30 June 2013

उस उड़ान के निशान अब भी हैं बाकी



‘उड़ान’ की कविता चौधरी को कौन भूल सकता है! यह धारावाहिक कंचन चौधरी भट्टाचार्य के जीवन पर आधारित था. इसे दर्शकों तक लाने और हजारों लड.कियों की प्रेरणा बनाने का श्रेय जाता है कंचन चौधरी की छोटी बहन कविता चौधरी को. कविता सर्फ के विज्ञापन में ललिता जी के तौर भी प्रसिद्ध हुईं. कविता चोधरी को याद करते हुए यह छोटा सा लेख लिखा है युवा पत्रकार प्रीति सिंह परिहार ने आप भी पढ़ सकते हैं...: अखरावट 


व क्त की परतें बीते हुए को ढकती जाती हैं, और इस क्रम में अनगिनत ऐसी चीजें भी भुला दी जाती हैं, जिनका कभी हमारी जिंदगी में गहरा दखल रहा था. लेकिन भुला दिये जाने के इस स्वाभाविक व्यवहार के बीच भी कुछ तो बचा ही रहता है, अपने पूरे प्रभाव के साथ. फिर वह व्यक्ति विशेष हो या टेलीविजन के जरिये हमसे रूबरू होने वाला कोई किरदार या कहानी. वास्तविक जिंदगी की ऐसी ही एक कहानी टीवी के जरिये हम तक पहुंची. धीरे-धीरे इस कहानी को हम अपने आस-पास की दुनिया में नये चेहरों के साथ घटते हुए देखने लगे. जी हां, आपका अंदाजा सही है, यह पुलिस अधिकारी कल्याणी की कहानी है. देश के मध्यम और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की लड.कियों की जिंदगी में आयी यह कहानी उन्हें उड.ने का हुनर भी दे गयी. 

नब्बे के दशक में वाया दूरदर्शन ‘उड.ान’ धारावाहिक घर-घर तक पहुंचा था. खास बात यह थी कि जिन घरों में बाों को टीवी देखने की मनाही होती थी, वहां भी सहजता से इस धारावाहिक को देखने की इजाजत मिल जाती. इसकी प्रमुख पात्र कल्याणी स्कूलों में पढ.नेवाली लड.कियों के लिए आइकॉन बन गयी थी. हर लड.की कल्याणी की तरह पुलिस अधिकारी बनने का सपना देखने लगी थी. ‘उड.ान’ एक तरह से महिला सशक्तीकरण पर आधारित पहला धारावाहिक था. असल में यह कहानी थी कंचन चौधरी भट्टाचार्य की, जिन्हें देश की पहली महिला पुलिस निदेशक बनने का गौरव हासिल हुआ. लेकिन इसे दर्शकों तक लाने और हजारों लड.कियों की प्रेरणा बनाने का श्रेय जाता है- कंचन चौधरी की छोटी बहन कविता चौधरी को. अपनी बड.ी बहन के पुलिस अधिकारी बनने, पुरुषों के दबदबेवाले पुलिस महकमे में बतौर महिला अधिकारी खुद को साबित करने के संघर्ष को धारावाहिक की स्क्रिप्ट में ढालनेवाली कविता ही थीं. उन्होंने न सिर्फ ‘उड.ान’ को शब्दबद्ध किया, इसकी निर्देशक भी वही थीं. ‘उड.ान’ की प्रमुख किरदार कल्याणी की भूमिका को भी कविता ने ही निभाया था. कविता चौधरी ने इस धारावाहिक से अपनी निर्देशकीय ही नहीं, अभिनय प्रतिभा को भी साबित किया था. 

दर्शकों के मन में यह सवाल आज भी बना हुआ है कि इसके बाद वह कभी टीवी के परदे पर अपने इस असर के साथ क्यों नहीं दिखीं. इसका जवाब शायद यह हो कि जिस उद्देश्य के लिए कविता चौधरी ने इस माध्यम को थामा था, उसे एक हद तक छू लिया था. इसलिए खुद को दोहराया नहीं. हालांकि इस धारावाहिक के बाद कविता सर्फ के एक विज्ञापन में ललिता जी के रूप में बहुत लोकप्रिय हुई थीं. डेली सोप की भरमारवाले इस दौर में परदे पर कविता चौधरी भले नहीं हैं, लेकिन उन्होंने इस बीच कुछ फिल्में और धारावाहिक लिखे हैं. सामाजिक सरोकारों से जुडे. विषयों पर वृत्तचित्र बनाये हैं. सतीश कौशिक निर्देशित फिल्म ‘बधाई हो बधाई’और 2008 में आये टीवी सीरियल ‘योर ऑनर’ का लेखन भी उनके नाम दर्ज है. 

इस सबसे इतर वह आज भी सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहती हैं, जिसकी तस्दीक कभी-कभार अखबारों के पत्रों में सिंगल कॉलम की खबरों से ही सही, होती रहती है. इस कहानी की असली नायिका कंचन चौधरी 2007 में सेवानवृत्त हो चुकी हैं. लेकिन उस दौर की वो लड.कियां जिनके लिए यह धारावाहिक प्रेरणा बना, अपनी बेटियों को इस धारावाहिक के दृश्यों से जोड. सकती हैं. इसके 32 ऐपिसोड डीवीडी के रूप में आ गये हैं. क्या पता उनकी प्रेरणा का कोई कतरा उनके बेटी के की आंखों में एक और ‘उड.ान’ बन कर तैर जाये. 

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