाश की लंबी कहानी ‘मोहनदास’ पर भी फिल्म बन चुकी है. चेतन भगत का उपन्यास ‘टू स्टेट्स’ भी जल्द ही फिल्माकार होकर परदे पर आने वाला है. 



5 May 2013

सिनेमा पर सुधीर कक्कड़: भारतीय सिनेमा दिवास्वप्नों पर पलता है..

प्रसिद्द मनो-समाजशास्त्री सुधीर कक्कड़ की नजर से सिनेमा की व्याख्या. आप भी पढ़ें. 





1940 के दशक में जब मैं बड.ा हो रहा था, कम से कम पंजाब में तो सिनेमा देखने को भले पूरी तरह अनैतिक न माना जाता हो, आवारगी का एक लक्षण जरूर माना जाता था. ऐसा मध्यवर्गीय और उच्च मध्यवर्गीय परिवारों में तो जरूर था. सिनेमा देखने की आदत को खासतौर पर बच्चों की मानसिकता के निर्माण के लिहाज से खतरनाक समझा जाता था. वैसे हर फिल्म के लिए यही बात लागू नहीं होती थी. भारत में बाकी सारी चीजों की तरह इस मामले में भी एक श्रेणीकरण था. भारतीय फिल्मों की जाति व्यवस्था में कुंग-फू की स्टंट फिल्मों की भारतीय नकलों को सबसे निचले पायदान पर रखा गया था वहीं ‘ब्राह्मण मिथकीय’ और ‘क्षत्रिय ऐतिहासिक’ फिल्में शीर्ष स्थान पर अपना दावा करतीथीं. बचपन में स्टंट फिल्में मुझे सबसे ज्यादा पसंद थीं. मेरी दोस्ती एक दरबान से हो गयी थी. इस तरह मैं इस मामले में खुशनसीब था कि लाहौर में हम कहीं भी जाते, मैं अपनी फिल्मों के प्रति दीवानगी को आगे बढ.ा सकता था. मैंने ‘दीवानगी’ शब्द का इस्तेमाल बिल्कुल इसके शाब्दिक अथरें में किया है. न कि किसी रूपक के तौर पर. फिल्मों के प्रति मेरी भूख कभी न भरनेवाली थी और मेरी खुराक भी कुछ ऐसी ही थी. मैंने ‘रतन’ 16 बार देखी. शिकारी 14 बार और यहां तक कि कादंबरी भी तीन बार. 



सिनेमा देखने जाने से जुड़ी यादें मुझे नोस्टालजिक बनाती हैं और बचपन से जुड.ी दूसरी अच्छी यादों पर भी छा जाती हैं. इस पर एक दिव्य आभामंडल छाया हुआ है. अंधेरे के अकेलेपन में, जिसे एक झिलमिलाती रोशनी चीरती रहती थी और परदे पर एक जादुई लेकिन जानी पहचानी दुनिया रचती थी- मैं एक छोटा सा बा नहीं रह जाताथा, बल्कि ईष्या के साथ देखी जानेवाली वयस्कों की दुनिया का हिस्सा बन जाताथा. हालांकि मैं इस दुनिया की प्रथाओं और रहस्यों को समझता था, लेकिन बेहद धुंधले रूप में. मैं किसी उत्तेजक संवाद के बाद फूट पड.नेवाले ठहाके में शामिल हो जाया करता था, भले ही इसका वास्तविक अर्थ मेरे पल्ले न पड.ा हो. 

भारत में फिल्में जिस दर्शक वर्ग की ओर लक्षित हैं, वह इतना विविधता भरा है, कि इनकी अपील सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों के पार चली जाती है. हर दिन कम से कम डेढ. करोड. दर्शकों द्वारा देखे जानेवाले पॉपुलर सिनेमा के मूल्य और इसकी भाषा काफी समय पहले शहरी चौहद्दियों को पार कर ग्रामीण जनसंख्या की लोक-संस्कृति में शामिल हो गयी है, जहां यह अच्छे जीवन और सामाजिक, पारिवारिक और प्रेम संबंधों से जुडे. विचारों को प्रभावित करने लगा है. किसी क्षेत्र का लोक नृत्य या संगीत का कोई खास रूप जैसे भक्ति भजन जब मुंबई या मद्रास की स्टूडियो की चौखट को पार करता है और दूसरे क्षेत्रों और संभवत: पश्‍चिम के संगीत और नृत्य की शैलियों की भी मिलावट द्वारा रूपांतरित कर पुन: प्रसारित किया जाता है, तो यह लौट कर अपने मूल रूप को भी प्रभावित करता है. इसी तरह फिल्मी दृश्यों, संवादों और साज-सज्जा ने लोक थियेटरों का भी उपनिवेशीकरण शुरू कर दिया है. यहां तक कि धार्मिक पूजा के परंपरागत प्रतीक और मूर्तियां भी फिल्मों में देवताओं और देवियों के प्रस्तुतीकरण से प्रभावित हो रहे हैं. 

लोकप्रिय फिल्मों को मैं एक सामूहिक फेंटैसी, दिवास्वप्नों के समूह के तौर पर देखता हूं. ‘सामूूहिक’ और ‘समूह’ जैसे शब्दों के प्रयोग से मेरा मतलब यह नहीं है कि हिंदी फिल्में मिथकीय सामूहिक अवचेतन या जिसे कभी-कभी सामूहिक चेतना कहा जाता है, उसकी अभिव्यक्ति हैं. इसकी जगह मैं सिनेमा को भारतीय उपमहाद्वीप में रहनेवाली विशाल जनसंख्या के साझा स्वप्नों (फेंटैसी)का वाहक मानता हूं. यह विशाल जनसंख्या सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक रूप से एक दूसरे से जुड.ी है. फेंटैसी शब्द का यहां मेरा अभिप्राय कल्पना जगत से है, जो इच्छाओं से चालित होता है और हमें एक ऐसा वैकल्पिक जगत मुहैया कराता है, जहां हम यथार्थ से अपने पुराने संघर्ष को जारी रख सकते हैं. 

हमारी फिल्मों में फिल्म दर फिल्म स्वप्नों की ऐसी भारी मात्रा में नियमितता आश्‍चर्य में डालती है. एक तरह से जिंदगी की वास्तविक समस्याओं के ऐसे जादुई हल, भारतीय जनमानस में गहरी जमी ऐसे समाधानों की इच्छा की ओर इशारा करते हैं. कुछ लोग भारतीय सिनेमा में इस तरह बाहरी यथार्थ की अनदेखी को अस्वस्थता की निशानी भी मान सकते हैं. खासकर इसलिए भी क्योंकि कोई यह तर्क नहीं दे सकता कि फिल्मों में फेंटैसी भीषण गरीबी से जूझ रहे लोगों को इससे बाहर निकलने का रास्ता देती है. 

इस संदर्भ में पहली बात यह है कि भारत में फिल्म देखनेवालों की असल आबादी गरीबों की नहीं है. दूसरी बात, दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं है, जहां गंभीरतम आर्थिक विपत्रता और राजनीतिक अस्थिरता के दौर में भी इस तरह से लगातार स्वप्न जगत का प्रदर्शन होता रहा है. न ही 1920 के दशक में र्जमनी में आर्थिक संकट के दौरान, न ही द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद जापान में फेंटैसी को इस ऊंचाई तक पहुंचाया गया. हमें यह मानना होगा कि सिर्फ आर्थिक स्थिति भारतीय फिल्मों में दिखनेवाले स्वप्न लोक की व्याख्या नहीं कर सकती. 

मुझे लगता है कि भारतीय सिनेमा में हर जगह दिखायी देनेवाली फेंटैसी का कारण सांस्कृतिक मनोविज्ञान में छिपा है, न कि सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में. दूसरी संस्कृतियों की तरह हमारे यहां भी फिल्मों के एडिक्ट हैं. ये वैसे बदकिस्मत लोग हैं, जिन्हें उनके बचपन में ही दुनिया को वयस्क तरीके से देखने पर मजबूर होना पड़ा. जिन्हें अपनी शुरुआती जिंदगी में हर तरह के जादुई चीजों से वंचित कर दिये जाने के कारण पैदा हुए खालीपन को भरने के लिए फिल्मी दुनिया की फेंटैसी की जरूरत पड.ती है. इस समूह को छोड. दिया जाये, तो कोई भी समझदार भारतीय यह नहीं मानता कि सिनेमा में वास्तविक जिंदगी का अंकन होता है. हालांकि मुझे यहां यह स्वीकार करना चाहिए कि अविश्‍वास को स्थगित रखने की हमारी प्रवृत्ति किसी भी दूसरी संस्कृति की तुलना में कहीं ज्यादा है. 

इस आधार पर देखें, तो मैं भारतीय सिनेमा के दर्शकों को न सिर्फ सिनेमा की कहानी का पाठक मानता हूं, बल्कि उन्हें उसका असल लेखक भी स्वीकार करता हूं. फिर फिल्म निर्माताओं, निर्देशकों, स्क्रिप्ट लेखकों और संगीत निर्देशकों की भूमिका क्या है? मेरा मानना है कि उनकीभूमिका पूरी तरह से यांत्रिक है, जैसे एक प्रकाशक की होती है. जो पास में आयी पांडुलिपियों में से किताबें चुन कर, उसे संपादित कर प्रकाशित करता है. बॉक्स ऑफिस पर पैसा कमाने की चाहत इस बात को पक्का करती है कि फिल्मकार ऐसे दिवास्वप्नों को चुनें और विकसित करें, जो अलग हट कर न हों. फिल्मों को इसलिए दर्शकों की साझा चिंताओं की ओर लक्षित होना होता है. अगर ऐसा नहीं होगा तो सिनेमा की अपील काफी सीमित हो जायेगी. जो व्यावसायिक रूप से नुकसानदेह होगा.

(सुधीर कक्कड. की किताब ‘इंडियन आइडेंटिटी’ का अनुवादित-संपादित अंश)

ये भी पढ़ें  : मेरी निगाह में सिनेमा : बलराज साहनी, सत्यजीत रे, अडूर गोपालकृष्णन

4 May 2013

मेरी निगाह में सिनेमा : बलराज साहनी, सत्यजीत रे, अडूर गोपालकृष्णन


बलराज साहनी



मैं दो बीघा जमीन में अपनी भूमिका को हमेशा गर्व के भाव के साथ देखूंगा. बेशक मैं इस भूमिका की स्मृतियों को अपनी आखिरी सांस तक सहेज कर रखूंगा. - यह कबूल करने के बाद मुझे इस बात का हक दिया जाना चाहिए कि मैं इस फिल्म से जुड़े कुछ तकनीकी पक्षों पर बात करूं. यह फिल्म रवींद्रनाथ टैगोर की इसी नाम से लिखी एक कविता पर आधारित थी. लेकिन इसके बावजूद विमल राय ने गुरुदेव के प्रति इसके लिए कोई कृतज्ञता व्यक्त नहीं की है. मेरा मानना है कि न्याय और भलमनसाहत का तकाजा है कि इसे स्वीकार किया जाये.
इस फिल्म के मुख्य किरदार में दो खामियां हैं, जो इसकी ताकत को काफी हद तक कम कर देती है. पहला, वह कभी भी उस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं करता, जिसका उसे सामना करना होता है. दूसरा, वह अपने दोस्तों और सहकर्मियों को खुद से दूर कर देता है. एक औसत दर्शक खुद को हीरो के जूते में रख कर देखना चाहता है. कौन सा ऐसा दर्शक होगा, जो खुद को इस तरह के आत्मपीड़क और अंतर्मुखी हीरो के साथ जोड़ कर देखना चाहेगा. वह दया का पात्र ज्यादा नजर आता है. यही वजह रही कि दो बीघा जमीन को जनता के बीच उस तरह की सफलता और लोकप्रियता नहीं मिली, जितनी कि उसे बुद्धिजीवियों के बीच मिली.
कुछ हद तक हमारी सारी प्रगतिशील कला और हमारा साहित्य इस आदत का शिकार है. यह विदेशी मूल्य और वाद है, जिस पर हम खरा उतरना चाहते हैं, न कि उन मूल्यों पर, जो हमारी अपनी धरती की उपज हैं. दो बीघा जमीन की तकनीक भी विश्व प्रसिद्ध इतालवी निर्देशक की फिल्म बाइसिकिल थीफ और उसमें प्रदर्शित किये गये यथार्थवाद से प्रभावित थी. यही वह कारण था कि रूसियों ने भले ही दो बीघा जमीन के बारे में अच्छी बातें कहीं, लेकिन उन्होंने अपनी सारी प्रशंसा और सम्मान राजकपूर की फिल्म आवारा के लिए सुरक्षित रख लिया, बल्कि वे आवारा के प्रति दीवाने से हो गये. आवारा के प्रदर्शन के बाद रूस में लाखों कामगार मजदूर फैक्टरियों और खेतों में ‘आवारा हूं’ की धुन गुनगुनाते पाये जाते थे. बल्कि जहां तक जनता के प्यार और लोकप्रियता का सवाल है, राजकपूर ने रूस के अभिनेताओं को भी पीछे छोड़ दिया. हालांकि हमने उम्मीद की थी समाजवाद के इस मक्का में लोग कहीं ज्यादा सुसंस्कृत और उन्नत कला  को सम्मान देंगे, लेकिन रूसियों को आवारा के प्रति उनकी दीवानगी के लिए कसूरवार नहीं माना जा सकता. खास तौर से यह देखते हुए कि आवारा में कितने बेजोड़ तरीके से भारतीय जीवन की धड़कन को पकड़ा गया है. इस संदर्भ में हम यह गांठ बांध सकते हैं कि एक अंगरेज हमेशा एक ऐसे भारतीय से संवाद करना कहीं ज्यादा पसंद करेगा, जिसे बस काम चलाऊ अंगरेजी ही आती हो.
(बलराज साहनी की आत्मकथा ‘बलराज साहनी एन आॅटोबायोग्राफी’ का अनुदित एवं संपादित अंश)



सत्यजीत रे






मुझे लगता है कि मुझमें काफी पहले परिपक्वता आ गयी. मुझमें शुरू से ही ऊपर से साधारण दिखनेवाले ढांचे में गहन संदेश को सिनेमाई परदे उतारने का जुनून रहा. मैं अपनी फिल्में बनाते वक्त कभी पश्चिम के दर्शकों के बारे में नहीं सोचता. जब मैं फिल्म बना रहा होता हूं, तो सिर्फ बंगाल के दर्शक ही मेरे जेहन में होते हैं. अपनी फिल्मों के सहारे मंै उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश करता हूं. और ऐसा करते हुए मैं कामयाब भी रहा हूं. शुरुआत में बंगाल के दर्शक काफी पिछड़े हुए थे. वे बचकानी बांग्ला फिल्मों के कचरे के आदी थे. मुझे धीरे-धीरे ही सही, उन्हें साथ लेकर चलना था. इस राह में कई बार कामयाबी मिली, कई बार मैं चूक गया. दर्शकों से जुड़ा ऐसा खतरा बर्गमैन और फेलिनी के साथ नहीं था. बर्गमैन का फिल्म संसार बेहद सहज था. हालांकि कई बार उनमें तीखापन और गहरा संघर्ष भी होता है. इसमें उनकी कई बार उम्दा फोटोग्राफी भी मदद करती है. जहां तक फेलिनी की बात है, मुझे लगता है कि वह एक ही फिल्म लगातार बनाये जा रहे हैं. उनकी फिल्में काफी साहसी होती हैं. इस तथ्य के बावजूद कि फेलिनी कहानियों में ज्यादा रुचि नहीं लेते, दर्शक उनके साहस को देखने जाते हैं. मैं वह सब कर सकता हूं, जो बर्गमैन और फेलिनी ने किया है. लेकिन मेरे पास वे दर्शक नहीं हैं और मैं  उनके परिवेश में काम नहीं कर रहा हूं. मुझे उन दर्शकों से संतुष्ट रहना है, जो कूड़े का अभ्यस्त रहा है.
मैंने भारतीय दर्शकों के साथ तीस सालों तक काम किया है और इन  वर्षों में सिनेमा का बाहरी चेहरा वैसा का वैसा रहा है. कम से कम बंगाल में तो नहीं ही बदला. वहां आपको ऐसे निर्देशक मिल जायेंगे, जो इतने पिछड़े हैं, इतने मूर्ख किस्म के हैं, इतना कूड़ा उत्पादन कर रहे हैं कि आपके लिए यह यकीन करना नामुमकिन होगा कि उनकी फिल्मों का अस्तित्व भी मेरी फिल्मों के साथ है. मेरी परिस्थितियां ऐसी हैं कि मुझे अपनी कहानियों को हमेशा साधारण बनाये रखना होता है. हां, मैं यह जरूर कर सकता हूं कि मैं अपनी फिल्मों को अर्थवान बनाऊं, उनमें मनोवैज्ञानिक घात-प्रतिघात पैदा करूं, उनमें नये शेड्स डालूं. और इस तरह से एक ‘पूर्ण’ का निर्माण करूं, जो कई लोगों को कई सारी चीजें संप्रेषित करेंगी.
कुछ आलोचकों को लगता है कि मैं गरीबी को रोमांटिसाइज करता हूं, या कि मेरी फिल्मों में गरीबी और वंचितता अपने क्रूरतम रूप में प्रकट नहीं होती. मेरा मानना है कि पाथेर पंचाली गरीबी के रूपांकन में काफी कठोर है. पात्रों का व्यवहार, जिस तरह से मां एक वृद्ध औरत के साथ व्यवहार करती है, वह  क्रूरतापूर्ण ही तो है. मुझे याद नहीं कि किसी ने एक परिवार में किसी वृद्ध के साथ इस तरह की क्रूरता दिखायी है.
मैंने किसी की भी तुलना में अपनी फिल्मों कहीं ज्यादा राजनीतिक टिप्पणी की है. मिडिल मैन में एक लंबा संवाद है, जिसमें एक कांग्रेसी आगे के लक्ष्यों के बारे में बात करता है. वह झूठ बोलता है. मूर्खतापूर्ण बातें करता है, लेकिन उसकी उपस्थिति महत्वपूर्ण है. किसी भी दूसरे निर्देशक की फिल्म में इस दृश्य को शामिल नहीं किया जाता. लेकिन यह जरूर है कि फिल्म निर्देशकों के ऊपर कई तरह के प्रतिबंध होते हैं. उसे मालूम होता है कि कुछ चित्रण और डायलॉग कभी  भी सेंसर बोर्ड से पास नहीं होंगे. फिल्म निर्देशकों की भूमिका उदासीन द्रष्टा की नहीं है. आप हीरक राजार देशे देखिए. उसमें एक दृश्य है, जिसमें सारे गरीब लोगों को बाहर हांक दिया गया है. यहां इमरजेंसी के दौरान जो दिल्ली और दूसरे शहरों में हुआ उसका सीधा असर देखा जा सकता है. जब आप ऐसी फैंटेसी फिल्में बना रहे हों, तो आप अपनी बात सामने रख सकते हैं, लेकिन जब आप समकालीन चरित्रों के साथ खेल रहे होते हैं, तब आप एक सीमा तक ही अपनी बात रख सकते हैं.

(1982 में प्रकाशित सिनेएस्ट साक्षात्कार श्रृंखला का संपादित अंश)


अडूर गोपालकृष्ण


जब मैं अपनी फिल्मों पर काम कर रहा होता हूं, तो मैं अपने आप से यह नहीं कहता कि देखो ये तुम्हारे दर्शक हैं, और तुम्हारी फिल्म को इनके लिए प्रासंगिक होना चाहिए. नहीं, अगर मुद्दे महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं, अगर विचार वैध और तार्किक हैं, तो फिल्में खुद-ब-खुद प्रासंगिक हो जायेंगी. एक फिल्म ‘एक समय में’ बनायी जाती है, लेकिन यह ‘एक समय के लिए’ ही नहीं बनायी जाती. मेरा मानना है कि एक अच्छी फिल्म अपने बनानेवाले की उम्र से कहीं ज्यादा जियेगी. मेरा विश्वास है कि कला या साहित्य के अच्छे शाहकार की ही तरह एक अच्छी फिल्म का असर कई पीढ़ियों पर पड़ता है. हालांकि इसका असर महसूस हो, और यह क्रियाओं को जन्म दे, इसमें कहीं ज्यादा वक्त लग सकता है. वैसे भी मैं हर दिन-ब-दिन की सामान्य समस्याओं पर सिनेमा नहीं बनाता. मेरे पास इन फिल्मों में समय खपाने करने की ऊर्जा नहीं है. मैं व्यापक मुद््दों पर ध्यान केंद्रित करने को तरजीह देता हूं. फिल्म बनाने को लेकर मेरा साफ मानना है कि इसे विचारों को प्रभावित करना चाहिए. किसी मुद्दे पर जागरूकता पैदा करना चाहिए. शुरुआत यहीं से होती है. इस तरह की फिल्मों को आपको परेशान करना चाहिए. इसे आपको खुद से और समाज से सवाल पूछने के लिए प्रेरित करना चाहिए. इस तरह सवाल पूछना ही बदलाव की ओर पहला छोटा सा कदम है.
               जहां तक व्यावसायिक सिनेमा का प्रश्न है, यह आज एक जुआ बन गया है, न कि रचनाशीलता की एक प्रक्रिया. आज निर्माता-निर्देशकों को लगता है कि जो भव्य है, वह अच्छा है. स्टार कास्ट बड़ा होना चाहिए. बजट बड़ा होना चाहिए. लेकिन आखिरी सत्य यह है कि आप जो पैसा खर्च करते हैं, या कितना भव्य रचते हैं, वह महत्वपूर्ण नहीं है. दर्शक की असल चिंता यह है कि सिनेमा कितना अच्छा है.

(3 मई, 2006 को रेडिफ डॉट कॉम पर प्रकाशित साक्षात्कार का संपादित अंश)

26 April 2013

जिसने चिराग बनना कबूल किया...

शमशाद बेग़म को याद करते हुए यह टुकडा लिखा है प्रीति सिंह परिहार ने आप भी पढ़ें. 




हिंदी सिनेमा के शुरुआती दशकों में फिल्म गायकी में एक खनकदार आवाज हुआ करती थी. इस आवाज ने कईयादगार गीत दिये और संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा के लिए दर्ज हो गयी. लेकिन इस आवाज की पहचान में लिपटी शख्सीयत शमशाद बेगम अरसे से गुमनाम खामोशी ओढे. जी रही थीं. इसी खामोशी के साथ उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. दुनिया से इस रुखसती से बहुत पहले से वह अपने आपको घर की चारदीवारी में समेटे हुए थीं. इस दौरान उनका जिक्र शायद ही कहीं था. आज जब वो नहीं हैं, उनके जाने की खबरें हैं. गुजर जाने के बाद याद करने का दस्तूर जो ठहरा. इस हकीकत से वाबस्ता शमशाद बेगम की सांसें बिना किसी शिकायत के चलते-चलते, थम गयीं. पीछे रह गये हैं उनके गाये सदाबहार गीत, जो कल भी उतनी ही शिद्दत से सुने जाते थे, आज भी उन्हें सुनने वालों की कमी नहीं. 

शमशाद बेगम का नाम हर उस शख्स की याद में जगह रखता है, जो संगीत से वाबस्ता रहा है. ये अलग बात है कि शमशाद उन लोगों की यादों से दूर हो गयीं थीं, जिनकी सफलता का ताला खोलने की वह चाबी बनीं थीं. लंबे समय से वह मुंबई में ही, सिने जगत की चकाचौंध से दूर अपनी बेटी और दामाद के साथ गुमनाम जिंदगी बसर कर रही थीं. बीमार थीं. लेकिन उनकी फिक्र का कोई चरचा कभी उनके गीतों से आबाद रही फिल्मी दुनिया में नहीं सुनाई दिया. चालीस से लेकर साठ के दशक तक अपनी अवाज से कई गीतों को सजाने वाली इस गायिका ने तकरीबन चार दशक पहले पार्श्‍वगायन को अलविदा कह खुद को अपने घर-परिवार तक सीमित कर लिया था. शमशाद बेगम का अंतिम गीत 1968 में फिल्म ‘किस्मत’ के लिए आशा भोंसले के साथ ‘कजरा मोहब्बत वाला’ रिकॉर्ड किया गया था. 

रेडियो और दूरदर्शन के दौर में जिन गानों को सुनते हम बडे. हुए उनमें ‘ले के पहला-पहला प्यार’,‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’,‘बूझ मेरा क्या नाम रे’ में शमशाद बेगम की मैखुश आवाज घुली थी. 14 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृत्सर में जन्मी शमशाद के एल सहगल की गायिकी की मुरीद थीं. बचपन से संगीत से लगाव तो था, लेकिन इसकी विधिवत तालीम उन्हें नहीं मिली थी. किस्मत ने जरूर उन्हें खनकती आवाज के साथ सुरों को साधने का हुनर दिया था. इसी हुनर की बदौलत शमशाद बेगम को 1937 में लाहौर रेडियो से अपनी गायकी को आगे बढ.ाने की राह मिली. 1940 के आस-पास वह फिल्मों में बतौर प्लेबैक सिंगर गाने लगीं. उन्होंने नौशाद, ओपी नय्यर, मदन मोहन और एसडी बर्मन सहित उस दौर के तमाम संगीतकारों की लिए गाने गाये. ओपी नय्यर उनकी आवाज से इतने प्रभावित थे कि कहते थे,‘शमशाद की आवाज मंदिर की घंटी की मांनिद स्पष्ट और मधुर है.’

शमशाद ने गजल और भक्तिगीत भी गाये. उनके हिस्से विभित्र भाषाओं में लगभग पांच हजार गीत गाने का श्रेय दर्ज है. फिल्मी दुनिया से उनके दूरी बना लेने के लंबे अतंराल के बाद 1998 में खबर सुनी गयी थी कि गायिका शमशाद बेगम नहीं रहीं. लेकिन उनके कुछ प्रसंशक जब इस खबर की तह में गये, तो पता चला वे जीवित हैं और यह खबर नौसिखिया खबरियों की जल्दबाजी का नतीजा थी. शमशाद बेगम को खुदा ने दिलकश आवाज के साथ खूबसूरत चेहरा भी बख्शा था. लेकिन उन्हें अपनी तसवीर खिंचवाने से हमेशा परहेज रहा. लंबे समय तक लोग उन्हें उनकी आवाज से ही पहचानते रहे. संगीत की दुनिया से खुद को दूर करने के कुछ समय पहले उन्होंने पहली बार एक साक्षात्कार के दौरान अपनी तसवीर लेने की इजाजत दी थी. वर्ष 2009 में लोगों ने व्हील चेयर पर बैठे राष्ट्राति से पद्मभूषण लेते समय इस गायिका की एक झलक देखी.

शमशाद बेगम की शख्सीयत से रूबरू होकर यही अहसास होता है कि उन्होंने सितारा बनने की सारी खूबियों के बाद भी चिराग बने रहना कबूल किया था. इस चिराग से रोशन कई जहां हुए, पर इसे अपने साये में बैठे अंधेरे का कोई मलाल न रहा. शायद शमशाद ‘सुनहरे दिन’ फिल्म में गाये अपने गीत ‘मैंने देखी जग की रीत..’ की तर्ज पर इस जमाने की रीत से वाकिफ थीं. इसलिए किसी शिकायत को अपने दिल में न जगह देकर जिंदादिली से जीते हुए इस दुनिया से अलविदा हुईं.

                                     प्रीति सिंह परिहार युवा पत्रकार हैं 

25 April 2013

मैं रहूँ न रहूँ , मेरी आवाज हमेशा जिन्दा रहेगी : शमशाद बेग़म

हिंदी सिनेमा की शुरूआती पार्श्‍व गायिकाओं में एक महत्वपूर्ण नाम रहा है शमशाद बेगम का. अपनी आवाज से कईगीतों को सदाबहार नगमों में शुमार करवानेवाली यह गायिका अब हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन उनके गाये गीत आज भी उतने मकबूल हैं, जितने कल थे. इन गीतों की लोकप्रियता जाहिर करती है कि इनसे हमेशा सिनेमाईसंगीत गुलजार रहेगा. शायद इसीलिए प्रसिद्ध संगीतकार ओपी नय्यर ने उनकी आवाज की तुलना मंदिर की घंटी की पवित्रता से की थी. शमशाद के साथ काम कर चुके लोगों के जेहन में वह एक बेहतरीन गायिका के साथ, एक खुशमिजाज, मिलनसार और जिंदादिल शख्सीयत के तौर जिंदा हैं. पद्मभूषण से सम्मानित शमशाद बेगम से कुछ दिनों पहले बात की थी युवा फिल्म रिपोर्टर उर्मिला कोरी ने. बातचीत का यह अंश आप भी पढ़ें। 



आज से कुछ सालों पहले मुंबई के हीरानंदानी स्थित उनके घर पर मुझे उनसे मिलने का मौका मिला था. उनके घर पर पहुंचने से पहले मेरे जेहन में उनके व्यक्तित्व की एक संजीदा छवि थी, लेकिन जब वह व्हीलचेयर से कमरे में दाखिल हुईं, तो उनकी बाों की तरह खिलखिलाती मुस्कुराहट से एक अलग ही छवि जेहन में बस गयी. मुझे देख कर उनकी जो पहली प्रतिक्रिया थी,‘अरे आप तो अभी बी हो. खुशकिस्मत हो, जो आज के दौर में हो, वरना हमारे जमाने में बहुत पाबंदिया थीं. अच्छा लगता है जब लड.कियों को उनके मन का करते देखती हूं.’ शमशाद जी से मिले अभी बस दो मिनट ही हुए थे, लेकिन ऐसा लग रहा था मानो हम एक-दूसरे को बरसों से जानते हों. उन्होंने तहे दिल से न सिर्फ मेरा स्वागत किया, बल्कि किसी अभिभावक की तरह ही फिल्मों से इतर दुनिया के बारे में बातचीत की. शमशाद जी की मशहूर गायिका की जगजाहिर छवि से आगे उनके व्यक्तित्व के और भी कई पहलू थे, जो उनसे मिल कर ही आप जान सकते थे. वे खुशमिजाज, नये लोगों की तारीफ करनेवाली महिला थीं. वे लोगों की हौंसलाअफजाई करने में विश्‍वास रखती थीं और जिंदगी से वे बेहद संतुष्ट थीं. यही वे तत्व थे, जो उन्हें औरों से जुदा करते थे. बिना शिकवा- शिकायत के उन्होंने एक बेहतरीन जिंदगी जी. आज शमशाद बेगम नहीं हैं. लेकिन उनकी गायिकी और उनका खुशमिजाज चेहरा हमेशा जेहन में जिंदा रहेगा. उस मुलाकात में उन्होंने अपनी जिंदगी की कई बातें मुझसे साझा की थीं. शमशाद बेगम से हुई उस बातचीत के मुख्य अंश उन्हीं के शब्दों में.

और मैंने गुलाम हैदर का दिल जीत लिया
महज 12 साल की उम्र में जेनोफोन कंपनी से मैंने अपने कैरियर की शुरुआत की थी. मेरे चाचाजी मेरे प्रेरणास्त्रोत थे. उन्हें गाने का शौक था. उनसे ही यह गुण मुझमें आ गया था. मेरे चाचाजी को मेरी आवाज बहुत पसंद थी, इसलिए जेनोफोन (लाहौर) द्वारा आयोजित प्रतिस्पर्धा में वे मुझे ले गये,जहां मैंने बिना किसी संगीत के एक मुखड.ा गाकर संगीतकार उस्ताद गुलाम हैदर का मन जीत लिया. मैं विजेता चुनी गयी और जेनोफोन कंपनी के साथ 12 गानों का कॉट्रैक्ट मिला. एक गाने के लिए उस वक्त बारह रुपये मिलते थे. इससे पहले मेरी विधिवत ट्रेनिंग नहीं हुई थी, लेकिन उस्ताद गुलाम हैदर ने मुझे संगीत की औपचारिक शिक्षा दी. वही मेरे पहले और आखिरी गुरु थे. उस वक्त धार्मिक कट्टरता भी काफी हावी थी. मुझे याद है जेनोफोन कंपनी ने एक आरती‘जय जगदीश’ रिकॉर्ड करवायी थी, मगर धर्मिक कट्टरता की आशंका के डर से मेरी जगह उमा देवी का नाम दिया गया था.

रेडियो ने रखा मेरी गायिकी को जिंदा 
जेनोफोन कंपनी में तो मैं गाने लगी थी, लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मेरे लिए बतौर गायिका शुरुआत करना आसान नहीं था. अम्मी गुलाम ए फातिमा जितनी नर्म मिजाज की थी, अब्बा हुसैन बख्श उतने ही सख्त मिजाज थे. महिलाएं उस वक्त परदे में रहती थीं. उन दिनों प्लेबैक का जमाना नहीं था. अभिनेत्रियां अभिनय के साथ -साथ परदे पर गाती भी थीं. इसलिए लाहौर के पंचोली स्टूडियो ने मेरी आवाज सुनकर पहले मुझे स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया था. आपको विश्‍वास नहीं होगा, मैं चुन ली गयी. स्क्रीन टेस्ट तो मैं अब्बाजान से छिपकर देने गयी थी, लेकिन जैसे ही शूटिंग की बात आयी, अब्बा से इजाजत लेना जरूरी हो गया था. जैसे ही अभिनय के लिए मैंने उनसे बात की, उन्होंने फरमान सुना दिया कि अगर मैंने अभिनय के लिए जिद की, तो वे मेरा गाना भी बंद करवा देंगे. मेरे सपने चूर-चूर हो गए. मैंने ऑल इंडिया में रेडियो प्रोग्राम कर अपने अंदर की गायिका को जिंदा रखा था. लेकिन अल्लाह को मुझ पर तरस आ गया और दो साल बाद प्लेबैक सिगिंग का दौर शुरु हो गया. एक बार फिर पंचोली स्टूडियो ने मुझे बुलाया और बतौर गायिका अपनी फिल्म ‘खजांची’ में मुझे ब्रेक दिया. इस तरह से मुझे मेरी पहली फिल्म मिल गयी.

जब मैं नरगिस की आवाज बनी
‘खजांची’ फिल्म के गीत सभी को इतने पसंद आए कि पाकिस्तान से हिंदुस्तान तक सभी मेरे प्रशंसक बन गए. इन्हीं में से एक फिल्मकार महबूब खान भी थे. मुझे मुंबई लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है. वे मुझसे मिलने लाहौर आये और मेरे अब्बा को मनाया. अब्बा मान गए, लेकिन उन्होंने एक शर्त्त रखी कि मुंबई जाने के बाद भी मैं परदा करूंगी और अभिनय में कभी नहीं आऊंगी. मैंने हां कर दी और मैं मुंबई आ गयी. महबूब खान की फिल्म ‘तकदीर’ में मैं नरगिस दत्त की आवाज बनी थी. इसके बाद सी रामचंद्रन,पंडित गोविंद, अनिल विश्‍वास जैसे संगीतकारों की जैसे लाइन लग गयी. एक के बाद एक सुपरहिट गीत आये और मैं मुंबई की होकर रह गयी. लेकिन अपने अब्बा से किया वादा हमेशा निभाया. अपने कैरियर में मैंने हमेशा खुद को लाइम लाइट से दूर रखा. मेरी गिनी चुनी तस्वीरे ही होंगी. मैं सिर्फ गाना गाती, फिर घर आ जाती थी. यही वजह है कि इंडस्ट्री में मेरा कभी कोई दोस्त नहीं था. 




गुटबाजी बढ. गयी, तो मैंने इंडस्ट्री छोड. दी 
शुरुआत में नवोदित संगीतकार मेरे पास आकर कहते थे कि आप मेरी फिल्म में एक गाना गा दीजिए, लेकिन गाना हिट हो जाने के बाद वे मुझे पहचानते भी नहीं थे. मैं हमेशा से यही सोचती थी कि जो गीत मेरे लिए बना है, वह मुझे ही मिलेगा. नूरजहां, सुरैया, जोहराबाई अंबालेवाली, अमीरबाई कर्नाटकी, उमादेवी ये उस दौर में मेरी प्रतिद्वंद्वी थीं, जो गायकी के साथ-साथ अभिनय भी करती थीं. लोग इन्हें आवाज और अभिनय दोनों से पहचानते थे, लेकिन मेरी आवाज ही काफी थी. लोगों ने मेरी आवाज को हमेशा ही पसंद किया और मुझे काम मिलता गया. मैंने कभी भी किसी संगीतकार से काम नहीं मांगा. यही वजह है कि जब इंडस्ट्री में ग्रुपिज्म (गुटबाजी) बढ. गया, तो मैंने इंडस्ट्री छोड. दी. मुझे खुशी थी कि जब मैंने इंडस्ट्री छोड.ी, उस वक्त मैं टॉप पर थी. फिल्म ‘किस्मत’ का ‘हाय मैं तेरे कुर्बान’ मेरा आखिरी गीत था, जो बहुत बडा हिट हुआ था. उस गीत के बाद मैंने कभी माइक नहीं पकड.ा.

रीमिक्स से मुझे परहेज नहीं 
मौजूदा दौर में मुझे सोनू निगम की आवाज बहुत पसंद है. मुझे रिमिक्स गानों से कोई परहेज नहीं है. मेरे द्वारा गाये गए ‘सैंय्या दिल में आना रे’, ‘लेके पहला-पहला प्यार’ और ‘मेरे पिया गये रंगून’ जैसे गीतों के रीमिक्स वर्जन मैं चाव से सुनती हूं. मुझे खुशी है कि कम से कम रीमिक्स गानों की वजह से आज की पीढ.ी पुराने गानों से रूबरू है.

हमारे दौर में संगीत इबादत था
इस पीढ.ी की मुझे सिर्फ एक परेशानी नजर आती है, वह ये कि यह अपने बडे.-बुजुगरें को उतना सम्मान नहीं देती, जितना हमारे वक्त में था. मुझे याद है, मैं मोहम्मद रफी के साथ फिल्म ‘रेल का डिब्बा’ का गीत ‘ला दे मुझे बालमा हरी हर चूड.ियां..’ गा रही थी. बिना सांस लिए गाना गाने की बात भले ही आज चर्चा में हो, लेकिन हमारे वक्त में भी हम ऐसे कई गीत गाते थे. यह गीत भी कुछ ऐसा ही था, गाते हुए मोहम्मद रफी की सांस टूट जा रही थी, लेकिन मेरी नहीं टूट रही थी. फिर क्या था, रफी साहब ने आकर मेरे पैरों को छू लिया और कहा कि ‘आपा कैसे आप एक सांस में गा ले रही हैं.’ उस वक्त अपने से बड.ों का इस कदर सम्मान किया जाता था. किशोर कुमार कोरस में वायलिन बजाता था. अक्सर गाने की रिकॉर्डिंग के बाद मेरी कुरसी के पास आकर बैठ जाता और कहता कि मेरे भाई (अशोक कुमार) मुझसे कितने आगे हैं और मैं कहीं भी नहीं हूं, तब मैंने उससे कहा था कि वो दिन ज्यादा दूर नहीं जब तू सबसे आगे निकल जाएगा. वाकई ऐसा ही हुआ. उसमें संगीत को लेकर जबरदस्त जुड.ाव था.

संगीत उस वक्त के लोगों के लिए सिर्फ व्यवसाय या आय का साधन नहीं था, बल्कि इबादत था. मुझे याद है राजकपूर को अपनी फिल्म ‘आवारा’ में मुझसे एक गाना गवाना था, लेकिन मेरे पास बिल्कुल भी समय नहीं था. क्योंकि उस वक्त एक बार में ही गाने की रिकॉर्डिंग करनी पड.ती थी. इसलिए पहले ही मैं संगीतकार के साथ रियाज कर लेती थी, तब जाकर स्टूडियो में गाना गाती थी. मगर राज साहब के लिए मेरे पास डेट्स ही नहीं थीं. मैंने उन्हें परेशानी बतायी और कहा कि अगर मैं मुश्किल से गाने के लिए एक दिन का समय निकाल लूंगी, लेकिन रिहर्सल के लिए समय कहां से लाऊं. तब राज जी ने मुझसे कहा कि आप उसके लिए परेशान न हों. शंकर-जयकिशन आपके घर आकर रिहर्सल करायेंगे. वाकई हर सुबह गाने की रिकॉर्डिंग में जाने से पहले शंकर-जयकिशन और राज कपूर मेरे घर आकर रिहर्सल करवाते थे.

मुझे किसी से कोई शिकवा नहीं 
मुझे किसी से कोई शिकवा नहीं है. फिल्म इंडस्ट्री ने मेरी कभी खबर नहीं ली. लेकिन मुझे किसी से शिकायत नहीं है. गायिकी मेरा जुनून है और मैंने उसे शिद्दत से जिया. इससे ज्यादा मुझे किसी से कोई उम्मीद नहीं थी. मुझे उस वक्त भी दुख नहीं हुआ था, जब अभिनेत्री सायरा बानो की दादी शमशाद बेगम के मरने पर सभी ने सोचा कि मैं नहीं रही. कई प्रतिष्ठित अखबार और चैनलों ने मेरी ही तसवीर दिखायी थी. मेरी बेटी उषा ने कहा भी हमें इन पर केस करना चाहिए, लेकिन मैंने मना कर दिया. आखिरकार साई सामने आ गयी. मैं एक बात जानती हूं कि मैं रहूं या न रहूं, लेकिन मेरी आवाज फिल्मों के माध्यम से हमेशा जिंदा रहेगी.

16 April 2013

हीरो को टक्कर देनेवाला खलनायक : प्राण

प्राण को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की घोषणा शायद इस वजह से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी यह पुरस्कार परदे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले एक अभिनेता को मिला है. प्राण सिनेमा के परदे पर खलनायकी के पर्याय हैं. नायकों की पूजा करने वाले हमारे समाज में प्राण को सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान मिलना भारतीय सिनेमा के वयस्क होने का एक प्रमाण कहा जा सकता है. हालांकि सच यह भी है की यह वयस्कता इसके सौवें साल में आयी है, और अभी भी इसे एक ट्रेंड मानने का कोई ठोस कारण नहीं है. प्राण को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने पर सोमवार को यह लेख प्रभात खबर के लिए विनोद अनुपम ने लिखा. आप भी पढ़िए. : अखरावट 

93 वर्ष की उम्र में प्राण के लिए हिन्दी सिनेमा के सबसे बडे सम्मान दादा साहब फाल्के सम्मान की घोषणा हुई। वाकई प्राण जैसे अभिनेता को यह सम्मान काफी पहले मिल जाना चाहिए था। लेकिन सवाल है पहले किन्हें नहीं मिलना चाहिए था, देवानंद को, यश चोपडा को, मन्ना डे, मजरुह सुल्तानपुरी को...प्राण से भी पूछा जाता तो इनमें से किसी नाम की जगह पर अपने नाम पर शायद ही वे सहमत होते। प्राण के लिए अभिनय एक कला थी,जिसके प्रति समर्पण का प्रतिसाद उन्हें उनके दर्शकों से मिलता था, पुरस्कार की न तो उन्हे इच्छा थी, न ही अपेक्षा।आश्चर्य नहीं कि आजादी के ठीक पहले भारत आ जाने वाले प्राण को अपना पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिलने में 20 वर्ष बीत गए। लेकिन दर्शकों की तालियों ने कभी प्राण के चेहरे पर शिकन नहीं आने दी। अपने 70 साल से भी लम्बे सिनेमाई जीवन में उन्हें शायद ही कभी असंतोष व्यक्त करते देखा गया। भारतीय सिनेमा के 100 वें वर्ष में वास्तव में यह सम्मान भाईचारे, समर्पण और अभिनय की उस परंपरा को याद दिलाने की कोशिश है जिसके प्रतीक पुरुष के रुप में प्राण माने जाते हैं। आज जबहिन्दी सिनेमा के नायक वास्तविक जीवन में खलनायक बनने को उतावले दिख रहे हों, ऐसे में यह जानना वाकई सुखद लगता है कि प्राण ऐसे विरले कलाकारों में थे जो सेट पर महिला कलाकारों को खड़े होकर रिसिव किया करते थे, चाहे वह कोई नवोदित अदाकारा ही क्यों न हो। परदे पर क्रूरता के पर्याय बने प्राण की पहचान उनकी सौम्यता थी, जो अब 93बर्ष के बुजुर्ग के चेहरे पर और भी मुखर हो गई लगती है। लेकिन यह प्राण के अभिनय का प्रभाव ही है कि तस्वीरों में दिखते उस सौम्य बुजुर्ग को देखते हुए भी याद ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के दो घोड़े पर एक साथ सवार डाकू राका की ही आती है। याद उस खलनायक की आती है, जिसने न जाने कितने बलात्कार, कितने षडयंत्रों, कितनी हत्याओं को पूरी तन्मयता से परदे पर साकार किया।
                यह शायद संयोग नहीं कि प्राण ने अपने अभिनय की शुरूआत महिला कलाकार के रूप में ही की थी। शिमला की रामलीलाओं में मदन पुरी राम की भूमिका निभाया करते थे,जबकि सीता की भूमिका लंबे समय तक प्राण निभाते रहे। प्राण की विलक्ष्ण अभिनय क्षमता ही थी कि एक सौम्य छवि को क्रूर खलनायक के रूप में उन्होंने दर्शकों को स्वीकार करवा दिया। प्राण की अभिनय यात्रा का आरंभ छोटी छोटी नकारात्मक भूमिकाओं से हुआ।1940 में पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ में प्राण को एक अहम् नकारात्मक किरदार मिला,  फिल्म सफल हुई और उसके साथ प्राण की गणना भी सफल अभिनेताओं में होने लगी। जल्दी ही वे लौहार फिल्म उद्योग में एक खलनायक की छवि बनाने में कामयाब हो गए, इनकी लोकप्रियता ने उसी समय निर्माताओं को हिम्मत दी, और 1942 में लाहौर की पंचोली आर्ट प्रोडक्शन के ‘खानदान’ में इन्हें उस समय की महत्वपूर्ण अदाकारा नूरजहां के साथ नायक बनने का अवसर दिया गया।लेकिन खलनायक के अभिनय की विविधता के सामने,नायक के चरित्र की एकरसता प्राण को रास नहीं आयी। बटवारे से पहले प्राण तकरीबन २२ फिल्मो में खलनायक की भूमिका निभा कर लाहौर में स्थापित हो गये थे। आजादी के बाद प्राण ने लाहोर छोड़ दिया और मुंबई आ गए, हालांकि पाकिस्तान में नायक के रूप में उनकी ‘शाही लुटेरा’ जैसी फिल्में आजादी के बाद तक दिखायी जाती रही, और भारत आने के बावजूद पाकिस्तान के लोकप्रिय अभिनेताओं में वे शुमार किये जाते रहे।

                प्राण स्टाइल ऐक्टर थे, लेकिन फर्क यह था कि जहां अधिकांश अभिनेता अपने स्टाइल को अपना ब्रांड बनाकर जिंदगी भर दुहराते रहे, प्राण हरेक फिल्म में अपने एक नये स्टाइल के साथ आए। कभी कभी स्टाइल के लिए उन्होंने सिगरेट, रूमाल, छड़ी जैसी प्रापर्टी का भी सहारा लिया, लेकिन अधिकांश फिल्मों में स्टाइल उनकी आंखों, होठों और चेहरे के भाव से बदलते रहे। हां, प्राण शायद ऐसे पहले अभिनेता थे जिन्होंने आवाज और मोडूलेशन बदलकर पात्र को एक नई पहचान दी, बाद में जिसका इस्तेमाल अमिताभ बच्चन ने‘अग्निपथ’ में, शाहरूख खान ने ‘वीरजारा’ में और बोमन ईरानी ने ‘वेलडन अब्बा’ में किया। प्राण अपने अभिनय के बारे में कहते भी थे, मैं पात्र में नहीं उतरता पात्र को अपने अंदर उतार लेता हूं।आज के मेथड एक्टिंग में उनका यकीन नहीं था। यह प्राण की ही खासियत थी कि अपने मैनेरिज्म के साथ भी वे दर्शकों को एक ओर ‘उपकार’ के मंगल चाचा दूसरी ओर ‘विक्टोरिया नं.203’ के राणा के रुप में भी स्वाकार्य हो सकते थे। आश्चर्य नहीं कि हिंदी सिनेमा  में पचास और साठ का दशक त्रिदेव ( दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद ) के लिये भले ही याद किया जाता हो, लेकिन जो उन्हें एक कडी से जोडती थी वे प्राण थे, फिल्म चाहे दिलीप कुमार की हो, या राज कपूर की, या फिर देवानंद की, अधिकांश फिल्मों में खलनायक के रुप में प्राण की उपस्थिती तय मानी जाती थी। दिलीप कुमार के साथ‘आजाद’, ‘मधुमती’, ‘देवदास’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘राम और श्याम’ और ‘आदमी’ में महत्वपूर्ण किरदार रहे तो  देव आनंद के साथ ‘जिद्दी’, ‘मुनीमजी’, ’अमरदीप’  जैसी फिल्मे पसंद की गई। राज कपूर के साथ ‘आह’, ‘चोरी  चोरी’ , ‘छलिया’ , ‘जिस  देश  में  गंगा बहती  है’ , ‘दिल  ही  तो है’ जैसी फिल्मों में जो जोडी बनी वह ‘बाबी’ तक कायम रही।

                      प्राण ने 60 साल से भी ज़्यादा समय तक चले अपने करियर के दौरान 400 से भी अधिक फिल्मों में काम किया। प्राण के लिए फर्क नहीं पडता फिल्म कैसी बन रही है, कौन बना रहा है, साथी कलाकारों की क्या भूमिका है, वे अपना श्रेष्ठ देते रहे। चाहे फिल्म कैसी भी बनी हो, यह याद करना मुश्किल होता है कि दर्शकों की कसौटी पर प्राण खरे न उतरे हों। मनमोहन देसाई की बडी फिल्मों की बडी भूमिका में भी वे उतने ही सशक्त दिखते थे,जितना ‘जंगल में मंगल’ जैसी छोटी फिल्म में किरण कुमार के साथ काम करते हुए।प्राण ने कभी अपने को किसी खास समूह का हिस्सा नहीं बनने नहीं दिया। उनके लिए सिनेमा महत्वपूर्ण रहा, और सिनेमा में अपनी भूमिका। 1967 में मनोज कुमार ने ‘उपकार’के साथ उन्हें एक नई पहचान दी। सहृदय मलंग चाचा के किरदार को प्राण ने वह ताकत दी कि हिन्दी सिनेमा में चरित्र भूमिकाओं को नायकों के समानान्तर स्थान दिया जाने लगा। यहां तक कि चरित्र भूमिकाओं को केन्द्र में रख कर फिल्में लिखी जाने लगीं। कह सकते हैं अमिताभ बच्चन प्रौढ भूमिकाओं में आज अपना श्रेष्ठ देते दिख रहे हैं तो उसकी जमीन तैयार करने का श्रेय प्राण को ही जाता है।

              2001 में प्राण को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। वास्तव में यह उस कलाकार का सम्मान था जो अपने अभिनय की स्वयं मिसाल था। अभिनय की यह तरलता शायद उन्हें उस विरासत से मिली थी जिसे प्राण ने आज भी संजोये रखा है। कहते हैं शराब के साथ जब लोग होश खो बैठते हैं, प्राण साहब पूरी गालिब सुना दे सकते हैं। फैज भी मानते थे कि उनके अलावा किसी और को फैज याद है, तो वे प्राण हैं। मीर तकी मीर, नजीर अकबराबादी, अली सरदार जाफरी, कैफी आजमी... प्राण की जिंदगी के सुर शायद यहीं से तय होते थे।

                शायद इसीलिए ‘उपकार’ के मलंग बाबा हों या ‘विक्टोरिया नं. 203’ का मस्त मौला चोर, ‘कालिया’ का जेलर हो या ‘जंजीर’ का खान, जिंदगी के जो भी रंग दिखाने के अवसर प्राण को मिले पूरी तन्मयता से उसे परदे पर साकार किया उसने। राजकपूर, दिलीप कुमार,देव आनंद से लेकर राजेन्द्र कुमार, मनोज कुमार, धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना, नवीन निश्चल अभिनेताओं की पीढि़या-दर-पीढि़या गुजरती रहीं, लेकिन जब तक शारीरिक रूप से सक्षम रहे,प्राण के लिए हिन्दी सिनेमा में भूमिका निकाली जाती रही। वे ऐसे पहले चरित्र अभिनेता थे,जिनपर गाना फिल्माया जाना फिल्म के लिए भाग्यशाली माना जाता था। भाग्यशाली हो या न हो, यह तो जरूर है कि प्राण की जीवंतता उस गाने को अमर कर देने का सामर्थय रखती थी। कौन भूल सकता है, ‘कस्में वादे प्यार वफा सब बाते हैं बातों का क्या....’ या फिर ‘यारी है इमान मेरा, यार मेरी जिंदगी...। ‘प्राण’ का होना हिन्दी सिनेमा में प्राण का होना है, हड़बड़ी में हिट तलाशते और सफलता के लिए अभिनय से दीगर चीजों को तरजीह देने की कोशिश में लगे अभिनेताओं को एक बार अवश्य मुड़कर प्राण की ओर देख लेना चाहिए, यदि वे अच्छे अभिनेता के साथ अच्छे व्यक्ति भी बनना चाहते हैं।

विनोद अनुपम : लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं.

11 April 2013

फरमाइश की है झुमरी तिलैया से.....

"झुमरी तिलैया" नाम सुनकर हम बचपन में खिलखिला कर हंस दिया करते थे. हम में से कई लोगों के लिए झुमरी तिलैया बस एक काल्पनिक जगह थी, जहाँ के लोग फ़िल्मी गानों के बेहद शौक़ीन थे.  वे दिन भर चिट्ठियाँ लिखा करते थे...अपनी फरमाइशों की फेहरिस्त बनाया करते थे...उन्हें जूनून की हद तक शायद रेडिओ पर अपना नाम और उससे भी बढ़कर अपने शहर का नाम सुनने का चस्का लगा था... जब धीरे धीरे देश से वह पुराना रेडियो गायब हुआ, तब उसके साथ ही झुमरी तिलैया भी कही खो गया. उसके साथ ही खो गयी चेहरों पर खिलने वाली वह तन्दुरित मुस्कान....इस झुमरी तिलैया पर जो हकीकत की जमीन से ज्यादा हमारी कल्पनाओं में बसा करता था...एक रिपोर्ट लिखी है  अनुपमा ने... आप भी पढ़े...: अखरावट 
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देश  के लाखों रेडियो श्रोताओं की याद में बसा झारखंड का झुमरी तिलैया धीरे-धीरे अपनी पहचान बदल रहा है, लेकिन उसकी नई पहचान में भी सिनेमा और स्वाद का रस घुला हुआ है...... 

अगर आपने जीवन के किसी भी दौर में रेडियो पर फरमाइशी फिल्मी गीतों का कार्यक्रम सुना हो तो यह संभव नहीं है कि आप झुमरीतिलैया के नाम से अपरिचित हों. बात जब झुमरीतिलैया की हो तो वाकई यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि किस किस्से को तवज्जो दी जाए, बातचीत का कौन-सा सिरा थामा जाए. है तो यह एक छोटा-सा कस्बा लेकिन यहां गली-गली में ऐसी दास्तानें बिखरी हैं जो आपकी यादों से वाबस्ता होंगी.
झारखंड के कोडरमा जिले में स्थित यह शहर फरमाइशी गीतों के कद्रदानों का शहर तो है ही लेकिन आप यहां आएंगे तो एक और फरमाइश आपसे की जाएगी- यहां बनने वाले कलाकंद को चखने की. यहां बनने वाला कलाकंद हर रोज देश के कोने-कोने में जाता है और दुनिया के उन मुल्कों में भी जहां इस इलाके के लोग रहते हैं.

इस बीच सड़क किनारे दीवारों से झांकते पोस्टर एक दूसरी कहानी भी बता रहे होते हैं. यह झुमरीतिलैया की नई पहचान है. कुछ युवाओं द्वारा जिद और जुनून में बनाई गई ‘झुमरीतिलैया’ नाम की फिल्म ने भी शहर को नई पहचान देने की कोशिश की है. इन्हीं बातों के बीच तिलैया डैम के पास हमें ब्रजकिशोर बाबू मिलते हैं, जो कहते हैं, 'देखिए, यह सब पहचान बाद की है, इसकी असली पहचान तो अभ्रक को लेकर रही है. 1890 के आस-पास जब रेल लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ तो पता चला कि यहां तो अभ्रक की भरमार है. फिर क्या था अंग्रेजों की नजर पड़ी, वे खुदाई करने में लग गए. बाद में छोटूराम भदानी और होरिलराम भदानी आए. उन्होंने मिलकर सीएच कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनाई और माइका किंग नाम से मशहूर हो गए.’ ब्रजकिशोर बाबू कहते हैं कि शहर में 1960 में ही मर्सिडीज और पोर्सके कार देखी जा सकती थीं.

इस छोटे-से कस्बे में ऐसी अनेक दास्तानें बिखरी हुई हैं. वहां से हम सीधे गंगा प्रसाद मगधिया के घर पहुंचते हैं जो अपने जमाने में रेडियो पर फरमाइशी गीतों के चर्चित श्रोता थे. रेडियो सिलोन से लेकर विविध भारती तक फरमाइशी फिल्मों का कार्यक्रम हो और मगधिया का नाम न आए, ऐसा कम ही होता था. शहर के बीचो-बीच स्थित दुकान के पीछे बने मकान में उनकी पत्नी मालती देवी, भाई किशोर मगधिया और बेटे अंजनि मगधिया से मुलाकात होती है. घर में दाखिल होने पर पता चल जाता है कि हम ऐसी जगह पर हैं जहां कभी सिर्फ और सिर्फ गीत-संगीत और रेडियो की खुमारी रही होगी. कुछ पुराने रेडियो छज्जे पर रखे रहते हैं कपड़े के गट्ठर में पुराने कागजों के कुछ बंडल पड़े होते हैं. अंजनि मगधिया उन्हें खोलते हुए कहते हैं, ‘इसे ही देख लीजिए, कुछ नहीं बताना पड़ेगा हम लोगो को.

पिताजी के मन में रेडियो फरमाइश, गीत-संगीत की दीवानगी की कहानी इसी बंडल में है.’ बंडल खुलता है, सबसे पहले एक पैड नजर आता है- बारूद रेडियो श्रोता संघ, झुमरीतिलैया. पोस्टकार्ड हैं जो बाकायदा प्रिंट कराए गए हैं. कोई गंगा प्रसाद मगधिया के नाम से है तो किसी में उनके साथ पत्नी मालती देवी का नाम भी है. कुछ पोस्टकार्ड बारूद रेडियो श्रोता संघ के नाम वाले हैं. स्व. गंगा प्रसाद मगधिया की पत्नी मालती देवी कहती हैं, ‘मुझे तो इतना गुस्सा आता था उन पर कि क्या बताऊं. दिन भर बैठकर यही करते रहते थे. कहने पर कहते थे- सुनना, तुम्हारा भी नाम आएगा. मैं झल्लाकर कहती कि रेडियो से नाम आने पर क्या होगा तो वे हंस कर कहते- माना कि फरमाइश बचपना बर्बाद करती है, मगर ये क्या कम है कि दुनिया याद करती है. 

उनके भाई किशोर कहते हैं कि उस जमाने में विदेश में एक बार फरमाइश भेजने में 14 रुपये तक का खर्च आता था लेकिन यह रोजाना होता था. हमारे मन में सवाल उठता है कि आखिर उस जमाने में यानी 60 से 80 के दशक के बीच इतना खर्च कर रेडियो पर फरमाइशी गीत सुनने का यह जुनून क्यों. जवाब मिलता है- एक तो इस छोटे-से कस्बेनुमा शहर को ख्याति दिलाने की होड़, दूसरा इस छोटे-से शहर के लोगों का नाम रेडियो सिलोन, रेडियो इंडोनेशिया, रेडियो अफगानिस्तान, विविध भारती वगैरह में रोजाना सुनाई पड़ता था. एक तो इसे लेकर उत्साह और रोमांच रहता था और दूसरा अधिक से अधिक बार नाम प्रसारित करवाने की एक होड़ भी थी, जिसमें कई गुट एक-दूसरे से मुकाबला करने में लगे रहते थे.

हम रेडियो और फरमाइशी गीतों के दूसरे दीवानों के बारे में जानना चाहते हैं. बताया जाता है कि रामेश्वर वर्णवाल भी फरमाइशी गीतों के बेमिसाल श्रोता और फरमाइश भेजने वालों के बेताज बादशाह थे. कवि और फिल्म समीक्षक विष्णु खरे ने कभी लिखा था कि अमीन सयानी को मशहूर कराने में झुमरीतिलैया वाले रामेश्वर वर्णवाल का बड़ा योगदान रहा है. मगधिया और वर्णवाल के अलावा झुमरीतिलैया से फरमाइश करने वालों में कुलदीप सिंह आकाश, राजेंद्र प्रसाद, जगन्नाथ साहू, धर्मेंद्र कुमार जैन, लखन साहू, हरेकृष्ण सिंह, राजेश सिंह और अर्जुन सिंह के नाम भी हैं. हरेकृष्ण सिंह तो अपने नाम के साथ अपनी प्रेमिका प्रिया जैन का नाम भी लिखकर भेजा करते थे.

फरमाइशी गीतों की मासूम चाहत में भी षड्यंत्रों और घात-प्रतिघात की गुंजाइश मौजूद थी. कई लोग जहां टेलीग्राम भेजकर भी गीतों की फरमाइश करते थे वहीं ऐसे लोग भी थे जो डाकखाने से सेटिंग करके एक-दूसरे की फरमाइशी चिट्ठियों को गायब भी करवा देते थे ताकि दूसरे का नाम कम आए. बहरहाल, अतीत के इन दिलचस्प किस्सों के साथ हम वर्तमान को जानने की कोशिश करते हैं. फरमाइशी गीतों के कारण पहचान बनाने वाले इस शहर में अब इसके कितने दीवाने बचे हैं? गंगा प्रसाद मगधिया के भाई किशोर मगधिया कहते हैं, ‘हम इसे जिंदा तो रखना चाहते हैं लेकिन केवल एक परंपरा की तरह क्योंकि रोजी-रोटी की चिंता जुनून पर हावी है.’ 

इस बीच शहर की दीवारों पर जगह-जगह ‘झुमरीतिलैया’ फिल्म के पोस्टर नजर आ रहे हैं. हम कोशिश करते हैं शहर की नई फिल्मी पहचान से रूबरू होने की. हम फिल्म के कलाकारों से मिलने उनके घर पहुंचते हैं. एक कमरे में सारे कलाकार जुटते हैं. निर्देशक-अभिनेता अभिषेक द्विवेदी, उनके भाई राहुल, उनके पिता उदय द्विवेदी, मां कांति द्विवेदी, विवेक राणा, उनके मामा गौरव राणा, अभिनेत्री नेहा, नेहा के पापा आदि. इन सबने मिलकर फिल्म प्रोडक्शन कंपनी बनाई एफ ऐंड बी यानी फेंड्स ऐंड ब्रदर्स प्रोडक्शन. फिल्म में अगर तकनीशियन वगैरह का शुल्क जोड़ लिया जाए तो इसमें कम से कम 13 लाख रुपये लगते लेकिन आपसी जुगाड़ के चलते यह महज पांच लाख रुपये में बन गई.

यह फिल्म शहर के सिनेमाहॉल में दस दिन तक चलीं, रांची में एक सप्ताह तक, बुंडू में छह दिन तक. अब होली के बाद दूसरे शहरों में फिर से रिलीज करने की तैयारी है. फिल्म में एक्शन की भरमार है. अभिषेक कहते हैं, ‘हम बचपन से ही मार्शल आर्ट के दीवाने रहे हैं. बहुत दिनों से फिल्म बनाने की सोचते थे. हमने तय किया खुद ही पैसा जुटाएंगे और खुद ही अभिनेता-अभिनेत्री बनेंगे.’ इसके बाद सोनी एफएक्स कैमरे का जुगाड़ हुआ. ग्यारहवीं में पढ़ने वाली नेहा नायिका के रूप में मिल गई.

हीरो के लिए विवेक, राहुल आदि हो गए. पापा की भूमिका के लिए निर्देशक अभिषेक के पापा मिल गए और मां के रोल में उनकी मां. किसी का नाम नहीं बदला गया. किसी को फिल्म का अनुभव पहले से नहीं था, सो बार-बार ब्रूस ली की फिल्म ‘इंटर द ड्रैगन’, ‘टॉम युम वुम’ आदि दिखाई गईं ताकि एक्शन का रियाज हो. इसके बाद घर में और आस-पास के लोकेशन में ‘झुमरीतिलैया’ की शूटिंग भी शुरू हो गई. फिल्म बनाने के दौरान लगा कि एक गाना तो होना ही चाहिए. अब गायक कहां से आए तो अभिषेक ने अपने चाचा को कहा, जो मुकेश के गाने ही गाते हैं. ऐसे ही जुगाड़ तकनीक से झुमरीतिलैया बनकर तैयार हुई और रिलीज हुई तो एक बार फिर गीत-संगीत के शहर का फिल्मी सफर शुरू हुआ.


फिल्म की अभिनेत्री नेहा कहती हैं, ‘मैं पहले सोचती थी कि अभिनय कैसे करूंगी लेकिन दोस्तों के साथ काम का पता ही नहीं चला.’ फिल्म में मां बनी निर्देशक अभिषेक की मां कांति द्विवेदी कहती हैं, ‘बेटों ने मुझसे भी अभिनय करा लिया, अब तो सड़क पर जाती हूं तो कई बार बच्चे कहते हुए मिले- देखो-देखो, झुमरीतिलैया की मां जा रही है.’ एक्शन फिल्मों का नाम झुमरीतिलैया क्यों? इस सवाल के जवाब में निर्देशक अभिषेक कहते हैं कि अपना शहर है झुमरीतिलैया, इसके नाम पर तो इतना भरोसा है कि कुछ भी चल जाएगा.

गीतों के शहर में फिल्मों के जरिए सफर का यह नया अनुभव सुनना दिलचस्प लगता है. यहां से निकलते-निकलते युवा फिल्मकार भी कलाकंद चखने की सिफारिश कर ही देते हैं. वहां से हम कलाकंद के लिए मशहूर आनंद विहार मिष्ठान्न भंडार पहुंचते हैं. दुकान मालिक के बेटे अमित खेतान कहते हैं, ‘झुमरीतिलैया जैसा कलाकंद कहीं और खाने को नहीं मिल सकता.’

खेतान बताते हैं कि कलाकंद की शुरुआत भाटिया मिष्ठान्न भंडार ने की थी लेकिन उसके बंद हो जाने के बाद कलाकंद की सबसे ज्यादा बिक्री उनकी दुकान में ही होती है. इसकी फरमाइश देश के हर हिस्से और कई बार विदेश तक से आती है. पिछले चार दशक से कलाकंद बनाने में ही लगे कारीगर सुखती पात्रो कहते हैं, ‘मैंने बहुत जगह देखा है, कलाकंद आज भले सभी जगह हो लेकिन यह देन तो इसी झुमरीतिलैया की है.’

पता नहीं कलाकंद कहां की देन है लेकिन वाकई झुमरीतिलैया के कलाकंद का स्वाद शायद ही कहीं और मिले. शहर की पहचान अब बदल रही है. कोई कहता है कि यह पावर हब बन रहा है तो कोई और बेशकीमती पत्थरों को इसकी नई पहचान बताता है, लेकिन हमारे हाथों में मगधिया के पोस्टकार्डों का बंडल होता है- पसंदकर्ता गंगा प्रसाद मगधिया, बारूद रेडियो क्लब, झुमरीतिलैया, गीत- दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गया रे, फिल्म गंगा-जमुना....!

मूल रूप से तहलका हिंदी में प्रकाशित 

मूल कॉपी यहाँ पढ़ी जा सकती है

10 April 2013

सूरज न बन पाये तो बनके दीपक जलता चल



बात जब संगीत निर्देशकों की होती है तो हमारे मन में एसडी-आर डी बर्मन, मदन मोहन, ओ पी नैय्यर, कल्याण जी आनद जी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, खैय्याम आदि के नाम तो आते हैं, लेकिन हम अक्सर एक नाम भूल जाते हैं।। य़ह अलग बात है कि आज भी कही जब उनके संगीत से सजे गीत जब हमें सुनने को मिलते हैं, तो हमारे कदम बरबस ठिठक जाते हैं ...हम मधुबन की खुशबू को  तो  ढलती रातों में घुलते महसूस करते हैं लेकिन संगीत का मधुबन बनेवाली हिंदी सिनेमा की इस महिला संगीतकार का नाम याद करने में अक्सर मुश्किल का सामना करते हैं।। कितनों को तो शायद यह नाम मालूम भी नहीं।। यहाँ बात हो रही है हिंदी सिनेमा की पहली स्थापित महिला संगीतकार उषा खन्ना उषा खन्ना कि. उषा खन्ना पर यह छोटा सा लेख लिखा है प्रीति सिंह परिहार ने. आप भी पढ़ें।।  : अखरावट 






जिंदगी प्यार का गीत है, इसे हर दिल को गाना पड़ेगा’ गीत को अपने संगीत से सजाने से बहुत पहले ही उन्होंने गीतों के इर्द-गिर्द अपनी एक दुनिया बनाने का सपना बुन लिया था़.  इस सपने को लेकर वे बड़ी हुईं।  यह सपना साकार भी हुआ पर जरा सी तब्दीली के साथ़। सपने का आधार संगीत ही रहा पर आकार कुछ अलग बना़।  हुआ यूं कि वे आयीं तो गायिका बनने थीं, लेकिन उनमें एक बेहतरीन संगीतकार का हुनर था. उनके असली हुनर की पहचान हुई और पहली ही फिल्म के संगीत से यह पहचान प्रसिद्घि पाने लगी़  अपने संगीत से उन्होंने तीन दशक तक लगभग ढाई सौ फिल्मों के गीतों को अपनी धुनों से सजाया़  आज उनके नाम का जिक्र भले कभी-कभार होता हो, लेकिन हिंदी सिनेमा के संगीतकारों की बात उनके नाम के बिना शुरू नहीं हो सकती़  जी हां, बात हो रही है हैं प्रसिद्घ महिला संगीतकार उषा खन्ना की़।  वही उषा खन्ना जिन्होंने ‘छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी’, ‘मधुबन खुशबू देता है’ जैसे यादगार गीतों की धुन बनायी़।

मध्यप्रदेश के ग्वालियर में जन्मी उषा खन्ना ने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली थी़। पिता मनोहर खन्ना शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता थे और गीत लिखा करते थे़।  पिता के संगीत प्रेम ने उषा को भी संगीत की ओर मोड़ा़ वे पिता के लिखे गानों की धुन बनातीं, फिर उन्हें खुद गाती भी थीं।  अरबी संगीत ने भी उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया़।

अपनी पहली धुन महज सोलह साल की उम्र में बनाने वाली उषा को गायिका बनने की ख्वाहिश फिल्मी दुनिया में लेकर आयी, उन्होंने कुछ गीत गाये भी, लेकिन उनकी पहचान शायद संगीतकार के तौर पर ही होनी थी़।  पचास के दशक में वे जब गायिका के तौर पर मौका पाने के लिए शशिधर मुखर्जी से मिलीं, तो उन्होंने अपनी ही धुनों से सजाये कुछ गीत उन्हें सुनाये़।  उषा खन्ना ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था, उनके गीत सुन कर शशिधर मुखर्जी ने कहा ‘क्या तुम्हें लगता है कि तुम लता और आशा जैसी गायिकाओं से अच्छा गाती हो? ये गीत अगर तुमने बनाये हैं, तो तुम संगीतकार क्यों नहीं बन जातीं? अगले कुछ महीनों तक वे उषा से हर रोज दो गानों की धुन बनवाते़।  अच्छी तरह परखने और उनकी बनायी कई धुनों को सुनने के बाद 1959 उन्होंने ‘दिल दे के देखो’ में उषा को बतौर संगीतकार मौका दिया़।  इस पहली ही फिल्म के गीतों की सफलता ने उनके लिए संगीत की दुनिया का रास्ता तैयार कर दिया़। 1979 में उषा खन्ना के संगीत से सजे ‘दादा’ फिल्म के गीत ‘दिल के टुकड़े-टुकड़े करके मुस्कुरा के चल दिये’ के लिए के यसुदास को फिल्म फेयर अवार्ड मिला़।  उषा खन्ना के कंपोजीशन में मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने क ई प्रसिद्ध गीत गाये़।

‘पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले’, ‘जिंदगी प्यार का गीत है’ और ‘शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है’ जैसे अनगिनत यादगार गीत उषा खन्ना के संगीत के पिटारे से निकले हैं. उन्होंने कुछ मलयालम फिल्मों में भी संगीत दिया जिन्हें खासा पसंद किया गया़ फिल्मकार और गीतकार सावन कुमार ने उनके लिए सबसे अधिक गीत लिखे, जिनमें से ज्यादातर लोकप्रिय हुए़।  2003 में ‘दिल परदेसी हो गया’ फिल्म में संगीत देने के बाद से उनका नाम किसी फिल्म में बतौर संगीतकार नहीं दिखा़।  इस बीच कई धारावाहिकों में उनके संगीत देने की खबरें जरूर आती रहीं.  उषा की धुन से सजा ‘साजन बिना सुहागन’का गीत ‘मधुबन खुशबू देता है’ की खुशबू आज भी संगीतप्रेमियों के मन में कायम है़।  इस गीत के अंतरे में एक पंक्ति है-‘सूरज न बन पाये, तो बनके दीपक जलता चल’.  उषा खन्ना बेशक सूरज की तरह चमकने की काबीलियत रखती हैं, लेकिन उन्होंने दीपक की तरह जलते रहना चुना़  उषा खन्ना के बरक्स एक हद तक यह बात सच भी लगती है़  उन्होंने आज गायिकी में स्थापित कई बड़े नाम मसलन, पंकज उदास, रूप कुमार राठौर और सोनू निगम को पहला मौका दिया था़  लेकिन उगते सूरज को सलाम करने के आज के समय में लाखों श्रोताओं के दिलों में सुकून का दीया जलानेवाली उषा खन्ना का जिक्र कहीं नहीं दिखता.                                


31 March 2013

फिल्म मेकिंग की किताब है ‘प्यासा’ : राकेश ओम प्रकाश मेहरा


कुछ फिल्में एक याद की तरह जिंदगी में रह जाती हैं. यह याद गुजरते वक्त के साथ भी धुंधली नहीं पड.ती. उसके संवाद, दृश्य और किरदार एक हल्की-सी आहट पाकर सामने आ खडे. होते हैं. ऐसी ही एक फिल्म की याद  को उर्मिला कोरी के साथ साझा किया है. फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने. 


सिनेमा से मेरी शुरुआती पहचान रविवार के दिन दूरदर्शन पर आनेवाली ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों और ऑल इंडिया रेडियो पर फिल्मों के संवादों के माध्यम से हुई थी. बीतते सालों के साथ यह पहचान दोस्ती और दोस्ती जल्द ही प्यार में बदल गयी. जिस तरह से प्यार में दिमाग से नहीं दिल की सुनते हैं, ऐसे ही मुझे लगता है कि सिनेमा दिल से देखने की चीज है, दिमाग से नहीं. बस शर्त यह होनी चाहिए कि वह दिल को छू सकने का माद्दा भी रखता हो. एक ऐसा सिनेमा जो मनोरंजन के साथ-साथ एक सोच भी दे, मेरे लिए वही फिल्म है. यह सब मैंने गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ में पाया है. 

आम तौर पर लोग ‘प्यासा’ को मुख्य रूप से एक रोमांटिक फिल्म मानते हैं, लेकिन गौर करें तो यह फिल्म समाज पर भी पैनी चोट करती है. आजादी के बाद नेहरू और गांधी के दिखाये सपने जब टूट रहे थे और देश बेरोजगारी और भुखमरी का शिकार हो रहा था, तो इस फिल्म का गीत ‘जिन्हें हिंद पर नाज है..’ के शब्द पूरी तरह से व्यवस्था पर प्रहार करते हैं. साथ ही इसमें दुनिया का अजीब रंग भी दिखाया गया है. जिस प्रतिभाशाली शायर विजय को जमाने ने ठुकरा दिया था, उसी को मुर्दा समझ कर वही जमाना सिर आंखों पर बैठाने को तत्पर हो गया. आखिर हम मरने के बाद ही लोगों की कद्र क्यों करते हैं!

इस फिल्म के जरिये गुरुदत्त ने यह बात फिर साबित कर दी थी कि वह अद्भुत फिल्मकार थे. उन्होंने जिस तरह से फिल्म के क्लाइमेक्स को रचा था, अंधेरे सभागार के दरवाजे से आ रहे प्रकाश के बीच, सलीब पर टंगे ईसा मसीह की मुद्रा में दरवाजे पर खडे. विजय की छवि, वह सीन हिंदी सिनेमा के यादगार फ्रेमों में से एक था. फोटोग्राफी का बेजोड. संगम था. इस फिल्म के लिए छायाकार वीके मूर्ति की भी जितनी तारीफ की जाये कम है. अभिनय के लिहाज से भी यह फिल्म क्लासिक है. वहीदा जी, गुरुदत्त, रहमान और माला सिन्हा सभी बेहतरीन थे. कुल मिला कर ‘प्यासा’ फिल्ममेकिंग की किताब है, जिसका हर फ्रेम, संवाद, गीत-संगीत आपके दिल को छू जाता है. 

                                                                                 उर्मिला कोरी युवा फिल्म  रिपोर्टर हैं 
     

27 March 2013

सौ साल के सिनेमा में गायब होती होली...

कभी समय था जब फ़िल्मी परदे पर होली को एक अनिवार्य आकर्षण के रूप में समाहित किया जाता था. लेकिन सिनेमा के सौवें साल तक आते आते हिंदी सिनेमा से होली लगभग गायब हो चुकी है। सौ साल का सिनेमा और होली के साथ इसके रिश्ते को बारीकी से देखा है फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने. आप भी पढ़िए और होली के रंग में डूबिये उतरिये.  





मल्टीप्लेक्सों की चमक में धब्बे के डर से पानी की बोतलों पर भी जब प्रतिबंध लगा, तो बाजार के आगे समर्पित हिंदी सिनेमा ने बगैर प्रतीक्षा किये परदे पर भी होली को दिखाना प्रतिबंधित कर लिया. शायद कथित आधुनिक सौंदर्यबोध ने आज के फिल्मकारों को यह सीख दी होगी कि होली का भदेसपन, मल्टीप्लेक्स के अति अभिजात्य वातावरण में टाट की पैबंद सरीखा दिखेगा. आश्‍चर्य नहीं कि कभी हिंदी सिनेमा के लिए अनिवार्य रही होली अब सिर्फ सिनेमा की खबरों में दिखायी देती है, सिनेमा के परदे पर नहीं. वास्तव में सिनेमा ने दर्शक बदले, तो उसके त्योहार भी बदले, आज ‘वेलेन्टाइन डे’ और ‘फ्रेंडशिप डे’ हिंदी सिनेमा सेलिब्रेट कर रही है, कभी समय था जब परदे पर होली को एक अनिवार्य आकर्षण के रूप में समाहित किया जाता था. यह वह समय था जब हिंदी फिल्में, हिंदी दर्शकों को ध्यान में रख कर बना करती थीं. उस समय -‘होली आई रे’, ‘होली’, ‘फागुन’ जैसी कई फिल्में बनी, जिसमें सारा कथानक होली के इर्द-गिर्द ही घूमता था. 

यह वह समय था, जब हिंदी सिनेमा के लिए होली वर्जनामुक्त होने का एकमात्र बहाना था. यह सिर्फ रंग और उत्साह का अवसर नहीं था, मानव मुक्ति का अवसर था, जिसमें मन की कुंठाओं, आग्रहों और पूर्वाग्रहों से मुक्ति पायी जाती थी. आज के समाज को शायद ही समझ में आये कि होली का वर्जनामुक्ति से क्या संबंध है? उनके लिए तो हरेक दिन और दिन के हर घंटे वर्जनामुक्त हैं. ‘जिस्म’ और ‘र्मडर’ के दौर में जब महेश भट्ट जैसे फिल्मकार विवाहेत्तर संबंध को स्वाभाविक मानकर चल रहे हों, जहां सहमति से सेक्स की उम्र सोलह करने के लिए दवाब बन रहा हो, वहां कैसे किसी से यह समझने की उम्मीद की जा सकती है कि ‘फूल और पत्थर’ में होली के अवसर पर पुलकित होकर मीना कुमारी क्यों गाती हैं, ‘लायी है हजारों रंग होली...’, आज की पीढ.ी के लिए यह एहसास दुर्लभ है.

जाहिर है विपुल शाह की कुछ वर्ष पहले आयी ‘वक्त- रेस अगेंस्ट टाइम’ में होली दिखायी भी जाती है, तो अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड.ा की ‘लेट्स प्ले होली’ की सरगोशियों के साथ, यहां तय करना मुश्किल हो जाता है कि यह कोई रेनडांस का सीक्वेंश है या उस होली का दृश्य जिसे हम जानते रहे हैं. यह होली के स्वभाव का ही कमाल है कि रंगों के लिए जाने जाना वाला यह त्योहार हिंदी सिनेमा में तब भी दिखाया जाता था, जब उसके पास रंगों की ताकत नहीं थी. यूं तो कई श्‍वेत-श्याम फिल्मों में होली दृश्य पूरी जीवंतता से फिल्माये गये, लेकिन 1950 में बनी ‘जोगन’ के ‘डारो रे रंग डारो रसिया’ को आज भी भुलाना संभव नहीं हो पाता. इस गीत में दिखती नरगिस की जीवंतता फिर एक बार देखने को मिली महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ में. गांव की अलमस्ती, छेड.छाड. और ,संबंधों की गरमाहट प्रदर्शित करती ‘होली आई रे कन्हाई रंग छलके, सुना दे जरा बांसुरी..’ आज भी होली के उत्साह से सराबोर कर जाती है.

‘मंगल पांडे’ में ‘भीगी चोली, चुनरी भी गीली हुई, सजना देखो मैं नीली हुई. थोड.ी-थोड.ी तू जो नसीली हुई, पतली कमर लचकीली हुई. .तुम रह-रह के फेंको न यह नजरों का जाल.अब हमें कोई रोके नहीं, कोई टोके नहीं.. ’ के बोल पर एक ओर मंगल पांडे और नर्तकी के प्रेम को परवान चढ.ते दिखाया जाता है, वहीं दूसरी ओर कम उम्र में विधवा बनी अमीशा के मन में उमडे. स्वभाविक उत्साह को भी प्रदर्शित किया जाता है. केतन मेहता के लिए मंगल पांडे के कालखंड में वर्जना को टूटते दिखाये जाने का होली के अलावा दूसरा अवसर नहीं हो सकता था.

अधिकांश हिंदी फिल्मों में होली के अवसर का उपयोग कथानक को एक नया मोड. देने के लिए ही किया गया है. राजेश खत्रा अभिनीत ‘कटी पतंग’ की, ‘आज न छोडे.ंगे हमजोली...’ के गीत होली के मूड को दोगूना ही नहीं करते, इस गीत में अभिव्यक्त एक युवा विधवा के दर्द का कंट्रास्ट इसे और भी प्रासंगिक बना देता है. कई फिल्मों में होली का अवसर प्रेम की मुखर अभिव्यक्ति के रूप में भी प्रदर्शित हुआ है. राकेश रोशन की ‘कामचोर’ में नायिका, ‘जहां मल दे गुलाल मोहे ..’ की मांग करती है, वहीं ‘डर’ में नायिका अज्ञात प्रेमी के भय से मुक्त होने का उत्साह अपने पति के साथ इन शब्दों के साथ मनाती है, ‘अंग से अंग मिलाना सजन ऐसे रंग लगाना..’.

आज जब तय रूप से हिंदी फिल्में मल्टीप्लेक्स और एनआरआइ दर्शकों को ध्यान में रख कर बनायी जा रही हैं, उसमें होली जैसे त्योहार की गुंजाइश ही नहीं बचती. हिंदी समाज में होली अभिजात्य लोगों द्वारा भी भले ही मना ली जाती रही हो, लेकिन खेलने की परंपरा सर्वहारा की ही रही है. कह सकते हैं होली का आनंद बगैर सर्वहारा हुए हम नहीं उठा सकते. निश्‍चय ही आज के कथित कॉरपोरेट दौर में जब सब कुछ एकदम करीने से चाहिए होता है, होली की भदेस सामूहिकता कैसे सूट कर सकती है. उन्हें नीली रोशनी में दिखाये जा रहे नितांत अंतरंग दृश्यों पर आपत्ति नहीं होती, लेकिन ढोल-मजीरे की थाप पर होरी का समूह गायन उन्हें अश्लील ही नहीं, विद्रुप भी लगता है. आश्‍चर्य नहीं कि लंबे अंतराल के बाद आये ‘बागवान’ के गीत ‘होली खेले रघुवीरा..’ के अतिरिक्त होली गीतों के नाम पर हिंदी सिनेमा में सत्राटा ही दिखायी पड.ता है. ‘बागवान’ की होली भी इसलिए दर्शकों को स्वीकार्य हो गयी. क्योंकि यह एक परिवार की कहानी थी, इसमें एक समाज को स्थापित करने की कोशिश की गयी थी. सबसे बढ.कर इसमें महानायक अमिताभ बच्चन थे, जहां आकर सारे फिल्मी गणित और व्याकरण ध्वस्त हो जाते हैं.



यह मात्र संयोग नहीं कि हिंदी सिनेमा के पांच कालजयी होली गीतों को याद करने की कोशिश करें तो तीन अमिताभ पर ही फिल्माये गये हैं. ‘बागवान’ से पहले ‘सिलसिला’ का रंग बरसे.., और उससे पहले ‘शोले’ का विहंगम, होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं..’. वर्षों से लोकगीत के रूप में गाये जाने वाले, रंग बरसे..का विकल्प नहीं ढूंढ.ा जा सकता. होली और होली गीत ही किसी व्यक्ति को अपने प्रेम की सार्वजनिक अभिव्यक्ति की ताकत दे सकते हैं. खासकर तब जब वह सामाजिक दायरे से बाहर भी हो. ऐसा ही स्मिता पाटिल अभिनीत ‘आखिर क्यों’ में भी दिखा था, जब नायक अपनी पत्नी के सामने ही उसकी छोटी बहन से प्रणय निवेदन कर बैठता है, ‘सात रंग में खेल रही दिलवालों की होली रे..’. ये होली गीत फिल्म के कथानक में भी महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं. और केवल नायिका के तन दिखाने का बहाना मात्र नही होते. जैसा सावन कुमार की ‘सौतन’ मे दिखा था, जब वे मॉरिशस में नायिका को ‘मेरी तो पहले ही तंग थी चोली, आ गयी बैरन होली.’ के साथ होली के रंगों में सराबोर दिखाते हैं.

सच यही है कि अधिकांश फिल्मों में होली सौंदर्य, सामाजिकता और संगीत का समन्वय ही प्रदर्शित करती आयी है. वास्तव में जिसे भुलाना संभव नहीं. ‘कोहीनूर’ को आज हम भले ही याद न कर पायें, लेकिन अपने मन से उसके ‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो’ को उतार पाना कतई संभव नहीं. वी शांताराम ने भी अपनी पहली रंगीन फिल्म ‘नवरंग’ में एक अद्भुत होली गीत रखा था, जिसे नृत्यांगना संध्या की चपलता ने अविस्मरणीय बना दिया. छेड.छाड. के साथ कुछ यूं शुरू होते हैं, गीत के बोल, कटक अटक झटपट पनघट पर चटक मटक झनकार नवेली.. और फिर प्रत्युत्तर शुरू होता है, जारे हट नटखट.. गौरतलब है कि इस गीत में नायक नायिका दोनों की ही भूमिका अकेले संध्या ने ही निभायी थी. यहां ‘नदिया के पार’ को कैसे भूला जा सकता है, जोगिड.ा सारारारा..भोजपुरी पृष्ठभूमि वाले इस गाने में नायक नायिका ही नहीं पूरा गांव रंगों में सराबोर दिखता है. बूढे. से लेकर बच्चे तक. होली के अवसर पर पारंपरिक नटुआ नाच की झलक भी शायद यहां पहली बार हिंदी फिल्म में दिखी थी.

होली की विशेषता ही है जितने रंग हैं, उतने ही मूड हैं. हिंदी सिनेमा ने कमोबेश होली के हरेक मूड को फिल्माने की कोशिश की भी की है. अब होली भी खो रही है और उसकी विशेषता भी, जाहिर है परदे से भी गुम हो रही है होली.

विनोद अनुपम राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं।