16 April 2013

हीरो को टक्कर देनेवाला खलनायक : प्राण

प्राण को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की घोषणा शायद इस वजह से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी यह पुरस्कार परदे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले एक अभिनेता को मिला है. प्राण सिनेमा के परदे पर खलनायकी के पर्याय हैं. नायकों की पूजा करने वाले हमारे समाज में प्राण को सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान मिलना भारतीय सिनेमा के वयस्क होने का एक प्रमाण कहा जा सकता है. हालांकि सच यह भी है की यह वयस्कता इसके सौवें साल में आयी है, और अभी भी इसे एक ट्रेंड मानने का कोई ठोस कारण नहीं है. प्राण को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने पर सोमवार को यह लेख प्रभात खबर के लिए विनोद अनुपम ने लिखा. आप भी पढ़िए. : अखरावट 

93 वर्ष की उम्र में प्राण के लिए हिन्दी सिनेमा के सबसे बडे सम्मान दादा साहब फाल्के सम्मान की घोषणा हुई। वाकई प्राण जैसे अभिनेता को यह सम्मान काफी पहले मिल जाना चाहिए था। लेकिन सवाल है पहले किन्हें नहीं मिलना चाहिए था, देवानंद को, यश चोपडा को, मन्ना डे, मजरुह सुल्तानपुरी को...प्राण से भी पूछा जाता तो इनमें से किसी नाम की जगह पर अपने नाम पर शायद ही वे सहमत होते। प्राण के लिए अभिनय एक कला थी,जिसके प्रति समर्पण का प्रतिसाद उन्हें उनके दर्शकों से मिलता था, पुरस्कार की न तो उन्हे इच्छा थी, न ही अपेक्षा।आश्चर्य नहीं कि आजादी के ठीक पहले भारत आ जाने वाले प्राण को अपना पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिलने में 20 वर्ष बीत गए। लेकिन दर्शकों की तालियों ने कभी प्राण के चेहरे पर शिकन नहीं आने दी। अपने 70 साल से भी लम्बे सिनेमाई जीवन में उन्हें शायद ही कभी असंतोष व्यक्त करते देखा गया। भारतीय सिनेमा के 100 वें वर्ष में वास्तव में यह सम्मान भाईचारे, समर्पण और अभिनय की उस परंपरा को याद दिलाने की कोशिश है जिसके प्रतीक पुरुष के रुप में प्राण माने जाते हैं। आज जबहिन्दी सिनेमा के नायक वास्तविक जीवन में खलनायक बनने को उतावले दिख रहे हों, ऐसे में यह जानना वाकई सुखद लगता है कि प्राण ऐसे विरले कलाकारों में थे जो सेट पर महिला कलाकारों को खड़े होकर रिसिव किया करते थे, चाहे वह कोई नवोदित अदाकारा ही क्यों न हो। परदे पर क्रूरता के पर्याय बने प्राण की पहचान उनकी सौम्यता थी, जो अब 93बर्ष के बुजुर्ग के चेहरे पर और भी मुखर हो गई लगती है। लेकिन यह प्राण के अभिनय का प्रभाव ही है कि तस्वीरों में दिखते उस सौम्य बुजुर्ग को देखते हुए भी याद ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के दो घोड़े पर एक साथ सवार डाकू राका की ही आती है। याद उस खलनायक की आती है, जिसने न जाने कितने बलात्कार, कितने षडयंत्रों, कितनी हत्याओं को पूरी तन्मयता से परदे पर साकार किया।
                यह शायद संयोग नहीं कि प्राण ने अपने अभिनय की शुरूआत महिला कलाकार के रूप में ही की थी। शिमला की रामलीलाओं में मदन पुरी राम की भूमिका निभाया करते थे,जबकि सीता की भूमिका लंबे समय तक प्राण निभाते रहे। प्राण की विलक्ष्ण अभिनय क्षमता ही थी कि एक सौम्य छवि को क्रूर खलनायक के रूप में उन्होंने दर्शकों को स्वीकार करवा दिया। प्राण की अभिनय यात्रा का आरंभ छोटी छोटी नकारात्मक भूमिकाओं से हुआ।1940 में पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ में प्राण को एक अहम् नकारात्मक किरदार मिला,  फिल्म सफल हुई और उसके साथ प्राण की गणना भी सफल अभिनेताओं में होने लगी। जल्दी ही वे लौहार फिल्म उद्योग में एक खलनायक की छवि बनाने में कामयाब हो गए, इनकी लोकप्रियता ने उसी समय निर्माताओं को हिम्मत दी, और 1942 में लाहौर की पंचोली आर्ट प्रोडक्शन के ‘खानदान’ में इन्हें उस समय की महत्वपूर्ण अदाकारा नूरजहां के साथ नायक बनने का अवसर दिया गया।लेकिन खलनायक के अभिनय की विविधता के सामने,नायक के चरित्र की एकरसता प्राण को रास नहीं आयी। बटवारे से पहले प्राण तकरीबन २२ फिल्मो में खलनायक की भूमिका निभा कर लाहौर में स्थापित हो गये थे। आजादी के बाद प्राण ने लाहोर छोड़ दिया और मुंबई आ गए, हालांकि पाकिस्तान में नायक के रूप में उनकी ‘शाही लुटेरा’ जैसी फिल्में आजादी के बाद तक दिखायी जाती रही, और भारत आने के बावजूद पाकिस्तान के लोकप्रिय अभिनेताओं में वे शुमार किये जाते रहे।

                प्राण स्टाइल ऐक्टर थे, लेकिन फर्क यह था कि जहां अधिकांश अभिनेता अपने स्टाइल को अपना ब्रांड बनाकर जिंदगी भर दुहराते रहे, प्राण हरेक फिल्म में अपने एक नये स्टाइल के साथ आए। कभी कभी स्टाइल के लिए उन्होंने सिगरेट, रूमाल, छड़ी जैसी प्रापर्टी का भी सहारा लिया, लेकिन अधिकांश फिल्मों में स्टाइल उनकी आंखों, होठों और चेहरे के भाव से बदलते रहे। हां, प्राण शायद ऐसे पहले अभिनेता थे जिन्होंने आवाज और मोडूलेशन बदलकर पात्र को एक नई पहचान दी, बाद में जिसका इस्तेमाल अमिताभ बच्चन ने‘अग्निपथ’ में, शाहरूख खान ने ‘वीरजारा’ में और बोमन ईरानी ने ‘वेलडन अब्बा’ में किया। प्राण अपने अभिनय के बारे में कहते भी थे, मैं पात्र में नहीं उतरता पात्र को अपने अंदर उतार लेता हूं।आज के मेथड एक्टिंग में उनका यकीन नहीं था। यह प्राण की ही खासियत थी कि अपने मैनेरिज्म के साथ भी वे दर्शकों को एक ओर ‘उपकार’ के मंगल चाचा दूसरी ओर ‘विक्टोरिया नं.203’ के राणा के रुप में भी स्वाकार्य हो सकते थे। आश्चर्य नहीं कि हिंदी सिनेमा  में पचास और साठ का दशक त्रिदेव ( दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद ) के लिये भले ही याद किया जाता हो, लेकिन जो उन्हें एक कडी से जोडती थी वे प्राण थे, फिल्म चाहे दिलीप कुमार की हो, या राज कपूर की, या फिर देवानंद की, अधिकांश फिल्मों में खलनायक के रुप में प्राण की उपस्थिती तय मानी जाती थी। दिलीप कुमार के साथ‘आजाद’, ‘मधुमती’, ‘देवदास’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘राम और श्याम’ और ‘आदमी’ में महत्वपूर्ण किरदार रहे तो  देव आनंद के साथ ‘जिद्दी’, ‘मुनीमजी’, ’अमरदीप’  जैसी फिल्मे पसंद की गई। राज कपूर के साथ ‘आह’, ‘चोरी  चोरी’ , ‘छलिया’ , ‘जिस  देश  में  गंगा बहती  है’ , ‘दिल  ही  तो है’ जैसी फिल्मों में जो जोडी बनी वह ‘बाबी’ तक कायम रही।

                      प्राण ने 60 साल से भी ज़्यादा समय तक चले अपने करियर के दौरान 400 से भी अधिक फिल्मों में काम किया। प्राण के लिए फर्क नहीं पडता फिल्म कैसी बन रही है, कौन बना रहा है, साथी कलाकारों की क्या भूमिका है, वे अपना श्रेष्ठ देते रहे। चाहे फिल्म कैसी भी बनी हो, यह याद करना मुश्किल होता है कि दर्शकों की कसौटी पर प्राण खरे न उतरे हों। मनमोहन देसाई की बडी फिल्मों की बडी भूमिका में भी वे उतने ही सशक्त दिखते थे,जितना ‘जंगल में मंगल’ जैसी छोटी फिल्म में किरण कुमार के साथ काम करते हुए।प्राण ने कभी अपने को किसी खास समूह का हिस्सा नहीं बनने नहीं दिया। उनके लिए सिनेमा महत्वपूर्ण रहा, और सिनेमा में अपनी भूमिका। 1967 में मनोज कुमार ने ‘उपकार’के साथ उन्हें एक नई पहचान दी। सहृदय मलंग चाचा के किरदार को प्राण ने वह ताकत दी कि हिन्दी सिनेमा में चरित्र भूमिकाओं को नायकों के समानान्तर स्थान दिया जाने लगा। यहां तक कि चरित्र भूमिकाओं को केन्द्र में रख कर फिल्में लिखी जाने लगीं। कह सकते हैं अमिताभ बच्चन प्रौढ भूमिकाओं में आज अपना श्रेष्ठ देते दिख रहे हैं तो उसकी जमीन तैयार करने का श्रेय प्राण को ही जाता है।

              2001 में प्राण को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। वास्तव में यह उस कलाकार का सम्मान था जो अपने अभिनय की स्वयं मिसाल था। अभिनय की यह तरलता शायद उन्हें उस विरासत से मिली थी जिसे प्राण ने आज भी संजोये रखा है। कहते हैं शराब के साथ जब लोग होश खो बैठते हैं, प्राण साहब पूरी गालिब सुना दे सकते हैं। फैज भी मानते थे कि उनके अलावा किसी और को फैज याद है, तो वे प्राण हैं। मीर तकी मीर, नजीर अकबराबादी, अली सरदार जाफरी, कैफी आजमी... प्राण की जिंदगी के सुर शायद यहीं से तय होते थे।

                शायद इसीलिए ‘उपकार’ के मलंग बाबा हों या ‘विक्टोरिया नं. 203’ का मस्त मौला चोर, ‘कालिया’ का जेलर हो या ‘जंजीर’ का खान, जिंदगी के जो भी रंग दिखाने के अवसर प्राण को मिले पूरी तन्मयता से उसे परदे पर साकार किया उसने। राजकपूर, दिलीप कुमार,देव आनंद से लेकर राजेन्द्र कुमार, मनोज कुमार, धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना, नवीन निश्चल अभिनेताओं की पीढि़या-दर-पीढि़या गुजरती रहीं, लेकिन जब तक शारीरिक रूप से सक्षम रहे,प्राण के लिए हिन्दी सिनेमा में भूमिका निकाली जाती रही। वे ऐसे पहले चरित्र अभिनेता थे,जिनपर गाना फिल्माया जाना फिल्म के लिए भाग्यशाली माना जाता था। भाग्यशाली हो या न हो, यह तो जरूर है कि प्राण की जीवंतता उस गाने को अमर कर देने का सामर्थय रखती थी। कौन भूल सकता है, ‘कस्में वादे प्यार वफा सब बाते हैं बातों का क्या....’ या फिर ‘यारी है इमान मेरा, यार मेरी जिंदगी...। ‘प्राण’ का होना हिन्दी सिनेमा में प्राण का होना है, हड़बड़ी में हिट तलाशते और सफलता के लिए अभिनय से दीगर चीजों को तरजीह देने की कोशिश में लगे अभिनेताओं को एक बार अवश्य मुड़कर प्राण की ओर देख लेना चाहिए, यदि वे अच्छे अभिनेता के साथ अच्छे व्यक्ति भी बनना चाहते हैं।

विनोद अनुपम : लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं.

11 April 2013

फरमाइश की है झुमरी तिलैया से.....

"झुमरी तिलैया" नाम सुनकर हम बचपन में खिलखिला कर हंस दिया करते थे. हम में से कई लोगों के लिए झुमरी तिलैया बस एक काल्पनिक जगह थी, जहाँ के लोग फ़िल्मी गानों के बेहद शौक़ीन थे.  वे दिन भर चिट्ठियाँ लिखा करते थे...अपनी फरमाइशों की फेहरिस्त बनाया करते थे...उन्हें जूनून की हद तक शायद रेडिओ पर अपना नाम और उससे भी बढ़कर अपने शहर का नाम सुनने का चस्का लगा था... जब धीरे धीरे देश से वह पुराना रेडियो गायब हुआ, तब उसके साथ ही झुमरी तिलैया भी कही खो गया. उसके साथ ही खो गयी चेहरों पर खिलने वाली वह तन्दुरित मुस्कान....इस झुमरी तिलैया पर जो हकीकत की जमीन से ज्यादा हमारी कल्पनाओं में बसा करता था...एक रिपोर्ट लिखी है  अनुपमा ने... आप भी पढ़े...: अखरावट 
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देश  के लाखों रेडियो श्रोताओं की याद में बसा झारखंड का झुमरी तिलैया धीरे-धीरे अपनी पहचान बदल रहा है, लेकिन उसकी नई पहचान में भी सिनेमा और स्वाद का रस घुला हुआ है...... 

अगर आपने जीवन के किसी भी दौर में रेडियो पर फरमाइशी फिल्मी गीतों का कार्यक्रम सुना हो तो यह संभव नहीं है कि आप झुमरीतिलैया के नाम से अपरिचित हों. बात जब झुमरीतिलैया की हो तो वाकई यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि किस किस्से को तवज्जो दी जाए, बातचीत का कौन-सा सिरा थामा जाए. है तो यह एक छोटा-सा कस्बा लेकिन यहां गली-गली में ऐसी दास्तानें बिखरी हैं जो आपकी यादों से वाबस्ता होंगी.
झारखंड के कोडरमा जिले में स्थित यह शहर फरमाइशी गीतों के कद्रदानों का शहर तो है ही लेकिन आप यहां आएंगे तो एक और फरमाइश आपसे की जाएगी- यहां बनने वाले कलाकंद को चखने की. यहां बनने वाला कलाकंद हर रोज देश के कोने-कोने में जाता है और दुनिया के उन मुल्कों में भी जहां इस इलाके के लोग रहते हैं.

इस बीच सड़क किनारे दीवारों से झांकते पोस्टर एक दूसरी कहानी भी बता रहे होते हैं. यह झुमरीतिलैया की नई पहचान है. कुछ युवाओं द्वारा जिद और जुनून में बनाई गई ‘झुमरीतिलैया’ नाम की फिल्म ने भी शहर को नई पहचान देने की कोशिश की है. इन्हीं बातों के बीच तिलैया डैम के पास हमें ब्रजकिशोर बाबू मिलते हैं, जो कहते हैं, 'देखिए, यह सब पहचान बाद की है, इसकी असली पहचान तो अभ्रक को लेकर रही है. 1890 के आस-पास जब रेल लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ तो पता चला कि यहां तो अभ्रक की भरमार है. फिर क्या था अंग्रेजों की नजर पड़ी, वे खुदाई करने में लग गए. बाद में छोटूराम भदानी और होरिलराम भदानी आए. उन्होंने मिलकर सीएच कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनाई और माइका किंग नाम से मशहूर हो गए.’ ब्रजकिशोर बाबू कहते हैं कि शहर में 1960 में ही मर्सिडीज और पोर्सके कार देखी जा सकती थीं.

इस छोटे-से कस्बे में ऐसी अनेक दास्तानें बिखरी हुई हैं. वहां से हम सीधे गंगा प्रसाद मगधिया के घर पहुंचते हैं जो अपने जमाने में रेडियो पर फरमाइशी गीतों के चर्चित श्रोता थे. रेडियो सिलोन से लेकर विविध भारती तक फरमाइशी फिल्मों का कार्यक्रम हो और मगधिया का नाम न आए, ऐसा कम ही होता था. शहर के बीचो-बीच स्थित दुकान के पीछे बने मकान में उनकी पत्नी मालती देवी, भाई किशोर मगधिया और बेटे अंजनि मगधिया से मुलाकात होती है. घर में दाखिल होने पर पता चल जाता है कि हम ऐसी जगह पर हैं जहां कभी सिर्फ और सिर्फ गीत-संगीत और रेडियो की खुमारी रही होगी. कुछ पुराने रेडियो छज्जे पर रखे रहते हैं कपड़े के गट्ठर में पुराने कागजों के कुछ बंडल पड़े होते हैं. अंजनि मगधिया उन्हें खोलते हुए कहते हैं, ‘इसे ही देख लीजिए, कुछ नहीं बताना पड़ेगा हम लोगो को.

पिताजी के मन में रेडियो फरमाइश, गीत-संगीत की दीवानगी की कहानी इसी बंडल में है.’ बंडल खुलता है, सबसे पहले एक पैड नजर आता है- बारूद रेडियो श्रोता संघ, झुमरीतिलैया. पोस्टकार्ड हैं जो बाकायदा प्रिंट कराए गए हैं. कोई गंगा प्रसाद मगधिया के नाम से है तो किसी में उनके साथ पत्नी मालती देवी का नाम भी है. कुछ पोस्टकार्ड बारूद रेडियो श्रोता संघ के नाम वाले हैं. स्व. गंगा प्रसाद मगधिया की पत्नी मालती देवी कहती हैं, ‘मुझे तो इतना गुस्सा आता था उन पर कि क्या बताऊं. दिन भर बैठकर यही करते रहते थे. कहने पर कहते थे- सुनना, तुम्हारा भी नाम आएगा. मैं झल्लाकर कहती कि रेडियो से नाम आने पर क्या होगा तो वे हंस कर कहते- माना कि फरमाइश बचपना बर्बाद करती है, मगर ये क्या कम है कि दुनिया याद करती है. 

उनके भाई किशोर कहते हैं कि उस जमाने में विदेश में एक बार फरमाइश भेजने में 14 रुपये तक का खर्च आता था लेकिन यह रोजाना होता था. हमारे मन में सवाल उठता है कि आखिर उस जमाने में यानी 60 से 80 के दशक के बीच इतना खर्च कर रेडियो पर फरमाइशी गीत सुनने का यह जुनून क्यों. जवाब मिलता है- एक तो इस छोटे-से कस्बेनुमा शहर को ख्याति दिलाने की होड़, दूसरा इस छोटे-से शहर के लोगों का नाम रेडियो सिलोन, रेडियो इंडोनेशिया, रेडियो अफगानिस्तान, विविध भारती वगैरह में रोजाना सुनाई पड़ता था. एक तो इसे लेकर उत्साह और रोमांच रहता था और दूसरा अधिक से अधिक बार नाम प्रसारित करवाने की एक होड़ भी थी, जिसमें कई गुट एक-दूसरे से मुकाबला करने में लगे रहते थे.

हम रेडियो और फरमाइशी गीतों के दूसरे दीवानों के बारे में जानना चाहते हैं. बताया जाता है कि रामेश्वर वर्णवाल भी फरमाइशी गीतों के बेमिसाल श्रोता और फरमाइश भेजने वालों के बेताज बादशाह थे. कवि और फिल्म समीक्षक विष्णु खरे ने कभी लिखा था कि अमीन सयानी को मशहूर कराने में झुमरीतिलैया वाले रामेश्वर वर्णवाल का बड़ा योगदान रहा है. मगधिया और वर्णवाल के अलावा झुमरीतिलैया से फरमाइश करने वालों में कुलदीप सिंह आकाश, राजेंद्र प्रसाद, जगन्नाथ साहू, धर्मेंद्र कुमार जैन, लखन साहू, हरेकृष्ण सिंह, राजेश सिंह और अर्जुन सिंह के नाम भी हैं. हरेकृष्ण सिंह तो अपने नाम के साथ अपनी प्रेमिका प्रिया जैन का नाम भी लिखकर भेजा करते थे.

फरमाइशी गीतों की मासूम चाहत में भी षड्यंत्रों और घात-प्रतिघात की गुंजाइश मौजूद थी. कई लोग जहां टेलीग्राम भेजकर भी गीतों की फरमाइश करते थे वहीं ऐसे लोग भी थे जो डाकखाने से सेटिंग करके एक-दूसरे की फरमाइशी चिट्ठियों को गायब भी करवा देते थे ताकि दूसरे का नाम कम आए. बहरहाल, अतीत के इन दिलचस्प किस्सों के साथ हम वर्तमान को जानने की कोशिश करते हैं. फरमाइशी गीतों के कारण पहचान बनाने वाले इस शहर में अब इसके कितने दीवाने बचे हैं? गंगा प्रसाद मगधिया के भाई किशोर मगधिया कहते हैं, ‘हम इसे जिंदा तो रखना चाहते हैं लेकिन केवल एक परंपरा की तरह क्योंकि रोजी-रोटी की चिंता जुनून पर हावी है.’ 

इस बीच शहर की दीवारों पर जगह-जगह ‘झुमरीतिलैया’ फिल्म के पोस्टर नजर आ रहे हैं. हम कोशिश करते हैं शहर की नई फिल्मी पहचान से रूबरू होने की. हम फिल्म के कलाकारों से मिलने उनके घर पहुंचते हैं. एक कमरे में सारे कलाकार जुटते हैं. निर्देशक-अभिनेता अभिषेक द्विवेदी, उनके भाई राहुल, उनके पिता उदय द्विवेदी, मां कांति द्विवेदी, विवेक राणा, उनके मामा गौरव राणा, अभिनेत्री नेहा, नेहा के पापा आदि. इन सबने मिलकर फिल्म प्रोडक्शन कंपनी बनाई एफ ऐंड बी यानी फेंड्स ऐंड ब्रदर्स प्रोडक्शन. फिल्म में अगर तकनीशियन वगैरह का शुल्क जोड़ लिया जाए तो इसमें कम से कम 13 लाख रुपये लगते लेकिन आपसी जुगाड़ के चलते यह महज पांच लाख रुपये में बन गई.

यह फिल्म शहर के सिनेमाहॉल में दस दिन तक चलीं, रांची में एक सप्ताह तक, बुंडू में छह दिन तक. अब होली के बाद दूसरे शहरों में फिर से रिलीज करने की तैयारी है. फिल्म में एक्शन की भरमार है. अभिषेक कहते हैं, ‘हम बचपन से ही मार्शल आर्ट के दीवाने रहे हैं. बहुत दिनों से फिल्म बनाने की सोचते थे. हमने तय किया खुद ही पैसा जुटाएंगे और खुद ही अभिनेता-अभिनेत्री बनेंगे.’ इसके बाद सोनी एफएक्स कैमरे का जुगाड़ हुआ. ग्यारहवीं में पढ़ने वाली नेहा नायिका के रूप में मिल गई.

हीरो के लिए विवेक, राहुल आदि हो गए. पापा की भूमिका के लिए निर्देशक अभिषेक के पापा मिल गए और मां के रोल में उनकी मां. किसी का नाम नहीं बदला गया. किसी को फिल्म का अनुभव पहले से नहीं था, सो बार-बार ब्रूस ली की फिल्म ‘इंटर द ड्रैगन’, ‘टॉम युम वुम’ आदि दिखाई गईं ताकि एक्शन का रियाज हो. इसके बाद घर में और आस-पास के लोकेशन में ‘झुमरीतिलैया’ की शूटिंग भी शुरू हो गई. फिल्म बनाने के दौरान लगा कि एक गाना तो होना ही चाहिए. अब गायक कहां से आए तो अभिषेक ने अपने चाचा को कहा, जो मुकेश के गाने ही गाते हैं. ऐसे ही जुगाड़ तकनीक से झुमरीतिलैया बनकर तैयार हुई और रिलीज हुई तो एक बार फिर गीत-संगीत के शहर का फिल्मी सफर शुरू हुआ.


फिल्म की अभिनेत्री नेहा कहती हैं, ‘मैं पहले सोचती थी कि अभिनय कैसे करूंगी लेकिन दोस्तों के साथ काम का पता ही नहीं चला.’ फिल्म में मां बनी निर्देशक अभिषेक की मां कांति द्विवेदी कहती हैं, ‘बेटों ने मुझसे भी अभिनय करा लिया, अब तो सड़क पर जाती हूं तो कई बार बच्चे कहते हुए मिले- देखो-देखो, झुमरीतिलैया की मां जा रही है.’ एक्शन फिल्मों का नाम झुमरीतिलैया क्यों? इस सवाल के जवाब में निर्देशक अभिषेक कहते हैं कि अपना शहर है झुमरीतिलैया, इसके नाम पर तो इतना भरोसा है कि कुछ भी चल जाएगा.

गीतों के शहर में फिल्मों के जरिए सफर का यह नया अनुभव सुनना दिलचस्प लगता है. यहां से निकलते-निकलते युवा फिल्मकार भी कलाकंद चखने की सिफारिश कर ही देते हैं. वहां से हम कलाकंद के लिए मशहूर आनंद विहार मिष्ठान्न भंडार पहुंचते हैं. दुकान मालिक के बेटे अमित खेतान कहते हैं, ‘झुमरीतिलैया जैसा कलाकंद कहीं और खाने को नहीं मिल सकता.’

खेतान बताते हैं कि कलाकंद की शुरुआत भाटिया मिष्ठान्न भंडार ने की थी लेकिन उसके बंद हो जाने के बाद कलाकंद की सबसे ज्यादा बिक्री उनकी दुकान में ही होती है. इसकी फरमाइश देश के हर हिस्से और कई बार विदेश तक से आती है. पिछले चार दशक से कलाकंद बनाने में ही लगे कारीगर सुखती पात्रो कहते हैं, ‘मैंने बहुत जगह देखा है, कलाकंद आज भले सभी जगह हो लेकिन यह देन तो इसी झुमरीतिलैया की है.’

पता नहीं कलाकंद कहां की देन है लेकिन वाकई झुमरीतिलैया के कलाकंद का स्वाद शायद ही कहीं और मिले. शहर की पहचान अब बदल रही है. कोई कहता है कि यह पावर हब बन रहा है तो कोई और बेशकीमती पत्थरों को इसकी नई पहचान बताता है, लेकिन हमारे हाथों में मगधिया के पोस्टकार्डों का बंडल होता है- पसंदकर्ता गंगा प्रसाद मगधिया, बारूद रेडियो क्लब, झुमरीतिलैया, गीत- दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गया रे, फिल्म गंगा-जमुना....!

मूल रूप से तहलका हिंदी में प्रकाशित 

मूल कॉपी यहाँ पढ़ी जा सकती है

10 April 2013

सूरज न बन पाये तो बनके दीपक जलता चल



बात जब संगीत निर्देशकों की होती है तो हमारे मन में एसडी-आर डी बर्मन, मदन मोहन, ओ पी नैय्यर, कल्याण जी आनद जी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, खैय्याम आदि के नाम तो आते हैं, लेकिन हम अक्सर एक नाम भूल जाते हैं।। य़ह अलग बात है कि आज भी कही जब उनके संगीत से सजे गीत जब हमें सुनने को मिलते हैं, तो हमारे कदम बरबस ठिठक जाते हैं ...हम मधुबन की खुशबू को  तो  ढलती रातों में घुलते महसूस करते हैं लेकिन संगीत का मधुबन बनेवाली हिंदी सिनेमा की इस महिला संगीतकार का नाम याद करने में अक्सर मुश्किल का सामना करते हैं।। कितनों को तो शायद यह नाम मालूम भी नहीं।। यहाँ बात हो रही है हिंदी सिनेमा की पहली स्थापित महिला संगीतकार उषा खन्ना उषा खन्ना कि. उषा खन्ना पर यह छोटा सा लेख लिखा है प्रीति सिंह परिहार ने. आप भी पढ़ें।।  : अखरावट 






जिंदगी प्यार का गीत है, इसे हर दिल को गाना पड़ेगा’ गीत को अपने संगीत से सजाने से बहुत पहले ही उन्होंने गीतों के इर्द-गिर्द अपनी एक दुनिया बनाने का सपना बुन लिया था़.  इस सपने को लेकर वे बड़ी हुईं।  यह सपना साकार भी हुआ पर जरा सी तब्दीली के साथ़। सपने का आधार संगीत ही रहा पर आकार कुछ अलग बना़।  हुआ यूं कि वे आयीं तो गायिका बनने थीं, लेकिन उनमें एक बेहतरीन संगीतकार का हुनर था. उनके असली हुनर की पहचान हुई और पहली ही फिल्म के संगीत से यह पहचान प्रसिद्घि पाने लगी़  अपने संगीत से उन्होंने तीन दशक तक लगभग ढाई सौ फिल्मों के गीतों को अपनी धुनों से सजाया़  आज उनके नाम का जिक्र भले कभी-कभार होता हो, लेकिन हिंदी सिनेमा के संगीतकारों की बात उनके नाम के बिना शुरू नहीं हो सकती़  जी हां, बात हो रही है हैं प्रसिद्घ महिला संगीतकार उषा खन्ना की़।  वही उषा खन्ना जिन्होंने ‘छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी’, ‘मधुबन खुशबू देता है’ जैसे यादगार गीतों की धुन बनायी़।

मध्यप्रदेश के ग्वालियर में जन्मी उषा खन्ना ने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली थी़। पिता मनोहर खन्ना शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता थे और गीत लिखा करते थे़।  पिता के संगीत प्रेम ने उषा को भी संगीत की ओर मोड़ा़ वे पिता के लिखे गानों की धुन बनातीं, फिर उन्हें खुद गाती भी थीं।  अरबी संगीत ने भी उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया़।

अपनी पहली धुन महज सोलह साल की उम्र में बनाने वाली उषा को गायिका बनने की ख्वाहिश फिल्मी दुनिया में लेकर आयी, उन्होंने कुछ गीत गाये भी, लेकिन उनकी पहचान शायद संगीतकार के तौर पर ही होनी थी़।  पचास के दशक में वे जब गायिका के तौर पर मौका पाने के लिए शशिधर मुखर्जी से मिलीं, तो उन्होंने अपनी ही धुनों से सजाये कुछ गीत उन्हें सुनाये़।  उषा खन्ना ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था, उनके गीत सुन कर शशिधर मुखर्जी ने कहा ‘क्या तुम्हें लगता है कि तुम लता और आशा जैसी गायिकाओं से अच्छा गाती हो? ये गीत अगर तुमने बनाये हैं, तो तुम संगीतकार क्यों नहीं बन जातीं? अगले कुछ महीनों तक वे उषा से हर रोज दो गानों की धुन बनवाते़।  अच्छी तरह परखने और उनकी बनायी कई धुनों को सुनने के बाद 1959 उन्होंने ‘दिल दे के देखो’ में उषा को बतौर संगीतकार मौका दिया़।  इस पहली ही फिल्म के गीतों की सफलता ने उनके लिए संगीत की दुनिया का रास्ता तैयार कर दिया़। 1979 में उषा खन्ना के संगीत से सजे ‘दादा’ फिल्म के गीत ‘दिल के टुकड़े-टुकड़े करके मुस्कुरा के चल दिये’ के लिए के यसुदास को फिल्म फेयर अवार्ड मिला़।  उषा खन्ना के कंपोजीशन में मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने क ई प्रसिद्ध गीत गाये़।

‘पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले’, ‘जिंदगी प्यार का गीत है’ और ‘शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है’ जैसे अनगिनत यादगार गीत उषा खन्ना के संगीत के पिटारे से निकले हैं. उन्होंने कुछ मलयालम फिल्मों में भी संगीत दिया जिन्हें खासा पसंद किया गया़ फिल्मकार और गीतकार सावन कुमार ने उनके लिए सबसे अधिक गीत लिखे, जिनमें से ज्यादातर लोकप्रिय हुए़।  2003 में ‘दिल परदेसी हो गया’ फिल्म में संगीत देने के बाद से उनका नाम किसी फिल्म में बतौर संगीतकार नहीं दिखा़।  इस बीच कई धारावाहिकों में उनके संगीत देने की खबरें जरूर आती रहीं.  उषा की धुन से सजा ‘साजन बिना सुहागन’का गीत ‘मधुबन खुशबू देता है’ की खुशबू आज भी संगीतप्रेमियों के मन में कायम है़।  इस गीत के अंतरे में एक पंक्ति है-‘सूरज न बन पाये, तो बनके दीपक जलता चल’.  उषा खन्ना बेशक सूरज की तरह चमकने की काबीलियत रखती हैं, लेकिन उन्होंने दीपक की तरह जलते रहना चुना़  उषा खन्ना के बरक्स एक हद तक यह बात सच भी लगती है़  उन्होंने आज गायिकी में स्थापित कई बड़े नाम मसलन, पंकज उदास, रूप कुमार राठौर और सोनू निगम को पहला मौका दिया था़  लेकिन उगते सूरज को सलाम करने के आज के समय में लाखों श्रोताओं के दिलों में सुकून का दीया जलानेवाली उषा खन्ना का जिक्र कहीं नहीं दिखता.