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18 December 2013

यहाँ कमलनी खिलती है

वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजने का फैसला अकादमी के देर आयद पर दुरुस्त आयद की परंपरा के अनुकूल ही है. फिलहाल पढ़ते हैं उनकी एक कहानी. "यहाँ कमलनी खिलती है". : अखरावट  


वीराने में दो औरतें मौन बैठी थीं। पास-पास नहीं, दूर; अलग, दो छोरों पर असम्पृक्त। एक नजर देख कर ही पता चल जाता था कि उनका आपस में कोई सम्बन्ध न था; वे देश के दो ध्रुवों पर वास करने वाली औरतें थीं।
एक औरत सूती सफ़ेद साड़ी में लिपटी थी। पूरी की पूरी सफ़ेद; रंग के नाम पर न छापा, न किनारा, न पल्लू। साड़ी थी एकदम कोरी धवल, पर अहसास, उजाले का नहीं, बेरंग होने का जगाती थी। मैली-कुचैली या फिड्डी-धूसर नहीं थी। मोटी-झोटी भी नहीं, महीन बेहतरीन बुनी-कती थी जैसी मध्य वर्ग की उम्रदराज़ शहरी औरतें आम तौर पर पहनती हैं। हाँ, थी मुसी-तुसी। जैसे पहनी नहीं, बदन पर लपेटी भर हो। बेख़याली में आदतन खुँसी पटलियाँ, कन्धे पर फिंका पल्लू और साड़ी के साथ ख़ुद को भूल चुकी औरत। बदन पर कोई ज़ेवर न था, न चेहरे पर तनिक-सा प्रसाधन, माथे पर बिन्दी तक नहीं। वीराने में बने एक मझोले अहाते के भीतर बैठी थी वह। चारों तरफ से खुला, बिला दरोदीवार, गाँव के चौपाल जैसा, खपरैल से ढका गोल अहाता।
दरअसल, वीराना वीरान था भी और नहीं भी। दो बीघा जमीन का टुकड़ा, दो फुट ऊँची चाहरदीवारी से घिरा था। दीवार इंसान की बनाई हुई थी, इसलिए उसे वीराने का हिस्सा नहीं माना जा सकता था। पर उसकी गढ़न स्त्री की साड़ी जैसी बेरंग-बेतरतीब थी; यूँ कि उसका होना-न होना बेमानी था। वह बस थी; पेड़-पत्तों से महरूम, उस खारी धरती की निर्जन सारहीनता को बाँध, कम करने के बजाय बढ़ा रही थी। उस जमीन को घेरते वक्त, घेरने वाले का इरादा, उसे आबाद करने का नहीं था। दिल की वीरानी को हरदम रौंदते यादों के काफिले को जीते-जीते, बाक़ी की जिंन्दगी जीने की कूवत पैदा करने के लिए, जिस एकान्त की जरूरत होती है, उसी को निजी बनाने की कोशिश थी। कभी-कभी सुकून पाने को वीराने में ही ठौर बनाना पड़ता है; वैसा ही ठौर था वह मझोला छाजन।
पर अचरज, इंसानों को बसाने का जज्बा भले न रहा हो, फूलते-फलते पेड़ लगाने का इरादा जरूर था। इरादा कि उम्मीद! जिद या दीवानगी! जो था, कारगर न हुआ। धरती में खार की पहुँच इतनी गहरी थी और निकास के अभाव में, बरसात के ठहरे पानी की मियाद इतनी लम्बी कि पेड़ों का उगना, मुश्किल ही नहीं, करीब-करीब नामुमकिन था। कुछ झाऊं और कीकर जरूर उग आते थे जब-तब। पर जब और तब के बीच का फासला इतना कम होता कि पता न चलता, कब थे कब नहीं। उगते, हरसाते, ललचाते और मुक्ति पा जाते। जब पहले-पहल, पहला झाऊं उगा तो बड़ी पुख्तगी के साथ इरादा, उम्मीद बना कि बस अब वह भरे भले नहीं पर जंगली पेड़ वहाँ हरे जरूर होंगे। और उसके एकाध साल बाद, जमीन ममतामयी हुई तो फलदार पेड़ भी उग सकेंगे। झाऊं के बाद कीकर उगे तो उम्मीद भी उमगती चली गई, अंकुर से पौध बनती। सरदी पड़ने पर कीकर पीले पड़ कर सूख गये; झाऊं भी गिनती के दस-बीस बचे। तब भी उम्मीद ने दम न तोड़ा। लगा इस बरस पाला ज्यादा पड़ गया, अगली बार सब ठीक हो जाएगा। जब अगले बरस भी सिलसिला वही रहा तो धीरे-धीरे, जंगली पौधों के पेड़ बनने से पहले गलने-सूखने के साथ, उम्मीद क्या, ज़िद तक दम तोड़ गई।
दूसरी औरत छाजन के बाहर, चहारदीवारी के भीतर बैठी थी, हैंड पम्प के पास। फिसड्डी, पैबन्द लगी कुर्ती और ढीली सलवार पहने थी। अर्सा पहले जब नया जोड़ा बना था तो रंग ठीक क्या रहा होगा, कहा नहीं जा सकता था। और जो हो, सफेद वह कभी नहीं था। मैला-कुचैला या बेतरतीब फिंका हुआ अब भी नहीं। दुरुस्त न सही चुस्त जरूर था, देह पर सुशोभित। सीधी तनी थी उसकी मेहनतकश देह, उतनी ही जितनी पहली की दुखी-झुकी-लुकी। ज़ाहिर था वह निम्न से निम्नतर वर्ग की औरत थी। गाँव की वह औरत, जो दूसरों के खेतों पर फी रोज मजदूरी करके एक दिन की रोज़ी-रोटी का जुगाड़ करती है पर खुदकाश्त जमीन न होने पर भी रहती किसान है। जमीन से जुड़ाव में; अपनी भाव-भंगिमा में। वह इस ऊसर धरती के साथ पली-बढ़ी थी। उसे उपजाऊ से खार होते देखा था। कोई नहर बनाई थी सरकार ने। पर पानी के निकास का सही बन्दोबस्त न होने पर खार इधर के खेतों की तरफ दौड़ा था और हरियल धरती को कल्लर बना कर छोड़ा था। आदमकद पेड़ उगाने की न उसने कभी उम्मीद की, न किसी और ने जिद। उसने आस लगाई तो बस कमतर श्रेणी का धान उगाने वाले खेतिहरों की फसल की बुवाई-कटाई की, जो कमोबेश पूरी होती रही, दो-एक सालों के फासले पर। जब सूखा पड़ता और फसल सिरे से गायब हो जाती तो सरकार राहत के लिए जहाँ सड़क-पुल बनाती, वहीं मजूरी करने चली जाती। जिस दिन मजूरी नहीं, उस दिन कमाई नहीं; रोटी नहीं। बिला काम-धाम, आराम से बैठने की उसे आदत न थी। सोने और जागने के बीच सिर्फ काम का फासला जानती थी, इसलिए चन्द मिनट बेकार क्या बैठी, आप से आप आँखें मुँद गईं। इतनी गहरी सोई कि ओढ़नी बदन से हट, सिर पर टिकी रह गई। निस्पंद बैठे हुए भी उसकी देह जिंदगी की थिरकन का भास देती रही। साँस का आना-जाना, छाती का उठना-गिरना, मानो उसकी रूहानियत के परचम हों।
कल उसने दूनी मजदूरी करके, घरवाले और बच्चे के लिए कुछ रोटी-प्याज बचा रखा था कि आज काम पर न जा, यहाँ बैठ पाए। ऐसा भाग कम होता था कि एक दिन में दो दिनों के गुजारे लायक अन्न जुट जाए। सबकुछ बरखा भरोसे जो था। सचमुच पिछले दो बरस बड़भागी बीते थे। पिछले बरस भी बरखा इतनी हो गई थी कि धान की फसल ठीक-ठाक हो और उसे कटाई का काम मिलता रहे। और इस बरस... इस बरस तो यूँ टूट कर बरसा था सावन कि बिला खेत-जमीन, हरिया लिया था जिया। तभी न कल दूनी मजदूरी का जुगाड़ हुआ और आज यहाँ बैठने आ पाई। जानती थी पहली औरत आज आएगी; पिछले दो बरसों से आ रही थी।
मुँदने से पहले उसकी आँखें दीवार के परली तरफ टिकी थीं। दीवार की बाँध में बँध कर, उधर की निचली जमीन के गड्डों-खड्डों पर, उमग-घुमग कर बरसा पानी जो ठहरा, तो भरा-पूरा पोखर बन लिया। और उसमें खिल आए कमलनी के अनगिन फूल। जहाँ तक वह जानती थी; और इस इलाके के बारे में शायद ही कुछ था जो वह नहीं जानती थी; तो इस बरस से पहले, किसी बरस यहाँ कमलनी नहीं खिली थी।
हे मैया, अजब माया है थारी! इस बरस कमलनी भी यों खिली ज्यों बरसा पानी; अटाटूट। देवी पारवती का चमत्कार नहीं तो क्या कहें इसे? वह जाने थी भली भाँत, पारवती के कहे पर ही खिली थी कमलनी यूँ घटाटोप। कहा होगा शिवजी से कि प्राणप्यारे खिला दो, छोरी खातिर उसकी नाईं कमलनी। बाबा शंकर मना करते तो कैसे; सूरत छोरी की ज्यों पारवती की परछाईं। दिप-दिप मुख पर देवी जोगी मुस्कान लिए खत्म हुई थी; पल भर को जो छोरे का हाथ अपने हाथ से छूटने दिया हो। जैसे ही गाड़ी ट्रेक्टर से टकराई, सोने से छोरा-छोरी मिट्टी हो गए। यह औरत, जो दो बरस से यहाँ आया करे है; जने क्या सोच बंजर को आड़ दे, बीज छींटा करे है, छोरे की माँ है।
सफेद झुकी औरत की आँखें उसकी देह की तरह बेजान नहीं थीं। जब-तब उनमें यादों का बरसाती अंधड़ सरगोशियाँ कर उठता। कभी काली आँधी की किरकिर धूल तो कभी साँवले मेह की झिलमिल टपकन। प्यार से पगे पल की याद कुलांच भरती कि विरह से सना उपरांत लपक कर उसे दबोच लेता।
वह उन्हें पूरा नहीं खोलती थी, न इधर-उधर ताकने की इजाजत देती थी। निगाहें यूँ नीचे झुकी रहतीं जैसे अपने दुख पर शर्मिन्दा हों। पर इधर-उधर न देखने की कोशिश जितनी करे, प्रकृति को पूरी तरह पछाड़ कहाँ पाती थी? गाहे बगाहे नजर फिसल ही जाती, यहाँ-वहाँ। उसकी दूसरी कोशिश भी नाकाम रहती। बोझिल अधखुली आँखों को पूरी तरह मूँद, यह उम्मीद करने की, कि इस वीराने में यादों के भंवर में डूब, नींद आ जाएगी। एकाध दफा यह तो हुआ कि भंवर से दो-एक खुशनुमा लम्हे जेहन में उभरे और बरबस ओंठों पर हल्की मुस्कराहट तिर गई। पर ज्यादा देर टिकी नहीं... अनचाहे-मनचाहे उगे झाऊं-कीकर की तरह समाधिस्थ हो गई। बची रही चीखती-चीरती एक आवृत्ति...पहले गुजरी इस तिथि की...
कभी ऐसा भी हुआ कि अधखुली आँखों से उसने उम्मीद के इस वीराने को फल-फूल से लदा देख लिया। बेर, कैर, करौंदों से ही नहीं, जामुन और आम के झुरमुट से हरियाया। पर भ्रम रहा भ्रम ही; दीवानगी में भी वह जाने रही कि वह दीवानगी थी, असलियत या सच्चाई नहीं। उन जबरन मुंदी, अधमुंदी आँखों में जब नींद कभी न आई तो सपने कैसे आते? नहीं आए इसी से दीवानगी को दीवानगी जाने रही और वीराने को वीराना।
अब भी, हमेशा की तरह, उसने जबरन आँखें मूँदीं तो छलावे-सी मायावी, नामालूम-सी खुशबू ने पलकों पर दस्तक दी। कहाँ से आई खुशबू? क्या आँख लग गई, सपना आ बैठा उसके रूमाल का रूप ले, भीगी पलकों पर? आँखें औचक खुलीं तो इधर-उधर भटक भी लीं।
उसने देखा... जमीन को घेरे जो दो फुटी दीवार खड़ी थी, उसके दूसरी तरफ बाहर पानी ही पानी था। इतना पानी! हाँ होता है, देख चुकी है न दो बार। बरसात होने पर, उम्मीद का यह वीरान बगीचा, पानी से भरा उथला नाला बन, खुद अपने पेड़-पौधों को निगल जाता है। पर यह मौत का साया फेंकता पानी नहीं, कुछ और है। इसमें तो बेशुमार कमलनी खिली हैं! दर्जनों, बीसियों, सैंकड़ों की तादाद में। वह चौंक कर खड़ी हो गई। कमलनी! यहाँ, जहाँ कभी कुछ खिलता नहीं। समझी! आखिरकार उसे नींद आ ही गई और यह सलोना सपना दिखला गई।
मन्त्र मुग्ध वह उठी और यन्त्र-बिद्ध कदमों से दीवार के पास पहुँच गई। कमलनी बदस्तूर खिली रही; मन के तिलिस्मी पेड़ों की तरह बिलाई नहीं। उस पार जाने के लिए वह दीवार में, हैंड पम्प के पास बनी, फाँक की तरफ बढ़ी तो वहाँ एक स्त्री मूर्ति देख, स्तब्ध-अवसन्न रह गई। कहाँ से आई यह प्रतिमा, उसने तो लगवाई नहीं, करुणा से ओतप्रोत देव-मूर्ति... तब... कौन लगा गया... किसने तराशी ऐसी दिलकश... उसकी साँस रुक गई... मूर्ति की छाती उठती-गिरती साँस से हिल रही थी। यह तो... जिन्दगी की हलचल से लबालब, बादामी आँखें पूरी खोल सपनों में खोई... उसकी बहू थी? दिंन्दा?
पर उसे तो उसने ख़ुद अपने हाथों...
सिर में घुमेर उठी और वह चक्कर खा वहीं उसके बराबर में ढह गई। पसीने से तरबतर बदन से चिपकी साड़ी का पल्लू कन्धों से लरज, दूसरी औरत की ओढ़नी की तरह जमीन पर बिछ गया। वह बेखबर उठँगी पड़ी रही। उस औरत ने करुण वात्सल्य से भीगी दृष्टि उस पर डाली पर अपनी जगह से हिली नहीं; सहारा दे उसे उठाया नहीं।
सिर हाथों में थाम, उसने खुद को सम्भाला और अपनी उसी झुकी, दुखी, जीवन से हताश, मुक्ति की तलाश में दिग्भ्रमित मुद्रा में बैठ गई। निगाह बरबस ऊपर उठी तो दूसरी औरत की स्निग्ध नजर से जा टकराई।
नजर के साथ चेहरा आँखों की राह जेहन में पहुँचा तो हाहाकार करते दिल ने समझा, वह नितान्त अजनबी औरत थी। निश्चल रह कर भी, अपनी साँसों के स्पंदन से उस निष्कम्प सन्नाटे को आबाद कर रही थी। खुली बादामी आँखों, उसी मंजर को ताक रही थी, जिसे सपना जान, मोहपाश में बँधी, वह फिर-फिर देखने की पगलाई ख्वाहिश लिए, चली आई थी। उनकी साझा नजरों के सामने हर तरफ कमलनी ही कमलनी थी।
दोनों पास-पास मौन बैठी, एक दिशा में ताक रही थीं। पहली औरत अपने से बेखबर थी और दूसरी से भी; पर दूसरी, पहली से पूरी तरह खबरदार थी। स्नेहिल, ममता में रची-पगी दृष्टि, जब-तब उस पर डाल, वापस कमलनी के घटाटोप की तरफ़ मोड़ लेती।
कितना वक्त गुजराः कुछ पल, चन्द लम्हे, एक घन्टा, एक पहर; कौन हिसाब रखता। बेखयाली में गुम पहली औरत भला क्या कयास लगाती, कितने बरस बीते वहाँ? लगा, रेत की मानिन्द हाथों से फिसली पूरी जिन्दगी बीत ली। याद आया, यहाँ साँप के एक जोड़े ने बसेरा किया था। केंचुल छोड़ एक दिन सरक लिए। फिर नहीं लौटे। मोर-मोरनी भी भटक आए थे एक बार, जब बरसात से पहले, कुछ पेड़ उम्मीद बन उगे थे। वे भी चले गए न लौटने के लिए। वही बार-बार लौट आती है यहाँ। कब हुआ था वह सब? क्या पिछले साल ही? अब कहाँ थे वे? यहीं कहीं थे आस-पास या गये? सब गए; सब के सब?
दूसरी बेखबर नहीं थी। आश्वस्त थी कि दिन ढलने में अभी वक्त था। साँझ उतरने पर, जब कमलनी पँखुड़ियाँ समेटना शुरू करेगी, तभी घर पलट पाएगी, सोच कर ही वीराने में पाँव रखा था। उसे पता था, छोरे की माँ छोरे की पुन्न तिथि पर साँझ घिरने पर ही वहाँ से पलटती थी। कमलनी कल फिर खिलेगी; सूरज उगने के साथ। पर पारवती अपने शिव को साथ ले जो गई सो गई। दो बरस बाद ये सौगात भेजी माँ के लिए; ढेरोढेर कमलनी के फूल। यहीं से पानी ले जाती थीं गाँव भर की औरतें। इस बरस हर जबान पर यही नाम था; जहाँ कमलनी खिलती है।
बरसात बाद के अगहन महीने की दुपहरी का तेज ताप, जिसमें हरिण भी काले पड़ जाते हैं, मद्धिम पड़ना शुरू हुआ तो दमकती-चमकती कमलनी, स्त्री की आर्द्र दृष्टि की तरह सौम्य दीखने लगीं। उसने अचकचा कर ऊपर आसमान की तरफ देखा; हाँ, सूरज चलाचली की ओर बढ़ रहा था। उसने ओढ़नी सिर से खींच, पूरा बदन ढका और असमंजस भरी निगाह से पास बैठी औरत को निहारा। निहोरा अब भी था उसमें पर हल्की दुविधा का भास लिए।
थिर मूरत में हरकत हुई तो पहली औरत मायाजाल से निकल ठोस जमीन पर आ गिरी। पर कमलनी... वे तो अब भी खिली थीं। कुछ सिमटी-सकुचाई जरूर थीं, नई दुल्हिन की तरह। पर थीं सब की सब वहीं; मगन मन पानी के ऊपर तैरती। नहीं, मायावी नहीं था वह लोक जिसमें विचर, वह अभी-अभी लौटी थी। कमलनी थीं, वाकई थीं।
बेध्यानी टूटी तो जो पहले नहीं सूझा था, अब सोच बैठी। कौन थी वह औरत; यहाँ क्यों बैठी थी? हैंड पम्प से पानी लेने आई होगी। इस खारे इलाके का पानी भी खारा था; कुओं का ही नहीं, गहरे खुदे नल कूप का भी। वह खुदवा कर देख चुकी थी। मीठा पानी सिर्फ सरकार की कृपा से मिलता था। उसकी जमीन पर था मीठे पानी का एक हैंड पम्प। उसी ने कह-सुन कर लगवाया था। सुबह सकारे गाँव की औरतें उससे पानी भरने आती थीं। पर इतनी देर रुक-ठहर कोई बैठती न थी। भागती-दौड़ती आईं, पानी भरते-भरते आपस में दो बोल बोले और चल दीं। कभी वह नजर आ गई तो शर्मीली-सी दुआ-सलाम उससे भी कर ली,बस।
उठने-उठने को होती दूसरी औरत बैठी थी अब तक। पर उसके बदन की कसमसाहट पहली को उठने पर आमादा कर रही थी। क्या वे किसी काम के सिलसिले में आपस में टकराई थीं? याद आया, एक बार, एक स्वयंसेवी संस्था से दो औरतें यहाँ आई थीं; गाँव की औरतों को क्या-कुछ बतलाने। बड़ी मुश्किल से औरतों को इकट्ठा किया था पर बात आगे बढ़ी न थी। कैसे बढ़ती? औरतें चाहती थीं रोजगार और वे देती थीं, मात्र सलाह। तो... उसने क्या किया? कुछ नहीं। सोचा भी नहीं कि कुछ कर सकती थी।
फिर एक बार... अरे पिछले बरस ही तो, धान की थोड़ी-सी फसल भी हुई थी इस जमीन पर; कुछ औरतें काट ले गई थीं। उनमें रही होगी यह भी। पर... आज... एक बरस बाद... इतनी देर से यहाँ क्यों बैठी है? कौन है यह, क्यों है?
कौन हो सकती है? गरीब घर की किसान औरत, और क्या। पर... आँखों से झरती कण-कण अनुकम्पा; सीधी-तनी-कृश देह से तरंगित वत्सल राग? पेबन्द लगी फिड्डी पोशाक में दिपदिप करती देवी-सी आकृति... उसकी बहू... नहीं पार्वती है यह साक्षात! वही... वही... और कोई नहीं...
कुछ पल गुजरे...एक पहर और बीता...
सूरज अवसान की तरफ़ बढ़ा, कमलनी सकुचाईं, मायाजाल तिड़कता चला गया। इतना कि तमाम संकोच-झिझक के बावजूद, सपनलोक से बेवफाई कर, वहजमीनी सवाल कर बैठी।
"कुछ चाहिए?"
"ना,"
उसने कहा," सोचा, इकली कैसे बैठोगी।"

3 March 2013

अकथ के महासागर से जन्म लेती है कविता : के सच्चिदानंदन


मलयालम  के प्रसिद्ध कवि-आलोचक के सच्चिदानंदन को मलयालम भाषा के लिए 2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया है. 18-19 फरवरी को सच्चिदानंदन दिल्ली में थे. मौका था साहित्य अकादमी पुरस्कार ग्रहण करने का. पुरस्कार ग्रहण करने के बाद दिये गये अपने वक्तव्य में सच्चिदानंदन ने मलयालम कविता के साथ ही खुद की कविता के बारे में भी महत्वपूर्ण बातें कहीं. अकादमी पुरस्कार वक्तव्य के अनुवाद का पहला भाग ...




दूसरों की कविता पर बात करना  हमेशा अपनी कविता पर बात करने की तुलना में आसान होता है. मैं यह नहीं बता सकता कि मेरे पास कविता कहां से आयी. इसका स्रोत क्या था. मेरे घर में पहले शायद ही कोई कवि था. जब भी मैं इस बारे में सोचता हूं, मुझे केरल के अपने गांव में लगातार होनेवाली झमाझम बारिश की आवाज सुनाई देती है. मुझे अपने स्कूल के दिनो में पढ़ी मलयाली रामायण की वे दीप्तिमान पंक्तियां याद आाती हैं, जिसमें कवि शब्दों की देवी से प्रार्थना करता है कि उसके दिमाग में सही शब्द बिना किसी ठहराव के अंतहीन समुद्री लहरों की तरह तैरते हुए चलते आयें. मेरी मां ने मुझे बिल्लियों, कौवों और पेड़ों से बात करना सिखाया. मेरे धर्मनिष्ठ पिता से मैंने ईश्वर और आत्माओं से संवाद करना सीखा. मेरी चेतना खो चुकी दादी ने मुझे इस कभी न खत्म होनेवाली रोज की दुनिया की नीरसता से बचने के लिए अपनी एक समानांतर दुनिया रचना सिखाया. मृतकों ने मुझे सिखाया कि मैं माटी के लोगों में से ही एक रहूं. हवाओं ने मुझे चलना और कांपना सिखाया कुछ इस तरह कि यह नजर में न आये. वर्षा ने मेरे स्वर को हजारों आरोह-अवरोह सिखाए. ऐसे शिक्षकों के बीच रहते हुए यह असंभव था कि मैं कवि जैसा कुछ नहीं बनता. 

मैंने अपनी कविता को 1960 के दशक मे गंभीरता से लेना शुरू किया, जब मलयाली कविता थीम, मूड और रूप के स्तर पर क्रांतिकारी बदलावों के दौर से गुजर रही थी. उस वक्त का नया कवि जो स्वच्छंदतावाद (रोमांटिसिज्म) के अतिचार और प्रगतिवादियों के उथलेपन से थक सा गया था, एक नया और अलग काव्य मुहावरा गढ़ने की कोशिश कर रहा था. एक ऐसा मुहावरा जो समकालीन जीवन की जटिलताओं को कैद करने में समर्थ हो सके. इन कवियों ने अपनी ट्रेनिंग तीन स्रोतों से हासिल की थी. विशिष्ट रूप से- मलयालम कविता की मौखिक और लिखित परंपरा से. व्यापक स्तर पर- क्लासिकल और भारतीय कविता की आधुनिक परंपरा से. और आधुनिक यूरोपीय कविता के आवां गार्द परंपरा से. नयी लय, नये उपमान, नये बिंब, नये शब्द समूह, भावनाओं और विचारों की नयी संरचनाएं, विभिन्न संस्कृतियों के आदिरूपों, मिथकों और दंतकथाओं के क्रांतिकारी तरीके से इस्तेमाल ने मिल कर मेरी भाषा में कविता के पूरे परिदृश्य को ही बदल कर रख दिया. कुछ उसी तरह जैसा दूसरी कई भाषाओं में हो रहा था. इस बदलाव का मेरे अंदर के कवि पर गहरा प्रभाव पड़ा और उसे नयी दिशा और आयाम दे गया. हमलोग केरल कविता(पत्रिका) के पीछे लामबंद हो गये. जिसका हर त्रैमासिक अंक कविता पर बहसों, वाचनों और प्रस्तुतियों का एक मौका बना जाया करता था. केरल में आधुनिक भावबोध पर आधारित एक नया समूह विकसित हो रहा था. इस वर्ग में लेखकों के अलावा आधुनिक चित्रकार, मूर्तिकार, फिल्म निर्माता और नाट्य लेखक शामिल थे. मेरी कविताओं का पहला संग्रह ‘अंचुसूर्यन’(पांच सूर्य)1971 में प्रकाशित हुआ और आधुनिक कविता पर एक ‘कुरुक्षेत्रम’ नाम की किताब एक साल पहले. इसके बाद लगभग हर दो साल के हिसाब से 20 संग्रह आये. 2006 में सारी कविताएं 500-500 पन्ने की तीन जिल्दों में संकलित हो कर आयीं. मैंने कभी आलोचक बनने के बारे में नहीं सोचा था, लेकिन उस समय काफी कम लोग थे, जो आधुनिक भावबोध की व्याख्या कर सकते थे. इसलिए मजबूरीवश मुझे यह जिम्मेदारी निभानी पड़ी. इस क्रम में मैंने नयी कविता, नयी कहानी, आधुनिक चित्रकला पर लेख या किताबें लिखीं. उत्तर-संरचनावाद में मेरे शोध और आलोचना के क्षेत्र में मेरी कोशिशों ने मेरी कविता को शायद ही कोई मदद की हो, लेकिन निश्चित तौर पर रचनात्मक लेखन की जटिल भाषायी प्रक्रिया और हर लेखन की अज्ञात और बहुस्वरी प्रकृति को समझने में इसने मेरी मदद जरूर की. इसने मुझे अपने लेखन को लेकर कम आग्रही(पजेसिव) बनाया.

1970 के दशक के उत्तरार्द्ध में एक नयी राजनीतिक चेतना ने आधुनिक कविता में नया प्राण भरने का काम किया. अब यह व्यापक सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक स्थितियों से जिरह करने और यथास्थितिवाद की जांच करने को तैयार थी. नयी कविता को इतिहास की आंखें मिल गयीं.  इसे कुछ हद तक नये वामपंथी आंदोलन जिसने केरल और देश के कई दूसरे राज्यों में नौजवानों को अपनी ओर आकर्षित किया था और कुछ हद तक सर्वदेशीय स्तर पर कामगारों, किसानों, दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के जागरण से इसे शक्ति ऊर्जा मिली. आज मैं यह भली-भांति देख सकता हूं कि नये वामपंथी आंदोलन में कुछ गंभीर समस्याएं थीं, लेकिन इसने निश्चित तौर पर व्यापक रचनात्मक ऊर्जा को जन्म दिया, जिसने हमारी कविता, कहानी-उपन्यास, थियेटर और सिनेमा को बदल कर रख दिया. आधुनितकतावादियों की बिरादरी नये सिरे से संगठित हुई.  कुछ लेखकों का पूरी तरह से रूपांतरण हो गया, जिसने यीट्स के शब्दों में कहें तो भयावह सुंदरता (टेरिबल ब्यूटी) को जन्म दिया. कुछ में यह बदलाव सीमित स्तर पर हुआ. ये इस नयी राजनीति के प्रति सहानुभूति रखते थे. हम  सभी "जनकीय  संस्कारिका वेदी"(द फोरम फार पीपुल्स कल्चर) से जुड़े थे. इसके जर्नलों और कार्यक्रमों में आवां गार्द कला और साहित्यिक रूपों को प्रोत्साहित करने की कोशिश की गयी. लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी कवियों के साथ ही यूरोप के सामाजिक संघर्ष के कवियों के अनुवादों ने (जिनमें से ज्यादातर मैंने किये थे)  आधुनिकतावादी कविता का वैकल्पिक माडल सामने रखा. विश्वविद्यालयों के परिसर कविता पाठों और नाटकों से  गुलजार और गुंजायमान हो उठे. यही वह समय था जब मैंने कुछ यूरोपीय नाटकों का एडप्टेशन भी किया. गांधी के आखिरी दिनों पर मेरा नाटक सेकुलर आर्टिस्ट फोरम के अनुरोध पर लिखा गया था, जिसकी स्थापना में मेरा भी सहयोग रहा था. इसमें कई लेखक व कलाकार शामिल थे. उस समय तक मैं भारत भवन भोपाल, साहित्य अकादमी और आइसीसीआर के कविता कार्यक्रमों का निमंत्रित अतिथि हो चुका था. यहां होनेवाले कविता वाचनों और वर्कशापों ने मुझे विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों, खासकर कवियों के साथ ही कई विदेशी कवियों के संपर्क में आने का मौका दिया. 

सत्तर के दशक के आंदोलन का अंत दुखद तरीके से हुआ. कई युवा शहीद हुए. इनमें से कई पुलिस  द्वारा मारे गये थे, कइयों ने मोहभंग होने के कारण आत्महत्या कर ली. मैं इस परिणति से बच पाया तो सिर्फ इस  वजह से कि मैंने राजनीतिक मोर्चों और इनकी कट्टर विचारधाराओं से एक महीन दूरी बना कर रखी थी और पीछे लौटने, अलग-थलग पड़ने और टूटन की इस घड़ी को ईमानदारी के साथ अपनी कविता में अभिव्यक्त कर पाया.  इस अंतराल का इस्तेमाल मैंने अंतरावलोकन और सैद्धांतिक सवालों का जवाब खोजने के लिए किया. इसी सिलसिले में मैंने ‘‘उत्तरम’’  नामक पत्रिका की शुरुआत की. यह वह समय था जब कई बेहद नये सामाजिक आंदोलन उभर कर सामने आ रहे थे.  ये आंदोलन मानवाधिकार, उपभोक्ता आधिकार, पर्यावरण और आदिवासियों के सवाल, दलित और स्त्री मुक्ति के सवालों से जुड़े इन आंदोलनों ने उम्मीद जगायी. मैं केरल में विशिष्ट मुद्दों पर उभर रहे सूक्ष्म आंदोलनों(माइक्रो स्ट्रगल्स) जिसे फूको ने "ट्रांसवर्सल  स्ट्रगल्स" कहा है) की राजनीति को महसूस कर सकता था. इनकी नैतिक चिंताएं 70 के दशक  के आंदोलन से जुड़ी हुई तो थीं, लेकिन इसका राजनीतिक नजरिया अलग था. यह नजरिया उन राजनीतिक दलों के नजरिये से अलग था जो जमीन, जंगल, पानी, हवा, ज्ञान, और संस्कृत को सभी इंसानों की साझी संपत्ति मानते हैं और मानते हैं कि इनका इस्तेमाल लाभ के लिए नहीं किया जान चाहिए. मैं आज भी इस दर्शन में यकीन करता हूँ. 

 कविता महज मिलान करने का खेल नहीं है. इसका उद्भव अकथ के महासागर से होता है. यह वह कहना चाहती है, जो कह नहीं सकती है, बेनाम को नाम देना चाहती है. बेआवाज को आवाज  देना चाहती है.  यह अक्षत धरती को तोड़ने का काम करती है. खाली पन्नों पर अक्षर उकेरती है.  कविता जो सच उजागर करती है, मुमकिन है वह तत्काल उपयोगी न हो. लेकिन धीरे-धीरे यह सामाजिक चेतना का हिस्सा बन जाता है. कविता, गद्य से अलग होती है, तो लय या छंद के कारण नहीं. यह अंतर अंतर्विरोधों को घुलाने की इसकी ताकत में, चीजों का साकार चित्र खींचने, शब्दों और स्मृतियों को जोड़ने की तरीके में छिपा होता है. लय और तुक जरूर एक वातावरण के निर्माण में मदद करते हैं. शब्द-भंडार के परे जो दुनिया है, उसी दुनिया में इसका आकर्षण निहित है. यह स्मृतियों से निर्वासित कर दिये गये शब्दों और अनुभवों को फिर से हासिल करती है. यह हमारी मानवता का अक्षय स्मरणपत्र है. उस कभी न समझे जा सकनेवाले रहस्य का भी, जो हर तर्क को बौना बना देती है और पूर्व निर्धारित परियोजनाओं को औंधे मुंह गिरा देती है. हर सक्षम कवि ने निश्चित रूप से आविर्भाव के उन क्षणों का रोमांच और भय महसूस किया होगा. कम से कम प्रेरणा के सर्वोत्तम क्षणों में. मैंने भी न सिर्फ कुछ ऐसी कविताएं लिखते वक्त, जो मेरे पास इलहाम की तरह आयी थीं, बल्कि महान संगीत को सुनते हुए, महान साहित्यिक रचनाओं को पढ़ते हुए इसका अनुभव किया है. जैसा कि पोलिश कवि तौदेज रौसेविक्ज़ ने कहा था, कवी को अपने शब्द निश्चित के धरातल पर नहीं अनिश्चितता के अतल में रखना चाहिए...आज कला और जीवन के बीच आपसदारी किसी भी कला  के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. ताकि यह हमें पश्चिम के ऐन्थ्रोपोसेंट्रिक(मानव केन्द्रित ) विचारों से मुक्त कर सके. जो प्रकृति के बारे में युद्ध और बलात्कार की भाषा बोलता है जो पृथ्वी और इंसान को नाश की और ले जा रहा है.  
                                               
जारी 

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