20 March 2013

भारत पर चे ग्वेरा


क्यूबाई क्रान्ति के ठीक बाद चे ग्वेरा , फिदेल कास्त्रो के दूत के तौर पर भारत आये थे. इस यात्रा के दौरान उन्होंने जवाहर लाल नेहरु से मुलाकात की थी और भारत की दशा, क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष, संघर्ष के गांधीवादी तरीके,  नेहरूवादी विकास, भारत में व्याप्त असमानता आदि विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकट किये थे.  भारत पर उनका लिखा एक संस्मरण कुछ साल पहले अंग्रेजी पत्रिका फ्रंटलाइन छपा था..उसी संस्मरण का एक अंश...




काहिरा से हमने सीधे भारत के लिए उड़ान भरी. 39 करोड़ लोगों का देश, जिसका क्षेत्रफल 30 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है.

भूमि के नाट्य का एहसास यहाँ मिस्र से ज्यादा होता. यहां मिट्टी की उर्वरता रेगिस्तानी मिस्र से कहीं ज्यादा है. लेकिन सामाजिक अन्याय ने भूमि के असमान और मनमाने वितरण को जन्म दिया है. जिसका परिणाम है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों के पास काफी जमीन है, जबकि बहुतों के पास कुछ भी नहीं
.
भारत को ब्रिटेन ने 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत के दौरान अपना उपनिवेश बनाया था. निश्चित तौर पर इस जीत के साथ आजादी बनाये रखने के संघर्ष की कहानी भी जुड़ी हुई है, लेकिन अंगरेजों की सैन्य क्षमता इस मामले में निर्णायक साबित हुई. भारत के फलते-फूलते हस्तकरघा उद्योग को साम्राज्यवादी संरचना के हाथों काफी नुकसान उठाना पड़ा जो भारतीयों की आर्थिक आत्मनिर्भरता को समाप्त करने पर आमादा थे, ताकि उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए साम्राज्य का कर्जदार बनाया जा सके. यह स्थिति पूरी 19वीं शताब्दी के दौरान बनी रही. 20वीं शताब्दी जिसमें हम रह रहे हैं,  यह देश कई विद्रोहों का साक्षी भी बना , जिसमें कई बेगुनाहों की जान गयी.

दुसरे विश्वयुद्ध से बाहर निकलते हुए अंगरेजी साम्राज्य के विखंडन के संकेत काफी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे थे. भारत में रहस्यवादी-आध्यात्मिक व्यक्तित्व वाले(मिस्टिक फिगर)  महात्मा गांधी के नेतृत्व में  चलाये जा रहे निष्क्रिय प्रतिरोध ने आखिर कार वर्षों से कामना की जा रही आजादी के लक्ष्य को हासिल किया. गांधी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने भारत की बागडोर संभाली. नेहरू को एक ऐसे देश का नेतृत्व मिला, जिसकी चेतना अनंत वर्षों के बाहरी वर्चस्व के कारण रुग्ण हो गयी थी, और जिसकी अर्थव्यवस्था को लंदन के मेट्रोपाॅलिटन बाजारों के लिए सस्ते दामों में सामान मुहैया कराने के लिए मजबूर किया गया था. भूमि का पुनर्वितरण किया जाना था और देश को भविष्य की आर्थिक तरक्की के लिए औद्योगिकीकृत किया जाना था. कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने खुद को इस लक्ष्य के प्रति बेहद उत्साह के साथ समर्पित किया.

इस विशालकाय और अतिसाधारण देश में ऐसी कई संस्थाएं और रवायतें हैं जो वर्तमान समय की सामाजिक समस्याओं को लेकर बनायी गयी हमारी अवधारणा से मेल नहीं खाती हैं. प्रासंगिक नजर नहीं आतीं.
हमारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था समान है. अपमान और उपनिवेशीकरण का इतिहास भी एक जैसा है. हमने प्रगति की समान दिशा चुनी है. बावजूद इसके कि हमारे समाधान काफी मिलते-जुलते हैं और एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं, वास्तव में वे काफी अलग हैं. कुछ वैसे, जैसे दिन, रात से होता है. हमारे देश में कृषि सुधार की एक बड़ी आंधी ने कैमागुवे (क्यूबा का एक प्रांत) में बड़ी जोतों को  समाप्त कर दिया. अब यह लहर पूरे देश में अबाध रूप से फैल रही है और इसे रोक पाना अब मुमकिन नहीं है. बड़ी जोतों को समाप्त किया जा रहा है और गरीब किसानों को मुफ्त में जमीन का वितरण किया जा रहा है.

लेकिन महान भारत देश इस मामले में काफी प्राच्यवादी सतर्कता और कंजूसी दिखा रहा है. वह काफी फूंक-फूक कर कदम रखते हुए बड़े भूपतियों को भूमिहीन किसानों को भूमि देने का न्याय करने के लिए राजी कर रहा है और किसानों को इस  जमीन के लिए पैसे चुकाने के लिए मना रहा है. इस तरह दुनिया में सबसे पवित्र, समझदार और गरीब बना दिये गये लोगों को घोर वंचितता से बाहर लाने की प्रक्रिया इतनी से चल रही है कि नजर ही नहीं आती.

19 March 2013

"आपबीती को जगबीती बनाने की कोशिश की है"- मंजूर एहतेशाम


मशहूर कथाकार मंजूर एहतेशाम का लेखन अपनी एक अलग ही काट लिए हुए है. उनके उपन्यास उस भारत का चेहरा हैं , जिस पर अब फ़िल्में भी नहीं बना करतीं. सामूहिक सामाजिक बहसें  तो नहीं ही  होतीं.  भारत का वह समाज जो स्मृतियों से भी लापता हो चुका है. एहतेशाम जी के लेखन में ख़ास किस्म का नोस्टाल्जिया है. स्मृति आख्यान. लापता हो चुके या हो रहे को सहेज लेने की एक बेचैनी. मंजूर एहतेशाम से बात की प्रीति सिंह परिहार ने. यह आलेख बातचीत को आत्म-वक्तव्य में ढाल कर लिखा गया है. 




लिखने वाला मंजूर एहतेशाम कुछ इस तरह होगा, ऐसा कभी सोचा नहीं था. आज भी यही समझता हूं कि यह मैं नहीं हूं. प्रिंट में दिखने वाले नाम मेरे लिए बहुत बड़ी चीज थे, आज भी हैं. जेहन में कहीं यह कल्पना कभी नहीं थी कि लेखक के रूप में मेरा नाम किसी किताब में आ सकता है. यह भी नहीं जानता था कि ऐसा समय आयेगा जब मेरे लेखन को पसंद करने वाले पाठक होंगे, मुझे राष्ट्रपति भवन जाने का मौका मिलेगा या इस वजह से कुछ लोग मुझसे नाराज भी हो जायेंगे. इन सारी चीजों से खुशी मिली, तो एक बड़ी जिम्मेदारी का एहसास भी हुआ. बचपन से डायरी लिखता था. स्कूल में लिखे गये निबंध पर हिंदी की शिक्षक की सराहना अकसर लिखने के लिए प्रेरित करती. एक वक्त ऐसा आया जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड.कर कहानी लिखने लगा. सत्येन साहब जैसे दोस्त मिले, जिनसे कहानी पर बात होती.

पहली कहानी ‘रमजान में मौत’ 1973 में सारिका के लंबी कहानी कॉलम प्रकाशित हुई. इस बात को चालीस साल हो गये. तब से अब तक जितना भी लिखा, वो मेरी अपनी जिंदगी से हट कर कुछ भी नहीं. दरअसल, कथा लेखन में यथार्थ कहीं परछाईं की तरह भीतर होता है और कल्पनाशीलता उसे शब्दाकार देती है. फिक्शन में लेखक का सामाजिक परिवेश, वर्ग, समाज, शहर- नाम लिए बिना भी आते जाते हैं. मेरे लेखन में भी आजादी के बाद की जिंदगी, मध्यवर्गीय मुसलिम परिवार, भोपाल शहर बार-बार आते हैं. लिखते हुए मैंने कोशिश की है कि अपनी आपबीती को जगबीती बना सकूं.

कहानी लिखना मेरे लिए ज्यादा मुश्किल होता है, उपन्यास की बनिस्बत. कहानी की अलग चुनौतियां होती हैं लेकिन वह ज्यादा सुख भी देती है. हालांकि मैंने चालीस साल के लेखन में कुल जमा 40 कहानियां ही लिखी हैं. कहानी सीधे वार करने की कला की मांग करती है. एक उम्दा कहानी लिखना मुश्किल काम है. वैसे उपन्यास लेखन की भी अपनी मुश्किलें हैं लेकिन उसका फलक बड.ा होता है. वह आपको वक्त देता है, ठहर कर सोचने और कहने का. सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक परिवेश को अभिव्यक्त करने का. मैंने अपने हर उपन्यास को लिखने के लिए पांच-छह साल का लंबा वक्त लिया है. बहुत सी ऐसी बातें जिनके बारे में मुझे लगता है कि लोगों को जानना चाहिए और वह मैं ही लिख सकता हूं, उन्हें कहने के लिए जब कहानियां छोटी पड. जाती हैं, तो उपन्यास लिखता हूं.कोई चीज है, जो सवाल की तरह घेरती है और वही मजबूर करती है लिखने के लिए. कभी-कभी मैं अपना लिखा हुआ जब खुद पढ.ता हूं, तब पता चलता है कि मेरे लेखन की मूल चिंता क्या थी. पहले से यह बहुत साफ नहीं होता. मैं किसी एक समस्या के बारे में बहुत कांशियस होकर नहीं लिखता.

मैंने कभी भी रात को या सुबह उठकर नहीं लिखा. हमेशा ऑफिस टाइम में हमारे शो रूम में बैठकर लिखता हूं. अपना पहला उपन्यास मैंने एक दवा की दुकान में बैठकर लिखा था. लिखते समय मुझे सिर्फ कुर्सी और मेज की दरकार होती है. फिर आप चाहे चौराहे पर भी बैठा दें, मैं अगर लिख रहा हूं, तो लिखता ही जाऊंगा. हालांकि कई बार ऐसा भी हुआ है कि लिखते-लिखते एक जगह पर आकर अटक गया और बहुत वक्त लगा है आगे बढ.ने में. शायद ऐसा सबके साथ होता होगा. पाठक भले आपको इत्मीनान दिलायें कि हां सबकुछ ठीक है. लेकिन कभी-कभी कुछ छूट जाने का एहसास रह जाता है. हर रचना अपना आवरण, तकनीक और भाषा खुद-ब-खुद लेकर आती है. एक बार आप उसके रिदिम में बंध गये, तो रुकते नहीं. लेकिन अगर उस रिदिम को आप नहीं पकड. पाये, तब मुश्किल होती है.

मैं इस सच से वाकिफ हूं कि अकेले मेरे लिख भर देने से कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा.लेकिन यह भरोसा बना रहता है कि अगर पांच लोग भी मेरे लिखे को पढेंगे, तो उनके माध्यम से मेरी बात दूर तलक जायेगी. दरअसल, लेखक के पास बहुत बडे. बदलाव की गुंजाइश नहीं होती. फ्रेंच रिव्योलूशन में जरूर लेखकों की भूमिका रही. लेकिन काल मार्क्‍स भी अकेले कुछ नहीं कर पाये, उन्हें दोस्तवस्की की जरूरत पड.ी. महात्मा गांधी के बाद उनकी बात करने वाले बहुत सारे हुए, लेकिन पहले उन्हें खुद लिखना पड.ा. ये सभी बहुत बडे. लोग थे.

हमारे समय-समाज  की कुछ चीजें मुझे अकसर परेशान करती हैं. एक समय के बाद समझ नहीं
आता कि आपने समाज को बनाया है या समाज ने आपको. मुझे समझ नहीं आता कि चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान लोग सांप्रदायिक क्यों हो जाते हैं! हमारा सेंस ऑफ ह्यूमर और कामनसेंस हमें इसकी इजाजत क्यों नहीं देता कि जो चीजें ऐतिहासिक हो चुकी हैं, अब हमें उनसे आगे बढ.ना चाहिए. लेकिन कहीं एक अजीब तरह की शतरंज चल रही है. किसको कौन मात देगा, कहना मुश्किल है पर इसकी फिराक हर तरफ दिखती है. फायदा उठाने का यह एटीट्यूट मेरे ख्याल से एक राष्ट्र के लिए बहुत ही घातक है. कुछ मामलों में तय करना होगा कि हम क्या हैं. मौजूदा समय में हमारे जीवन मूल्यों में लगातार दोगलापन हावी हो रहा है. आज बेईमानी को इस तरह से अपना लिया गया है, जैसे वो सेकेंड नेचर हो. यह इतनी गंभीर समस्या है कि इससे लड.ने के लिए गांधी जैसे किसी व्यक्ति की जरूरत होगी. इसका इलाज अगर मिल भी जाये, तो उस पर काम करने के लिए लंबा वक्त लगेगा. साहित्य इस तरह की चीजों को थोड.ा बहुत ही बदल सकता है. ऐसे चंद लोग जो सही सोच पर टिके हैं, उन्हें थोड.ी बहुत हिम्मत दिला सकता है. लेकिन अगर बुनियादी स्वभाव ही ऐसा हो जाये, तो कुछ नहीं रहेगा न मूल्य, न जीवन.

लिखने के बहुत पहले से मैं देश ही नहीं, दुनिया भर का साहित्य पढ.ता रहा हूं. लेकिन जो रचनाएं और रचनाकार अच्छे लगे, उन सबके नाम याद कर पाना मुश्किल है. जो याद आ रहा है उसमें दोस्तोवस्की के उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ और ‘द ब्रदर्स कारमाजोव’ के साथ टॉल्स्टाय का लिखा बहुत कुछ है. मार्खेज और विलियम फाकनर पसंद आये. साउथ अफ्रीका के भी कुछ लेखक हैं. अमिताभ घोष के शुरुआती उपन्यास अच्छे लगे. हिंदी में प्रेमचंद और फणीश्‍वरनाथ रेणु का लेखन लाजवाब है. मुक्तिबोध मुझे बेपनाह पसंद हैं. उनकी डायरी, कविता, कहानी सब बहुत ही उम्दा हैं. निर्मल वर्मा, जो मेरे बहुत करीबी रहे हैं और जिन्हें मैं बहुत ज्यादा प्यार भी करता था, उनके उपन्यास ‘वे दिन’,‘लालटीन की छत’ और ‘एक चिथड.ा सुख’ सहित उनकी कुछ कहानियां बेहद पसंद हैं. वे उस तरह के लेखक हैं, जो मैं नहीं हूं. लेकिन मुझे उनका लिखा हुआ बहुत अच्छा लगता है. श्रीलाल शुक्ल और विनोद कुमार शुक्ल के लेखन का मुरीद हूं. उर्दू में सआदत हसन मंटो तो थे ही. अब्दुल्लाह हुसैन का उपन्यास ‘उदास नस्लें’ पसंद आया. स्वदेश दीपक भी पसंद हैं. उदय प्रकाश के साथ नये में मनोज रूपड.ा प्रभावित करते हैं. गीतांजलि श्री की ‘माई’,‘खाली जगह’ सहित कुछ कहानियां अच्छी लगीं.

इन दिनों मैं एक उपन्यास पर ही काम कर रहा हूं. बहुत ठंड के दिनों में मैं लिख नहीं पाता, तो कुछ ऐतिहासिक मालूमात जो उपन्यास के लिए जरूरी हैं, उन्हें पढ. कर उनके नोट्स लेता रहा हूं. कुछ कहानियां भी हैं, धूप निकलते ही जिन पर काम करूंगा. लगता है कि अभी बहुत लिखना है और कभी लगता है कि अब क्या करूंगा लिख कर. कविता मुझे बहुत अच्छी लगती है, लेकिन मेरे अंदर वह योग्यता ही नहीं है कि कविता की एक पंक्ति भी लिख सकूं. लेखन से इतर मुझे पढ.ना पसंद है. दोस्त जिनकी तादाद अब दिन ब दिन कम होती जा रही है, उनके साथ मिल बैठना अच्छा लगता है.
                                                         
                                                                                 प्रीति सिंह परिहार युवा पत्रकार हैं. 

मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित 

17 March 2013

नगमे उसके अब भी जुबां पर हैं...बस उसका नाम नहीं


मुंबई में गुमनाम सी जिन्दगी जी रहे नक्श लायलपुरी के गीत आज भी जवां होती रातों, अलसाई सी सुबहों में हमारे सीने को चाक कर जाते है. नक्श भले दुनिया द्वारा भुला से दिए गए हों, लेकिन उनके गीत बेसाख्ता जुबान को शीरीं बना जाते हैं. नक्श लायलपुरी से मुंबई में मुलाक़ात की फिल्म रिपोर्टर उर्मिला कोरी ने. यह लेख नक्श जी के जीवन और उनके फन को याद कर रहा है..



न जाने क्या हुआ जो तूने छू लिया/ खिला गुलाब सा मेरा बदन/ निखर-निखर गयी संवर -संवर गयी / बना के आईना तुझे ऐ जानेमन... 

इश्क  में लरजता हुआ शायद ही कोई दिल होगा जिसने इस गीत की उंगली थामे कुछ दूरी न तय की होगी.. कहते हैं नाम भले भूल जाए..लफ्ज बचे रहते हैं...और अगर लफ्ज इतने पाकीजा हों तो तो वे सिर्फ बचे ही नहीं रहते...हर दिल का राग बन जाते हैं. फनकार भुला दिया जाता है..लेकिन उसका फन जिन्दा रहता है. ऐसे ही एक फनकार का नाम है नक्श लायलपुरी. 

24 फरवरी 1928को लाहौर के लायलपुर, जो अब फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है, में जन्मे मशहूर  गीतकार नक्श लायलपुरी  भले ही इंडस्ट्री द्वारा भुलाए जा चुके हैं लेकिन उनके गीत न जाने क्या हुआ जो तुने छू लिया,  उल्फत में जमाने की हर रस्म, ये मुलाकात एक बहाना है/ प्यार का सिलसिला पुराना है,  चांदनी रात में एक बार तुझे देखा, तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीं है...  जैसे अनगिनत गीत अब भी हर दिल में एक कसक पैदा कर जाते हैं. लाहौर पावर हाऊस में बतौर इंजीनियर काम करनेवाले जगन्नाथ पुरी के घर जन्मे जसवंत राय को शेरो-सुखन की दुनिया में नक्श लायलपुरी के नाम से जानती है. नक्श एक साल के भी नहीं हुए थे कि उनकी माता जी विद्या पुरी का अकस्मात देहांत हो गया. माता के देहांत के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली. 1947में हुए बंटवारे के समय पूरा परिवार लाहौर से लखनऊ आकर बस गया. पढाई-लिखाई तथा विशेषकर ऊर्दू शायरी में रूचि रखनेवाले नक्श बचपन से ही स्वाभिमानी किस्म के थे. पढाई समाप्त होने के बाद नौकरी न मिलने के कारण जब सौतेली माता ने हर रोज घर में कलह शुरू कर दिया तो उनके स्वाभिमानी मन ने विद्रोह कर दिया. 

सन 1950 में एक रोज किसी को बिना बताए नक्श साहब लखनऊ से बंबई आ गए. एक जोडी कपडे तथा जेब में चवन्नी के साथ मुंबई आनेवाले नक्श जी बताते हैं,  ‘उन दिनों रेलगाडियां कोयले से चला करती थी सो लखनऊ से कल्याण तक आते आते मेरे पूरे कपडे काले हो चुके थे. दोपहर का वक्त था सो भूख भी बहुत तेज लगी हुई थी.जेब में चवन्नी के रूप में यह मेरी आखिरी दौलत मेरे पास थी. एक पल विचार आया क्यों ना इसे बचा कर रख लिया जाए मगर दूसरे ही पल पेट की आग ने इस विचार को पुख्ता कर दिया कि बेगाने देश में भूखे पेट आमद दर्ज करने से कहींऐसे न हो कि कई दिन फांके करने पडे.सो मैंने जेब में पडी चवन्नी की चार पुरियां और भाजी खरीदी. दुर्भाग्य से पहला निवाला उठाते ही चील ने झपट्टा मारकर वह निवाला जमीन पर गिरा दिया.दुखी मन के साथ मैने वह पुरी भाजी वहीं छोड दी और वापस ट्रेन में आकर बैठ गया. जब ट्रेन दादर पहुंची तब ख्याल आया कि यहां मेरे कलम मित्र(पेन फ्रेंड) प्रदीप नैयर रहते है. हम कभी मिले नहीं थे सो उनसे मिलने के लिए मै उनके घर की तरफ चल पडा. उनके घर पहुंचने के बाद पाया वहां बडा सा ताला लटका हुआ है. ताला देखकर मेरा दिल फट पडा. वाचमैन ने बताया वह किसी काम से 15दिनों के लिए पूना गए हैं. यह सुनकर दिल और बैठ गया. बेहद थकान, धूप की तपिश और भूख ने मुझे बेहाल कर दिया था. साथ ही सवाल यह भी था कि अब क्या ? सडक पर चलते हुए यही सवाल  बार-बार दिल से टकरा रहा था कि सामने से मुझे एक 80-90 साल के एक बुजुर्ग सरदार हाथ में छडी लिए आते दिखाई दिए.मैने उन्हें रोककर जब अपनी परेशानी बताई, तो उन्होंने मुझे दादर स्थित गुरुद्वारे का पता बताया और कहा, वहां आठ दिन रहने और खाने की व्यवस्था हो सकती है. आठ दिन सुनकर मै जरा आश्वस्त हुआ और उम्मीद की एक किरण के साथ उनका शुक्रिया अदा कर गुरु द्वारे का पता पूछते पूछते वहां जा पहुंचा. जब मै वहां पहुंचा तब खाने का समय समाप्त हो चुका था और सभी एक बडे से हॉल में आराम कर रहे थे. वहां मेरी मुलाकात एक युवा नौजवान से हुई जिसने बंटवारे में अपना एक पैर खो दिया था. पेशे से वह बिजनेस मैन था और बिजनेस के सिलिसले में लाहौर से बंबई आया हुआ था. जब उसे पता चला कि मै एक शायर हूं तो उसका झुकाव मेरी तरफ अधिक हो गया। मेरी हालत देखकर उसने मुझे अपना तौलिया, साबुन और तेल दिया. इस तरह छ: दिन बीत गए और उसके जाने का दिन आ गया.मेरे लिए समस्या यह थी कि दो दिन बाद मेरी भी आठ दिन की अवधि खत्म होनेवाली थी.मेरी परेशानी देखकर उसने गुरुद्वारे वालों से कहकर मेरे रहने का एक हफ्ता इंतजाम और कर दिया, साथ ही जाते वक्त कुछ पैसे देकर वह चला गया.’

बंबई आने के बाद नक्श जी को पहला काम एक डाकखाने में बतौर क्लर्क की मिली. नौकरी में अरुचि तथा अधिकारियों से अनबन होने के कारण उन्होंने वह नौकरी छोड दी. कला की तरफ रुझान रखनेवाले नक्श जी ने बंबई में भी अपने काफी प्रशंसक बना लिए थे, जिनमें अधिकतर कला में रूचि रखनेवाले बडे घरों के लडके थे. उनकी मदद से नक्श जी ने एक नाटक तैयार किया.  आर्थिक मदद उन लडकों ने दी.  नायक के रूप में उन्होंने  अभिनेता राम मोहन को चुना,  उस समय निर्देशक जगदीश सेठी के साथ बतौर सहयोगी निर्देशक के रूप में कार्यरत थे. नक्श जी बताते है‘ मेरे लिखे नाटक और गीतों से प्रभावित होकर उन्होंने मुझे फिल्मों के लिए गीत लिखने का सुझाव दिया. मगर उन दिनों फिल्मों के बारे में मेरी राय अच्छी नहीं थी. मुझे लगता था फिल्मी दुनिया में नए लोगों के साथ बहुत बद्सलूकी की जाती है. जब मैने उन्हें अपने दिल की बात बताई तो वह हंसने लगे और कहा कि यदि आपको इज्जत से काम मिले तब तो आपको कोई परेशानी नहीं होगी. उनकी बात सुनकर मैने कहा बिल्कुल नहीं. जहां इज्जत और पैसा दोनों मिले वहां काम करने में कैसी हिचक. मेरी बात सुनकर उन्होंने मेरी मुलाकात जगदीश सेठी से करवाई. तब वह अपनी फिल्म जग्गू की तैयारियों में व्यस्त थे. गीत लिखने के लिए उन्होंने सात गीतकार नियुक्त कर रखे थे.शर्त यह थी कि जिसका गीत अच्छा होगा उसे चुना जाएगा. इस तरह आठवें गीतकार के रूप में उनके यहां मुझे भी मौका मिल गया. उनकी खासियत यह थी कि वहां लिखने के लिए सभी गीतकारों को समान रूप से पैसे मिलते थे. बीस दिन बाद आखिरकार वह भी दिन आ गया जब दो गीतों को चुना गया. उसमें से एक गीत मेरा था और दूसरा गीत उस जमाने के मशहूर गीतकार मुजफ्फर शाहजहांपुरी का. उन दोनों गीतों में से एक गीत का चुनाव होना था. गीत दोनों ही अच्छे थे सो मतदान के जरिए चुनाव तय हुआ। चुनाव की बात सुनकर मेरा दिल बैठ गया मुझे लगा अब तो कुछ नहीं हो सकता क्योंकि मुझे कौन जानता है जो मेरे लिए मतदान करेगा.मगर इत्तेफाक से मुझे उनसे एक मत अधिक मिले और मेरा गीत चुन लिया गया. इस तरह 1952में फिल्म ‘जग्गू से मैने फिल्मी दुनिया में प्रवेश किया.' 

नक्श जी इस बात को भी मानते है कि इस इंडस्ट्री में अपने पैर जमाने के लिए दूसरों की तरह उन्हें ज्यादा संघर्ष नहीं करना पडा. नक्श जी के अनुसार उन्हें यकीन था कि जिस तरह उन्हें प्रवेश मिला है, उसी तरह एक दिन वह बुलंदियों को भी छू लेंगे.नक्श जी बताते ह कि आज की तरह वह दौर भी मार्केटिंग का दौर था, जहां खुद को बेचना एक कला समझी जाती थी. मगर नक्श जी कभी इस दौड में नहीं शामिल हुए. 1952से लेकर आज तक काम मांगने के लिए वह किसी संगीतकार के पास नहीं गए. हालांकि नक्श जी यह भी मानते है कि यही वजह है जो उन्हें कोई बडी फिल्म नहीं मिल पाई. 

  गीतकार की जिन्दगी, आजाद जिन्दगी नहीं होती. हर गीत अच्छी धुनों, अच्छे गायक, सफल फिल्म और एक अच्छे चेहरे की मोहताज होती है, जिस पर यह गीत फिल्माया जाए. इन सबको मिलाकर ही एक कामयाब गीत बनता है 

वैसे नक्श जी भले ही यह कहें कि उन्हें कोई बडी फिल्म नहीं मिल पाई मगर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि वह संगीत प्रेमियों के पसंदीदा गीतकारों में से एक है.लेकिन इसका श्रेय भी नक्श जी खुद को ना देते हुए आकाशवाणी के उद्घोषकों को देते हैं जिन्होंने उनके गाने खूब बजाए. उस वक्त पैसे लेकर गाने बजाने का चलन था मगर पैसे देकर अपनी वाहवाही नक्श जी को मंजूर ना थी.बतौर गीतकार नक्श जी की लोकप्रियता किसी से छुपी नहीं है मगर यह सवाल भी स्वाभाविक है कि आखिर किस गायक और संगीतकार ने उनके गीतों के साथ न्याय किया ? इस सवाल के जवाब में नक्श जी मुस्कुराते हुए कहते है कि गीतकार की जिन्दगी, आजाद जिन्दगी नहीं होती. हर गीत अच्छी धुनों, अच्छे गायक, सफल फिल्म और एक अच्छे चेहरे की मोहताज होती है, जिस पर यह गीत फिल्माया जाए. इन सबको मिलाकर ही एक कामयाब गीत बनता है।’ वैसे नक्श जी के अनुसार गीत सिर्फ दो तरह के होते हैं, एक अच्छा गीत और दूसरा बुरा गीत. इस सिलिसले में नक्श जी एक गीत उदाहरण देते है जिसे पूरा करने के लिए उन्हें 4काफिये की बजाय 52काफिये लिखने पड़े   गीत के बोल थे - 

मजबूर है हम, तकदीर का गम, हर हाल में सहना पडता है।
शकवे भी जुबां पर आते है खामोश भी रहना पडता है।

नक्श जी बताते है ‘जब 52 काफिया लिखने के बावजूद यह गीत नहीं चुना गया, तो मैने इस गीत के संगीतकार गुलशन सूफी से इसका कारण पूछा.उन्होंने मुझे बताया कि आपके सभी शेर अच्छे है मगर मेरे धुनों में वह जम नहीं पा रहे है. मुझे गीत में जो कट चाहिए, वह कट आपकी शायरी में नहीं आ रही है. उनकी बातों को गौर करके मैने घर जाकर रात को एक शेर और लिखा, जो उन्हें खूब भाया. वह इस प्रकार है - 
ऐ शोख सितारे झूम नहीं, अफसोस तुझे मालूम नहीं,
ऐसी भी घडी आ जाती है, जब चांद को गहना पडता है.
(इस गीत में गहना का अर्थ ग्रहण से है) 

नक्श जी के अनुसार इस गीत को लिखने वक्त जितनी मुश्किलात आई, उतना ही सुकून इसके लोकिप्रय होने पर मिला।’  इसके अलावा  बप्पी लाहिरी का एक गीत  लिखने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पडी। नक्श जी बताते है, संगीतकार बप्पी लाहिरी एक ऐसा गीत चाहते थे जो भजन की शक्ल में हो और उसमें भाई का डूबकर मरना, बहन का बलात्कार और बरसात, तीनों चीजें समाहित हों. इस भजन को लिखने की जिम्मेदारी पहले उन्होंने किसी और को दी थी मगर एक महीने तक जब वह गीत नहीं लिख पाया तो वह गीत मेरे पास आ गया खैर,फिल्म तो साइन कर ली मगर अगले पल लगा कि यह फिल्म साइन करके मैने मुसीबत मोल ले ली- आखिरकार इन सभी चीजों को आपस में मिलाते हुए मैने एक भजन रूपी गीत की रचना की, जो इस प्रकार है - पाप का सावन घिर आया, पाप के बादल छाए/ राम ही जानें आज की बरखा कहां अगन बरसाए. 
इस गीत को मैने तरकीब से बनाई थी मगर आज भी मै इस गीत से खुश नहीं हूं।’

नक्श जी बताते है कि आज की तरह यह जरूरी नहीं था कि पहले धुन बनें उसके बाद गीत लिखे जाएं उस दौर के संगीतकार गीतों के अनुसार गीत और धुन बनाते थे,  जिस नृत्य पर आधारित गीत में संगीत मुख्य भूमिका निभाता है.सो उसका संगीत पहले तैयार किया जाता था क्योंकि उसमें हल्के फुल्के बोल भी चल जाते थे.

1952 से लेकर अब तक अनगिनत गीत लिख चुके नक्श जी अपने प्रोफेशन को प्रोफेशन नहीं मानते.उनके लिए यह कला है,  उन्हें सुकून देती है. साथ ही उन्हें इस बात की खुशी और तसल्ली है कि बुरा गीत ना लिखने का उनका फैसला आज तक कायम है. वैसे इस लिहाज से नक्श जी ने कई दौर देखे. पुराने लोगों के साथ साथ नए लोगों के लिए शब्द रचना कर चुके नक्श जी अपना अधिक जुडाव पुराने लोगों से मानते है.  उनके अनुसार आज के संगीतकारों के पास अधूरी शिक्षा है. पहले के संगीतकार पूरी तरह से राग विद्या में प्रशिक्षित होकर आते थे. उन्हें शास्त्रीय संगीत की सारी किस्में पता थी.इसके अलावा शायरी के लिए भी उनके पास कान थे जो आज के संगीतकारों में नदारद है. यही नहीं इन दिनों टेलीविजन में अपना खास मुकाम बनाए रिएलिटी शो में भी उनकी कोई आस्था नहीं है, विशेष रूप से उसमें नजर आनेवाले जजों पर.

यूं तो नक्श जी ने जयदेव, खैय्याम, मदन मोहन और रोशन, इन सभी के साथ खूब काम किया,  मगर विशेष रूप से वह मदन मोहन से काफी प्रभावित हैं. उनका कहना है कि मदन मोहन जी का जजमेंट काफी अच्छा था. सुरों के साथ गीत की भी उन्हें अच्छी परख थी। एक बार मैने उन्हें एक गीत लिखकर दिया, 

आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें,
होश में दोनों नहीं हैं, किसको दीवाना कहें.

इस गीत को सुनकर वह खुशी से उछल पडे और मुझे गले लगाते हुए कहा कि यह तो लाजवाब मुखडा है. इसे हम चाहें तो कव्वाली बना लें, गीत बना लें या फिर गजल बना लें. गायकी की हर विधा में यह बेजोड है.’ यदि आज के गीतों की बात करें तो आज के गीतों से नक्श जी को कोई परहेज नहीं है मगर उनका मानना है कि आज के गीतों में गहराई नहीं है और उसकी वजह है गीतकारों और संगीतकारों की निष्ठा में कमी. नक्श जी बताते है कि पहले कुछ फिल्म कंपनियां थी जैसे पूना में शालिमार फिल्म कंपनी और मुंबई में फजली ब्रदर्स, इनके निर्माता - निर्देशक काफी पढे लिखे और साहित्यिक किस्म के इंसान थे. अपनी फिल्मों के लिए उन्होंने बडे बडे और नामी शायर जैसे जोश मलिदाबादी और मजरूह सुल्तानपुरी को रखा था. उनके पास अच्छी जुबान के साथ अच्छी सोच भी थी, मगर आज के बारे में क्या कहें,उनकेबारे में कुछ ना कहना ही बेहतर है. इसके अलावा प्रेरणा के नाम पर गीत - संगीत की हो रही चोरी से उन्हें बेहद नफरत है. 

कुछ सालों तक छोटे परदे के सीरियलों के लिए गीत लिखने वाले नक्श जी फिलहाल मुंबई के ओशिवारा स्थित अपने आवास में गुमनाम सी जिंदगी जी रहे हैं लेकिन उन्हें किसी से शिकायत नही हैं.  वह बॉलीवुड की इस अदा से भी अच्छी तरह वाकिफ है कि यहां नमस्कार सिर्फ उगते सूरज को किया जाता है, डूबते सूरज को नहीं. नक्श जी कहते हैं कि यहां क्या हर जगह का यही आलम है. उदाहरण के तौर पर रेसकोर्स में जैकपॉट एक आदमी का लगता है और हारकर हजारों निकलते है मगर हारनेवालों के बारे में कोई नहीं सोचता, सभी की नजर सिर्फ जैकपॉट वाले पर होती है.इतनी आसानी से जिंदगी का फलसफा बयां करनेवाले नक्श जी ने सफलता और असफलता के कई पायदानों  को छुआ है मगर आज भी पुरस्कार उनके लिए कोई खास मायने नहीं रखते. उनका मानना है कि पुरस्कार कलाकारों की हौसला अफजाई के लिए होते है.सो यदि पुरस्कार योग्यता के आधार पर तय हो तो अच्छी बात है मगर दुखद बात यह है कि हमेशा से पुरस्कार बिकते आए हैं.
                                                                                        
नक्श जी आज फ़िल्मी दुनिया की चमक दमक से दूर हैं.  रेडियो पर जब उनका लिखा कोई पुराना नगमा बज उठता है तब वे शायद अपना ही एक शेर दुहराते हैं..

मैं दुनिया की हक़ीकत जानता हूँ
किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ

मेरी पहचान है शेरो सुख़न से
मैं अपनी कद्रो-क़ीमत जानता हूँ ..

                                                                             उर्मिला कोरी युवा फिल्म रिपोर्टर हैं.