8 April 2013

"लिखना एक तरह से कैद में चले जाना है" : चिनुआ अचेबे


अफ्रीकी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले चिनुआ अचेबे, जिनका निधन पिछले महीने २१ मार्च को हो गया, ने लेखन को हमेशा एक तरह का रचनातमक  एक्टिविज्म माना. उनका लेखन महज एक लेखक की रचना यात्रा नहीं बल्कि अफ्रीकी महादेश की पीड़ा की भी यात्रा है. उनके लेखन और  संघर्ष को यह साक्षात्कार (जिसे यहाँ आत्म वक्तव्य की शक्ल में ढाला गया है) काफी गहराई से सामने लाता है...आपके लिए इस आत्म वक्तव्य का दूसरा और आख़िरी हिस्सा. यहाँ उन्होंने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में महत्वपूर्ण बातें कही हैं. : अखरावट




सृजन की प्रक्रिया हर रचना के लिए एक समान नहीं होती. मुझे लगता है कि सबसे पहले एक सामान्य विचार आता है, उसके ठीक बाद अहम किरदार आते हैं. हम लोगों सामान्य विचारों के समुद्र के बीच में रहते हैं, इसलिए यह अपने आप में उपन्यास नहीं है, क्योंकि सामान्य विचार अनगिनत संख्या में हैं. लेकिन जिस क्षण एक खास विचार एक किरदार से जुड़ जाता है, यह कुछ ऐसा होता है, जैसे कोई इंजन चल पड़े. तब एक उपन्यास बनने लगता है. यह खासकर उन उपन्यासों के संदर्भ में सही बैठता है, जिसमें विशिष्ट और कद्दावर चरित्र होते हैं, जैसे देवता के बाण में एजुलू. ऐसे उपन्यासों में जिसमें किरदार का व्यक्तित्व उस तरह का सब पर छा जानेवाला नहीं होता है, जैसे नो लॉन्गर एट ईज, मुझे लगता है कि एक सामान्य विचार कम से कम शुरुआती अवस्था में ज्यादा अहम होता है. लेकिन जब यह शुरुआती अवस्था बीत जाती है, सामान्य विचार और चरित्र में कोई ज्यादा अंतर नहीं होता है. दोनों अहम हो जाते हैं. 

जैसे कोई उपन्यास आगे बढ़ता है, मैं प्लॉट या थीम के बारे में ज्यादा चिंता नहीं करता हूं. सारी चीजें खुद ब खुद आती हैं, क्योंकि तब किरदार कहानी को अपने हिसाब से मोड़ रहे होते हैं. एक बिंदु पर आकर लगता है कि जैसे आपका घटनाओं पर उस तरह का नियंत्रण नहीं है, जैसा आपने सोचा था. कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें वहां होना ही चाहिए, नहीं तो कहानी अधूरी लगेगी. और ऐसी चीजें खुद ब खुद आ जाती हैं. जब ऐसा नहीं होता है, तब आप मुश्किल में होते हैं और उपन्यास रुक जाता है. 

मेरे लिए लिखना एक कठिन काम है. कठिन शब्द इसे बताने के लिए काफी नहीं है. यह एक तरह से एक कुश्ती की तरह है. आपको विचारों और कहानी के साथ कुश्ती लड़नी होती है. इसके लिए काफी ऊर्जा की जरूरत होती है. लेकिन इसी क्षण यह काफी रोचक भी है. इसलिए लिखना एक साथ कठिन और आसान दोनों है. आपको यह स्वीकार करना होता है कि जब आप लिख रहे होते हैं, तब आपकी जिंदगी पहले वाली नहीं रह जाती. मेरे लिए लिखना एक तरह से कैद में चले जाना है. फिर चाहे कितना भी वक्त लगे आप इस कैद से बाहर नहीं आ सकते. इसलिए यह एक साथ कठिन और उल्लास देनेवाला, दोनों है. 

मैंने महसूस किया है कि मैं सबसे अच्छा तब लिखता हूं, जब मैं नाइजीरिया में अपने घर में होता हूं. लेकिन आदमी  दूसरी जगहों पर भी रह कर काम करना सीखता है. जिस परिवेश के बारे में मैं लिख रहा हूं, लिखने के लिहाज से वह परिवेश मेरे लिए सहज होता है. दिन का वक्त खास मायने नहीं रखता. मैं सुबह जागनेवाला व्यक्ति नहीं हूं. मुझे बिस्तर से बाहर निकलना अच्छा नहीं लगता, इसलिए मैं पांच बजे जगकर लिखना नहीं शुरू करता, हालांकि मैंने सुना है कि कई लोग ऐसा करते हैं. मैं अपने दिन की शुरुआत के बाद लिखना शुरू करता हूं और रात गये तक लिख सकता हूं. लिखने का अनुशासन मेरे लिए यह है कि मुझे किसी भी सूरत में काम करना है. इससे फर्क  नहीं पड़ता कि मैं कितना लिख पा रहा हूं. 

मैं पेन से ही लिखता हूं. कागज पर पेन मेरे लिए सबसे मुफीद तरीका है. मैं मशीनों के साथ सहज नहीं हो पाता. जब भी मैं टाइपराइटर पर कुछ काम करना चाहता हूं, मुझे लगता कि यह मेरे और मेरे शब्दों के बीच आ रहा है. जो बाहर निकलता है, वह वैसा नहीं होता है, जो बेफिक्र होकर लिखते हुए आता. इस मामले में मैं शायद पूर्व औद्योगिक व्यक्ति हूं. 

जहां तक लेखक का सार्वजनिक बहसों में खुद को शामिल करने का सवाल है, मुझे लगता है कि इसके लिए कोई सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता. लेकिन मुझे लगता है कि लेखक सिर्फ लेखक नहीं होता. वह एक नागरिक भी होता है. मेरा हमेशा से मानना रहा है कि गंभीर और अच्छे साहित्य का अस्तित्व हमेशा से मानवता की मदद उसकी सेवा करने के लिए रहा है. न कि उसे सवालों के घेरे में लाने या उस पर दोषारोपण करने के लिए. कोई कला कैसे कला कही जा सकती है, अगर इसका मकसद मानवता को हताश करना हो. हां, यह मानवता को असहज कर सकता है. यह मानवता के खिलाफ नहीं हो सकता. यही कारण है कि मैं नस्लवाद को असहनीय मानता हूं. कुछ लोगों को लगता है कि मेरे कहने का मतलब  यह है कि अपने लोगों की प्रशंसा करनी चाहिए. भगवान के लिए जाइये और मेरी किताबें पढ़िये. मैं अपने लोगों की प्रशंसा नहीं करता. मैं उनका सबसे बड़ा आलोचक हूं. कुछ लोगों को लगता है कि मेरा छोटा सा पर्चा- द ट्रॉबल विद  नाइजीरिया, थोड़ा अतिवादी था. मैं अपने लेखन के कारण हर तरह की समस्या में पड़ता रहा हूं. कला को हमेशा मानवता के पक्ष में होना चाहिए. 
समाप्त .

पेरिस रिव्यू में छपे एक पुराने साक्षात्कार के आधार पर तैयार 


7 April 2013

लेखक को इतिहासकार होना होता है...: चिनुआ अचेबे


अफ्रीकी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले चिनुआ अचेबे, जिनका निधन पिछले महीने २१ मार्च को हो गया, ने लेखन को हमेशा एक तरह का रचनातमक  एक्टिविज्म माना. उनका लेखन महज एक लेखक की रचना यात्रा नहीं बल्कि अफ्रीकी महादेश की पीड़ा की भी यात्रा है. उनके लेखन और  संघर्ष को यह साक्षात्कार (जिसे यहाँ आत्म वक्तव्य की शक्ल में ढाला गया है) काफी गहराई से सामने लाता है...आप भी पढ़िए : अखरावट 




जहां तक बचपन में कहानियां लिखने की प्रेरणा की बात है, उस दौर में कहानियां लिखना संभव नहीं था. इसलिए तब इस बारे में सोचा भी नहीं. हां, इतना जरूर है कि मुझे यह पता था कि मुझे कहानियां पसंद हैं. कहानियां जो मेरे घर में सुनायी जाती थीं, पहले मेरी मां द्वारा. फिर मेरी बड़ी बहन द्वारा. जैसे कछुए की कहानी- या कोई भी कहानी जो मैं लोगों की बातचीत के भीतर से ढूंढ़ लेता था. जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया, तब जो कहानियां मैं पढ़ा करता था, वे मुझे अच्छी लगती थीं. वे दूसरी तरह की कहानियां थीं. लेकिन मुझे अच्छी लगती थीं. नाईजीरिया के मेरे हिस्से में मेरे माता-पिता ईसाई धर्म में धर्मांतरित होनेवाले शुरुआती लोगों में से थे. उन्होंने सिर्फ धर्म ही नहीं बदला था, मेरे पिता ईसाई धर्म प्रचारक भी थे. वे और मेरी मां  वर्षों तक इग्बोलैंड के विभिन्न हिस्सों में ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए घूमते रहे. मैं छह भाई बहनों में पांचवां था. जब मैं बड़ा हो रहा था, तब तक मेरे पिता रिटायर हो चुके थे और अपने परिवार के साथ अपने पुश्तैनी गांव में आकर बस गये थे. 

जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया और पढ़ना सीखा, मेरा सामना दूसरे लोगों और दूसरी धरती की कहानियों से हुआ. ये कहानियां मुझे बहुत अच्छी लगती थीं. इनमें कई अजीब-अतार्किक किस्म की होती थीं. जब मैं बड़ा हुआ, मैंने रोमांच कथाओं को पढ़ना शुरू किया. तब मुझे नहीं पता था कि मुझे उन बर्बर-आदिम लोगों के साथ खड़ा होना है, जिनका मुठभेड़ अच्छे गोरे लोगों से हुआ था. मैंने सहज बोध से गोरे लोगों का पक्ष लिया. वे अच्छे थे! वे काफी अच्छे थे! बुद्धिमान थे! दूसरी तरफ के लोग ऐसे नहीं थे. वे मूर्ख थे. बदसूरत थे. इस तरह मुझे अपनी कहानी के न होने के खतरे से परिचय हुआ. एक महान कहावत है- जब तक शेर की तरफ से इतिहास लिखनेवाला नहीं होगा, जब तक शिकारी का इतिहास हमेशा उसे ही महिमामंडित करेगा. यह बात बहुत बाद तक मेरी समझ में नहीं आयी. जब मुझे एहसास हुआ कि मुझे लेखक बनना है, तब मुझे यह पता था कि मुझे वह इतिहासकार बनना है. यह किसी अकेले का काम नहीं है. यह एक ऐसा काम है, जिसे हम सबको मिलकर साथ करना है, ताकि शिकार के इतिहास में शेर की पीड़ा, उसका कष्ट, उसकी बहादुरी भी झलके.            

मेरी उच्च शिक्षा इबादान विश्वविद्यालय में हुई. तब यह नया-नया खुला ही था. एक तरह से यह उपनिवेशवादी समय के विरोधाभासों का आईना था. अगर अंगरेजों ने नाइजीरिया में कुछ बेहतर काम किये, तो इबादान उनमें से एक था. यह लंदन यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज के तौर पर शुरू हुआ था. उपनिवेशी शासन में चीजें ऐसी ही होती थीं. आप किसी और की पूंछ के तौर पर काम करना शुरू करते हैं.  मुझे जो डिग्री मिली वह लंदन यूनिवर्सिटी की ही थी. आजादी जब आयी, तब इसके प्रतीकों में से एक यह भी था कि इबादान यूनिवर्सिटी के तौर पर अस्तित्व में आया. 

मैंने पढ़ाई विज्ञान से शुरू की. फिर अंगरेजी, फिर इतिहास फिर धर्म. मुझे ये विषय काफी रोचक और काम के लगे. धर्म का अध्ययन मेरे लिये नया और उत्सुकता पैदा करनेवाला था, क्योंकि इसमें सिर्फ ईसाई धर्म दर्शन शामिल नहीं था, इसमें पश्चिमी अफ्रीका के धर्मों का अध्ययन भी शामिल था. वहां मुझे जेम्स वेल्स नाम के एक शिक्षक मिले. वे प्रभावशाली उपदेशक थे. एक बार उन्होंने मुझसे कहा, हम तुम्हें शायद वह नहीं पढ़ा सकते जिसकी तुम्हें जरूरत है, हम तुम्हें सिर्फ वही पढ़ा सकते हैं, जितना हम जानते हैं. मुझे लगा वे बेहद मार्के की बात कह रहे हैं. यह मुझे मिली सबसे अच्छी सीख थी. मैंने वहां सचमुच वैसा कुछ नहीं सीखा जिसकी मुझे जरूरत थी, सिवाय इस भाव के कि मुझे अपने बल पर अपना रास्ता बनाना है. अंगरेजी विभाग इसका उम्दा उदाहरण था. वहां मौजूद लोग इस विचार पर ही हंस देते कि हम में से कोई लेखक बनेगा. 

मेरी पहली दो किताबों- "थिंग्स फॉल अपार्ट" और नो लॉन्गर एट ईज के टाइटल क्रमश: आइरिश और अमेरिकी कवियों की कविताओं की पंक्तियों से हैं. ऐसा शायद इसलिए था कि ऐसा एक तरह के दिखावे के लिए था. मैंने अंगरेजी से जनरल डिग्री ली थी. और मुझे इसका प्रदर्शन करना था. लेकिन येट्स! मुझे भाषा के प्रति उसकी मोहब्बत, उसका प्रवाह अच्छा लगता था. वे दिल से हमेशा सही पक्ष में रहे. 

मेरे उपन्यास "थिंग्स फॉल अपार्ट" की पांडुलिपि की कहानी लंबी है. सबसे पहले तो यह लगभग खो ही गयी थी. 1957 में मैं स्कॉलरशिप कुछ दिन बीबीसी में जाकर पढ़ाई करने के लिए लंदन गया था. मैं थिंग्स फॉल अपार्ट का पहला ड्रॉफ्ट अपने साथ ले गया था, ताकि मैं इसे पूरा कर सकूं. वहां मैंने वहां अपने एकमात्र नाइजीरियाई साथी के कहने पर वह पांडुलिपी बीबीसी में इंस्ट्रक्टर और उपन्यासकार गिलबर्ट फेल्फ्स को दी. पांडुलिपी पाकर उन्होंने कोई उत्साह नहीं दिखाया था. वे होते भी क्यों? लेकिन उन्होंने काफी विनम्रता के साथ वह पांडुलिपी ले ली थी. वे मेरे अलावा पहले व्यक्ति थे, जिन्हें वह पांडुलिपी रोचक लगी थी. बल्कि उन्हें इसने इस  तरह प्रभावित किया था कि एक शनिवार वे मुझे खोजते रहे, ताकि वे मुझे इसके बारे में बता सकें. मैं लंदन से बाहर आ गया था. जब उन्हें इसका पता लगा, तो उन्होंने पता लगाया कि मैं कहां हूं और मेरे होटल में फोन किया और मेरे लिए पलट कर उन्हें फोन करने का संदेश छोड़ा. उनका यह संदेश मिलने पर मैं पूरी तरह बाग-बाग हो गया. मैंने अपने आप से कहा कि शायद उन्हें उपन्यास पसंद नहीं आया. फिर लगा कि अगर ऐसा होता, तो उन्होंने मुझे फोन ही क्यों किया होता! कुछ भी हो, मैं काफी रोमांचित था. जब मैं लंदन वापस लौटा, तो उन्होंने कहा, यह लाजवाब है. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं चाहता हूं कि यह उपन्यास मैं अपने प्रकाशक को दिखाऊं! मैंने कहा- हां, लेकिन अभी नहीं, क्योंकि मुझे लगता है कि इसका फॉर्म सही नहीं है. मैं तीन परिवारों की गाथा लिखना चाह रहा था, इसलिए मैंने अपने पहले ड्राफ्ट में काफी कुछ समेटने की कोशिश की थी, इसलिए मुझे लग रहा था कि मुझे कुछ क्रांतिकारी करने की जरूरत है, ताकि मैं इसे ज्यादा बड़ा कलेवर दे सकूं. 

इंग्लैंड में मैंने एक टाइपिंग एजेंसी का विज्ञापन देखा था. मुझे  एहसास था कि अगर आप प्रकाशक पर सचमुच प्रभाव जमाना चाहते हैं, तो आपको अपनी पांडुलिपी टाइप कराके भेजनी चाहिए. मैंने अपने हाथ से लिखी उपन्यास पांडुलिपि, जो उसकी एकमात्र पांडुलिपी थी, नाइजीरिया से लंदन पार्सल कर दी. उन्होंने जवाब भेजा कि पांडुलिपी की टाइपिंग के लिए प्रत्येक कॉपी के हिसाब से 32 पाउंड लगेंगे. मैंने ब्रिटिश पोस्टल आॅर्डर से यह रकम भेज दी. इसके बाद महीनों गुजर गये, लेकिन उनकी तरफ से कुछ भी सुनने को नहीं मिला. मैं उन्हें चिट्ठियां लिखता रहा. लिखता रहा. उधर से कोई जवाब नहीं आया. एक शब्द भी नहीं. मैं चिंता में  दुबला और  दुबला और दुबला होता जा रहा था. आखिरकार मैं खुशकिस्मत था. जिस ब्रॉडकास्टिंग हाउस में मैं काम करता था, उसमें मेरे बॉस छुट्टियों में  लंदन जा रहे थे. उन्हें मैंने इसके बारे में बताया. आखिरकार लंदन में उनकी कोशिशों के बाद मुझे थिंग्स फॉल अपार्ट की टाइप की हुई कॉपी मिली. सिर्फ एक. न कि दो. खैर जब यह वापस लौट कर आयी तब मैंने इसे अपने प्रकाशक हिनेमैन को भेजा. उन्होंने इससे पहले कभी कोई अफ्रीकी उपन्यास नहीं देखा था. उन्हें नहीं पता था कि इस उपन्यास के साथ आखिर करना क्या है! उन्होंने लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स के इकोनॉमिक्स और राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर से इस पर सलाह मांगी. वे हाल ही में नाइजीरिया से लौटे थे. उन्होंने इस उपन्यास के बारे में लिखा था, जो मेरे प्रकाशक के अनुसार किसी उपन्यास पर की गयी सबसे छोटी टिप्पणी थी. "विश्वयुद्ध के बाद का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास". पहले  इस उपन्यास की काफी कम कॉपी छापी गयी थी. ऐसा उन्होंने पहले कभी नहीं किया था. लेकिन यह काफी जल्दी आउट आॅफ प्रिंट हो गया. उपन्यास की कहानी इसी जगह पर रुक जाती अगर प्रकाशक ने इसके पेपरबैक संस्करण को छापने का एक और जुआ नहीं खेला होता. इस तरह  अफ्रीकी राइटर्स सीरीज अस्तित्व में आया. ऐलन हिल को अफ्रीकी साहित्य की खोज के लिए ब्रिटेन में सम्मानित किया गया. 

जारी 

पेरिस रिव्यू में करीब डेढ़ दशक पहले छपे साक्षात्कार का अनुवाद 

6 April 2013

‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ के कारण बहुत से लोगों को लगता है कि मैं बनारस का रहने वाला हूं : अब्दुल बिस्मिल्लाह


वरिष्ठ कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास झीनी-झीनी बीनी चदरिया को कौन भूल सकता है! काशी के बुनकरों पर लिखे इस उपन्यास को हिंदी साहित्य के मास्टरपीस का दरजा दिया जाता है. जीवन अनुभवों को कथा लेखन का बीज माननेवाले अब्दुल बिस्मिल्लाह से उनके सृजन संसार पर यह साक्षात्कार लिया है प्रीति सिंह परिहार ने. यहाँ साक्षात्कार को आत्मवक्तव्य की शक्ल में ढाला गया है. :: अखरावट.
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मैंने पढ.ते-पढ.ते ही लिखना सीखा. बचपन से मुझे पढ.ने का शौक था, लेकिन साहित्य की दुनिया और साहित्यिक किताबें मेरी पहुंच से बहुत दूर थीं. मैं ‘साहित्य’ के नाम से भी वाकिफ नहीं था, हां स्कूल की किताबों से अलग कुछ पढ.ना चाहता था. हम उन दिनों मध्यप्रदेश के डिंडोरी में रहते थे. वहां रविवार को लगने वाले हाट में फुटपाथ पर किस्सा तोता-मैना और हातिमताई जैसी किताबें एक या दो आना में मिला करती थीं. पिता से जिद कर मैं अपने लिए वे किताबें ले लेता था. पढ.ने के लिए मैं अखबारों की कतरनें भी सहेज लेता था, जिनमें धनिया, मिर्ची, हल्दी वैगरह लपेट कर बाजार से आती थीं. बहरहाल, इंटर कॉलेज पहुंचा, तो वहां छोटा सा पुस्तकालय मिला. लेकिन लेखन की वास्तविक प्रेरणा मुझे जीवन से मिली है.

इसके पीछे भी एक घटना रही. शरतचंद्र के उपन्यास ‘परिणीता’ से प्रभावित होकर मैंने ‘वादा’ शीर्षक से पहली बार एक प्रेम कहानी लिखी थी. मैंने कहानी के पात्रों के नाम हिंदू रखे और अज्ञानवश मामा की बेटी के साथ प्रेम दिखा दिया. मुसलिम समाज में तो मामा और चाचा की बेटी से विवाह हो जाता है, लेकिन हिंदू समाज में नहीं. अपने हिंदी के अध्यापक त्रिपाठी जी को मैंने वह कहानी दिखायी कि वो मेरी प्रसंशा करेंगे, पर बड.ी डांट पड.ी मुझे. उसी क्षण मैंने तय किया कि अब यथार्थ को जाने बिना कोरी कल्पना से कहानी नहीं लिखूंगा. इस समाज में यथार्थ की कितनी परते हैं, तब मैं नहीं जानता था. इसके बाद बहुत दिनों तक मैं छटपटाता रहा पर लिख नहीं सका. हालांकि लिखने की छटपटाहट तो पैदा हो ही गयी थी, इसलिए मैंने फिर हिम्मत की और अपने ही जीवन में जिन अनुभवों से गुजरा था, उन्हीं को आधार बनाकर लिखना शुरू किया. बचपन की एक घटना पर ‘खोटा सिक्का’कहानी लिखी. बेशक मैंने जीवन के अनुभवों पर लिखना शुरू किया, लेकिन यह भी सच है कि महज यथार्थ से साहित्य नहीं रचा जा सकता. साहित्य में कल्पना मिर्शित यथार्थ जरूरी है.

मेरी पहली कहानी आगरा से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘युवक’ में ‘सोने की अंगूठी’ शीर्षक से प्रकाशित हुई. उन्हीं दिनों बरेली की पत्रिका ‘एकांत’ में कविता भी छपी. तब मैं बीए में था.

मैं मानता हूं कि रचना एक वृक्ष है. वृक्ष जन्म लेता है एक बीज से. रचना एक बीच के रूप में रचनाकार के भीतर आ जाती है. भीतर ही भीतर वह रूप ग्रहण करती रहती है. यहीं पर रचनाकार की परख होती है. अगर उसने धैर्य से काम नहीं लिया, तो असमय जन्मे बो की तरह अपरिपक्व रचना का जन्म होगा. रवींद्रनाथ टैगोर ने भी रचना के जन्म की तुलना प्रसव पीड.ा से की थी. मेरा ख्याल है कि हर लेखक लगभग इस तरह की स्थिति से गुजरता है. लेकिन हर विधा की रचना प्रक्रिया अलग ढंग की होती है. उपन्यास एक थीम पर होता है. थीम के अनुकूल कहानी तथा कहानी के अनुकूल पात्र सोचने पड.ते हैं. इसके बाद कहानी बुनने की प्रक्रिया शुरू होती है. भीतर पूरा ढांचा तैयार हो जाता है, तब बारी आती है उसे कागज पर उतारने की. पर कागज पर उतराते वक्त जरूरी नहीं कि वह ज्यों की त्यों रहे. एक समय के बाद लेखक का किरदारों पर नियंत्रण नहीं रहता. कईबार वे ज्यादा शक्तिशाली हो जाते हैं. हम समाज में कई तरह के लोगों को देखते और जानते हैं और उनमें से ही हमें किरदार मिलते हैं. मेरे साथ प्राय: ऐसा होता है कि मैं एक किरदार में कई किरदारों की खूबियां और खामियां शामिल कर देता हूं. ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ के दो प्रमुख किरदार मतीन और अमीरउल्ला न जाने कितने लोगों से मिला कर गढे. गये हैं.

‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ के कारण बहुत से लोगों को लगता है कि मैं बनारस का रहने वाला हूं. लेकिन मेरा जन्म इलाहाबाद में हुआ, बचपन मध्यप्रदेश में बीता, पढ.ाई ज्यादातर मिर्जापुर और इलाहाबाद में हुई. नौकरियां छिटपुट कीं. बनारस के एक इंटर कॉलेज में परमानेंट नौकरी मिली, तो जहां मकान किराये पर मिला, वह बुनकरों का इलाका था. दिन-रात बराबर चलने वाले करघों की आवाज मुझे परेशान करने लगी. बहुत कोशिश के बाद भी किसी दूसरी जगह मकान नहीं मिला. यह इस देश की कटु साईहै, किसी मुसलमान को हिंदू मोहल्ले में किराये पर मकान नहीं मिलता. और बनारस में मुसलमान मतलब बुनकर. मैंने वहां तीन मकान बदले और तीनों बुनकर इलाके में ही मिले. सोचा अब इससे नहीं बचा जा सकता. बाद में वहां रहते-रहते करघों की आवाज की इतनी आदत हो गयी कि दीवाली पर तीन दिन के लिए करघे बंद हुए, तो एक अजीब से सूनेपन का एहसास हुआ. अब मुझे उनसे संगीत सा आनंद मिलने लगा. शायद कबीर ने अनहद नाद यहीं से पकड.ा हो.

वहां रहते हुए मैं बुनकरों के जीवन को नजदीक से देख रहा था. मैंने देखा वे मुसलमान तो हैं पर उनके त्योहार, रीति रिवाज, भाषा सब अलग हैं. मैं उनके सुख-दुख में शामिल हुआ और उनका अंग बन गया. तब मुझे लगा कि इन पर मैं लिखूंगा. मैं उनसे जुड.ी सूक्ष्म से सूक्ष्म चीजें देखता और नोट करता था. उनके जीवन को जानने के लिए मैं जितना भी प्रयत्न कर सकता था, किया. फिर भी दावे से नहीं कह सकता कि मैंने समग्रता में उनका चित्रण किया.

मेरी अधिकांश कहानियों के किरदार असल जीवन से हैं. कहीं-कहीं मैं भी हूं किरदार बनकर. जिस जगह के किरदार हैं, वहां की भाषा और बोली भी है. कालिदास का ‘शाकुंतलम’ पढ.ते वक्त मैंने देखा कि दुष्यंत के संवाद संस्कृत में हैं और शांकुतला के प्राकृत में. यह बात मेरे मन में हमेशा से थी. हर युग में दो तरह की भाषा होती है, एक पढे. लिखों की और एक आमजन की. बनारस के बुनकर जो भाषा बोलते हैं उसे अगर हिंदी में लिख दिया जाये, तो वह उपन्यास बन ही नहीं सकता था. मुझे लगता है कि बहुत जरूरी है किरदार अपनी भाषा बोले. भाषा केवल शब्द नहीं पूरी संस्कृति है. रचनाओं में क्षेत्रीय बोलियों-भाषाओं का इस्तेमाल एक तरह से उनका संरक्षण भी है.

मेरे लेखन की मूल चिंता पहले तो स्पष्ट नहीं थी. बाद में एहसास हुआ कि प्रतिबद्धता जरूरी है. तय करना होगा कि हम किसके पक्ष में खडे. हैं. मैंने उपेक्षित और शोषित के साथ खडे. होना चुना. पक्ष निर्धारित किये बिना क्रिटिकल एप्रोच भी नहीं आता. कभी-कभी इसमें सेल्फ क्रिटिसिज्म भी होता है. आत्म आलोचना के बगैर हम दूसरे की आलोचना भी नहीं कर सकते.

अब मेरी पहचान कथाकार के रूप में बन गयी है और उसे धोया नहीं जा सकता. ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ प्रकाशित होने से पहले मेरे नाम के आगे दो विशेषण लगते थे- कवि, कथाकार. बाद में कवि गायब हो गया, सिर्फ कथाकार रह गया. हाल ही में मेरा एक कविता संग्रह छपा, उसे मैंने दो लोगों को सर्मपित किया. त्रिलोचन शास्त्री को, जो मुझे मूलत: कवि मानते थे और प्यारे दोस्त मंगलेश डबराल को, जो मुझे मूलत: कथाकार मानते हैं.

लिखना मेरा कर्तव्य है, पेशा नहीं. पेशा तो अध्यापन है. जाहिर है कि दिन का समय मेरे पास नहीं होता, प्राय: मैं रात में ही लिखता हूं. लिख रहा होता हूं, तो कुछ भी होता रहे मैं उससे डिस्टर्ब नहीं होता. हालांकि लिखने के बीच बड.ा अंतराल आ जाये, तो वो जरूर लेखन को बाधित करता है. ‘अपवित्र आख्यान’ और ‘रावी लिखता है’ मैंने लगभग आगे-पीछे 1993-94 में पोलैंड में लिखना शुरू किया था. तभी भारत लौटना था. दोनों अधूारे उपन्यास लेकर 95 में मैं भारत लौट आया. दोनों वैसे ही पडे. रहे समय नहीं मिला पूरा करने का. 10 साल बाद मैं जब मॉस्को गया, उन्हें भी साथ लेता गया. इन दोनों को मैंने मॉस्को मैं बैठ कर पूरा किया. यानी शुरुआत पोलैंड में हुई और अंत मॉस्को में. बीच में दस साल का अंतराल रहा है. एक नया उपन्यास शुरू किया, लेकिन बीमार पड. जाने के कारण वह अधूरा पड.ा है, देखिए कब पूरा होता है.

मेरी दृष्टि में लेखन पुरस्कार के दो पहलू हैं. पुरस्कार से नयी ऊर्जा मिलती है, वहीं वे एक अजीब तरह की जिम्मेदारी का एहसास भी कराते हैं. आजकल तो तमाम तरह के पुरस्कार हैं और उनको लेकर राजनीति भी है. लेकिन मैंने इसे ऊर्जा और जिम्मेदारी के तौर पर ही लिया है. पुरस्कार से भी बड.ी चीज है पाठकों का स्नेह. हालांकि अब समय बदल गया है. पहले कोई रचना छपती थी, तो बाकायदा पत्र आते थे पाठकों के. लेकिन अब कोई एसएमएस कर देता है या फोन. पत्रों में एक अभिव्यक्ति होती थी भावों की. अब कितना जुड.ाव है, तय कर पाना मुश्किल है. फिर भी असली निर्णायक पाठक है और उस निर्णय की जड. रचना में है. अगर रचना में सार्मथ्य है तो वो बची रहेगी. यही वास्तविकता है और मैं पाठकों के स्नेह और प्रतिक्रिया को ही वास्तविक पुरस्कार मानता हू.
                         प्रीति सिंह परिहार युवा पत्रकार हैं 


मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित